Friday, 28 December 2012

यह वक्त है सामाजिक और राजनीतिक सुधार का

दिल्ली में में 23 वर्षीय पैरामेडिकल छात्रा के साथ सामूहिक बलात्कार के मामले में इंसाफ की मांग को लेकर उपजे जन आक्रोश को अनदेखा नहीं किया जा सकता है। न तो सरकार के स्तर पर और न ही समाज के स्तर पर। एक तरफ जहां समाज को प्रतिबद्धता के साथ इस लड़ाई को आगे बढ़ानी होगी, वहीं सरकार के स्तर पर कुछ ऐसे उपाय ईजाद करने होंगे ताकि गैंगरेप जैसे हालात पैदा ही न हों। मैं मानता हूं कि आर्थिक उदारीकरण के साथ-साथ देश में राजनीतिक उदारीकरण और पितृ सत्तात्मक भारतीय समाज का उदारीकरण भी होना जरूरी था जो नहीं हो पाया, लेकिन इसके साथ ही खासकर महिलाओं से जुड़े अपराध से संबंधित जो आदम जमाने के कानून की जिस छाया में हम जी रहे हैं उसे भी बदलने की सख्त जरूरत है। देश में आर्थिक उदारीकरण के जनक और हमारे अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह पता नहीं क्यों भूल गए कि देश, समाज, सरकार और कानून-व्यवस्था का उदारीकरण किए बिना आर्थिक उदारीकरण कभी सफल नहीं हो पाता है। दुर्भाग्य से हमारा देश कुछ ऐसे ही हालात में जी रहा है और इसका दुष्परिणाम हत्या, लूट, डाका, बलात्कार, सामूहिक बलात्कार, अपहरण आदि के रूप में सामने आ रहा है।

दरअसल इस तरह के अपराध को अंजाम देने वाला शख्स आर्थिक उदारीकरण के बाद की पीढ़ी है जिसकी सोच तो भौतिकवादी है लेकिन वह चारों तरफ से पुरातन समाज के कायदे- कानून और सामाजिक ताने-बाने में इस तरह से जकड़ा हुआ है कि इन दोनों के बीच वह संतुलन नहीं बिठा पाता जिससे हादसे हो जाते हैं। निश्चित रूप से जिन युवा प्रजाति के लड़कों ने इस जघन्य सामूहिक बलात्कार को अंजाम दिया, इसके पीछे कोई सोची समझी रणनीति नहीं रही होगी। जहां तक मैं समझ रहा हूं, बस के अंदर दुर्भाग्य से कुछ ऐसी परिस्थितियां बनी होगी (मसलन दोनों पक्षों में किसी बात को लेकर विवाद आदि) कि नशे में धुत्त आवारा किस्म के लड़कों ने इस जघन्य घटना को अंजाम दे दिया। लेकिन इतना तो तय है कि एक तो ये लड़के शराब के नशे में धुत्त थे और दूसरा ये कि इनको पुलिस और कानून का भय नहीं रहा होगा। ये सब कुछ क्यों हुआ और कैसे हुआ यह पुलिस जांच का विषय है लेकिन जो कुछ हुआ इससे वीभत्स घटना की कल्पना नहीं की जा सकती और इसमें आरोपियों को जो भी सजा मुकर्रर की जाएगी वो कम होगी। सजा होगी और सख्त से सख्त सजा होगी यह भी तय मानिए क्यों कि इस घटना की प्रतिक्रिया पूरे देश में जिस तरह से सामने आई वह भी कल्पना से परे है। लेकिन हम सबको मिलकर इस सूरत को बदलनी होगी वरना देश, समाज और सरकार उसी ढर्रे पर चलता रहेगा कि घटना घटी, हंगामा हुआ, सरकार की तरफ से सजा का ऐलान कर दिया गया और फिर वही मरघट की शांति।

