Friday, 22 April 2022

मोदी की भाजपा के लिए यह अयोध्या लकी नहीं होने जा रहा

भारतीय राजनीति में एक और अयोध्या को लेकर माहौल गरमाने लगा है. शुक्र मनाइए कि यह नया अयोध्या उत्तर भारत में नहीं है और इस अयोध्या के साथ किसी मस्जिद का विवाद भी जुड़ा हुआ नहीं है. नाम है अयोध्या अश्वमेधा महा मंडपम जो तमिलनाडु की राजधानी चेन्नई में स्थित है. विवाद इसके सरकार द्वारा अधिग्रहण को लेकर है और इसी मुद्दे पर बीजेपी और डीएमके के बीच खींचतान शुरू हो गई है. वैसे तो राज्य में जब भी किसी मंदिर को हिन्दू रिलीजियस एंड चैरिटेबल एडोमेंट्स डिपार्टमेंट के तहत लाया जाता है तो विरोध होता है. लेकिन इस बार का मामला थोड़ा अलग है क्योंकि इसका संचालन करने वाले श्रीराम समाज के साथ बीजेपी आकर खड़ी हो गई है. बीजेपी ने इसे हिन्दू बनाम द्रविड़ राजनीति का मुद्दा बना दिया है. बीजेपी तमिलनाडु में अपना पांव जमाने के लिए लंबे वक्त से संघर्ष कर रही है. लिहाजा अब इस बात को लेकर कानाफूसी शुरू हो गई है कि चेन्नई स्थित पश्चिमी मंबालम के आर्य गौड़ा रोड पर बने अयोध्या महा मंडपम के जिस विवाद को तूल दिया जा रहा है, क्या इसके जरिये बीजेपी दक्षिण भारत की राजनीति में अपनी हैसियत बढ़ाने में कामयाब हो सकती है? क्या बीजेपी के लिए एक और अयोध्या उसकी राजनीतिक सत्ता के लिए लकी होने जा रहा है? निश्चित रूप से इस बात पर चर्चा होनी चाहिए, लेकिन इससे पहले जानना और समझना जरूरी है कि आखिर यह अयोध्या महा मंडपम है क्या और इसको लेकर विवाद क्या है?

क्या है अयोध्या अश्वमेधा महा मंडपम?

चेन्नई के पश्चिमी मंबालम में आर्य गौड़ा रोड पर स्थित है अयोध्या अश्वमेधा महा मंडपम. कहा जाता है कि स्थानीय ब्राह्मणों ने 1950 के दशक में श्रीराम समाज की स्थापना की थी. इसके तहत एक कोष बनाया गया ताकि बड़े पैमाने पर रामनवमी का त्योहार मनाया जा सके. मौजूदा वक्त में श्रीराम समाज एक मंदिर, एक स्कूल और एक कम्युनिटी हॉल का संचालन करता है. श्रीराम समाज के इसी मंदिर का नाम है अयोध्या महा मंडपम. जिस स्थान पर मंदिर बनाया गया इस बारे में कहा जाता है उसे कांची कामकोटि पीठम के शंकराचार्य चंद्रशेखरेंद्र सरस्वती ने चुना था. श्रीराम समाज की वेबसाइट के अनुसार, शंकराचार्य इस जगह पर जब आए तो कुछ देर तक चहलकदमी करते रहे और फिर जमीन पर जिस जगह पर बैठे वहीं पर देवी-देवताओं की प्रतिमाएं स्थापित की गईं. कुछ लोग कहते हैं कि यहां राम की एक तंजौर पेंटिंग है उसी की पूजा होती है तो कुछ लोग कहते हैं कि मंडपम में कुछ मूर्तियां स्थापित की गई हैं जिसकी विधिवत पूजा होती है. श्रीराम समाज संस्था के पूर्व अध्यक्ष एम.वी. रमाणी के मुताबिक, संस्था 100 फीसदी जनता के दान पर चलती है. इस संस्था के पास करीब 100 करोड़ से अधिक की संपत्ति है. विवादों से इतर हाल में अयोध्या महा मंडपम की चर्चा इसलिए जोर-शोर से हुई थी क्योंकि बीते 1 अप्रैल 2022 को तमिलनाडु के राज्यपाल आरएन रवि ने 69वें रामनवमी कार्यक्रम का उद्घाटन किया था. इस दौरान उन्होंने कहा था कि हम महात्मा गांधी के उस सपने को सच करने की तरफ बड़ रहे हैं जब उन्होंने कहा था कि भारत में रामराज्य हो.

अयोध्या महा मंडपम पर क्यों हो रहा विवाद?

अयोध्या महा मंडपम पर विवाद दो चीजों को लेकर है. पहला यह कि यह मंदिर है या सिर्फ एक मंडप और दूसरा चढ़ावे में आने वाले पैसे और सोने का बंदरबांट. इन्हीं दो वजहों से अयोध्या महा मंडपम के सरकारी अधिग्रहण की प्रक्रिया साल 2013 में तभी शुरू हो गई थी जब प्रदेश में डीएमके की धुर विरोधी एआईएडीएमके की सरकार थी और जे. जयललिता मुख्यमंत्री थीं. विवाद पहली बार साल 2013 में तब शुरू हुआ जब श्रीराम समाज के पूर्व अध्यक्ष एमवी रमाणी ने श्रीराम समाज में पैसे की हेराफेरी और टैक्स चोरी का आरोप लगाया. मामला मद्रास हाईकोर्ट पहुंचा. कोर्ट ने रूलिंग दी कि अयोध्या महा मंडपम को राज्य के हिंदू रिलीजियस एंड चैरिटेबल एडोमेंट्स डिपार्टमेंट के तहत लाया जाए. डिपार्टमेंट ने रमाणी के आरोपों की जांच की. कुछ मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, विभाग ने यह भी पाया कि समाज ने मंडपम में राम और सीता की मूर्तियां भी स्थापित की थीं जिनकी दिन में दो बार पूजा की जाती है. इसके आधार पर विभाग ने माना कि पूजा के नियमों के अनुसार अयोध्या महा मंडपम एक मंदिर है. एचआरसीई डिपार्टमेंट की जांच के बाद कोर्ट के आदेश दिया कि श्रीराम समाज और अयोध्या मंडपम के कामकाज की देखरेख के लिए विभाग एक उचित व्यक्ति की नियुक्ति करे. जब डिपार्टमेंट ने 31 दिसंबर 2013 को उचित व्यक्ति की नियुक्ति का निर्णय लिया तो श्रीराम समाज ने इस आदेश को चुनौती दी. इसपर हाईकोर्ट ने स्टे ऑर्डर दे दिया जो आठ साल तक बना रहा. स्टे ऑर्डर की मियाद पूरी होने के बाद बीते 11 अप्रैल 2022 को कोर्ट ने स्टे हटाया और डिपार्टमेंट को आदेश दिया कि वह मंडपम को अपने दायरे में ले. श्रीराम समाज ने इस पर ऐतराज जताया और मंदिर का कंट्रोल अपने हाथ में लेने गए सरकारी अधिकारियों को खदेड़ दिया. विरोध करने वालों में इलाके के लोगों के अलावा बीजेपी के कार्यकर्ता भी थे. अब ये विवाद आने वाले वक्त में क्या रूप लेगा यह सब अभी भविष्य के गर्त में है लेकिन इतना तो तय है कि बीजेपी दक्षिण भारत के इस अयोध्या को भी राजनीतिक चश्मे से देख रही है और पूरी कोशिश होगी कि मामले को 2024 के लोकसभा चुनाव में चुनावी मुद्दा बनाया जाए ताकि तमिलनाडु की राजनीतिक जमीन पर भी कमल खिल सके.

क्या भाजपा के लिए यह अयोध्या भी लकी होगा?

अयोध्या महा मंडपम का अधिग्रहण आज की तारीख में तमिलनाडु की राजनीतिक बिसात पर सत्तारूढ़ डीएमके और बीजेपी के बीच सियासी संग्राम का सबसे बड़ा मुद्दा बन गया है. बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष के. अन्नामलाई ने आरोप लगाया है कि मंदिर अधिग्रहण का यह खेल डीएमके सरकार की ओर से जानबूझ कर अयोध्या मंडपम में होने वाले पूजा-पाठ, राम भजन और कीर्तन आदि के कार्यक्रमों पर रोक लगाने के लिए किया जा रहा है. अन्नामलाई का मानना है कि अयोध्या मंडपम के सरकारी अधिग्रहण का फैसला डीएमके सरकार की ओर से हिन्दुओं खासकर ब्राह्मणों को निशाना बनाने के लिए लिया जा रहा है. लेकिन बीजेपी इस बात को भूल रही है कि यह उत्तर प्रदेश का वो अयोध्या नहीं जिसमें बाबरी मस्जिद का टैग लगा था. दूसरी अहम बात यह कि बीजेपी भ्रष्टाचार के मुद्दे पर जीरो टॉलरेंस नीति पर काम करती है. श्रीराम समाज पर पैसों की हेराफेरी और टैक्स चोरी का आरोप है. ऐसे में बीजेपी श्रीराम समाज और अयोध्या महा मंडपम के अधिग्रहण का विरोध कैसे कर सकती है. तीसरी अहम बात यह कि बीजेपी यह भी भूल रही है कि इस मंदिर का सरकारी अधिग्रहण पहली बार कोर्ट के आदेश पर 2013 में किया गया था. इसे सरकार के अधीन लाने का आदेश दिसंबर 2013 में तत्कालीन मुख्यमंत्री जे. जयललिता की सरकार द्वारा जारी किया गया था. आदेश में तब कहा गया था कि श्रीराम समाज तमिलनाडु हिंदू धार्मिक और धर्मार्थ बंदोबस्ती अधिनियम, 1959 की धारा 6(20) के तहत एक सार्वजनिक मंदिर है. समाज के कुछ सदस्यों द्वारा मंदिर और धन के कुप्रबंधन की शिकायतों के बाद 2013 में यह आदेश जारी किया गया था. ये अलग बात है कि कोर्ट के स्टे-ऑर्डर की वजह से मामला 8 साल के लिए टल गया. ये वही एआईएडीएमके है जिसके साथ बीजेपी 2021 के विधानसभा चुनाव में गठबंधन में लड़ी थी और गठबंधन बुरी तरह से हार गई थी. बीजेपी को बामुश्किल चार सीटें मिली थीं.
 
2019 के लोकसभा चुनाव की बात करें तो बीजेपी को यह भूलना नहीं चाहिए कि जब पूरे देश में मोदी की लहर चलरही थी, तमिलनाडु में नरेंद्र मोदी जहां भी चुनाव प्रचार करने पहुंचते थे #GoBackModi ट्रेंड करने लगता था. बीजेपी का वोट शेयर तमिलनाडु में 2014 में 5.56% था जो 2019 में घटकर 3.66% रह गया. बीजेपी ने 2019 के लोकसभा चुनाव में 5 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे लेकिन सभी को हार का सामना करना पड़ा था. इस तरह के सियासी चक्रव्यूह में यह कहना कठिन है कि बीजेपी की राजनीतिक सत्ता के लिए तमिलनाडु का यह अयोध्या भी लकी साबित होगा.

