Tuesday, 11 October 2016

डोनाल्ड ट्रम्प का खेल अब खत्म समझिए

एक पुराने वीडियो में अश्लीलता से भरे विवादित वक्तव्य के सामने आने के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में रिपब्लिकन पार्टी के उम्मीदवार डोनाल्ड ट्रम्प का गेम पूरी तरह से खत्म हो गया लगता है। आने वाले समय में तमाम सर्वे और विश्लेषकों का फैसला दुनिया के सामने होगा।

सबको आजादी, सबको समान अधिकार, सबको समान अवसर ये अमेरिका के लोकतंत्र की बुनियाद हैं। लेकिन डोनाल्ड डॉक्टरिन के बारे में माना जाता है कि वह वो अमेरिका नहीं बना सकती जिसका ख्वाब अमेरिका को गढ़ने वालों ने देखा था। दुनिया के सबसे सजग लोकतंत्र में एक ऐसा ब्रांड जो निडर है, बेबाक है और धनवान भी। एक ऐसा ब्रांड जो जनता की भावनाओं और सपनों से खेलता हो, नए-नए शिगूफे छोड़कर अमेरिकी जनता को चौंकाता हो, एक ऐसा ब्रांड जो समझता हो कि उसके सामने किसी की कोई हैसियत नहीं है। आपको लगता है कि इस तरह का कोई शख्स अमेरिका का अगला राष्ट्रपति बनेगा?

जी हां! डोनाल्ड ट्रम्प अमेरिका को फिर से महान बनाने की बात करते हुए नारा देते हैं 'मेक अमेरिका ग्रेट अगेन।' उनकी इन्हीं बातों पर अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में रिपब्लिकन पार्टी ने ट्रम्प कार्ड खेलते हुए डोनाल्ड ट्रम्प को अपना उम्मीदवार बनाया। उसके बाद ट्रम्प ने कई चौंकाने वाले बयान दिए हैं। मसलन मुस्लिमों को अमेरिका से खदेड़ दूंगा, भगवान द्वारा बनाया गया सबसे ज़्यादा नौकरियां देने वाला राष्ट्रपति बनूंगा, मैं अमेरिका को महान बना दूंगा आदि आदि।

हालांकि ट्रम्प ने अपने पुराने वीडियो में अश्लील और विवादित बयान की सच्चाई को तुरंत कबूल कर लिया और माफी भी मांग ली, लेकिन अमेरिकी मतदाता और खासकर महिलाएं ट्रम्प को कभी माफ नहीं करेंगी। सर्वे पहले ही इस बात को बता चुका है कि करीब 70 प्रतिशत महिला वोटर डेमोक्रेटिक उम्मीदवार हिलेरी क्लिंटन की तरफ हैं। ये तादाद और बढ़े इसके लिए डेमोक्रेटिक पार्टी ट्रम्प के इस नए खुलासे को और उभारेगी। इस टेप की बातें हर अमेरिकी वोटर तक पहुंचाएगी। इससे उन लोगों को ट्रम्प से चिढ़ और बढ़ेगी जो अभी तक तय नहीं कर पा रहे थे कि किसे वोट दें। उनकी दुविधा इससे खत्म हो जाएगी। कम से कम अमेरिकी वोटरों से तो ऐसी उम्मीद की ही जा सकती है।

कहते हैं कि बेशुमार दौलत के मालिक ट्रम्प का सिक्का अमेरिका ही नहीं, पूरी दुनिया के प्रॉपर्टी बाजार में चलता है। आसमान छूती इमारतों में ट्रम्प टॉवर का नाम लगते ही उसका भाव आसमान छूने लगता है। लेकिन दुनिया के सबसे शक्तिशाली राष्ट्र अमेरिका का राष्ट्रपति बनने के लिए यह काबीलियत कोई मायने नहीं रखता है। ट्रम्प का  विवादित बयान वाला जो एक पुराना वीडियो सामने आया है उसमें वह महिलाओं के बारे में भद्दी और आपत्तिजनक टिप्पणी करते दिख रहे हैं। वर्ष 2005 में ट्रंप ने एक सोप ओपेरा में ये टिप्पणी की थी। शायद उस समय ट्रम्प को ये अंदाजा नहीं रहा होगा कि उसे एक दिन अमेरिका में राष्ट्रपति पद के चुनाव के लिए अमेरिकी जनमानस का सामना करना पड़ेगा।