महिलाएं भारतीय समाज में एक बेहतर जिंदगी कैसे जीएं, इसको लेकर आज पूरे देश में बड़ी बड़ी बहस छिड़ी हुई है। कोई कह रहा है महिला अपराध से संबंधित मामलों की सुनवाई को फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाया जाए, कोई कहता है महिला अपराध रोकने से संबंधित कानून को बदला जाए तो कोई कहता है कि पुलिस को सुधारा जाए। इस बात पर कोई बहस नहीं हो रही कि कुछ ऐसे उपाय क्यों नहीं ईजाद किए जाएं कि पुलिस, थाना और कचहरी तक पहुंचने की नौबत ही न आने पाए। मेरा मानना है कि इसके लिए हमें समस्या की जड़ में जाना चाहिए और समाधान के रास्ते वहीं से निकालने चाहिए। जहां तक मेरा चिंतन कहता है, हमें सबसे पहले सामाजिक उदारीकरण का रास्ता तैयार करना पड़ेगा। जाहिर है यह बड़ा सवाल सबके मन में होगा कि यह सामाजिक उदारीकरण क्या बला है?

सामाजिक उदारीकरण नाम का यह शब्द कोई अमेरिका से आयात नहीं किया गया है। सदियों से समय-समय पर भारतीय संस्कृति में सामाजिक उदारीकरण होता रहा है और एक बार फिर इसकी जरूरत आ पड़ी है क्यों कि हमारे देश के कुछ नीति निर्माताओं ने पश्चिमी देशों के दबाव में आर्थिक उदारीकरण का जो जाल देश में फैला दिया है उससे संतुलन बिठाने के लिए सामाजिक उदारीकरण जरूरी हो गया है। एक आम आदमी की भाषा में अगर इसे परिभाषित करना हो तो इसे यूं कहें कि समाज का हर व्यक्ति चाहे वह महिला हो या पुरुष, सबकी तरक्की कैसे हो इस बारे में सहज भाव से सोचे, समझे और मदद को तत्पर रहे। अपनी बेटी और पड़ोसी की बेटी का फर्क मिटाना होगा, बेटी और बहू का भेद मिटाना होगा, लड़का और लड़की का भेद भी मिटाना होगा, जात-पांत, धर्म-संप्रदाय में दूरियां खत्म करनी होगी। ये सारी चीजें सामाजिक उदारीकरण के दायरे में आती है और जिस दिन हम अपने देश में सामाजिक उदारीकरण के पेड़ को उगा लिए समझिए समाज की किसी महिला के खिलाफ अपराध नहीं होगा।

अब हम आगे चलते हैं। सामाजिक उदारीकरण एक लंबी प्रक्रिया है जो एक दिन में नहीं आने वाली। इसपर हमें सतत और समयबद्ध तरीके से काम करना होगा, लेकिन इसके साथ जो तत्काल प्रभाव से एक काम करना चाहिए और जो संभव भी है वो है देश के सभी राज्यों में शराबबंदी कानून लागू करने का। कहते हैं कि पूरे देश में गुजरात एक ऐसा राज्य है जहां यह कानून लागू है। मेरा मानना है कि गुजरात की तर्ज पर इसे सभी राज्यों में लागू किया जाना चाहिए और अगर सरकार इस दिशा में आगे नहीं बढ़ती है तो इसके लिए जन आंदोलन छेड़ा जा सकता है।

मेरा मानना है और इसमें कोई दो राय नहीं कि समाज में तमाम अपराधों की जड़ में शराब होता है। खासकर महिलाओं के खिलाफ अपराध में शराब की भूमिका सबसे अधिक होती है। अगर लोग शराब न पीएं तो महिलाओं के खिलाफ घरेलू हिंसा, बलात्कार, सामूहिक बलात्कार, मारपीट आदि के साथ-साथ सड़क हादसों में भी काफी कमी आएगी और लोगों की आर्थिक संपन्नता भी बढ़ेगी। शराब के खिलाफ अभियान सामाजिक उदारीकरण को लागू करने में काफी सहायक होगा और भरोसे के साथ हम कह सकते हैं कि दिल्ली गैंगरेप जैसी वीभत्स घटनाओं की आशंकाओं को जड़ से मिटाया जा सकता है।

