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Friday, 22 April 2022
मोदी की भाजपा के लिए यह अयोध्या लकी नहीं होने जा रहा
Thursday, 21 April 2022
कुतुब मीनार परिसर में गणेश मूर्ति की असल कहानी क्या है?
ऐतिहासिक धरोहर है कुतुब मीनार परिसर
कुतुब मीनार परिसर एक ऐतिहासिक धरोहर है. कुतुब मीनार से सटी एक मस्जिद है जो कुव्वत-उल-इस्लाम के नाम से जानी जाती है. माना जाता है कि यह भारत में मुस्लिम सुल्तानों द्वारा बनवाई गई पहली मस्जिद है. कहा यह भी जाता है कि इस मस्जिद में सदियों पुराने मंदिरों का भी बड़ा हिस्सा शामिल है. देवी-देवताओं की मूर्तियां और मंदिर की वास्तुकला अभी भी इस आंगन के चारों ओर के खंबों और दीवारों पर साफ दिखाई देती है. इतना ही नहीं, क़ुतुब मीनार के प्रवेश द्वार पर एक शिलालेख में भी लिखा है कि ये मस्जिद वहां बनाई गई है, जहां 27 हिन्दू और जैन मंदिरों का मलबा था. लेकिन इस शिलालेख पर लिखी बातों से ये स्पष्ट नहीं होता है कि मस्जिद का निर्माण इसी स्थान पर बने मंदिरों को तोड़कर बनाया गया है. हो सकता है मंदिरों को कहीं और तोड़ा गया हो और उसका मलबा उस स्थान पर फेंका गया हो जहां कुव्वत-उल-इस्लाम का निर्माण किया गया और उस निर्माण में मलबे का इस्तेमाल किया गया हो. कहने का मतलब यह कि ऐतिहासिक तथ्यों में इस बात का कोई सटीक और स्पष्ट प्रमाण मौजूद नहीं है कि एक ही स्थान पर बने 27 मंदिरों को तोड़कर उसी स्थान पर मस्जिद का निर्माण किया गया. हां, मस्जिद के कई स्तंभ और उसके ढांचे इस बात की तस्दीक जरूर करते हैं कि मंदिरों के तोड़े गए मलबे का इस्तेमाल मस्जिद में किया गया है. इस सूरत में विवाद को अगर खत्म करना हो तो खत्म किया जा सकता है. रही बात हिन्दू देवी-देवताओं की खंडित प्रतिमाओं की तो यह भारतीय पुरातत्व विभाग के संरक्षण में है और इसे पूजा के लिए इस्तेमाल की इजाजत नहीं दी जा सकती है. इस बारे में धार्मिक प्रकृति की प्राचीन इमारतों पर पुरातत्व विभाग की नीति बिल्कुल स्पष्ट है. और चूंकि मामला अदालत में जा चुका है. निचली अदालत से बात नहीं बनी तो मामला ऊपरी अदालत में भी जाएगा क्योंकि पूरे मामले की छानबीन के बाद ही कोई अंतिम फैसला दिया जाएगा. तब तक इंतजार करना पड़ेगा. इससे पहले हिन्दू देवी-देवताओं की प्रतिमा को कहीं और ले जाकर स्थापित नहीं किया जा सकता है. जैसा कि दिल्ली की अदालत ने अपने हालिया आदेश में कहा है.
विवाद के पीछे की पूरी कहानी क्या है?
राजपूत राजा पृथ्वीराज चौहान की हार के बाद शिहाबुद्दीन उर्फ मुइजुद्दीन मुहम्मद गौरी ने अपने गुलाम जनरल क़ुतुबुद्दीन ऐबक को दिल्ली का शासक नियुक्त किया था. ये कहानी 1200 ईस्वी की है. तभी क़ुतुबुद्दीन ऐबक और उसके उत्तराधिकारी शम्सुद्दीन इल्तुतमिश ने दिल्ली के महरौली में क़ुतुब मीनार बनवाया था. इसी दौर में कुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद का भी निर्माण किया गया था जिसका विस्तार बाद में कई वर्षों तक होता रहा. मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, कुव्वत इस्लाम मस्जिद में तीर्थंकर ऋषभदेव, भगवान विष्णु, गणेश जी, शिव-गौरी, सूर्य देवता समेत कई हिंदू देवी देवताओं की मूर्तियां मौजूद हैं. इनमें से ज्यादातर मूर्तियां खंडित अवस्था में पड़ी हैं. असल में नेशनल मॉन्युमेंट ऑथरिटी ने पिछले महीने भारतीय पुरातत्व विभाग को एक पत्र लिखा था जिसमें कहा गया था कि भगवान गणेश की दो मूर्तियों- ‘उल्टा गणेश’ और ‘पिंजड़े में गणेश’ को राष्ट्रीय संग्रहालय में सम्मानजनक स्थान दिया जाए जहां ऐसी प्राचीन वस्तुएं रखी जाती हैं. 25 मार्च 2022 के एनएमए चेयरमैन तरुण विजय ने संस्कृति मंत्रालय को लिखे पत्र में कहा था, ये बहुत शर्मनाक बात है कि मस्जिद परिसर के अन्दर भगवान गणेश जी की मूर्तियां बेहद अपमानजनक स्थिति में रखी गई हैं. एक मूर्ति तो ऐसी जगह है, जहां लोगो के पैर लगते है, वहीं दूसरी जाली में बंद हैं. उन्हें वहाँ से हटाकर नेशनल म्यूजियम जैसी दूसरी जगह रखा जा सकता है. यहीं से विवाद की शुरूआत हुई. दिल्ली की साकेत कोर्ट में पूजा अर्चना के अधिकार को लेकर एक अर्जी में कहा गया कि नेशनल मॉन्युमेंट अथॉरिटी के दिए सुझाव के मुताबिक, भगवान गणेश की मूर्तियों को नेशनल म्यूजियम या किसी दूसरी जगह विस्थापित नहीं किया जाना चाहिए, बल्कि उन्हें इसी परिसर में पूरे सम्मान के साथ उचित स्थान पर रखकर पूजा-अर्चना की इजाजत दी जानी चाहिए. इस मामले में एक याचिका 9 दिसंबर 2021 को भी दिल्ली की एक दीवानी अदालत में लगाई गई थी जिसमें कहा गया था कि कुतुबुद्दीन ऐबक ने 27 मंदिरों को तोड़कर उनके अवशेषों से मस्जिद का निर्माण करवाया था, इसलिए परिसर में बिखरी मूर्तियों को दोबारा स्थापित कर पूजा की अनुमति दी जाए. हालांकि, तत्कालीन जज ने तब याचिका को रद्द करते हुए कहा था कि अतीत की गलतियों के कारण मौजूदा वक्त की शांति भंग नहीं की जा सकती.
