Friday, 29 November 2019

शिवसेना की 'धर्मनिरपेक्षता' पर हंगामा क्यों?

महाराष्ट्र में 'महा विकास अघाड़ी' की सरकार बन चुकी है। शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे मुख्यमंत्री पद की शपथ ले चुके हैं वो भी घोर सेक्यूलर यानी धर्मनिरपेक्ष दलों कांग्रेस और एनसीपी के साथ। सूबे के राजनीतिक इतिहास को पलटकर देखें तो पहली बार शिवसेना हिन्दुत्व की डोर तोड़कर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी संग सेक्यूलर यानी धर्मनिरपेक्षता की डोर से बंध गई है। शपथ ग्रहण समारोह से पहले जैसे ही महा विकास अघाड़ी का चार पन्नों का न्यूनतम साझा कार्यक्रम (कॉमन मिनिमम प्रोग्राम) सामने आया और उसकी प्रस्तावना में जब इस बात का उल्लेख पाया गया कि गठबंधन 'संविधान में वर्णित धर्मनिरपेक्ष मूल्यों को लेकर प्रतिबद्ध है' तो सियासी गलियारों में खलबली मच गई। देखते ही देखते खबरिया चैनलों में इस बात को लेकर बहस छिड़ गई कि आखिर शिवसेना की ऐसी क्या मजबूरी रही कि उसे हिन्दुत्व से किनारा करना पड़ा? बाला साहेब ठाकरे की शिवसेना जिसकी पहचान भगवा और हिन्दुत्व से थी, ऐसा क्या हो गया कि उसे सेक्यूलरिज्म यानी धर्मनिरपेक्षता की राह पकड़नी पड़ी। हम इसे समझने की कोशिश करेंगे, लेकिन अगर आप मशहूर शायर बशीर बद्र के इस शेर की कुछ पंक्तियों पर गौर फरमाएं तो शायद बहुत कुछ समझ में आ जाएगा...  

मुसाफ़िर के रस्ते बदलते रहे,
मुक़द्दर में चलना था चलते रहे।
वो क्या था जिसे हमने ठुकरा दिया,
मगर उम्र भर हाथ मलते रहे।
मुहब्बत अदावत वफ़ा बेरुख़ी,
किराये के घर थे बदलते रहे।

बात हिन्दुत्व की हो या सेक्यूलरिज्म की, जब ये सब किराये के घर हैं तो क्या भाजपा, क्या कांग्रेस और क्या एनसीपी, जब जहां से सत्ता मिल जाए वहीं अपना घर बना लो। कोई मतलब नहीं इस हंगामे का। राजनीति में सब कुछ जायज होता है। कुछ भी निश्चित नहीं होता। शिवसेना इसका अपवाद नहीं। शिवसेना के राजनीतिक सफर पर गौर करें तो कई ऐसे वाक्ये सामने आए जब पार्टी ने अपनी सियासी जमीन को मजबूत आधार प्रदान करने के लिए विचारधारा को ताख पर रखा। दरअसल, बाला साहेब ठाकरे ने महाराष्ट्र के स्थानीय लोगों यानी मराठी मानुष या कहिए मराठी अस्मिता की रक्षा के लिए 19 जून 1966 को शिवसेना की नींव रखी थी। ठाकरे मूल रूप से कार्टूनिस्ट थे और राजनीतिक विषयों पर तीखे कटाक्ष करते थे। अगर आपको याद हो तो शिवसेना के गठन के समय बाला साहेब ठाकरे ने नारा दिया था, 'अंशी टके समाजकरण, वीस टके राजकरण' (80 प्रतिशत समाज और 20 फीसदी राजनीति)। लेकिन भूमिपुत्र, मराठी मानुष या मराठी अस्मिता का मुद्दा लंबे समय तक चल नहीं सका। फिर शिवसेना ने हिन्दुत्व के मुद्दे को अपना लिया जिसके सहारे वह आगे बढ़ती रही। सिर्फ महाराष्ट्र की बात करें तो शिवसेना ने पहली बार महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव 1990 में लड़ा जिसमें उसके 52 विधायकों ने जीत हासिल की। भाजपा के साथ 1989 में गठबंधन किया जो 2014 तक चला। 2014 का विधानसभा चुनाव दोनों दलों ने एक दूसरे से अलग होकर लड़ा। उसके बाद दोनों पार्टियों ने मिलकर प्रदेश में सरकार जरूर बनाई, लेकिन मुद्दों पर टकराव की बुनियाद भी इसी दौर में फली-फुली। 2018 के अंत में उद्धव ठाकरे ने अयोध्या में रामलला के दर्शन कर राम जन्मभूमि मुद्दे को हवा दी थी। 2019 के विधानसभा चुनाव में भाजपा के साथ मिलकर शिवसेना ने चुनाव जरूर लड़ा और इन्हीं दोनों दलों को जनादेश भी मिला लेकिन 'मुख्यमंत्री हमारा होगा' को लेकर दोनों दलों ने हिन्दुत्व की डोर तोड़ दी। शिवसेना ने मराठा राजनीति के भीष्म पितामह शरद पवार की उस एनसीपी से हाथ मिला लिया जिसने कांग्रेस के साथ मिलकर चुनाव लड़ा था। और अंतत: महा अघाड़ी विकास (शिवसेना-एनसीपी-कांग्रेस) की सरकार बन गई। जिद्द पूरी करते हुए शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे मुख्यमंत्री बन गए। अब जो लोग हिन्दूवादी शिवसेना की धर्मनिरपेक्षता पर सवाल उठा रहे हैं उन्हें अपना राजनीतिक ज्ञान बढ़ाना चाहए और जानना चाहिए कि शिवसेना ने इस तरह के कदम कोई पहली बार नहीं उठाए हैं।

