Sunday, 30 June 2013

देवभूमि में भीषण तबाही का सच

इतिहास इस बात का गवाह है कि जब-जब ईश्वरीय सत्ता को चुनौती देने का साहस मानव ने जुटाया, दैवीय आपदा के रूप में उसे तबाही का सामना करना पड़ा। कुछ इसी तरह के मानवीय साहस का परिणाम देवभूमि के नाम से मशहूर उत्तराखंड के केदारनाथ धाम समेत कई इलाकों में 16 जून की शाम को आए जल प्रलय के रूप में पूरी दुनिया ने देखा।

स्कंद-पुराण के अनुसार, जैसे देवताओं में भगवान विष्णु, सरोवरों में समुद्र, नदियों में गंगा, पर्वतों में हिमालय, भक्तों में नारद, गायों में कामधेनु और सभी पुरियों में कैलाश श्रेष्ठ है, वैसे ही सम्पूर्ण क्षेत्रों में केदार क्षेत्र सर्वश्रेष्ठ है। और उस दिव्यधाम का परिसर लाशों से पट गया हो, गौरीकुंड व केदारनाथ के बीच यात्रा के प्रमुख पड़ाव रामबाड़ा का नामोनिशान मिट गया हो, शंकराचार्य का समाधि स्थल तक मलबे में दब गया हो तो फिर इसे ईश्वरीय सत्ता को चुनौती का दुष्परिणाम न कहें तो फिर क्या कहें।

किसी ने सच ही कहा है कि ईश्वरीय सत्ता को चुनौती देना खुद के अस्तित्व को मिटाने जैसा है। स्थानीय लोगों का कहना है कि श्रीनगर में गंगा की धारा के बीच स्थापित धारी देवी की मूर्ति हटाए जाने से जल प्रलय आया। प्रकृति की हर गतिविधियों को विज्ञान के नजरिये से देखने वाले लोग भले ही इसे अंधविश्वास मान रहे हों, लेकिन भक्तों और संतों का तर्क मानें तो 16 जून को धारी देवी की मूर्ति को हटाया गया था और इसी वजह से जल प्रलय ने देवभूमि में तबाही मचाई। यह निश्चित रूप से धारी देवी का ही प्रकोप है। आस्थावान लोगों का यह भी मानना है कि अगर धारी देवी की मूर्ति को उनकी जगह से नहीं हटाया जाता तो जल प्रलय नहीं आता। इससे पूर्व 1882 में भी एक राजा ने मंदिर की छत को जब अपने तरीके से बनाने करने की कोशिश की थी तो उस समय भी इसी प्रकार की विनाशलीला देखी गई थी।

भाजपा नेता उमा भारती समेत साधु-संतों की बड़ी जमात और स्थानीय लोग हमेशा से धारी देवी की मूर्ति को स्थापित जगह से एक इंच भी इधर-उधर करने के खिलाफ थे। इस संबंध में पिछले वर्ष 7 जुलाई को वरिष्ठ भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी के नेतृत्व में सुषमा स्वराज, अरुण जेटली, नितिन गडकरी और उमा भारती ने प्रधानमंत्री से मुलाकात की थी। यहां तक कि पिछले महीने 16 मई को लालकृष्ण आडवाणी के साथ जाकर उमा भारती ने राष्ट्रपति से भी धारी देवी को बचाने की गुहार लगाई थी। तो फिर धारी देवी की मूर्ति को स्थापित जगह से क्यों हटाया गया? इसपर चर्चा करने से पहले हमें यहां धारी देवी की महिमा को जानना जरूरी होगा।

दरअसल धारी देवी इस पूरे इलाके की कुलदेवी हैं जिन्हें गांव के लोग सदियों से पूजते आ रहे हैं। यह मंदिर श्रीनगर से 10 किलोमीटर दूर पौड़ी गांव में स्थित है। स्थानीय लोगों की मान्यता है कि पिछले 800 सालों से धारी देवी अलकनंदा नदी के बीच विराजमान होकर नदी की धारा को काबू में रखती आ रही हैं। मान्यता के अनुसार धारी देवी ही उत्तराखंड में चारों धाम की रक्षा करती हैं। इस देवी को पहाड़ों और तीर्थयात्रियों की रक्षक देवी भी माना जाता है। बीते 16 जून को स्थानीय लोगों के विरोध और हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ धारी देवी की मूर्ति को मंदिर से हटाकर ऊपर सुरक्षित जगह पर ले जाया गया और फिर उसी रात केदारनाथ धाम में बादल फटा और सैलाब में सब कुछ तबाह हो गया। पौराणिक धारणा है कि एक बार भयंकर बाढ़ में पूरा मंदिर बह गया था लेकिन धारी देवी की मूर्ति एक चट्टान से सटी धारो गांव में बची रह गई थी। गांव वालों को धारी देवी की ईश्वरीय आवाज सुनाई दी थी कि उनकी मूर्ति को वहीं स्थापित किया जाए। यही वजह है कि धारी देवी की मूर्ति को उनके मंदिर से हटाए जाने का हमेशा से विरोध किया जा रहा था।