(21 अप्रैल 2022 को https://www.tv9hindi.com में प्रकाशित)
https://www.tv9hindi.com/opinion/will-bjp-be-able-to-strengthen-its-position-in-the-politics-of-south-through-ayodhya-maha-mandapam-controversy-1187279.html

Thursday, 21 April 2022

कुतुब मीनार परिसर में गणेश मूर्ति की असल कहानी क्या है?


दिल्ली के महरौली इलाके में भव्य क़ुतुब मीनार दुनिया के चंद अजूबों में से एक रहा है. लेकिन मौजूदा वक्त में इसकी चर्चा दुनिया के चंद अजूबों की वजह से नहीं, बल्कि परिसर में स्थित कुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद में हिन्दू देवी-देवताओं की खंडित मूर्तियों पर उठे विवाद की वजह से हो रही है. मामला दिल्ली की अदालत तक पहुंच चुका है. कोर्ट ने भगवान गणेश की मूर्तियों को मस्जिद परिसर से बाहर ले जाने पर फिलहाल रोक लगाकर यथास्थिति बरकरार रखने का आदेश दिया है. ऐसे में सवाल यह उठता है कि आखिर कोर्ट को क्यों यथास्थिति बरकरार रखने का आदेश देना पड़ा? भगवान गणेश की मूर्तियों को मस्जिद परिसर से बाहर ले जाने या परिसर के अंदर पूजा करने की इजाजत देने से कोर्ट ने क्यों मना कर दिया है? 

ऐतिहासिक धरोहर है कुतुब मीनार परिसर 

कुतुब मीनार परिसर एक ऐतिहासिक धरोहर है. कुतुब मीनार से सटी एक मस्जिद है जो कुव्वत-उल-इस्लाम के नाम से जानी जाती है. माना जाता है कि यह भारत में मुस्लिम सुल्तानों द्वारा बनवाई गई पहली मस्जिद है. कहा यह भी जाता है कि इस मस्जिद में सदियों पुराने मंदिरों का भी बड़ा हिस्सा शामिल है. देवी-देवताओं की मूर्तियां और मंदिर की वास्तुकला अभी भी इस आंगन के चारों ओर के खंबों और दीवारों पर साफ दिखाई देती है. इतना ही नहीं, क़ुतुब मीनार के प्रवेश द्वार पर एक शिलालेख में भी लिखा है कि ये मस्जिद वहां बनाई गई है, जहां 27 हिन्दू और जैन मंदिरों का मलबा था. लेकिन इस शिलालेख पर लिखी बातों से ये स्पष्ट नहीं होता है कि मस्जिद का निर्माण इसी स्थान पर बने मंदिरों को तोड़कर बनाया गया है. हो सकता है मंदिरों को कहीं और तोड़ा गया हो और उसका मलबा उस स्थान पर फेंका गया हो जहां कुव्वत-उल-इस्लाम का निर्माण किया गया और उस निर्माण में मलबे का इस्तेमाल किया गया हो. कहने का मतलब यह कि ऐतिहासिक तथ्यों में इस बात का कोई सटीक और स्पष्ट प्रमाण मौजूद नहीं है कि एक ही स्थान पर बने 27 मंदिरों को तोड़कर उसी स्थान पर मस्जिद का निर्माण किया गया. हां, मस्जिद के कई स्तंभ और उसके ढांचे इस बात की तस्दीक जरूर करते हैं कि मंदिरों के तोड़े गए मलबे का इस्तेमाल मस्जिद में किया गया है. इस सूरत में विवाद को अगर खत्म करना हो तो खत्म किया जा सकता है. रही बात हिन्दू देवी-देवताओं की खंडित प्रतिमाओं की तो यह भारतीय पुरातत्व विभाग के संरक्षण में है और इसे पूजा के लिए इस्तेमाल की इजाजत नहीं दी जा सकती है. इस बारे में धार्मिक प्रकृति की प्राचीन इमारतों पर पुरातत्व विभाग की नीति बिल्कुल स्पष्ट है. और चूंकि मामला अदालत में जा चुका है. निचली अदालत से बात नहीं बनी तो मामला ऊपरी अदालत में भी जाएगा क्योंकि पूरे मामले की छानबीन के बाद ही कोई अंतिम फैसला दिया जाएगा. तब तक इंतजार करना पड़ेगा. इससे पहले हिन्दू देवी-देवताओं की प्रतिमा को कहीं और ले जाकर स्थापित नहीं किया जा सकता है. जैसा कि दिल्ली की अदालत ने अपने हालिया आदेश में कहा है.

विवाद के पीछे की पूरी कहानी क्या है?

राजपूत राजा पृथ्वीराज चौहान की हार के बाद शिहाबुद्दीन उर्फ मुइजुद्दीन मुहम्मद गौरी ने अपने गुलाम जनरल क़ुतुबुद्दीन ऐबक को दिल्ली का शासक नियुक्त किया था. ये कहानी 1200 ईस्वी की है. तभी क़ुतुबुद्दीन ऐबक और उसके उत्तराधिकारी शम्सुद्दीन इल्तुतमिश ने दिल्ली के महरौली में क़ुतुब मीनार बनवाया था. इसी दौर में कुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद का भी निर्माण किया गया था जिसका विस्तार बाद में कई वर्षों तक होता रहा. मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, कुव्वत इस्लाम मस्जिद में तीर्थंकर ऋषभदेव, भगवान विष्णु, गणेश जी, शिव-गौरी, सूर्य देवता समेत कई हिंदू देवी देवताओं की मूर्तियां मौजूद हैं. इनमें से ज्यादातर मूर्तियां खंडित अवस्था में पड़ी हैं. असल में नेशनल मॉन्युमेंट ऑथरिटी ने पिछले महीने भारतीय पुरातत्व विभाग को एक पत्र लिखा था जिसमें कहा गया था कि भगवान गणेश की दो मूर्तियों- ‘उल्टा गणेश’ और ‘पिंजड़े में गणेश’ को राष्ट्रीय संग्रहालय में सम्मानजनक स्थान दिया जाए जहां ऐसी प्राचीन वस्तुएं रखी जाती हैं. 25 मार्च 2022 के एनएमए चेयरमैन तरुण विजय ने संस्कृति मंत्रालय को लिखे पत्र में कहा था, ये बहुत शर्मनाक बात है कि मस्जिद परिसर के अन्दर भगवान गणेश जी की मूर्तियां बेहद अपमानजनक स्थिति में रखी गई हैं. एक मूर्ति तो ऐसी जगह है, जहां लोगो के पैर लगते है, वहीं दूसरी जाली में बंद हैं. उन्हें वहाँ से हटाकर नेशनल म्यूजियम जैसी दूसरी जगह रखा जा सकता है. यहीं से विवाद की शुरूआत हुई. दिल्ली की साकेत कोर्ट में पूजा अर्चना के अधिकार को लेकर एक अर्जी में कहा गया कि नेशनल मॉन्युमेंट अथॉरिटी के दिए सुझाव के मुताबिक, भगवान गणेश की मूर्तियों को नेशनल म्यूजियम या किसी दूसरी जगह विस्थापित नहीं किया जाना चाहिए, बल्कि उन्हें इसी परिसर में पूरे सम्मान के साथ उचित स्थान पर रखकर पूजा-अर्चना की इजाजत दी जानी चाहिए. इस मामले में एक याचिका 9 दिसंबर 2021 को भी दिल्ली की एक दीवानी अदालत में लगाई गई थी जिसमें कहा गया था कि कुतुबुद्दीन ऐबक ने 27 मंदिरों को तोड़कर उनके अवशेषों से मस्जिद का निर्माण करवाया था, इसलिए परिसर में बिखरी मूर्तियों को दोबारा स्थापित कर पूजा की अनुमति दी जाए. हालांकि, तत्कालीन जज ने तब याचिका को रद्द करते हुए कहा था कि अतीत की गलतियों के कारण मौजूदा वक्त की शांति भंग नहीं की जा सकती. 

अतीत की विरासत से छेड़छाड़ ठीक नहीं

पुरातत्व विभाग के पूर्व प्रमुख सैयद जमाल हसन की मानें तो आर्ट और आर्किटेक्चर से संबंधित जो भी इमारतें हैं, चाहे वो बौद्ध धर्म की हों, जैन धर्म की हों, हिन्दू धर्म की हों या इस्लाम की हों. अतीत की जो भी विरासत हो, निशानियां हों, हमें उन्हें 'जैसी हैं, वैसे ही रहने देना चाहिए', ताकि आने वाली पीढ़ियां यह देखकर समझ सकें कि यह किसकी वास्तुकला शैली है, यह निर्माण की गुप्त शैली है, यह शुंग शैली है, यह मौर्य शैली, यह मुगल शैली है. उस शैली को जीवित रखना हमारा काम है. दूसरी बात, मान लीजिए आज हिन्दू धर्मावलंबी भगवान गणेश व अन्य देवी देवताओं की खंडित प्रतिमा को मस्जिद से उठाकर किसी अन्य स्थान पर स्थापित कर पूजा-अर्चना करने लगेंगे तो आने वाली पीढ़ियों को यह कैसे पता चलेगा कि मुगल शासक कुतुबुद्दीन ऐबक ने मंदिरों को तोड़कर मस्जिद का निर्माण करवाया था. ऐसे बहुत सारे शोध व अध्ययन से हम वंचित रह जाएंगे जो आने वाली भविष्य की पीढ़ियां कर सकती है. कई हिन्दू संगठन और इतिहासकार ताज महल, पुराना किला, जामा मस्जिद और मुस्लिम शासकों द्वारा निर्मित कई अन्य इमारतों को हिन्दू इमारत मानते हैं. उनका मानना है कि मुस्लिम शासकों ने प्राचीन हिन्दू मंदिरों और इमारतों को ध्वस्त करके मस्जिद की शक्ल दे दी थी. इसका मतलब यह तो हो नहीं सकता कि मस्जिद के शक्ल वाली सारी इमारतों को तोड़कर मंदिर की शक्ल दे दी जाए. कम से कम ऐतिहासिक विरासत की श्रेणी में जो इमारतें हैं उन्हें तो छोड़ दिया जाए.