अतीत की विरासत से छेड़छाड़ ठीक नहीं
पुरातत्व विभाग के पूर्व प्रमुख सैयद जमाल हसन की मानें तो आर्ट और आर्किटेक्चर से संबंधित जो भी इमारतें हैं, चाहे वो बौद्ध धर्म की हों, जैन धर्म की हों, हिन्दू धर्म की हों या इस्लाम की हों. अतीत की जो भी विरासत हो, निशानियां हों, हमें उन्हें 'जैसी हैं, वैसे ही रहने देना चाहिए', ताकि आने वाली पीढ़ियां यह देखकर समझ सकें कि यह किसकी वास्तुकला शैली है, यह निर्माण की गुप्त शैली है, यह शुंग शैली है, यह मौर्य शैली, यह मुगल शैली है. उस शैली को जीवित रखना हमारा काम है. दूसरी बात, मान लीजिए आज हिन्दू धर्मावलंबी भगवान गणेश व अन्य देवी देवताओं की खंडित प्रतिमा को मस्जिद से उठाकर किसी अन्य स्थान पर स्थापित कर पूजा-अर्चना करने लगेंगे तो आने वाली पीढ़ियों को यह कैसे पता चलेगा कि मुगल शासक कुतुबुद्दीन ऐबक ने मंदिरों को तोड़कर मस्जिद का निर्माण करवाया था. ऐसे बहुत सारे शोध व अध्ययन से हम वंचित रह जाएंगे जो आने वाली भविष्य की पीढ़ियां कर सकती है. कई हिन्दू संगठन और इतिहासकार ताज महल, पुराना किला, जामा मस्जिद और मुस्लिम शासकों द्वारा निर्मित कई अन्य इमारतों को हिन्दू इमारत मानते हैं. उनका मानना है कि मुस्लिम शासकों ने प्राचीन हिन्दू मंदिरों और इमारतों को ध्वस्त करके मस्जिद की शक्ल दे दी थी. इसका मतलब यह तो हो नहीं सकता कि मस्जिद के शक्ल वाली सारी इमारतों को तोड़कर मंदिर की शक्ल दे दी जाए. कम से कम ऐतिहासिक विरासत की श्रेणी में जो इमारतें हैं उन्हें तो छोड़ दिया जाए.
कोर्ट का सही वक्त पर सही फैसला
क़ुतुब मीनार परिसर में मंदिर की बहाली के लिए प्रतिबद्ध याचिकाकर्ता रंजना अग्निहोत्री जो पेशे से वकील भी हैं, कहती हैं कि भारत में जितने भी मंदिर थे, जो मुगल शासकों द्वारा हिंदुओं को अपमानित करने और मस्जिद बनाने के लिए ध्वस्त किए गये थे, हम वहां भारत की गरिमा को दोबारा बहाल करेंगे और इन मंदिरों को आजाद कराएंगे. लेकिन आजादी का मतलब अगर यह है कि ताज महल, कुतुब मीनार और जामा मस्जिद को तोड़कर वहीं मंदिर बनाना है तो यह अतीत की विरासत के साथ न्याय नहीं होगा. जो है उसकी यथास्थिति बरकरार रखते हुए अगर मंदिर का स्वतंत्र अस्तित्व खड़ा करें तो इस बात को शिलालेख पर पूरी कहानी का उल्लेख करें तो भविष्य की पीढ़ी को हम ज्यादा अच्छे से समझा सकेंगे कि पहले क्या था, फिर मुगल काल में क्या हुआ और फिर हमने क्या किया. नहीं तो फिर बात वही हो जाएगी और हम जानते भी हैं कि कई ऐसे बौद्ध मठ हैं जो मंदिर बनाए गए हैं. तो उनको फिर से बौद्ध मठ बनाने की इजाजत दी जा सकती है क्या? कहा तो यह भी जाता है कि महाबोधि मंदिर में जो मूर्ति हैं, वो शिव जी की है. फिर उसका क्या होगा? इस तरह तो यह कभी ना खत्म होने वाला सिलसिला शुरू हो जाएगा. क़ुतुब मीनार का परिसर कई साम्राज्यों का अहम केंद्र रहा है. भारत सरकार ने इसे राष्ट्रीय धरोहर के रूप में संरक्षित किया है. लिहाजा इसे धार्मिक मण्डलों में विभाजित करने की जगह ऐतिहासिक स्मारक के रूप में ही देखना बेहतर होगा. और ऐसे में दिल्ली की अदालत ने भगवान गणेश की प्रतिमा को लेकर कुतुब मीनार परिसर में यथास्थिति बरकरार रखने का आदेश सही वक्त पर सही फैसला कहा जाएगा.