13 साल पहले उत्तराखंड के रूप में नया राज्य बना था। साल 2004 के बाद हालात तेजी से बिगड़े हैं, जब केंद्र सरकार सहित उत्तराखंड सरकार ने करीब 800 विद्युत परियोजनाओं को मंजूरी दी है, जिसमें धारी देवी मंदिर का स्थान भी शामिल है। बेतहाशा विस्फोटों से जर्जर हो चुके पहाड़ों की भीतरी जलधाराएं रिसने लगी हैं। इससे पेड़ों को मिलने वाली नमी कम हो गई है, जो घटती हरियाली की बड़ी वजह बनी है। उत्तराखंड को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाया है यहां की जल विद्युत परियोजनाओं ने। एक बांध के लिए पांच से 25 किमी. की लंबी सुरंगें पहाड़ों के भीतर बेतहाशा विस्फोटों के जरिए खोदी गईं हैं। ये टनल आकार में इतनी बड़ी हैं कि इनमें एक साथ तीन ट्रेनों को गुजारा जा सकता है। एक अनुमान के मुताबिक इस वक्त करीब 125 स्थानों पर कहीं न कहीं सुरंग खोदी जा रही हैं। 427 बांध बनने हैं। इनमें से 100 बांधों पर काम चल रहा है। सन् 60 के दशक में पहाड़ों पर दिन-रात का तापमान समान था लेकिन पिछले 10 वर्षों में रात के मुकाबले दिन का तापमान तेजी से बढ़ा है और ये बादल फटने की बड़ी वजह बन रहे हैं। हमारी पर्यावरण, जलनीति दोषपूर्ण है और आपदा प्रबंधन लचर है। आपदा को अधिक विनाशकारी बनाने में समाज एवं सरकार की गलतियों एवं लापरवाही की भी बड़ी भूमिका है। प्रकृति बदला लेती है।

बहरहाल, धर्म और प्रकृति के प्रति सजग और जागरूक लोगों का मानना है कि पहाड़ों से छेड़छाड़ और मां धारी देवी की दैवीय सत्ता को चुनौती देने से देवभूमि में जल प्रलय आया। आखिर ऐसा क्या संयोग था कि धारी देवी की मूर्ति को जैसे ही उनकी जगह से हटाया गया, अचानक एक ग्लेशियर फटा और उसी दौरान गौरीकुंड और रामबाड़ा के बीच एक बादल भी फट गया? फिर केदारनाथ के आसपास का सब कुछ तबाह हो गया सिर्फ केदारनाथ मंदिर को छोड़कर। ये अवधारणाएं आस्था पर आधारित हैं और इसपर भरोसा रखना उसी प्रकार तर्कसंगत है जिस प्रकार से एक वैज्ञानिक सोच वाले व्यक्ति के लिए ‘न्यूटन के नियम’। ऐसे में, शासन व्यवस्था की यह नैतिक जिम्मेदारी बनती है कि ‘विकास’ और ‘आस्था’ के बीच एक संतुलन बनाकर रखा जाए। पुरातत्व महत्व की दृष्टि से भी देखा जाए तो इस धारी देवी की मूर्ति के साथ छेड़छाड़ करना तर्कसंगत प्रतीत नहीं होता। देवभूमि (उत्तराखंड) के लोगों में माता धारी देवी के प्रति आस्था इतनी प्रबल है कि इतिहास में जब भी इस तबाही के कारणों का जिक्र होगा लोग पर्यावरण के साथ हो रहे खिलवाड़ से पहले ‘मूर्ति’ का हटाए जाने की बात ही कहेंगे।

हिमालय की तराई से गंगा के निकलने के स्थान गंगोत्री और यमुना नदी के उद्गम यमुनोत्री के मार्ग में हिंदुओं के प्रमुख तीर्थ स्थल पड़ते हैं। पुराणों में कहा गया है कि ब्रह्मपुत्र सहित यदि इन नदियों को रोकने का किसी भी प्रकार का प्रयास किया गया तो प्रलय तय है। वराह, भागवत आदि पुराणों में रेवाखंड नाम के अध्याय में बताया गया है कि नर्मदा पाताल की नदी है और इसे रोकने का मतलब देश के अधिकांश हिस्सों में भूकंपों को आमंत्रित करना होगा। बहुत मेहनत और तपस्या के बल पर हमारे प्राचीन ऋषि-मुनियों ने इन नदियों को बनाया। लेकिन मानव विकास के ठेकेदारों ने सरकार से मिलकर बड़े-बड़े विद्युत परियोजनाओं को मंजूरी देकर और बांध बनाकर इन सभी नदियों के स्वाभाविक बहाव को रोक दिया है।

हवा, मिट्टी, जंगल, पानी और ऐतिहासिक तीर्थस्थल को लेकर सरकारें गंभीर नहीं हैं। जबकि इनका हिसाब-किताब रखा जाना बेहद जरूरी है। इनके बिना जीवन नहीं चल सकता है। इसके उलट इन्हीं के साथ इन दिनों छेड़छाड़ हो रही है। पहाड़ों पर नदियों को प्रकृति के रूप से नहीं बहने दिया जा रहा है। उन पर बांध बन रहे हैं या उनका गैरकानूनी तरीके से दोहन हो रहा है। इसलिए अब समय आ गया है कि सरकार पहाड़ों के अस्तित्व को समझे और इस तरह की नीतियां बनाए जिससे पहाड़ों का विनाश न हो। निश्चित रूप से इसके लिए नई राष्ट्रीय नीति बननी चाहिए जिसे राज्य सरकारें सख्ती से लागू करें।

