Sunday, 31 October 2021

राम की अयोध्या के सियासी अखाड़े में ‘सब धान 22 पसेरी’ या बात कुछ और है?


अगले साल होने वाले उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव को लेकर राजनीति गरमाने लगी है और इस गरमाहट के बीच भगवान राम की अयोध्या एक बार फिर से सभी राजनीतिक दलों के केंद्र में आ गई है. कुछ दलों को लगता है कि अयोध्या बड़ा चुनावी फैक्टर बनने जा रहा है तो किसी के लिए यह लंबे वक्त से राजनीति की प्रयोगशाला के मानिंद है. हालांकि अभी इस बात की कोई गारंटी नहीं कि यूपी की चुनावी बिसात पर अयोध्या का राम मंदिर बड़ा मुद्दा बनने जा रहा है, लेकिन सभी दलों के नेता लोग अयोध्या की तरफ जिस तरह से दौड़ लगाने लगे हैं, माना जा सकता है कि न सिर्फ यूपी चुनाव बल्कि 2024 के लोकसभा चुनाव की पटकथा भी अयोध्या की भूमि से ही लिखी जाएगी. दरअसल इस धर्मनगरी में किसी भी तरह की राजनीतिक हलचल का न सिर्फ उत्तर प्रदेश में बल्कि पूरे देश पर प्रभाव पड़ता है, लिहाजा सभी दलों के नेता राम-नाम की आस्था वाली इस नगरी से ही अपने-अपने वोट बैंक को साधने की सियासत में जुटने लगे हैं.

भगवान राम की अयोध्या के रण में कौन-कौन?

बड़े जोर की चर्चा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 3 नवंबर 2021 को राम की अयोध्या में दीपोत्सव कार्यक्रम में शिरकत करेंगे. उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के अयोध्या से चुनाव लड़ने की अटकलें भी चल रही हैं. समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव भी कहने लगे हैं कि वह विष्णु के सभी अवतारों को मानते हैं, जब राम मंदिर बनेगा तो पत्नी-बच्चों संग दर्शन करने जरूर जाएंगे. बसपा प्रमुख मायावती भी उनसे दो कदम आगे बढ़कर राम पथ पर चल रही हैं. यूपी के 18 मंडलों में ब्राह्मण सम्मेलन के आयोजन की शुरूआत अयोध्या से करके बसपा ने ब्राह्मण वोटों को साधने की कोशिश की है. कहते हैं कि इस सम्मेलन में जय श्रीराम के जयकारे भी खुब गूंजे. आईएमआईएम के अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी ने भी यूपी में अपनी पार्टी के चुनाव प्रचार का आगाज अयोध्या में रैली से किया है. कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा भी अयोध्या हो आई हैं. और पिछले दिनों आम आदमी पार्टी के सर्वेसर्वा तथा दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल जब अयोध्या पहुंचे तो राजनीति का पारा अचानक से ऊपर चढ़ गया. जब सीएम योगी को लगा कि राम के नाम को लेकर भाजपा का पेटेंट खतरे में है तो वो भी भड़ासी बन गए.

भाजपा के लिए 'जय श्रीराम' को बचाने की चुनौती

बहुत सारे सियासी पंडितों, राजनीतिक विश्लेषकों को लगता है कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद अयोध्या और राम मंदिर का मुद्दा चुनावी मुद्दा नहीं बन पाएगा. लेकिन चूंकि भाजपा की राजनीति का आधार ही अयोध्या में भव्य राम मंदिर का निर्माण है जो आने वाले दो-ढाई वर्षों में अपना आकार ले लेगा तो अब यह कैसे संभव हो सकता है कि उसे भुला दिया जाए. गणना करने वाले बताते हैं कि यूपी के सीएम पद पर ताजपोशी के बाद बीते साढ़े चार वर्षों में योगी आदित्यनाथ 20 से अधिक बार अयोध्या का दौरा कर चुके हैं. अयोध्या से ही उनके चुनाव लड़ने की अटकलें भी लगाईं जा रही हैं. राम-राम का उच्चारण जो कभी सामाजिक अभिवादन के तौर पर लोगों में रचा-बसा था उसे जय श्रीराम में बदलकर राष्ट्रवाद और हिन्दू राष्ट्र की परिकल्पना से जोड़ने में भाजपा ने बहुत मेहनत की है. इसके लिए जिस अयोध्या की जमीन को भाजपा ने अपना राजनीतिक हथियार बनाया उस जमीन को अन्य विरोधी दलों के अतिक्रमण से बचाना आज उसके लिए एक बड़ी चुनौती बन गई है. चुनौती इसलिए नहीं कि अयोध्या में राम मंदिर की लड़ाई में भाजपा के योगदान को कोई कमतर आंक रहा है. चुनौती इस रूप में देखी जा रही है कि 1985 में राम मंदिर का ताला किसने खुलवाया था? चुनाव आते-आते विवादित स्थल के पास राम मंदिर का शिलान्यास किसने करवाया? ये अलग बात है कि तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी के तात्कालिक फैसलों को भुनाने के लिए उनकी पार्टी कांग्रेस की जमीन दरक चुकी है, लेकिन जिस तरीके से राजीव की बेटी प्रियंका गांधी ने यूपी के रण में कांग्रेस की कमान संभाली हैं, इंकार नहीं किया जा सकता है कि 2024 आते-आते वो इस मुद्दे को लपक न लें. पर इससे भी बड़ी चुनौती भाजपा के लिए ये है कि वह भी जानती है कि भगवान राम सर्वव्यापी हैं, आस्था के प्रतीक हैं, राम पर तर्क-वितर्क नहीं किया जा सकता, मर्यादा पुरुषोत्तम राम के रूप में एक राजा के तौर पर उनकी ख्याति रही है, चूंकि राजा को किसी एक धर्म, संप्रदाय या किसी एक राजनीतिक दल के पहरूए के तौर पर पेश कर नहीं सकते. राम को किसी के भी मानस का हिस्सा बनने से आप कैसे रोक सकते हैं? लिहाजा इस पूरे चक्रव्यूह को भेदना ऐसे वक्त में भाजपा के लिए एक बड़ी चुनौती बनकर खड़ी हो गई है जब यूपी चुनाव से ठीक पहले राम की अयोध्या में सभी राजनीतिक दल और उसके नेता अपनी-अपनी हाजिरी लगा रहे हैं.

आम आदमी पार्टी का यह कैसा अयोध्या प्रेम?

अरविंद केजरीवाल के बारे में अक्सर कहा जाता है कि वह हिन्दुस्तान की राजनीति को बदलने आए हैं, लेकिन राजनीति को नई दिशा और दशा देने का वादा करने वाला यह मुखर राजनेता किस तरह से पहले मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति के साथ खुद को आगे बढ़ाया, राम का नाम लेने तक से परहेज किया, अब वो अयोध्या पहुंचकर रामलला और हनुमान जी के दर्शन करे, सरयू की आरती भी तो ये बात समझ में आती है कि मामला इतना सीधा है नहीं जितना हम सब समझते हैं. दरअसल आप के केजरीवाल धर्म के राजनीतिक पहलू को धर्मनिरपेक्ष तरीके से इस्तेमाल करना चाहते हैं. याद हो तो महात्मा गांधी से लेकर समाजवादी चिंतक राम मनोहर लोहिया तक रामराज्य की चर्चा किया करते थे. इसमें कोई शक नहीं कि उत्तर प्रदेश में मतदाताओं का एक बड़ा वर्ग भाजपा के साथ खड़ा है. लेकिन उसी वर्ग में बहुत सारे मतदाता ऐसे भी हैं जिनके लिए भाजपा को वोट करना उनकी मजबूरी है. मतदाताओं का ये वो वर्ग है जो गले में राम नाम का गमछा डाले युवकों की टोलियों, मॉब लिंचिंग और धार्मिक कट्टरता को पसंद नहीं करता है. भगवान राम में उसकी अगाध श्रद्धा है, लेकिन मंदिर के नाम पर चंदे में हेराफेरी उसे पसंद नहीं. मतदाताओं के इसी सोच वाले हिस्से ने केजरीवाल को अयोध्या के रण में आने को मजबूर किया है. आप को लगता है कि गवर्नेंस का मुद्दा तो उसकी यूएसपी है ही, उसमें अगर हिन्दुत्व का तड़का डाल दिया जाए तो काउ बेल्ट की राजनीति में उसका दायरा बढ़ जाएगा.