इस वीडियो रिकॉर्डिंग के सामने आने के बाद अमेरिका में ट्रम्प की जबरदस्त आलोचना हो रही है। ट्रम्प ने तीसरी पत्नी मलानिया से शादी करने के कुछ महीनों बाद ही यह आपत्तिजनक टिप्पणी की थी। ट्रम्प रिकॉर्डिंग में बता रहे थे कि एक लड़की को उन्होंने सेक्स के लिए मनाने की कोशिश की। ट्रम्प ने कहा कि मैंने उसके साथ सेक्स किया और वह महिला शादीशुदा थी। उसे कुछ फर्नीचर चाहिए था। मैं उसे फर्नीचर शॉपिंग के लिए ले गया। मैंने उससे कहा कि मैं उसे बताऊंगा कि अच्छा फर्नीचर कहां मिलता है। इसके बाद ट्रम्प ने उसी शो में एक्ट्रेस एरियाना जकर को देखकर कहा कि उन्हें कुछ मिंट्स चाहिए। उन्होंने कहा, हो सकता है मैं उसे किस करने लग जाऊं क्योंकि मैं खूबसूरत लड़कियों को देखते ही उनकी तरफ आकर्षित हो जाता हूं। यह आकर्षण एक चुंबक की तरह है। मैं किस करने के लिए बिल्कुल भी इंतजार नहीं कर पाऊंगा। ट्रंप यहीं नहीं रुके, उन्होंने कहा कि अगर आप स्टार हैं तो वे आपको सब कुछ करने देती हैं, आप तब उनके साथ कुछ भी कर सकते हैं।

साल 2005 के इस वीडियो के सार्वजनिक होने के बाद ट्रम्प ने माफी मांगते हुए अपनी सफाई में कहा कि यह हमारे बीच का एक हल्का-फुल्का मजाक था। यह एक निजी बातचीत थी जो सालों पहले हुई थी। बिल क्लिंटन ने तो इससे भी भद्दी टिप्पणी की थी। लेकिन अगर मेरी इस टिप्पणी से कोई अपमानित महसूस कर रहा है तो मैं इसके लिए माफी मांगता हूं। अमेरिका में इसी साल नवंबर में राष्‍ट्रपति चुनाव होने हैं। मुख्‍य मुकाबला रिपब्लिकन पार्टी के नेता डोनाल्‍ड ट्रम्प और डेमोक्रेटिक पार्टी की नेता हिलेरी क्लिंटन के बीच है। हालांकि मैदान में कई उम्‍मीदवार और भी हैं।

अमेरिका में राष्ट्रपति चुने जाने के लिए कराए जाने वाली प्रेसिडेंशियल बहस में भी डोनाल्ड ट्रम्प लगातार कमजोर पड़ते दिख रहे हैं। इसकी पुष्टि बहस के तुरंत बाद कराए गए सर्वक्षणों ने भी की है। रविवार को दूसरी बहस के तुरंत बाद कराए गए सर्वेक्षणों के अनुसार, डेमोकेट्रिक उम्मीदवार हिलेरी क्लिंटन ‘स्पष्ट विजेता’ बनकर उभरीं हैं। सीएनएन : ओआरसी सर्वेक्षण में कहा गया कि हिलेरी इस बहस की स्पष्ट विजेता रहीं क्योंकि सर्वेक्षण में शामिल 57 प्रतिशत लोगों ने हिलेरी के जीतने की बात कही जबकि 34 प्रतिशत ने ट्रम्प का समर्थन किया। राष्ट्रपति चुनाव की तीन में से पहली बहस होने के बाद 27 सितंबर को सीएनएन:ओआरसी ने सर्वेक्षण कराया था। तब भी लगभग 62 प्रतिशत मतदाताओं ने हिलेरी को स्पष्ट विजेता बताया था। ट्रंप को महज 27 प्रतिशत लोगों का समर्थन मिला था।

