Friday, 23 September 2011

मुस्लिम टोपी से ऐतराज़ क्यों?

गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के तीन दिनों के उपवास को लेकर कुछ बड़े सवाल उठ खड़े हुए हैं. पहला सवाल ये कि क्या मोदी अब नरम हिंदुत्ववादी की छवि बना रहे हैं? और दूसरा सवाल ये कि क्या मुस्लिम टोपी पहनने से इनकार करना उनकी निजी पसंद-नापसंद का मामला है या फिर उनका बर्तावसर्व-धर्म-सम्भावकी भावना के खिलाफ माना जाए?

दंगा पीड़ितों का दर्द

गुजरात में गोधरा के बाद हुए दंगों के पीड़ितों ने मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के तीन दिनों के उपवास को राजनीतिक तमाशा बताते हुए मोदी को एक पत्र लिखा जिसमें कहा गया, ‘जब तक उन्हें न्याय नहीं मिलता कोई सद्भावना नहीं हो सकती. हम लोग ताक़तवर राजनीतिक दलों के शिकार हैं जिनकी ताक़त इसी बात में है कि हम विभाजित रहें. वोट की राजनीति करने वालों को परास्त करके जब तक हम एकजुट नहीं होंगे सद्भावना क़ायम नहीं हो सकती. आप अगर इतने ही बड़े मुख्यमंत्री हैं जिसका आप दावा करते हैं तो साबरमती एक्सप्रेस में मारे गए 58 लोगों की जान आपने क्यों नहीं बचाई.’

मुस्लिम टोपी, ना बाबा ना

मोदी के उपवास के दौरान सभी धर्मों के नेताओं को बुलाया गया था और उनसे स्टेज पर मिलने कुछ मुस्लिम नेता भी गए. मुस्लिम धर्मगुरु सैय्यद इमाम शाही सैय्यद ने गुजरात के मुख्यमंत्री को एक टोपी भेंट की थी, लेकिन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस टोपी को लेने से मना कर दिया. हालांकि, मोदी ने मुस्लिम धर्म गुरु की तरफ से दी गई शॉल को स्वीकार किया. सैय्यद ने कहा, ‘मुझे इससे बहुत दुख हुआ है. वह हर समुदाय की टोपी और पगड़ी पहन रहे हैं, लेकिन उन्होंने मुस्लिम टोपी पहनने से इनकार कर दिया.’ वाकई मोदी तीन दिनों के उपवास में हर समुदाय की तरफ से भेंट की गई अलग-अलग टोपियों में देखे गए.

मोदी की आत्म प्रवंचना

उपवास तोड़ने के बाद मंच से नरेंद्र मोदी के भाषण का छोटे से अंश का यहां उल्लेख करना ज़रूरी होगा. मोदी के शब्दों पर गौर करिये, ‘कुछ साल पहले भारत सरकार ने जस्टिस सच्चर कमेटी का गठन किया था अल्पसंख्यकों के विकास का अध्ययन करने के लिए. जस्टिस सच्चर कमेटी की टीम ने गुजरात आकर भी अध्ययन किया. जस्टिस सच्चर की पूरी टीम की मेरे साथ एक मीटिंग हुई. उन्होंने मुझसे पूछा कि आप अपने राज्य में अल्पसंख्यकों के लिए क्या करते हैं. मैंने उनसे कहा कि मेरी सरकार अल्पसंख्यकों के लिए कुछ भी नहीं करती है. वो चौंक गए. ऐसा बेबाक उत्तर कोई दे सकता है. मैंने साफ-साफ कहा, मेरी सरकार अल्पसंख्यकों के लिए कुछ नहीं करती. मैंने कहा, एक और वाक्य लिख लीजिए. मेरी सरकार बहुसंख्यकों के लिए भी कुछ नहीं करती. मेरी सरकार 6 करोड़ गुजरातियों के लिए काम करती है. यहां कोई भेदभाव नहीं है. हर चीज को माइनॉरिटी-मैजोरिटी के तराजू पर तोलना. आए दिन वोट बैंक कि राजनीति करना. ये रास्ता मेरा नहीं है. मेरे राज्य के सभी नागरिक मेरे हैं. उनका दुख मेरा दुख है.

