Friday, 11 May 2018

कर्नाटक तय करेगा शाह का भविष्य

राजनीतिक गलियारों में इस बात का शोर मचा है कि कर्नाटक चुनाव में अगर भाजपा हारी तो पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और भाजपा की चुनावी जीत के चाणक्य अमित शाह की छुट्टी हो जाएगी। लिहाजा कर्नाटक चुनाव शाह के लिए सबसे बड़ी अग्निपरीक्षा है। अमित शाह को करीब से जानने वाले बताते हैं कि भाजपा अध्यक्ष को इतना नर्वस उन्होंने पहले कभी नहीं देखा। इसकी वजहें भी हैं। पहली यह कि भाजपा का आंतरिक सर्वे भी उन्हें कर्नाटक में जीत की गारंटी नहीं दे रहा है और दूसरी आरएसएस के नीति-नियंता कर्नाटक की चुनावी बिसात पर शाह की चली गई चाल से बेहद नाराज हैं।

इसमें कोई दो राय नहीं कि अमित शाह वर्तमान में भारतीय राजनीति के कद्दावर नेता हैं। जहां तक देश की सरकार और भाजपा की बात है तो शाह भले ही यूनियन कैबिनेट में शामिल नहीं हैं लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बाद अगर किसी की चलती है तो वह अमित शाह हैं। लेकिन जहां तक कर्नाटक चुनाव की बात है तो यह ऐसा चुनाव है जिसे अमित शाह अपनी शर्तों पर जीतना चाहते थे और संघ अपने अंदाज में यह चुनाव लड़ना चाहता था। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में रसूख रखने वाले सूत्रों का कहना है कि पिछले कुछ दिनों में अमित शाह और संघ के शीर्ष नेतृत्व के बीच तीन मुलाकातें हो चुकी हैं और तीनों ही मुलाकातों में अमित शाह को कुछ बातें सुननी पड़ी हैं। शाह के स्तर पर कर्नाटक में हुए फैसलों से संघ खुद को सहज स्थिति में नहीं पा रहा है और अमित शाह को बार-बार अपने हर फैसले के बारे में सफाई देनी पड़ रही है।

दरअसल, संघ शुरू से ही कर्नाटक को लेकर भाजपा को आगाह कर रहा था। उसके स्वयंसेवकों की रिपोर्ट थी कि कर्नाटक में सिद्धारमैया को कम आंकना बड़ी गलती होगी। लेकिन उस वक्त भाजपा अति-आत्मविश्वास में थी। दिल्ली वालों को कर्नाटक की जमीनी सच्चाई का सही अंदाजा नहीं था और भाजपा के जिन नेताओं को सच्चाई पता थी वे सच बताकर पार्टी आलाकमान को नाराज नहीं करना चाहते थे। इसलिए जब भाजपा चुनावी समर में कूदी तो अचानक जमीन बदली-बदली नजर आई। संघ अब इसी बात से नाराज़ है। आरएसएस नेताओं का कहना है कि भाजपा से एक नहीं कई गलतियां हुई हैं। हर बार भाजपा नेताओं को लगता है कि वो चुनाव जीत जाएंगे तो उनकी गलतियां छिप जाएगी। लेकिन गोरखपुर और फूलपूर के बाद अगर कर्नाटक में भी हार दर्ज हुई तो अमित शाह को इसकी जिम्मेदारी लेनी ही होगी।

आरएसएस के भीतरी सूत्रों की मानें तो संघ शुरू से ही भाजपा को सलाह दे रहा था कि इस बार बीएस येदियुरप्पा का जादू खत्म हो चुका है और केंद्रीय मंत्री अनंत हेगड़े जैसे नए नेता को मुख्यमंत्री उम्मीदवार के तौर पर पेश करना चाहिए। संघ की दलील थी कि सिद्धारमैया की पार्टी भले ही कांग्रेस है लेकिन उनकी सोच कांग्रेस से एकदम अलग है। इसलिए उन्हें हराने के लिए भाजपा को भी कुछ अलग सोचना और करना होगा। लेकिन भाजपा के शीर्ष नेतृत्व ने संघ के मनमाफिक बदलाव करने में रूचि नहीं दिखाई। संघ मुख्यालय में पैठ रखने वाले एक नेता की मानें तो संघ की नाराजगी तब और बढ़ गई जब अमित शाह ने बेल्लारी के रेड्डी भाइयों को भी टिकट दे दिया और बेल्लारी का चुनाव जीतने की कमान भी उन्हें सौंप दी। संघ अमित शाह के इस फैसले को पचा नहीं पा रहा है। संघ को समझ में नहीं आ रहा है कि बेल्लारी की कुछ सीटें जीतने के लिए उन्होंने कर्नाटक के सबसे बड़े चुनावी मुद्दे भ्रष्टाचार से समझौता कैसे कर लिया।

