Sunday, 29 January 2012

यूपी : जाति के बहाने जीतेगी राजनीति

राजनीतिक और सामाजिक दृष्टि से उत्तर प्रदेश एक ऐसा राज्य है जो दिल्ली की सत्ता को बहुत रास आता है। 2012 के विधानसभा चुनावों को 2014 में होने वाले लोकसभा के आम चुनाव का सेमीफाइनल माना जा रहा है। वैसे तो हर राज्य के चुनावी नतीजे अहम होते हैं, लेकिन उत्तर प्रदेश एक ऐसा राज्य है, जो दीर्घकाल से देश की राजनीतिक दशा दिशा को तय करता रहा है। लेकिन 18 मंडल, 75 जनपद, 312 तहसील, 80 लोकसभा, 30 राज्यसभा के साथ 403 सदस्यीय विधानसभा और 20 करोड़ की आबादी वाले इस विशालकाय प्रदेश में विकास कहीं पीछे छूट गया है और जाने-अनजाने में यह सूबा धर्म जाति आधारित राजनीति की प्रयोगशाला बन गया है। हम यहां यूपी की बात करेंगे। क्या चल रहा है यूपी की राजनीति में? लेकिन इससे पहले प्रदेश के जातीय समीकरण को सुलझा लेते हैं।


यूपी के बारे में एक कहावत बहुत प्रचलित है कि यहां के मतदाता अपना वोट नेता को नहीं, जाति को देते हैं। हर बार की तरह इस बार भी मतदाता वोट तो जाति को देंगे लेकिन जीतेगी राजनीति ही। जाति के इसी समीकरण को अपने-अपने पक्ष में करने के लिए तमाम राजनीतिक दल और प्रत्याशी अपने लुभावने वादों से मतदाताओं को फांसने में जुट गए हैं, लेकिन संयोगवश किसी राजनीतिक दल के पास न तो कोई मुद्दा है न कोई एजेंडा। ऐसे में मतदाताओं के पास एकमात्र विकल्प जाति का होता है और जिस दल का जातीय समीकरण मजबूत होगा, राजनीति उसे सत्ता सुख का ताज पहनाएगी। उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में जिस पार्टी को 30 प्रतिशत वोट मिलेंगे, उसकी जीत तय है। जहां तक जातीय समीकरण की बात है तो प्रदेश में 16 प्रतिशत वोट अगड़ी जाति के हैं। इनमें 8 प्रतिशत ब्राह्मण, 5 प्रतिशत ठाकुर और 3 प्रतिशत अन्य हैं। 35 प्रतिशत पिछड़ी जातियों में 13 प्रतिशत यादव, 12 प्रतिशत कुर्मी और 10 प्रतिशत अन्य हैं। इसके अलावा 25 प्रतिशत दलित, 18 प्रतिशत मुस्लिम, 5 प्रतिशत जाट और एक फीसदी अन्य हैं। पिछले चुनाव में मायावती सोशल इंजीनियरिंग के फार्मूले के तहत 25 प्रतिशत दलित, 8 प्रतिशत ब्राह्मण और 18 प्रतिशत मुस्लिम वोटों को जोड़ने में काफी हद तक सफल रहीं थी और यूपी में बसपा की पूर्ण बहुमत वाली सरकार का यही राज था।