ट्रम्प को प्रिसिला लैम का भरोसा
इस बीच अमेरिकी चैनल सीएनएन ने हांगकांग की फेंग सुई एक्‍सपर्ट प्रिसिला लैम से जब पूछा कि बराक ओबामा के बाद अमेरिका का राष्‍ट्रपति कौन बनेगा? तो उन्‍होंने डोनाल्‍ड ट्रम्प का नाम लिया। लैम ने अपनी भविष्‍वाणी के 80 फीसदी सही होने का दावा भी किया है। प्रिसिला लैम की भविष्‍यवाणी के मुताबिक, 2016 डोनाल्ड ट्रम्प का साल है। उनका साइन अर्थडॉग है और मौजूदा वर्ष में उनका सितारा बुलंद है। ट्रम्प के जन्म की तारीख बताती है कि वह हिलेरी पर भारी पड़ेंगे। लैम के मुताबिक, ट्रम्प बेहद महत्‍वाकांक्षी हैं। उनके चेहरे की बनावट वर्गाकार है और ऐसे चेहरे वाले लोग हालांकि व्यवसाय के क्ष्‍ोत्र में नाम कमाते हैं, लेकिन नाक ऊंची है, इसलिए वह दूसरे क्षेत्रों मसलन राजनीति में भी सफल हो सकते हैं।

जहां तक हिलेरी क्लिंटन की सफलता का सवाल है तो लैम के मुताबिक, हिलेरी का साइन अर्थपिग है। उनका चेहरा बहुत अच्‍छा है और आंखें शार्प। हिलेरी का चेहरा लंबा है, नाक ऊंची है और होठ फ्लेक्सिबल हैं। ऐसी बनावट वाले पैसा कमाने की जगह लोगों को सुपरवाइज करते हैं और ऊंचे पदों पर आसीन होते हैं। लैम कहती हैं, 'हिलेरी दूसरी बार राष्‍ट्रपति पद की दौड़ में हैं। आठ साल पहले वह डिफरेंट साइकिल में थी और थोड़ी ज्‍यादा आक्रामक थीं। उन्‍हें लगता था कि उन्‍हें ही जीतना चाहिए, इसलिए वह हार गई थीं। लेकिन इस बार स्थिति उनके लिए थोड़ी ठीक है। लेकिन उनके लिए ट्रम्प को हराना आसान नहीं होगा।

ट्रम्प का 'अति' आत्मविश्वास
व्हाइट हाउस की रेस में डोनाल्ड ट्रम्प वाइल्ड कार्ड की तरह आए। उनके बयानों और बेतरतीब अंदाज ने किसी को चौंकाया तो किसी को डराया। ट्रम्प का दावा है कि वे अमेरिका को फिर से महान बना देंगे। लेकिन ट्रम्प की सबसे बड़ी चिंता ये भी है कि उन्होंने पूरी जिंदगी में मेहनत करके जो कुछ खड़ा किया है, अगर हार गए तो एक झटके में ढह जाएगा। करो या मरो के अंदाज में ट्रम्प जनता से कह रहे हैं कि उनके सामने भी ऐसा ही ख़तरा खड़ा है, और इसीलिए उन्होंने अमेरिकी की जनता से किया है अमेरिका को महान बनाने का वादा। ठीक उसी तरह जिस तरह कभी हिटलर ने जर्मनी को महान बनाने का रोडमैप तैयार किया था। ट्रंप को यकीन है कि ‘मेक अमेरिका ग्रेट अगेन’ का फॉर्मूला उन्हें व्हाइट हाउस का ताज पहना देगा।