जब तक रेड्डी भाई चुनाव मैदान में नहीं उतरे थे तब तक भाजपा का सबसे बड़ा नारा था- सिद्धारमैया, सिद्धारमैया नहीं सिद्धा-रुपैया हैं। लेकिन अब भ्रष्टाचार का हमला भी भाजपा को ही सहना पड़ रहा है। अमित शाह और संघ नेतृत्व की पिछली मुलाकात तो सिर्फ इसी मुद्दे को लेकर थी। लेकिन शाह अपने जवाबों से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को संतुष्ट नहीं कर पाए कि आखिर रेड्डी भाइयों को टिकट देने की जरूरत क्यों पड़ी? संघ के भीतरी सूत्रों का तो यहां तक कहना है कि पार्टी के फैसलों से संघ इस कदर नाराज है कि कर्नाटक में भाजपा हारी तो अमित शाह को अध्यक्ष पद भी छोड़ना पड़ सकता है।

दरअसल, संघ के ज्यादातर नेताओं को अब भाजपा में नेतृत्व परिवर्तन की जरूरत महसूस हो रही है। अभी संघ में नंबर दो के नेता भैय्याजी जोशी भी अमित शाह से खुश नहीं बताए जा रहे हैं। कर्नाटक के बाद मध्य प्रदेश और राजस्थान में चुनाव होने हैं। संघ को लगता है कि इन दो राज्यों में भी पार्टी की हालत कुछ अच्छी नहीं है। इसलिए अगर 2019 का चुनाव जीतना है तो बदलाव 2018 में ही करने होंगे। भाजपा अध्यक्ष के तौर पर संघ की पहली पसंद हमेशा से नितिन गडकरी रहे हैं। संघ की नजर में मोदी सरकार में अगर किसी एक मंत्री की छवि सबसे अच्छी है और काम करने का रिकॉर्ड अच्छा है तो वे हैं नितिन गडकरी। इसके अलावा संघ हमेशा सामूहिक नेतृत्व में यकीन रखता है। इस वजह से उसे लगता है कि अब गुजरात के दो नेताओं के भरोसे नहीं, बल्कि सबको साथ लेकर चलने का वक्त आ गया है। और बात अगर इतनी दूर तलक आ पहुंची है तो यह काम अमित शाह को अध्यक्ष पद से हटाए बिना संभव नहीं।

Friday, 16 March 2018

योगी कभी हारता नहीं

गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है- 'योगः कर्मसु कौशलम' यानी जीव कर्म में अपनी संलग्नता के कारण परमात्म तत्व से विमुख न हों, इस कुशलता से कर्म करने वाला व्यक्ति योगी है। यानी जो मन को वश में कर के भौतिक इच्छाओं का त्याग कर देता है और विरागी हो जाता है वह योगी कहलाता है। कहने का मतलब यह कि योगी शब्द की अवधारणा को सार्थक करने वाला शख्स कर्मजीवी होता है, वह कभी हारता नहीं है। और ऐसा व्यक्ति अगर राजनीति में भी दखल रखता हो तो फिर क्या कहने। जी हां! हम यहां बात कर रहे हैं योगी आदित्यनाथ की। उस योगी आदित्यनाथ की जो गोरखपुर स्थित गोरक्षनाथ मठ के महंथ भी हैं और उत्तर प्रदेश के मुख्य सेवक भी। भारतीय राजनीति में इन दिनों अगर सबसे अधिक चर्चा किसी नेता की हो रही है तो उसमें योगी आदित्यनाथ का नाम सबसे ऊपर है। वह इसलिए कि गोरखपुर लोकसभा सीट पर 11 मार्च को हुए उपचुनाव में भाजपा को करारी हार का सामना करना पड़ा। कोई कह रहा है कि यह योगी की हार है, कोई कह रहा है यह भाजपा की हार है तो कोई कह रहा है कि यह मोदी-शाह की हार है। हार किसी की भी हो, वह होती हार ही है। लेकिन जब गोरखपुर की राजनीति के गुना-भाग में जाएंगे तो इस जीत-हार की असलियत खुलकर सामने आती है और उससे यह साफ हो जाता है कि योगी कभी हारता नहीं है। 