अटल की मोदी को नसीहत

एक जून 2002 को तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल विहारी वाजपेयी ने गुजरात की सांप्रदायिक स्थिति को लेकर मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को एक चिट्ठी लिखकर अपनी चिंता से अवगत कराया था. माना जाता है कि वह मुख्‍यमंत्रियों के साथ कम ही पत्राचार किया करते थे, लेकिन उन्‍हें गुजरात के हालात को लेकर दखल देने की जरूरत महसूस हुई और उन्‍होंने मोदी के नाम चिट्ठी लिखी. आरटीआई के जरिए सामने आई यह चिट्ठी गोधरा कांड के तीन महीने बाद की लिखी हुई है. चिट्ठी में तत्‍कालीन प्रधानमंत्री ने मोदी को यह आभास दिलाया कि दंगा पीडितों को पहुंचे नुकसान को काफी कम कर आंका गया है. उन्‍होंने मुख्‍यमंत्री को यहां तक भरोसा दिलाया था कि जरूरत पड़ी तो राज्‍य सरकार को अतिरिक्‍त खर्च से निपटने के लिए केंद्र धन भी मुहैया कराएगा. वाजपेयी ने यह भी लिखा था- मुझे जानकारी मिली है कि ज्‍यादातर मामलों में मारे गए लोगों के परिवारों को मुआवजा नहीं मिल सका है, क्‍योंकि उनके शव की पहचान नहीं हुई है. लापता व्‍यक्तियों को लेकर आए आवेदन निपटाने में होने वाली देरी की ओर भी वाजपेयी ने मोदी का ध्‍यान आकृष्‍ट कराया था. यह चिट्ठी लिखने से दो महीने पहले वाजपेयी ने मोदी को ‘राजधर्म’ का पालन करने की सलाह भी दी थी. इसमें उन्‍होंने कहा कि मुख्‍यमंत्री को जाति, पंथ, धर्म, संप्रदाय के आधार पर कोई भेदभाव किए बिना राजधर्म निभाते रहना चाहिए.

उक्त चार मुद्दों पर गौर करें तो शायद कुछ कहने की जरूरत नहीं रह जाती है. लेकिन इन्हीं चार मुद्दों से इस लेख के शुरू में किए गए कुछ सवालों का जवाब जरूर मिल जा रहा है. अगर मोदी नरम हिंदुत्ववादी की छवि के रूप में खुद को पेश करना चाह रहे हैं तो फिर क्या मुस्लिम और क्या हिंदू. दोनों की टोपियों में दूरियां क्यों? जहां तक मुस्लिम टोपी पहनने से इनकार करना उनकी निजी पसंद-नापसंद का मामला है तो मोदी को इस बात का इल्म होना चाहिए कि आप एक ऐसी कुर्सी पर बैठे हैं जहां इस तरह की निजी पसंद या नापसंद नहीं चलती. इस कुर्सी से आपको आपके ही नेता अटल विहारी वाजपेयी के कहे अनुसार, राजधर्म निभाना होता है. अंत में ‘सर्व-धर्म-सम्भाव’ की बात करें तो निश्चित रूप से मोदी के सभी धर्मों की टोपी पहनने के बाद मुस्लिम टोपी पहनने से मना करना ‘सर्व-धर्म-सम्भाव’ की भावना के बिल्कुल उलट है. मोदी जी, जो इमाम साहब आपको टोपी भेंट करना चाह रहे थे वो भी आपके 6 करोड़ गुजरातियों में से एक थे. आपने ही तो सच्चर कमेटी से कहा था कि मेरे राज्य के सभी नागरिक मेरे हैं. यहां कोई भेदभाव नहीं है. हर चीज को माइनॉरिटी-मैजोरिटी के तराजू पर तोलना, आए दिन वोट बैंक कि राजनीति करना, ये रास्ता मेरा नहीं है.