बहरहाल, कुतुब मीनार परिसर और क़ुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद में हिन्दू देवी-देवताओं की खंडित मूर्तियां ऐतिहासिक धरोहर यानी अतीत की विरासत के तौर पर संरक्षित की गई हैं. लिहाजा कोर्ट ने भी फिलहाल भारतीय पुरातत्व विभाग की गाइडलाइंस को ध्यान में रखते हुए इसे विवादों से दूर रखने की कोशिश के तहत आदेश जारी किया है. लिहाजा हिन्दू देवी देवताओं की मूर्तियों को अन्यत्र नहीं ले जाया जा सकता है और न ही उसकी पूजा की इजाजत दी जा सकती है. ऐतिहासिक धरोहरों को धार्मिक आस्था से अलग रखना चाहिए. अगर इसे विवादों में घसीटा गया तो देश में हर मंदिर और हर मस्जिद पर विवाद खड़ा किया जाएगा और फिर हमारा 'सर्व-धर्म-सम्भाव' वाला देश खतरे में पड़ जाएगा.
https://www.tv9hindi.com/opinion/quwwat-ul-islam-masjid-controversy-why-will-ganesh-idols-not-be-removed-from-the-qutub-minar-complex-1186242.html
Wednesday, 20 April 2022
एलन मस्क का ये एडवेंचरस इन्वेंशन मानवता के खिलाफ है
एडवेंचरस इन्वेंशन को जीते हैं एलन मस्क
स्पेसऐक्स, टेस्ला, सोलर सिटी आदि की बात तो छोड़ ही दीजिए, स्टारलिंक, हाइपरलूप, बोरिंग कंपनी, ओपन आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की ही बात करें तो सिवा अमीर लोगों के इससे आम आदमी की जिंदगी में क्या बदलाव आया? खैर रात गई बात गई की तर्ज पर हम इसे भी छोड़ते हैं. बात हम ट्वीटर की भी नहीं करेंगे क्योंकि यहां भी वह इस बात को स्थापित करने में लगे हैं कि जो जैसा सोचता है वैसा ही उसे ट्वीटर पर अभिव्यक्त करने की आजादी मिले. लेकिन एलन मस्क इस बात को भी जानते हैं कि इस अभिव्यक्ति की आजादी की भी अपनी सीमाएं है. इसे अपने-अपने तरीके से सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक और राजनीतिक तौर पर एक टूलकिट की तरह इस्तेमाल किया जा सकता है और किया भी जा रहा है. तो बात इससे भी बनने वाली नहीं है और शायद इसीलिए वह एक ऐसी मशीन बनाने की प्रक्रिया के अंतिम दौर में प्रवेश कर चुके हैं जो दिमाग को पढ़ सकता है. दिमाग को एक चिप के जरिये कंट्रोल किया जा सकता है. मस्क अगर ऐसा कर पाए तो निश्चित तौर पर यह साइंस की बड़ी कामयाबी हो सकती है, लेकिन यह कामयाबी उन लोगों की भी बड़ी जीत होगी जो दुनिया को अपनी मुट्ठी में करना चाहते हैं. यह उन लोगों की बड़ी जीत होगी जो नई वैश्विक व्यवस्था यानी न्यू वर्ल्ड ऑर्डर को स्थापित करना चाहते हैं. यह उन लोगों की भी बड़ी जीत होगी जो दुनिया को अपने हिसाब से कंट्रोल करना चाहते हैं. ऐसे में मस्क का यह दावा सिर्फ एक छलावा है कि इस तकनीक से ऑटिज्म और सिजोफ्रीनिया का इलाज संभव हो जाएगा. याददाश्त घटने, डिप्रेशन या नींद न आने जैसी परेशानियां इस तकनीक से दूर की जा सकेंगी. इसका असल मकसद तो इंसानी दिमाग पर कब्जा करना है. जब कब्जा करने की तकनीक हाथों में आ जाएगी तो उसपर काबू पाना आसान हो जाएगा. और तब ये आइडिया कितना खतरनाक हो जाएगा, आप इसकी कल्पना भी नहीं कर सकते हैं. ऐसे में यह कहना गलत नहीं होगा कि एलन मस्क हमेशा एडवेंचरस इन्वेंशन को जीते हैं.
क्या है न्यूरालिंक ब्रेन चिप की पूरी कहानी?