Friday, 31 May 2013

भारत में 'दामादवाद' का दर्द

उत्तर भारत में दामाद की खातिर कुछ भी कर गुजरने की परम्परा है। भले ही वह गैर कानूनी ही क्यों न हो। लगता है यह परम्परा अब दक्षिण भारत में भी अपना पांव पसार चुकी है। देश में एक के बाद एक कई ऐसे दामाद राष्ट्रीय परिदृश्य में उभरे हैं जिससे संबंधित परिवार तो क्या पूरे देश की साख को बट्टा लगता है।

दरअसल भारतीय समाज और परिवार में दामाद नाम के आदमी से ज्यादा महत्वपूर्ण कोई नहीं होता। क्योंकि दामाद सिर्फ एक आदमी ही नहीं होता है। दामाद एक परंपरा होता है, एक उत्सव भी होता है। दामाद जब आता है तो पूरा घर मुस्कराने लगता है। जिस घर में दाल-रोटी भी मुश्किल से जुटता है और दाल-रोटी के साथ भाजी शायद ही कभी बनता हो, दामाद के आने पर उसी घर में पकवान बनता है। खीर-पूरी बनती है। खीर-पूरी बनाने का साधन कहां से और कैसे जुटाया जाता है, ये गरीब घर के बच्चे को कभी समझ में नहीं आता। हालांकि इसमें बच्चे का कोई दोष नहीं है। जब देश को समझ में नहीं आता तो ये बच्चे कहां से समझेंगे। हम बात कर रहे हैं आईपीएल सट्टेबाजी में फंसे गुरुनाथ मयप्पन की जो भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड के अध्यक्ष एन. श्रीनिवासन के दामाद हैं। हम बात कर रहे हैं डीएलएफ भूमि घोटाले में फंसे रॉबर्ट वाड्रा की जो दुनिया की शक्तिशाली महिलाओं में शुमार और कांग्रेस पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष सोनिया गांधी के दामाद हैं। हम बात कर रहे हैं उस रंजन भट्टाचार्य की जो देश के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के दत्तक दामाद हैं। ये दामाद सिर्फ एक परिवार तक सीमित नहीं हैं बल्कि इन्हें लोग देश के दामाद के रूप में भी देखता है।

अंग्रेजी में एक कहावत - 'ईस्ट ऑर वेस्ट दामाद इज बेस्ट।’ यानी ऐसा शख्स (दामाद ) जिसपर आप सर्वस्व लुटा देते हैं और बदले में पाते हैं अपमान, तिरस्कार, घृणा और आपकी कमाई हुई दौलत पर लालच भरी निगाहें। ऐसा प्यारा और जग से न्यारा रिश्ता है दामाद का। भारत के कुछ हिस्सों में तो ऐसा भी माना जाता है कि दामाद को अगर घर में ज्यादा दिन टिका लिया तो वह घर भर को चकरघिन्नी बना देता है। हम यहां कुछ ऐसे ही चकरघिन्नी बना देने वाले दामादों की चर्चा करेंगे जिससे संबंधित परिवार तो परेशान हुआ ही, देश का नाम भी बदनाम किया। समय-समय पर देश ने इन दामादों की पीड़ा झेली। अगर दुनिया के नक्शे पर नजर दौराएं तो सिर्फ भारत ही नहीं पूरी दुनिया के सत्ता समीकरण में दामादवाद एक अलौकिक विचारधारा के रूप में स्थापित हो चुका है। भारत की बात करें तो आजकल हर तरफ मयप्पन के नाम का शोर है। इससे पहले रॉबर्ट वाड्रा और रंजन भट्टाचार्य के नाम का शोर देश सुन चुका है। ये दामाद अपने सास और ससुर के प्रभाव का इस्तेमाल कर भ्रष्टाचार की चादर ओढ़ चुके है। खास बात ये है कि ये सब राष्ट्र की अस्मिता की कीमत पर हो रहा है। 'दामादवाद की पीड़ा' राष्ट्र की भावनाओं से खिलवाड़ है। गुजरात विधानसभा चुनाव के दौरान एक जनसभा में मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने दामाद शब्द पर चुटकी लेते हुए सोनिया गांधी पर निशाना भी साधा था। मोदी ने कहा था कि छह करोड़ गुजराती ही मेरा परिवार हैं। मेरा कोई दामाद नहीं है इसलिए गुजरात में भ्रष्टाचार की कोई संभावना ही नहीं।