कुछ और उम्मीदें जो दे रहीं सहारा
महान विचारक नोम चोमस्की का कहना है कि ट्रम्प को वोट डालना टॉर्चर, ग्लोबल वॉर्मिंग और दुनिया में जंग पर मुहर लगाने जैसा होगा। लेकिन डोनाल्ड ट्रम्प ने एक मजबूत अमेरिका का जो एजेंडा तैयार किया है उससे नहीं लगता कि वह कहीं से कमजोर हैं। ट्रम्प अमेरिका को मुसलमानों से निजात दिलाने की बात कहते हैं। जॉर्ज बुश ने भी ‘वॉर ऑन टेरर’ कहा था। पहले मुसलमानों के ऊपर ही कहा था, बाद में उसे बदल दिया कि आतंकवादी मुसलमान अलग हैं। उनकी सरकार सिर्फ आतंकवादी मुसलमानों को ही टारगेट करेगी। लेकिन ट्रम्प सीधे तौर पर कह रहे हैं कि मुसलमान ही आतंकवादी हैं। इसलिए ट्रम्प का नारा है- टारगेट ऑन मुस्लिम। ट्रम्प ने इस्लामिक स्टेट के खतरे से नफरत की नई हवा तैयार की है और ट्रम्प को इस हवा में अपना झंडा लहराता दिखता है।

अमेरिकी युवाओं के लिए रोजगार एक अहम मुद्दा है। ओबामा काल में अमेरिका में बेरोजगारी दर बढ़ी है। अमेरिका के अंदर और अमेरिका के बाहर दोनों ही मोर्चों पर अमरीकियों की नौकरी पर ग्रहण लगा है। विदेशी अमेरिका में ही अमरीकियों की नौकरी छीन रहे हैं। इसके अलावा आउटसोर्सिंग के जरिए सरहद पार भी अमरीकियों की नौकरी छिन रही है। डोनाल्ड ट्रम्प ने चीन के खिलाफ भी अमरीकियों की नौकरी के लिए खुली लड़ाई का ऐलान कर दिया है। ट्रम्प कहते हैं कि चीन से भी अमरीकियों की नौकरी वापस ले आएंगे।

बहरहाल, ट्रम्प युवाओं को चाहे जितना लुभा लें, आतंकवाद पर मतदाताओं को चाहें जितना भी लुभा लें, मेक अमेरिका ग्रेट अगेन जैसे स्लोगन चाहें जितना भी दे लें, लेकिन अमेरिकी मतदाता जब अपने सबसे अहम सांचे में चाल, चरित्र और चेहरा पर राष्ट्रपति पद के प्रत्याशियों को डालेंगे तो तय मानिए डोनाल्ड ट्रम्प उसमें फिट नहीं बैठेंगे। दरअसल, अमेरिकी लोकतंत्र की अच्छाई कहिए या बुराई कि चाल, चरित्र और चेहरा के संदर्भ में अमेरिकन खुद के प्रति भले ही ईमानदार ना हों लेकिन देश के नेता (राष्ट्रपति) से यह जरूर उम्मीद करते हैं कि उसमें किसी तरह का खोट ना हो। और यहीं आकर हिलेरी के मुकाबले ट्रम्प मात खा जाते हैं।   

डोनाल्ड ट्रम्प आज जिस मुकाम पर पहुंचे हैं, कोई शक नहीं कि उसको हासिल करने के लिए उन्होंने एक लंबा सफर तय किया है। ट्रम्प दुनिया के एक कामयाब बिल्डर हैं। उनका दावा है कि जिस काम को भी उन्होंने हाथ में लिया वहां कामयाबी मिली। अमेरिका को भी वे अपने ट्रम्प मॉडल से ऊपर ले जाने का दावा करते हैं। लेकिन अमेरिका का राष्ट्रपति बनना दुनिया का एक धनवान शख्स बनने से बिलकुल अलग कहानी होती है। सब कुछ आपके अनुकूल है लेकिन चाल, चरित्र और चेहरा के बनावटीपन को अगर मतदाताओं ने भांप लिया तो आप व्हाइट हाउस अपने दरवाबे बंद कर लेता है। उस शख्स के लिए और भी जो कहता हो कि 'मैं लोगों के सपनों से खेलता हूं, हाइपरबोल किसी काम को प्रमोट करने का सबसे प्रभावशाली तरीका है।'

