कहानी शुरू होती है नवजोत सिंह सिद्धू की कांग्रेस पार्टी में एंट्री से। एक ऐसे सिद्धू की जिसके बारे में कहा जाता है कि चाहे क्रिकेट का मैदान हो या फिर राजनीति का अखाड़ा, कैप्टन से बगावत की अदावत से नवजोत सिंह सिद्धू का नाता पुराना रहा है। तो क्या कांग्रेस आलाकमान को यह बात पता नहीं थी। बिल्कुल पता थी और इसी वजह से बगावत की अदावत वाले सिद्धू के नाम पर कांग्रेस आलाकमान ने मुहर लगाई थी। दरअसल, कांग्रेस का केंद्रीय नेतृत्व उस बात को भूला नहीं था जब 2017 के पंजाब चुनाव के वक्त कैप्टन अमरिंदर सिंह ने धमकी दी थी कि अगर उन्हें मुख्यमंत्री उम्मीदवार नहीं बनाया गया तो वे पार्टी तोड़ देंगे। दरअसल, 2014 में जब कांग्रेस के बड़े-बड़े नेता लोकसभा चुनाव लड़ने से कतरा रहे थे, उस समय सोनिया गांधी के एक इशारे पर कैप्टन अमरिंदर अरूण जेटली के खिलाफ अमृतसर से लोकसभा चुनाव लड़ने के लिए तैयार हो गए थे और फिर वो न सिर्फ चुनाव लड़े, बल्कि उन्होंने जेटली को करारी मात भी दी। अंतत: 2017 के विधानसभा चुनाव में कैप्टन अमरिंदर सिंह की अगुवाई में कांग्रेस ने चुनाव लड़ा और पंजाब की कुल 117 सीटों में से 77 सीटों पर जीत हासिल कर पूरे एक दशक बाद सत्ता में वापसी की। अमरिंदर सिंह की यह जीत इस मायने में बेहद अहम थी कि 2014 में केंद्र में नरेंद्र मोदी की सरकार बनने के बाद भाजपा लगातार एक के बाद एक कई राज्यों में अपनी सरकार बनाती जा रही थी। लेकिन पंजाब की सत्ता में कांग्रेस की वापसी करा अमरिंदर सिंह मोदी-शाह वाली भाजपा के विजय रथ को रोकने वाले नेताओं में शुमार हो गए। इतना ही नहीं, जब 2019 के लोकसभा चुनाव में हर तरफ़ मोदी लहर की ही चर्चा थी, तब भी कांग्रेस ने पंजाब की 13 लोकसभा सीटों में से 8 सीटें जीतीं। इससे अमरिंदर का कद और ऊंचा हो गया। इतना ऊंचा कि अब वो कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व को नजरअंदाज करने लगे। अक्सर ये भी होने लगा कि कैप्टन जब भी दिल्ली आते थे, पीएम मोदी और गृह मंत्री अमित शाह से बिना मिले नहीं जाते थे। अब केंद्रीय नेतृत्व तो केंद्रीय नेतृत्व होता है। वो भी कांग्रेस पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व जहां गांधी परिवार की ही तूती बोलती हो। प्रियंका गांधी और राहुल गांधी को कैप्टन की एको-अहम की राजनीति रास नहीं आई। लेकिन लाख टके का सवाल ये था कि कैप्टन के खिलाफ खड़ा किसे किया जाए? जब आलाकमान ने घोड़े दौड़ाए तो सिद्धू के रूप में एक ऐसा नेता मिल गया जिसने कैप्टन अमरिंदर को सत्ता से बेदखल करने का बीड़ा उठा लिया।