कोर्ट का सही वक्त पर सही फैसला

क़ुतुब मीनार परिसर में मंदिर की बहाली के लिए प्रतिबद्ध याचिकाकर्ता रंजना अग्निहोत्री जो पेशे से वकील भी हैं, कहती हैं कि भारत में जितने भी मंदिर थे, जो मुगल शासकों द्वारा हिंदुओं को अपमानित करने और मस्जिद बनाने के लिए ध्वस्त किए गये थे, हम वहां भारत की गरिमा को दोबारा बहाल करेंगे और इन मंदिरों को आजाद कराएंगे. लेकिन आजादी का मतलब अगर यह है कि ताज महल, कुतुब मीनार और जामा मस्जिद को तोड़कर वहीं मंदिर बनाना है तो यह अतीत की विरासत के साथ न्याय नहीं होगा. जो है उसकी यथास्थिति बरकरार रखते हुए अगर मंदिर का स्वतंत्र अस्तित्व खड़ा करें तो इस बात को शिलालेख पर पूरी कहानी का उल्लेख करें तो भविष्य की पीढ़ी को हम ज्यादा अच्छे से समझा सकेंगे कि पहले क्या था, फिर मुगल काल में क्या हुआ और फिर हमने क्या किया. नहीं तो फिर बात वही हो जाएगी और हम जानते भी हैं कि कई ऐसे बौद्ध मठ हैं जो मंदिर बनाए गए हैं. तो उनको फिर से बौद्ध मठ बनाने की इजाजत दी जा सकती है क्या? कहा तो यह भी जाता है कि महाबोधि मंदिर में जो मूर्ति हैं, वो शिव जी की है. फिर उसका क्या होगा? इस तरह तो यह कभी ना खत्म होने वाला सिलसिला शुरू हो जाएगा. क़ुतुब मीनार का परिसर कई साम्राज्यों का अहम केंद्र रहा है. भारत सरकार ने इसे राष्ट्रीय धरोहर के रूप में संरक्षित किया है. लिहाजा इसे धार्मिक मण्डलों में विभाजित करने की जगह ऐतिहासिक स्मारक के रूप में ही देखना बेहतर होगा. और ऐसे में दिल्ली की अदालत ने भगवान गणेश की प्रतिमा को लेकर कुतुब मीनार परिसर में यथास्थिति बरकरार रखने का आदेश सही वक्त पर सही फैसला कहा जाएगा. 

बहरहाल, कुतुब मीनार परिसर और क़ुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद में हिन्दू देवी-देवताओं की खंडित मूर्तियां ऐतिहासिक धरोहर यानी अतीत की विरासत के तौर पर संरक्षित की गई हैं. लिहाजा कोर्ट ने भी फिलहाल भारतीय पुरातत्व विभाग की गाइडलाइंस को ध्यान में रखते हुए इसे विवादों से दूर रखने की कोशिश के तहत आदेश जारी किया है. लिहाजा हिन्दू देवी देवताओं की मूर्तियों को अन्यत्र नहीं ले जाया जा सकता है और न ही उसकी पूजा की इजाजत दी जा सकती है. ऐतिहासिक धरोहरों को धार्मिक आस्था से अलग रखना चाहिए. अगर इसे विवादों में घसीटा गया तो देश में हर मंदिर और हर मस्जिद पर विवाद खड़ा किया जाएगा और फिर हमारा 'सर्व-धर्म-सम्भाव' वाला देश खतरे में पड़ जाएगा.

(21 अप्रैल 2022 को https://www.tv9hindi.com में प्रकाशित)
https://www.tv9hindi.com/opinion/quwwat-ul-islam-masjid-controversy-why-will-ganesh-idols-not-be-removed-from-the-qutub-minar-complex-1186242.html

Wednesday, 20 April 2022

एलन मस्क का ये एडवेंचरस इन्वेंशन मानवता के खिलाफ है


एलन मस्क दुनिया के बहुत सारे लोगों के लिए अति प्रेरणादायक शख्स हो सकते हैं. कुछ लोगों के लिए सुपरह्यूमन भी हो सकते हैं. और कुछ लोग तो ये तक कहने लगे हैं कि एलन मस्क इंसान नहीं एलियन हैं. लेकिन यहां बड़ा सवाल यह उठता है कि एलन मस्क नाम का इंसान अपनी दिमागी फितरत से अब तक जो कुछ करता आया है और जो कुछ करने जा रहा है क्या वह आम आदमी की जिंदगी को अब तक ऐसा कुछ दे पाया है जिससे उसकी मुश्किलें आसान हो गई हों? किसी ने बल्ब का आविष्कार किया तो लोग अंधेरी रात में भी उजाले का अहसास करने लगे. आम इंसान की जिंदगी में यह एक चमत्कार की तरह रहा. किसी ने कंप्यूटर बनाया, किसी ने मोबाइल, किसी ने टेलीविजन तो किसी ने इंटरनेट ईजाद किया और इसमें कोई दो राय नहीं कि इन आविष्कारों से लोगों की जिंदगी में बड़ा बदलाव आया. तो क्या हम एलन मस्क के आविष्कारों को ऐसी उपलब्धि के तौर पर देख सकते हैं? सैटेलाइट इंटरनेट के बाद एलन मस्क दिमाग को पढ़ने वाली जिस मशीन को लाने की बात कर रहे हैं वह साइंस की सबसे बड़ी कामयाबी हो सकती है, लेकिन यह इंसानी जिंदगी की सूरत को कितना बेहतर बनाएगा यह अभी भविष्य के गर्त में है. तमाम तरह की आशंकाएं भी है. इस बारे में जितनी मुंह उतनी बातें की जा रही हैं जिसे समझना बेहद जरूरी है.    

एडवेंचरस इन्वेंशन को जीते हैं एलन मस्क

स्पेसऐक्स, टेस्ला, सोलर सिटी आदि की बात तो छोड़ ही दीजिए, स्टारलिंक, हाइपरलूप, बोरिंग कंपनी, ओपन आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की ही बात करें तो सिवा अमीर लोगों के इससे आम आदमी की जिंदगी में क्या बदलाव आया? खैर रात गई बात गई की तर्ज पर हम इसे भी छोड़ते हैं. बात हम ट्वीटर की भी नहीं करेंगे क्योंकि यहां भी वह इस बात को स्थापित करने में लगे हैं कि जो जैसा सोचता है वैसा ही उसे ट्वीटर पर अभिव्यक्त करने की आजादी मिले. लेकिन एलन मस्क इस बात को भी जानते हैं कि इस अभिव्यक्ति की आजादी की भी अपनी सीमाएं है. इसे अपने-अपने तरीके से सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक और राजनीतिक तौर पर एक टूलकिट की तरह इस्तेमाल किया जा सकता है और किया भी जा रहा है. तो बात इससे भी बनने वाली नहीं है और शायद इसीलिए वह एक ऐसी मशीन बनाने की प्रक्रिया के अंतिम दौर में प्रवेश कर चुके हैं जो दिमाग को पढ़ सकता है. दिमाग को एक चिप के जरिये कंट्रोल किया जा सकता है. मस्क अगर ऐसा कर पाए तो निश्चित तौर पर यह साइंस की बड़ी कामयाबी हो सकती है, लेकिन यह कामयाबी उन लोगों की भी बड़ी जीत होगी जो दुनिया को अपनी मुट्ठी में करना चाहते हैं. यह उन लोगों की बड़ी जीत होगी जो नई वैश्विक व्यवस्था यानी न्यू वर्ल्ड ऑर्डर को स्थापित करना चाहते हैं. यह उन लोगों की भी बड़ी जीत होगी जो दुनिया को अपने हिसाब से कंट्रोल करना चाहते हैं. ऐसे में मस्क का यह दावा सिर्फ एक छलावा है कि इस तकनीक से ऑटिज्म और सिजोफ्रीनिया का इलाज संभव हो जाएगा. याददाश्त घटने, डिप्रेशन या नींद न आने जैसी परेशानियां इस तकनीक से दूर की जा सकेंगी. इसका असल मकसद तो इंसानी दिमाग पर कब्जा करना है. जब कब्जा करने की तकनीक हाथों में आ जाएगी तो उसपर काबू पाना आसान हो जाएगा. और तब ये आइडिया कितना खतरनाक हो जाएगा, आप इसकी कल्पना भी नहीं कर सकते हैं. ऐसे में यह कहना गलत नहीं होगा कि एलन मस्क हमेशा एडवेंचरस इन्वेंशन को जीते हैं.        

क्या है न्यूरालिंक ब्रेन चिप की पूरी कहानी?  

हमारे-आपके जीवन में कई बार ऐसा होता है कि हम-आप कुछ सोचते हैं, लेकिन उसे करने से पहले ही भूल जाते हैं. कोई बेहद महत्वपूर्ण काम या कोई पासवर्ड अचानक दिमाग से गायब हो जाता और फिर उसे याद करना मुश्किल हो जाता है. एलन मस्क का दावा है कि न्यूरालिंक ब्रेन चिप डिवाइस का इस्तेमाल याददाश्त को बढ़ाने, ब्रेन स्ट्रोक या अन्य न्यूरोलॉजिकल बीमारी से ग्रस्त मरीजों में किया जाएगा. इसके अलावा लकवाग्रस्त मरीजों के लिए भी यह फायदेमंद साबित होगी. इस डिवाइस के जरिये मरीज के दिमाग को पढ़ा जा सकेगा और डेटा को एकत्रित किया जा सकेगा. लेकिन इसी डेटा संग्रह की कहानी से शुरू होती है इस ब्रेन चिप के मकसद की असल कहानी. 21वीं सदी में डेटा की ताकत सबसे अहम हो गई है. डेटा की ताकत न सिर्फ सामाजिक, आर्थिक और धार्मिक सत्ता दिलाती है बल्कि राजनीतिक सत्ता दिलाने में भी यह अहम भूमिका निभा रही है. ऐसे में अगर इंसानी दिमाग को पढ़ पाने और उसके कंट्रोल करने की चाबी इंसान के हाथ लग जाए तो वह कितना खतरनाक खेल खेल सकता है इसका अंदाजा लगाना कठिन है. एलन मस्क दरअसल इंसानी दिमाग को मशीन से जोड़ना चाहते हैं. अभी हम या तो हाथ से मशीन कंट्रोल करते हैं या आवाज से. मस्क को लगता है कि मशीन से संवाद करने का ये तरीका धीमा है. हम सीधे अपने दिमाग से ही मशीन को क्यों नहीं कंट्रोल कर सकते हैं. इसके लिए मस्क की कंपनी न्यूरालिंक ब्रेन-मशीन इंटरफेस तैयार कर रही है. यानी ऐसी टेक्नोलॉजी कि एक चिप आपके ब्रेन में लगाने के बाद आपका दिमाग मोबाइल, कंप्यूटर या अन्य मशीनों से जुड़ जाएगा. न्यूरालिंक ब्रेन चिप की कहानी इतनी ही है. हालांकि कुछ न्यूरोसर्जन की मानें तो एलन मस्क की चिप दिमाग के सिग्नल को रिकॉर्ड तो आसानी से कर लेगी, लेकिन उन्हें डिकोड करना एक बड़ी चुनौती होगी. क्योंकि, कोई भी अभी तक शत-प्रतिशत न्यूरोन की भाषा को समझ नहीं पाया है. शायद ईश्वर ने इसे सिर्फ इंसान के शरीर की बाकी सेल्स की समझ के लिए ही बनाए हैं.