Thursday, 22 September 2011

‘उपवास’ नहीं, ‘जन उपहास’ कहिए

गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को इस बात का अभिमान है कि उन्होंने कभी अपना जन्मदिन नहीं मनाया है. 17 सितंबर को जब मोदी ने भव्य सद्भावना उपवास शुरू किया तो उनका यह अभिमान डगमगाने लगा था. इसलिए कि लोग क्या कहेंगे. फिर मोदी ने उपवास मंच से अपने संबोधन में उपवास के समर्थन में सफाई पेश की. मोदी के शब्द पर गौर करिए, “मैं जिन संस्कारों में पला हूं उनके कारण मैंने कभी अपना जन्मदिन नहीं मनाया. पहले तो लोगों को पता नहीं था कि मेरा जन्मदिन क्या है. अब जब से लोगों को पता चला है तो साल में सिर्फ एक ही यह दिन 17 सितंबर होता है जब मैं अपना फोन नहीं उठाता हूं. मैं कभी अपना जन्मदिन नहीं मनाता हूं. मेरे लिए यह अनूकूल समय था इसलिए मैंने यह कालखंड चुना है इसका मेरे जन्मदिन से कोई लेना-देना नहीं है.”

मोदी के उक्त संबोधन के शब्दों पर गौर करें तो आप शायद मानने को विवश होंगे कि इसका उपवास से कोई लेना-देना नहीं था, सिवाय आत्म प्रचार के. आगे बढ़ने से पहले हम यह जानने की कोशिश करते हैं कि उपवास क्या होता है? मानव शरीर में पांच इंद्रियां होती हैं. जब व्यक्ति को लगता है कि इन पांचों इंद्रियों में असंतुलन पैदा हो रहा है तो उसमें संतुलन बनाने के लिए उपवास का प्रयोग करता है. मन, कर्म और वचन से व्यक्ति कमजोर होने लगता है तो उपवास कर उसे मजबूत करता है. महात्मा गांधी उपवास को हमेशा एक हथियार के रूप में प्रयोग करते थे, जो नि:स्वार्थ होता था. और फिर उपवास को एकांत चाहिए, उपवास को सहज और सरल होना चाहिए.

मोदी का उपवास इससे बिल्कुल उलट था. इसे उपवास का उपहास कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं होनी चाहिए. मेरी दृष्टि में मोदी का उपवास जनउपहास है. वो इसलिए कि तीन दिनों के इस सद्भावना उपवास में 60 करोड़ से अधिक का खर्च बैठा है. उपवास के खर्च पर नज़र रखने वाले बताते हैं कि जिस हॉल में यह उपवास आयोजित किया गया था उसका किराया पांच लाख रुपये प्रतिदिन है. कहा जा रहा है कि विवि प्रशासन ने मोदी से तीन दिनों के लिए सिर्फ तीन रुपये यानी एक रुपये प्रतिदिन का किराया ही लिया. मतलब, विवि प्रशासन ने मोदी की खातिर 14 लाख 99 हजार 997 रुपये का राजस्व का नुकसान सहा.

गुजरात यूनिविर्सिटी के हॉल में भारी सुरक्षा इंतजामों पर भी नज़र डालना जरूरी होगा. 10 से 12 हजार पुलिसकर्मी, 4 त्‍वरित कार्रवाई दल, 2 चेतक कमांडो टीम, 9 एसआरपीएफ कमांडो, 10 आईपीएस अधिकारी, एसपी स्तर के 20 अधिकारी सद्भावना उपवास स्थल पर बैठे गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की सुरक्षा में तैनात किये गए थे. इसके अलावा 50 सीसीटीवी कैमरे, 35 छोटे कैमरे, ग्राउंड में 10 वॉच टावर, 2000 कार पार्किंग वीआईपी के लिए, दो से चार हजार कारें, आठ से 10 हजार बाइक और 1500 भारी वाहन जीएमडीसी ग्राउंड में बनाए गए थे. मेडिकल टीम में 10-15 फिजिशियन, एनेसेथेसिस्‍ट, कार्डियोलॉजिस्‍ट, टेक्‍नीशियन, मोबाइल आईसीयू चौबीसों घंटे तैनात. 10 प्‍लाज्‍मा टीवी, पांच एलईडी टीवी और कई बड़ी स्‍क्रीन ताकि नरेंद्र मोदी लोगों को करीब से दिखाई देते रहें.

