Wednesday, 22 July 2020

नई वैश्विक व्यवस्था : खतरनाक साजिश है एजेंडा-21

कुछ साल पहले एक फिल्म आने वाली थी जिसका नाम था ए ग्रे स्टेट (A Grey State)। इस फिल्म के माध्यम से आज कोरोना महामारी की आड़ में जो कुछ भी हो रहा है वह फिल्मकार ने बताने की कोशिश की थी, लेकिन दुर्भाग्य से फिल्म के रिलीज होने से पहले ही फिल्म के निर्माता-निर्देशक डेविड क्रौली की हत्या हो गई। ऐसा माना जा रहा है की डीप स्टेट ने उसकी हत्या करवा दी थी। उनकी पत्नी और बच्ची को भी मार दिया गया क्योंकि डेविड क्रौली इस फिल्म के माध्यम से बताना चाहते थे कि किस तरह से सभ्रांत वर्ग यानी एलीट क्लास दुनिया को अपनी मुट्ठी में रख रहे हैं। इतना ही नहीं, जो आज के हालात बन रहे हैं ये डेविड क्रौली ने उस वक्त ही बता दिए थे कि किस तरह से लोगों को नियंत्रण में रखने के लिए टीकाकरण या वैक्सीन का सहारा लिया जाएगा, आरएफआईडी (RFID) चिप्स तक लगाईं जाएंगी, जिसे 'मार्क ऑफ द बीस्ट' भी बोला जा रहा है। हो सकता है इसी वजह से डीप स्टेट को यह अच्छा नहीं लगा होगा और उन्होंने फिल्म के रिलीज होने से पहले ही क्रौली कि हत्या करवा दी। इस फिल्म से ताल्लुक रखने वाली ज्यादातर जानकारी इंटरनेट से सेंसर कर दी गई। बात यहीं से शुरू होती है नई वैश्विक व्यवस्था यानी न्यू वर्ल्ड आर्डर की और यही है एजेंडा- 21 जिसकी समय सीमा 2020 से 2030 तक है। हम सबको खासतौर पर हम भारत के लोगों को इस बात को लेकर सतर्कता बरतनी चाहिए कि कुछ कुलीन, सभ्रांत या एलीट लोग हैं जो पूरी दुनिया को नियंत्रण में रखते हैं। हम सबको भले ही ऐसा लगता हो कि सरकारों के हाथ में ताकत होती है, लेकिन हकीकत यह है कि असली ताकत और नियंत्रण तो कुछ सीक्रेट सोसाइटी या कुलीन लोगों के हाथों में ही होती है और उनके ही निर्णय पूरी दुनिया को मानने होते हैं। अभी जो ये कोरोना वायरस की खबरें लगातार आ रही हैं उसको देखते हुए ऐसा लगने लगा है कि न्यू वर्ल्ड आर्डर यानी नई वैश्विक व्यवस्था का असली रूप जल्द ही हम सबके सामने होगा। 

दरअसल, अभी जो दुनियावी ताकतें काम कर रही हैं वह अलग-अलग जगहों पर विभाजित हैं, लेकिन जब नई वैश्विक व्यवस्था पूरी तरह से अपने प्रभाव में आ जाएगी तो ये शक्तियां पूरी तरह से एक ही संगठन के हाथों में चली जाएंगी जो टॉप लेवल से सभी चीजों को नियंत्रित करेगी। यही वह संगठन है जो एलीट क्लास यानी कुलीन वर्ग का होगा। मसलन क्राउन कॉरपोरेशन, बड़े बैंक संगठन जैसे कि रॉकफेलर या रॉथचाइल्ड इत्यादि या इलुमिनाटी समाज जो 300 लोगों की सुपरपावर कमेटी है, इनके हाथों में भी ये ताकत हो सकती हैं और इन्ही की 'हां या ना' से दुनिया के सारे फैसले किए जाएंगे। नई वैश्विक व्यवस्था को वास्तविक रूप से शैतानों की सभ्यता भी कहा जा रहा है। इसका मतलब यह नहीं है कि टॉप लेवल पर कोई शैतान बैठा हुआ है, लेकिन ये जो एलीट क्लास होता है ये किसी शैतान से कम भी नहीं होता है। इनके इरादे कभी नेक नहीं होते हैं। ये पूरी दुनिया पर अपना नियंत्रण चाहते हैं और हमें गुलाम बनाकर रखना चाहते हैं। इसीलिए न्यू वर्ल्ड ऑर्डर यानी नई वैश्विक व्यवस्था की स्थापना की जा रही है। इस नई वैश्विक व्यवस्था के साथ-साथ एक एजेंडा 2030 को भी स्थापित करने पर काम बहुत तेजी से चल रहा है जिसे एजेंडा-21 भी बोला जा रहा है। यह तो बहुत ही ज़्यादा खतरनाक है। 