यूपी मिशन-2012 की राजनीतिक प्रकृति काफी कुछ बदल चुकी है। मायाराज के इन पांच वर्षों के कार्यकाल में बसपा से ब्राह्मणों का मोह भंग हुआ है। 8 प्रतिशत का यह वोट बैंक भाजपा और कांग्रेस में बंटने की उम्मीद जताई जा रही है। लेकिन मसला राजनीतिक दलों के लिए ब्राह्मणों का 8 प्रतिशत या अगड़ों के 16 प्रतिशत वोट का नहीं है और न ही 35 प्रतिशत पिछड़ी जातियों का वोट बैंक कोई मुद्दा है। एक भाजपा को छोड़ दें तो तमाम दलों और यूपी की पूरी राजनीति मुस्लिम समुदाय के 18 प्रतिशत वोट के इर्द-गिर्द घूम रही है। दरअसल प्रदेश में सत्ता के दावेदार दलों की बात करें तो पहले नंबर पर बसपा, दूसरे नंबर पर सपा और तीसरे नंबर पर कांग्रेस और भाजपा है। इसमें भाजपा की स्थिति कमजोर दिख रही है। वह इसलिए कि प्रदेश में एक मजबूत नेता के न होने से भाजपा का जनाधार लगातार कम होता जा रहा है। 25 प्रतिशत दलित और 18 प्रतिशत मुस्लिम वोट पार्टी को मिलना नहीं है। 16 प्रतिशत अगड़ा और 35 प्रतिशत पिछड़ी जातियों के वोट बैंक में सभी की हिस्सेदारी होगी। तो जातीय समीकरण के हिसाब से भाजपा यूपी की सत्ता में फिट नहीं बैठती है और फिर चुनाव बाद भी भाजपा की केमेस्ट्री किसी दल से मेल नहीं खाती। अब बची कांग्रेस, सपा और बसपा। ये तीनों ही दल अपने-अपने वोट बैंक में 18 प्रतिशत वोट बैंक को सत्ता की सीढ़ी पर चढ़ने में मददगार मानते हुए मुस्लिम समुदाय को सबसे बड़ा हितैषी साबित करने में जुटे हैं।


चूंकि यह चुनाव बिना किसी मुद्दा और एजेंडा के लड़ा जा रहा है इसलिए अल्पसंख्यकों को आरक्षण का मुद्दा एक सोची-समझी रणनीति के तहत पैदा किया गया और सभी दल इसके सहारे गंगा नहा लेना चाहते हैं। हालांकि ये कोई आसान काम नहीं है। दरअसल अल्पसंख्यक आरक्षण का मुद्दा मायावती की राजनीति की देन है। अब 27 प्रतिशत कोटे में ही 4.5 प्रतिशत अल्पसंख्यक कोटा का प्रावधान कर कांग्रेस नीत यूपीए सरकार ने पासा फेंका उससे कांग्रेस खुद ही मुश्किल में फंस गई है। कांग्रेस के लिए अल्पसंख्यक आरक्षण न तो उगलते बन रहा है और न ही निगलते। हां, एक सूरत बनती जरूर दिख रही है और उसके संकेत भी मिल रहे हैं जिसके तहत चुनाव बाद कांग्रेस और रालोद सपा के साथ मिलकर गठबंधन सरकार बनाएं। इस समीकरण की नीब डाली जा चुकी है। इस नीब को मजबूती देने का काम किया है केंद्र की यूपीए सरकार की घटक ममता की तृणमूल कांग्रेस ने।


तृणमूल लगातार कांग्रेस को आंखें दिखा रही है। लेकिन ये गठबंधन तब होगा जब कांग्रेस और मुलायम पर 18 प्रतिशत मुसलमान मेहरबान हो जाएं। लेकिन ऐसा होना इसलिए मुश्किल होगा कि मुसलमानों को भी इस बात का अंदाजा है कि 4.5 प्रतिशत अल्पसंख्यक आरक्षण से उनका भला नहीं होने वाला है और गाहे-बगाहे मुसलमानों में भी इस बात की सुगबुगाहट अब होने लगी है कि उन्हें आरक्षण नहीं अवसर की चाहिए। अल्पसंख्यक आरक्षण की राजनीति को मुसलमान अब समझने लगे हैं। गा बजा के बसपा ही एक ऐसी पार्टी शेष बचती है जिसके पास दलितों का 25 प्रतिशत वोट बैंक का मजबूत आधार है। कुछ मेहरबानी मुस्लिम वोटर तो कुछ अन्य जातियों के वोटर बसपा के जातिगत समीकरण के तहत उतारे गए प्रत्याशी में निश्चित रूप से निष्ठा जताएंगे। अगर 10 प्रतिशत वोटर का रुझान भी अन्य जातियों से बसपा की तरफ रहा तो मायावती को सत्ता में आने से कोई नहीं रोक सकता है।