गोरक्षनाथ मठ की राजनीति सर्वोपरि
गोरखपुर की सियासत को करीब से जानने वाले इस बात को अच्छी तरह से जानते हैं कि यहां मठ की राजनीति सर्वोपरि है। दूसरे नंबर पर यहां की सियासत ब्राह्मण बनाम ठाकुर की चलती है। कई दशक पहले शुरू हुई इस तरह की सियासी जंग आज भी बरकरार है। ऐसा माना जाता है और यही सच भी है कि गोरखपुर में भाजपा की हार की आधी स्क्रिप्ट तो उसी तारीख में लिख दी गई थी जब वहां से उपेंद्र दत्त शुक्ला को उपचुनाव का प्रत्याशी बनाया गया था। वह इसलिए क्योंकि पहली बात कि उपेंद्र शुक्ला गोरक्षनाथ मठ से बाहर के प्रत्याशी थे, दूसरा योगी आदित्यनाथ की पसंद के नहीं थे और तीसरा उनपर ब्राह्मण का ठप्पा लगा था। उपेंद्र शुक्ला को लेकर भगवा राजनीति में कुछ ऐसे हालात पैदा हो गए थे कि अगर वह जीतते तो ये भाजपा, मोदी, शाह और योगी की जीत से ज्यादा गोरखपुर के मठ की हार होती। कहने का मतलब यह कि गोरखपुर में भाजपा की इस हार में कहीं न कहीं 'मठ' की अपनी जीत छिपी है।

बीते तीन दशक में पहली बार ऐसा हुआ जब गोरखपुर सीट पर भाजपा का उम्मीदवार गोरखनाथ मठ का कोई व्यक्ति नहीं था। दरअसल यह लोकसभा सीट योगी आदित्यनाथ के उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनने के बाद खाली हुई थी। उपेंद्र शुक्ला को भाजपा का टिकट दिए जाने को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के लिए एक राजनीतिक झटका माना जा रहा था। योगी के करीबी सूत्र बताते हैं कि योगी की पसंद के उम्मीदवार को पार्टी ने टिकट नहीं दिया। उनके मुताबिक उपेंद्र शुक्ला योगी के नहीं बल्कि केंद्रीय वित्त राज्यमंत्री शिव प्रताप शुक्ला की पसंद थे। गोरखपुर लोकसभा उपचुनाव के लिए योगी की पसंद उनकी गैरमौजूदगी में मठ के मुख्य पुजारी कमल नाथ थे। योगी की इच्छा थी कि लोकसभा सीट मंदिर के पास ही रहे। लेकिन स्थानीय स्तर पर कुछ नेता मठ से बाहर पार्टी के किसी सक्रिय कार्यकर्ता को देने की मांग उठा रहे थे। फिर योगी ने अपनी इच्छा को बदलते हुए धर्मेंद्र सिंह को टिकट देने की बात कही, लेकिन पार्टी आलाकमान ने योगी की इच्छा को सिरे से खारिज करते हुए शिवप्रताप शुक्ला के चहेते उपेंद्र शुक्ला को टिकट दिया गया। फिर क्या था, योगी ने मन ही मन उसी वक्त ठान लिया कि भाजपा की हार मंजूर लेकिन मठ की हार किसी सूरत में मंजूर नहीं हो सकती।  

यहीं बड़ा सवाल यह उठता है कि योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री रहते उनके अपने ही गढ़ में उनपर शिव प्रताप शुक्ला कैसे हावी हो गए? कोई और नहीं, भाजपा के लोगों का ही यह कहना है कि पार्टी के ही कुछ लोग उन्हें अपने ही गढ़ गोरखपुर में कमजोर करना चाहते हैं। पार्टी द्वारा पहले मेयर चुनाव और अब लोकसभा उपचुनाव में उनकी इच्छा के खिलाफ जाकर उम्मीदवार देने से इस बात को बल मिलता है। गोरखपुर में शिव प्रताप शुक्ला भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के काफी भरोसेमंद माने जाते हैं। यह बात वक्त-वक्त पर साबित भी होती रही है। अगर याद हो तो राजनाथ सिंह जब 2013 में दोबारा से भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने थे तो उनकी टीम में अमित शाह बतौर राष्ट्रीय महासचिव आए। उन्हें उत्तर प्रदेश का प्रभारी बनाया गया और शिव प्रताप शुक्ला तभी से अमित शाह का विश्वास जीतने के लिए काम करते रहे हैं। 2016 में जब भाजपा ने शुक्ला को राज्यसभा भेजा तो उस वक्त भी यही कहा गया था कि अमित शाह की वजह से ही उन्हें सांसदी मिली है।