इस सबके बावजूद अगर महिलाओं के खिलाफ अपराध का कोई मामला सामने आता है जो एक सोची समझी रणनीति या साजिश का हिस्सा होता है तो उसके लिए महिलाओं के खिलाफ अपराध से संबंधित जो कानून सदियों से देश में चले आ रहे हैं उसमें संशोधन किया जा सकता है और पुलिस को आधुनिक तौर तरीकों से कुछ इस तरह से प्रशिक्षित किया जाए ताकि कोई भी पीड़ित लड़की जब थाने में शिकायत दर्ज कराने जाए तो उसे अपने घर जैसा अहसास हो। मेरा मानना है कि महिलाओं के खिलाफ अपराध चाहे वह छेड़खानी हो, घरेलू हिंसा हो, अपहरण हो, बलात्कार हो या फिर सामूहिक बलात्कार गैरजमानती तीन साल से लेकर फांसी तक की सजा का प्रावधान होना चाहिए।

जाहिर सी बात है कि यह सब राजनीतिक इच्चाशक्ति के बिना संभव नहीं है। अमेरिका के कहने पर अगर देश में परमाणु समझौता के लिए संसद में खास बहस हो सकती है, मल्टी ब्रांड रिटेल सेक्टर में प्रत्य़क्ष विदेशी निवेश (एफडीआइ) के लिए बहस हो सकती है, तो देश की महिलाओं की मुकम्मल सुरक्षा की बातचीत के लिए संसद क्यों नहीं बैठ सकती? देश की जनता चाहती है कि संसद समयबद्ध तरीके से व्यवस्था में सुधार के लिए एक कारगर कानून बनाए, यही रास्ता है। यानी संसद या विधायिका या विधानमंडल की यह संवैधानिक और नैतिक जिम्मेदारी बनती है कि जनता के प्रति, जनता के लिए और जनता के हित में एक ऐसा कानून बनाए जो अपराधियों के दिलो-दिमाग में खौफ पैदा कर सके। यह जरूरी इसलिए भी है क्यों कि दिल्ली गैंगरेप की घटना ने पूरी दुनिया में भारत की छवि को खराब किया है। इस घटना को लेकर न्यूयॉर्क टाइम्स अखबार ने लिखा, `भारत का अपराध संबंधी न्याय तंत्र अयोग्यता, भ्रष्टाचार व राजनीतिक हस्तक्षेप का शिकार है। ऐसा लगता है कि यह प्रभावी ढंग से प्रतिक्रिया देने में सक्षम नहीं है। सीएनएन की रिपोर्ट के अनुसार, भारत के आधिकारिक आंकड़े बताते हैं कि पिछले 40 वर्षों में दुष्कर्म की घटनाओं में करीब 875 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। 1971 में दुष्कर्म की 2487 घटनाएं हुई थीं। 2011 में ऐसी 24206 घटनाएं हुईं हैं।

बहरहाल, भारत को वैश्विक शक्ति के रूप में अपनी पहचान बनानी है तो देश की सत्ता में बैठे राजनीतिक दलों व उनके नेताओं को अपनी दैहिक भाषा बदलनी होगी। यह कहने से काम नहीं चलेगा कि हमारी भी तीन बेटियां हैं और गैंगरेप की इस घटना को लेकर हमें दुख है। देश के गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे ने तो गजब ही कर दिया। उनकी नजर में गैंगरेप केस में इंसाफ मांग रहे युवा लड़के-लड़कियों और माओवादियों में कोई फर्क ही नजर नहीं आया। इंडिया गेट पर प्रदर्शन कर इंसाफ की मांग कर रहे युवाओं से मिलने के सवाल पर गृहमंत्री ने यहां तक कह दिया कि कल को अगर माओवादी हथियारों के साथ प्रदर्शन करने लगें तो क्या मैं वहां भी जाऊंगा’? शिंदे ने कहा कि वो महिलाओं के खिलाफ बढ़ती रेप की घटनाओं का विरोध कर रहे प्रदर्शनकारियों से नहीं मिलेंगे। शिंदे ने यह भी कहा कि रेप कानून में संशोधन पर संसद का विशेष सत्र बुलाने की भी जरूरत नहीं है। इतने से साफ है कि जिस सरकार में सुशील कुमार शिंदे जैसे गृह मंत्री बैठे हो, न्याय की उम्मीद बेमानी ही होगी। इसलिए हमें राजनीतिक उदारीकरण की भी बात करनी होगी। भले ही इसके लिए आजादी की एक और लड़ाई क्यों न लड़नी पड़े। देश की जनता को जन नेता चाहिए राजनेता नहीं।

