Friday, 9 October 2020

अब कौन नापेगा भारतीय राजनीति का तापमान?


फरकिया वाली खगड़िया के बेहद दुरुह इलाके शहरबन्नी से निकलकर दिल्ली की सत्ता यानी रायसीना हिल्स तक का सफर अपने संघर्ष के बूते तय करने का नाम है रामविलास पासवान जो अब हमारे बीच नहीं रहे। भारत की राजनीति में ‘मौसम वैज्ञानिक' के नाम से मशहूर रामविलास पांच दशक तक बिहार और देश की राजनीति में एक ध्रुवतारा की तरह चमकते रहे। दो बार लोकसभा चुनाव में सर्वाधिक मतों से जीतने का विश्व रिकॉर्ड बनाने और देश के आधा दर्जन प्रधानमंत्रियों की कैबिनेट की शोभा रहे इस दलित मसीहा के बारे में कहा जाता है कि राजनीति की नब्ज पर उनकी पकड़ इस कदर मजबूत थी कि एक वक्त में उन्हें यूपीए में शामिल कराने के लिए सोनिया गांधी खुद चलकर उनके घर पर दस्तक दी थीं। 

‘ना काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर’ इस कहावत को चरितार्थ करने वाले मृदुभाषी रामविलास पासवान के छह प्रधानमंत्रियों के साथ काम करने की कहानी भी बड़ी अजब गजब है। 1996 से 2015 तक केन्द्र में सरकार बनाने वाले सभी राष्ट्रीय गठबंधन चाहे यूपीए हो या एनडीए का वह हिस्सा बने रहे। इसी कारण लालू प्रसाद ने उनको ‘मौसम विज्ञानी’ का दर्जा भी दिया था। अब तो वह खुद भी स्वीकारने लगे थे कि वह जहां रहते हैं सरकार उन्हीं की बनती है। मतलब राजनीतिक मौसम का पुर्वानुमान लगाने में वे माहिर थे। समाजवादी पृष्ठभूमि के बड़े नेताओं में रामविलास की अपनी एक पहचान थी। 

जब सत्ता की चाबी लगी थी हाथ, लेकिन...

फरवरी 2005 की बात है जब बिहार की सत्ता की चाबी उनके हाथ लगी थी, लेकिन...। साल 2000 में लोक जनशक्ति पार्टी बनाने के बाद फरवरी 2005 में पहली बार उनकी पार्टी बिहार विधानसभा का चुनाव लड़ी थी तो 29 विधायक जीतकर आए थे। किसी दल को बहुमत नहीं होने के कारण सरकार नहीं बन रही थी। पासवान अगर उस वक्त नीतीश कुमार के साथ या लालू प्रसाद का साथ दे देते तो प्रदेश में सरकार बन सकती थी। मगर उन्होंने शर्त रख दी कि जो पार्टी अल्पसंख्यक को मुख्यमंत्री बनाएगी, उनकी पार्टी उसी का साथ देगी। और उनकी इस शर्त पर कोई खरा नहीं उतरा। सूबे को दोबारा चुनाव में जाना पड़ा। बाद में उसी साल अक्टूबर-नवम्बर में हुए चुनाव में नीतीश कुमार के नेतृत्व में एनडीए को बहुमत मिला और सरकार बनी। कहते हैं कि रामविलास पासवान की वह सबसे बड़ी राजनीतिक भूल थी और उसके बाद कभी भी उनकी पार्टी का प्रदर्शन उस रूप में नहीं कर पाई कि बिहार की सत्ता में अहम भूमिका निभा पाएं। 

2009 में जब हार गए थे लोकसभा चुनाव

2004 के लोकसभा चुनाव में रामविलास जीते, लेकिन 2009 में वह हार गए। 2009 में पासवान ने लालू प्रसाद की पार्टी राजद के साथ गठबंधन किया था। पूर्व गठबंधन सहयोगी कांग्रेस को छोड़कर। 33 वर्षों में पहली बार वे हाजीपुर से जनता दल के रामसुंदर दास से चुनाव हार गए थे। उनकी पार्टी लोजपा 15वीं लोकसभा में कोई भी सीट जीतने में सफल नहीं रही। साथ ही उनके गठबंधन के साथी और उनकी पार्टी भी अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाई और 4 सीटों पर सिमट गई। उस वक्त लालू यादव के सहयोग से वह राज्यसभा में पहुंचे थे। बाद में हाजीपुर क्षेत्र से 2014 के चुनाव में नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में वह फिर से एनडीए में आ गए और संसद में पहुंकर मंत्री बने। उसी चुनाव में बेटा चिराग भी पहली बार जमुई से सांसद बना।   