हॉल के अंदर तीन कैमरे लगाए गए. इनमें मोदी और मंच पर मौजूद दिग्‍गजों की तस्‍वीरें कैद होती रहीं. इतना कुछ जान लेने के बाद उपवास पर कुल जमा खर्च का हिसाब लगाने की शायद जरूरत नहीं और यह कहने में भी कोई गुरेज नहीं कि यह सारा खर्च जनता की जमा पूंजी से किया गया है. जनता के पैसे से अगर मोदी अपनी गलती के लिए प्रायश्चित कार्यक्रम आयोजित करते हैं, या फिर देश की जनता से देश सेवा का समर्थन हासिल करना चाहते हैं तो जनता का इससे बड़ा उपहास और कुछ नहीं हो सकता है.

Tuesday, 6 September 2011

ममता-मनमोहन के बीच 'तीस्ता' की दीवार

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की दो दिवसीय ढाका यात्रा में चार अन्य मुख्यमंत्रियों के साथ ममता बनर्जी अब नहीं जा रही हैं. अपनी यात्रा रद्द करते हुए ममता बनर्जी ने प्रधानमंत्री कार्यालय को संदेश भिजवाया कि भारत और बांग्लादेश के बीच तीस्ता नदी जल बंटवारा संधि की जो शर्तें उन्हें बताई गई थीं, उससे अंतिम मसौदे का स्वरूप एकदम अलग है. बांग्लादेश को ज्यादा जल दिए जाने का प्रावधान है. इससे पश्चिम बंगाल को नुकसान होगा. कहने का मतलब यह कि ममता और मनमोहन के बीच तीस्ता नदी चल बंटवारा संधि दीवार बनकर खड़ा हो गया है. जाहिर है यह दीवार ममता ने सोची-समझी रणनीति के तहत खड़ी की है.
राजनीति के चश्मे से देखा जाए तो ममता ने एक तीर से कई निशाने साधे हैं. आपको अगर ध्यान हो तो ममता जब केंद्र में मंत्री थी तब भी वह अपने निर्णय से पश्चिम बंगाल की राजनीति पर असर ज़रूर छोड़ती थीं. अब तो वह राज्य की सीएम ही हैं तो फिर अपने प्रदेश का अहित होते कैसे देख सकती हैं. प्रधानमंत्री की ढाका यात्रा के दौरान तीस्ता जल बंटवारे को लेकर 15 वर्षीय अंतरिम समझौते पर दस्तखत होने हैं. केंद्र सरकार को समर्थन दे रहीं ममता बनर्जी तीस्ता जल बंटवारा संधि के बहाने बंगाल के लिए आर्थिक मदद की खातिर नए सिरे से दबाव बना सकती हैं. केंद्र ने पश्चिम बंगाल को विशेष आर्थिक पैकेज दिया है, लेकिन उसे अपर्याप्त बताते हुए ममता बाढ़ राहत और ग्रामीण विकास के मद में विशेष अनुदान की मांग कर रही हैं. ऐन वक्त पर बांग्लादेश की अपनी यात्रा रद्द कर ममता ने केंद्र को यही समझाने की कोशिश की है कि अगर बांग्लादेश को ज्यादा पानी देना है तो विशेष अनुदान की हमारी मांग भी पूरी करनी होगी. प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के लिए ममता की ज़िद को स्वीकारना उनकी राजनीतिक मज़बूरी है. वो इसलिए कि ममता की तृणमूल कांग्रेस की यूपीए सरकार की एक मज़बूत घटक जो है.