Thursday, 20 December 2012

नरेंद्र मोदी की महाविजय के हैं कई मायने

गुजरात में नरेंद्र मोदी ने जीत की हैट्रिक लगा दी है। यह मोदी की लगातार तीसरी और भाजपा की लगातार पांचवीं जीत है। तय मानिए यह जीत गुजरात का विकास और नरेंद्र मोदी के हिंदुत्व की है। यह जीत नरेंद्र मोदी को देश का प्रधानमंत्री बनाने के लिए जीत है। 182 सीट वाले गुजरात विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 115 सीटों पर जीत दर्ज कर एक बार फिर इतिहास रच दिया है। यह वाकई नरेंद्र मोदी की महाविजय है और इस महाविजय के कई मायने हैं।


पिछले डेढ़ दशक से गुजरात में भाजपा की सरकार है और खास बात यह है कि इन वर्षों में गुजरात ने आर्थिक और सामाजिक दोनों ही मोर्चे पर भारी तरक्की की है। गुजरात की सफलताएं इतनी प्रभावशाली हैं कि देश क्या दुनिया की निगाहें गुजरात पर आकर ठहर जाती हैं। इस सच से कोई इंकार नहीं कर सकता कि नरेंद्र मोदी आज की तारीख में भाजपा के सबसे बड़े नेता हैं और गुजरात विधानसभा का चुनाव जीतकर मोदी का कद आज और बड़ा हो गया है। नरेंद्र मोदी एक ईमानदार राजनेता हैं। नैतिक जिम्मेदारी के साथ जीते हैं। उनकी प्रशासनिक क्षमता संदेह से परे है। गुजरात में विकास के लिए उनकी गिनती देश के काबिल मुख्यमंत्रियों में होती है। मोदी के नाम पर भाजपा के कार्यकर्ता जोश से भर जाते हैं और सबसे बड़ी बात यह कि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और भाजपा जिस विचारधारा से ऊर्जा पाती है मोदी उसके सबसे बड़े प्रतीक पुरुष हैं। मोदी ने इस विचारधारा को नया आयाम दिया है। उन्होंने भाजपा के `हिंदुत्व` को `विकास` से जोड़कर एक नया मॉडल पेश करने की कोशिश की जिसमें वह बेहद सफल रहे।


पहले बात हिंदुत्व की ही करते हैं। दरअसल जिस सोमनाथ से लालकृष्ण आडवाणी ने 1989 में राम मंदिर के लिए रथयात्रा शुरू की थी, वहीं से आशीर्वाद लेकर नरेंद्र मोदी ने भी औपचारिक रूप से गुजरात में अपना चुनावी अभियान छह करोड़ गुजरातियों के विकास के नारे के साथ शुरू किया था। यह पहला मौका है जब हिंदुत्व की जमीन पर खड़े नरेंद्र मोदी का छह करोड़ गुजरातियों के विकास का नारा प्रभावी दिख रहा है। सद्भावना उपवास के बाद मोदी ने गुजरात में किसी मुस्लिम को भाजपा का टिकट नहीं दिया, लेकिन विकास में बराबर भागीदारी के नाम पर उन्हें भी अपने अभियान में शामिल करने की कोशिश की है। इसके अलावा मोदी ने महिलाओं और युवाओं पर सबसे ज्यादा फोकस किया। गुजरात का चुनावी इतिहास इस बात का गवाह है कि जब-जब प्रदेश में मतदान प्रतिशत अधिक होता है, भाजपा को सत्ता मिली है। गुजरात ने अपने पिछले रिकार्ड को तोड़ते हुए ताजा विधानसभा चुनाव में मतदान प्रतिशत का नया रिकार्ड बनाया है। साल 1995 में विधानसभा चुनावों में रिकार्ड 64.70 फीसदी मतदान हुआ था। तब केशुभाई पटेल भाजपा के मुख्यमंत्री बने थे। इस बार के चुनावों ने पिछले रिकार्ड को ध्वस्त करते हुए 71.30 फीसदी का नया रिकार्ड कायम किया है। मोदी ने सत्ता की हैट्रिक बनाई।