कैसे काम करेगा न्यूरालिंक ब्रेन चिप?

न्यूरालिंक ब्रेन चिप टेक्नोलॉजी आर्टिफीसियल इंटेलिजेंस की दुनिया को विकसित करने की तरफ एलन मस्क का एक और क्रांतिकारी कदम है. न्यूरालिंक टेक्नोलॉजी ऐसे न्यूरल इम्प्लांट को विकसित करने का लक्ष्य लेकर चल रही है जिससे इंसानी दिमाग को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से सिंक्रोनाइज करके कम्प्यूटर्स, कृत्रिम शारीरिक अंग और दूसरी मशीनों को सिर्फ सोचने भर से चलाया जा सके. इसके लिए विकसित की जा रही डिवाइस बेहद छोटी होगी. शायद इसका आकार नाखून के बराबर हो सकता है और ये बैटरी से ऑपरेट होगी. इसमें इस्तेमाल होने वाले तार इंसान के बालों से भी कई गुना पतले होंगे. इस डिवाइस को दिमाग के अंदर इम्प्लांट किया जाएगा. माना जा रहा है कि इस ब्रेन चिप की मदद से इंसान बिना हिले-डुले किसी भी मशीन को कंट्रोल कर सकता है. हालांकि अभी इसका ट्रायल किसी भी इंसान पर नहीं किया गया है. इसका इस्तेमाल अभी सिर्फ सूअर और बंदरों पर किया गया है. लेकिन इस चिप की मदद से वैज्ञानिक यह पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं कि तरह-तरह की गतिविधियां करते वक्त जानवरों के दिमाग में किस तरह के बदलाव होते हैं. 

अब बात न्यूरालिंक ब्रेन चिप के नफा-नुकसान की

एलन मस्क का दावा है कि उनका मिशन सफल रहा तो इंसान की सोचने-समझने की क्षमता कई गुना बढ़ जाएगी. व्हीलचेयर हो या ड्रोन, कंप्यूटर से जुड़ी किसी भी चीज को चलाने के लिए हाथ हिलाने की जरूरत नहीं रह जाएगी. आदमी सोचेगा और चीजें काम करने लग जाएंगी. अगर ऐसा हो सका तो अल्जाइमर और पार्किंसंस जैसी बीमारियों के मरीजों की जिंदगी बदल जाएगी, रीढ़ की चोट से लाचार मरीजों को नया जीवन मिल जाएगा. एलन मस्क के दावे बेशक कई बीमारियों के इलाज को लेकर उम्मीद तो जगाते हैं, लेकिन इस पूरी कहानी में कई डरावनी चुनौतियां और कई सवाल भी हैं. न्यूरोसाइंस के दिग्गजों का कहना है कि दिमाग की सर्जरी बेहद नाजुक होती है और इसे आखिरी उपाय के तौर पर आजमाया जाता है. किसी भी सेहतमंद इंसान की ब्रेन सर्जरी सिर्फ इसलिए की जाए कि वह सुपरकंप्यूटर का मुकाबला करना चाहता है, यह बात पचती नहीं है क्योंकि इसमें रिस्क बहुत ज्यादा होगा. जान भी जा सकती है. जैसा कि मस्क का दावा है कि ऐसे चिप से दुनियाभर की जानकारियां दिमाग में डाउनलोड की जा सकेंगी और इस पूरी मेमोरी को रीप्ले किया जा सकेगा. सोचिए! अगर तमाम लोग ऐसा करने लगे तो उनका दिमाग क्या कर रहा होगा? जब हर फाइल, हर किताब, हर सवाल का जवाब उस चिप के जरिए मिलने लगेगा तो क्या दिमाग सुस्त नहीं पड़ जाएगा? कहने का मतलब यह कि क्या यह कमजोरी इंसानी डीएनए में स्थापित नहीं हो जाएगी और आगे चलकर पूरी मानव जाति की सोचने-समझने की ताकत कमजोर नहीं कर देगी? सर्च इंजन गूगल इसका नायाब उदाहरण है. तीन साल का बच्चा भी अपना दिमाग लगाना छोड़ दिया है और अपनी हर उलझनों को गूगल के जरिये ही सुलझा रहा है.

एक और बड़ा खतरा जुड़ा है चिप के ब्रेन इंप्लांट से. अभी जिस तरह क्रेडिट कार्ड, डेबिट कार्ड डेटा से लेकर पर्सनल मेडिकल हिस्ट्री तक हैक करने की खबरें आती हैं, पूरा का पूरा अकाउंट खाली हो जाता है, हो सकता है न्यूरालिंक के इस ब्रेन कंप्यूटर इंटरफेस को भी हैक कर लिया जाए. अगर इंसानी दिमाग से जुड़े कंप्यूटर इंटरफेस को हैक कर लिया गया तो सोचिए फिर क्या होगा? अगर चिप इम्प्लांट वाले इंसानों के एक बड़े हुजूम को किसी पर हमला करने या किसी दूसरी बेअदबी के लिए निर्देश दे दिया जाए तो उस हालत से कैसे निपटा जाएगा? खतरा यह भी है कि इसी चिप के चलते इंसान ही मशीन बन जाए और ऐसी मशीनों को कुछ बददिमाग लोग कंट्रोल करने लगें तो क्या होगा. बहुत हद तक ये काम आज भी सोशल मीडिया और हिप्नोटिज्म विधा से किया भी जा रहा है. 

बहरहाल, न्यूरालिंक ब्रेन चिप की पूरी कहानी को पढ़ने और समझने के बाद एक बात तो तय है कि अगर यह प्रयोग सफल रहा तो इसे साइंस की सबसे बड़ी कामयाबी के तौर पर आंका जाएगा, लेकिन इसका नकारात्मक पहलू हावी हुआ जिसका अंदेशा ज्यादा है तो यह पूरी मानव जाति के अस्तित्व पर सवालिया निशान लगा देगा. विकास एक सतत प्रक्रिया है जो होते रहना चाहिए, लेकिन इसमें एक बात ध्यान रखने की है कि यह सब मानवता के लिए हो ना कि मानवता की कीमत पर. मशीन विकास का एक जरिया हो सकता है जिसे आदमी चलाता है, लेकिन अगर यही मशीन आदमी को चलाने लगे, उसे कंट्रोल करने लगे जो मौजूदा दौर में बहुत हद तक होने भी लगा है तो इंसान के वजूद को बनाए रखना शायद मुश्किल हो जाएगा. 

(19 अप्रैल 2022 https://www.tv9hindi.com में प्रकाशित)
https://www.tv9hindi.com/opinion/will-elon-musk-brain-reading-machine-be-the-biggest-science-breakthrough-since-satellite-internet-1183216.html

Saturday, 16 April 2022

चीन, पाकिस्तान, अमेरिका और रूस से भी महंगा है भारत में पेट्रोल


एक ऐसी चीज जिस पर देश की पूरी अर्थव्यवस्था टिकी हो और हम उसका करीब 86 फीसदी हिस्सा आयात करते हों तो इसका मतलब साफ है कि इसके लिए हम दूसरे देशों पर मोहताज हैं और यह तथ्य सर्वविदित है कि मोहताज होने वाली अर्थव्यवस्था में ज्यादा विकल्प होते नहीं हैं. हम बात कर रहे हैं पेट्रोल और डीजल की आसमान छूती कीमतों की. भारत में पेट्रोल और डीजल के भाव 100 रुपये प्रति लीटर पार करने के बाद से जो हंगामा मचा हुआ है उसमें एक बात अब ये निकलकर आ रही है कि दुनिया के अन्य देशों में पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर नजर दौड़ाएं तो भारत के लोग शायद अपने गम को कम कर सकते हैं. मतलब भारत के मुकाबले दुनिया के बहुतेरे देशों में पेट्रोल और डीजल की कीमतें बहुत ज्यादा है. अब इस बात में कितनी सच्चाई है इसे समझना जरूरी है.   

पीपीपी मॉडल से समझिए मूल्यवृद्धि का सच 

दुनियावी अर्थव्यवस्था में एक शब्द है क्रय शक्ति समानता जिसे अंग्रेजी में पीपीपी यानी Purchasing Power Parity कहते हैं. यह अंतर्राष्ट्रीय विनिमय का एक सिद्धांत है. यह शब्द वर्ल्ड बैंक का ईजाद किया हुआ है और इसका इस्तेमाल वैश्विक अर्थव्यवस्थाओं में जीवन की लागत के अंतर को निर्धारित करने में किया जाता है. इसका अर्थ किन्हीं दो देशों के बीच वस्तु या सेवा की कीमत में मौजूद अंतर से लिया जाता है. पीपीपी मॉडल से यह पता लगाया जाता है कि दो देशों के बीच मुद्रा की क्रयशक्ति में कितना अंतर या फिर कितनी समानता मौजूद है. पीपीपी के आधार पर ही मुद्रा विनिमय दर को तय किया जाता है. 

पीपीपी मॉडल के मुताबिक, भारत में एलपीजी की कीमत दुनिया में सबसे अधिक है, जबकि पेट्रोल की कीमत तीसरे और डीजल की कीमत आठवें नंबर पर सबसे अधिक है. भारत में एक लीटर पेट्रोल की कीमत 120 रुपये है जो पीपीपी मॉडल के अनुसार, लगभग 5.2 डॉलर (अंतरराष्ट्रीय डॉलर मूल्य) होता है जो दुनिया में तीसरे नंबर पर सबसे अधिक है. अमेरिका में यह 1.2 डॉलर प्रति लीटर है. इसी तरह से एक लीटर डीजल की कीमत भारत में 4.6 डॉलर है जो दुनिया में 8वें नंबर पर सबसे ज्यादा है. इसी तरह से एलपीजी की कीमत दुनिया भर के 54 देशों की तुलना में सबसे ज्यादा 3.5 डॉलर प्रति लीटर है. तो पीपीपी मॉडल के हिसाब से देखें तो कोई ऐसी सूरत दिखती नहीं है कि दुनिया के अन्य देशों के मुकाबले भारत में पेट्रोल, डीजल या रसोई गैस की कीमत कम है. अगर मूल्यवृद्धि की रफ्तार यूं ही बढ़ती रही तो वो दिन दूर नहीं जब एलपीजी की तरह ही पेट्रोल और डीजल की कीमतों में भी भारत नंबर एक पर पहुंच जाएगा.