ठाकुर बनाम ब्राह्मण की सियासी जंग
एक वक्त था जब गोरक्षनाथ मठ के महंथ दिग्विजय नाथ हुआ करते थे। उस वक्त गोरखपुर के ब्राह्मणों में पंडित सुरतिनारायण त्रिपाठी का काफी मान-सम्मान हुआ करता था। कहते हैं कि किसी वजह से दिग्जिवज नाथ ने सुरतिनारायण त्रिपाठी का अपमान किया था और वहीं से ठाकुर बनाम ब्राह्मण के बीच सियासी जंग शुरू हो गई। इसके बाद उस वक्त के युवा नेता हरिशंकर तिवारी ने दिग्विजय नाथ के खिलाफ आवाज उठाई। आगे चलकर ठाकुरों का नेतृत्व वीरेंद्र शाही के हाथ आया, लेकिन हरिशंकर तिवारी का 'हाता' और महंथ अवैद्यनाथ के 'मठ' के बीच गोरखपुर में वर्चस्व की लड़ाई चलती रही। 90 के दशक में योगी आदित्यनाथ के हाथ जब मठ की कमान आई तो योगी ने निरंतर 'मठ' की ताकत बढ़ाई। उनकी हिंदू युवा वाहिनी आसपास के कई जिलों में सक्रिय हुई। इसी बीच 1998 में माफिया डॉन श्रीप्रकाश शुक्‍ला का एनकाउंटर कर दिया गया जिसे ब्राह्मण क्षत्रप कहा जाता था।

गोरखपुर में ब्राह्मणों और ठाकुरों के वोट बराबर-बराबर हैं, लेकिन योगी आदित्यनाथ ने समाज सेवा के रास्ते अपनी ताकत लगातार बढ़ई और ब्राह्मण नेतृत्व कमजोर पड़ता गया। इसके साथ ही 'हाता' का असर भी कम होता गया। उस वक्त शिवप्रताप शुक्ला ब्राह्मणों के सर्वमान्य और ताकतवर नेता थे। लेकिन योगी की बढ़ती ताकत के साथ ही उनका राजनीतिक पतन होता चला गया। हालत ये हो गई कि कुछ वर्षों के लिए शिवप्रताप शुक्ला राजनीतिक पटल से भी ओझल हो गए। इस बीच राज्य से लेकर केंद्र तक योगी आदित्यनाथ का राजनीतिक कद लगातार बढ़ता गया। भाजपा में मोदी-शाह युग से पहले आलम ये था कि पूर्वांचल में योगी आदित्यनाथ जिसे चाहते उसे ही टिकट मिलता, जिसे नहीं चाहते वह टिकट पाकर भी हार जाता। मजबूरन भाजपा को उनके आगे घुटने टेकने पड़ते। उनकी हर बात केंद्रीय नेतृत्व को माननी पड़ती। गोरखपुर उपचुनाव में भाजपा की हार से तो यही लग रहा कि हालात आज भी बदले नहीं हैं।

साल 2017 में हुए विधानसभा चुनाव में भाजपा की शानदार जीत के बाद मुख्यमंत्री के लिए कई नाम सामने आए थे। मनोज सिन्हा का नाम तो फाइनल भी हो गया था लेकिन ऐन वक्त पर आरएसएस के समर्थन से योगी आदित्यनाथ मुख्यमंत्री बनने में सफल रहे। उनके मुख्यमंत्री बनते ही उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा नाराजगी ब्राह्मणों में थी। यह बात जब केंद्रीय नेतृत्व तक पहुंची तो मोदी और शाह ने डैमेज कंट्रोल के लिए महेंद्र नाथ पांडेय को प्रदेश भाजपा का अध्यक्ष बनाया। बात नहीं बनी तो योगी की सीट पर टिकट देने के लिए किसी ब्राह्मण चेहरे की तलाश थी ताकि यहां भी संतुलन बनाया जा सके। उसके तहत भाजपा संगठन और आरएसएस की सहमति से गोरखपुर उपचुनाव के लिए उपेंद्र दत्त शुक्ला मोदी और अमित शाह की पहली पसंद बने। लेकिन योगी आदित्यनाथ को यह नाम पसंद नहीं था। उसकी असली वजह यह थी कि योगी के सामने अपनी सीट बचाने से ज्यादा अहम था गोरखपुर में अपने 'मठ' की ताकत को बचाना।