हमारे-आपके जीवन में कई बार ऐसा होता है कि हम-आप कुछ सोचते हैं, लेकिन उसे करने से पहले ही भूल जाते हैं. कोई बेहद महत्वपूर्ण काम या कोई पासवर्ड अचानक दिमाग से गायब हो जाता और फिर उसे याद करना मुश्किल हो जाता है. एलन मस्क का दावा है कि न्यूरालिंक ब्रेन चिप डिवाइस का इस्तेमाल याददाश्त को बढ़ाने, ब्रेन स्ट्रोक या अन्य न्यूरोलॉजिकल बीमारी से ग्रस्त मरीजों में किया जाएगा. इसके अलावा लकवाग्रस्त मरीजों के लिए भी यह फायदेमंद साबित होगी. इस डिवाइस के जरिये मरीज के दिमाग को पढ़ा जा सकेगा और डेटा को एकत्रित किया जा सकेगा. लेकिन इसी डेटा संग्रह की कहानी से शुरू होती है इस ब्रेन चिप के मकसद की असल कहानी. 21वीं सदी में डेटा की ताकत सबसे अहम हो गई है. डेटा की ताकत न सिर्फ सामाजिक, आर्थिक और धार्मिक सत्ता दिलाती है बल्कि राजनीतिक सत्ता दिलाने में भी यह अहम भूमिका निभा रही है. ऐसे में अगर इंसानी दिमाग को पढ़ पाने और उसके कंट्रोल करने की चाबी इंसान के हाथ लग जाए तो वह कितना खतरनाक खेल खेल सकता है इसका अंदाजा लगाना कठिन है. एलन मस्क दरअसल इंसानी दिमाग को मशीन से जोड़ना चाहते हैं. अभी हम या तो हाथ से मशीन कंट्रोल करते हैं या आवाज से. मस्क को लगता है कि मशीन से संवाद करने का ये तरीका धीमा है. हम सीधे अपने दिमाग से ही मशीन को क्यों नहीं कंट्रोल कर सकते हैं. इसके लिए मस्क की कंपनी न्यूरालिंक ब्रेन-मशीन इंटरफेस तैयार कर रही है. यानी ऐसी टेक्नोलॉजी कि एक चिप आपके ब्रेन में लगाने के बाद आपका दिमाग मोबाइल, कंप्यूटर या अन्य मशीनों से जुड़ जाएगा. न्यूरालिंक ब्रेन चिप की कहानी इतनी ही है. हालांकि कुछ न्यूरोसर्जन की मानें तो एलन मस्क की चिप दिमाग के सिग्नल को रिकॉर्ड तो आसानी से कर लेगी, लेकिन उन्हें डिकोड करना एक बड़ी चुनौती होगी. क्योंकि, कोई भी अभी तक शत-प्रतिशत न्यूरोन की भाषा को समझ नहीं पाया है. शायद ईश्वर ने इसे सिर्फ इंसान के शरीर की बाकी सेल्स की समझ के लिए ही बनाए हैं.
कैसे काम करेगा न्यूरालिंक ब्रेन चिप?
न्यूरालिंक ब्रेन चिप टेक्नोलॉजी आर्टिफीसियल इंटेलिजेंस की दुनिया को विकसित करने की तरफ एलन मस्क का एक और क्रांतिकारी कदम है. न्यूरालिंक टेक्नोलॉजी ऐसे न्यूरल इम्प्लांट को विकसित करने का लक्ष्य लेकर चल रही है जिससे इंसानी दिमाग को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से सिंक्रोनाइज करके कम्प्यूटर्स, कृत्रिम शारीरिक अंग और दूसरी मशीनों को सिर्फ सोचने भर से चलाया जा सके. इसके लिए विकसित की जा रही डिवाइस बेहद छोटी होगी. शायद इसका आकार नाखून के बराबर हो सकता है और ये बैटरी से ऑपरेट होगी. इसमें इस्तेमाल होने वाले तार इंसान के बालों से भी कई गुना पतले होंगे. इस डिवाइस को दिमाग के अंदर इम्प्लांट किया जाएगा. माना जा रहा है कि इस ब्रेन चिप की मदद से इंसान बिना हिले-डुले किसी भी मशीन को कंट्रोल कर सकता है. हालांकि अभी इसका ट्रायल किसी भी इंसान पर नहीं किया गया है. इसका इस्तेमाल अभी सिर्फ सूअर और बंदरों पर किया गया है. लेकिन इस चिप की मदद से वैज्ञानिक यह पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं कि तरह-तरह की गतिविधियां करते वक्त जानवरों के दिमाग में किस तरह के बदलाव होते हैं.