पेट्रोल-डीजल की कीमतों में भारत की स्थिति क्या है?

globalpetrolprices.com पर 11 अप्रैल 2022 को जारी साप्ताहिक प्राइस इंडेक्स के मुताबिक, दुनिया के कुल 169 देशों का आंकलन करें तो भारत में पेट्रोल की औसत कीमत 112.55 रुपये प्रति लीटर है. इस सूची के मुताबिक, दुनिया के 109 देशों में पेट्रोल की कीमत भारत से कम है और 60 देशों में भारत की कीमत से ज्यादा है. दुनिया में पेट्रोल की सबसे कम कीमत वेनेजुएला में 1.89 रुपये प्रति लीटर है वहीं सबसे ज्यादा कीमत हांगकांग में 218 रुपये प्रति लीटर है. अगर हम सात पड़ोसी देशों में पेट्रोल की बात करें तो पाकिस्तान में 62.13 रुपये प्रति लीटर, अफगानिस्तान में 66.85, श्रीलंका में 67.01 रुपये, बांग्लादेश में 78.23 रुपये, बर्मा में 78.85 रुपये, भूटान में 95 रुपये और नेपाल में 99.75 रुपये प्रति लीटर पेट्रोल बिक रहा है जो भारत से काफी कम है. बड़े व विकसित देशों की बात करें तो ब्रिटेन और फ्रांस में क्रमश: 160.51 रुपये और 143.03 रुपये प्रति लीटर भारत से ज्यादा महंगा है. लेकिन अमेरिका में 90.35, रूस में 47.12 रुपये, चीन में 111.68, जापान में 102.75 रुपये प्रति लीटर पेट्रोल का खुदरा मूल्य है जो भारत से कम है.

इसी तरह से डीजल की बात करें तो भारत में डीजल की औसत कीमत 100.55 रुपये प्रति लीटर है. globalpetrolprices.com की साप्ताहिक प्राइस इंडेक्स के मुताबिक, दुनिया के 95 देशों में डीजल की कीमत भारत से कम है और 73 देशों में भारत से ज्यादा है. दुनिया में डीजल की सबसे कम कीमत ईरान में 0.77 रुपये प्रति लीटर है वहीं सबसे ज्यादा कीमत हांगकांग में 192.53 रुपये प्रति लीटर है. पड़ोसी देशों की बात करें तो पाकिस्तान में 59.76, अफगानिस्तान में 60.85, श्रीलंका में 41.67, बांग्लादेश में 70.32, बर्मा में 82.78, भूटान में 100 और नेपाल में 89.15 रुपये प्रति लीटर खुदर मूल्य है जो भारत से काफी कम है. बड़े व विकसित देशों की बात करें तो अमेरिका में यह दर 100.75 रुपये, रूस में 48.13 रुपये, जापान में 89.86, चीन में 100.39, फ्रांस में 149.22, और ब्रिटेन में 174.44 रुपये प्रति लीटर बिक रहा है. इनमें फ्रांस और ब्रिटेन को छोड़ दें तो बाकी देशों में डीजल की कीमत भारत से काफी कम है.

तो फिर भारत के लोग गम को कम कैसे करें?

हमने ऊपर पीपीपी मॉडल पर विश्लेषण कर देख लिया, फिर पड़ोसी देश और बड़े व विकसित देशों की खुदरा दरों का तुलनात्मक अध्ययन कर देख लिया. इससे तो वो बात निकलकर नहीं आई कि दुनिया के देशों में पेट्रोल-डीजल की कीमतों को देख भारत के लोग अपना गम कम कर सकते हैं. हां, एक तथ्य जरूर है जिसका गणित समझकर इस नतीजे पर पहुंचा जा सकता है कि दुनिया के अन्य देशों के मुकाबले भारत में तेल की कीमतें काफी कम हैं. 1 अप्रैल 2022 को पेट्रोल की 101.81 रुपये प्रति लीटर कीमत को आधार मानें और इसका विस्तृत ब्यौरा निकालें तो बेसिक मूल्य 53.34 रुपये प्रति लीटर का है. इस पर फ्रेट चार्ज 20 पैसे लगता है. केंद्र सरकार की एक्साइज ड्यूटी 27.90 रुपये और राज्य सरकार का वैट चार्ज 16.54 रुपये और डीलर कमीशन 3.83 रुपये प्रति लीटर लगता है. इसी तरह से 1 अप्रैल 2022 को डीजल की 93.07 रुपये प्रति लीटर कीमत को आधार मानें और इसका विस्तृत ब्यौरा निकालें तो बेसिक मूल्य 54.87 रुपये प्रति लीटर, फ्रेट चार्ज 22 पैसे, केंद्र सरकार की एक्साइज ड्यूटी 21.80 रुपये, राज्य सरकार का वैट चार्ज 13.26 रुपये और डीलर कमीशन 2.58 रुपये लगता है. कहने का मतलब यह कि अगर पेट्रोल की कीमत में केंद्र और राज्य सरकार के टैक्स को खत्म कर दिया जाए तो कीमत 57.37 रुपेय प्रति लीटर और डीजल की कीमत करीब 58 रुपये प्रति लीटर पर आ जाएगी. लेकिन गणित के इस फॉर्मूले में सरकारों की आमदनी का मसला ऐसा है जो कम होने या खत्म होने का नाम नहीं ले रहा है. यह तभी संभव है जब राज्य और केंद्र सरकार पेट्रोल और डीजल से आय पर निर्भरता कम करे. इसके अलावा सरकार अगर तेल की कीमतों को जीएसटी के दायरे में ले आए तब भी बात बन सकती है और हम भारत के लोग इस बात का दावा कर सकते हैं कि भारत में पेट्रोल, डीजल की कीमतें दुनिया के अन्य देशों के मुकाबले काफी कम हैं.

कुल मिलाकर देखें तो इस बात से इनकार नहीं कि दुनिया के बहुत सारे देश ऐसे हैं जहां भारत के मुकाबले पेट्रोल और डीजल का खुदरा मूल्य काफी ज्यादा है. हांगकांग, इजरायल, इटली, जर्मनी, फ्रांस और ब्रिटेन का नाम उदाहरण के तौर पर लिया जा सकता है. लेकिन बहुत सारे देश ऐसे भी है जहां पेट्रोल और डीजल का खुदरा मूल्य काफी कम भी है. निश्चित तौर पर जब हम इस तरह का तुलनात्मक अध्ययन करते हैं तो उसके पीछे बहुत सारे फैक्टर को शामिल किया जाता है. देश की प्रति व्यक्ति आय, देश की जीडीपी, तेल की खपत, टैक्स का हिस्सा, वाहनों की संख्या, देश की भौगोलिक परिस्थिति, देश की आबादी आदि का जब तुलनात्मक अध्ययन किया जाता है तब जाकर वास्तविक स्थिति का पता चल पाता है कि हम कहां खड़े हैं. हमारे देश में अगर तेल महंगा है तो क्यों है और किसी देश में सस्ता है तो क्यों है. आम तौर पर जब सरकारें या उससे जुड़ी एजेंसियां तेल की बढ़ती कीमतों को जायज ठहराने की कोशिश करती है तो वह उन्हीं देशों का नाम लेती है जहां कीमतें भारत से ज्यादा हैं. वह तेल की कीमतों में उछाल के प्रतिशत दर का हवाला देने लगती है अमेरिका के मुकाबले भारत में कीमतों में उछाल की दर कम रही. ऐसे में सीधी बात तो यही है कि अगर कीमतें आम जनता की जेब से बाहर हैं तो वह किसी दूसरे देश में कम है या ज्यादा है इससे कोई फर्क नहीं पड़ता. गम मिटाने का ये जरिया आर्थिक लिहाज से ठीक भी नहीं है.

(15 अप्रैल 2022 को https://www.tv9hindi.com में प्रकाशित)
https://www.tv9hindi.com/opinion/is-the-price-of-petrol-and-diesel-really-higher-in-the-world-than-in-india-1175307.html 

Thursday, 14 April 2022

पुतिन का 'वन मैन वन प्लान' फेल तो नहीं हो गया है?


करीब डेढ़ महीने का वक्त बीत चुका है. बावजूद इसके यूक्रेन रूस के खिलाफ युद्ध के मैदान में शिद्दत से डटा हुआ है. और अब तो विदेशी मीडिया रिपोर्ट्स में भी इस तरह के दावे किए जाने लगे हैं कि जिस युद्ध को क्रेमलिन 'विशेष सैन्य अभियान' कहता आ रहा है वह अब कमजोर पड़ने लगा है. पश्चिमी देशों के सैन्य विश्लेषक भी इस बात को लेकर आश्चर्यचकित हैं कि आखिर रूसी सेना कैसे कमजोर पड़ गई है. नाटो के ताजा अनुमानों को अगर सही मानें तो रूसी सेना के करीब 15000 सैनिक घायल अवस्था में हैं. इन घायल सैनिकों का तेजी से ड्यूटी पर लौटना यानी फिर से मोर्चा संभालना मुमकिन नहीं है. मृतकों की संख्या लगभग दोगुनी है. इसका अर्थ यह हुआ कि रूस ने बीते डेढ़ महीने के संघर्ष में लगभग 45,000 सैनिकों को खो दिया है. रूसी युद्धक वाहनों की बात करें तो करीब 2500 वाहनों को या तो नष्ट कर दिया गया है या यूक्रेन ने उसे कब्जा लिया है. इसमें 450 मुख्य युद्धक टैंक और 825 बख्तरबंद लड़ाकू वाहन, पैदल सेना से लड़ने वाले वाहन और बख्तरबंद वाहन शामिल हैं. हालांकि ये कहना अभी जल्दबाजी होगा कि रूस युद्ध में कमजोर पड़ गया है. हां, एक बात जरूर है कि यूक्रेन को कब्जे में लेने के लिए रूस जैसे ताकतवर देश को डेढ़ महीने का वक्त लग जाए, चौंकाता जरूर है. कुछ तो ऐसी बात यूक्रेनी युद्धवीरों में जरूर है जो रूसी सेना के हौसले को पस्त कर रखा है. 

फेल तो नहीं हो गया वन मैन, वन प्लान?