गोधरा कांड के बाद राज्य भर में भड़के दंगों के बाद साल 2002 के विधानसभा चुनावों में 61.55 फीसदी मतदान हुआ था और भाजपा सत्ता में आई थी। साल 2007 के विधानसभा चुनावों में हालांकि 59.77 फीसदी मतदान दर्ज किया गया था और तब भी भाजपा को सत्ता मिली थी। उस समय भाजपा को कुल 182 में से 117 सीटें मिली थी। कहने का मतलब यह कि मतदान प्रतिशत बढ़ने का तो गुजरात में भाजपा को फायदा होता ही है साथ ही एंटी इनकम्बेंसी फेक्टर के पंख भी इस प्रदेश में आकर कट जाते हैं। नरेंद्र मोदी ने मतदान के अंतिम चरण में मतदान करने से पहले कहा भी था कि गुजरात में प्रो-इनकम्बेंसी फेक्टर काम करता है। गुजरात में भाजपा की भव्य विजय होगी। निश्चित रूप से यह हिंदुत्व का एजेंडा ही है जो नरेंद्र मोदी की साख को लगातार बढ़ा रहा है।


दरअसल मोदी हिंदुत्व के जिस एजेंडा को लेकर चल रहे हैं वह वास्तविक हिंदुत्व की परिभाषा से ओतप्रोत है। मोदी के हिंदुत्व एजेंडा को आप सांप्रदायिकता के चश्मे से नहीं देख सकते हैं। नरेंद्र मोदी दरअसल वास्तविक राष्ट्रवाद के आधार पर शासन चलाते हैं और यह सत्य नियम है कि वास्तविक राष्ट्रवाद की बुनियाद पर काम किया जाए तो हिंदुत्व उस राष्ट्र का भविष्य बदल देगा। सोमनाथ मंदिर के सामने ठेला लगाने वाले मुसलमान भाई को इस बात से कोई मतलब नहीं कि प्रदेश में कौन जीत रहा है और कौन हार रहा है। वह मोदी राज में काफी सुरक्षित महसूस करता है। असुरक्षा का भाव होने का सवाल पूछने पर उसका कहना है कि साहब! यहां मंदिर में तो सब हिंदू ही तो आते हैं। आज तक तो ऐसा कोई भाव नहीं आया। समझ सकते हैं कि नरेंद्र मोदी इस प्रकार के हिंदुत्व को जीते हैं।


अब मोदी राज में विकास की बात करते हैं। गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी देश के ऐसे इकलौते राजनेता हैं जो जिंदगी अपनी शर्तों पर जीते हैं और इसी दर्शन के साथ वह तीसरी बार सत्ता में आए हैं। आपको याद होगा जब वर्ष 2002 में गुजरात में गोधरा की आग फैली थी तो पूरी दुनिया में गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को अछूत मान लिया गया था। देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने भी उन्हें `राजधर्म` का पालन करने की नसीहत दे डाली थी। ब्रिटेन ने 2002 में द्विपक्षीय सम्बंधों पर रोक लगा दी थी और मार्च-2005 में अमरीका ने मोदी को वीजा देने से इनकार कर दिया था। तब मोदी ने कसम खाई थी कि वह जीते जी अमेरिका की धरती पर कदम नहीं रखेंगे। और फिर मोदी ने गुजरात के परिदृश्य को ऐसे बदला कि गुजरात बना विकास मॉडल और नरेंद्र मोदी बने विकास पुरूष।