53 साल के राजनीतिक सफर में कई ऐसे मौक आए जब शिवसेना और कांग्रेस ने एक-दूसरे को सहयोग किया। साल 1967 को याद करें जब पार्टी की स्थापना के एक साल ही हुए थे, शिवसेना की पहली चुनावी रैली में कांग्रेस नेता रामाराव अदित पहुंचे थे। 'बाल ठाकरे एंड द राइज ऑफ शिवसेना' में भी इस बात का उल्लेख है। रामाराव अदिक और बाला साहेब ठाकरे पुराने दोस्त थे। किताब के मुताबिक, ठाकरे ने उस वक्त कांग्रेस-शिवसेना गठबंधन पर कहा भी था कि हम कम्युनिस्टों को हराने के लिए साथ आ रहे हैं। इतना ही नहीं, 1966 में बाल ठाकरे ने जब शिवसेना नाम की पार्टी बनाई थी तो ऐसा कहा जाता है कि उनको महाराष्ट्र के तत्कालीन मुख्यमंत्री वसंतराव नाईक का समर्थन हासिल था, जिस वजह से शिवसेना को वसंत सेना भी कहा जाता था। 1971 में शिवसेना ने अपना पहला चुनाव के. कामराज की कांग्रेस सिंडिकेट के साथ मिलकर लड़ा था। ये अलग बात थी कि बाद में इंदिरा वाली कांग्रेस का गुट ही असली कांग्रेस के रूप में अस्तित्व में आया। जब आपातकाल का दौर आया तो बाल ठाकरे ही इकलौते विरोधी नेता थे जिन्होंने इंदिरा द्वारा लगाए गए आपातकाल का खुलकर समर्थन किया था। ठाकरे तो यहां तक कहते सुने गए थे कि मैं लोकशाही नहीं, बल्कि ठोकशाही पर विश्वास करता हूं। थॉमस हेनसेन की लिखी किताब 'वेजेस ऑफ वायलेंस : नेमिंग एंड आइडेंटिटी इन पोस्टकोलोनियल बॉम्बे' के मुताबिक, ठाकरे ने आपातकाल का समर्थन करते हुए कहा था कि इंदिरा गांधी ने देश में आपातकाल इसलिए लगाया, क्योंकि देश में फैली अस्थिरता से निपटने का यही एकमात्र उपाय है। 1977 में बाला साहेब ने बीएमसी चुनाव में कांग्रेस उम्मीदवार मुरली देवड़ा का समर्थन किया था। उसी साल हुए आम चुनाव में शिवसैनिकों ने कांग्रेस का प्रचार भी किया था। 1980 में इंदिरा गांधी ने प्रधानमंत्री बनते ही महाराष्ट्र की सरकार को बर्खास्त कर दिया और यहां दोबारा चुनाव कराए। इन चुनावों में कांग्रेस ने अब्दुल रहमान अंतुले को मुख्यमंत्री उम्मीदवार बनाया था। अंतुले और ठाकरे अच्छे दोस्त थे। इसलिए ठाकरे ने चुनाव में अपने उम्मीदवार नहीं उतारे और कांग्रेस का समर्थन किया। शिवसेना और कांग्रेस की दोस्ती राष्ट्रपति चुनाव में भी साथ दिख चुकी है। 2007 में शिवसेना ने एनडीए समर्थित भैरो सिंह शेखावत की जगह यूपीए की उम्मीदवार प्रतिभा पाटिल का समर्थन किया था। इसी तरह से 2012 के राष्ट्रपति चुनाव में शिवसेना ने यूपीए के प्रणब मुखर्जी का समर्थन किया था। राष्ट्रपति चुनाव जीतने के बाद प्रणब मुखर्जी बाल ठाकरे से मिलने उनके घर मातोश्री भी गए थे।