2017 के विधानसभा चुनाव से ठीक पहले सिद्धू ने कांग्रेस का हाथ थामा था। हालांकि कैप्टन अमरिंदर तब भी सिद्धू की कांग्रेस में एंट्री से खुश नहीं थे। लेकिन सोनिया-राहुल-प्रियंका की तिकड़ी सिद्धू को कैप्टन की नकेल कसने के लिए ही खड़ा किया था। लिहाजा 2017 का चुनाव जीतने के बाद कैप्टन अमरिंदर सिंह को ना चाहते हुए भी सिद्धू को कैबिनेट मंत्री बनाना पड़ा। लेकिन दोनों के बीच खींचतान तब बढ़ गई जब सिद्धू ने यह ऐलान कर दिया कि वे इमरान खान के शपथ ग्रहण समारोह का हिस्सा बनने के लिए पाकिस्तान जाएंगे। तब अमरिंदर ने सिद्धू को इस बात पर पुनर्विचार करने की सलाह भी दी थी लेकिन सिद्धू नहीं माने। मामला तब और पेचीदा हो गया जब अमरिंदर ने पाकिस्तानी सेना प्रमुख कमर जावेद बाजवा के साथ सिद्धू के गले मिलने की घटना का मुखर विरोध कर दिया। उसके बाद 2019 के लोकसभा चुनाव में आलाकमान के निर्देश पर चुनाव प्रचार करने सिद्धू पंजाब पहुंचे तो उन्होंने वहां अपनी ही पार्टी की कैप्टन सरकार पर भ्रष्टाचार का आरोप ये कहते हुए लगाया कि यहां भी 25 प्रतिशत का कमीशन लिया जा रहा है। कांग्रेस के कई नेताओं ने तब सिद्धू पर कार्रवाई की मांग भी की थी। इस तरह से कैप्टन अमरिंदर और नवजोत सिंह सिद्धू के बीच तनाव बढ़ता गया।
आखिरकार जून, 2019 में सिद्धू ने मंत्री पद से इस्तीफ़ा दे दिया। इस्तीफे में भी सिद्धू ने सियासी चाल चली और कैप्टन को नीचा दिखाने का मौका नहीं छोड़ा। उन्होंने अपना इस्तीफा राहुल गांधी के नाम लिखा और बाद में कैप्टन अमरिंदर सिंह को भेजा। तभी से कैप्टन को यह लगने लगा था कि पंजाब की राजनीति में सिद्धू नाम के पतंग की डोर को ढील कहीं और से दी जा रही है। और कांग्रेस आलाकमान के खेल का तब पर्दाफाश भी हो गया जब कैप्टन के लाख विरोध के बावजूद सिद्धू को पंजाब कांग्रेस की कमान सौंप दी गई। हालांकि तब भी कैप्टन पर सत्ता के अहंकार का नशा इतना हावी था कि वो ये नहीं समझ सके कि चुनाव से पहले उनके राजतख्त को पलटने तक की तैयारी हो रखी है। अंतत: कांग्रेस आलकमान ने कैप्टन से इस्तीफा मांग ही लिया। कैप्टन के पास कोई विकल्प नहीं था। इस्तीफा तो कैप्टन ने दे दिया लेकिन इस शर्त के साथ कि सीएम पद पर सिद्धू की ताजपोशी उन्हें मंजूर नहीं होगा। कैप्टन की शर्त कांग्रेस आलाकमान की पटकथा में पहले से ही तय थी। लेकिन ये वाली बात सिद्धू को भी नहीं पता थी कि दिल्ली में बैठी गांधी परिवार की तिकड़ी ने उसके कंधे पर बंदूक सिर्फ कैप्टन अमरिंदर को निपटाने के लिए रखी थी। और उसकी प्रतिक्रिया जिस रूप में सामने आएगी उससे सिद्धू भी जो आसमान में उड़ रहे थे उसे एक दलित नेता चरणजीत सिंह चन्नी की मुख्यमंत्री पद पर ताजपोशी कराकर जमीन पर ला दिया। सिद्धू को जब तक यह बात समझ में आई, बहुत देर हो चुकी थी।