Tuesday, 29 March 2016

असम में मिशन-84 का तीन तिकड़म

असम में 126 विधानसभा सीटों के महासंग्राम में दो-तिहाई बहुमत प्राप्त करने के लिए 'मिशन 84' का तीन तिकड़म चरम पर है। भाजपा महीनों से इस मिशन पर काम कर रही है और यहां तक कि उसने कई राज्यों से अलग रूख अपनाते हुए कांग्रेस के तरुण गोगोई के मुकाबले केंद्र सरकार के मंत्री सर्बानंद सोनोवाल के रूप में मुख्यमंत्री के नाम तक की घोषणा कर दी है।

आगामी चार और 11 अप्रैल को होने जा रहे चुनाव को लेकर एक सर्वे रिपोर्ट में भाजपा गठबंधन को मजबूत दिखाया गया है। एवीसी सर्वे द्वारा जारी एक रिपोर्ट में फरवरी के पहले सप्ताह तक के हालात के अनुसार असम विधानसभा के कुल 126 सीटों में से भाजपा 47, कांग्रेस 26, एआईयूडीएफ 24, बीपीएफ 15, एजीपी एक और निर्दलीय एक सीटों पर जीतती दिख रही है।

भाजपा को लोकसभा चुनाव (2014) में राज्य की 14 में से 7 सीटें मिली थीं। इससे उसका मनोबल काफी ऊंचा है। भाजपा को ये भी भरोसा है कि लगातार तीन विधानसभा चुनाव में मिली जीत के बाद अब कांग्रेस पार्टी और मुख्यमंत्री तरुण गोगोई की सरकार से लोग ऊब चुके हैं। वो बदलाव चाहते हैं और भाजपा उन्हें एक अच्छी सरकार देने का वादा कर रही है, लेकिन दिक्कत ये है कि असम की जो तस्वीर दूर से दिखती है वो नजदीक जाने पर अलग ही नजर आती है। जमीनी हालात कुछ अलग तरह की राजनीतिक हकीकत को बयां करती हैं।

दरअसल असम अपने आप में एक लघु भारत है। यहां सांस्कृतिक और भाषाई विविधता है। बराक घाटी और ब्रह्मपुत्र घाटी की सोच काफी अलग है और भाषा भी। अपर असम और लोवर असम की अलग-अलग तासीर हैं। भाजपा ने हमेशा की तरह इस बार भी अवैध बांग्लादेशियों के खिलाफ नारे को जोरशोर से उठा रखा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी अपनी चुनावी रैलियों में 'राज्य के विकास' का नारा देने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं।

हालांकि असम के लोगों के लिए अवैध बांग्लादेशियों के घुसपैठ का मुद्दा भावुक जरूर है, लेकिन यह मुद्दा 'मिशन 84' की कामयाबी की गारंटी नहीं देता है। इस मुद्दे पर पिछले चुनाव में (2011) भाजपा को सिर्फ पांच सीटें मिली थीं और इसी मुद्दे को फिर से हवा देना सफलता की गारंटी मानना आत्ममुग्धता के सिवा और कुछ नहीं होगा। वह इसलिए क्योंकि यहां मुस्लिम आबादी 30 फीसदी के करीब है जिसमें अधिकतर बंगाली भाषा बोलने वाले हैं। ये वर्ग हमेशा से कांग्रेस और बदरुद्दीन अजमल की एआईयूडीएफ को वोट देते आए हैं और इनकी जिंदगी में ऐसा कोई बदलाव नहीं आया है जिससे ये समझा जाए कि इस बार वो इन दोनों पार्टियों को वोट न दें।

भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के लिए दिल्ली और बिहार में मिली हार के बाद असम एक अहम चुनौती है। पार्टी में उनकी साख बनी रहे इसके लिए जरूरी है कि वह असम विधानसभा चुनाव में जीत हासिल करें, लेकिन ये उन्हें भी मालूम है और पार्टी के अन्य अहम नेताओं को भी कि कांग्रेस को हराना इतना आसान नहीं होगा। भाजपा की सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि राज्य के 126 विधानसभा चुनाव क्षेत्रों में से आधे में भी पार्टी की उपस्थिति नहीं है। बुनियादी ढांचों की बेहद कमी है। पार्टी के पास मुख्यमंत्री तरुण गोगोई की तरह ऊंचे कद का कोई नेता नहीं है।