अब बात न्यूरालिंक ब्रेन चिप के नफा-नुकसान की
एलन मस्क का दावा है कि उनका मिशन सफल रहा तो इंसान की सोचने-समझने की क्षमता कई गुना बढ़ जाएगी. व्हीलचेयर हो या ड्रोन, कंप्यूटर से जुड़ी किसी भी चीज को चलाने के लिए हाथ हिलाने की जरूरत नहीं रह जाएगी. आदमी सोचेगा और चीजें काम करने लग जाएंगी. अगर ऐसा हो सका तो अल्जाइमर और पार्किंसंस जैसी बीमारियों के मरीजों की जिंदगी बदल जाएगी, रीढ़ की चोट से लाचार मरीजों को नया जीवन मिल जाएगा. एलन मस्क के दावे बेशक कई बीमारियों के इलाज को लेकर उम्मीद तो जगाते हैं, लेकिन इस पूरी कहानी में कई डरावनी चुनौतियां और कई सवाल भी हैं. न्यूरोसाइंस के दिग्गजों का कहना है कि दिमाग की सर्जरी बेहद नाजुक होती है और इसे आखिरी उपाय के तौर पर आजमाया जाता है. किसी भी सेहतमंद इंसान की ब्रेन सर्जरी सिर्फ इसलिए की जाए कि वह सुपरकंप्यूटर का मुकाबला करना चाहता है, यह बात पचती नहीं है क्योंकि इसमें रिस्क बहुत ज्यादा होगा. जान भी जा सकती है. जैसा कि मस्क का दावा है कि ऐसे चिप से दुनियाभर की जानकारियां दिमाग में डाउनलोड की जा सकेंगी और इस पूरी मेमोरी को रीप्ले किया जा सकेगा. सोचिए! अगर तमाम लोग ऐसा करने लगे तो उनका दिमाग क्या कर रहा होगा? जब हर फाइल, हर किताब, हर सवाल का जवाब उस चिप के जरिए मिलने लगेगा तो क्या दिमाग सुस्त नहीं पड़ जाएगा? कहने का मतलब यह कि क्या यह कमजोरी इंसानी डीएनए में स्थापित नहीं हो जाएगी और आगे चलकर पूरी मानव जाति की सोचने-समझने की ताकत कमजोर नहीं कर देगी? सर्च इंजन गूगल इसका नायाब उदाहरण है. तीन साल का बच्चा भी अपना दिमाग लगाना छोड़ दिया है और अपनी हर उलझनों को गूगल के जरिये ही सुलझा रहा है.
एक और बड़ा खतरा जुड़ा है चिप के ब्रेन इंप्लांट से. अभी जिस तरह क्रेडिट कार्ड, डेबिट कार्ड डेटा से लेकर पर्सनल मेडिकल हिस्ट्री तक हैक करने की खबरें आती हैं, पूरा का पूरा अकाउंट खाली हो जाता है, हो सकता है न्यूरालिंक के इस ब्रेन कंप्यूटर इंटरफेस को भी हैक कर लिया जाए. अगर इंसानी दिमाग से जुड़े कंप्यूटर इंटरफेस को हैक कर लिया गया तो सोचिए फिर क्या होगा? अगर चिप इम्प्लांट वाले इंसानों के एक बड़े हुजूम को किसी पर हमला करने या किसी दूसरी बेअदबी के लिए निर्देश दे दिया जाए तो उस हालत से कैसे निपटा जाएगा? खतरा यह भी है कि इसी चिप के चलते इंसान ही मशीन बन जाए और ऐसी मशीनों को कुछ बददिमाग लोग कंट्रोल करने लगें तो क्या होगा. बहुत हद तक ये काम आज भी सोशल मीडिया और हिप्नोटिज्म विधा से किया भी जा रहा है.
बहरहाल, न्यूरालिंक ब्रेन चिप की पूरी कहानी को पढ़ने और समझने के बाद एक बात तो तय है कि अगर यह प्रयोग सफल रहा तो इसे साइंस की सबसे बड़ी कामयाबी के तौर पर आंका जाएगा, लेकिन इसका नकारात्मक पहलू हावी हुआ जिसका अंदेशा ज्यादा है तो यह पूरी मानव जाति के अस्तित्व पर सवालिया निशान लगा देगा. विकास एक सतत प्रक्रिया है जो होते रहना चाहिए, लेकिन इसमें एक बात ध्यान रखने की है कि यह सब मानवता के लिए हो ना कि मानवता की कीमत पर. मशीन विकास का एक जरिया हो सकता है जिसे आदमी चलाता है, लेकिन अगर यही मशीन आदमी को चलाने लगे, उसे कंट्रोल करने लगे जो मौजूदा दौर में बहुत हद तक होने भी लगा है तो इंसान के वजूद को बनाए रखना शायद मुश्किल हो जाएगा.
https://www.tv9hindi.com/opinion/will-elon-musk-brain-reading-machine-be-the-biggest-science-breakthrough-since-satellite-internet-1183216.html
Saturday, 16 April 2022
चीन, पाकिस्तान, अमेरिका और रूस से भी महंगा है भारत में पेट्रोल
पीपीपी मॉडल से समझिए मूल्यवृद्धि का सच
दुनियावी अर्थव्यवस्था में एक शब्द है क्रय शक्ति समानता जिसे अंग्रेजी में पीपीपी यानी Purchasing Power Parity कहते हैं. यह अंतर्राष्ट्रीय विनिमय का एक सिद्धांत है. यह शब्द वर्ल्ड बैंक का ईजाद किया हुआ है और इसका इस्तेमाल वैश्विक अर्थव्यवस्थाओं में जीवन की लागत के अंतर को निर्धारित करने में किया जाता है. इसका अर्थ किन्हीं दो देशों के बीच वस्तु या सेवा की कीमत में मौजूद अंतर से लिया जाता है. पीपीपी मॉडल से यह पता लगाया जाता है कि दो देशों के बीच मुद्रा की क्रयशक्ति में कितना अंतर या फिर कितनी समानता मौजूद है. पीपीपी के आधार पर ही मुद्रा विनिमय दर को तय किया जाता है.
