Saturday, 27 November 2021

तो जनसंख्या नियंत्रण वाले कानूनों की जरूरत ही क्या है?


जनसंख्या नियंत्रण कानून को लेकर एक बार फिर भ्रम की स्थिति पैदा हो गई है. कानून को राष्ट्रीय स्तर पर लाया जाए या इसे टाल दिया जाए. संसद के शीतकालीन सत्र में तीन कृषि कानूनों को वापस लेने के मोदी सरकार के फैसले से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के नेताओं को भी लगने लगा है कि सरकार को जनसंख्या नियंत्रण बिल लाने से पहले सर्वसम्मति बनाने और व्यापक विचार-विमर्श का रास्ता अपनाना चाहिए. आखिर इस तरह की स्थिति क्यों पैदा हुई? दरअसल, राष्ट्रीय परिवार और स्वास्थ्य सर्वेक्षण (National Family Health Survey) के ताजा सर्वे रिपोर्ट ने जिन तथ्यों का खुलासा किया है, उसने देश के नीति-निर्माताओं को एक बार फिर यह सोचने पर विवश किया है कि भारत जैसे देश में कानून बनाकर जनसंख्या के बोझ को कम नहीं किया जा सकता. ये अलग बात है कि यह एक सर्वे है और इसमें देश के 707 जिलों के सिर्फ 650,000 परिवारों को सैंपल के तौर पर शामिल किया गया है. 130 करोड़ से अधिक की आबादी वाले देश में साढ़े छह लाख परिवारों का सैंपल बहुत मायने नहीं रखता, लेकिन इसे इंडिकेटर के तौर पर तो देखा ही जाएगा.

नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे रिपोर्ट के क्या हैं मायने?

राष्ट्रीय परिवार और स्वास्थ्य सर्वेक्षण (National Family Health Survey) में जो सबसे अहम बात निकलकर सामने आई है वो ये कि पहली बार देश में फर्टिलिटी रेट यानी प्रजनन दर 2 पर आ गई है. 2015-16 में यह 2.2 थी. मतलब पहले एक मां औसतन 2.2 बच्चे पैदा करती थी. अब वो औसतन 2 बच्चे पैदा कर रही है. इस गिरावट का सीधा मतलब ये है कि कम बच्चे पैदा हो रहे हैं. लिहाजा बिना जनसंख्या नियंत्रण कानून के ही देश जनसंख्या कम होने की दिशा में बढ़ रहा है. सर्वे के ताजा आंकड़ों में ये भी कहा गया है कि भारत में अब 1000 पुरुषों पर 1020 महिलाएं हैं. 1990 के दौर को याद करें तो हर 1000 पुरुषों के मुकाबले महिलाओं की संख्या सिर्फ 927 थी. साल 2005-06 में हुए तीसरे एनएफएचएस सर्वे में ये 1000-1000 के साथ बराबर हो गया. इसके बाद 2015-16 में चौथे सर्वे के आंकड़ों को देखें तो इसमें फिर से गिरावट आ गई. तब 1000 पुरुषों के मुकाबले 991 महिलाएं थीं. आजादी के इतिहास में पहली बार महिलाओं के अनुपात ने पुरुषों को पछाड़ दिया है. मतलब ये कि महिला सशक्तिकरण अभियान के तहत जब महिलाएं इतनी सशक्त हो चुकी हैं तो महिलाओं को थोड़ा और जागरूक कर जनसंख्या नियंत्रण के गुर सिखाए जा सकते हैं. उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में भी जहां जनसंख्या नियंत्रण विधेयक को कानूनी जामा पहनाया गया है, राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण रिपोर्ट-5 में प्रति हजार पुरुषों पर महिलाओं की संख्या बढ़कर 1017 हो गई है. वर्ष 2015 की बात करें तो उस समय लिंगानुपात 995 था. चूंकि इस सर्वे को भारत का स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय यानी Ministry of Health and Family Welfare कंडक्ट कराता है जिसकी शुरुआत 1992-93 में हुई थी. लिहाजा सरकार के लिए ये तय करना आसान होगा कि बेकाबू होती जनसंख्या वृद्धि के लिए जनसंख्या नियंत्रण कानून कितना जरूरी है.

पीएम मोदी क्यों करते हैं जनसंख्या नियंत्रण की बात?

कहते हैं कि जिस प्रकार से बिना पानी के नदी की कल्पना नहीं की जा सकती, उसी प्रकार जनसंख्या के बिना किसी राष्ट्र की कल्पना नहीं की जा सकती, लेकिन इसी का दूसरा पहलू यह भी है कि जब जनसंख्या बेकाबू हो जाए और वो भी युवा जनसंख्या जिसके लिए रोजगार के अवसर सीमित हों, तो भी राष्ट्र का अस्तित्व खतरे में पड़ जाता है. शायद इसी खतरे को भांपते हुए 15 अगस्त 2019 को लाल किले की प्राचीर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तेजी से बढ़ रही जनसंख्या पर चिंता जताई थी. दरअसल, किसी भी देश में युवा तथा कार्यशील जनसंख्या की अधिकता तथा उससे होने वाले आर्थिक लाभ को जनसांख्यिकीय लाभांश (Demographic Divided) के तौर पर देखा जाता है. भारत में मौजूदा समय में सर्वाधिक जनसंख्या युवाओं की है. यदि इस आबादी का इस्तेमाल देश की अर्थव्यवस्था को गति देने में किया जाए तो यह जनसांख्यिकीय लाभांश प्रदान करेगा, लेकिन यह तब संभव होगा जब शिक्षा गुणवत्तापरक हो, रोजगार के अवसर असीमित हों, स्वास्थ्य एवं आर्थिक सुरक्षा के साधन प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हों. वरना यह युवा व कार्यशील आबादी अभिशाप का रूप धारण कर सकती है. इसीलिए दुनिया के समझदार देश अपने संसाधनों के अनुपात में ही जनसंख्या वृद्धि पर बल देते हैं. भारत में मौजूदा वक्त में युवा एवं कार्यशील जनसंख्या सबसे ज्यादा है, लेकिन उसकी योग्यता के मुताबिक रोजगार के अवसर बेहद सीमित हैं. ऐसे में यदि जनसंख्या वृद्धि को नियंत्रित न किया गया तो स्थिति भयावह हो सकती है. इसीलिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जनसंख्या नियंत्रण कानून लाकर जनसंख्या को नियंत्रित करने की बात लगातार कर रहे हैं.