सियासत के जानकार बताते हैं कि भाजपा ने एजीपी और कांग्रेस से जिन नेताओं को तोड़ कर पार्टी में शामिल किया है उनमें से अधिकतर पार्टी के किसी काम के नहीं हैं। जहां तक असम गण परिषद से चुनावी गठजोड़ की बात है तो यहां एजीपी की घटती लोकप्रियता भाजपा के लिए रोड़ा ही साबित होगी। पार्टी ने कांग्रेस सरकार के खिलाफ 'विरोधी लहर' का लाभ उठाने के लिए कभी कोई ठोस रणनीति नहीं बनाई है।

जहां तक कांग्रेस की रणनीति का सवाल है तो वह ये है कि कांग्रेस एआईयूडीएफ के साथ जरूरत पड़ी तो चुनाव के बाद हाथ मिला सकती है। अब इसमें भाजपा के लिए जरूरी यह है कि वह चुनाव से पहले या चुनाव के बाद कांग्रेस और एआईयूडीएफ को साथ नहीं आने दे। लेकिन इस मोर्चे पर काम करने के लिए भाजपा ने कोई रणनीति नहीं बनाई है कि ये कैसे किया जाए। राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो भाजपा को अलग-अलग क्षेत्रों के लिए अलग-अलग रणनीति बनानी चाहिए थी। मसलन, अवैध बांग्लादेशियों का मुद्दा बराक घाटी और ब्रह्मपुत्र घाटी में कारगर नहीं हो सकता क्योंकि दोनों इलाकों के मुद्दे भिन्न हैं।

हालांकि असम में सामाजिक और धार्मिक ध्रुवीकरण करना बहुत मुश्किल काम नहीं है लेकिन इस रणनीति से 'मिशन 84' का वो लक्ष्य भाजपा को हासिल होगा कि नहीं, इसकी गारंटी नहीं है। कुल मिलाकर कहा जाए तो अभी तक भाजपा की जीत की राह आसान नहीं दिख रही है, लेकिन पार्टी के लिए इस बार का चुनाव एक बड़ा अवसर है। कांग्रेस यहां डेढ़ दशक से राज करती आ रही है। जाहिर है असम की जनता का कांग्रेस से थोड़ा मोह भंग तो जरूर हुआ होगा।

बहरहाल, असम के मुद्दे गहरे जरूर हैं, लेकिन वो जमीन पर दिखाई नहीं देते। सत्ता पलट की गुंजाइश है, लेकिन परिवर्तन की आंधी बहती नहीं दिख रही। कौन बनेगा मुख्यमंत्री? किसकी होगी जीत? जाहिर है ये सवाल सबके जहन में है। अगर कोई चमत्कार न हो जाए तो नि:संकोच यह कहा जा सकता है कि पिछली बार की तरह ही इस बार भी त्रिशंकु विधानसभा होगी। कोई एक दल बहुमत के करीब भी नहीं पहुंचेगा। और तब बड़ा सवाल यह होगा कि गठबंधन की सरकार का नेतृत्व कांग्रेस करेगी या भाजपा और असम गण परिषद में से कोई एक।

Sunday, 21 February 2016

जाट आरक्षण आंदोलन सौ फीसदी 'साजिश'

हरियाणा में जाट आरक्षण आंदोलन ने हिंसक रूप अख्तियार कर लिया है। खट्टर सरकार के जाट नेता व मंत्री, पुलिस और सेना को निशाना बनाते हुए यह आंदोलन अब पूरी तरह से समाज विरोधी रास्ते पर आगे बढ़ रहा है। पूरे प्रदेश में जातीय टकराव की खतरनाक स्थिति बन गई है। निश्चित रूप से इस आंदोलन ने एक साथ कई सवाल खड़े किये हैं? पहला ये कि जाट आरक्षण आंदोलन किसी साजिश का हिस्सा तो नहीं है? क्या जाटों ने आंदोलन की परिभाषा को बदल दिया है? और अंतिम सवाल यह कि आंदोलन का इतने कम समय में इतना हिंसक रूप अख्तियार कर लेना सरकारी मशीनरी की विफलता नहीं है?

