Wednesday, 31 January 2018

संविधान की रक्षा कौन करेगा?

जब हम लोकतांत्रिक सिद्धांतों की बात करते हैं तो वह हमें बताती है कि लोकतंत्र में आम जनता ही केंद्र में होती है, लेकिन व्यवहार में लोकतंत्र एक सांविधानिक व्यवस्था को जन्म देता है जिसमें अधिकारों और कर्तव्यों का बंटवारा कार्यपालिका, न्यायपालिका और विधायिका में कर दिया जाता है। चूंकि इस व्यवस्था में आम नागरिक अधिकार संपन्न नहीं होते। जाहिर है, जन-सशक्तिकरण के सवाल पर जब लोकतंत्र नाकाम साबित होता है तो इसका ठीकरा संविधान पर फूटता है। आजादी के बाद से लगातार देश इसी व्यवस्था में जीने को अभिशप्त है।

एक वैश्विक रिपोर्ट के मुताबिक, जब देश में साल 2017 में कुल संपत्ति के सृजन का 73 प्रतिशत हिस्सा केवल एक प्रतिशत अमीर लोगों के हाथों में हो तो निश्चित रूप से लोकतांत्रिक ढांचा चरमराएगा और इसकी आंच से संविधान झुलसेगा। जब देश की शीर्ष अदालत के वरिष्ठ जज मीडिया के समक्ष न्यायपालिका की रक्षा की गुहार लगाएं तो यह सोचना बनता है कि देश का लोकतांत्रिक ढांचा कमजोर हो रहा है। इन जजों का कहना है कि आज देश का लोकतंत्र खतरे में है और कल कोई ये न कहे कि हमने अपनी आत्मा बेच दी है इसलिए हम मीडिया के सामने आए हैं। जजों ने कहा कि जब तक इस संस्था को बचाया नहीं जा सकता, लोकतंत्र को नहीं बचाया जा सकता। जाहिर है लोकतंत्र नहीं बचेगा तो संविधान के अस्तित्व में बने रहने की बात कैसे सोच सकते हैं। आखिर इसी लोकतंत्र की रक्षा के लिए तो संविधान की सत्ता को स्थापित किया गया है।

इससे भी एक कदम बढ़कर पहले पद्मावती और फिर पद्मावत फिल्म को लेकर देश में जिस तरह का हंगामा मचा उसने भी अपनी आंच से संविधान को झुलसाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हवाला देकर सुप्रीम कोर्ट ने फिल्म पद्मावत को रिलीज करने का आदेश दिया, लेकिन कई राज्यों की सरकारों ने शीर्ष अदालत के आदेश का पालन नहीं किया और करणी सेना के अलावा कई दक्षिणपंथी संगठनों के लोगों ने उत्पात मचाया। इस तरह की समाज व देशविरोधी गतिविधियां सीधे-सीधे संविधान को चुनौती देने जैसी है। क्योंकि सुप्रीम कोर्ट या देश की अन्य अदालतें जब कोई फैसला सुनाती हैं तो वह संविधान में उल्लिखित कानून के आधार पर होता है और अगर विधायिका ही इसको मानने में आनाकानी करने लगे तो फिर इस संविधान को बचाने के लिए देश के लोगों को आगे आना होगा, सरकारों को सोचना होगा, देश के तमाम विपक्षी दलों को इस बारे में रणनीति बनाकर जुटना होगा।

राहुल ने लगाई संवैधानिक मूल्यों की रक्षा की गुहार
कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर पहली बार देशवासियों के नाम खुली चिट्ठी में राहुल गांधी ने कहा कि हम सबके लिए यह याद रखना बेहद जरूरी है कि न्याय, समानता और भाईचारा हमारे संविधान की बुनियाद है। हमारे युवा देश के इतिहास में संविधान के इन अमूल्य धरोहरों की रक्षा करने की इससे ज्यादा जरूरत पहले कभी नहीं रही थी। देशवासियों के नाम अपने खुले पत्र में राहुल ने संविधान के बुनियादी आधारों न्याय और विचारों की स्वतंत्रता के अधिकार से जुड़ी चुनौतियों को भी रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि हमें डर, भय और धमकी से परे अपने विचारों को स्वतंत्र रूप से व्यक्त करने का अधिकार है। धर्म, संस्कृति और विचारों की हमारी विविधता हमारे गणतंत्र की ताकत है। इस अहम मौके पर हम सबको एकजुट होकर यह सुनिश्चित करना चाहिए कि न्याय के संवैधानिक अधिकार की रक्षा करते हुए गरीबों और उन लोगों के अधिकारों की रक्षा की जाए जिनकी आवाज ऊपर तक नहीं पहुंच पाती। देश में सामाजिक तनाव के वाकयों की ओर इशारा करते हुए राहुल ने कहा कि हमारी पृष्ठभूमि चाहे जैसी हो, सिर्फ यह बात मायने रखती है कि हम सब भारतीय हैं। इसीलिए आर्थिक हैसियत, जाति, धर्म या लिंग के आधार पर केवल कानून के हिसाब से ही सभी के साथ एक समान व्यवहार केवल शब्दों में ही नहीं बल्कि वास्तविक स्वरुप में हो यह हम सब को सुनिश्चित करना चाहिए।

संविधान बचाओ रैली से विपक्षी एकजुटता की आस
पूरा देश 26 जनवरी को जब अपना 69वां गणतंत्र दिवस मना रहा था, वहीं देश की आर्थिक राजधानी मुंबई में कई राजनीतिक दल एक मंच पर आकर संविधान बचाओ रैली के बहाने विपक्षी एकजुटता का संदेश दे रहे थे। 2014 के लोकसभा चुनाव में राजग का हिस्सा रहे और अब भाजपा से नाराज स्वाभिमानी शेतकरी संगठन के मुखिया एवं सांसद राजू शेट्टी ने केंद्रीय मंत्री अनंत कुमार हेगड़े के संविधान पर दिए विवादित बयान का उल्लेख करते हुए देश के सभी विरोधी दलों को एक मंच पर लाने की कोशिश की। रैली में एनसीपी अध्यक्ष शरद पवार के अलावा शरद यादव,  सीताराम येचुरी, नेशनल कांफ्रेंस के नेता उमर अब्दुल्ला, टीएमसी नेता दिनेश त्रिवेदी, कांग्रेस नेता संजय निरूपम और अशोक चह्वाण, गुजरात के पाटीदार नेता हार्दिक पटेल, कांग्रेस नेता अल्पेश ठाकोर, एनसीपी के प्रफुल्ल पटेल और डीपी त्रिपाठी, भाजपा के बगावती नेता नाना पटोले और सपा नेता अबु आजमी ने शिरकत की। रैली से इतर उमर अब्दुल्ला ने मीडिया से कहा कि हमारे पास जो कुछ भी है, संविधान की वजह से है। संविधान सुरक्षित नहीं रहेगा तो कुछ भी नहीं रहेगा। रैली के माध्यम से एनसीपी सुप्रीमो शरद पवार ने यह संकेत भी दिया कि 2019 के लोकसभा चुनाव में वे फिर से आघाड़ी के साथ युति में रहेंगे। शिवसेना के साथ गठबंधन को पवार ने सिरे से नकार दिया। उन्होंने यह भी कहा कि 2019 के चुनाव में कांग्रेस एनसीपी की टक्कर भाजपा-शिवसेना से होगी। पवार ने कहा कि जल्दी ही दिल्ली में सभी विपक्षी दलों की एक बैठक होगी जिसमें आगे की रणनीति तय की जाएगी।