ये था सियासी दलों का जातीय गणित। अब आते हैं सूबे की राजनीति पर। कांग्रेस करीब दो दशक पुरानी अपनी राजनीतिक जमीन को फिर से पाना चाहती है। किसी भी सूरत में। बसपा की माया और भाजपा की उमा अपने-अपने मोर्चे संभाले हुए हैं। कांग्रेस ने राहुल, तो सपा ने मुलायम परिवार और रालोद ने अजित सिंह चौधरी को अपने सेनापति के तौर पर चुनावी संग्राम में उतारा है। राहुल गांधी, रीता बहुगुणा जोशी और दिग्विजय की तिकड़ी यूपी के ‘मिशन इंपॉसिबल’ को पॉसिबल मान रही है। 25 जनवरी 1950 को संयुक्त प्रांत से इस राज्य का नामकरण उत्तर प्रदेश हुआ था। लंबे समय तक कांग्रेस का यहां एकछत्र राज रहा। जिस समय राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे, तब 1985 के चुनाव में यहां अंतिम बार कांग्रेस को 260 से ज्यादा सीटें हासिल हुई थीं और 1989 में वह सत्ता से बाहर हुई तो 22 साल बीत चुके हैं, सत्ता में वापस नहीं लौटी। इसके साथ यह भी हकीकत है कि जब से उत्तर प्रदेश कांग्रेस से रूठा है, तब से केन्द्र में वह अपने बूते सरकार नहीं बना सकी है सो कांग्रेस को किसी भी सूरत में यूपी की सत्ता चाहिए।


मुख्यमंत्री मायावती ने 21 नवंबर को विधानसभा में प्रदेश को चार टुकड़ों पूर्वाचल, बुंदेलखंड, अवध प्रदेश और पश्चिम प्रदेश में बांटने का प्रस्ताव पारित कर केन्द्र सरकार को भेजने का ऐलान कर कांग्रेस ही नहीं, भाजपा और सपा को भी चारो खाने चित्त कर दिया। अवध को छोड़ दें तो बाकी तीन क्षेत्रों से अलग राज्य की मांग लंबे समय से चली आ रही है। मायावती इन क्षेत्रों के मतदाताओं को यह संदेश देने में सफल रही कि वे छोटे राज्यों के गठन के पक्ष में हैं। मायावती ने ऐन चुनाव से पहले राज्य को चार हिस्सों में बांटने का प्रस्ताव हड़बड़ी में क्यों पारित किया, यह समझने के लिए उत्तर प्रदेश के राजनीतिक हालातों को समझना जरूरी है।


वैसे तो मायावती पहले भी इस तरह की मौखिक मांग केन्द्र से कर चुकी थीं परन्तु राजनीतिक दल उनकी नीयत पर यह कहते हुए उंगली उठा रहे थे कि वह वाकई गंभीर हैं तो विस से प्रस्ताव पारित करके केन्द्र को क्यों नहीं भेजती? विस के सत्र से पहले हफ्ते में मुलायम सिंह यादव ने एटा में बड़ी रैली की थी और राहुल गांधी ने फूलपुर में शक्ति प्रदर्शन कर चुनावी शंखनाद फूंका था। मुलायम ने जहां सत्ता में आने पर किसानों को सिंचाई के लिए मुफ्त पानी उपलब्ध कराने का भरोसा दिया, वहीं राहुल ने प्रदेश के लोगों की गैरत को यह कहते हुए ललकारा था कि कब तक पंजाब और महाराष्ट्र में भीख मांगते रहोगे। जाहिर है, यूपी में चुनाव हैं तो सबके निशाने पर मायावती है। मायावती ने भी कच्ची गोलियां नहीं खेली हैं। वे जानती हैं कि कब किससे कैसे निपटना है? इसलिए उन्होंने पिछले कुछ महीनों में जहां एक के बाद एक कई लोकलुभावन घोषणाएं की, वहीं राज्य के बंटवारे का प्रस्ताव पारित करके विपक्ष के ऊपर ब्रह्मास्त्र चला दिया।