दरअसल जाटों का इतिहास सिंधु घाटी सभ्यता में समुह बनाकर खेती करने वालों से लेकर सत्ता सुख के लिए राजनीति के दौर में समूह बनाकर ब्राहमणवाद और पूंजीवाद से लड़ने और मरने तक का है। इस लेख को लिखने के दौरान जब जाटों के बारे में कुछ तथ्य ढूंढने निकला तो एक बड़ी ही रोचक कहानी से रू-ब-रू हुआ--

जाट ने एक दिन भगवान से कहा : मुझे खुशियां दे दे!
भगवान बोले : ठीक है, पर सिर्फ चार बार ही दूंगा।
वे चार बार तू बता?
जाट ने कहा : ठीक है, गर्मियों, सर्दियों, बरसात और वसंत में। 
भगवान हैरान रह गए! और बोले : नहीं, सिर्फ तीन बार दूंगा। 
जाट ने कहा : ठीक है, आज, कल और परसों दे दे। 
भगवान फिर हैरान रह गए और बोले : सिर्फ दो बार ही दूंगा। 
जाट ने कहा : ठीक है, दिन और रात दे दे। 
भगवान फिर से हैरान रह गए! और बोले : सिर्फ एक दिन ही दूंगा। 
जाट ने कहा : हर दिन। 
फिर भगवान हंसने लगे और बोले : रै जाट, तेरे रहेंगे हमेशा ठाठ।

कहने का मतलब यह कि आप कुछ भी कीजिए, लेकिन जाट के ठाठ में किसी तरह की कोई कमी आई तो जाट बिरादरी इसे कतई बर्दाश्त नहीं कर सकता। इस छोटी सी कहानी को पढ़ने के बाद मैं क्या, शायद आप भी इस नतीजे पर जरूर पहुंचे होंगे कि हरियाणा में कहीं न कहीं जाट के ठाठ में सरकार या सियासत के स्तर पर दखलंदाजी हुई है जो उसे नागवार गुजरा। आरक्षण की मांग तो एक बहाना भर है, एक साजिश भर है। असली कहानी तो कुछ और ही है। हरियाणा के सियासी पंडित बताते हैं कि असली निशाना तो जाटों के गढ़ में मनोहर लाल खट्टर के रूप में गैर जाट मुख्यमंत्री हैं।

आरक्षण मांग रही जाट समुदाय का यह आंदोलन इतना बड़ा और हिंसक हो जाएगा, इसका अंदाजा हरियाणा की खट्टर सरकार को भी नहीं रहा होगा। कहीं न कहीं इस हिंसक आंदोलन को सरकार की विफलता के तौर पर भी देखा जा रहा है। सरकार की इंटेलिजेंस यह पता लगाने में पूरी तरह से विफल रही कि इतने बड़े पैमाने पर आंदोलन की तैयारी है क्योंकि इतना बड़ा आंदोलन एक-दो दिनों की कवायद तो नहीं हो सकती है। इसके लिए काफी लंबा वक्त लगा होगा। गांव-गांव में जाट नेताओं ने बैठकें की होंगी और आंदोलनकारियों को सर पर कफन बांधकर निकलने के लिए ब्रेनवाश भी किया गया होगा।

दरअसल, पिछली हुड्डा सरकार का आरक्षण देने का फैसला कोर्ट के आदेश पर रद्द हो गया था। इसके बाद से जाट समुदाय खट्टर सरकार पर नया रास्ता तलाशने का दबाव बढ़ा रही थी। लेकिन खट्टर सरकार को यह समझ में नहीं आया कि वह जाटों को कैसे मनाएं। हरियाणा में 30 प्रतिशत आबादी रखने वाली जाट बिरादरी अपने लिए ओबीसी कैटेगरी में आरक्षण चाहती है। और यह संभव नहीं है।