अयोध्या पर सियासत में कांग्रेस भी पीछे नहीं

ऐसा नहीं है कि हिन्दुत्व और भगवान राम को लेकर को लेकर अयोध्या कोई पहली बार राजनीतिक दलों के केंद्र में है. इससे पहले भी राम की अयोध्या ने इस तरह के सियासी मेले देखे हैं. 1989 में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने कांग्रेस के लिए लोकसभा चुनाव प्रचार का आगाज अयोध्या से ही किया था. आजादी के तुरंत बाद उस चुनाव को कौन भूल सकता है जब देश के प्रतिष्ठित समाजवादी नेता आचार्य नरेंद्र देव के खिलाफ कांग्रेस ने बरहज (देवरिया) से बाबा राघव दास को अपना प्रत्याशी बनाकर उतार दिया था. यूं तो बाबा राघव दास की पहचान गांधीवादी और विनोबा के शिष्य के तौर पर थी लेकिन इस चुनाव में उन्हें हिन्दुत्व के चेहरे के तौर पर स्थापित करने का प्रयास कांग्रेस ने किया था. बाबा राघव दास को तब जबरदस्त समर्थन मिला था और समाजवाद के पुरोधा आचार्य नरेंद्र देव चुनाव हार गए थे. 80 के दशक की बात करें तो यूपी में कांग्रेस की सरकार थी. तब श्रीपति मिश्र की सरकार ने राम जन्मभूमि बाबरी मस्जिद परिसर से जुडी 42 एकड़ भूमि राधा पार्क के लिए अधिग्रहित की थी. सरयू के घाटों की खुदाई करके राम की पैड़ी भी तभी बनाई गई थी. इसके बाद आरएसएस और भाजपा के नेताओं में हलचल शुरू हुई थी. 6 मार्च 1983 को मुजफ्फरनगर में एक विराट हिंदू सम्मेलन का आयोजन किया गया था जिसमें पूर्व उप प्रधानमंत्री गुलजारी लाल नन्दा, कांग्रेस के बड़े नेता और सरकार में मंत्री रहे दाऊ दयाल खन्ना भी शामिल हुए थे. खास बात यह रही कि इसी सम्मेलन में पहली बार राम जन्मभूमि मुक्ति का प्रस्ताव पारित किया गया था. ये कोई सुनी-सुनाई बात नहीं बल्कि यह सब अयोध्या पर जो कुछ इतिहास लिखा गया है उसके पन्नों में दर्ज है.

'अयोध्या! मैं आ रहा हूं' दोहराने की लगी होड़ 

साल 1951 में स्थापित भारतीय जनसंघ से लेकर 1980 में स्थापित भारतीय जनता पार्टी के चुनावी एजेंडे में अयोध्या और भगवान राम के भव्य मंदिर निर्माण का मुद्दा हमेशा शीर्ष पर रहे हैं. इस लिहाज से हिन्दुत्व की राजनीति करने वाली भाजपा के लिए अयोध्या बेहद महत्वपूर्ण है. आजादी के वक्त से लेकर 80 के दशक तक हिन्दुत्व और अयोध्या की जमीन पर सत्ता की राजनीति करने वाली कांग्रेस आज के दौर में भले ही पिछड़ गई हो, लेकिन अयोध्या को केंद्र में रखकर जो इतिहास कांग्रेस ने उन दिनों में संजोया था उस पन्ने को पलटने के लिए राहुल और प्रियंका गांधी को कांग्रेस फिर से खड़ी कर रही है. और भी दलों मसलन सपा, बसपा तक को लगने लगा है कि राम नाम की राजनीति को खारिज कर सत्ता की दौड़ में लौटना आसान नहीं होगा. ऐसे में जो भी दल 2022 के चुनाव में भाजपा से सत्ता छीनना चाहती है, उसे लगता है कि यह काम अयोध्या के रास्ते से गुजरे बिना संभव नहीं. लिहाजा राजनीतिक दलों में राम की अयोध्या में अपनी राजनीतिक उपस्थिति दिखाने की होड़ सी लग गई है. हर कोई कुमार पाशी की कविता के शीर्षक को दोहराने से नहीं चूक रहा कि 'अयोध्या! मैं आ रहा हूं'. 

बहरहाल, ऐसे वक्त में जब सभी राजनीतिक दलों के केंद्र में अयोध्या आकर खड़ी हो गई है, श्रीरामरक्षास्तोत्रं के उस मंत्र का जिक्र करना जरूरी हो जाता है जिसे श्री राम तारक मंत्र भी कहा जाता है...

''राम रामेति रामेति, रमे रामे मनोरमे।
सहस्रनाम तत्तुल्यं, रामनाम वरानने॥''

कहते हैं कि इस मंत्र का जाप सम्पूर्ण विष्णु सहस्त्रनाम या विष्णु के 1000 नामों के जाप के समान है. इस मंत्र में ‘रा’ शब्द विश्ववाचक है और ‘म’ ईश्वरवाचक. यानी जो समस्त लोकों का ईश्वर है उसे ‘राम’ कहा गया है. 6 दिसंबर 1992 को राम की अयोध्या में जो कुछ हुआ वह हो गया. दुर्भाग्य की बात ये है कि तब धर्म के नाम पर जो लोग लड़े-भिड़े, टकराव आज भी कम नहीं हुआ है. आज भी उस दिन की याद में कोई शौर्य दिवस मनाता है तो कोई कलंक दिवस लेकिन अयोध्या से यह कोई पूछने को तैयार नहीं कि वो क्या मनाती है वो क्या सोचती है? कहते हैं कि कनक भवन के बगल में स्थित सुंदर भवन में राम जानकी का मंदिर है. अंसार हुसैन उर्फ मन्नू मियां 1945 से लेकर जीवन के आखिरी वक्त तक मंदिर के मैनेजर रहे. मेले में वो पुजारी के काम में भी हाथ बंटाते थे और जब कभी मंदिर में लोग कम पड़ जाते थे तो आरती के वक्त मन्नू मियां खुद खरताल बजाने खड़े हो जाते थे. मन्नू मियां पांच वक्त के नमाजी थे लेकिन किसी की क्या मजाल कि उनको लेकर अयोध्या में कभी कोई विवाद खड़ा करे. तब क्या मन्नू मियां कभी ऐसा सोचते होंगे कि अयोध्या का सच क्या है और अयोध्या का झूठ क्या है? कहने का मतलब यह कि राम से बड़ा राम के नाम का अर्थ है. आज जरूरत इस बात को परखने की है कि अयोध्या की परिक्रमा करने वाले कितने नेता राम के इस अर्थ की गहराई को समझते हैं? कितने नेता श्रीरामरक्षास्तोत्रं के इस श्री राम तारक मंत्र का जाप करते हैं? लिहाजा आज अयोध्या की जमीन पर जो कुछ हो रहा है वह अपनी राजनीति चमकाने और सत्ता हथियाने या सत्ता बनाए रखने के सिवा और कुछ भी नहीं है. देखना होगा कि जिस अयोध्या से हरदल अपना-अपना राजनीतिक हित साधने में लगा है, 2022 में अयोध्या उसे 'सब धान 22 पसेरी' समझती है या फिर कुछ और.

(30 अक्टूबर 2021 को https://www.tv9hindi.com में प्रकाशित)
https://www.tv9hindi.com/opinion/ayodhya-and-lord-ram-have-become-important-for-political-parties-in-uttar-pradesh-assembly-elections-894142.html 

Wednesday, 27 October 2021

भारत की तबाही का बड़ा हथियार है चीन का नया भूमि सीमा कानून


भारत के साथ एलएसी यानी वास्तविक नियंत्रण रेखा पर लंबे वक्त से चल रहे तनाव के बीच चीन की विधायिका ने नया भूमि सीमा कानून पारित कर भारत के खिलाफ एक और बेहद खतरनाक चाल चल दी है. आगामी 1 जनवरी 2022 से लागू होने वाले इस नए कानून को चीन भले ही अपने देश की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता के लिए अहिंसक बता रहा हो, लेकिन कड़वा सच यही है कि सीमावर्ती इलाकों में चीन अपनी जमीनी दखल को और पुख्ता तरीके से विस्तार देने जा रहा है. इन निर्जन इलाकों में वह आम नागरिकों को बसाने की तैयारी कर रहा है, ताकि किसी भी अन्य देश खासतौर पर भारत के लिए इन इलाकों में सैन्य कार्रवाई और मुश्किल हो जाए. सीधे तौर पर कहें तो चीन का यह नया भूमि सीमा कानून आने वाले वक्त में भारत की तबाही का एक बड़ा हथियार साबित होगा. 

क्या है चीन का नया भूमि सीमा कानून?

नेशनल पीपुल्स कांग्रेस (एनपीसी) की स्थायी समिति के सदस्यों ने जिस नए कानून को मंजूरी दी है उसके तहत चीन के सीमावर्ती इलाकों में सुरक्षा व्यवस्था बढ़ाई जाएगी. आर्थिक, सामाजिक विकास के साथ-साथ सार्वजनिक क्षेत्रों और इंफ्रास्ट्रक्चर को भी विकसित किया जाएगा. आम नागरिकों के रहने और काम करने के लिए सीमा सुरक्षा और आर्थिक व सामाजिक सामंजस्य को मजबूत तरीके से खड़ा किया जाएगा. चीनी समाचार एजेंसी शिन्हुआ की रिपोर्ट को आधार मानें तो कानून में इस बात का भी जिक्र है कि चीन समानता, परस्पर विश्वास और मित्रतापूर्ण वार्तालाप के सिद्धांतों का पालन करते हुए पड़ोसी देशों के साथ लंबे वक्त से चले आ रहे सीमा संबंधी मुद्दों और विवादों से निबटेगा. सामरिक विशेषज्ञ इस बात का अंदेशा जता रहे हैं कि चीन की विधायिका ने जिस भूमि सीमा कानून को पारित किया है उसका आधार ही भारत-चीन सीमा विवाद है जिसका वह अपने तरीके से और अपनी शर्तों पर समाधान चाहती है.