गुरुनाथ मयप्पन  
बीसीसीआई अध्यक्ष एन. श्रीनिवासन के दामाद और उनकी टीम चेन्नई सुपरकिंग्स के शीर्ष अधिकारी गुरुनाथ मयप्पन को मुंबई पुलिस ने सट्टेबाजी के आरोपों में गिरफ्तार किया है। मयप्पन चेन्नई के टीम प्रिंसिपल और सीईओ बताए जाते थे लेकिन चेन्नई टीम के मालिक इंडिया सीमेंट्स ने मयप्पन की गिरफ्तारी से ठीक पहले यह बयान जारी कर श्रीनिवासन के दामाद से किनारा कर लिया और कहा कि वह न तो टीम प्रिंसिपल हैं और न ही सीईओ। वह सिर्फ मानद सदस्य हैं। मयप्पन पर मुंबई पुलिस ने धोखाधड़ी और जालसाजी के भी आरोप लगाए हैं। मयप्पन का नाम सट्टेबाजी मामले में गिरफ्तार फिल्म अभिनेता विंदू दारा सिंह ने लिया था। मुंबई पुलिस के अनुसार मयप्पन के इस अपराध में शामिल होने के प्रमाण हैं इसलिए उन्हें गिरफ्तार कर घंटों पूछताछ की गई। अपने दामाद की गिरफ्तारी के बाद श्रीनिवासन पर इस्तीफा देने के लिए दबाव बढ़ता जा रहा है लेकिन बोर्ड अध्यक्ष थेथर बने हुए हैं और कह रहे हैं कि जब उनकी कोई गलती नहीं है तो वह इस्तीफा क्यों दें। 35 साल के गुरुनाथ मयप्पन चेन्नई के रहने वाले हैं। श्रीनिवासन की बेटी रूपा से उन्होंने प्रेम विवाह किया था। श्रीनिवासन ने अंतरजातीय शादी का विरोध किया था। कहते हैं कि पढ़ाई के दौरान मयप्पन स्कूल से निकाले गए थे। मयप्पन को बेहद अंधविश्वासी माना जाता है। गोल्फ के शौकीन गुरुनाथ मयप्पन 9 करोड़ के यॉट के मालिक हैं। मयप्पन का रियल एस्टेट का भी कारोबार है। मयप्पन केवल अपने ससुर का ही कारोबार नहीं संभालते, वे अपने पिता की एवीएम प्रोडक्शनस एंड एंटरटेनमेंट, एवीएम स्टूडियो और एवीएम कंस्ट्रक्शनस के मैनेजिंग डायरेक्टर भी हैं। एवीएम देश का सबसे पुराना स्टूडियो है जहां हिंदी, तमिल और तेलुगु फिल्में बनती हैं। तो ऐसे में गुरुनाथ को 'बोर्न विद द सिल्वर स्पून' कहना गलत नहीं होगा। क्रिकेट के अतिरिक्त गुरुनाथ मोटर रेसिंग और गोल्फ टीमों में किस्मत आजमा चुके हैं। उनको करीब से जानने वाले उन्हें 'प्रिंस गुरुनाथ' बुलाते हैं। गुरुनाथ के पिता एवी मयप्पन, जिन्हें ए. वी. एम. कहा जाता था, बेहद प्रख्यात फिल्म निर्माता थे।

रॉबर्ट वाड्रा  
प्रियंका वाड्रा के पति और सोनिया गांधी के इकलौते दामाद रॉबर्ट वाड्रा पर लगातार भ्रष्टाचार के आरोप लगते रहे हैं। कथित रूप से अवैध संपत्ति जुटाने के आरोपों की निष्पक्ष जांच कराने की मांग भी उठाई गई है। टीम अन्ना के सदस्य रहे अरविंद केजरीवाल ने रॉबर्ट पर आरोप लगाते हुए कहा कि वाड्रा चार साल में 50 लाख से 300 करोड़ रुपए के कैसे हो गए। डीएलएफ ने वाड्रा को बेहद सस्ती कीमतों पर कई फ्लैट के अलावा करोड़ों का कर्ज बिना ब्याज दिया। निश्चित रूप से एक शीर्ष राजनीतिक परिवार के दामाद द्वारा इतनी ज्यादा संपत्तियों का अधिग्रहण कई सवालों को जन्म देता है। भारत में इस राजनीतिक और आर्थिक ऑलिगार्की तथा क्रॉनी (बेईमान) कैप्टेलिज्म के सबसे नए नायक रॉबर्ट वाड्रा हैं। वाड्रा न तो सक्रिय राजनीति में हैं और न ही कांग्रेस के पदाधिकारी। उनकी सबसे बड़ी खासियत और उपलब्धि यही है कि वह भारत की सबसे ताकतवर राजनीतिक महिला और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के दामाद हैं। यूपीए सरकार में हो रहे बड़े-बड़े घोटालों के बावजूद सोनिया गांधी और उनके परिवार पर भ्रष्टाचार का सीधा आरोप नहीं लगा था। उनकी छवि एक तरह से बेदाग थी। कांग्रेस समय-समय पर अपनी साख बचाने के लिए सोनिया के त्याग को ब्रह्मास्त्र की तरह इस्तेमाल करती रही है। यह प्रचारित किया जाता रहा है कि जिस महिला ने प्रधानमंत्री की कुर्सी को ठुकरा दिया हो वह किसी तरह के भ्रष्टाचार में कैसे शामिल हो सकती है। लेकिन इंडिया अगेन्स्ट करप्शन के कर्ताधर्ता और समाजसेवी से राजनीतिज्ञ बने अरंविद केजरीवाल और प्रख्यात वकील प्रशांत भूषण ने रॉबर्ट वाड्रा के जमीन जायदाद के गोरखधंधे को बेकनाब करके सोनिया गांधी की महान त्याग की छवि को पूरी तरह से ध्वस्त कर दिया। ऐसा पहली बार हुआ जब किसी ने नेहरू-गांधी परिवार पर भ्रष्टाचार का सीधा आरोप लगाया है। वह भी पूरे सबूतों के साथ। वाड्रा प्रकरण से भविष्य में कांग्रेस को कितना अधिक राजनीतिक नुकसान होगा यह कहना अभी मुश्किल है, लेकिन इतना जरूर है कि सोनिया गांधी की छवि के धूमिल होने से कांग्रेस बुरी तरह से हिल गई।