हुड्‌डा सरकार ने 2012 में स्पेशल बैकवर्ड क्लास (एसबीसी) के तहत जाट, जट सिख, रोड, बिश्नोई और त्यागी समुदाय को आरक्षण दिया। यूपीए सरकार ने भी 2014 में हरियाणा समेत नौ राज्यों में जाटों को ओबीसी में लाने का ऐलान किया था लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने जाटों को पिछड़ा मानने से इनकार कर यूपीए सरकार का आदेश रद्द कर दिया। पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के एक आदेश के बाद 19 सितंबर 2015 को खट्टर सरकार को भी जाटों सहित पांच जातियों को आरक्षण देने की अधिसूचना को वापस लेना पड़ा। यह अधिसूचना हुड्डा सरकार के वक्त जारी हुआ था। इसके बाद से जाट समुदाय खट्टर सरकार पर नया रास्ता तलाशने का दबाव बना रही थी।

हरियाणा में कुल 67 प्रतिशत आरक्षण पहले से ही लागू है। अनुसूचित जाति को 20 प्रतिशत, बैकवर्ड क्लास-ए को 16 प्रतिशत, बैकवर्ड क्लास-बी को 11 प्रतिशत, स्पेशल बैकवर्ड क्लास को 10 प्रतिशत और आर्थिक रूप से बैकवर्ड क्लास-सी को 10 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान है। जाट नेता अपनी बिरादरी के लिए अब ओबीसी कैटेगरी में आरक्षण चाहते हैं। लेकिन हरियाणा सरकार इसपर राजी नहीं है। कहने का तात्पर्य कि आरक्षण का जो गणित है वह जाट आरक्षण आंदोलन के नेताओं को भी पता है कि यह संभव नहीं है लेकिन वह इसे भावनात्मक मुद्दा बनाकर गैरजाट मुख्यमंत्री को सत्ता से बेदखल करना चाहते हैं। जाट बहुल प्रदेश में कोई गैरजाट नेता मुख्यमंत्री बन जाए यह जाट समुदाय को पच नहीं रहा है। इसलिए जाट आरक्षण आंदोलन नहीं एक साजिश है कहने या मानने में कोई संदेह नहीं है।

जहां तक आंदोलन की अवधारणा की बात है तो इस कसौटी पर भी जाट आरक्षण आंदोलन को उचित नहीं ठहराया जा सकता है। आंदोलन समाज और देश के हित में होता है। यह आंदोलन की पहली शर्त होती है। लेकिन जाट आरक्षण आंदोलन से किस समाज और देश का भला हो रहा है? खुद जाट समाज के लिए भी यह आंदोलन जानलेवा साबित हो रहा है। लोगों की जानें जा रही हैं। सामाजिक तानाबाना छिन्न-भिन्न हो रहा है। पीने का पानी और दूध का संकट पैदा हो गया है। लोग कहीं आ-जा नहीं सकते हैं। स्कूल कॉलेज, सरकारी दफ्तर सब बंद हो गए हैं। खाने-पीने के जरूरी सामान नहीं मिल रहे हैं। पेट्रोल पंप, सरकारी कार्यालय, सर्किट हाउस, मंत्रियों के घर, रेलवे स्टेशन, पुलिस चौकी और सरकारी व सार्वजनिक वाहनों में आग लगाई जा रही है। पूरे प्रदेश में अराजकता का माहौल है।

बड़ा सवाल यह है कि संवैधानिक स्थिति एवं सामाजिक औचित्य को दरकिनार कर विपक्ष में रहते हुए देश और प्रदेश की तमाम सियासी पार्टियां आरक्षण जैसी मांगों को हवा देती हैं और सत्ता में आने पर उसकी कीमत चुकाती हैं। यह सवाल उठाने का साहस कोई राजनीतिक दल नहीं कर पा रहा है कि क्या आरक्षण ही तमाम आर्थिक-सामाजिक कठिनाइयों का समाधान है? गुजरात में पटेल समुदाय आरक्षण की मांग करे, हरियाणा में जाट समुदाय आरक्षण की मांग करे तो इससे ज्यादा हास्यास्पद बात कुछ और हो नहीं सकती। इसलिए आज जरूरत है इस तरह की मांगों से प्रेरित आंदोलन की रणनीति या मंशा को सरकार समझे और समय रहते इसका उचित समाधान करे।