चीन की विस्तारवादी नीति में भारत सबसे ऊपर

चीन का नया भूमि सीमा कानून पूरी तरह से विस्तारवादी नीति का हिस्सा है और इसमें भी खासतौर पर निशाने पर भारत ही है. माना जा रहा है कि इससे भारत में घुसपैठ करने में आसानी रहेगी. चीन और भारत के बीच बहुत बड़ी भूमि निर्जन है जिसपर अक्सर विवाद होता है. चीन के इस ताजा कानूनी पहल से उसे भारत की निर्जन भूमि पर दावा करने में आसानी रहेगी. पूरे सीमावर्ती क्षेत्रों की बात करें तो चीन की 14 देशों के साथ करीब 22,100 किलोमीटर की भूमि सीमा लगती है. चीन का दावा है कि इसमें 12 पड़ोसी देशों के साथ तो उसने सीमा विवाद सुलझा लिया है, लेकिन भारत और भूटान दो ऐसे देश हैं जिनके साथ समझौतों को अंतिम रूप देना बाकी है. भारत और चीन के बीच सीमा विवाद वास्तविक नियंत्रण रेखा पर करीब 3488 किलोमीटर के क्षेत्र में है जबकि भूटान के साथ चीन का विवाद 400 किलोमीटर की सीमा पर है. हाल ही में उसने भूटान के साथ सीमा विवाद सुलझाने के लिए एक समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं. भूटान के साथ कूटनीतिक रिश्ते बनाने की चीन कोशिशों से भारत का चिंतित होना स्वाभाविक है. अगर आप चीन के मुखपत्र ग्लोबल टाइम्स के विचारों पर नजर रखते हैं तो इस बात को मानने में कोई हिचक नहीं कि चीन भूटान को अगला तिब्बत बनाना चाहता है. चीन का यह कहना कि भूटान की सीमा चौकी पर भारत बेवजह टांग अड़ा रहा है, समझा जा सकता है कि भूटान से समझौता किस तरह से भारत को कमजोर करने की ड्रैगन की एक बड़ी खतरनाक चाल है.

दूसरी तरफ, इस कानून को आधार बनाकर चीन तिब्बत पर भी अपना सांस्कृतिक और सामाजिक वर्चस्व मजबूत करेगा. इस संदर्भ में तिब्बत की सीमा से सटे तवांग मठ के प्रमुख ग्यांग बुंग रिंपोचे के हालिया बयान को भी अनदेखा नहीं किया जा सकता है. रिंपोचे ने साफतौर पर कहा है कि अगले दलाई लामा को चुने जाने की प्रक्रिया में चीन को दखलंदाजी का कोई हक नहीं है. वह विस्तारवादी नीति को बढ़ावा देता है. चीनी सरकार धर्म में विश्वास नहीं करती है. इतना ही नहीं, रिंपोचे ने भारत जैसे देशों से तिब्बत की संस्कृति और धरोहर की रक्षा के लिए आगे आने की अपील भी की. दरअसल, दलाई लामा और तिब्बत पर चीन का जो नजरिया है वह उसे वैश्विक मंच पर हमेशा नीचा दिखाता है, उसके अहंकार को ठेस पहुंचाता है. इस पूरी फिल्मी कहानी में चीनी शासक भारत को विलेन के तौर पर देखता है. यह भारत की सेहत के लिए ठीक नहीं है.

चीन के निशाने पर सिलीगुड़ी कॉरिडोर भी

चीन सिलीगुड़ी कॉरिडोर जिसे भारत के ‘चिकन नेक कॉरिडोर’के तौर पर भी जाना जाता है को अपने लिए बड़ा खतरा मानता है. याद करें तो 2017 में जब भारत और चीन के बीच डोकलाम संकट पैदा हुआ था तो ये कॉरिडोर एक महत्वपूर्ण मार्ग बनकर उभरा था. दरअसल पश्चिम बंगाल में स्थित 60 किमी लंबा और 20 किमी चौड़ा सिलीगुड़ी कॉरिडोर उत्तर-पूर्व को भारत के बाकी हिस्सों से जोड़ता है. भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्र में करीब 5 करोड़ की मानव आबादी है. आर्थिक दृष्टि से ये कॉरिडोर उत्तर-पूर्वी राज्यों और शेष भारत के व्यापार के लिए बेहद अहम है. भारत और पूर्वोत्तर राज्यों के बीच एकमात्र रेलवे फ्रेट लाइन भी यहां मौजूद है. वास्तविक नियंत्रण रेखा के पास सड़क मार्ग और रेलवे लाइन सिलीगुड़ी कॉरिडोर से जुड़े हुए हैं. इस कॉरिडोर के जरिए ही यहां सभी जरूरी चीजों की सप्लाई की जाती है. कहने का मतलब यह कि ये कॉरिडोर भारत और इसके पूर्वोत्तर राज्यों के साथ-साथ दक्षिण पूर्व एशिया में आसियान देशों के लिए भी एक महत्वपूर्ण एंट्री गेट है. इसके माध्यम से भारत अपनी ‘एक्ट ईस्ट पॉलिसी’ को भी तेजी से आगे बढ़ा रहा है. 

दूसरा, ये कॉरिडोर पूर्वोत्तर राज्यों में घुसपैठ, सीमा पार आतंकवाद और इस्लामी कट्टरपंथियों का मुकाबला करने में काफी अहम साबित हुआ है. म्यांमार, थाईलैंड और लाओस में संगठित अपराध और ड्रग ट्रैफिकिंग की तस्करी भारतीय राज्यों जैसे त्रिपुरा, मिजोरम, मणिपुर, नागालैंड और अरुणाचल प्रदेश के लिए बड़ा सुरक्षा खतरा रहा है. सिलीगुड़ी कॉरिडोर इस सुरक्षा खतरे से निबटने में काफी अहम भूमिका निभा रहा है. सिलीगुड़ी कॉरिडोर से तिब्बत की चुंबी घाटी सिर्फ 130 किमी दूर है, लिहाजा भारत यहां से चीन की हरकतों पर भी नजर रखता है. युद्ध के समय आसानी से और कम वक्त में हथियारों और सैनिकों को तैनात किया जा सकता है. इन तमाम वजहों से चीन भारत के इस अहम एंट्री गेट को बाधित करने की जुगत में है. चीन का नया कानून काफी हद तक इसमें मददगार साबित हो सकता है.

नो मेंस लैंड एग्रीमेंट को भी समझना जरूरी

चीन की सीमा से सटे जो देश यह मानकर भूमि सीमा कानून को हल्के में ले रहे हैं कि इसका असर सिर्फ भारत पर पड़ने वाला है तो वो बड़ी भूल कर रहे हैं. आने वाले वक्त में इसका असर भारत ही नहीं बल्कि चीन की सीमा से सटे सभी देशों पर पड़ेगा और सबसे ज्यादा असर तो रूस पर पड़ेगा. दरअसल चीन और रूस के बीच सदियों से चला आ रहा एक समझौता है जिसके अनुसार, एक निश्चित क्षेत्र नो मेंस जोन होगा. ये अलग बात है कि नो मेंस जोन पर अतिक्रमण के लिए चीन किस देश की सीमा को चुनता है, लेकिन नया कानून पूरी तरह से इस समझौते पर एक तरह से प्रहार है. याद करें तो मई 2017 में चीन ने वन बेल्ट वन रोड समिट किया था. इसमें रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन भी शामिल हुए थे. पूरे इलाके में भारत ही एक ऐसा इकलौता देश है जो चीन की इस महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट का विरोध कर रहा है. लिहाजा न्यौता मिलने के बावजूद पीएम मोदी ने समिट में शामिल होने से इनकार कर दिया था. तब चीन ने भारत को यह जताने की कोशिश की थी कि उसका पवित्र मित्र देश रूस वन बेल्ट वन रोड प्रोजेक्ट पर चीन के साथ है. तो समय-समय पर चीन इस तरह के प्रयोग कर हालात को भांपने का फॉर्मूला ईजाद करता रहता है. ताजा चीनी भूमि सीमा कानून को भी इसी नजरिये से देखा जाना चाहिए कि इस पर रूस की क्या प्रतिक्रिया आती है. यह प्रतिक्रिया भारत के लिए काफी मायने रखती है. क्योंकि चीन को यह बात अच्छे से पता है कि भारत और रूस का संबंध पंडित जवाहर लाल नेहरू के काल से ही भावनात्मक रहा है. आज भी भारत रूस से ही सबसे ज्यादा हथियारों की खरीद करता है. संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में आज भी रूस भारत का खुलकर समर्थन करता है. बावजूद इसके अगर भारत-चीन में विवाद बढ़ता है और रूस को चीन तथा भारत में से किसी को एक को चुनना होगा तो चीन ऐसा मानकर चलता है कि वह तटस्थ रहेगा. दुर्भाग्य से अगर ऐसा हुआ तो यह चीन की बड़ी कूटनीतिक जीत होगी, क्योंकि अभी तक रूस हमेशा भारत के साथ खड़ा रहा है. और जब तक रूस भारत के साथ खड़ा रहेगा, चीन भारत के खिलाफ कोई भी बड़ा कदम नहीं उठाएगा.

बहरहाल, कूटनीति कहती है कि आर्थिक विकास के लिए किसी भी देश की सरकार का पहला काम होता है कि सरहद पर शांति बनाए रखी जाए. लेकिन चीन एक ऐसा अपवाद देश है जो सरहद पर अशांति को ही आर्थिक तरक्की का आधार मानकर फैसले लेता है. कोविड महामारी के बीच चीन यह मानकर चल रहा है कि वह दुनिया की सबसे बड़ी आर्थिक ताकत के तौर पर खुद को खड़ा कर चुका है. लिहाजा वह पड़ोसी देशों समेत पूरी दुनिया को अपने इशारों पर नचा सकता है सिवा भारत के. इसलिए नए भूमि सीमा कानून की बुनियाद पर विस्तारवादी नीति के साथ वह भारत के सीमावर्ती इलाकों में भी चहलकदमी करेगा. भारत अगर ड्रैगन की इस कुत्सित चाल में फंस गया तो निश्चित रूप से इसकी आर्थिक तरक्की को झटका लगेगा. कहने का मतलब यह कि चीन के इस नए भूमि सीमा कानून जिसको भारत की तबाही के बड़े हथियार के तौर पर देखा जा रहा है, के हर पहलू पर गंभीरता से विचार कर उसकी काट के लिए नई नीति तैयार करने की दिशा में भारत को तुरंत आगे बढ़ना चाहिए.