पीपीपी मॉडल के मुताबिक, भारत में एलपीजी की कीमत दुनिया में सबसे अधिक है, जबकि पेट्रोल की कीमत तीसरे और डीजल की कीमत आठवें नंबर पर सबसे अधिक है. भारत में एक लीटर पेट्रोल की कीमत 120 रुपये है जो पीपीपी मॉडल के अनुसार, लगभग 5.2 डॉलर (अंतरराष्ट्रीय डॉलर मूल्य) होता है जो दुनिया में तीसरे नंबर पर सबसे अधिक है. अमेरिका में यह 1.2 डॉलर प्रति लीटर है. इसी तरह से एक लीटर डीजल की कीमत भारत में 4.6 डॉलर है जो दुनिया में 8वें नंबर पर सबसे ज्यादा है. इसी तरह से एलपीजी की कीमत दुनिया भर के 54 देशों की तुलना में सबसे ज्यादा 3.5 डॉलर प्रति लीटर है. तो पीपीपी मॉडल के हिसाब से देखें तो कोई ऐसी सूरत दिखती नहीं है कि दुनिया के अन्य देशों के मुकाबले भारत में पेट्रोल, डीजल या रसोई गैस की कीमत कम है. अगर मूल्यवृद्धि की रफ्तार यूं ही बढ़ती रही तो वो दिन दूर नहीं जब एलपीजी की तरह ही पेट्रोल और डीजल की कीमतों में भी भारत नंबर एक पर पहुंच जाएगा.
पेट्रोल-डीजल की कीमतों में भारत की स्थिति क्या है?
globalpetrolprices.com पर 11 अप्रैल 2022 को जारी साप्ताहिक प्राइस इंडेक्स के मुताबिक, दुनिया के कुल 169 देशों का आंकलन करें तो भारत में पेट्रोल की औसत कीमत 112.55 रुपये प्रति लीटर है. इस सूची के मुताबिक, दुनिया के 109 देशों में पेट्रोल की कीमत भारत से कम है और 60 देशों में भारत की कीमत से ज्यादा है. दुनिया में पेट्रोल की सबसे कम कीमत वेनेजुएला में 1.89 रुपये प्रति लीटर है वहीं सबसे ज्यादा कीमत हांगकांग में 218 रुपये प्रति लीटर है. अगर हम सात पड़ोसी देशों में पेट्रोल की बात करें तो पाकिस्तान में 62.13 रुपये प्रति लीटर, अफगानिस्तान में 66.85, श्रीलंका में 67.01 रुपये, बांग्लादेश में 78.23 रुपये, बर्मा में 78.85 रुपये, भूटान में 95 रुपये और नेपाल में 99.75 रुपये प्रति लीटर पेट्रोल बिक रहा है जो भारत से काफी कम है. बड़े व विकसित देशों की बात करें तो ब्रिटेन और फ्रांस में क्रमश: 160.51 रुपये और 143.03 रुपये प्रति लीटर भारत से ज्यादा महंगा है. लेकिन अमेरिका में 90.35, रूस में 47.12 रुपये, चीन में 111.68, जापान में 102.75 रुपये प्रति लीटर पेट्रोल का खुदरा मूल्य है जो भारत से कम है.
इसी तरह से डीजल की बात करें तो भारत में डीजल की औसत कीमत 100.55 रुपये प्रति लीटर है. globalpetrolprices.com की साप्ताहिक प्राइस इंडेक्स के मुताबिक, दुनिया के 95 देशों में डीजल की कीमत भारत से कम है और 73 देशों में भारत से ज्यादा है. दुनिया में डीजल की सबसे कम कीमत ईरान में 0.77 रुपये प्रति लीटर है वहीं सबसे ज्यादा कीमत हांगकांग में 192.53 रुपये प्रति लीटर है. पड़ोसी देशों की बात करें तो पाकिस्तान में 59.76, अफगानिस्तान में 60.85, श्रीलंका में 41.67, बांग्लादेश में 70.32, बर्मा में 82.78, भूटान में 100 और नेपाल में 89.15 रुपये प्रति लीटर खुदर मूल्य है जो भारत से काफी कम है. बड़े व विकसित देशों की बात करें तो अमेरिका में यह दर 100.75 रुपये, रूस में 48.13 रुपये, जापान में 89.86, चीन में 100.39, फ्रांस में 149.22, और ब्रिटेन में 174.44 रुपये प्रति लीटर बिक रहा है. इनमें फ्रांस और ब्रिटेन को छोड़ दें तो बाकी देशों में डीजल की कीमत भारत से काफी कम है.
तो फिर भारत के लोग गम को कम कैसे करें?