रॉबर्ट वाड्रा 18 अप्रैल 1969 में उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद शहर में पैदा हुए। मुरादाबाद में उनके पिता राजेंद्र वाड्रा पीतल व्यवसायी थे और मां मूलत: स्कॉटलैंड की रहने वाली हैं। मूल रुप से वाड्रा परिवार पाकिस्तान के सियालकोट से है। भारत विभाजन के समय राजेंद्र वाड्रा के पिता यानी रॉबर्ट वाड्रा के दादा भारत आकर बस गए। रॉबर्ट वाड्रा के एक भाई और एक बहन थीं। 2001 में बहन की कार दुर्घटना में मौत हो गई और 2003 में उनके भाई ने आत्महत्या कर ली थी। 2009 में उनके पिता की हृदयगति रुक जाने से मृत्यु हो गई। अब वाड्रा परिवार में उनकी मां ही उनके साथ है। कहा जाता है कि रॉबर्ट अपनी मां के बेहद करीब हैं। रॉबर्ट वाड्रा और प्रियंका गांधी की मुलाकात 1991 में दिल्ली में एक कॉमन फ्रेंड के घर पर हुई थी। बाद में दोनों की दोस्ती  बढ़ी और दोनों ने 18 फरवरी, 1997 को शादी कर ली। प्रियंका से विवाह करने के बाद रॉबर्ट वाड्रा का जीवन ही बदल गया। कहा जाता है कि रॉबर्ट के प्रियंका से शादी से फैसले को उनके परिवार ने पसंद नहीं किया और इसके चलते पिता-पुत्र के रिश्तों में दरार भी आ गई। अपने पिता से संबंध बिगड़ने पर रॉबर्ट वाड्रा सुर्खियों में आ गए। एक दौर ऐसा भी आया जब 2001 में उन्होंने एक सार्वजनिक बयान देकर खुद को अपने पिता से अलग कर लिया। रॉबर्ट के पिता राजेंद्र वाड्रा पर आरोप था कि उन्होंने उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी में नौकरी लगवाने के नाम पर लोगों को धोखा दिया। 2001 में ही उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव के दौरान रॉबर्ट की बाइक रैली को एक आईएएस अधिकारी ने रोक दिया था। बाद में उस आईएएस अधिकारी का तबादला एक बार फिर उन्हें विवादों में ले आया।

रंजन भट्टाचार्य
रंजन भट्टाचार्य देश के एक ऐसे दामाद हैं जो चुपके-चुपके काम करते-करते चुपके से ही पर्दे से गायब हो गए। पर्दे पर हीरो की तरह कभी नहीं चमके। एक जमाने में दिल्ली के ओबेराय होटल में काम करने वाले और अटल बिहारी वाजपेयी की मित्र राजकुमारी कौल के दामाद रंजन भट्टाचार्य के बारे में लोग कहते हैं कि असल में सत्ता उन्हीं के हाथ में था। लेकिन जैसे ही उनकी सत्ता का स्रोत यानी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) की सरकार के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी 2004 में सत्ता से बाहर हुए, भट्टाचार्य भी अचानक से गायब हो गए। लेकिन लगभग आठ साल बाद एक शाम अचानक सारी मीडिया का फोकस अटल बिहारी वाजपेयी के दामाद रंजन भट्टाचार्य पर हो गया। अरविंद केजरीवाल ने अपने प्रेस कॉन्फ्रेंस में एक टेप बजाया जिनमें भट्टाचार्य की आवाज सुनी गई। टेप कांड से ही चर्चा में आईं नीरा राडिया से बातचीत में भट्टाचार्य ने कहा, 'मुकेश भाई (मुकेश अंबानी) ने मुझसे कहा, कांग्रेस तो अपनी दुकान है।' भाजपा नेता अटल बिहारी वाजपेयी के दत्तक दामाद भट्टाचार्य की कांग्रेस के बारे में इस तरह की अपनेपन से भरी टिप्पणी भारतीय राजनीति के उस पहलू को बहुत अच्छे से उजागर करती है, जिसमें कहा जाता है कि देश की सभी राजनीतिक पार्टियां मिली हुई हैं। दरअसल भट्टाचार्य 2010 में चर्चा में तब आए थे जब यूपीए-2 की सरकार में मंत्री तय करने के मामले में नीरा राडिया टेप कांड उछला था। आरोप है कि मई 2009 में उन्होंने नीरा राडिया को तसल्ली दिलाई थी कि वह कांग्रेस में अपने संपर्कों के जरिए दयानिधि मारन को टेलीकॉम मंत्री नहीं बनने देंगे। यानी जब भाजपा अपनी लगातार दूसरी हार के गम में डूबी थी, वाजपेयी के दत्तक दामाद कांग्रेस का मंत्रिमंडल सजाने में व्यस्त थे। कल्पना कर सकते हैं तब वाजपेयी को कैसा लगा होगा? रंजन भट्टाचार्य ताकतवर रहते हुए भी कभी सार्वजनिक नहीं रहे। छोटे से राजनीतिक सर्कल के अलावा वह न तो ज्यादा लोगों से मिलते थे और न ही सार्वजनिक रूप से नजर आते थे। उनकी तस्वीरें भी कम ही छपती थीं। जानकार कहते हैं कि वह गली से गुजर जाएं तो किसी को पता नहीं चलेगा कि वाजपेयी का दामाद जा रहा है। ऐसा भी नहीं कि रंजन भट्टाचार्य को लेकर विवाद नहीं हुए। संघ प्रमुख केसी सुदर्शन ने एक बार कहा था कि भट्टाचार्य और वाजपेयी के प्रधान सचिव ब्रजेश मिश्रा की वजह से भाजपा की बुरी गत हुई। यूटीआई घोटाले में भी भट्टाचार्य का नाम उछला था। लेकिन प्रबंधन का कमाल रहा कि कहीं कोई नुकसान नहीं हुआ।