हम भारत के अधिकांश लोग जिन्हें इस बारे में अंदाजा नहीं है उनको जानना चाहिए कि एजेंडा-21 जिसे 2030 तक पूरी तरह से लागू करने की योजना है उसके तहत होगी- एक ग्लोबल सरकार, एक ग्लोबल मुद्रा, एक ग्लोबल सेंट्रल बैंक जिसमें एक ग्लोबल कैशलेस सिस्टम होगा, एक ग्लोबल सेना होगी, पूरी शिक्षा व्यवस्था ऑनलाइन होगी। मतलब यह कि सारी चीजें एक ही ग्रुप के हाथों में होगी और वही ऊपर से सब-कुछ नियंत्रित करेगा। इसके साथ-साथ टीकाकरण यानी वैक्सीनेशन अनिवार्य कर दी जाएगी जिसका मतलब यह है कि आपको वैक्सीन लगवानी ही होगी। अगर आप वैक्सीन नहीं लगवाते हैं तो ये आपको कोई काम नहीं करने देंगे या फिर आपके काम में इतना रोड़ा अटका दिया जाएगा कि आपके लिए वैक्सीन लेना मजबूरी हो जाएगी। यहां यह भी जानना जरूरी है कि ये वैक्सीन बहुत ही ज्यादा घातक है और किसी भी सूरत में इंसानी ताकत के लिए ठीक नहीं है। जो विकसित देश हैं, वहां कोरोना वैक्सीन का खूब विरोध किया जा रहा है। लेकिन हमारे देश में ऐसा कुछ नहीं हो रहा और कुछ होने भी नहीं जा रहा है। जिस बिल एंड मिलिंडा गेट्स फाउंडेशन और माइक्रोसॉफ्ट कंपनी के स्वामी बिल गेट्स को पश्चिमी देशों में कोरोना और वैक्सीनेशन को लेकर पूरी तरह से एक्सपोज किया जा रहा है, उनके खिलाफ दर्जनों मुकदमें दर्ज किए गए हैं, हमारे देश में उस शख्स की पूजा की जा रही है। देश की मुख्यधारा की मीडिया में भी इस तरह की कोई खबर सामने नहीं आ रही है क्योंकि मुख्यधारा की मीडिया भी कहीं न कहीं बिल गेट्स जैसे एलीट क्लास के लोगों के नियंत्रण में है और उनका एकमात्र काम सिर्फ झूठ बोलना, प्रोपगेंडा फैलाना है। भारत में अगर कोई पत्रकार या मीडिया इस तरह की बात करता है तो उसे मानसिक रूप से दिवालिया करार दे दिया जाता है।