प्रधानमंत्री की ढाका यात्रा की तैयारियों को लेकर गृह मंत्री पी चिदंबरम और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार शिवशंकर मेनन ने हाल ही में कोलकाता जाकर ममता के साथ बैठकें की थीं. बैठकों के दौरान ममता बनर्जी को बताया गया था कि 25 हजार क्यूसेक पानी बांग्लादेश को दिया जाएगा. लेकिन अंतिम मसौदे में 33 हजार से 50 हजार क्यूसेक पानी बांग्लादेश के देने की बात कही गई है. तीस्ता नदी सिक्किम के सो लोमो झील से निकलकर बंगाल के जलपाईगु़ड़ी से होते हुए बांग्लादेश में प्रवेश करती है और 600 किलोमीटर का रास्ता तय कर ब्रह्मपुत्र में मिल जाती है. भारत में सिलीगु़ड़ी के पास तीस्ता के गाजलडोबा प्वाइंट पर जल की मात्रा मापकर बंटवारे का फार्मूला तैयार किया गया है.
मुख्यमंत्री सचिवालय के सूत्रों के अनुसार, गर्मी में गाजलडोबा प्वाइंट पर ही तीस्ता का पानी घटकर सिर्फ 5000 क्यूसेक तक रह जाता है. ऐसे में समझौते के अनुसार, बांग्लादेश को पानी देने पर बंगाल के छह जिलों का क्या होगा? ममता की आपत्ति का एक बिंदु तीस्ता नदी के सिंचाई वाले इलाकों को लेकर भी है. भारत में यह इलाका 10 हजार वर्ग किलोमीटर और बांग्लादेश में सिर्फ 2000 वर्ग किलोमीटर है.
इसमें कोई दो राय नहीं कि ममता ने जो मुद्दा उठाया है वह निश्चित रूप से राज्य के हित में है और इसकी राज्य या केंद्र किसी भी स्तर पर अनदेखी ममता की राजनीतिक निष्ठा में आड़े आ सकती है. लेकिन ममता की ज़िद से प्रधानमंत्री डॉ.मनमोहन सिंह के सामने बड़ा सवाल यह खड़ा हो गया है कि तीस्ता नदी पर हुए समझौते पर हस्ताक्षर किए जाएं या नहीं? संविधान के अनुसार, किसी भी अंतरराष्ट्रीय मामलों में निर्णय लेने का अधिकार केंद्र सरकार के पास होती है. यदि विदेशी मामलों में किसी निर्णय से कोई राज्य प्रभावित होता है तो केंद्र सरकार उससे विचार-विमर्श कर सकती है. लेकिन ऐन वक्त पर ममता की आपत्ति से तीस्ता नदी पर प्रस्तावित समझौता अब अधर में लटक गया है.