क्यों जरूरी है जनसंख्या नियंत्रण कानून?

जो लोग तार्किक तरीके से जनसंख्या नियंत्रण कानून की बात कर रहे हैं उनकी बात को भी अनदेखा नहीं किया जा सकता है. दरअसल, किसी भी देश में जब जनसंख्या बेकाबू हो जाती है तो संसाधनों के साथ उसकी ग़ैर-अनुपातित वृद्धि होने लगती है, लिहाजा इसमें स्थिरता लाना जरूरी हो जाता है. भारत में विकास की गति की अपेक्षा जनसंख्या वृद्धि दर अधिक है. संसाधनों के साथ-साथ क्षेत्रीय असंतुलन भी तेजी से बढ़ रहा है. उसको इस तरह से समझ सकते हैं कि दक्षिण भारत में कुल फर्टिलिटी रेट यानी प्रजनन क्षमता दर 2.1 है जिसे स्थिरता दर माना जाता है, लेकिन इसके उलट उत्तर भारत और पूर्वी भारत जिसमें बिहार, उत्तर प्रदेश, ओडिशा जैसे राज्य हैं, इनमें कुल प्रजनन क्षमता दर 4 से ज़्यादा है तो यह भारत के भीतर एक क्षेत्रीय असंतुलन पैदा करता है. जब किसी भाग में विकास कम हो और जनसंख्या अधिक हो, तो ऐसे स्थान से लोग रोजगार की तलाश में अन्य स्थानों की तरफ पलायन करते हैं. लेकिन संसाधनों की कमी तथा जनसंख्या की अधिकता तनाव पैदा करती है, भारत के अलग-अलग क्षेत्रों में उपजा क्षेत्रवाद कहीं न कहीं संसाधनों के लिए संघर्ष से ही जुड़ा हुआ है. लिहाजा सरकार के लिए यह जरूरी हो जाता है कि पूरे देश के लिए एक जनसंख्या नियंत्रण कानून बना दिया जाए.

जनसंख्या नियंत्रण कानून के राजनीतिक पहलू

मथुरा के युद्धोपरांत जब द्वारका पूरी तरह से नष्ट हो गई थी, तब पांडवों के महाप्रस्थान के बाद राजा परीक्षित स्वयं श्रीकृष्ण के प्रपौत्र वज्रनाभ को मथुरा का राज्य सौंपने आए थे. कहते हैं कि जब वज्रनाभ मथुरा के राजा बने उस वक्त समय पूरा वज्रमण्डल उजाड़ पड़ा था. चारों तरफ सिर्फ सूने भवन थे. तब वज्रनाभ ने राजा परीक्षित से कहा था- राज्य, धन या शत्रु की मुझे कोई चिंता नहीं, लेकिन मैं यहां राज्य किस पर करूं? यहां तो प्रजा ही नहीं है. मतलब ये कि राज्य यानी राष्ट्र की ताकत उसकी प्रजा यानी जनसंख्या होती है. पीएम मोदी देश और वैश्विक मंच पर बार-बार 130 करोड़ भारतवासी को अपनी ताकत बताते हैं. आर्थिक नजरिये से भी देखा जाए तो 130 करोड़ की बड़ी जनसंख्या ही भारत की ताकत है जो उसे दुनिया के नक्शे पर बड़ा बनाता है. बड़ी आबादी की वजह से ही यहां दुनिया भर की कंपनियों को बड़ा बाजार और सस्ता मैनपावर मिलता है. इसीलिए भारत इन कंपनियों को निवेश के लिए लुभाता भी है और भुनाता भी है. इस लिहाज से भारत के लिए जनसंख्या नियंत्रण कानून अप्रासंगिक हो जाता है. सरसंघचालक मोहन भागवत भी लगातार इस बात की वकालत करते रहे हैं कि देश में एक ऐसी जनसंख्या नीति पर फिर से विचार किया जाना चाहिए जो सभी पर समान रूप से लागू हो. अभी हाल ही में नागपुर के रेशमबाग मैदान में दशहरा रैली को संबोधित करते हुए सरसंघचालक ने कहा था कि वर्ष 1951 से 2011 के बीच जनसंख्या वृद्धि दर में भारी अंतर के कारण देश की जनसंख्या में जहां भारत में उत्पन्न मत पंथों के अनुयायियों का अनुपात 88% से घटकर 83.8% रह गया है, वहीं मुस्लिम जनसंख्या का अनुपात 9.8% से बढ़कर 14.24% हो गया है. संघ समेत तमाम दक्षिणपंथी संगठन जनसंख्या नियंत्रण कानून को हिन्दू बनाम मुस्लिम के तौर पर आंकते हैं. लेकिन चुनाव और वोट बैंक की विवशता इन संगठनों के लिए भी मुश्किल खड़ी करता है, लिहाजा मीडिया के जरिये लोगों में इस तरह की खबर को प्रसारित करवा देते हैं कि इन्हें कानूनी जामा पहनाने से पहले व्यापक विमर्श जरूरी है, क्योंकि समाज के एक वर्ग में इसको लेकर शंका है. कहने का मतलब यह कि सरकार हो या फिर उससे जुड़ी सांगठनिक ताकतें सब जनसंख्या नियंत्रण को लेकर कानून बनाने पर कन्फ्यूज हैं. 