दरअसल, एजेंडा-21 के तहत आपको वैक्सीन लगाया जाएगा और उसके जरिये और ज्यादा बीमारियां आपकी बॉडी में इंजेक्ट कर दी जाएंगी। कहा तो ये भी जा रहा है कि इसी वैक्सीन के जरिये आपकी बॉडी में एक माइक्रो-चिप्स भी आने वाले वक्त में लगाई जा सकती हैं। इसी आरएफआईडी चिप्स के बारे में मैंने शुरू में जिक्र किया है। अगर आप गूगल सर्च करेंगे तो आपको पता चलेगा कि इसकी शुरुआत स्वीडन में हो चुकी है। इस चिप के जरिये हर व्यक्ति का पूरा ट्रैक रिकॉर्ड रखा जाएगा ताकि उसे जरूरत के हिसाब से नियंत्रित किया जा सके। जिस चिप की आज तक आपको जरूरत नहीं थी उसको अब आपके शरीर में डाला जाएगा और आप खुशी-खुशी इसे स्वीकार भी करेंगे। एजेंडा-21 के तहत ही 5G के टॉवर भी लगाने का काम शुरू हो चुका है। 5G के बारे में यह बात जानना जरूरी है कि टॉवर में इतनी घातक फ्रीक्वेंसी की किरणें निकलेंगी जिससे कैंसर जैसी बीमारी होने का खतरा बहुत बढ़ जाएगा। 5G की फ्रीक्वेंसी दुनिया की समृद्ध सेना और बड़ी-बड़ी स्टॉक एक्सचेंज में अपनी जानकारी इकट्ठा करने के लिए इस्तेमाल करती रही हैं। अब उसे अगर आम लोगों की सोसाइटी में लाया जाएगा तो बड़े स्तर पर दुनियावी सेहत को नुकसान होगा। यह बात सच है कि इससे इंटरनेट की स्पीड कई गुना बढ़ जाएगी, लेकिन यह भी सच है कि आपके हाथों में जो आरएफआईडी माइक्रो-चिप डाली जाएगी वह भी 5G से ही कंट्रोल होगा। दुनिया के कई देशों में इसका जबरदस्त विरोध किया जा रहा है, लेकिन हमारे देश में अभी तक इस बारे में लोगों को एक तो ज्यादा जानकारी नहीं है और दूसरा इस तरह की मानसिकता दिल और दिमाग में बैठ गई है कि देखा जाएगा, झेल लिया जाएगा। 

अब आते हैं एजेंडा-21 की सबसे भयानक साजिश पर। जो भी लोग नई वैश्विक व्यवस्था और एजेंडा-21 के पीछे काम कर रहे हैं उनका मकसद 2030 तक दुनिया की 75 से 80 फीसदी जनसंख्या को मिटा देना है यानी खत्म कर देना है। यह कोई काल्पनिक बात नहीं है। यह जॉर्जिया के गाइड स्टोन पर बड़े-बड़े अक्षरों में और कई भाषाओं में साफ-साफ लिखा हुआ है। उनका मिशन है कि पूरी दुनिया की जनसंख्या को 50 करोड़ के अंदर लाना है। इसका मतलब यह हुआ कि जो एलीट क्लास या सबसे ऊपर बैठी शैतानों की फौज है उसे दुनिया को अपनी मुट्ठी में करने के लिए छोटी जनसंख्या वाली दुनिया चाहिए क्योंकि वर्तमान में 760 करोड़ की बड़ी जनसंख्या वाली दुनिया को कंट्रोल करना बहुत मुश्किल काम होगा। इसलिए एजेंडा-21 की थिंकटैंक यही चाहेगी कि दुनिया की 80 प्रतिशत से अधिक जनसंख्या का अस्तित्व ही खत्म हो जाए और दुनिया की पूरी जनसंख्या का सर्वाधिक हिस्सा भारत और चीन में है। तो इस परिस्थिति में हम भारत के लोगों को ये तय करना होगा कि इस 80 प्रतिशत मिटने वाली जनसंख्या में होना चाहेंगे या नहीं। कहने का मतलब यही है कि अब हम सबका अस्तित्व खतरे में है।