इतना ही नहीं, वो शिवसेना जो अपनी कट्टर विचारधारा और मुसलमानों के खिलाफ भड़काऊ बयान देने के लिए जानी जाती है, इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग के साथ गठबंधन कर एक जमाने में राजनीति के बड़े सूरमाओं को हैरत में डाल दिया था। पत्रकार प्रकाश अकोलकर ने शिवसेना पर लिखी अपनी किताब 'जय महाराष्ट्र' में लिखा है कि 1970 के दशक में मुंबई मेयर का चुनाव जीतने के लिए शिवसेना ने मुस्लिम लीग के साथ भी तालमेल किया था। हिंदू हृदय सम्राट के रूप में प्रसिद्धि पा चुके बाला साहेब ठाकरे ने मुस्लिम नेता गुलाम मोहम्मद बनातवाला के साथ स्टेज भी साझा किया था। उस वक्त की राजनीतिक कहानी पर भरोसा करें तो मुस्लिम लीग नेता गुलाम मोहम्मद बनातवाला को शिवसेना खासकर बाल ठाकरे का प्रबल आलोचक माना जाता था। लेकिन शिवसेना ने अपना मेयर बनाने के लिए मुस्लिम लीग से गठबंधन कर मदद ली थी। तब शिवसेना और मुसलमानों के साथ आने को एक बड़े मास्टर स्ट्रोक की तरह देखा गया था। कहने का तात्पर्य यह कि सत्ता के लिए जो पार्टी मुस्लिम लीग को अपना सकती है तो फिर कांग्रेस और एनसीपी से हाथ मिलाने पर सवाल उठाने का कोई मतलब नहीं रह जाता है।

बहरहाल, शिवसेना ने धर्मनिरपेक्ष दलों से गठबंधन कर सरकार जरूर बनाई है, लेकिन इस बात का उल्लेख पार्टी ने कहीं नहीं किया है कि हम हिन्दुवादी नहीं हैं। हर हिन्दू जन्म से हिन्दूवादी होता है। भाजपा की थिंकटैंक आरएसएस भी कहती है कि हिन्दुस्तान में रहने वाला हर इंसान हिन्दू है। ऐसे में यह मानना कि भाजपा से अलग होने पर पार्टी के अंदर जो हिन्दुत्व की अवधारणा है वह खत्म हो जाती है, ठीक तो नहीं ठहराया जा सकता है। शिवसेना ही क्यों, कांग्रेस, समेत कोई भी गैर भाजपाई दल यह नहीं कह सकता कि वह हिन्दुत्व में भरोसा नहीं रखती। हिन्दुत्व कोई राजनीतिक विचारधारा तो है नहीं। जब हिन्दुत्व एक दर्शन है, जीवन जीने का तरीका है तो फिर इसपर बहस की कोई गुंजाइश बचती नहीं है। रही बात धर्म निरपेक्ष या पंथ निरपेक्ष होने की तो इसका जिक्र भारतीय संविधान की प्रस्तावना में है और पूरा देश धर्मनिरपेक्षता की डोर से बंधा है। क्या भाजपा यह दावा कर सकती है कि वह धर्मनिरपेक्ष पार्टी नहीं है। तो फिर शिवसेना की धर्मनिरपेक्षता पर सवाल कैसे खड़ा किया जा सकता है।