(26 अक्टूबर 2021 को https://www.tv9hindi.com में प्रकाशित)
https://www.tv9hindi.com/opinion/china-new-land-boundary-law-is-the-big-weapon-of-india-destruction-888382.html 

Friday, 22 October 2021

कश्मीर में हिंसा का नया दौर : पाकिस्तान और तालिबान के डबल इंजन का आतंक तो नहीं?


धरती का जन्नत एक बार फिर से सुलगने लगा है. 2 अक्टूबर 2021 के बाद से कश्मीर में 11 आम नागरिक मारे जा चुके हैं. इसमें शहीद सैनिकों और मारे गए आतंकियों को जोड़ दें तो यह संख्या 33 तक पहुंच चुकी है. आतंकियों के निशाने पर एक बार फिर गैर-कश्मीरी, सिख और कश्मीरी पंडित हैं. ऐसे में अब सवाल यह उठता है कि घाटी में हिंसा की वारदातों में अचानक वृद्धि क्यों हुई? यह सब कौन कर रहा है और क्यों कर रहा है? क्या घाटी एक बार फिर से 1990 के दौर में लौट रहा है? कोई कहता है इसके पीछे तालिबान तो कोई कहता है पाकिस्तान तो कुछ लोग दबी जुबान में यह भी कह रहे हैं कि कश्मीर को हर कोई वोट बैंक के तौर पर इस्तेमाल कर रहा है. सटीक तौर पर यह बताने से हर कोई बच रहा है, यहां तक कि दिल्ली में बैठी सत्ता भी. 

आतंकी हमले का पाक संग तालिबानी कनेक्शन तो नहीं?

इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि अफगानिस्तान में तालिबानी सत्ता का असर घाटी में अशांति के रूप में उभर सकता है. तालिबान के प्रवक्ता सुहैल शाहीन ने पिछले महीने मीडिया से खुले तौर पर कहा भी था कि एक मुसलमान के तौर पर, भारत के कश्मीर में या किसी और देश में मुस्लिमों के लिए आवाज उठाने का अधिकार हमारे पास भी है. हम आवाज उठाएंगे. शाहीन के इस बयान को सीधे तौर पर भले ही आप घाटी की ताजा हिंसा से जोड़कर न देखें, लेकिन तालिबानी सत्ता से घाटी में मौजूद कट्टरपंथियों की जमात को नैतिक बल तो मिला ही है. कहें तो डबल इंजन की ताकत के तौर पर पाकिस्तान और अफगानिस्तान में तालिबान की सत्ता से इस्लामिक कट्टरपंथियों का मनोबल आने वाले वक्त में निश्चित रूप से घाटी और भारत के लिए मुश्किलें पैदा करेगा. इसमें उस चीन की चाल को भी अनदेखा नहीं कर सकते जो भारत को अपना दुश्मन नंबर वन मानता है और तालिबान की सत्ता को समर्थन करता है. पाकिस्तान को अपना समर्थन देता है और मसूद अजहर जैसे आतंकवादी को ग्लोबल टेरेरिस्ट बनने से बचाने की हर संभव कोशिश करता है. भारतीय सुरक्षा अधिकारियों का कहना है कि हाल की हत्याओं को द रेसिस्टेंस फ्रंट ने अंजाम दिया है. टीआरएफ दरअसल पाकिस्तानी आतंकवादी संगठन लश्कर-ए-तैयबा और हिजबुल मुजाहिदीन का ही एक मोर्चा है जिसे स्थानीय लड़ाकों की मदद के लिए बनाया गया है. गौर करने वाली बात यह भी है कि यह कश्मीर के अगस्त 2019 के पुनर्गठन की पृष्टभूमि से उभरा है जिसमें बड़े पैमाने पर विरोध की आशंका को देखते हुए सरकार ने घाटी में संचार सुविधा और किसी भी तरह के आंदोलन पर प्रतिबंध लगाकर लोगों को कई महीनों तक घर के अंदर रहने को मजबूर किया था.

अर्थव्यवस्था बिगाड़ने और संपत्ति हड़पने का खेल

ताजा आतंकी हमलों से पूरी घाटी में खौफ का माहौल है। इसके पीछे कश्मीर की अर्थव्यवस्था बिगाड़ने और कश्मीरी पंडितों की संपत्ति हड़पने से संबंधित तथ्य भी उभरकर सामने आ रहे हैं. कश्मीरी पंडित और बाहरी मजदूरों का पलायन शुरू हो गया है. कश्मीर में 80 प्रतिशत कुशल और अर्धकुशल मजदूर बाहरी हैं जो उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, बंगाल, राजस्थान आदि राज्यों से आते हैं. अगर इनका पलायन नहीं रूका तो तमाम डेवलपमेंट प्रोजेक्ट थम जाएंगे. जम्मू-कश्मीर की ग्रॉस स्टेट डोमेस्टिक प्रोडक्शन में बागवानी की हिस्सेदारी करीब 7 प्रतिशत है. घाटी में 3.38 लाख हेक्टेयर भूमि पर फल का उत्पादन होता है. इनमें से 1.62 लाख हेक्टेयर भूमि पर सेब उगाया जाता है. कश्मीर की मुख्य फसल सेब की कटाई का यह पीक सीजन है। हालात इस कदर बदतर हो रहे हैं कि सेब तोड़ने के लिए मजदूरों का संकट पैदा हो गया है. करीब 7 लाख लोग इस क्षेत्र से प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष तौर से जुड़े हैं. लिहाजा हालात नहीं सुधरे तो यह कश्मीर की अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान में ले जाएगा. अर्थव्यवस्था की बुनियाद पर ही कश्मीर के विकास और शांति की स्थापना का संकल्प आगे बढ़ेगा. लिहाजा सरकार को इस दिशा में जल्द ठोस पहल करनी होगी. 

जहां तक कश्मीरी पंडितों से उनकी संपत्ति हड़पने का मामला है तो आपको 90 के दशक की परिस्थितियों को समझना होगा. दरअसल, तब कश्मीरी पंडितों के खिलाफ जो बड़े पैमाने पर हिंसा और उनकी हत्याएं हुईं थीं तो अपनी जान बचाने के लिए वो लोग घर छोड़कर अपने परिवारों के साथ घाटी से पलायन कर गए थे. कई सालों तक उन्हें देश के अलग-अलग हिस्सों में बतौर शरणार्थी रहना पड़ा. इस दौरान पलायन कर चुके लोगों ने अपने पीछे जो घर और संपत्ति घाटी में छोड़ दी थी उन पर स्थानीय लोगों ने कब्जा जमा लिया. अगर उस संपत्ति का कोई वारिश आया तो उसे औने-पौने दाम में खरीद लिया. साल 1997 में राज्य सरकार विपत्ति में अचल संपत्ति बेचने और खरीदने के खिलाफ कानून लेकर आई. जानकारों का कहना है कि कानून के बावजूद औने-पौने दाम में संपत्ति बिकती रहीं. सरकार की ओर से ये स्पष्ट नहीं किया गया कि किस रेट पर जमीन वापस दिलाई जाएगी. क्या वापसी उस समय की कीमत के हिसाब से होगी या फिर अभी के बाजार भाव के हिसाब से. सरकार की ओर से ये भी स्पष्ट नहीं किया गया है कि संपत्ति वापस लेने वालों को सरकार सुरक्षा मुहैया कराएगी या नहीं. अब जबकि अनुच्छेद 370 को रद्द कर दिया गया है, स्थानीय लोगों को यह भय सताने लगा है कि सरकार 1997 के कानून की खामियों को दूर कर कश्मीरी पंडितों की उनकी जमीन उन्हें वापस दिला सकती है. इस तथ्य से घाटी में मौजूद कट्टरपंथी ताकतें भी अनभिज्ञ नहीं हैं और स्थानीय लोगों में अपनी पैठ जमाने के लिए माहौल को बिगाड़ने का काम कर रहे हैं. 