बहरहाल, मोदी-शाह नीत भाजपा को यह समझना होगा कि पूर्वांचल में भाजपा का मतलब योगी होता है और योगी का मतलब है उनका अपना संगठन। अटल-आडवाणी युग में भी योगी ने 'मठ' की सर्वोच्चता से कभी समझौता नहीं किया और कभी किसी के सामने झुकना मंजूर नहीं किया। यही वजह रही कि योगी आदित्यनाथ को केंद्र या राज्य में कभी किसी मंत्री पद से नहीं नवाजा गया। ऐसे में उनके अहाते किसी भी उम्मीदवार के लिए उनकी मर्जी के बिना जीत हासिल करना नामुमकिन है। मठ की ताकत और ठाकुर बनाम ब्राह्मण की यह सियासी जंग 2019 के लोकसभा चुनाव में क्या गुल खिलाएगी इसका सबको इंतजार रहेगा।

Wednesday, 31 January 2018

संविधान की रक्षा कौन करेगा?

जब हम लोकतांत्रिक सिद्धांतों की बात करते हैं तो वह हमें बताती है कि लोकतंत्र में आम जनता ही केंद्र में होती है, लेकिन व्यवहार में लोकतंत्र एक सांविधानिक व्यवस्था को जन्म देता है जिसमें अधिकारों और कर्तव्यों का बंटवारा कार्यपालिका, न्यायपालिका और विधायिका में कर दिया जाता है। चूंकि इस व्यवस्था में आम नागरिक अधिकार संपन्न नहीं होते। जाहिर है, जन-सशक्तिकरण के सवाल पर जब लोकतंत्र नाकाम साबित होता है तो इसका ठीकरा संविधान पर फूटता है। आजादी के बाद से लगातार देश इसी व्यवस्था में जीने को अभिशप्त है।

एक वैश्विक रिपोर्ट के मुताबिक, जब देश में साल 2017 में कुल संपत्ति के सृजन का 73 प्रतिशत हिस्सा केवल एक प्रतिशत अमीर लोगों के हाथों में हो तो निश्चित रूप से लोकतांत्रिक ढांचा चरमराएगा और इसकी आंच से संविधान झुलसेगा। जब देश की शीर्ष अदालत के वरिष्ठ जज मीडिया के समक्ष न्यायपालिका की रक्षा की गुहार लगाएं तो यह सोचना बनता है कि देश का लोकतांत्रिक ढांचा कमजोर हो रहा है। इन जजों का कहना है कि आज देश का लोकतंत्र खतरे में है और कल कोई ये न कहे कि हमने अपनी आत्मा बेच दी है इसलिए हम मीडिया के सामने आए हैं। जजों ने कहा कि जब तक इस संस्था को बचाया नहीं जा सकता, लोकतंत्र को नहीं बचाया जा सकता। जाहिर है लोकतंत्र नहीं बचेगा तो संविधान के अस्तित्व में बने रहने की बात कैसे सोच सकते हैं। आखिर इसी लोकतंत्र की रक्षा के लिए तो संविधान की सत्ता को स्थापित किया गया है।

इससे भी एक कदम बढ़कर पहले पद्मावती और फिर पद्मावत फिल्म को लेकर देश में जिस तरह का हंगामा मचा उसने भी अपनी आंच से संविधान को झुलसाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हवाला देकर सुप्रीम कोर्ट ने फिल्म पद्मावत को रिलीज करने का आदेश दिया, लेकिन कई राज्यों की सरकारों ने शीर्ष अदालत के आदेश का पालन नहीं किया और करणी सेना के अलावा कई दक्षिणपंथी संगठनों के लोगों ने उत्पात मचाया। इस तरह की समाज व देशविरोधी गतिविधियां सीधे-सीधे संविधान को चुनौती देने जैसी है। क्योंकि सुप्रीम कोर्ट या देश की अन्य अदालतें जब कोई फैसला सुनाती हैं तो वह संविधान में उल्लिखित कानून के आधार पर होता है और अगर विधायिका ही इसको मानने में आनाकानी करने लगे तो फिर इस संविधान को बचाने के लिए देश के लोगों को आगे आना होगा, सरकारों को सोचना होगा, देश के तमाम विपक्षी दलों को इस बारे में रणनीति बनाकर जुटना होगा।