इसमें कोई दो राय नहीं कि जनसंख्या नियंत्रण एक दोधारी तलवार है. 2011 की जनगणना के अनुसार भारत की आबादी 121 करोड़ थी और मौजूदा वक्त में अनुमानित जनसंख्या 130 करोड़ को पार कर चुकी है. कोई अनहोनी न हुई तो 2030 तक भारत की आबादी चीन से भी ज्यादा होने का अनुमान लगाया जा रहा है. ऐसे में भारत के समक्ष तेजी से बढ़ती जनसंख्या एक बड़ी चुनौती है. लेकिन अतीत का अनुभव बताता है कि इसके नियंत्रण के लिए कानूनी तरीका बेहतर व उपयुक्त कदम नहीं माना जा सकता. आजाद भारत में दुनिया का सबसे पहला जनसंख्या नियंत्रण राजकीय अभियान साल 1951 में आरंभ किया गया था, लेकिन यह विफल रहा. साल 1975 में आपातकाल के दौरान बड़े स्तर पर जनसंख्या नियंत्रण के प्रयास किए गए थे, लेकिन इस दौरान भी कई अमानवीय तरीकों का इस्तेमाल किये जाने की वजह से न सिर्फ यह कार्यक्रम फ्लॉप रहा बल्कि लोगों में भय का माहौल पैदा हो गया था. इसके बाद किसी सरकार ने इस दिशा में कोई पहल नहीं की. चूंकि भारत एक लोकतांत्रिक देश है जहां हर किसी को अपने व्यक्तिगत जीवन के विषय में फैसला लेने का अधिकार है. लिहाजा सरकार को कानून का सहारा लेने के बजाय जागरूकता अभियान, शिक्षा का दायरा और उसके स्तर को बढ़ाकर तथा गरीबी को समाप्त करने जैसे उपाय कर जनसंख्या नियंत्रण के लिए प्रयास करने होंगे. भारत के पास अपनी जनसंख्या के आकार में कटौती करने की पर्याप्त गुंजाइश है. राष्ट्रीय परिवार और स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 की रिपोर्ट को इस दिशा में एक शुभ संकेत के तौर पर देखा जाना चाहिए.

(26 नवंबर 2021 को https://www.tv9hindi.com में प्रकाशित)
https://www.tv9hindi.com/opinion/after-the-national-family-and-health-survey-is-there-no-longer-a-need-for-a-population-control-law-932377.html

Friday, 26 November 2021

'किताबी बम' कांग्रेस को घेरने की तिकड़ी साठगांठ तो नहीं?


राष्ट्रीय सुरक्षा एक ऐसा मसला होता है जिसपर राजनीतिक बहस का कोई ओर-छोर नहीं होता है. एक पार्टी जो सत्ता में होती है और दूसरी पार्टी जो विपक्ष में होती है, दोनों अपने-अपने तरीके से राष्ट्रहित और पार्टी हित को ध्यान में रखकर इसकी व्याख्या करती है. लेकिन तंबूपरस्त मीडिया के रूप में आजकल एक तीसरी पार्टी भी खड़ी हो गई है जिसे न तो मीडिया की नैतिक जिम्मेदारी का ख्याल रहता है और न ही राष्ट्रीय सुरक्षा की जिम्मेदारी का अहसास. जिस तंबू के नीचे खुद को वो सुरक्षित महसूस करती है उसी के हिसाब से गेम को सेट करने में जुट जाती है. हम बात कर रहे हैं कांग्रेस पार्टी के वरिष्ठ नेता और सांसद मनीष तिवारी की नई किताब को लेकर मचे घमासान की. किताब (10 flashpoints: 20 years – National Security Situations That Impacted India) का लोकार्पण आगामी एक दिसंबर को होना है. लेकिन इससे पहले ही किताब के कुछ अंश को लीक कर पूर्ववर्ती मनमोहन सरकार को इस तरह से कठघरे में खड़ा किया जा रहा है जैसे मनमोहन सिंह ने राष्ट्रीय सुरक्षा को ताख पर रखकर देश के साथ कोई गद्दारी कर दी हो. इस किताब को लेकर अब तक जो बातें सामने आई हैं और खुद मनीष तिवारी ने भी ट्विटर पर एक संक्षिप्त लेख में जिन मुद्दों को साझा किया है उसे समझना बेहद जरूरी है. समझना इस बात को भी जरूरी है कि मनीष तिवारी ने किताब के लोकार्पण की टाइमिंग का यही वक्त क्यों चुना? मनमोहन सिंह को कठघरे में खड़ा करना कितना उचित है? और कांग्रेस को घेरने की तिकड़ी सांठगांठ का नतीजा तो नहीं है यह 'किताब बम'?