मुश्किलों के दलदल में भाजपा

अन्ना के आंदोलन से एक ओर जहां भाजपा को मज़बूत होने का मौका मिला, वहीं कर्नाटक के विवादास्पद रेड्डी बंधुओं ने पार्टी को मुश्किल में फंसा दिया है. सोमवार 5 अगस्त को सुबह होते ही सीबीआई की टीम बेल्लारी में अवैध खनन के मामले में कर्नाटक के पूर्व पयर्टन मंत्री जी. जनार्दन रेड्डी के घर जा धमकी. जनार्दन रेड्डी को गिरफ्तार किया. पूरे घर को खंगाला तो वहां से डेढ़ करोड़ की नगदी, एक निजी चौपड़ और कुछ अहम कागजात मिले जिसे टीम ने जब्त कर लिया. उनके भाई श्रीनिवास रेड्डी के घर से 30 किलो सोना और तीन करोड़ से अधिक की नगदी जब्त की गई.
अब बड़ा सवाल यह है कि भ्रष्टाचार मुक्त भारत के निर्माण के लिए समर्पित अन्ना के आंदोलन से विपक्षी पार्टी के नाते जिस भाजपा को यूपीए सरकार और कांग्रेस पार्टी को घेरने का जो मौका मिला था, रेड्डी बंधुओं की गिरफ्तारी के बाद भाजपा अब किस मुंह से भ्रष्टाचार के खिलाफ अपनी आवाज़ को बुलंद करे. वर्तमान परिवेश में पार्टी के लिए संकट सिर्फ मुद्दे का नहीं है, असली संकट यह है कि पार्टी में आंतरिक फूट विनाशक दौर में प्रवेश कर गया है.
लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्‍वराज ने इस बात से पूरी तरह इनकार किया है कि उन्‍होंने रेड्डी बंधुओं को कभी बचाने की कोशिश की. उन्‍होंने इस बात से भी इनकार किया कि बेल्‍लारी बंधुओं को कर्नाटक मंत्रिमंडल में जगह दिलाने में उनकी कोई भूमिका थी.स्‍वराज का कहना है कि जब रेड्डी बंधुओं को येदियुरप्‍पा सरकार में मंत्री बनाया गया तो अरुण जेटली कर्नाटक के प्रभारी थे और बी एस येदियुरप्‍पा राज्‍य के मुख्‍यमंत्री थे. वेंकैया नायडू और अनंत कुमार राज्‍य में उस वक्‍त सीनियर नेता थे. इन लोगों के बीच आपस में क्‍या बात हुई, इससे मेरा कोई लेना-देना नहीं था.
दरअसल बेल्‍लारी बंधु के तौर पर मशहूर जर्नादन, करुणाकर और सोमशेखर रेड्डी सुषमा स्‍वराज के करीबी माने जाते हैं और कहा जाता है कि इन तीनों भाइयों को सुषमा का आशीर्वाद हासिल है. सुषमा और रेड्डी बंधुओं की निकटता उस वक्‍त सामने आई थी जब 1999 में सुषमा ने कांग्रेस अध्‍यक्ष सोनिया गांधी के खिलाफ बेल्‍लारी लोकसभा सीट से चुनाव लड़ा था.
सुषमा स्वराज का कहना है कि रेड्डी बंधुओं से पूरे साल में सिर्फ एक बार मेरी मुलाकात होती है जब वह वरामहलक्ष्‍मी की पूजा के लिए बेल्‍लारी जाती हैं. बाकी 364 दिनों में हमारी कोई बात नहीं होती है. सुषमा स्वराज को इतनी सफाई इसलिए देनी पड़ी क्योंकि कांग्रेस तो दूर, पार्टी के अंदर ही एक धड़ा रेड्डी बंधुओं से उनके संबंधों को लेकर बखेड़ा खड़ा करने में जुटा है.
कांग्रेस भी समय-समय पर सुषमा के बेल्‍लारी बंधुओं से संबंधों को लेकर सवाल उठाती रही है. स्‍वराज पर खदान की कमाई से कर्नाटक की राजनीति पर राज करने वाले रेड्डी बंधुओं की सबसे बड़ी पैरवीकार के आरोप लगते रहे हैं. कांग्रेस नेता संजय निरुपम ने संसद में भी बेल्लारी बंधुओं के बहाने सुषमा स्वराज पर तीखे कटाक्ष किए हैं. तथ्यों के साथ-साथ अखबारों में छपे फोटो भी सदन में दिखाए गए हैं। इनमें रेड्डी बंधु, सुषमा स्वराज के पैर छूते दिखाई पड़ रहे हैं. इसके जवाब में सुषमा का कहना था कि पिछले 11 साल से रेड्डी बंधुओं को वह जानती हैं, लेकिन इन 11 सालों में उन्होंने उनसे 11 रुपए भी नहीं लिए हैं. स्वराज ने यह भी कहा कि बेल्लारी में सोनिया गांधी के खिलाफ चुनाव लड़ कर उन्होंने शुरुआत की थी और रेड्डी बंधुओं ने बेल्लारी से कांग्रेस को खत्म कर उनके अभियान का समापन किया है.
बहरहाल, भाजपा की धुर विरोधी कांग्रेस का लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष सुषमा स्वराज या उनकी पार्टी भाजपा को कटघरे में खड़ा करना तो बखूबी समझ में आता है, लेकिन भाजपा में अपने ही नेता पर अन्य नेताओं द्वारा कीचड़ उछाला जाना इस बात का साफ संकेत है कि पार्टी में सत्ता संघर्ष की कवायद तेज हो गई है. लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष और राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष के बीच जो सत्ता संघर्ष का खेल चल रहा है वह न तो इन दोनों नेताओं के हित में है और न ही पार्टी के हित में है. इसलिए समय रहते पार्टी आलाकमान को इस तरह के अंतरकलह से उबरना होगा. अगर ऐसा न हो सका तो पार्टी मुश्किलों के दलदल में लगातार फंसती ही चली जाएगी और मिशन-2014 का सपना पूरा नहीं हो पाएगा.