बहरहाल, आज की तारीख में देश ‘दामादवाद’ के दर्द से परेशान है, आहत है। कल तक जो मयप्पन सिर्फ एन. श्रीनिवासन का दामाद बना हुआ था, कोई जानता तक नहीं था, आईपीएल स्पॉट फिक्सिंग के चंगुल में फंसने के बाद मयप्पन अचानक से पूरे देश का बदनाम दामाद बनकर सुर्खियां बटोर रहा है। रंजन भट्टाचार्य और रॉबर्ट वाड्रा भी देश के ऐसे ही दामाद रहे हैं। ना जाने ऐसे कितने दामाद और भी होंगे जो पर्दे के पीछे दलाली और गद्दारी को करीने से अंजाम दे रहे होंगे। मीडिया को ऐसे और दामाद खोजने होंगे। बहुत जरूरी है सिर्फ ब्रेकिंग न्यूज के लिए ही नहीं, देशहित में भी। साथ ही सरकार को भी पकड़ में आए ऐसे भ्रष्ट दामादों की खातिरदारी के लिए कुछ अलग से कानून बनाने होंगे। क्योंकि आईसीसी की नैतिक संहिता में जुए और सट्टेबाजी को लेकर विशिष्ट नियम हैं जिसके अनुसार निदेशक या उसका समकक्ष और उसके परिवार के सदस्य ‘सट्टेबाजी व्यवसाय’ से जुड़ी किसी गतिविधि में संलिप्त नहीं हो सकते लेकिन इस नियम में दामाद का कोई जिक्र नहीं है। आईसीसी नैतिक संहिता के उपबंध 7.2 (डी) के मुताबिक, ‘यह स्वीकार्य नहीं है और एक निदेशक को संहिता के उल्लंघन का दोषी पाया जाएगा अगर उसके परिवार (पति, पत्नी, माता, पिता, भाई, बहन, बेटा या बेटी) के सदस्य का सट्टेबाजी व्यवसाय में हित है, सट्टेबाजी व्यवसाय से ठोस रिश्ता है या सट्टेबाजी व्यवसाय के दैनिक संचालन के लिए वह कर्मचारी की भूमिका निभा रहा है।’ अगर इस नियम के मुताबिक चला जाए तो आईपीएल मैचों में सट्टेबाजी के आरोप में मयप्पन की गिरफ्तारी को श्रीनिवासन की ओर से आईसीसी संहिता का उल्लंघन नहीं कहा जा सकता।

Monday, 13 May 2013

हलफनामे से हांफती संप्रग सरकार


कोल ब्लॉक आवंटन घोटाले में केंद्रीय जांच ब्यूरो के सुप्रीम कोर्ट में दिए हलफनामे और उसके बाद सुप्रीम कोर्ट की कड़ी टिप्पणी से केंद्र की संप्रग सरकार बुरी तरह हांफ रही है। अश्विनी कुमार को कानून मंत्री के पद से हटना पड़ा। सीबीआई की जांच रिपोर्ट सरकार से साझा करने पर गलत जानकारी देने के मामले में सरकार के अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल हरेन रावल को इस्तीफा देना पड़ा। अब प्रमुख विपक्षी दल भाजपा प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का इस्तीफा मांग रही है। भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी का मानना है कि अब मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बने रहने का कोई तर्क नहीं है। प्रधानमंत्री को बचा रहे कानून मंत्री को पद से हटाने के फैसले के बाद चीजें आगे बढ़नी चाहिए और आगे का रास्ता यही है कि प्रधानमंत्री को अब निश्चित तौर पर इस्तीफा देना चाहिए। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह भी कह रहे हैं कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह यदि स्वयं ईमानदारी से आत्मनिरीक्षण करें तो उनके पास इस्तीफे के अलावा और कोई विकल्प नहीं बचता है। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि पीएम का भविष्य बहुत कुछ सुप्रीम कोर्ट में 10 जुलाई को कोलगेट पर होने वाली सुनवाई पर टिका है। कहने का तात्पर्य यह कि पिछले कुछ सालों से खेलगेट, कोलगेट या फिर रेलगेट जैसे मामले उजागर हुए हैं, संप्रग सरकार की शासन व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करते हैं।

