Friday, 16 March 2018

योगी कभी हारता नहीं

गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है- 'योगः कर्मसु कौशलम' यानी जीव कर्म में अपनी संलग्नता के कारण परमात्म तत्व से विमुख न हों, इस कुशलता से कर्म करने वाला व्यक्ति योगी है। यानी जो मन को वश में कर के भौतिक इच्छाओं का त्याग कर देता है और विरागी हो जाता है वह योगी कहलाता है। कहने का मतलब यह कि योगी शब्द की अवधारणा को सार्थक करने वाला शख्स कर्मजीवी होता है, वह कभी हारता नहीं है। और ऐसा व्यक्ति अगर राजनीति में भी दखल रखता हो तो फिर क्या कहने। जी हां! हम यहां बात कर रहे हैं योगी आदित्यनाथ की। उस योगी आदित्यनाथ की जो गोरखपुर स्थित गोरक्षनाथ मठ के महंथ भी हैं और उत्तर प्रदेश के मुख्य सेवक भी। भारतीय राजनीति में इन दिनों अगर सबसे अधिक चर्चा किसी नेता की हो रही है तो उसमें योगी आदित्यनाथ का नाम सबसे ऊपर है। वह इसलिए कि गोरखपुर लोकसभा सीट पर 11 मार्च को हुए उपचुनाव में भाजपा को करारी हार का सामना करना पड़ा। कोई कह रहा है कि यह योगी की हार है, कोई कह रहा है यह भाजपा की हार है तो कोई कह रहा है कि यह मोदी-शाह की हार है। हार किसी की भी हो, वह होती हार ही है। लेकिन जब गोरखपुर की राजनीति के गुना-भाग में जाएंगे तो इस जीत-हार की असलियत खुलकर सामने आती है और उससे यह साफ हो जाता है कि योगी कभी हारता नहीं है। 

गोरक्षनाथ मठ की राजनीति सर्वोपरि
गोरखपुर की सियासत को करीब से जानने वाले इस बात को अच्छी तरह से जानते हैं कि यहां मठ की राजनीति सर्वोपरि है। दूसरे नंबर पर यहां की सियासत ब्राह्मण बनाम ठाकुर की चलती है। कई दशक पहले शुरू हुई इस तरह की सियासी जंग आज भी बरकरार है। ऐसा माना जाता है और यही सच भी है कि गोरखपुर में भाजपा की हार की आधी स्क्रिप्ट तो उसी तारीख में लिख दी गई थी जब वहां से उपेंद्र दत्त शुक्ला को उपचुनाव का प्रत्याशी बनाया गया था। वह इसलिए क्योंकि पहली बात कि उपेंद्र शुक्ला गोरक्षनाथ मठ से बाहर के प्रत्याशी थे, दूसरा योगी आदित्यनाथ की पसंद के नहीं थे और तीसरा उनपर ब्राह्मण का ठप्पा लगा था। उपेंद्र शुक्ला को लेकर भगवा राजनीति में कुछ ऐसे हालात पैदा हो गए थे कि अगर वह जीतते तो ये भाजपा, मोदी, शाह और योगी की जीत से ज्यादा गोरखपुर के मठ की हार होती। कहने का मतलब यह कि गोरखपुर में भाजपा की इस हार में कहीं न कहीं 'मठ' की अपनी जीत छिपी है।