कोरोना वायरस निश्चित रूप से एजेंडा-21 यानी नई वैश्विक व्यवस्था को लागू करने का एक जरिया या हिस्सा हो सकता है- इससे इनकार नहीं किया जा सकता है। यही वायरस एक तरह से बायोलॉजिकल वर्ल्ड वॉर को भी जन्म दे सकता है। यह महामारी कोई प्राकृतिक प्रकोप नहीं बल्कि जानबूझकर पैदा किया गया मानवजनित वायरस है जो युद्ध करने के लिए बनाया गया है ताकि अर्थव्यवस्था को धराशायी किया जा सके और लोगों में डर पैदा कर उसकी मजबूरी का पूरी तरह से इस्तेमाल किया जा सके। और लोगों की ऐसी ही परिस्थितियों के बीच नई वैश्विक व्यवस्था को लागू कर दिया जाएगा। दुनिया से लोकतंत्र खत्म हो जाएगा और कुलीन तंत्र की स्थापना हो जाएगी। मेरे आलेख के रूप में ये पूरी कहानी आपको बहुत हद तक काल्पनिक लग सकती है, दंतकथा जैसी लग सकती है, लेकिन कोरोना से पहले और कोरोना के बाद की दुनिया को जब आप समझने की कोशिश करेंगे, जो चीजें जीवन में घटित हो रही हैं उस सबको जब आप कनेक्ट करने की कोशिश करेंगे तो शायद आप यह अहसास कर पाएंगें कि वाकई यह सब होने जा रहा है।

Thursday, 2 July 2020

भारतीय रेल ने भी पकड़ ही ली 'निजीकरण' की ट्रेन

अंदेशा तो पहले से ही था, लेकिन अब वह पूरी तरह से होने जा रहा है। हम बात कर रहे हैं भारतीय रेल के निजीकरण की। मुझे याद है 22 नवंबर 2019 शुक्रवार का वो दिन जब रेल मंत्री पीयूष गोयल ने राज्यसभा में प्रश्नकाल के दौरान सवालों का जवाब देते हुए कहा था कि रेलवे भारत और देशवासियों की संपत्ति है और आगे भी रहेगी। गोयल ने रेलवे के निजीकरण की संभावाओं को खारिज करते हुए तब कहा था कि सरकार रेलवे का निजीकरण नहीं कर रही है, बल्कि यात्रियों को बेहतर सुविधाएं मुहैया कराने के लिए निजी कंपनियों से कॉमर्शियल और ऑन-बोर्ड सेवाओं की आउटसोर्सिंग कर रही है। मालिकाना हक रेलवे के पास ही रहेगा। हम केवल लाइसेंस दे रहे हैं। हमारे देश की जनता बहुत भोली है। मंत्री जी का संसद में दिया बयान सुन लिया, समझ लिया और मान लिया। लेकिन सरकार कहां मानने वाली। वक्त का इंतजार किया और कोरोना महामारी व लॉकडाउन के दौरान आपदा एक्ट का फायदा उठाते हुए यात्री ट्रेन सेवा के संचालन के लिए पहली बार खुले तौर पर निजी कंपनियों के दरवाजे खोल दिए। इसके तहत देश में 109 गंतव्य मार्गों पर निजी कंपनियां यात्री ट्रेनों का संचालन कर सकेंगी। सरकार का अनुमान है कि इसमें 30 हजार करोड़ रुपये का निवेश हो सकता है। हालांकि इसकी शुरूआत तो तभी हो गई थी जब आईआरसीटीसी ने सरकारी पटरी पर पहली निजी ट्रेन तेजस का संचालन शुरू किया था।