जिम्मेदारी से नहीं बच सकती सरकार

कहते हैं युद्ध की शुरूआत इंसान की मन:स्थिति से होती है लिहाजा वहीं से शांति की स्थापना के प्रयास भी किए जाने चाहिए. पहली बात यह है कि घाटी में इस बात की आशंका लगातार बढ़ती जा रही है कि कश्मीरी अल्पसंख्यकों को निशाना बनाने से मुसलमानों की मुश्किलें बढ़ेंगी. यहां करीब 7 लाख सैनिकों की मौजूदगी कश्मीरियों को डराती हैं. उनका दिल और दिमाग इस बात को लेकर आशंकित है कि देर-सबेर केंद्र सरकार यहां कोई बड़ी कार्रवाई कर सकती है. घाटी में हिंसा का इतिहास बताता है कि साल 1989 से लेकर अब तक करीब 40 हजार से अधिक लोगों की जानें जा चुकी हैं. 2019 से पहले तक सरकारें ये कहकर खुद को बचाती रहीं कि कश्मीर में जो कुछ हो रहा है वह पाकिस्तान प्रायोजित है. लेकिन अगस्त 2019 में नई दिल्ली द्वारा संविधान के अनुच्छेद 370 को समाप्त करने, इस क्षेत्र की स्वायत्तता को समाप्त करने और जम्मू कश्मीर के राज्य का दर्जा खत्म करने के बाद सरकार ये कहकर नहीं बच सकती कि ये हमला पाकिस्तान प्रायोजित है। दो साल का वक्त गुजर चुका है और हालात जस के तस बने हैं. अनुच्छेद 370 हटाने के पीछे सोच थी कश्मीर के विकास की, आतंकी घटनाओं से निजात दिलाने की, आर्थिक हालात सुधारने की, घाटी के लोगों में भरोसा कायम करने की कि सरकार और सेना मिलकर उनकी हर मुश्किलों को दूर करेगी. कहने का मतलब यह कि घाटी में शांति कायम करने को लेकर जो इच्छाशक्ति सरकार में होनी चाहिए, कहीं न कहीं उसमें चूक हुई है, जो इस तरह के हालात पैदा हुए हैं. कुछ नहीं तो मोदी सत्ता अपने नेता अटल बिहारी वाजपेयी की कश्मीर नीति पर अमल कर लेती जिसमें उन्होंने कश्मीर के लोगों को आश्वस्त करते हुए कहा था कि सभी मुद्दों को हम इंसानियत (मानवतावाद), जम्हूरियत (लोकतंत्र) और कश्मीरियत (कश्मीर की हिंदू-मुस्लिम सद्भाव) सिद्धांतों से हल करना चाहते है. अनुच्छेद 370 को रद्द करने के बाद घाटी में शांति कायम करने का इससे बेहतर तरीका और कोई हो नहीं सकता. हालात इस ओर भी इंगित करते हैं कि परिसीमन आयोग को समाप्त करने, विधानसभा चुनाव करवाने और कश्मीर को पूर्ण राज्य का दर्जा बहाल करने में जितना विलंब होगा, सुरक्षा और राजनीतिक दोनों ही दृष्टि से खतरा बढ़ता ही जाएगा.

बहरहाल, हालात ने एक ट्रेंगल का आकार ले लिया है. सीमा पार से इस तरह की खबरें आ रही हैं कि कश्मीर में आतंकियों ने 200 गैर मुस्लिमों की हत्या का टारगेट तय किया है. कश्मीरी पंडितों और गैर-मुस्लिमों पर हमले करने की बड़ी साजिश पाक अधिकृत कश्मीर में रची जा रही है. दूसरी तरफ विपक्षी दल यह कहने से नहीं चूक रहे कि कश्मीर राजनीति का अखाड़ा बन गया है जहां पर कई पहलवान मौजूद हैं. इस अखाड़े में पाकिस्तान, चीन के साथ-साथ हमारी एजेसियां भी आकर खेलती हैं. किसी को पंजाब में वोट बैंक की राजनीति करनी है तो किसी को उत्तर प्रदेश चुनाव में कश्मीर के नाम पर ध्रुवीकरण की राजनीति करनी है. तीसरे मुहाने पर कश्मीर की जनता खड़ी है जिनके सामने अपने राजनीतिक वजूद, आर्थिक हालात और अपनी पहचान को बनाए रखने की चुनौती है. ये लोग अनुच्छेद 370 के हटाने को इस रूप में देखते हैं कि उनकी पहचान उनसे छीन ली गई है. जम्मू कश्मीर के जिन हिन्दू बहुल इलाकों में 370 के खात्मे का स्वागत किया गया था, आज ये लोग नाखुश है. ऐसे में हालात से निपटने के लिए केंद्र सरकार को जितनी जल्दी हो सके, ठोस कार्ययोजना के साथ सामने आना होगा. वरना अनुच्छेद 370 को रद्द करने का ऐतिहासिक फैसला फिसलता चला जाएगा. 

(21 अक्टूबर 2021 को https://www.tv9hindi.com में प्रकाशित)
https://www.tv9hindi.com/opinion/new-round-of-violence-in-kashmir-is-it-terror-of-double-engine-of-pakistan-and-taliban-881586.html

Tuesday, 19 October 2021

कुरान की बेअदबी तो बहाना है, हिन्दुओं की संपत्ति कब्जाना है


सोशल मीडिया पर कुरान की बेअदबी की अफवाह के बाद कट्टरपंथियों की भीड़ बांग्लादेश में अल्पसंख्यक हिन्दुओं पर लगातार हमले कर रही है, हिन्दू धार्मिक स्थलों, देवी-देवताओं की मूर्तियों को निशाना बना रही है और उनके घरों को आग के हवाले कर रही है. कोमिल्ला जिले से शुरू हुई हमलों की यह आग अब नोआखाली और राजधानी ढाका तक फैल चुकी है. वही नोआखाली जहां 7 नवंबर 1946 को सांप्रदायिकता की आग बुझाने के लिए महात्मा गांधी को जाना पड़ा था. वही ढाका जिसका नाम बांग्लादेश के सबसे बड़े ढाकेश्वरी मंदिर के नाम पर रखा गया था.

इतिहास के पन्नों को पलटकर देखें तो बांग्लादेश में अल्पसंख्यक हिन्दुओं पर हमले का इतिहास कोई नया नहीं है। भारत में बाबरी मस्जिद विध्वंस से पहले 29 अक्टूबर 1990 को बांग्लादेश में राजनीतिक संगठन जमात-ए-इस्लामी ने बाबरी मस्जिद को गिराए जाने की अफवाह फैला दी थी. इसके चलते 30 अक्टूबर को भड़की हिंसा में कई हिन्दू मारे गए थे. साल 2001 में बीएनपी-जमात गठबंधन की जीत के बाद हिन्दुओं के खिलाफ हिंसा हुई थी. 2004 की अंतरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता रिपोर्ट के अनुसार, 2001 के चुनाव के बाद चटगांव में एक ही हिन्दू परिवार के 11 सदस्यों को जिंदा जला दिया गया था. लेकिन अब जबकि बांग्लादेश में शेख हसीना की सत्ता है, एक पंथनिरपेक्ष सत्ता तो ऐसे में हिन्दुओं पर हमले की घटनाएं लगातार क्यों हो रही हैं?

कट्टरपंथियों को पसंद नहीं हसीना का भारत प्रेम 

मीडिया रिपोर्ट्स में ये बात सामने आ रही है कि हमले की ताजा घटनाओं में प्रदर्शनकारी भारत विरोधी नारे लगा रहे हैं, साथ ही शेख हसीना को यह संदेश भी दे रहे हैं कि वो नई दिल्ली से अपनी नजदीकियां खत्म करें. दरअसल, बांग्लादेश में कई इस्लामिक कट्टरपंथी धड़े हैं जो शेख हसीना की सरकार से खफा रहते हैं. पिछले साल की ही तो बात है जब बांग्लादेश के कट्टरपंथी इस्लामिक संगठन हजरत-ए-इस्लाम के चीफ जुनैद बाबूनगरी ने कहा था कि हम देश की सभी मूर्तियों को गिरा देंगे और कोई मायने नहीं रखता है कि कौन सी मूर्ति किसकी है. यहां तक कि बंगबंधु शेख मुजीब-उर-रहमान की 100वीं जयंती पर उनकी मूर्ति लगाने तक का विरोध जुनैद ने किया था. तो पहली बात तो यही है कि शेख हसीना की भारत के साथ दोस्ताना संबंध इन कट्टरपंथी संगठनों को मंजूर नहीं है. ऐसे संगठन बांग्लादेश को पूरी तरह से इस्लामिक राष्ट्र के तौर पर देखना चाहते हैं जो शेख हसीना की सत्ता के रहते संभव नहीं है. क्योंकि शेख हसीना बांग्लादेश की आजादी में भारत के अमूल्य योगदान का जिक्र करने से कभी नहीं चूकतीं. हमले की ताजा घटनाओं के बाद भी शेख हसीना ने कहा कि बंगबंधु शेख मुजीब-उर-रहमान यही चाहते थे कि बांग्लादेश में सभी धर्मों के लोग अपने धर्म का आजादी से पालन करें. बंगबंधु ने जिस मकसद से स्वतंत्र मुल्क बनाया था, हम उसी रास्ते पर चलेंगे. शेख हसीना का यही भारत प्रेम कट्टरपंथियों को रास नहीं आ रहा है और मौका पाते ही वो हिन्दुओं और उनके मंदिरों पर हमले कर भारत- बांग्लादेश के संबंधों को खराब करने का मौका तलाशते रहते हैं.

पवित्र कुरान की बेअदबी तो एक बहाना है  

गंगा-ब्रह्मपुत्र के मुहाने पर स्थित बांग्लादेश में 9 प्रतिशत की आबादी वाले अल्पसंख्यक हिन्दूओं का एक सच ये भी है कि हाल के वर्षों में बड़ी संख्या में हिन्दुओं का यहां से पलायन हुआ है. ऐसे में कोई यह अफवाह फैलाकर हिन्दुओं पर हमला करने लगे कि उसने कुरान या पैगंबर मोहम्मद की बेअदबी की तो यह बात गले से नीचे उतरती नहीं है. दरअसल, कट्टरपंथी ताकतों को यह बात अच्छे से पता है कि हिन्दुओं ने पिछले 5000 सालों में किसी पर आक्रमण नहीं किया और न ही तलवार उठाकर किसी का धर्म परिवर्तन करवाया. जगह-जगह हिन्दुओं पर हमले इसी सोच का नतीजा है. यह पूरी तरह से बांग्लादेश से हिन्दुओं को भगाने की साजिश का एक हिस्सा है. भारत के दक्षिणपंथी नेता, पूर्व राज्यपाल और बांग्लादेश पर गहन अध्ययन करने वाले चिंतक डॉ. तथागत रॉय भी इस बारे में लगातार कहते रहे हैं कि बांग्लादेश में दो तरह के लोग हैं जो हिन्दुओं पर हमला करते हैं. एक कट्टरपंथी जो मानते हैं कि बांग्लादेश केवल मुसलमानों का देश है और दूसरा वह समूह जो बांग्लादेश में हिन्दुओं की अचल संपत्ति हथियाना चाहता है. कहने का मतलब यह कि कुरान की बेअदबी तो बहाना है, असल मकसद तो हिन्दुओं की संपत्ति को कब्जाना है. यह बांग्लादेश के अंदर की सामाजिक हकीकत है.