बहरहाल, गंगा-जमुनी संस्कृति का उद्गम स्थल रहा उत्तर प्रदेश आज अपनी पहचान के संकट से गुजर रहा है। जिस प्रदेश की भूमि ने बाल्मीकि, संत तुलसीदास, कबीरदास, सूरदास, प्रेमचंद, निराला, जयशंकर प्रसाद, सुमित्रा नंदन पंत, भारतेन्दु हरिश्चंद्र, रामचंद्र शुक्ल, महाबीर प्रसाद द्विवेदी, मैथिलीशरण गुप्त जैसे रचनाकारों को पैदा किया हो और जिस सूबे की राजनीति ने देश को सर्वाधिक आठ प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू, लाल बहादुर शास्त्री, इंदिरा गांधी, चौधरी चरण सिंह, राजीव गांधी, विश्वनाथ प्रताप सिंह, चंद्रशेखर और अटल बिहारी वाजपेयी के रूप में दिए हों, वहां धर्म व जाति आधारित राजनीति का बोलबाला है और विकास के रथ का पहिया टूटता जा रहा है। लेकिन इस सबके बीच जैसा कि हमने शुरू में कहा था कि वोट भले ही जाति को पड़े जीतेगी राजनीति ही। लेकिन वो राजनीति नहीं जो सियासी पार्टियां चाहती हैं। राजनीति की प्रकृति तेजी से बदल रही है क्योंकि मतदाता का मिजाज जो बदल रहा है। तय मानिए यूपी में यह राजनीतिक बदलाव एक नया सबेरा लाएगा।

बिजली : दावों को झुठलाती हकीकत

देश की राजनीति से अवाम सवाल कर रही है कि जब आप सबने खुली विश्व अर्थव्यवस्था को मंजूरी दे दी है, वैश्वीकरण की नीति पर चलकर ही भारत का विकास एवं समस्याओं का समाधान होना है तो भारत के लोगों की जिंदगी चाहे वे ग्रामीण भारत में रहें या शहरी भारत में दिनोदिन कठिन, खर्चीली, तनावपूर्ण और अराजक लाचार क्यों होती जा रही हैं? जिंदगी के छोटे-छोटे सवाल जैसे नलों में रोज साफ पीने का पानी की उपलब्धता, बिजली का सर्वसुलभ होना, रेल और बस में सुरक्षित सफर निरंतर दुरुह क्यों हो रहे हैं? हम यहां सिर्फ बिजली की बात करेंगे जो लगातार जीवन जीने के स्तर से लेकर सामाजिक मर्यादाओं को छिन्न-भिन्न करते हुए भारत की अर्थव्यवस्था तक के लिए महासंकट का रूप लेता जा रहा है।

देश में एक लाख से अधिक गांवों में रहने वाले करीब साढ़े तीन करोड़ लोग आज भी लालटेन युग में जी रहे हैं। आधिकारिक आंकड़े बताते हैं कि तमिलनाडु एक ऐसा प्रदेश है जहां हर गांव बिजली से रोशन है, लेकिन इसी तमिलनाडु के धर्मपुरी जिले में स्थित कड़ापडी एक ऐसा गांव है जहां के लोगों ने कभी बिजली के दर्शन नहीं किये। कश्मीर के सोपिया जिला मुख्यालय से मात्र 8 किलोमीटर की दूरी पर 10 हजार की आबादी वाला एक गांव बसा है जिसका नाम है सीडो। गांव के एक बुजुर्ग के अनुसार, 1987 में सिंगल लाइन तार से बिजली खंभों की जगह पेड़ों के सहारे गांव में बिजली लाई गई। 2001 में एक दिन अचानक तार टूटकर सड़क पर जा गिरा और दो बच्चे इसकी चपेट में आ गए। गांव के लोगों ने प्रदर्शन कर सरकार से सुनियोजित तरीके से गांव में बिजली आपूर्ति की मांग की। बिजली व्यवस्था में सुधार तो दूर, जो बिजली आ रही थी वो भी गुल हो गई। गांव में बने दो मंजिला सामुदायिक चिकित्सा केंद्र में लगे तमाम चिकित्सा उपकरणों, नियो नेटल सेंटर में बेबी वार्मर, सीलिग फेन आदि पर धूल की मोटी परतें जमी हुई हैं। आज एक दशक से अधिक समय बीत चुके हैं, लोग लालटेन और गैस लैंप से अपना गुजारा कर रहे हैं।