बीते तीन दशक में पहली बार ऐसा हुआ जब गोरखपुर सीट पर भाजपा का उम्मीदवार गोरखनाथ मठ का कोई व्यक्ति नहीं था। दरअसल यह लोकसभा सीट योगी आदित्यनाथ के उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनने के बाद खाली हुई थी। उपेंद्र शुक्ला को भाजपा का टिकट दिए जाने को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के लिए एक राजनीतिक झटका माना जा रहा था। योगी के करीबी सूत्र बताते हैं कि योगी की पसंद के उम्मीदवार को पार्टी ने टिकट नहीं दिया। उनके मुताबिक उपेंद्र शुक्ला योगी के नहीं बल्कि केंद्रीय वित्त राज्यमंत्री शिव प्रताप शुक्ला की पसंद थे। गोरखपुर लोकसभा उपचुनाव के लिए योगी की पसंद उनकी गैरमौजूदगी में मठ के मुख्य पुजारी कमल नाथ थे। योगी की इच्छा थी कि लोकसभा सीट मंदिर के पास ही रहे। लेकिन स्थानीय स्तर पर कुछ नेता मठ से बाहर पार्टी के किसी सक्रिय कार्यकर्ता को देने की मांग उठा रहे थे। फिर योगी ने अपनी इच्छा को बदलते हुए धर्मेंद्र सिंह को टिकट देने की बात कही, लेकिन पार्टी आलाकमान ने योगी की इच्छा को सिरे से खारिज करते हुए शिवप्रताप शुक्ला के चहेते उपेंद्र शुक्ला को टिकट दिया गया। फिर क्या था, योगी ने मन ही मन उसी वक्त ठान लिया कि भाजपा की हार मंजूर लेकिन मठ की हार किसी सूरत में मंजूर नहीं हो सकती।  

यहीं बड़ा सवाल यह उठता है कि योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री रहते उनके अपने ही गढ़ में उनपर शिव प्रताप शुक्ला कैसे हावी हो गए? कोई और नहीं, भाजपा के लोगों का ही यह कहना है कि पार्टी के ही कुछ लोग उन्हें अपने ही गढ़ गोरखपुर में कमजोर करना चाहते हैं। पार्टी द्वारा पहले मेयर चुनाव और अब लोकसभा उपचुनाव में उनकी इच्छा के खिलाफ जाकर उम्मीदवार देने से इस बात को बल मिलता है। गोरखपुर में शिव प्रताप शुक्ला भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के काफी भरोसेमंद माने जाते हैं। यह बात वक्त-वक्त पर साबित भी होती रही है। अगर याद हो तो राजनाथ सिंह जब 2013 में दोबारा से भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने थे तो उनकी टीम में अमित शाह बतौर राष्ट्रीय महासचिव आए। उन्हें उत्तर प्रदेश का प्रभारी बनाया गया और शिव प्रताप शुक्ला तभी से अमित शाह का विश्वास जीतने के लिए काम करते रहे हैं। 2016 में जब भाजपा ने शुक्ला को राज्यसभा भेजा तो उस वक्त भी यही कहा गया था कि अमित शाह की वजह से ही उन्हें सांसदी मिली है।

ठाकुर बनाम ब्राह्मण की सियासी जंग
एक वक्त था जब गोरक्षनाथ मठ के महंथ दिग्विजय नाथ हुआ करते थे। उस वक्त गोरखपुर के ब्राह्मणों में पंडित सुरतिनारायण त्रिपाठी का काफी मान-सम्मान हुआ करता था। कहते हैं कि किसी वजह से दिग्जिवज नाथ ने सुरतिनारायण त्रिपाठी का अपमान किया था और वहीं से ठाकुर बनाम ब्राह्मण के बीच सियासी जंग शुरू हो गई। इसके बाद उस वक्त के युवा नेता हरिशंकर तिवारी ने दिग्विजय नाथ के खिलाफ आवाज उठाई। आगे चलकर ठाकुरों का नेतृत्व वीरेंद्र शाही के हाथ आया, लेकिन हरिशंकर तिवारी का 'हाता' और महंथ अवैद्यनाथ के 'मठ' के बीच गोरखपुर में वर्चस्व की लड़ाई चलती रही। 90 के दशक में योगी आदित्यनाथ के हाथ जब मठ की कमान आई तो योगी ने निरंतर 'मठ' की ताकत बढ़ाई। उनकी हिंदू युवा वाहिनी आसपास के कई जिलों में सक्रिय हुई। इसी बीच 1998 में माफिया डॉन श्रीप्रकाश शुक्‍ला का एनकाउंटर कर दिया गया जिसे ब्राह्मण क्षत्रप कहा जाता था।