दक्षिण एशिया में चीन का बढ़ता प्रभुत्व

बांग्लादेश में हिन्दुओं पर हमले को अगर विस्तृत परिप्रेक्ष्य में देखें तो दक्षिण एशिया के देशों में चीन के बढ़ते प्रभाव को भी अनदेखा नहीं कर सकते. यह सर्वविदित है कि चीन भारत को दुश्मन नंबर एक मानता है. चीन लगातार इस कोशिश में जुटा है कि भारत को उसके सभी पड़ोसी देशों से अलग-थलग कर दें. यहां तक कि नेपाल और श्रीलंका को भी अपने जाल में फंसाकर उसे भारत के खिलाफ खड़ा करने में चीन काफी हद तक सफल रहा. अब बांग्लादेश को भी चीन उसी कतार में खड़ा करने की कोशिश में जुटा है. जब चीन को शेख हसीना की चाल समझ में नहीं आई तो उसने वहां के कट्टरपंथी संगठनों को साधना शुरू किया. चीन की दृष्टि साफतौर पर इसी फॉर्मूले पर काम कर रही है कि बांग्लादेश में जब हिन्दुओं पर हमले होंगे, मंदिरों पर हमले होंगे तो इसकी प्रतिक्रिया भारत में होगी. भारत-बांग्लादेश के संबंधों में खटास पैदा होगी तो बांग्लादेश का चीन से दोस्ती गांठना उसकी मजबूरी होगी. इस तरह से जब भारत के सभी पड़ोसी देशों पर चीन का शिकंजा कस जाएगा तो उसके लिए भारत को झुकाना काफी आसान हो जाएगा. 

बहरहाल, बांग्लादेश में हिन्दुओं पर हमले की जो आग लगी है उसे समय रहते बुझाना जरूरी है. बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना ने कहा भी है कि इस मामले में किसी को भी बख्शा नहीं जाएगा. इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि वे किस धर्म के हैं. साथ ही भारत से भी गुजारिश की है कि इस मसले पर वहां शांति कायम रखी जाए. अगर भारत में कुछ होता है तो बांग्लादेश के हिन्दू प्रभावित होते हैं. लिहाजा अब भारत और बांग्लादेश को मिलकर वक्त रहते इसका स्थायी समाधान तलाशना जरूरी है, नहीं तो आतंकवादी संगठन और चीन जैसी साम्राज्यवादी ताकतें इसका फायदा उठाने से चूकेंगे नहीं.

(18 अक्टूबर 2021 को https://www.tv9hindi.com में प्रकाशित) 
https://www.tv9hindi.com/opinion/attacks-on-hindus-in-bangladesh-the-disrespect-of-quran-is-an-excuse-876431.html

Friday, 15 October 2021

जब बुझने लगा सामाजिक न्याय का दीया तो मचने लगा ये शोर


भारत की सामाजिक और राजनीति व्यवस्था में यह नारा सदियों से लगता रहा है, 'जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी'. यहीं से शुरू होती है सामाजिक न्याय की लड़ाई. और अब जबकि ये लड़ाई राजनीतिक दलों को कमजोर होती दिखने लगी है, वोट बैंक खिसकने का खतरा मंडराने लगा है, सामाजिक न्याय का दीया बुझने का अहसास होने लगा है तो उसे ठोस आधार प्रदान करने के लिए जातीय जनगणना का शोर मचाया जाने लगा है. जातीय जनगणना कराने की मांग करने वाले नेताओं को ऐसा लगता है कि अन्य पिछड़ी जातियों यानी ओबीसी की श्रेणी में आबादी बढ़ी है, जिसका फायदा उन्हें जातीय जनगणना के आंकड़ों से मिल सकता है. शायद इसीलिए बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने इस बात को जोर-शोर से उठाना शुरू कर दिया है कि जातीय जनगणना कराना बहुत जरूरी है. सामाजिक न्याय और जातीय जनगणना की बात जब उठती है तो एक साथ कई सवाल भी उभरते हैं. पहला सवाल ये कि सामाजिक न्याय का दीया बुझने क्यों लगा है? और दूसरा, जातीय जनगणना कराने से मोदी सत्ता बच क्यों रही है? लेकिन इन सवालों की पड़ताल से पहले जातीय जनगणना के ऐतिहासिक तथ्यों को जान लेना जरूरी है.

जातीय जनगणना के ऐतिहासिक तथ्य

सामाजिक आबादी के बारे में जानकारी देना, उसका विश्लेषण करना और भारत जैसे लोक कल्याणकारी राज्य में यह पता लगाना कि लोगों की पहुंच का स्तर क्या है, यह न केवल समाज विज्ञानियों के लिए बल्कि देश व दुनिया के नीति निर्माताओं और सरकार के लिए भी काफी अहम होता है. देश में पहली बार 1881 में जनगणना कराई गई थी. तब यहां अंग्रेजों का राज हुआ करता था. तब भी जातीय जनगणना के आंकड़े जारी किए गए थे. 1931 तक की जनगणना में जातीय आंकड़े भी जारी किए जाते रहे. पहली बार 1941 की जनगणना में ऐसा हुआ कि जातीय आंकड़े जुटाए तो गए, लेकिन उसे जारी नहीं किया गया. आजादी के बाद पहली बार 1951 में जनगणना हुई. तब से लेकर अब तक सात बार की जनगणना में सिर्फ अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के आंकड़े ही प्रकाशित किए गए. वीपी सिंह की सरकार ने जिस मंडल कमीशन की सिफारिशों को लागू कर पिछड़ों को आरक्षण दिया, उसने भी 1931 की जनगणना को आधार मानकर ही ओबीसी की आबादी 52 प्रतिशत मानी थी.

क्यों बुझने लगा है सामाजिक न्याय का दीया?

जब हम सामाजिक न्याय की बात करते हैं तो सबसे पहले ये ख्याल आता है कि सभी मनुष्य समान हैं, लिहाजा सभी को समान अवसर मिलना चाहिए. इससे आगे बढ़ते हैं तो ये भी महसूस होता है कि किसी के साथ सामाजिक, धार्मिक, लैंगिक, भाषा, नस्ल आदि के आधार पर भेदभाव नहीं होना चाहिए. वक्त के साथ सामाजिक न्याय की अवधारणा में कई नए आयाम जुड़े. 50 और 60 के दशक को याद करें तो समाजवादी नेता व चिंतक राममनोहर लोहिया ने तब इस बात पर जोर दिया था कि पिछड़ों, दलितों, अल्पसंख्यकों और स्त्रियों को एकजुट होकर सामाजिक न्याय के लिए संघर्ष करना चाहिए. लोहिया चाहते थे कि ये समूह एकजुट होकर सत्ता और नौकरियों में ऊंची जातियों के एकाधिकार को चुनौती दें. लोहिया के विचारों की इसी पृष्ठभूमि में आपातकाल के बाद के राजनीतिक कालखंड में सामाजिक न्याय भारतीय राजनीति का एक प्रमुख नारा बना भी. खासतौर से 90 के दशक में उन जातियों का वर्चस्व राजनीति में भी स्थापित हुआ जिनकी बात लोहिया ने की थी. लेकिन जिस अरमान से जनता ने लालू, मुलायम, मायावती जैसे नेताओं को सत्ता के शिखर पर पहुंचाया, लोहिया के मानकों पर खड़े नहीं उतरे. उसकी बड़ी वजह यह रही कि ये नेता परिवारवाद और भाई-भतीजावाद में इस कदर फंस गए कि शासन की नीति के तौर पर जो काम इन्हें करने चाहिए थे वो वक्त रहते कर नहीं पाए. इनके लिए सामाजिक न्याय का नारा महज चुनावी नारा बनकर रह गया. चुनाव जीतने के बाद उन्होंने पलटकर नहीं देखा कि उनके लोग किस हाल में हैं. वक्त बदला, उसके साथ राजनीतिक व सामाजिक परिस्थितियां भी बदलीं. मौका पाकर भाजपा ने राजनीति की दिशा ही बदल दी. धर्म के आधार पर वोटों का ध्रुवीकरण और सरकारी कंपनियों का निजीकरण देश को उस मुहाने पर लाकर खड़ा कर दिया जहां नौकरियों में आरक्षण के मायने खत्म होने को हैं. जाति से इतर पूरे देश को 85 प्रतिशत बनाम 15 प्रतिशत में बांट दिया गया. 85 प्रतिशत आबादी जो एक तरह से मजदूरों की श्रेणी में आती हैं उनको जीने भर की चीजें तथाकथित तौर पर मुफ्त में बांटी जा रही है. ऐसे में सामाजिक न्याय का शब्द बेमानी हो गया. जाहिर सी बात है, जब देश में सरकारी कंपनियां बचेंगी ही नहीं तो सरकारी नौकरियों में आरक्षण का मतलब क्या रह जाएगा. जब सभी शिक्षण संस्थान प्राइवेट हाथों में चले जाएंगे तो दाखिले में मिलने वाले आरक्षण के क्या मायने रह जाएंगे. जब यह सब नहीं होगा तो सामाजिक न्याय का दीया कब तक जलेगा और उसके नाम पर राजनीति करने वाले नेताओं की सत्ता कब तक बचेगी?         