हमने ऊपर पीपीपी मॉडल पर विश्लेषण कर देख लिया, फिर पड़ोसी देश और बड़े व विकसित देशों की खुदरा दरों का तुलनात्मक अध्ययन कर देख लिया. इससे तो वो बात निकलकर नहीं आई कि दुनिया के देशों में पेट्रोल-डीजल की कीमतों को देख भारत के लोग अपना गम कम कर सकते हैं. हां, एक तथ्य जरूर है जिसका गणित समझकर इस नतीजे पर पहुंचा जा सकता है कि दुनिया के अन्य देशों के मुकाबले भारत में तेल की कीमतें काफी कम हैं. 1 अप्रैल 2022 को पेट्रोल की 101.81 रुपये प्रति लीटर कीमत को आधार मानें और इसका विस्तृत ब्यौरा निकालें तो बेसिक मूल्य 53.34 रुपये प्रति लीटर का है. इस पर फ्रेट चार्ज 20 पैसे लगता है. केंद्र सरकार की एक्साइज ड्यूटी 27.90 रुपये और राज्य सरकार का वैट चार्ज 16.54 रुपये और डीलर कमीशन 3.83 रुपये प्रति लीटर लगता है. इसी तरह से 1 अप्रैल 2022 को डीजल की 93.07 रुपये प्रति लीटर कीमत को आधार मानें और इसका विस्तृत ब्यौरा निकालें तो बेसिक मूल्य 54.87 रुपये प्रति लीटर, फ्रेट चार्ज 22 पैसे, केंद्र सरकार की एक्साइज ड्यूटी 21.80 रुपये, राज्य सरकार का वैट चार्ज 13.26 रुपये और डीलर कमीशन 2.58 रुपये लगता है. कहने का मतलब यह कि अगर पेट्रोल की कीमत में केंद्र और राज्य सरकार के टैक्स को खत्म कर दिया जाए तो कीमत 57.37 रुपेय प्रति लीटर और डीजल की कीमत करीब 58 रुपये प्रति लीटर पर आ जाएगी. लेकिन गणित के इस फॉर्मूले में सरकारों की आमदनी का मसला ऐसा है जो कम होने या खत्म होने का नाम नहीं ले रहा है. यह तभी संभव है जब राज्य और केंद्र सरकार पेट्रोल और डीजल से आय पर निर्भरता कम करे. इसके अलावा सरकार अगर तेल की कीमतों को जीएसटी के दायरे में ले आए तब भी बात बन सकती है और हम भारत के लोग इस बात का दावा कर सकते हैं कि भारत में पेट्रोल, डीजल की कीमतें दुनिया के अन्य देशों के मुकाबले काफी कम हैं.
कुल मिलाकर देखें तो इस बात से इनकार नहीं कि दुनिया के बहुत सारे देश ऐसे हैं जहां भारत के मुकाबले पेट्रोल और डीजल का खुदरा मूल्य काफी ज्यादा है. हांगकांग, इजरायल, इटली, जर्मनी, फ्रांस और ब्रिटेन का नाम उदाहरण के तौर पर लिया जा सकता है. लेकिन बहुत सारे देश ऐसे भी है जहां पेट्रोल और डीजल का खुदरा मूल्य काफी कम भी है. निश्चित तौर पर जब हम इस तरह का तुलनात्मक अध्ययन करते हैं तो उसके पीछे बहुत सारे फैक्टर को शामिल किया जाता है. देश की प्रति व्यक्ति आय, देश की जीडीपी, तेल की खपत, टैक्स का हिस्सा, वाहनों की संख्या, देश की भौगोलिक परिस्थिति, देश की आबादी आदि का जब तुलनात्मक अध्ययन किया जाता है तब जाकर वास्तविक स्थिति का पता चल पाता है कि हम कहां खड़े हैं. हमारे देश में अगर तेल महंगा है तो क्यों है और किसी देश में सस्ता है तो क्यों है. आम तौर पर जब सरकारें या उससे जुड़ी एजेंसियां तेल की बढ़ती कीमतों को जायज ठहराने की कोशिश करती है तो वह उन्हीं देशों का नाम लेती है जहां कीमतें भारत से ज्यादा हैं. वह तेल की कीमतों में उछाल के प्रतिशत दर का हवाला देने लगती है अमेरिका के मुकाबले भारत में कीमतों में उछाल की दर कम रही. ऐसे में सीधी बात तो यही है कि अगर कीमतें आम जनता की जेब से बाहर हैं तो वह किसी दूसरे देश में कम है या ज्यादा है इससे कोई फर्क नहीं पड़ता. गम मिटाने का ये जरिया आर्थिक लिहाज से ठीक भी नहीं है.
https://www.tv9hindi.com/opinion/is-the-price-of-petrol-and-diesel-really-higher-in-the-world-than-in-india-1175307.html
Thursday, 14 April 2022
पुतिन का 'वन मैन वन प्लान' फेल तो नहीं हो गया है?