Wednesday, 6 November 2019

आरसीईपी पर भारत का फैसला राष्ट्रीय हित में

रीजनल कॉम्प्रहेंसिव इकनॉमिक पार्टनरशिप (आरसीईपी) के प्रस्तावित समझौते से भारत को बाहर रखने का मोदी सरकार का फैसला राष्ट्र के हित में है वो भी तब जब सरकार ने 2022 तक किसानों की आमदनी दोगुनी करने का लक्ष्य तय कर रखा हो। और ये सब तभी संभव है जब बागवानी, डेयरी फार्मिंग, दुग्ध प्रसंस्करण, कृषि वानिकी, मधुमक्खी पालन, मत्स्य पालन से किसानों की आय में वृद्धि करने की तरकीब पर अमल किया जाएगा। इस सबके बीच अगर हम 'आरसीईपी समझौता' के चक्र में फंस जाते तो देश के ऊपर मुश्किलों का पहाड़ टूट जाता। इस लिहाज से भारत सरकार का यह फैसला काफी अहम है। एशिया के 16 प्रमुख देशों के साथ दुनिया के सबसे बड़े व्यापारिक समझौते के बारे में पीएम मोदी ने कहा भी कि आरसीईपी करार का मौजूदा स्वरूप पूरी तरह इसकी मूल भावना और इसके मार्गदर्शी सिद्धान्तों को परिलक्षित नहीं करता है। इसमें भारत द्वारा उठाए गए मुद्दों और चिंताओं का संतोषजनक समाधान नहीं किया गया है। ऐसे में भारत के लिए आरसीईपी समझौते में शामिल होना संभव नहीं है। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी इसको लेकर मोदी सरकार पर काफी आक्रामक रूख पहले ही दिखा चुकी थी। उन्होंने कहा था कि सरकार इसके जरिए पहले ही बुरी स्थिति का सामना कर रही भारतीय अर्थव्यवस्था को बड़ा नुकसान पहुंचाने की तैयारी में है। अगर सरकार इस समझौते पर दस्तखत करती है तो इसका हमारे किसानों, दुकानदारों, छोटे और मझोले इकाइयों पर गंभीर दुष्परिणाम होंगे।

दरअसल, भारत ने इस समझौते से पहले कई मुद्दे और चिंताएं सामने रखी थीं पर उसका ठोस समाधान नहीं निकला। भारत की पहली और सबसे बड़ी चिंता तो यही थी कि चीन समेत इन देशों के साथ पहले से ही बड़ा व्यापार घाटा है। इस समझौते के बाद आयात और ज्यादा बढ़ने की स्थिति में भारतीय उद्योगों और किसानों के हित प्रभावित हो सकते थे। मालूम हो कि आरसीईपी में आसियान के 10 सदस्य देशों के अलावा चीन, जापान, दक्षिण कोरिया, ऑस्ट्रेलिया, भारत और न्यू जीलैंड शामिल हैं। इन देशों में दुनिया की आधी आबादी रहती है और ग्लोबल जीडीपी की बात करें तो इसमें इनका 30 प्रतिशत का योगदान है। आरसीईपी (रीजनल कॉम्प्रिहेंसिव इकनॉमिक पार्टनरशिप) की बात करें तो यह दुनिया का सबसे बड़ा मुक्त व्यापार ब्लॉक स्थापित करने की एक कोशिश है जिसमें 16 देश शामिल हैं। भारत, चीन, जापान, दक्षिण कोरिया और आसियान देशों के अलावा ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड 2012 से इस मसले पर लगातार बातचीत करते आ रहे हैं। इसके तहत मुख्य बिंदुओं में 90 प्रतिशत सामानों पर आयात शुल्क घटाया जाना या खत्म किया जाना है। चीन के मामले में भारत 80 प्रतिशत सामान पर आयात शुल्क शून्य करने के पक्ष में था। इसके अलावा सर्विस, ट्रेड, निवेश बढ़ाना और वीजा नियमों को आसान बनाने के संबंध में भी भारत ने अपने विचार रखे थे। लेकिन ऐसा क्या हुआ कि भारत को इस समझौते से पीछे हटना पड़ा?

असल में भारत का चीन समेत इन तमाम देशों से आयात पहले ही काफी ज्यादा है और निर्यात काफी कम है। इस समझौते पर हस्ताक्षर करने के बाद इस बात की आशंका प्रबल हो जाती कि चीन से आयात काफी बढ़ जाएगा और इससे भारत के हितों की रक्षा करना संभव नहीं रह जाएगा। अगर आप आंकड़ों पर गौर करें तो सिर्फ 2019 में भारत का आरसीईपी देशों के साथ व्यापार घाटा 105 अरब डॉलर का है। इसमें 54 अरब डॉलर का घाटा सिर्फ चीन के साथ है। दूसरी तरफ इस समझौते का भारत में राजनीतिक विरोध भी काफी हो रहा था। डेयरी उद्योग से जुड़े किसान इस व्यापार समझौते का अत्यधिक विरोध कर रहे थे। भाजपा और आरएसएस से जुड़ी संस्था स्वदेशी जागरण मंच भी इसके खिलाफ लगातार आवाजें उठा रही थी। निश्चित रूप से समझौते में भारत के शामिल होने से चीन से मैन्युफैक्चर्ड गुड्स और न्यूजीलैंड से डेयरी प्रॉडक्ट्स की भारत में डंपिंग होगी, जिससे घरेलू उत्पाद व उत्पादकों को सीधे तौर पर नुकसान पहुंचेगा। अगर यह समझौता होता तो मोदी सरकार की महत्वाकांक्षी ‘मेक इन इंडिया’ अभियान को भी गहरा धक्का लगता।