जातीय जनगणना से क्यों बच रही मोदी सत्ता?

मंत्रिमंडल विस्तार के बाद जो मोदी सरकार खुद को ओबीसी मंत्रियों की सरकार कहते नहीं थक रही, जो मोदी सत्ता नीट परीक्षा के ऑल इंडिया कोटे में ओबीसी आरक्षण देने पर खुद अपनी पीठ थपथपा रही हो, वही सत्ता जातीय जनगणना के विचार से क्यों डर रही है? यह अपने आप में बड़ा सवाल है. दरअसल, जनगणना खुद में एक बेहद जटिल कार्य है और इसमें कोई भी चीज जब दर्ज हो जाती है, तो उसी से राजनीति भी जन्म लेती है, विकास के नए आयाम भी उसी से निर्धारित होते हैं. इस वजह से कोई भी सरकार बहुत सोच-समझ कर फैसला लेती है. अंग्रेज़ों की ओर से जनगणना लागू करने के पहले जाति व्यवस्था बेहद लचीली और गतिशील हुआ करती थी. लेकिन जब अंग्रेज जातिगत जनगणना लेकर आए तो सब कुछ रिकॉर्ड में दर्ज हो गया और इसके बाद से जाति व्यवस्था बेहद जटिल हो गई. 

याद करें तो 1931 के बाद से जातीय जनगणना नहीं हुई, बावजूद इसके जाति के नाम पर राजनीति अब भी हो रही है. हालांकि अभी जो राजनीति हो रही है, उसका कोई ठोस आधार नहीं है, उसे कानूनी तौर पर चुनौती दी जा सकती है. लेकिन अगर एक बार जनगणना में सब दर्ज हो गया तो वह एक आधार बन जाएगा. और इसके लिए जिस तरह के सत्ता संतुलन की जरूरत होती है वह सत्ताधारी दलों के लिए चुनौती जैसी होती है. दूसरी तरफ इसके नकारात्मक पहलू को परखें तो अगर जातियों की संख्या एक बार पता चल जाए और उस हिसाब से हिस्सेदारी दी जाने लगी तो कम संख्या वाली जातियों का क्या होगा? उनके बारे में कौन सोचेगा? एक दूसरा डर भी है. ओबीसी की सूची केंद्र की अलग है और राज्यों में अलग है. कुछ जातियां ऐसी हैं जिनकी राज्यों में गिनती ओबीसी में होती है, लेकिन केंद्र की सूची में उनकी गिनती ओबीसी में होती ही नहीं है. ऐसे में जातीय जनगणना हुई तो बवाल होना तय है. केंद्र की मोदी सत्ता इस बात को अच्छे से समझती है. लिहाजा वह सुप्रीम कोर्ट में भी कह चुकी है कि केंद्र सरकार 2021 की जनगणना में सामाजिक-आर्थिक जातिगत जनगणना नहीं करा सकती है. इसकी कई व्यवहारिक वजहें भी सरकार के तरफ से गिनाई गई हैं. 

भाजपा नीत मोदी सत्ता जातीय जनगणना से इसलिए भी बच रही है क्यों कि उसे यह डर सता रहा है कि अगर ऐसा हुआ तो क्षेत्रीय दलों को केंद्र सरकार की नौकरियों और शिक्षण संस्थाओं में ओबीसी कोटे में बदलाव के लिए सरकार पर दबाव बनाने का मुद्दा मिल जाएगा, बहुत हद तक संभव है कि ओबीसी की संख्या उन्हें केंद्र की नौकरियों में मिल रहे मौजूदा आरक्षण से कहीं अधिक हो जाए. इससे मंडल पार्ट-2 जैसी स्थिति उत्पन्न हो सकती है और भाजपा को चुनौती देने का एजेंडा तलाश रहीं क्षेत्रीय राजनीतिक दलों को नया हथियार मिल सकता है जिसे बहुत हद तक भाजपा तोड़ चुकी है. कहने का मतलब यह कि सामाजिक न्याय का जो दीया बुझ रहा है उसे जातीय जनगणना से संजीवनी मिल सकती है.

राष्ट्रीय दल भी साधते रहे हैं अपना हित

ऐसा कहा जाता है कि देश की राष्ट्रीय पार्टियां जातीय जनगणना के खिलाफ हैं, लेकिन याद करें तो 2011 की जनगणना से ठीक पहले 2010 में तत्कालीन भाजपा नेता गोपीनाथ मुंडे ने संसद में कहा था कि अगर इस बार भी जनगणना में ओबीसी की गणना नहीं की गई तो ओबीसी को सामाजिक न्याय देने के लिए और 10 साल लग जाएंगे. हम उनके साथ अन्याय करेंगे. इतना ही नहीं, मोदी सरकार के पिछले कार्यकाल में जब राजनाथ सिंह गृह मंत्री थे, 2021 की जनगणना तैयारियों का जायजा लेते समय 2018 की एक प्रेस विज्ञप्ति में सरकार ने माना था कि नई जनगणना में ओबीसी का आंकड़ा जुटाया जाएगा. लेकिन अब सरकार अपने वादे से मुकर रही है. कांग्रेस की बात करें तो भले ही लालू यादव और मुलायम सिंह यादव के दबाव में 2011 की जनगणना में सोशियो इकोनॉमिक कास्ट सेंसस आधारित डेटा जुटाया गया था. लेकिन सत्ता बदल जाने के बाद साल 2016 में मोदी सरकार ने इसके जो आंकड़े प्रकाशित किए उसमें जातीय आंकड़ों को छिपा लिया गया. ये आंकड़े आज भी सामाजिक कल्याण मंत्रालय की फाइलों में दबा पड़ा है.

बहरहाल, जातीय जनगणना एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन चुका है. केंद्र सरकार ने बड़े ही शालीन तरीके से अपनी आपत्ति जताते हुए गेंद राज्य सरकारों के पाले में डाल दिया है. लेकिन इस सच को कोई झुठला नहीं सकता कि जाति की वजह से आए विशेषाधिकारों को खत्म करके ही हम जातिविहीन समाज की स्थापना कर सकेंगे, जहां सभी एक-समान होंगे. और इन विशेषाधिकारों को खत्म करने के लिए सामाजिक-आर्थिक स्थिति के आधार पर गणना करनी ही होगी, जातीय जनगणना के आंकड़ों का सामने लाना ही होगा. सामाजिक न्याय का मूल सिद्धांत भी इसी बुनियाद पर टिका है. और अगर बुनियाद हिली तो न्यू इंडिया और भारतीय समाज को एक नए संकट से जूझना पड़ेगा. और तब सभी राजनीतिक दलों को अपनी साख और सत्ता बचानी मुश्किल हो जाएगी.

(14 अक्टूबर 2021 को https://www.tv9hindi.com में प्रकाशित) 
https://www.tv9hindi.com/opinion/why-is-the-political-noise-of-caste-census-rising-is-social-justice-weakening-869287.html

Tuesday, 12 October 2021

क्या वाकई नवीन पटनायक वाली बीजेडी की जमीन दरक रही है?


बड़ी पुरानी कहावत है- अब पछताए होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत. क्या ये कहावत ओडिशा में बीजेडी यानी बीजू जनता दल और लगातार पांच बार के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक की राजनीतिक परिस्थिति पर फिट बैठ रही है? क्या यह बात सच है कि कांग्रेस मुक्त भारत अभियान में भाजपा का साथ देकर नवीन पटनायक की बीजेडी इस तरह से फंस गई है कि अब उसे सेफ्रॉन पॉलिटिक्स से ही हार का डर सताने लगा है? आज इन सवालों के जवाब तलाशने इसलिए जरूरी हो गए हैं क्योंकि ओडिशा के कुहरते जमीनी विकास पर तमाम राजनीतिक दल अपने-अपने तरीके से अपनी-अपनी इमारतें बुलंद करने में जुटे पड़े हैं.

याद कीजिए वो वक्त जब 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले नरेंद्र मोदी ने 'कांग्रेस मुक्त भारत' का नारा दिया था. तब ओडिशा की बीजेडी सहित कई गैर कांग्रेसी दलों ने तहे दिल से इस नारे की तख्ती को अपने गले में लटकाने में देरी नहीं की थी, क्योंकि ये लोग देश की सबसे पुरानी पार्टी को अपना मुख्य प्रतिद्वंद्वी मान बैठी थीं. हालांकि नवीन पटनायक की अगुवाई वाली बीजेडी पहले ही भाजपा से हाथ मिलाकर एनडीए का हिस्सा बन गई थी ताकि कांग्रेस को सत्ता से दूर रख सके. बीजेडी-भाजपा ने 2000 से 2009 तक ओडिशा में गठबंधन सरकार चलाई, लेकिन यह भी सच है कि नवीन पटनायक को जब यह बात समझ में आ गई कि सत्ता के लिए इस तरह की गलबहियां एक दिन बीजेडी को सत्ता से बाहर कर देगी, दोनों के बीच की राजनीतिक अंतरंगता सीट शेयरिंग के मुद्दे पर टूट गई और दोनों की राहें जुदा-जुदा हो गईं. गैर-कांग्रेसी मुहिम में शामिल होने के 20 साल बाद अब जब कि बीजेडी ने कांग्रेस को जमीनी तौर पर उखाड़ फेंका है, अब वह खुद को मुश्किल परिस्थिति में देख रही है, क्योंकि भाजपा लगातार मुख्य प्रतिद्वंद्वी के तौर पर उभर रही है. बीजेडी के नेता यह अहसास करने लगे हैं कि ओडिशा को 'कांग्रेस मुक्त' करने से क्षेत्रीय दल बीजेडी को उतना फायदा नहीं हुआ, जितना भाजपा को उभरने का मौका मिला.