दरअसल इस सरकार के भ्रष्टाचार की कई कहानियां हैं, लेकिन हम यहां सिर्फ कोलगेट की ही बात करेंगे और उसमें भी सीबीआई के सुप्रीम कोर्ट में दिए उस हलफनामे की जिससे मनमोहन सरकार हांफती नजर रही है। संप्रग सरकार पांचवें साल में प्रवेश करने वाली है और लोकसभा चुनाव सिर पर है इसलिए मुश्किलें कुछ ज्यादा ही हैं। आगे बढ़ने से पहले हमें यहां यह जानना जरूरी होगा कि सीबीआई के इस हलफनामे की चिंगारी उठी कहां से? यह सवाल बेहद अहम है और देश को इसके बारे में जरूर पता होना चाहिए। साल 2003 में भाजपा के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) सरकार ने साल 2012 तक सभी को बिजली देने की मिशन की घोषणा की थी और इसके लिए एक लाख मेगावॉट अतिरिक्त बिजली के उत्पादन का लक्ष्य तय किया गया। लेकिन जब साल 2004 में कांग्रेस के नेतृत्व वाला संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) सत्ता में आया तो उसे लगा कि कोल इंडिया इतने बड़े पैमाने पर कोयले का उत्पादन नहीं कर पाएगी।

योजना आयोग के अनुमान के आधार पर सरकार ने निजी और सरकारी कंपनियों को अधिक कैप्टिव खदान आवंटित करने का निर्णय लिया। अब आप जानना चाहेंगे कि कैप्टिव खदान क्या है? साल 1973 में भारत सरकार ने कोयले के खनन को अपने हाथों में ले लिया था। सरकारी कंपनी कोल इंडिया लिमिटेड दुनिया की सबसे बड़ी कोयला उत्पादक कंपनी है और भारत में कोयला बेचने की एकमात्र एजेंसी भी। लेकिन साल 1976 में लोहे और इस्पात के निजी उत्पादकों को अपने आंतरिक इस्तेमाल के लिए कोयले की खदान दी जाने लगीं। ऐसी खदानों को कैप्टिव खदानकहते हैं और इनका इस्तेमाल केवल और केवल उन्हीं कारखानों के लिए किया जा सकता है जिनके लिए इन्हें आवंटित किया गया हो। साल 2006 से 2009 के बीच निजी कंपनियों को 75 और सरकारी कंपनियों को 70 कोल ब्लॉक आवंटित किए गए। ये आवंटन कोयला मंत्रालय ने किए। इस दौरान कोयला मंत्रालय प्रधानमंत्री के पास था और प्रधानमंत्री थे मनमोहन सिंह। मंत्रालय ने इन आवंटनों के लिए एक स्क्रीनिंग कमेटी बनाई थी। ये कमेटी 1992 में बनाई गई थी और इसमें तीन बार साल 2005, 2006 और 2008 में बदलाव भी किए गए। लेकिन बाद में नियंत्रक और महालेखा परीक्षक यानी सीएजी ने कहा कि कोल ब्लॉकों को लीज पर दिए जाने में जिन दिशा-निर्देशों का पालन किया गया वो पारदर्शी नहीं थे। वर्ष 2004 में सरकार ने पहले कैप्टिव खदानों की नीलामी का सुझाव दिया। इसमें तर्क ये था कि जिसे भी कैप्टिव खदान मिलेगी उसकी तो चांदी हो जाएगी क्योंकि कोल इंडिया से खरीदने या आयात करने की तुलना में अपनी खदान से कोयला सस्ता पड़ेगा। कहने का तात्पर्य यह कि जिसे भी कैप्टिव खदान मिलती, उसे बाजार से सीधे कोयला खरीदने वाली कंपनी से सस्ता कोयला मिलता। लेकिन आने वाले वर्षों में नीलामी की ये योजना खटाई में पड़ती गई क्योंकि बिजली कंपनियों को इससे कोयले की कीमत बढ़ने का डर सताने लगा।

अक्तूबर 2008 में संसद में कोल ब्लॉक की नीलामी पर एक नया विधेयक पेश किया गया जो सितंबर 2010 में कानून बन गया। साल 2012 में सीएजी ने कहा कि कोल ब्लॉक आवंटित करने में कई स्तरों पर पारदर्शिता लाने की प्रक्रिया में देरी हुई जिससे निजी कंपनियों को 1 लाख 85 हजार 591 करोड़ रुपयों का वित्तीय लाभ हुआ यानी सरकार को चूना लगा। बचाव में सरकार ने कुतर्क देना शुरू किया कि गठबंधन सरकार में नीतिगत फैसले लेने में समय लगता है। सरकार ने ये भी तर्क दिया कि विपक्षी भाजपा जिन राज्यों में सत्ता में है, वहां की सरकारों ने भी नीलामी का विरोध किया था। अंतत: सीएजी ने अपनी रिपोर्ट में लिखा, 'स्क्रीनिंग कमेटी ने पारदर्शी तरीका नहीं अपनाया।' सबसे अहम बात ये है कि सीएजी के अनुसार कोल ब्लॉकों को आवंटित करने के पीछे 2012 तक सभी को बिजली देने का सपना था और उसे पूरा नहीं किया गया। जिन 86 कोल ब्लॉकों को साल 2010-11 तक उत्पादन शुरू करना था उनमें से सिर्फ 28 ने ही 31 मार्च 2011 तक ऐसा किया। फरवरी 2012 में सरकार ने सीएजी को बताया था कि कोल ब्लॉक को उत्पादन स्तर तक पहुंचने में तीन से सात वर्ष तक का समय लग सकता है।