मध्यप्रदेश के दतिया जिले में एक गांव है खुजा। कहते हैं इस गांव में करीब एक दशक से शहनाई की गूंज, ढोलक की थाप पर मंगलगीत गाती महिलाओं के मधुर स्वर सुनाई नहीं दिए हैं। पूछताछ करने पर पता चला कि बिजली नहीं आने से गांव में दुल्हन के पांव पड़ने बंद हो गए हैं। बिजली गुल होने के बाद से यहां कोई अपनी बिटिया नहीं ब्याहना चाहता। 500 की आबादी वाले इस गांव में तीन दर्जन से अधिक ऐसे युवा हैं जो शादी की औसत उम्र पार कर चुके हैं। गांव के एक युवक की जुबानी सुनेंगे तो आप भी दंग रह जाएंगे, ‘एक साल पहले रिश्ते के लिए कुछ लोग घर आए थे। उन्होंने जब रिश्ते की बात बढ़ाई तो बातों ही बातों में साफ हुआ कि गांव में लंबे समय से बिजली नहीं है और फिलहाल आने की भी कोई उम्मीद नहीं है। तब उन्होंने कहा कि मेरी बेटी मोबाइल रखती है। ऐसे में उसका मोबाइल कैसे चार्ज हो पाएगा? और उन्होंने रिश्ता करने से मना कर दिया।’

उक्त तमाम चौंकाने वाले तथ्य यूपीए सरकार-2 की योजना ‘सभी के लिए बिजली’ की पोल खोलने के लिए काफी है। बिजली नहीं होने से उद्योग-धंधे चौपट हुए तो उद्यमियों ने उच्च क्षमता के जनरेटर का उपयोग करना शुरू कर दिया। लेकिन जब किसी गांव में बिजली के नहीं आने से युवकों के समक्ष शादी का संकट पैदा हो जाए और सामाजिक ताना-बाना छिन्न-भिन्न होने का खतरा पैदा होने लगे तो सोचना लाजिमी है कि सरकार कोई ऐसा कानून क्यों नहीं लाती जो देश के हर नागरिक को बिजली पाने का हक दिला सके। सरकार खाद्य सुरक्षा विधेयक (सबको भोजन की गारंटी) के लिए पहल कर सकती है तो बिजली सुऱक्षा विधेयक (सबको बिजली पाने का हक) के लिए पहल क्यों नहीं कर सकती।

गांव-गांव बिजली पहुंचाने के लिए सरकार ने 80 के दशक में ग्रामीण विद्युतीकरण कार्यक्रम शुरू किया, लेकिन भ्रष्टाचार और राजनीतिक इच्छाशक्ति के अभाव के कारण यह योजना मकसद में कामयाब होती नहीं दिखी तो सरकार ने 2005 में राजीव गांधी ग्रामीण विद्युतीकरण योजना की शुरुआत की और यूपीए-2 की सरकार ने दिसंबर 2012 तक सभी घरों में बिजली पहुंचाने का लक्ष्य तय किया है, लेकिन लाख टके का सवाल फिर से वही कि क्या 2012 में हर घर बिजली से रोशन हो पाएगा और दतिया का खुजा गांव जहां कोई बाप अपनी बेटी को ब्याहने से नहीं कतराएगा?