साल 1983 में बनाई थी दलित सेना

वर्ष 1975 में जब भारत में आपातकाल की घोषणा की गई तो उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। 1977 में रिहा होने पर वे जनता पार्टी के सदस्य बन गए और पहली बार इसके टिकट पर हाजीपुर से संसद पहुंचे। इस चुनाव में उन्होंने सबसे अधिक अंतर से चुनाव जीतने का विश्व रिकॉर्ड अपने नाम किया। वे 1980 और 1984 में हाजीपुर निर्वाचन क्षेत्र से 7वीं लोकसभा के लिए चुने गए। 1983 में उन्होंने दलित मुक्ति और उसके कल्याण के लिए एक संगठन दलित सेना की स्थापना की। 1989 में लोकसभा के लिए फिर से चुने गए और उन्हें विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार में केंद्रीय श्रम और कल्याण मंत्री बनाया गया। उसी समय मंडल आयोग की सिफारिशें लागू की गईं। 1996 में उन्होंने लोकसभा में सत्तारूढ़ गठबंधन का भी नेतृत्व किया, क्योंकि तत्कालीन प्रधानमंत्री एचडी देवेगौड़ा राज्यसभा के सदस्य थे। उसी साल वे पहली बार केंद्रीय रेल मंत्री बने। उन्होंने 1998 तक उस पद को संभाला। इसके बाद वे अक्टूबर 1999 से सितंबर 2001 तक केंद्रीय संचार मंत्री रहे, जब उन्हें कोयला मंत्रालय में स्थानांतरित किया गया और वे इस पद पर अप्रैल 2002 तक बने रहे। मगर इसी बीच 2000 में लोक जनशक्ति पार्टी (एलजेपी) बनाने के लिए वे जनता दल से अलग हो गए। 2004 के लोकसभा चुनावों के बाद पासवान यूपीए में शामिल हो गए और यूपीए सरकार में उन्हें रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय और इस्पात मंत्रालय में केंद्रीय मंत्री बनाया गया। हाजीपुर में रेलवे का जोनल कार्यालय खुलवाना और केन्द्र सरकार में अंबेडकर जयंती पर छुट्टी घोषित करावाने का श्रेय रामविलास पासवान को जाता है।

पहली बार 1969 में लड़े थे चुनाव

पांच दशकों में रामविलास पासवान 8 बार लोकसभा के सदस्य रहे। पासवान उस वक्त बिहार विधानसभा के सदस्य बन गए थे, जब लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार अपने छात्र जीवन में ही थे। इमरजेंसी के दौरान इंदिरा गांधी वाली कांग्रेस सरकार से लड़ने से लेकर अगले पांच दशकों तक पासवान कई बार कांग्रेस के साथ, तो कभी खिलाफ चुनाव लड़ते रहे और जीतते रहे। 1977 के लोकसभा चुनाव में ही हाजीपुर सीट से जनता दल के टिकट पर चुनाव लड़े पासवान ने चार लाख से ज्यादा वोटों से जीत दर्ज कर वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाया था। इसके बाद 2014 तक उन्होंने आठ बार आम चुनावों में जीत हासिल की। रामविलास पासवान का राजनीतिक सफर 1969 में तब शुरू हुआ था, जब वे संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के टिकट पर खगड़िया जिले के सुरक्षित सीट अलौली से कांग्रेस के मिश्री सदा को हराकर बिहार विधानसभा पहुंचे थे। 1974 में राज नारायण और जेपी के प्रबल अनुयायी के रूप में लोकदल के महासचिव बने। वे व्यक्तिगत रूप से राज नारायण, कर्पूरी ठाकुर और सत्येंद्र नारायण सिन्हा जैसे आपातकाल के प्रमुख नेताओं के करीबी रहे हैं।

दो शादी से तीन बेटी और एक बेटा

खगड़िया में एक दलित परिवार में 5 जुलाई 1946 को जन्मे रामविलास पासवान राजनीति में आने से पहले बिहार प्रशासनिक सेवा में अधिकारी थे। पासवान ने इमरजेंसी का पूरा दौर जेल में गुजारा। इमरजेंसी खत्म होने के बाद पासवान छूटे और जनता दल में शामिल हो गए। उनका पैतृक गांव खगड़िया जिले के अलौली स्थित शहरबन्नी गांव है। उनकी शादी 1960 में राजकुमारी देवी के साथ हुई थी। बाद में 1981 में पहली पत्नी को तलाक देकर दूसरी शादी 1983 में पंजाबी महिला रीना शर्मा से की। देश की राजनीति में इतना लंबा वक्त गुजार चुके रामविलास पासवान की निजी जिंदगी परदे में ही रही। उनकी निजी जिंदगी पर बातें तभी हुई जब विवाद हुए। पासवान ने दो शादियां की थीं। उनकी पहली पत्नी राजकुमारी से दो बेटियां हैं, जबकि दूसरी पत्नी रीना से एक बेटा चिराग पासवान और एक बेटी है। पहली पत्नी अब भी उनके गांव शहरबन्नी में ही रहती हैं और इन दिनों बीमार भी हैं। रामविलास ने कोसी कॉलेज खगड़िया और पटना यूनिवर्सिटी में पढ़ाई की थी। पटना विश्वविद्यालय से उन्होंने एमए और लॉ ग्रेजुएट की डिग्री ली थी।