ऐसा लगता है कि यूक्रेन को लेकर रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की राष्ट्रवादी सोच ने रणनीतिक तौर पर फ़ैसला लेने की उनकी क्षमता को धुंधला कर दिया है. शुरूआती दौर से ही यूक्रेन पर हमले को राष्ट्रपति पुतिन युद्ध नहीं, बल्कि विशेष सैन्य अभियान कहते आ रहे हैं. 24 फरवरी को जब रूस ने यूक्रेन पर हमला किया था तो पुतिन को शायद इस बात का अंदाजा नहीं होगा कि जीतने में उन्हें इतना लंबा वक्त लग जाएगा. ऐसा लगता है कि राजनीतिज्ञों और सेना की एजेंसियों, यहां तक कि सेना के जवानों और अफसरों के बीच भी अभियान को लेकर संवादहीनता की स्थिति रही है. इस बात से भी इनकार नहीं है कि सेना ने युद्ध की योजना एक ऐसे विशेष अभियान के रूप में की थी, जिसके बारे में कम ही लोगों को जानकारी हो. सीधी बात करें तो तो यह पुतिन का 'वन मैन, वन प्लान' जैसा है. युद्ध की रणनीति बनाई जाती है तो उसमें बहुत लोगों की भूमिका होती है और एक-दो नहीं दर्जनों प्लान के साथ मोर्चे पर सेना को तैनात किया जाता है. अगर यह बात सच है कि रूसी सेना यूक्रेन में फेल होती नजर आ रही है तो इसके पीछे पुतिन का ''वन मैन, वन प्लान'' को बड़ी वजह के तौर पर देखा जा सकता है. 

मौसम और जमीनी हालत रूसी सेना के प्रतिकूल

रूस एक विशाल देश है. यहां अलग-अलग जगहों पर मौसम और जमीनी हालात बिलकुल अलग-अलग हैं. रॉयल यूनाइटेड सर्विसेस इंस्टीट्यूट में रीसर्च फेलो एमिली फेरिस की मानें तो यूक्रेन में मौजूद रूसी सेना लॉजिस्टिक्स से जुड़ी दिक्कतों को झेल रही है. सेना को हथियार, गोला-बारूद, ईंधन, रसद, यूनिफॉर्म आदि की सप्लाई चाहिए. इसके साथ ही पुराने व घायल सैनिकों की जगह नए सैनिक चाहिए. किसी और सेना के मुक़ाबले रूस अपने सैनिकों और हथियारों को एक जगह से दूसरी जगह ले जाने और रसद की आपूर्ति के लिए ट्रेनों का इस्तेमाल करता है. ऐसे भी सेना के लिए रेल ट्रांसपोर्टेशन सबसे बेहतर जरिया माना जाता है. लेकिन किसी दूसरे देश पर हमले की परिस्थिति में इसका इस्तेमाल कितना हो पाएगा इसकी गारंटी नहीं होती है. हकीकत ये है कि रेल गाड़ियों से आ रही सप्लाई को सैनिकों तक पहुंचाने के लिए रूस के पास अधिक ट्रक नहीं हैं. इस वजह से रूसी सेना के लिए यूक्रेन में भीतर तक घुस पाना मुश्किल हो रहा है. ऐसे में अगर ये ट्रक बेकार हो गए या फिर दुश्मन ने नष्ट कर दिया जैसा कि यूक्रेनी सेना खूब कर रही है. यूक्रेन के उत्तरी हिस्से में दलदल की समस्या काफी गंभीर है. दलदल में फंसकर रूसी सेना के कई ट्रक ख़राब हुए हैं. इसके अलावा एक और बड़ी समस्या यह भी है कि कई ट्रकों का मेंटिनेंस भी बेहतर तरीके से नहीं हो पा रहा है. अगर ट्रकों के टायर पुराने हो गए होंगे तो वो यूक्रेन के मौसम को झेल नहीं पाएंगे और फट जाएंगे. तो इन सारी वजहों से दुश्मन की जमीन पर रूसी सेना की सप्लाई चेन प्रतिकूल परिस्थिति से गुजर रही है और इसका सीधा असर युद्ध में रूसी सेना के मनोबल को कमजोर कर रहा है. 

यूक्रेन के नागरिकों का साहस बड़ा फैक्टर

रूस और यूक्रेन की सेनाओं के मनोबल में बड़ा अंतर है. यूक्रेन के लोग अपने देश के अस्तित्व के लिए लड़ रहे हैं, वो अपने देश को संप्रभु राष्ट्र के तौर पर देखते रहना चाहते हैं. यूक्रेन के नागरिक अपनी सरकार और राष्ट्रपति के साथ खड़े हैं. यही वजह है कि जिन आम नागरिकों के पास मिलिट्री का कोई अनुभव नहीं है वो भी हथियार उठाकर अपने शहर और कस्बों की सुरक्षा के लिए रूसी सेना पर घात लगाकर बैठ गए हैं. किसी भी देश का नागरिक शायद अपने अस्तित्व के लिए इसी तरह लड़ते हैं. वो अपनी मातृभूमि और परिवार की रक्षा इसी तरह से करते हैं. उनका साहस, शानदार और चौंकाने वाला दोनों है.' अगर रूस की बात करें तो ज्यादातर रूसी सैनिक स्कूल से अभी-अभी पासआउट युवा हैं. उन्हें लगा था कि वो सिर्फ एक युद्ध अभ्यास पर जा रहे हैं, लेकिन यहां तो उनका सामना एक पूर्ण युद्ध से हो गया है. कहने का मतलब यह कि ज्यादातर रूसी सैनिक इस तरह की लड़ाई के लिए शारीरिक व मानसिक तौर पर तैयार नहीं थे या उनके पास युद्ध का बिलकुल थोड़ा अनुभव था.

दूसरी अहम बात यह है कि यूक्रेन के सैनिकों की संख्या रूस के सैनिकों की संख्या से बेशक कम हैं, लेकिन वो जमीन और अपने हथियारों का इस्तेमाल रूस से ज्यादा बेहतर तरीके से कर रहे हैं. एक तरफ रूस है जो कतारों में सैनिकों और सैन्य वाहनों को रखता है. धीमी गति से वो एक साथ आगे बढ़ते हैं तो दूसरी तरफ यूक्रेन के सैनिक छापामार तरीके का युद्ध कर रहे हैं. 'हिट एंड रन' की युद्ध नीति अपना रहे हैं, चुपके से एंटी-टैंक मिसाइल को फायर करते हैं और रूस की जवाबी कार्रवाई आने से पहले ही निकल जाते हैं. दरअसल, इस लड़ाई से पहले अमेरिका, ब्रिटेन और कनाडा के नाटो ट्रेनर्स यूक्रेन में लंबा वक्त गुजार चुके हैं. ऐसे में वो यूक्रेन के सैनिकों को रक्षात्मक युद्ध में तेजी लाने के बारे में और मिसाइल सिस्टम का बेहतर इस्तेमाल करने के बारे में निर्देश दे चुके हैं.

साइबर अटैक की रूसी योजना का फेल हो जाना

रूस ने यूक्रेन के खिलाफ युद्ध की जो रणनीति बनाई थी उसमें ये भी तय हुआ था कि रूसी साइबर अटैक की वजह से यूक्रेन के संचार तंत्र पूरी तरह से बर्बाद हो जाएंगे, लेकिन ऐसा हुआ नहीं. बजाय इसके यूक्रेन ने युद्ध के मोर्चे पर प्रभावी तालमेल बनाए रखने में बड़ी कामयाबी हासिल की है. यूक्रेन की सरकार कीव में पूरी तरह से सक्रिय दिख रही है. वहीं रूस के पास किसी भी तरह का यूनीफाइड मिलिट्री लीडरशिप नहीं है. अलग-अलग युद्ध के मोर्चे के बीच भी तालमेल की कमी है. रक्षा विशेषज्ञ जस्टिन क्रंप की मानें तो यूक्रेन ने लोकल और ग्लोबल दोनों ही स्तरों पर बढ़त हासिल करने के लिए सूचना के क्षेत्र का जबरदस्त इस्तेमाल किया है. यूक्रेनी सरकार ने पूरी दुनिया में युद्ध के नैरेटिव पर सफलतापूर्वक नियंत्रण हासिल किया है. इन वजहों से भी रूसी सैनिकों के मनोबल पर नकारात्मक प्रभाव पड़ने का अनुमान लगाया जा रहा है.

इसमें कोई दो राय नहीं कि रूस के पास दुनिया की सबसे ताकतवर सेना है. ये अलग बात है कि अभी तक रूस ने यूक्रेन में अपनी ताकत का अहसास कराया नहीं है. युद्ध की मीडिया रिपोर्टिंग दो पक्षों में बंटी सी दिख रही है, लिहाजा जमीनी हकीकत या तो दबाई जा रही है या फिर देरी में निकलकर आम लोगों तक पहुंच रही है. नाटो का पूरा तंत्र सक्रिय है और ज्यादातर पश्चिमी मीडिया यूक्रेन के पक्ष में रिपोर्ट करता दिख रहा है. इस बात से इनकार नहीं कि रूसी सेना के लिए यूक्रेन के अंदर की भौगोलिक परिस्थिति बहुत अनुकूल नहीं है. लेकिन अभी भी बड़ी संख्या में रूसी सैनिकों की मौजूदगी बताता है कि युद्ध यूक्रेन के पक्ष में नहीं है. पुतिन वन मैन की तरह व्यवहार जरूर कर रहे हैं लेकिन युद्ध की प्लानिंग को लेकर उनके चेहरे पर कोई शिकन नहीं है. सच तो यह है कि पुतिन का मकसद यूक्रेन को पूरी तरह से कब्जाना नहीं है बल्कि नाटो देशों को यह संदेश देना है कि वह रूस की सीमा से प्यार करने की जुर्रत न करे. और इतना काम पुतिन सफलतापूर्वक कर चुके हैं.

(13 अप्रैल 2022 को https://www.tv9hindi.com में प्रकाशित)
https://www.tv9hindi.com/opinion/russia-ukraine-war-what-is-the-reason-that-the-russian-army-seems-weak-in-ukraine-1171810.html

Tuesday, 28 December 2021

मोदी के लिए कृषि कानूनों को फिर से लाना 2024 से पहले असंभव

मोदी है तो मुमकिन है का लोकप्रिय नारा विपक्ष का पीछा नहीं छोड़ रहा है और विपक्ष भी ऐसा कि इसी नारे की कालिख सत्ता के मुंह पर पोतकर चुनावी वैतरणी पार करने की कोशिश में जुटी है. आमतौर पर ऐसा होता नहीं है, लेकिन उत्तर प्रदेश और पंजाब समेत पांच राज्यों में विधानसभा चुनावों की गरमागरमी के बीच एक बार फिर से यह चर्चा तेज हो गई है कि जिन तीन कृषि कानूनों को हाल ही में रद्द किया गया है सरकार उसे फिर से ला सकती है. दरअसल, देश के कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर अपने हालिया भाषण में कुछ ऐसा बोल गए जिसे देश की प्रमुख विपक्षी पार्टी कांग्रेस ने एक बड़े मुद्दे के तौर पर उछाल दिया है. अब कृषि मंत्री तोमर घूम-घूम कर सफाई देते फिर रहे हैं कि हमने ऐसा नहीं कहा है. यह विपक्ष की घिनौनी राजनीति है.