करीब डेढ़ महीने का वक्त बीत चुका है. बावजूद इसके यूक्रेन रूस के खिलाफ युद्ध के मैदान में शिद्दत से डटा हुआ है. और अब तो विदेशी मीडिया रिपोर्ट्स में भी इस तरह के दावे किए जाने लगे हैं कि जिस युद्ध को क्रेमलिन 'विशेष सैन्य अभियान' कहता आ रहा है वह अब कमजोर पड़ने लगा है. पश्चिमी देशों के सैन्य विश्लेषक भी इस बात को लेकर आश्चर्यचकित हैं कि आखिर रूसी सेना कैसे कमजोर पड़ गई है. नाटो के ताजा अनुमानों को अगर सही मानें तो रूसी सेना के करीब 15000 सैनिक घायल अवस्था में हैं. इन घायल सैनिकों का तेजी से ड्यूटी पर लौटना यानी फिर से मोर्चा संभालना मुमकिन नहीं है. मृतकों की संख्या लगभग दोगुनी है. इसका अर्थ यह हुआ कि रूस ने बीते डेढ़ महीने के संघर्ष में लगभग 45,000 सैनिकों को खो दिया है. रूसी युद्धक वाहनों की बात करें तो करीब 2500 वाहनों को या तो नष्ट कर दिया गया है या यूक्रेन ने उसे कब्जा लिया है. इसमें 450 मुख्य युद्धक टैंक और 825 बख्तरबंद लड़ाकू वाहन, पैदल सेना से लड़ने वाले वाहन और बख्तरबंद वाहन शामिल हैं. हालांकि ये कहना अभी जल्दबाजी होगा कि रूस युद्ध में कमजोर पड़ गया है. हां, एक बात जरूर है कि यूक्रेन को कब्जे में लेने के लिए रूस जैसे ताकतवर देश को डेढ़ महीने का वक्त लग जाए, चौंकाता जरूर है. कुछ तो ऐसी बात यूक्रेनी युद्धवीरों में जरूर है जो रूसी सेना के हौसले को पस्त कर रखा है.
Tuesday, 28 December 2021
मोदी के लिए कृषि कानूनों को फिर से लाना 2024 से पहले असंभव
Sunday, 26 December 2021
हां हैं भारत में ‘काम के घंटे’ सबसे ज्यादा, क्या कर लोगे?
देश में नए श्रम कानूनों (Labor Laws) को लागू करने की आहट फिर से सुनाई देने लगी है. कहा जा रहा है कि अगर ऐसा हुआ तो कर्मचारियों को हफ्ते में चार दिन ही काम करना पड़ेगा. बाकी के तीन दिन वो छुट्टियां मना सकेंगे. लेकिन क्या इससे भारत ऐसा देश भी बन सकेगा जहां दुनिया के अन्य देशों के मुकाबले काम के घंटे कम हो जाएंगे? तो इसका जवाब है- बिल्कुल नहीं. काम के घंटे पहले की तरह ही सप्ताह में 48 घंटे की बनी रहेगी. इसमें कोई दो राय नहीं कि दुनिया के तमाम देशों में श्रम कानूनों के तहत काम के जो घंटे निर्धारित हैं उसमें भारत में काम के घंटे और काम का सप्ताह दुनिया में सबसे ज्यादा लंबा है. यह एक कठोर सत्य है. लेकिन बात यहीं खत्म नहीं होने वाली. मुश्किलें और भी बढ़ने वाली हैं. हालांकि ऐसा भी नहीं है कि सिर्फ भारत में ही 48 घंटे का साप्ताहिक कार्य दिवस है. बांग्लादेश, वियतनाम, ब्रिटेन आदि में भी 48 घंटे का ही साप्ताहिक कार्य दिवस है, लेकिन ये भी सत्य है कि कानूनी तौर पर 48 घंटे से ज्यादा काम के घंटे दुनिया के किसी भी देश में नहीं है.
साल 1870 की बात करें तो ज्यादातर देशों में लोग साल में 3,000 घंटे से अधिक काम करते थे, मतलब हर हफ्ते 60-70 घंटे. लेकिन आज के वक्त में काम के घंटे तब के मुकाबले आधे हो गए हैं, उदाहरण के लिए, जर्मनी में जहां काम के घंटे 60 प्रतिशत कम हुए हैं वहीं ब्रिटेन में काम के घंटों में 40 प्रतिशत की कमी आई है. लेकिन भारत और चीन की बात करें तो यहां काम के घंटे पहले से बढ़े हैं. भारत में 1970 में जहां लोग औसतन साल में 2,077 घंटे काम करते थे, साल 2020 में बढ़कर 2,117 घंटे हो गए यानि इसमें 2 फीसदी का इजाफा हुआ है. चीन का आंकड़ा भारत से भी दो कदम आगे है. यहां 1970 में लोग 1976 घंटे सालाना काम करते थे, 2020 में बढ़कर 2,174 घंटे हो गए यानि 10 फीसदी का इजाफा. पिछले पांच दशक का इतिहास इस बात की ताकीद करता है कि आने वाले दिनों में भारत में काम के घंटों में और इजाफा हो सकता है. अगर ऐसा हुआ तो ‘आठ घंटे का आंदोलन’ का वजूद ही मिट जाएगा जिसने लंबे संघर्ष के दौरान हजारों कुर्बानियां दीं. 1886 में एक नारा गढ़ा गया था- ‘आठ घंटे काम, आठ घंटे आराम और आठ घंटे मनोरंजन!’ और इसी नारे के साथ अमेरिका के 13 हजार से अधिक व्यापारिक प्रतिष्ठानों में काम करने वाले करीब तीन लाख मजदूर अपनी एकजुटता का प्रदर्शन करते हुए सड़कों पर उतर आए थे. कहते हैं कि ‘आठ घंटे का आंदोलन’ इन मजदूरों के पांच दशक के संघर्षों की गाथा का चरम था.
(25 दिसंबर 2021 को https://www.tv9hindi.com में प्रकाशित)
https://www.tv9hindi.com/opinion/amidst-the-new-labor-laws-understand-why-india-has-the-highest-working-hours-in-the-whole-world-975387.html