इसके अलावा नॉन-टैरिफ बैरियर्स की बात करें तो इसको लेकर भी समझौते में कोई विश्वसनीय प्रतिबद्धता नहीं है। भारत ने आयात शुल्क बढ़ने की स्थिति में सुरक्षा की गारंटी मांगी थी जिसपर ध्यान नहीं दिया गया। बाजार की पहुंच को लेकर कोई मजबूत भरोसा नहीं मिलना भी भारत के इस समझौते में शामिल नहीं होना बड़ी वजह है। इस समझौते में सेवाओं को लेकर भी पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया जबकि भारत ने इसपर काफी जोर दिया था। इन तमाम तथ्यों पर गौर करने के बाद ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बैंकॉक में आरसीईपी सम्मेलन में अपने वक्तव्य में साफ तौर पर कह दिया, ‘चूंकि इस समझौते में भारत की चिंताओं और उसकी तरफ से उठाए गए मुद्दों का संतोषजनक समाधान पेश नहीं किया गया है। लिहाजा भारत का आरसीईपी में शामिल होना संभव नहीं है।’

क्या है आरसीईपी और भारत इसमें शामिल होता तो क्या होता?
आरसीईपी एक व्यापारिक समझौता (ट्रेड एग्रीमेंट) है जो सदस्य देशों को एक दूसरे के साथ व्यापार में सहूलियत प्रदान करता है। समझौते के तहत सदस्य देशों को आयात और निर्यात पर लगने वाला टैक्स नहीं भरना पड़ता है या बहुत कम भरना पड़ता है। इस एग्रीमेंट पर आसियान के 10 देशों के साथ-साथ छह अन्य देश, जिसमें भारत भी शामिल है, दस्तखत करेंगे। यह एग्रीमेंट अगर अमल में आया तो यह दुनिया के 3.4 अरब लोगों के बीच एक व्यापारिक समझौता होगा जो विश्व का सबसे बड़ा फ्री ट्रेड पैक्ट होगा। भारत का व्यापार घाटा आरसीईपी के ज्यादातर सदस्य देशों के साथ है और समझौते के बाद भारत पर बहुत ज्यादा बोझ बढ़ जाएगा। किसी देश के साथ व्यापार घाटे का मतलब यह है कि हम उस देश से आयात ज्यादा करते हैं और निर्यात कम। ऐसे में यदि आयात टैक्स घटता है तो यह व्यापार घाटा और बढ़ सकता है।

भारतीय उद्योग जगत ने भी आरसीईपी समूह में चीन की मौजूदगी को लेकर चिंता जताई थी। डेयरी, धातु, इलेक्ट्रॉनिक्स और रसायन समेत विभिन्न सेक्टर्स ने सरकार से इन क्षेत्रों में शुल्क कटौती नहीं करने का आग्रह किया था। उद्योग जगत को इस बात की आशंका है कि आयात शुल्क कम या खत्म होने की स्थिति में विदेशों से अधिक मात्रा में माल भारत आएगा और स्थानीय उद्योगों पर इसका बुरा असर होगा। अमूल ने भी डेयरी उद्योग को लेकर चिंता जाहिर की थी। योजना के मुताबिक, भारत प्रस्तावित समझौते के तहत चीन से आने वाले करीब 80 प्रतिशत उत्पादों पर शुल्क घटा या पूरी तरह से हटा सकता है। भारत इसी प्रकार ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड से आयातित 86 प्रतिशत उत्पादों और आसियान, जापान और दक्षिण कोरिया से आयात होने वाले 90 प्रतिशत उत्पादों पर सीमा शुल्क में कटौती कर सकता है। आयात होने वाले सामानों पर शुल्क कटौती को 5, 10, 15, 20 और 25 साल की अवधि में अमल में लाया जाना है। भारत का 2018-19 में आरसीईपी के सदस्य देशों में से चीन, दक्षिण कोरिया और आस्ट्रेलिया सहित 11 देशों के साथ व्यापार में घाटा रहा है।