दरअसल, केंद्रीय कृषि मंत्री पिछले दिनों महाराष्ट्र के उस शहर में थे जो भाजपा की मातृ संस्था राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का मुख्यालय भी है. इस शहर से सत्ता का कोई भी बयान जारी होता है तो उसके मायने निकाले जाते हैं. ऐसा ही हुआ कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर के साथ. महाराष्ट्र के नागपुर में आयोजित एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कृषि मंत्री ने जो बात कही उसे ध्यान से पढ़िए और शब्दों पर गौर कीजिए– ”हम कृषि सुधार कानून लेकर आए थे. कुछ लोगों को रास नहीं आया. लेकिन वो 70 वर्षों की आजादी के बाद एक बड़ा रिफॉर्म था जो नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व में आगे बढ़ रहा था. लेकिन सरकार निराश नहीं है. हम एक कदम पीछे हटे हैं. आगे फिर बढ़ेंगे क्योंकि हिन्दुस्तान का किसान हिन्दुस्तान की बैक बोन है.”

क्या फिर से कृषि कानून ला सकती है सरकार?

असल में जब आप मंत्री जी के भाषण का वीडियो देखेंगे तो ज्यादा समझ में आएगा. ‘हम एक कदम पीछे हटे हैं. आगे फिर बढ़े हैं’ इस वाक्य को बोलने के दौरान मंत्री जी के चेहरे पर जो भाव था और जिस तरह की उत्तेजना झलकी वह इस बात को इंगित करने के लिए काफी है कि कोई इस भ्रम में न रहे कि सरकार ने तीन कृषि कानूनों को सदा के लिए रद्द किया है. उसे सत्ता अपने फायदे के लिए स्थगित किया है. वक्त निकल जाने के बाद उसे फिर से लाया जा सकता है. मतलब साफ है- मोदी है तो मुमकिन है. बस इसी मुद्दे को चुनावी हथियार बनाकर कांग्रेस पार्टी देश को यह बताने और समझाने में जुट गई है कि सरकार किसानों को चुनौती के अंदाज में कह रही है कि ”आंदोलन को खत्म करना था लिहाजा हम थोड़ा पीछे हटे हैं. इस भ्रम में मत रहना कि हम तुम्हारे साथ खड़े हो गए हैं.” कांग्रेस ने सरकार पर पूंजीपतियों के दबाव में दोबारा काले कानूनों को वापस लाने की साजिश रचने का आरोप लगाते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से स्पष्टीकरण मांगा है. पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने तोमर के इस बयान को पीएम मोदी की माफी का अपमान करार देते हुए कहा कि सरकार ने इन विवादास्पद कानूनों पर यदि फिर से अपने कदम आगे बढ़ाए तो देश का किसान फिर सत्याग्रह करेगा. पहले भी अहंकार को हराया था, फिर हराएंगे!

राकेश टिकैत की प्रतिक्रिया के मायने भी समझिए

अगर आपको याद हो तो गाजीपुर बॉर्डर छोड़ने से पहले भारतीय किसान आंदोलन के प्रवक्ता और किसान आंदोलन के प्रमुख चेहरा राकेश टिकैत ने कहा था कि किसान आंदोलन अभी खत्म नहीं हुआ है. आंदोलन अभी स्थगित हुआ है. हम फिर वापस आएंगे क्योंकि अभी तो सिर्फ तीन कृषि कानूनों की ही वापसी हुई है. फसलों की एमएसपी का असली मुद्दा तो अभी बचा ही हुआ है जिसपर सरकार को फैसला करना है. कृषि मंत्री के खलबली मचाने वाले बयान के तुरंत बाद राकेश टिकैत ने भी चेतावनी दे दी कि किसान आंदोलन फिर से शुरू हो सकता है. टिकैत की यह चेतावनी भी कोई ऐसी-वैसी जगह नहीं, किसानों के गढ़ और राजेश पायलट की कर्मभूमि राजस्थान के दौसा में मीडिया के बीच जारी की. टिकैत ने कहा कि केंद्र सरकार ने सिर्फ तीन कृषि कानून ही रद्द किए हैं, किसान संगठनों की अन्य मांगें अभी नहीं मानी गई हैं. सत्ता पक्ष टिकैत के बयान को भले ही ‘थोथा चना बाजे घना’ के अंदाज में ले रही हो, लेकिन किसान आंदोलन को करीब से समझने वाले विश्लेषक इस बात की तरफ इंगित कर रहे हैं कि टिकैत की प्रतिक्रिया को देखते हुए कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर के बयान को हल्के में नहीं लिया जा सकता है. ऐसे भी तोमर का व्यक्तित्व गंभीर किस्म का है. लिहाजा उनके बयान को गंभीरता से लिया जाना चाहिए और उसकी गंभीर व्याख्या होनी चाहिए ताकि इस बात का पता चल सके कि अगर फिर से कृषि कानून लेकर सरकार आती है तो उसका स्वरूप क्या होगा?

2024 से पहले कानून को फिर से लाना असंभव

हालांकि कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर कोई इकलौते नेता नहीं हैं जिन्होंने कृषि कानूनों को फिर से लाने की तरफ इशारा किया हो. उन्नाव से भाजपा सांसद साक्षी महाराज भी कह चुके हैं कि राष्ट्र विरोधी ताकतों की वजह से कृषि कानूनों को वापस लिया गया है. बिल का क्या है? बनता है, बिगड़ता है. फिर वापस आ जाएगा. राजस्थान के राज्यपाल कलराज मिश्र ने भी कुछ इसी तरह के संकेत देते हुए कह चुके हैं कि जरूरत पड़ी तो किसान बिल को फिर से ड्राफ्ट करके लाया जाएगा. लेकिन भाजपा नीत मोदी सत्ता 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले इस तरह का कोई रिस्क लेना नहीं चाहेगी. क्योंकि सरकार को भी अच्छे से पता है कि कानून कोई जादुई छड़ी नहीं कि घुमा दी और सुधार हो गया. भारत में हजारों कानून हैं, लेकिन कितने कारगर हैं ये कानून समस्याओं का समाधान कराने में? असल में सुधार, बदलाव या परिवर्तन एक प्रक्रियागत चीजें हैं जिसका सरकार द्वारा समग्र प्रबंधन किया जाना बेहद जरूरी होता है. 

कृषि कानूनों के संदर्भ में बात करें तो यहां सुधार या परिवर्तन के प्रबंधन पर जोर नहीं दिया गया, सिर्फ कायदे-कानून पर जोर दिया गया. इसी मूल वजह से सरकार को कृषि कानूनों को वापस लेना पड़ा. और उससे भी बड़ा सच यह कि प्रचार-प्रसार के बल पर सरकार बिग रिफॉर्म का एक परसेप्शन गढ़कर इन तीन कृषि कानूनों को लागू करना चाहती थी. चूंकि किसान देश की नब्ज जानते हैं, पहचानते हैं लिहाजा वो सत्ता की नीयत को आसानी से भांप गए. उन्हें सरकार की नीयत पर शक हुआ कि आखिर सत्ता चाहती क्या है? कृषि सुधारों का क्रियान्वयन कैसे होगा? कृषि सुधार के लिए जरूरी था कि तमाम स्टेकहोल्डर्स से, किसान संगठनों से संवाद किया जाता, इसके तहत सरकार और किसान अपना-अपना पक्ष रखते. लेकिन ऐसा हो नहीं पाया और एक बड़ा आंदोलन खड़ा हो गया. जिससे जैसे-तैसे सरकार ने पीछा छुड़ाया. अब आगामी चुनावों में किसानों द्वारा न्यूनतम समर्थन मूल्य (एसएसपी) गारंटी कानून की मांग ही सरकार के लिए मुसीबत का सबब बना रहेगा. लिहाजा तीनों कृषि कानूनों को फिर से लाने का रिस्क कम से कम 2024 के लोकसभा चुनाव तक सरकार लेने की स्थिति में बिल्कुल नहीं है.

बहरहाल, आने वाले वक्त में मोदी सत्ता के समक्ष कई चुनौतियां हैं. बंगाल चुनाव में पराजय के बाद यूपी का चुनाव दोबारा से जीतना सबसे बड़ी चुनौती सामने खड़ी है. आरएसएस की भी अपनी महत्वाकांक्षाएं हैं और उसकी चाहत है कि 2025 में संघ के शताब्दी समारोह का जश्न मोदी सत्ता की चकाचौंध में मने. लिहाजा संघ और भाजपा दोनों के लिए जरूरी है कि तमाम विवादित मसलों को किनारे रखकर येन-केन-प्रकारेण 2022 में यूपी फतह और फिर 2024 में देश का जनादेश भाजपा के पक्ष में खड़ा हो. ऐसे में इस बात के आसार कम ही हैं कि सरकार कृषि कानूनों को दोबारा से लाकर फिर से एक और किसान आंदोलन की मुसीबत मोल ले.

(27 दिसंबर 2021 को https://www.tv9hindi.com में प्रकाशित)
https://www.tv9hindi.com/opinion/farmers-protest-re-introducing-agricultural-laws-impossible-before-2024-977991.html 

Sunday, 26 December 2021

हां हैं भारत में ‘काम के घंटे’ सबसे ज्यादा, क्या कर लोगे?


देश में नए श्रम कानूनों (Labor Laws) को लागू करने की आहट फिर से सुनाई देने लगी है. कहा जा रहा है कि अगर ऐसा हुआ तो कर्मचारियों को हफ्ते में चार दिन ही काम करना पड़ेगा. बाकी के तीन दिन वो छुट्टियां मना सकेंगे. लेकिन क्या इससे भारत ऐसा देश भी बन सकेगा जहां दुनिया के अन्य देशों के मुकाबले काम के घंटे कम हो जाएंगे? तो इसका जवाब है- बिल्कुल नहीं. काम के घंटे पहले की तरह ही सप्ताह में 48 घंटे की बनी रहेगी. इसमें कोई दो राय नहीं कि दुनिया के तमाम देशों में श्रम कानूनों के तहत काम के जो घंटे निर्धारित हैं उसमें भारत में काम के घंटे और काम का सप्ताह दुनिया में सबसे ज्यादा लंबा है. यह एक कठोर सत्य है. लेकिन बात यहीं खत्म नहीं होने वाली. मुश्किलें और भी बढ़ने वाली हैं. हालांकि ऐसा भी नहीं है कि सिर्फ भारत में ही 48 घंटे का साप्ताहिक कार्य दिवस है. बांग्लादेश, वियतनाम, ब्रिटेन आदि में भी 48 घंटे का ही साप्ताहिक कार्य दिवस है, लेकिन ये भी सत्य है कि कानूनी तौर पर 48 घंटे से ज्यादा काम के घंटे दुनिया के किसी भी देश में नहीं है.

भारत में वाकई काम के घंटे सबसे ज्यादा हैं?