मनीष तिवारी के ट्वीटर लेख की तीन बातें

सबसे पहले बात करते हैं मनीष तिवारी के ट्वीटर लेख की. 21वीं सदी की चुनौतियों के मद्देनजर भारत के नेशनल सिक्योरिटी डॉक्ट्रिन को किस तरह से मजबूत किया जा सकता है, इस मकसद से कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने 304 पन्नों की जो किताब लिखी है उसमें से कुछ अंश को एक छोटे से लेख के साथ ट्वीट किया है. 23 नवंबर 2021 को अंग्रेजी में ट्वीट किए गए लेख की पहली टिप्पणी में मनीष तिवारी लिखते हैं- सोवियत संघ के बाद अमेरिका की हार ने सभी तरह के उग्रवादियों और आतंकवादियों का मनोबल बढ़ा दिया है. इनमें इस्लामिक स्टेट, अलकायदा, लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मुहम्मद जैसे संगठनों का नाम शामिल है. इसका परिणाम हमें जम्मू कश्मीर और पंजाब में देखने को मिल सकता है. दूसरी टिप्पणी में मनीष तिवारी लिखते हैं- जुलाई 2018 में मोदी सरकार ने चीन को ध्यान में रखते हुए बनाई जा रही माउंटेन स्ट्राइक कोर के गठन को स्थगित कर दिया. इसके पीछे मोदी सरकार ने  आर्थिक तंगी का हवाला दिया. अगर माउंटेन स्ट्राइक कोर का गठन हो जाता और वो तैनात होती तो 2017 के डोकलाम विवाद समेत वास्तविक नियंत्रण रेखा पर पेश आ रही दूसरी अन्य चुनौतियों से बचा जा सकता था. माउंटेन स्ट्राइक कोर नहीं बनाकर मोदी सरकार ने राष्ट्रीय सुरक्षा को बड़ा नुकसान पहुंचाया है. ट्विटर पर साझा अपनी तीसरी टिप्पणी में तिवारी लिखते हैं- एक ऐसा देश जो सैकड़ों बेगुनाहों को मौत के घाट उतारने में ज़रा भी संकोच न करता हो, उसे लेकर संयम दिखाना ताकत की नहीं, कमज़ोरी की निशानी समझी जाती है. कभी-कभी हमें शब्दों में नहीं, अपने काम से संदेश देने की ज़रूरत होती है. 26/11 हमलों के बाद ये कर दिया जाना चाहिए था. मुझे लगता है कि भारत को अपने 9/11 के बाद एक 'काइनेटिक रिस्पॉन्स' देना चाहिए था.

कांग्रेस को घेरने की तिकड़ी साठगांठ तो नहीं?

ट्वीटर लेख में मनीष तिवारी ने जो तीन टिप्पणियां की हैं, सपाट तरीके से कहा जाए तो ये मनमोहन सिंह की आड़ लेकर कांग्रेस पार्टी को और कमजोर करने की तंबूपरस्त मीडिया, सत्ताधारी पार्टी भाजपा और किताब के लेखक मनीष तिवारी की तिकड़ी सांठगांठ लगती है. वो इसलिए क्योंकि पहली बात, मनीष तिवारी ने अपनी तीसरी टिप्पणी में 26\11 हमलों का जिक्र क्यों किया? अगर आप पार्टी लाइन से ऊपर उठकर निष्पक्ष लेखक के तौर पर खुद को पेश करना चाहते हैं तो आपको 26/11 हमलों के साथ 13 दिसंबर 2001 की उस घटना का भी जिक्र करना चाहिए था जब लोकतंत्र के मंदिर भारतीय संसद पर आतंकी हमला हुआ था. ऐसा न करके मनीष तिवारी ने एक लेखक के तौर पर खुद की नीयत पर सवाल खड़ा किया है. दूसरी बात, मनीष तिवारी ने अपने ट्वीटर लेख में दो और टिप्पणियां की हैं उसमें से माउंटेन स्ट्राइक कोर के गठन का मसला राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से बेहद संवेदनशील मसला था. किताब के लेखक ने ट्वीटर टिप्पणी में इस बात का जिक्र भी किया है कि अगर माउंटेन स्ट्राइक कोर का गठन हो जाता और वो तैनात हो जाती तो 2017 के डोकलाम विवाद समेत वास्तविक नियंत्रण रेखा पर पेश आ रही दूसरी अन्य चुनौतियों से बचा जा सकता था. माउंटेन स्ट्राइक कोर नहीं बनाकर मोदी सरकार ने देश की राष्ट्रीय सुरक्षा को बड़ा नुकसान पहुंचाया है. मीडिया ने इस बात को अंडरप्ले क्यों किया? 26/11 के मुकाबले ये ज्यादा गंभीर मुद्दा था. इस मसले को लेकर मीडिया अगर दबाव बनाए तो शायद आने वाले वक्त में माउंटेन स्ट्राइक कोर के गठन को लेकर बात बन जाए. रही बात सत्ताधारी पार्टी भाजपा की तो मनीष तिवारी और तंबूपरस्त मीडिया ने 'बिन मांगे मोती मिले' की तर्ज पर कांग्रेस के खिलाफ एक बड़ा हथियार थमा दिया है. हालांकि मनीष तिवारी ने एक अन्य ट्वीट में ये भी लिखा है कि 304 पन्नों की किताब में से एक टिप्पणी पर भाजपा की प्रतिक्रिया ने उन्हें हैरान किया है. ये देखने वाली बात होगी कि क्या वो इसी तरह की प्रतिक्रिया किताब की उन बातों पर भी देंगे जिनमें राष्ट्रीय सुरक्षा के मसले पर उनके कामों का मूल्यांकन किया गया है. लेकिन सवाल यही उठता है कि आपने भाजपा और तंबूपरस्त मीडिया को ये मौका दिया ही क्यों?

मनमोहन सिंह को कठघरे में खड़ा करना कितना उचित?   