दरअसल, एक दलित नेता का पंजाब का मुख्यमंत्री बनना लंबे वक्त से लंबित था। आलाकमान ने चन्नी के रूप में एक दलित सीएम की ताजपोशी कराकर इस बात को साबित करने की कोशिश की है कि कांग्रेस बदल रही है। अगर पंजाब की राजनीति को पन्नों को पलटकर देखें तो पता चलेगा कि बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक कांशी राम इसी पंजाब के होशियारपुर जिले से थे। यहीं से उन्होंने अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत की थी। ये अलग बात है कि 1996 के बाद के चुनावों में बसपा का प्रदर्शन अच्छा नहीं रहा। 2017 के विधानसभा चुनाव में तो वह 1.5 प्रतिशत वोटों में सिमट गई। जबकि पंजाब में दलितों की आबादी 32 प्रतिशत के आसपास है और कुल 34 सीटें अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित हैं। यह क्यों हुआ और कैसे हुआ इसकी एक अलग ही कहानी है। पर कांग्रेस ने सूबे के दलितों की राजनीतिक जमीन को पकड़ने की कोशिश के तहत ही एक दलित नेता को सीएम की कुर्सी पर बैठाया है। अब पंजाब कांग्रेस के अध्यक्ष पद से नवजोत सिंह सिद्धू ने जिस नाटकीय अंदाज में इस्तीफे की की पेशकश की है उससे कांग्रेस की साख को जबरदस्त डेंट लगा है। लोग पूछने और बोलने लगे हैं कि सिद्धू के बारे में जब कैप्टन पहले से ही आगाह कर रहे थे तो आलाकमान ने उनकी क्यों नहीं सुनी। अब इसमें सिद्धू का जो राजनीतिक नुकसान होगा वो तो होगा ही, कांग्रेस का नुकसान इस रूप में बड़ा होने वाला है कि सूबे में अब कैप्टन जैसा कोई ऐसा कद्दावर नेता कांग्रेस में नहीं है जो ताक में बैठे आप, अकाली दल, भाजपा आदि की चाल को समझकर होने वाले नुकसान से कांग्रेस को बचा पाए। क्योंकि कैप्टन के साथ आलाकमान ने जिस तरह का व्यवहार किया, वो कांग्रेस के साथ नहीं रहने का ऐलान कर चुके हैं। ऐसे में वह अब भाजपा से हाथ मिलाकर आने वाले चुनाव में कांग्रेस के नुकसान को बढ़ाने की भूमिका में ही खड़े होंगे।
बहरहाल, राज्य में विधानसभा चुनाव की उल्टी गिनती शुरू हो चुकी है। राजनीतिक घटनाक्रम तेजी से बदल रहे हैं। नवजोत सिंह सिद्धू किसी भी तरह से चुनाव से पहले मुख्यमंत्री बनना चाहते थे जो कांग्रेस आलाकमान ने होने नहीं दिया। अब सिद्धू ने जिस तरह का रूख अख्तियार किया है वह इस वक्त कांग्रेस की सेहत के लिए ठीक नहीं है। भाजपा का प्रदेश में कोई वोट बैंक इस रूप में नहीं है कि वह सत्ता के लिए ताल ठोके। भाजपा की उपलब्धि इसी में है कि वह किसी तरह से कांग्रेस को सत्ता से बेदखल कर दे। इसके लिए वह आम आदमी पार्टी तक को अंदरखाने समर्थन देने की बिसात बिछा रखी है। कैप्टन अमरिंदर सिंह पूरी तरह से मोदी-शाह के पाले में जा बैठे हैं। अकाली दल भी अपने तरीके से कांग्रेस को हराने में कोई कसर नहीं छोड़ेगी। ऐसे में अगर दिल्ली में बैठे कांग्रेसी चाणक्य एक भी चाल चूकते हैं, तो तय मानिए- बदल रही कांग्रेस के हाथ से पंजाब की सत्ता को फिसलने से कोई नहीं बचा सकता है।