विकासशील देशों में बिजली की मांग में बढ़ोतरी सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी से अधिक होती है। समग्र ऊर्जा नीति के अनुसार, अगर भारतीय अर्थव्यवस्था को 7 प्रतिशत की दर से बढ़ना है तो बिजली के उत्पादन में हर साल 10 प्रतिशत की वृद्धि होनी चाहिए, लेकिन भारत में इस समय 101,153 मेगावाट बिजली पैदा की जाती है जो ज़रूरत से 13,000 मेगावाट कम है। लेकिन यह सब कैसे संभव हो पाएगा? संभव होगा, लेकिन इसके लिए अवाम को जागरूक होना होगा और सरकार को एक सशक्त बिजली सुऱक्षा नीति बनानी होगी।

विकास के जिस चौराहे पर देश खड़ा है, तय है बिजली की मांग में अनवरत बढ़ोतरी ही होगी और इसे पैदा करने के पारंपरिक साधनों का अगर इस्तेमाल होता रहा तो प्राकृतिक संसाधनों के दोहन में भी उसी रफ्तार से इजाफा होगा और यदि ये संसाधन क्षय ऊर्जा के स्रोत रहे तो इससे बिजली की मांग पूरी होने का सवाल ही पैदा नहीं होता। हमें कोयला व पेट्रोल आधारित ऊर्जा स्रोत के बजाए दूसरे विकल्पों पर गौर करना ही पड़ेगा। मसलन पवन ऊर्जा, सौर ऊर्जा, जैव ऊर्जा। ये सब ऊर्जा के अक्षय भंडार हैं। फिर इनसे प्रदूषण का खतरा भी नहीं है।

ऊर्जा की बर्बादी कम से कम हो, इसके प्रयास बेहद जरूरी हैं। कंप्यूटर, फ्रिज, एयरकंडीशन, ओवन जैसे 20 सर्वाधिक बिजली की खपत वाले उपकरणों की जगह दूसरे कम खपत वाले विकल्पों को अगले 5-6 वर्षों मे अनिवार्य करने संबंधी नीति बने। इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों व वाहन निर्माता नई तकनीक से युक्त उत्पादों का ही निर्माण करें। बड़े-बड़े मॉलों आदि में एस्कलेटर आदि के प्रयोग से बचा जाए। रियल एस्टेट के क्षेत्र में ऐसी नीति अपनाई जानी चाहिए कि भवनों का निर्माण ऐसा हो कि दिन में बिजली जलाने की जरूरत महसूस न हो। इमारत में जाड़े के दिनों में अधिकतम गर्मी बचाए रखने की क्षमता हो। नई इमारतों में शीशे की बड़ी दीवारों से बचना जरूरी है ताकि गर्मी के दिनों में वातानुकूलन पर अधिक ऊर्जा की खपत न हो। लेकिन इतनी रोशनी की व्यवस्था अवश्य करनी है जिससे दिन के वक्त बल्व न जलाना पड़े। हमें 2012 तक 100 किमी के सफर में 5-6 लीटर से ज्याद ईंधन खाने वाली गाड़ियों पर रोक लगानी होगी।

इस तथ्य को ध्यान में रखने की जरूरत है कि एक लीटर पेट्रोल के इस्तेमाल से वातावरण में चार किलो कार्बन डाइऑक्साइड पहुंचती है। सरकार को चाहिए कि अक्षय ऊर्जा कानून जल्द से जल्द लागू करे। 2050 तक कार्बन उत्सर्जन में चार फीसदी की कमी करने की जरूरत है। इस मामले में सरकार दूसरे देशों को दोषी ठहराने की नीति छोड़ अपने पर ही ध्यान केंद्रित करे तो अच्छा होगा। बिजली उत्पादन में तो क्रमश: बढ़ोतरी करते हुए 2050 तक अक्षय ऊर्जा की हिस्सेदारी करीब 64 प्रतिशत करने की जरूरत है। बिजली की कीमत को तर्कसंगत रखा जाना भी जरूरी है। प्रदूषण फैलाने वाली कोयला आधारित औघोगिक इकाइयों पर सख्ती से लगाम लगे। बिजली चोरी रोकने और वितरण व्यवस्था को लेकर भी सरकार को सख्त कदम उठाने होंगे। तभी देश की अर्थव्यवस्था मजबूत होने के साथ हर गांव बिजली से रोशन होगा और सामाजिक ताना-बाना छिन्न-भिन्न होने से बच सकेगा। देश के हर नागरिक को ‘बिजली का हक’ का सपना साकार हो पाएगा।