मनीष तिवारी ने अपनी टिप्पणी में 26 नवंबर 2008 के मुंबई हमलों को भारत का 9/11 बताते हैं. उनका कहना है कि जिस तरह 9 सितंबर 2001 के हमलों के बाद अमरीका ने अपने गुनहगारों के खिलाफ एक युद्ध छेड़ दिया था, वैसा ही कदम भारत को भी उठाना चाहिए था. काइनेटिक रिस्पॉन्स के क्या मायने हैं यह बात हम मनीष तिवारी पर छोड़ते हैं लेकिन जिस वक्त की बात तिवारी कर रहे है, वो भी तो एक जिम्मेदार मंत्री के तौर पर तत्कालीन मनमोहन सरकार में शामिल थे. अपने ही पीएम को कठघरे में खड़ा कर खुद को पाक साफ कैसे साबित कर सकते हैं. मनीष तिवारी से पहले भी 26/11 के मुद्दे को लेकर तत्कालीन वायुसेना चीफ एयर मार्शल फली मेजर ने 2017 में इस बात का खुलासा किया था कि पाकिस्तान पर हमले के लिए किस स्तर की तैयारियां थीं और किस तरह मनमोहन सरकार ने इसकी अनुमति नहीं दी थी. असल में जब आप 26/11 की प्रतिक्रिया में पाकिस्तान पर जवाबी हमले की बात करते हैं तो इसका मतलब साफ है आप कूटनीति और युद्ध नीति में फर्क नहीं कर पा रहे हैं या अंतर को समझ नहीं रहे हैं. एक प्रधानमंत्री की जिम्मेदारी बहुत बड़ी होती है. जल्दबाजी में युद्ध जैसा फैसला नहीं लिया जाता. अगर इस तरह से प्रधानमंत्री को जिम्मेदार ठहराया जाने लगे तो फिर 13 दिसंबर 2001 को भारतीय संसद पर हुए हमले के लिए भी तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए.   

बहरहाल, मनीष तिवारी हों या सलमान खुर्शीद, कांग्रेस में हमेशा से इस तरह के लोग अपनी व्याकुलता को 'किताब बम' के तौर पर फोड़ते रहे हैं. मनीष तिवारी, सलमान खुर्शीद, गुलाम नबी आजाद, कपिल सिब्बल समेत कई बड़े नेता जी-23 के सदस्य के तौर पर कांग्रेस में चिह्नित हो चुके हैं. प्रेशर पॉलिटिक्स के तहत ये नेता अपने आलाकमान पर समय-समय पर खासतौर पर चुनाव के वक्त इस तरह के नुस्खे आजमाते हैं. उत्तर प्रदेश और पंजाब में अगले साल चुनाव होने हैं. इन चुनावों में अपनी जगह बनाने के लिए पहले सलमान खुर्शीद और अब मनीष तिवारी ने कांग्रेस पर 'किताब बम' फोड़ने की कोशिश की है. इसका कितना लाभ इन्हें हासिल होगा ये तो वक्त तय करेगा, लेकिन इतना तय है कि बदलते भारत और बदल रही कांग्रेस में मनीष तिवारी जैसे नेता अपनी साख गिराने के साथ-साथ राजनीति की मर्यादा को भी तार-तार कर रहे हैं. इस बात से कोई इंकार नहीं कि किताब लिखना और सच लिखना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार है, लेकिन इस सच से भी इंकार नहीं कि आपकी डोर एक राजनीतिक दल से जुड़ी है. उसके भी अपने कायदे-कानून हैं, उसकी भी अपनी एक मर्यादा है. उसको आप चौराहे पर कैसे खड़ा सकते हैं.

(25 नवंबर 2021 को https://www.tv9hindi.com में प्रकाशित)
https://www.tv9hindi.com/opinion/is-manish-tewari-trying-to-humiliate-congress-through-his-book-930931.html

Thursday, 25 November 2021

यूपी से निकला ‘प्रियंका फॉर्मूला’ राजस्थान में हुआ हिट


राजस्थान में गहलोत मंत्रिमंडल के शांतिपूर्ण फेरबदल के बाद एक बार फिर से कांग्रेस का 'प्रियंका फॉर्मूला' चर्चा में है. कहा जा रहा है कि यूपी से निकला 'प्रियंका फॉर्मूला' राजस्थान में भी फिट और हिट है. उत्तर प्रदेश के चुनावी दंगल में 40 प्रतिशत टिकट महिलाओं को देने की बात करके कांग्रेस की राष्ट्रीय महासचिव और यूपी कांग्रेस की प्रभारी प्रियंका गांधी ने जो बड़ा दांव चला है, निश्चित रूप से कांग्रेस आलाकमान ने उसका ट्रेलर राजस्थान मंत्रिमंडल में तीन महिलाओं को मंत्री बनाकर बखूबी दिखाया है. 'प्रियंका फॉर्मूला' की बात जब हम राजस्थान के संदर्भ में करते हैं तो इसकी महत्ता और बढ़ जाती है क्योंकि सूबे में कांग्रेस जिस तरह से दो खेमों (गहलोत बनाम पायलट) में बंटी थी, उसका स्थायी समाधान भी प्रियंका ने अपने ही कंधों पर उठा रखी थी. इसके अलावा भी इस दरम्यान कई ऐसी बातें हुईं जिसे 'प्रियंका फॉर्मूला' के तौर पर प्रचारित और प्रसारित किया जा रहा है.