दुनिया के कई देशों में काम के घंटे की कानूनी प्रक्रिया का पूरी तरह से पालन नहीं किया जाता है. भारत भी इससे अछूता नहीं है. राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण कार्यालय (NSSO) की पहली आवर्ती श्रम बल सर्वे (PLFS) के डेटा का तो यही कहना है कि दुनिया के अन्य देशों के कर्मचारियों की तुलना में भारत के लोग सबसे ज्यादा घंटे काम करते हैं. भारत की सांख्यिकी एजेंसी की ओर से काम के घंटे पर किया गया यह पहला आधिकारिक सर्वे है, जिसमें यह बात सामने आई कि यहां के शहरों में औसतन एक कर्मचारी हर हफ्ते 53 से 54 घंटे काम करता है और गांव में 46 से 47 घंटे. काम के ये घंटे अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) की ओर से तय किए गए काम के घंटों की सीमा से ज्यादा है. हालांकि सरकार ने इस सर्वे को जारी नहीं किया. अलग-अलग मीडिया रिपोर्ट्स और एजेंसियों के आंकड़े बताते हैं कि दुनिया के कुछ प्रमुख देशों मसलन ऑस्ट्रेलिया में सप्ताह में 38 घंटा, दक्षिण कोरिया में 40 घंटा, फ्रांस में 35 घंटा, अमेरिका में 40 घंटा, रूस में 40 घंटे का ही कार्य दिवस तय है. आर्थिक इतिहासकार माइकल ह्यूबरमैन और क्रिस मिंस का अध्ययन इस बात की तस्दीक करता है कि दुनिया के ज्यादातर देशों खासतौर से अधिक आय वाले देशों में पिछले 150 सालों में काम के औसत घंटे में काफी कमी आई है. 1870 की औद्योगिक क्रांति के बाद काम के घंटे कम हुए. खासकर उन देशों में, जहां औद्योगीकरण पहले हुआ. लेकिन भारत जैसे देश में आर्थिक उदारीकरण की बयार के साथ गैरकानूनी तरीके से काम के घंटे को बढ़ा दिया गया. देश में बहुत सारे संस्थान इस रूप में काम करने लगे जो कागजी तौर पर तो श्रम कानूनों का अक्षरश: पालन करते हैं, लेकिन व्यवहार में इसकी घनघोर अनदेखी करते हैं.

क्यों होती है ‘काम के तय घंटे’ की अनदेखी?

मशहूर ब्रिटिश अर्थशास्त्री जॉन मेनार्ड कीन्स ने 1930 में भविष्यवाणी की थी कि तकनीकी परिवर्तन और उत्पादकता में सुधार के साथ एक ऐसा वक्त आएगा जब हम सप्ताह में सिर्फ 15 घंटे काम कर रहे होंगे, मतलब हर रोज तीन घंटे काम. आज जब हम काम के घंटों के आंकड़ों में झांकते हैं तो हम में से अधिकांश अभी भी सप्ताह में औसतन 42 घंटे से अधिक काम कर रहे हैं. और भारत की तो बात ही जुदा है जहां कानूनी तौर पर दुनिया में सबसे ज्यादा, सप्ताह में 48 घंटे की कार्य अवधि तय है. आखिर कीन्स से गलती कहां हुई? हमें ऐसा लगता है कि कीन्स ने जिन चीजों को कम करके आंका, उनमें से एक है हमारे साथियों के साथ प्रतिस्पर्धा करने की मानवीय इच्छा. एक ऐसी इच्छा जो हममें से अधिकांश को जरूरत से ज्यादा काम करने के लिए मजबूर करता है. उन देशों में तो और भी ज्यादा जहां बड़ी आबादी के बीच भीषण बेरोजगारी और इस वर्क फोर्स का शोषण करने के लिए बड़े-बड़े महाजन यानि कॉरपोरेट हैं. दरअसल कीन्स एक कट्टर अर्थशास्त्री थे और इस बात की सूक्ष्मता को आंकने में चूक गए कि मानव जाति की सामाजिक व आर्थिक इच्छा से जुड़ी स्पर्धा भी एक फैक्टर हो सकता है जो अर्थशास्त्र के बने-बनाए सिद्धांत को झकझोर कर रख देता है. इससे इतर, श्रम कानून से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि भारत की आबादी का एक बड़ा श्रम बल असंगठित क्षेत्र से जुड़ा है. इन असंगठित क्षेत्रों में काम करने वाले कर्मचारियों का वेतन बहुत कम होता है, जिसकी वजह से उन्हें ज्यादा घंटे तक काम करने को मजबूर होना पड़ता है. हालांकि फैक्टरी अधिनियम 1948 में कहा गया है कि मजदूरों से सप्ताह में 48 घंटे से ज्यादा काम नहीं कराया जा सकता और अगर इससे ज्यादा काम कराया जाता है तो ओवरटाइम देना होगा. लेकिन इसका पालन कितना हो पाता है वह किसी से छिपा नहीं है.

कहीं जापान जैसा हाल न हो जाए भारत का भी

अगर आप काम के घंटे को लेकर जापान के हालात का अध्ययन करें तो तथ्य काफी डराते भी हैं और चौंकाते भी हैं कि कहीं भारत का वर्क फोर्स जापान की तर्ज पर तो आगे नहीं बढ़ रहा. जापान जैसे देश में लोग रोजाना 16-16 घंटे काम कर रहे हैं. लोगों के काम करने के एडिक्शन से यहां की सरकार भी परेशान है. चेक गणराज्य की राजधानी प्रॉग में जन्मे डेविड टेसिन्स्की की जापानी श्रमिकों की दिनचर्या को दिखाने वाली उन तस्वीरों को कौन भूल सकता है. ‘The Man-Machine’ नाम की फोटो सीरिज वाली रिपोर्ट में डेविड कहते हैं कि उन्हें जापानी कर्मचारी रोबोट की तरह लगे. सालों-साल उनका एक ही रुटीन रहता है. सुबह काम पर निकलना, दिनभर काम, फिर ओवरटाइम, उसके बाद सहकर्मियों के साथ बातचीत, ड्रिंक्स और फिर देर रात घर वापसी. इतना ही नहीं, ज्यादातर लोग बस, ट्रेन जैसी सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था का इस्तेमाल करते हैं. टैक्सी लेना या खुद की कार रखना उनके जेब से बाहर की बात होती है. देर रात जब बस और ट्रेन बंद हो चुकी होती है तो कई वर्कर सड़क किनारे ही सो जाते हैं. डेविड कहते हैं कि लोग सड़कों पर भूत की तरह चलते हैं, खुद में खोए-खोए, नींद भरी आंखों के साथ. कई लोग तो खड़े-खड़े सोते मिले. इनमें से हर कोई यही कहता है कि बस पांच साल इस तरह काम कर लूं, फिर फलां पोजीशन पर पहुंच जाऊंगा. भारत में काम के घंटे की परिस्थिति की गंभीरता को समझने की अगर कोशिश की जाए तो संकेत अच्छे नहीं हैं. कोविड काल में हमने बहुत कुछ नंगी आंखों से देखा भी.

काम के घंटों में हो सकता है और इजाफा

साल 1870 की बात करें तो ज्यादातर देशों में लोग साल में 3,000 घंटे से अधिक काम करते थे, मतलब हर हफ्ते 60-70 घंटे. लेकिन आज के वक्त में काम के घंटे तब के मुकाबले आधे हो गए हैं, उदाहरण के लिए, जर्मनी में जहां काम के घंटे 60 प्रतिशत कम हुए हैं वहीं ब्रिटेन में काम के घंटों में 40 प्रतिशत की कमी आई है. लेकिन भारत और चीन की बात करें तो यहां काम के घंटे पहले से बढ़े हैं. भारत में 1970 में जहां लोग औसतन साल में 2,077 घंटे काम करते थे, साल 2020 में बढ़कर 2,117 घंटे हो गए यानि इसमें 2 फीसदी का इजाफा हुआ है. चीन का आंकड़ा भारत से भी दो कदम आगे है. यहां 1970 में लोग 1976 घंटे सालाना काम करते थे, 2020 में बढ़कर 2,174 घंटे हो गए यानि 10 फीसदी का इजाफा. पिछले पांच दशक का इतिहास इस बात की ताकीद करता है कि आने वाले दिनों में भारत में काम के घंटों में और इजाफा हो सकता है. अगर ऐसा हुआ तो ‘आठ घंटे का आंदोलन’ का वजूद ही मिट जाएगा जिसने लंबे संघर्ष के दौरान हजारों कुर्बानियां दीं. 1886 में एक नारा गढ़ा गया था- ‘आठ घंटे काम, आठ घंटे आराम और आठ घंटे मनोरंजन!’ और इसी नारे के साथ अमेरिका के 13 हजार से अधिक व्यापारिक प्रतिष्ठानों में काम करने वाले करीब तीन लाख मजदूर अपनी एकजुटता का प्रदर्शन करते हुए सड़कों पर उतर आए थे. कहते हैं कि ‘आठ घंटे का आंदोलन’ इन मजदूरों के पांच दशक के संघर्षों की गाथा का चरम था.

बहरहाल, हालात एक बार फिर से 1886 के पहले जैसी होती दिख रही है जब लोग हर दिन 15 घंटे से ज्यादा काम करते थे. कोविड महामारी के संकट से जूझ रही पूरी दुनिया और खासतौर से भारत में मजदूरों की जिंदगी तो खतरे में पड़ी ही, उसके 8 घंटे के कार्यदिवस पर भी सरकार और कॉरपोरेट का हथौड़ा चलने लगा है. फैक्ट्रियों से लेकर बड़े-बड़े कॉरपोरेट दफ्तरों तक में 8 घंटे के कार्यदिवस को आईना दिखाया जा रहा है और कहा जाने लगा है कि दफ्तर में आने का समय होता है, जाने का नहीं. आने वाले वक्त में 12 घंटे या उससे अधिक वक्त तक काम करने की परिस्थिति तमाम मजदूरों-कर्मचारियों, चाहे वह शारीरिक श्रम से जुड़ा हो या फिर मानसिक श्रम से, उसे शारीरिक, आर्थिक, पारिवारिक और सामाजिक तौर पर तोड़कर रख देगा, उसके अस्तित्व को नष्ट कर देगा. चूंकि श्रमिकों के हितों की रक्षा करने वाली तमाम संगठन और यूनियन्स पहले ही अपनी मौत मर चुकी हैं लिहाजा आने वाली मुश्किलों से लड़ने के लिए ‘दुनिया के मजदूरों एक हों’ का नारा फिर से बुलंद करने के अलावा और कोई मार्ग नहीं होगा.

(25 दिसंबर 2021 को https://www.tv9hindi.com में प्रकाशित)
https://www.tv9hindi.com/opinion/amidst-the-new-labor-laws-understand-why-india-has-the-highest-working-hours-in-the-whole-world-975387.html