गोरखपुर में ब्राह्मणों और ठाकुरों के वोट बराबर-बराबर हैं, लेकिन योगी आदित्यनाथ ने समाज सेवा के रास्ते अपनी ताकत लगातार बढ़ई और ब्राह्मण नेतृत्व कमजोर पड़ता गया। इसके साथ ही 'हाता' का असर भी कम होता गया। उस वक्त शिवप्रताप शुक्ला ब्राह्मणों के सर्वमान्य और ताकतवर नेता थे। लेकिन योगी की बढ़ती ताकत के साथ ही उनका राजनीतिक पतन होता चला गया। हालत ये हो गई कि कुछ वर्षों के लिए शिवप्रताप शुक्ला राजनीतिक पटल से भी ओझल हो गए। इस बीच राज्य से लेकर केंद्र तक योगी आदित्यनाथ का राजनीतिक कद लगातार बढ़ता गया। भाजपा में मोदी-शाह युग से पहले आलम ये था कि पूर्वांचल में योगी आदित्यनाथ जिसे चाहते उसे ही टिकट मिलता, जिसे नहीं चाहते वह टिकट पाकर भी हार जाता। मजबूरन भाजपा को उनके आगे घुटने टेकने पड़ते। उनकी हर बात केंद्रीय नेतृत्व को माननी पड़ती। गोरखपुर उपचुनाव में भाजपा की हार से तो यही लग रहा कि हालात आज भी बदले नहीं हैं।

साल 2017 में हुए विधानसभा चुनाव में भाजपा की शानदार जीत के बाद मुख्यमंत्री के लिए कई नाम सामने आए थे। मनोज सिन्हा का नाम तो फाइनल भी हो गया था लेकिन ऐन वक्त पर आरएसएस के समर्थन से योगी आदित्यनाथ मुख्यमंत्री बनने में सफल रहे। उनके मुख्यमंत्री बनते ही उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा नाराजगी ब्राह्मणों में थी। यह बात जब केंद्रीय नेतृत्व तक पहुंची तो मोदी और शाह ने डैमेज कंट्रोल के लिए महेंद्र नाथ पांडेय को प्रदेश भाजपा का अध्यक्ष बनाया। बात नहीं बनी तो योगी की सीट पर टिकट देने के लिए किसी ब्राह्मण चेहरे की तलाश थी ताकि यहां भी संतुलन बनाया जा सके। उसके तहत भाजपा संगठन और आरएसएस की सहमति से गोरखपुर उपचुनाव के लिए उपेंद्र दत्त शुक्ला मोदी और अमित शाह की पहली पसंद बने। लेकिन योगी आदित्यनाथ को यह नाम पसंद नहीं था। उसकी असली वजह यह थी कि योगी के सामने अपनी सीट बचाने से ज्यादा अहम था गोरखपुर में अपने 'मठ' की ताकत को बचाना।

बहरहाल, मोदी-शाह नीत भाजपा को यह समझना होगा कि पूर्वांचल में भाजपा का मतलब योगी होता है और योगी का मतलब है उनका अपना संगठन। अटल-आडवाणी युग में भी योगी ने 'मठ' की सर्वोच्चता से कभी समझौता नहीं किया और कभी किसी के सामने झुकना मंजूर नहीं किया। यही वजह रही कि योगी आदित्यनाथ को केंद्र या राज्य में कभी किसी मंत्री पद से नहीं नवाजा गया। ऐसे में उनके अहाते किसी भी उम्मीदवार के लिए उनकी मर्जी के बिना जीत हासिल करना नामुमकिन है। मठ की ताकत और ठाकुर बनाम ब्राह्मण की यह सियासी जंग 2019 के लोकसभा चुनाव में क्या गुल खिलाएगी इसका सबको इंतजार रहेगा।