सीएजी रिपोर्ट को आधार बनाकर विपक्ष ने कोल ब्लॉक आवंटन घोटाले की जांच की मांग को लेकर संसद ठप कर दिया। सरकार नियंत्रित सीबीआई ने जांच की और फिर जैसा कि अनुमान था, जांच रिपोर्ट में सरकार ने अपने तरीके से दखलंदाजी की। सीबीआई के तत्कालीन उप महानिरीक्षक रविकांत मिश्रा को जांच टीम से हटाकर गुप्तचर ब्यूरो में तबादला कर दिया गया। जब इतनी सारी बातें सामने आईं तो सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई से सरकार की दखलंदाजी पर हलफनामा मांग लिया। यह खबर मीडिया में ऐसे वक्त में लीक हुई जब बजट सत्र चल रहा था। कई महत्वपूर्ण वित्तीय विधेयक संसद में पारित होने थे। अगर सीबीआई के हलफनामे पर गौर किया जाए तो यह अदालत की अवमानना का मामला बनता है। क्योंकि सुप्रीम कोर्ट की साफ हिदायत थी कि जांच एजेंसी को सभी तरह के दबावों का मुकाबला करना चाहिए और उसे अपनी जांच रिपोर्ट कानून मंत्री सहित किसी के साथ भी साझा नहीं करनी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट की तीन सदस्यीय खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान सरकार और सीबीआई को आड़े हाथों लेते हुए हा कि सरकारी अधिकारियों के सुझाव पर रिपोर्ट की मूल आत्मा को ही बदल दिया गया। इससे जांच की पूरी दिशा ही बदल गई। सीबीआई जांच रिपोर्ट में केन्द्र के हस्तक्षेप पर चिंता व्यक्त करते हुए न्यायाधीशों ने कहा कि सीबीआई का काम कथित गड़बड़ियों के लिए कोयला मंत्रालय के अधिकारियों से पूछताछ करना है। सीबीआई के साथ विचार-विमर्श करने का उनका कोई सरोकार नहीं है। संयुक्त सचिव सीबीआई की जांच रिपोर्ट का अवलोकन कैसे कर सकते हैं?

अब ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि सीबीआई के हलफनामे से हांफ रही सरकार क्या सीबीआई रूपी तोते को पिंजरे से आजाद कर पाएगी? प्रथम दृष्ट्या तो इसका जवाब ना में ही होगा। देश की कोई भी पार्टी नहीं चाहती है कि सीबीआई को स्वायत्त संस्था का दर्जा दिया जाए क्योंकि सबके दामन दागदार हैं और उसे इस बात से डर लगता है सीबीआई अगर पिंजरे से बाहर गई तो उनकी बाकी जिंदगी जेल में ही कटेगी। लेकिन इस सबके बीच सुप्रीम कोर्ट की कड़ी फटकार के बाद सरकार ने सीबीआई रूपी 'तोते' को 'पिंजड़े' से आजाद करने की तैयारी शुरू कर दी है। इसके लिए वित्त मंत्री पी. चिदंबरम की अध्यक्षता में जीओएम (मंत्री समूह) का गठन भी कर दिया गया है। यह मंत्री समूह सीबीआई एक्ट (2010) में सुप्रीम कोर्ट के ताजा निर्देशों के अनुरूप बदलाव के सुझाव देगा। दरअसल सीबीआई अभी तक 1963 के दिल्ली विशेष पुलिस स्थापना कानून (डीएसपीईए) के आधार पर काम कर रही है। सुप्रीम कोर्ट के 1998 के विनीत नारायण फैसले के बाद इसमें कुछ बदलाव किए गए थे। जीओएम सुप्रीम कोर्ट के ताजा निर्देशों के अनुरूप इस एक्ट में बदलाव के सुझाव देगा जिसे सरकार 10 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट में पेश करेगी।

बहरहाल, हलफनामे के पीछे की पूरी कहानी आप समझ चुके होंगे। सपना था सबको बिजली देने का, ठीक उसी तरह जिस तरह से कांग्रेस की राष्ट्रीय अध्यक्ष सोनिया गांधी सबको भोजन की गारंटी योजना के तहत खाद्य सुरक्षा विधेयक संसद में पारित कराना चाहती हैं। लेकिन एक हलफनामे ने संप्रग सरकार का पूरा खेल बिगाड़ दिया है। यह कोई मामूली हलफनामा नहीं है जिसे सत्ता की ताकत से दबा दिया जाए। इस हलफनामे ने पूरे सत्ता तंत्र को हिलाकर रख दिया है। सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी से इस बात का सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में सरकार लोक की कोई बात नहीं कर रही, सिर्फ तंत्र की हनक से लोक को दबाकर रखने की जुगत भिड़ाई जा रही है। हलफनामे से सरकार का हांफना भी स्वभाविक है क्योंकि अगले साल देश में लोकसभा चुनाव होने हैं। भ्रष्टाचार के मकड़जाल में फंसी कांग्रेस नीत संप्रग सरकार को इस बात का भय सता रहा है कि कहीं उसकी दुर्दशा कर्नाटक में भाजपा सरकार की तरह ना हो जाए। ऊपर से कुछ लोकलुभावन विधेयक मसलन खाद्य सुरक्षा बिल, भूमि अधिग्रहण बिल आदि इस हलफनामे की वजह से संसद में पारित नहीं हो पाए। चुनाव से पहले अगर ये बिल सरकार पारित नहीं करा पाती है जिससे काफी उम्मीदें हैं तो जनता की अदालत का सामना करना संप्रग सरकार के लिए काफी मुश्किल भरा काम होगा।