राहुल ने लगाई संवैधानिक मूल्यों की रक्षा की गुहार
कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर पहली बार देशवासियों के नाम खुली चिट्ठी में राहुल गांधी ने कहा कि हम सबके लिए यह याद रखना बेहद जरूरी है कि न्याय, समानता और भाईचारा हमारे संविधान की बुनियाद है। हमारे युवा देश के इतिहास में संविधान के इन अमूल्य धरोहरों की रक्षा करने की इससे ज्यादा जरूरत पहले कभी नहीं रही थी। देशवासियों के नाम अपने खुले पत्र में राहुल ने संविधान के बुनियादी आधारों न्याय और विचारों की स्वतंत्रता के अधिकार से जुड़ी चुनौतियों को भी रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि हमें डर, भय और धमकी से परे अपने विचारों को स्वतंत्र रूप से व्यक्त करने का अधिकार है। धर्म, संस्कृति और विचारों की हमारी विविधता हमारे गणतंत्र की ताकत है। इस अहम मौके पर हम सबको एकजुट होकर यह सुनिश्चित करना चाहिए कि न्याय के संवैधानिक अधिकार की रक्षा करते हुए गरीबों और उन लोगों के अधिकारों की रक्षा की जाए जिनकी आवाज ऊपर तक नहीं पहुंच पाती। देश में सामाजिक तनाव के वाकयों की ओर इशारा करते हुए राहुल ने कहा कि हमारी पृष्ठभूमि चाहे जैसी हो, सिर्फ यह बात मायने रखती है कि हम सब भारतीय हैं। इसीलिए आर्थिक हैसियत, जाति, धर्म या लिंग के आधार पर केवल कानून के हिसाब से ही सभी के साथ एक समान व्यवहार केवल शब्दों में ही नहीं बल्कि वास्तविक स्वरुप में हो यह हम सब को सुनिश्चित करना चाहिए।

संविधान बचाओ रैली से विपक्षी एकजुटता की आस
पूरा देश 26 जनवरी को जब अपना 69वां गणतंत्र दिवस मना रहा था, वहीं देश की आर्थिक राजधानी मुंबई में कई राजनीतिक दल एक मंच पर आकर संविधान बचाओ रैली के बहाने विपक्षी एकजुटता का संदेश दे रहे थे। 2014 के लोकसभा चुनाव में राजग का हिस्सा रहे और अब भाजपा से नाराज स्वाभिमानी शेतकरी संगठन के मुखिया एवं सांसद राजू शेट्टी ने केंद्रीय मंत्री अनंत कुमार हेगड़े के संविधान पर दिए विवादित बयान का उल्लेख करते हुए देश के सभी विरोधी दलों को एक मंच पर लाने की कोशिश की। रैली में एनसीपी अध्यक्ष शरद पवार के अलावा शरद यादव,  सीताराम येचुरी, नेशनल कांफ्रेंस के नेता उमर अब्दुल्ला, टीएमसी नेता दिनेश त्रिवेदी, कांग्रेस नेता संजय निरूपम और अशोक चह्वाण, गुजरात के पाटीदार नेता हार्दिक पटेल, कांग्रेस नेता अल्पेश ठाकोर, एनसीपी के प्रफुल्ल पटेल और डीपी त्रिपाठी, भाजपा के बगावती नेता नाना पटोले और सपा नेता अबु आजमी ने शिरकत की। रैली से इतर उमर अब्दुल्ला ने मीडिया से कहा कि हमारे पास जो कुछ भी है, संविधान की वजह से है। संविधान सुरक्षित नहीं रहेगा तो कुछ भी नहीं रहेगा। रैली के माध्यम से एनसीपी सुप्रीमो शरद पवार ने यह संकेत भी दिया कि 2019 के लोकसभा चुनाव में वे फिर से आघाड़ी के साथ युति में रहेंगे। शिवसेना के साथ गठबंधन को पवार ने सिरे से नकार दिया। उन्होंने यह भी कहा कि 2019 के चुनाव में कांग्रेस एनसीपी की टक्कर भाजपा-शिवसेना से होगी। पवार ने कहा कि जल्दी ही दिल्ली में सभी विपक्षी दलों की एक बैठक होगी जिसमें आगे की रणनीति तय की जाएगी।