गहलोत कैबिनेट में तीन महिला मंत्री

2022 में होने वाले उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में महिलाओं को 40 प्रतिशत टिकट देने का ऐलान कर कांग्रेस की राष्ट्रीय महासचिव प्रियंका गांधी ने खूब सुर्खियां बटोरीं. कोई भी पार्टी प्रियंका के इस फैसले का विरोध या आलोचना नहीं कर पाई. राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने भी प्रियंका के इस फैसले का स्वागत किया था. तब ये सवाल भी उठे थे कि यूपी चुनावों के लिए प्रियंका का यह फॉर्मूला कांग्रेस गहलोत के राजस्थान सहित बाकी राज्यों में भी लागू करने की हिम्मत जुटा पाएगी. राजस्थान में चुनाव दिसंबर 2023 में होने हैं. 200 सीटों वाली राज्य विधानसभा में 40 प्रतिशत के हिसाब से गणना करें तो 80 सीटें महिलाओं को देनी होगी. पिछले चुनाव में कांग्रेस ने इन सीटों पर महज 27 महिला प्रत्याशियों को ही चुनावी समर में उतारा था. इनमें से 12 जीतकर विधानसभा पहुंचीं. इसके बाद उपचुनावों में 2 अन्य महिला विधायकों को टिकट दिया गया और वो भी जीतीं. इस वक्त कांग्रेस में महिला विधायकों की संख्या 14 है. आगामी चुनावों में महिलाओं के खाते में कितनी सीटें आती हैं और प्रियंका के फॉर्मूले को कितनी तरजीह दी जाएगी यह तो तब ही पता चलेगा, लेकिन उससे पहले जब बीते 21 नवंबर को गहलोत मंत्रिमंडल में फेरबदल को अंजाम दिया गया तो इसमें जरूर प्रियंका फॉर्मूला को तरजीह दी गई. तरजीह इस रूप में कि गहलोत कैबिनेट में ममता भूपेश के रूप में पहले जहां सिर्फ एक महिला मंत्री थीं, फेरबदल में 2 और महिलाओं (शकुंतला रावत और जाहिदा खान) को शामिल किया गया. ममता भूपेश को महिला बाल विकास राज्य मंत्री से कैबिनेट मंत्री बनाया गया है. इस तरह से कुल 14 महिला विधायकों में एक कैबिनेट और दो राज्य मंत्री बनाकर कांग्रेस आलाकमान ने दिसंबर 2023 की फिल्म का ट्रेलर दिखाया है जिसका श्रेय पूरी तरह से प्रियंका के फॉर्मूले को जाता है. प्रियंका अपनी राजनीतिक जमीन खुद तैयार करना चाहती हैं जिसकी फिलॉसफी है- जाति की राजनीति तो हर कोई करता है, हम तो जेंडर की राजनीति कर नया अध्याय लिखेंगे.

गहलोत बनाम पायलट विवाद खत्म

मंत्रिमंडल के शपथ ग्रहण समारोह से पहले सचिन पायलट ने मीडिया से साफतौर पर बताया था कि उन्होंने जो-जो मुद्दे उठाए थे उनका समाधान हो गया है. पायलट ने ये भी कहा कि सभी नेताओं से चर्चा करने के बाद इतना बड़ा फेरबदल हुआ है. यहां लोग सोचते हैं कि राजस्थान में परिवर्तन होगा, हमें उस सोच को खत्म करना है. राजस्थान में 2023 में हम फिर से सरकार बनाएंगे. दूसरी तरफ शपथ ग्रहण के बाद मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने मीडिया से कहा कि सभी वर्गों और कार्यकर्ताओं का सम्मान करने के लिए नई कैबिनेट बनी है. सभी लोग बहुत खुश हैं. अगले चुनाव की तैयारी आज से शुरू हो गई है. हम जनता की भावनाओं और अपेक्षाओं पर खरा उतरेंगे और अगली बार फिर से सरकार बनाने में कामयाब होंगे. इन दोनों नेताओं के बयान में जो एक बात कॉमन है वह यह कि अगली बार यानी 2023 में फिर से सूबे में कांग्रेस की सरकार बनाएंगे. कहा जाता है कि राजस्थान कांग्रेस में गहलोत बनाम पायलट की खेमेबंदी को खत्म कर इस कॉमन बयान को जारी करवाने के पीछे प्रियंका गांधी ने काफी मशक्कत की थी. 10 नवंबर 2021 को राहुल गांधी के सरकारी आवास 12 तुगलक लेन पर प्रियंका गांधी ने अशोक गहलोत से करीब तीन घंटे तक बैठक यूं ही नहीं की थी. इसी बैठक में प्रियंका ने अशोक गहलोत और सचिन पायलट के खेमों को साधने के लिए अपना फॉर्मूला सौंपा था जिसमें मंत्रिमंडल विस्तार, राजनीतिक नियुक्तियों की तस्वीर भी साफ कर दी गई थी. इसके तहत सचिन पायलट खेमे के रमेश मीणा, हेमाराम चौधरी, मुरारी लाल मीणा और बृजेंद्र ओला और विश्वेंद्र सिह को मंत्रिमंडल में शामिल किया गया. इतना ही नहीं, सचिन पायलट को संतुष्ट करने के लिए मंत्रिमंडल में जाट समाज से पांच विधायकों को मंत्री बनाया गया. मुरारीलाल मीणा को मंत्रिमंडल में शामिल करने के साथ ही स्व. राजेश पायलट का चुनावी क्षेत्र दौसा जिले से अब तीन मंत्री (2 कैबिनेट मंत्री और एक राज्यमंत्री) मंत्रिमंडल में हो गए हैं. परसादीलाल मीणा और ममता भूपेश पहले से मंत्रिमंडल में शामिल थे. कहने का मतलब यह कि प्रियंका ने जो बिसात बिछाई उसमें इस बात का ध्यान रखा गया कि पंजाब वाली गलती न दोहराई जाए. किसी को नाराज न करने का जो राजनीतिक सिद्धांत है उसका प्रियंका गांधी ने राजस्थान में बखूबी इस्तेमाल किया है. 