भाजपा यहां आदिवासी, दलित, ओबीसी का अधिकतर वोट चुनावों में हासिल करने लगी है जो कभी कांग्रेस का वोट बैंक हुआ करता था. भाजपा की हिन्दुत्व नीति भी ओडिशा में उसके प्रसार के लिए काफी अहम है. लेकिन नवीन पटनायक भाजपा की इस चाल को काफी अच्छे से समझते हैं. शायद इसी का असर है कि धर्म और भाषा की राजनीति से हमेशा दूरी बनाकर चलने वाले नवीन पटनायक अब अपने पिता बीजू पटनायक की तर्ज पर चुनाव प्रचार का शुभारंभ और जीत के बाद जगन्नाथ मंदिर जाने लगे हैं. 2019 के बाद से पटनायक धार्मिक मुद्दों पर ध्यान केंद्रित कर उड़िया भाषा और संस्कृति को ध्यान में रखकर नीतियां बनाने लगे हैं, ताकि भाजपा का मुकाबला किया जा सके. सत्ता के गलियारों में इस बात को लेकर खूब कानाफूसी हो रही है कि अपने 5वें कार्यकाल में नवीन पटनायक ने सॉफ्ट हिंदुत्व की राह पकड़ ली है.

16 अक्टूबर 2021 को नवीन पटनायक 75 साल के हो जाएंगे। वर्ष 2000 से वह ओडिशा के मुख्यमंत्री हैं. निश्चित रूप से भाजपा 2024 के विधानसभा चुनाव में इस मुद्दे को उछालेगी कि जिस सूबे में लगातार पांच बार एक ही शख्स मुख्यमंत्री रहा हो और एक क्षेत्रीय दल बीजेडी की मजबूत सरकार रही हो वह सूबा विकास के नक्शे पर इतना पिछड़ा क्यों है? कोरापुट, बोलांगीर, नुआपाड़ा, नबरंगपुर, मलकानगिरी, कालाहांडी की गिनती सबसे गरीब जिलों में क्यों होती है? अब यहां बड़ा सवाल यह उठता है कि जिस शख्स की राजनीतिक जमीन इतनी मजबूत हो, चुनाव में विकास का मुद्दा कितना प्रभाव छोड़ेगा? इसमें कोई शक नहीं कि भाजपा में मोदी युग की बात करें तो 2014 और 2019 के विधानसभा और लोकसभा चुनाव में मिली सीटें और वोट प्रतिशत इस बात की तस्दीक करते हैं कि वह कछुए की चाल चलकर बीजेडी की मुख्य प्रतिद्वंद्वी बनकर खड़ी हो गई है. कांग्रेस यहां तीसरे नंबर की पार्टी बन गई है. 2014 में 147 सीटों वाली विधानसभा चुनाव में बीजू जनता दल ने 43.40 प्रतिशत वोट पाकर 117 सीटें जीती थी वहीं कांग्रेस पार्टी ने 25.70 प्रतिशत वोट हासिल कर 16 और 18 प्रतिशत वोट हासिल कर भाजपा ने 10 सीटों पर जीत दर्ज की थी। 2019 के विधानसभा चुनाव की बात करें तो बीजेडी का वोट प्रतिशत बढ़कर 44.71 प्रतिशत जरूर हो गया लेकिन सीटों की संख्या घटकर 112 रह गई. वहीं भाजपा 32.49 प्रतिशत वोट के साथ 23 सीटों पर जीत दर्ज की और कांग्रेस 16.12 प्रतिशत वोट के साथ 9 सीटें जीतकर तीसरे नंबर की पार्टी बन गई. 

लोकसभा में 21 सीटों की बात करें तो 2014 के मोदी लहर में 20 सीटों पर जीत दर्ज करने वाली बीजेडी 2019 में 8 सीटें गंवाकर 12 सीटों पर सिमट गई. दूसरी तरफ 2014 में भाजपा ने जहां एक सीट जीती थी वहीं 2019 में 8 सीटों पर जीत दर्ज कर यह जताने में कोई कसर नहीं छोड़ी कि आने वाले वक्त में भाजपा बीजेडी को कड़ी चुनौती देने वाली है. हाल ही में पिपिली विधानसभा उपचुनाव में भी नवीन पटनायक की पार्टी महज 20,916 वोट से ही जीतने में कामयाब रही. भाजपा को यहां 42 फीसदी वोट मिले, जबकि बीजेडी को 53.80 फीसदी वोट मिले. अब सबकी नजर 2022 में राज्य में त्रिस्तरीय पंचायत और निकाय चुनाव पर लगी है. राजनीतिक पंडितों का साफ मानना है कि आगामी सभी चुनावों में नवीन पटनायक की पार्टी को भगवा दल से कड़ी चुनौती का सामना करना पड़ेगा. लोकल बॉडी चुनाव से यह भी पता चल जाएगा कि 2024 लोकसभा चुनाव में हवा किस ओर बहने वाली है. इन चुनावों के आंकड़ों पर भी गौर करें तो 2012 में जिस भाजपा के जिला परिषद सदस्यों की संख्या 36 थी, 2017 में बढ़कर 297 हो गई. ऐसे में यह सवाल यह लाजिमी है कि लगातार 21 साल से सत्ता में रहने के बाद भी क्या नवीन पटनायक की बीजेडी के लिए सचमुच चुनाव जीतना पहले की तरह ही आसान होगा या उन्हें एंटी-इंकम्बेंसी का खामियाजा भुगतना पड़ेगा?

हालांकि निकट भविष्य में नवीन पटनायक को एंटी-इंकम्बेंसी का खामियाज़ा भुगतने के सवाल को सिरे से खारिज करने वाले जानकारों का साफ कहना है कि आज भी ओडिशा में नवीन पटनायक के भाषण पर पत्थर नहीं, बल्कि तालियां गूंजती हैं. बावजूद इसके कि पूरे देश में वह अकेले ऐसे मुख्यमंत्री हैं जो अपने राज्य की भाषा उड़िया न तो बोल पाते हैं और न ही पढ़-लिख सकते हैं. लोग उन्हें लगातार पांच बार जिता चुके हैं और हर बार पहले के मुकाबले अधिक मतों से. नवीन पटनायक को करीब से देखने व समझने वाले पत्रकार धड़ल्ले से इस बात का उल्लेख करते हैं कि नवीन पटनायक से बड़ा सॉफ्ट और कम बोलने वाला शख्स राजनीति में है ही नहीं. नवीन पटनायक के जीवन के पिछले पन्नों को पलटेंगे तो शुरुआती पांच दशक तक उन्होंने राजनीति की तरफ आंख उठाकर देखा तक नहीं. लेकिन जब उन्होंने एंट्री ली तो खासतौर पर ओडिशा में उनकी टक्कर का कोई राजनेता दिखाई ही नहीं देता। इसलिए विकास के मुद्दे पर ओडिशा में हार जीत का फैसला मुश्किल ही लगता है.

दूसरी नवीन पटनायक की छवि भी ओडिशा में बीजेडी की जीत के पीछे बड़ी वजह मानी जाती है. इसकी पुष्टि नवीन पटनायक की जीवनी लिखने वाले रूबेन बैनर्जी की उस बात से होती है जिसमें वो कहते हैं कि एक बार उन्हें 1998 में अस्का संसदीय क्षेत्र से नवीन पटनायक का चुनाव कवर करने का मौका मिला था. जब वो अस्का पहुंचे तो उन्हें नवीन पटनायक कहीं नहीं दिखाई दिए. बड़ी मुश्किल से खोजते-खोजते जब वो ओबरॉय गोपालपुर होटल पहुंचे तो उन्होंने देखा कि खबरों की दुनिया से बेखबर पूल के बगल में बैठे नवीन पटनायक सिगरेट पी रहे हैं. मकसद बताने के बाद नवीन पटनायक इस बात के लिए तैयार तो हो गए कि वह उनके साथ चुनाव प्रचार पर जाएंगे लेकिन साथ में दो शर्तें लगा दीं. पहली ये कि वो अपनी रिपोर्ट में ये नहीं बताएंगे कि प्रचार के दौरान नवीन पटनायक ओबरॉय होटल में ठहरे हैं और दूसरा ये कि वो सिगरेट पीते हैं. शायद वो अपने मतदाताओं को ये संदेश नहीं देना चाहते थे कि भारत के सबसे पिछड़े इलाके में वोट मांगने वाला शख्स एक पांच सितारा होटल में ठहरा हुआ है. राजनीति में इस तरह के अनुशासन का पालन बहुत कम राजनेता कर पाते हैं. यही वजह है कि ओडिशा की जनता नवीन पटनायक को किसी देवता से कम नहीं मानती. यहीं पर भाजपा का राजनीतिक अनुशासन मात खा जाती है. तमाम सियासी परिस्थितियां अनुकूल होते हुए भी नवीन पटनायक की टक्कर का कोई नेता नहीं होने की वजह से भाजपा को ओडिशा की सत्ता में आने के लिए उस दिन का इंतजार करना पड़ेगा जब नवीन पटनायक राजनीति से संन्यास लेने की घोषणा करेंगे.

(11 अक्टूबर 2021 को https://www.tv9hindi.com में प्रकाशित) 
https://www.tv9hindi.com/opinion/is-the-political-ground-of-naveen-patnaik-led-bjd-really-cracking-863879.html