नरेंद्र दामोदर दास मोदी ने जब अक्तूबर 2001 में मुख्यमंत्री के रूप में पहली बार कार्यभार संभाला था तब गुजरात 26 जनवरी, 2001 को आए विनाशकारी भूकंप की विभीषिका तले दबा हुआ था। तब लगता था मानो गुजरात फिर कभी उठ नहीं पाएगा। लेकिन पुनर्वास और पुनर्निमाण के तेज प्रयासों और पुन: उठ खड़े होने के लोगों के अदम्य साहस और जज्बे से गुजरात विकास के मार्ग पर अग्रसर हो गया। उस दौर में गुजरात के पुनर्वास कार्य को रोल मॉडल के तौर पर स्वीकार किया गया। अपने डेढ़ दशक से अधिक के शासनकाल में मोदी के विकासवादी सोच के कुछ अहम फैसलों ने गुजरात कि किस्मत ही बदल दी।


किसी भी देश या राज्य की अर्थव्यवस्था की बात जब हम करते हैं तो निश्चित रूप से उसके सकल घरेलू उत्पाद दर (जीडीपी दर), कृषि विकास दर, औद्योगिक विकास दर और सेवा क्षेत्र में तरक्की की जमीनी हकीकत को आंका जाता है। गुजरात के सकल घरेलू उत्पाद (तरक्की की रफ्तार) की बात करें तो यह हमेशा डबल डिजिट में रही है। वर्ष 2000 के बाद गुजरात में कृषि की विकास दर बहुत अच्छी रही है। गुजरात में कृषि विकास दर हमेशा 10 प्रतिशत से ज्यादा रही है। वर्ष 2001 में गुजरात में 2000 मेगावाट बिजली पैदा होती थी जो उसकी अपनी जरूरत से बहुत कम थी, लेकिन 2012 के अंत में गुजरात में अतिरिक्त बिजली पैदा होने लगी। चूंकि बिजली औद्योगिक विकास के लिए संजीवनी होती है इसलिए गुजरात में औद्योगिक विकास की रफ्तार भी तेज है।


लोग अक्सर पूछते हैं कि गुजरात मॉडल क्या है। दरअसल इस राज्य में व्यक्तिगत पहल और उद्यमशीलता के लिए पूरी आजादी दी गई है और राज्य ने इसके लिए अनुकूल माहौल भी पैदा किया है। यह नियोजन के सशक्तिकरण और लोगों के सशक्तिकरण का बेजोड़ उदाहरण है। इसमें केंद्र के अनुदान से चलनेवाली योजनाओं के साथ राज्य की विशिष्ठ योजनाओँ को पूरक बनाया गया है। यह विकास का एक मानक सांचा है जिसे कोई भी राज्य अपनाकर तरक्की की राह पकड़ सकता है।


गुजरात विधानसभा चुनाव में जीत की हैट्रिक लगाकर नरेंद्र मोदी निश्चित रूप से देश के प्रधानमंत्री पद के संभावित दावेदारों में पहले पायदान पर आ गए हैं। इस मसले पर बहस पिछले एक साल से चल रही है और पूरे देश की निगाहें गुजरात विधानसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी के प्रदर्शन पर लगी थी। इस तरह के कयास लगाए जा रहे थे कि अगर नरेंद्र मोदी अपने पिछले प्रदर्शन से बेहतर प्रदर्शन करते हैं तो उस सूरत में नरेंद्र मोदी को देश का प्रधानमंत्री बनने से कोई नहीं रोक सकता है। अब जबकि गुजरात के नतीजे सामने आ चुके हैं, नरेंद्र मोदी को गुजरात से दिल्ली की ओर कूच करना चाहिए। मोदी को प्रधानमंत्री बनने के लिए मां का आशीर्वाद भी मिल चुका है तो फिर देर किस बात की....