दरअसल, मोदी सरकार का यह फैसला उस बिबेक देबरॉय समिति की उस रिपोर्ट का हिस्सा है जिसे वर्ष 2014 में रेलवे बोर्ड ने प्रमुख रेल परियोजनाओं के लिये संसाधन जुटाने और रेलवे बोर्ड के पुनर्गठन के लिए सुझाव देने को कहा था। इसका साथ दिया नीति आयोग ने भी। देबरॉय समिति ने वर्ष 2015 में अपनी रिपोर्ट पेश की थी जिसमें रेल के डिब्बों तथा इंजन के निजीकरण की बात साफतौर पर कही गई थी। समिति ने कहा था कि रेलवे के बुनियादी ढांचे के लिए एक अलग कंपनी का निर्माण करना चाहिए और ट्रेनों के संचालन का काम निजी हाथों में सौंपा जाना जरूरी है। रेलवे में निचले स्तर पर विकेंद्रीकरण की जरूरत पर भी समिति ने जोर दिया है। साथ ही नई लाइनों के निर्माण में रेलवे को राज्य सरकारों के साथ मिलकर काम करने की सलाह दी है।

बहुत से लोगों को सरकार का यह फैसला आज अच्छा लग रहा होगा, लेकिन आने वाले वक्त में अच्छे स्कूल और अस्पताल की तरह कहीं आना-जाना भी आपकी जेब से दूर हो जाएगा क्योंकि निजी कंपनियों का एक ही लक्ष्य होता है मुनाफा कमाना और रेलवे में लाभ कमाने का सबसे आसान तरीका होता है यात्री किराये में इजाफा करना जो पिछले पांच साल से सरकार ने अपरोक्ष तौर पर लगातार किया भी। लेकिन जब यह काम निजी कंपनियां करेंगी तो जनता की आवाज और उसका दर्द नक्कारखाने में तूती की आवाज बन जाएगी। क्योंकि निजी कंपनियां अपने व्यवहार में अप्रत्याशित होती हैं और इनमें जवाबदेही की भारी कमी होती है। उनकी जवाबदेही रेल यात्रियों के प्रति नहीं होगी बल्कि उनकी जेब से वसूली जाने वाली किराया से उनकी कंपनी को कितना मुनाफा पहुंचाना है उसकी चिंता करना महत्वपूर्ण होता है। एक और बात जो काफी महत्वपूर्ण है वह यह है कि रेलवे विशुद्ध तौर पर आम आदमी की जिंदगी को जीता है। सरकार के पास जब तक इसका स्वामित्व है, वह नफा-नुकसान की परवाह किए बिना राष्ट्रव्यापी पहुंच प्रदान करती है लेकिन निजीकरण में यह गुंजाइश खत्म हो जाएगी और उन्हें जिस क्षेत्र से मुनाफा नहीं होगा उस मार्ग पर ट्रेनों का संचालन बंद कर देंगे।

बहरहाल, यात्री ट्रेनों के संचालन के लिए पहली बार भारतीय रेलवे ने निजी निवेश का रास्ता साफ कर दिया है और सरकार के इस कदम के साथ ही रेलवे का 167 साल का इतिहास बदलने जा रहा है। साल 1853 में भारत में शुरू हुई व्यावसायिक ट्रेन सेवा अमेरिका, चीन और रूस के बाद दुनिया का चौथा सबसे बड़ा रेल नेटवर्क है और इसी नेटवर्क के जरिये भारतीय रेलवे प्रतिदिन करीब ढाई करोड़ लोगों को एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाती है। इस कार्य को अंजाम देने के लिए उसके पास तकरीबन 13 लाख कर्मचारी हैं। हालांकि वर्ष 2019 में ही लखनऊ से नई दिल्ली के बीच भारत की पहली प्राइवेट ट्रेन तेजस एक्सप्रेस की शुरुआत हो गई थी जिसे रेलवे में निजीकरण की दिशा में पहला बड़ा कदम माना गया था, लेकिन आज जब हम कोरोना जैसी वैश्विक महामारी के दौर से गुजर रहे हैं, देश में आपदा एक्ट लगा हुआ है और इसकी आड़ में सरकार उन सारे एजेंडा को पूरा कर लेना चाहती है जिसपर उसे लगता है कि इसके खिलाफ जनता की आवाज उठ सकती हैं। आखिर भारतीय रेल को देश की लाइफ लाइन जो कहा जाता है।