यूपी चुनाव में पायलट का जादू चला तो...  

प्रियंका गांधी न सिर्फ कांग्रेस पार्टी की महासचिव हैं, बल्कि उनके कंधों पर सबसे बड़े प्रदेश और देश की राजनीतिक दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाने वाले उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को फिर से खड़ा करने की बड़ी जिम्मेदारी भी है. पश्चिमी उत्तर प्रदेश जहां भाजपा काफी मजबूत स्थिति में है, जाट और मुस्लिम वोट यहां जिस एक दल को मिल जाए, चुनावी वैतरणी पार करने से उसे कोई नहीं रोक सकता. राजस्थान की सीमा से लगे उत्तर प्रदेश के कई जिलों में जाटों का खासा प्रभुत्व है. जाट बहुल इलाकों में सचिन पायलट को स्टार प्रचारक बनाकर यूपी चुनाव में उतारने की रणनीति पर भी प्रियंका ने काफी गुना-भाग किया है. सचिन पायलट का ननिहाल भी गाजियाबाद जिला स्थित शकलपुरा जावली गांव में है. इन तमाम चुनावी समीकरणों को ध्यान में रखते हुए प्रियंका गांधी ने सचिन पायलट को किसी भी तरह से नाराज नहीं करने के फॉर्मूले को अंजाम तक पहुंचाने की भरपूर कोशिश की है. देखना होगा कि सचिन पायलट यूपी के जाट बहुल इलाकों में कितना जादू दिखा पाते हैं और प्रियंका का ये नायाब फॉर्मूला किस हद तक यूपी चुनाव में कांग्रेस को लाभ दिला पाता है.        

इसमें कोई दो राय नहीं कि प्रियंका ने राजस्थान में अपने मूल फॉर्मूला के साथ-साथ वहां की परिस्थितिजन्य हालातों से निपटने के लिए जो भी तरकीब अपनाई, उससे वहां कांग्रेस डिरेल होने से बच गई. आने वाले वक्त में 'लड़की हूं...लड़ सकती हूं' नारे को लेकर जिस तेवर के साथ प्रियंका आगे बढ़ रही है, कहना गलत नहीं होगा कि इससे वो एक खास राजनीतिक मुकाम हासिल कर लेंगी. भारतीय राजनीति में महिलाएं कभी चुनाव का मुद्दा नहीं बन पाई हैं. करीब ढाई दशक से महिला आरक्षण विधेयक का मुद्दा जिस तरह से संसद में अटका पड़ा है, सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि राजनीति में महिलाएं किस तरह से हाशिये पर हैं. लंबे वक्त से यहां की राजनीति में धर्म और जाति की जड़ें गहरी पैठ बनाए हुए है. ऐसे में 40 प्रतिशत वाला 'प्रियंका फॉर्मूला' जिस तरह से अपने पांव पसारने शुरू कर दिए हैं, कहा जा सकता है कि इससे कांग्रेस पार्टी में तो प्रियंका का कद बढ़ ही रहा है, भारतीय राजनीति में भी प्रियंका गांधी इतिहास रच सकती हैं. 

(24 नवंबर 2021 को https://www.tv9hindi.com में प्रकाशित)
https://www.tv9hindi.com/opinion/priyanka-formula-from-up-became-a-hit-in-rajasthan-929186.html

Friday, 19 November 2021

नेताजी और भगत सिंह तो बहाना हैं, असल में गांधी को मिटाना है


दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश भारत के लिए दुर्भाग्य कहें या सौभाग्य, संयोग कहें या प्रयोग कि जब-जब चुनाव सिर पर होता है, गांधी, नेहरू, पटेल, नेताजी, भगत सिंह आदि को लेकर बेतुका राग छेड़ दिया जाता है. देश कोविड महामारी के दौर से गुजर रहा है, देश महंगाई, गरीबी और बेरोजगारी के दंश को झेल रहा है. ऐसे में एक टीवी चैनल को दिए इंटरव्यू में कंगना रनौत के इस बयान को किस रूप में देखा जाए जिसमें वो गांधी की अहिंसा का मजाक उड़ाते हुए इस बात का दावा कर रही हैं कि 1947 में देश को जो आजादी मिली थी वो आजादी नहीं भीख थी. असली आजादी तो 2014 में मिली जब मोदी सरकार सत्ता में आई. इतने पर ही कंगना नहीं मानीं. एक अखबार की कतरन को अपने इंस्टाग्राम पर शेयर किया जिसकी हेडलाइन थी 'Gandhi, others had agreed to hand over Netaji' इस खबर में दावा किया गया है कि महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, मोहम्मद अली जिन्ना और मौलाना आजाद ने एक ब्रिटिश न्यायाधीश से समझौता किया था कि अगर नेताजी सुभाष चंद्र बोस देश वापस लौटते हैं, तो उन्हें ब्रिटिश सरकार को सौंपा जाएगा और उन पर केस चलेगा. कंगना के इन तमाम विवादित बयानों से सोशल मीडिया पर बवाल मचा हुआ है. 

नेताजी को लेकर कंगना का दावा कितना सच? 

इस बात में कोई दो राय नहीं कि महात्मा गांधी और नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की विचारधारा अलग-अलग थीं, पर इस सच से भी कोई इनकार नहीं कि दोनों का मकसद एक ही था 'भारत की आजादी'. इस सच से भी कोई मुंह नहीं मोड़ सकता कि महात्मा गांधी को सबसे पहले 'राष्ट्रपिता' के संबोधन से नेताजी ने ही संबोधित किया था. ऐसे में इस तरह की बात को उछालना कि नेताजी को लेकर ब्रिटिश सत्ता और तत्कालीन कांग्रेस के बीच कोई समझौता हुआ था, एक राजनीतिक षड्यंत्र के तहत गढ़ी गई कहानी के सिवा और कुछ भी नहीं है. 2014 में सत्ता में आने के बाद पीएम मोदी ने नेताजी से संबंधित तमाम दस्तावेजों को जुटाने में खुद पहल की थी. गृह मंत्रालय से लेकर राष्ट्रीय अभिलेखागार तक नेताजी से जुड़े सभी दस्तावेजों को खंगालने के बाद भी इस तरह के कोई सुबूत हाथ नहीं लगे जिससे इस बात की पुष्टि होती हो कि नेताजी को लेकर कांग्रेस का ब्रिटिश सत्ता से कोई समझौता हुआ था. इस संबंध में आरटीआई से भी जानकारी जुटाने की खूब कोशिश की गई, लेकिन नतीजा सिफर ही रहा. ऐसे में जब-जब देश में चुनाव की बयार तेज होती है, इस तरह का इमोशनल अत्याचार जनता पर किया जाता है. जो लोग इस तरह के मुद्दों को उछालते हैं उन्हें इतिहास में झांककर जरूर अंदाजा लगाना चाहिए कि गांधी, पटेल, नेहरू, नेताजी, भगत सिंह के आपसी रिश्ते कैसे थे? 

नेताजी की नजर में गांधी क्या थे?

नेताजी सुभाष चंद्र बोस की नजर में गांधी क्या थे, इसको लेकर समय-समय पर बहुत कुछ कहा जाता रहा है. अक्सर आजादी की लड़ाई में योगदान को लेकर गांधी और नेताजी को दो अलग-अलग छोरों पर खड़ा किया जाता रहा है. ऐसे में कुछ ऐतिहासिक तथ्यों को जानना जरूरी हो जाता है. 6 जुलाई 1944 को नेताजी ने जापान से गांधीजी के नाम जो संदेश दिया था उसमें नेताजी कहते हैं... दुनियाभर के हिंदुस्तानी आपके स्वास्थ्य को लेकर चिंतित हैं. अंग्रेजों की जेल में कस्तूरबा जी की दुखद मृत्यु के बाद देशवासियों के लिए आपके स्वास्थ्य के बारे में चिंतित होना स्वाभाविक था. ये ईश्वर की कृपा है कि तुलनात्मक तौर पर आपके स्वास्थ्य में सुधार हुआ है. अब 48 करोड़ 80 लाख हिंदुस्तानियों को आपके मार्गदर्शन और सलाह का लाभ मिल सकेगा. 1941 में भारत छोड़ने के बाद मैं जिन देशों में भी गया और जो अंग्रेजी प्रभाव से मुक्त हैं, वहां आपको उच्चतम सम्मान से देखा जाता है, ऐसा सम्मान जो अन्य किसी भारतीय नेता को पिछली शताब्दी में नहीं मिला है. देश के बाहर रहने वाले भारतीयों और भारत की स्वतंत्रता के विदेशी मित्रों के मन में आपके प्रति जो आदर है, वो सौ गुना अधिक बढ़ गया, जब आपने अगस्त 1942 में भारत छोड़ो प्रस्ताव का समर्थन किया. महात्मा जी, मैं आपको भरोसा दिला सकता हूं कि मैं और मेरे साथ काम करने वाले लोग खुद को भारत के लोगों का सेवक मानते हैं. अपने प्रयासों, कष्टों और बलिदान के लिए हम केवल एक ही पुरस्कार जीतना चाहते हैं और वो है भारत की आजादी. एक बार भारत आजाद हो जाए तो हममें से ऐसे बहुत से लोग हैं जो राजनीति से संन्यास लेना चाहेंगे. बाकि बचे लोग आजाद भारत में कोई भी पद, चाहे कितना ही छोटा क्यों ना हो, स्वीकार करने में संतोष का अनुभव करेंगे. हमारे राष्ट्रपिता, भारत की स्वतंत्रता के इस पावन युद्ध में हम आपका आशीर्वाद और आपकी शुभकामनाएं मांगते हैं.

गांधी की नजर में नेताजी क्या थे?

नेताजी सुभाष चंद्र बोस को देशबंधु चित्तरंजन दास से मिलाने का काम महात्मा गांधी ने ही किया था. लेकिन असहयोग आंदोलन के अचानक समाप्त किए जाने से नाराज मोतीलाल नेहरू और चित्तरंजन दास ने जब कांग्रेस से अलग होकर स्वराज पार्टी बना ली थी तो नेताजी भी स्वराजियों के साथ चले गए थे. लेकिन गांधी का व्यक्तित्व ऐसा था कि एक बार जब वे किसी व्यक्ति में गुणदर्शन कर लेते थे, तो फिर कोई भी वैचारिक मतभेद उन्हें उनसे अलग नहीं कर सकती थी और कमोबेश यही गुण सुभाष बाबू में भी था. कलकत्ता नगर निगम का अध्यक्ष रहने के दौरान जब नेताजी को बिना कोई कारण बताए गिरफ्तार कर लिया गया और बाद में उन्हें बहुत ही गंभीर बीमारी की हालत में रिहा किया गया तो महात्मा गांधी ने ब्रिटिश सरकार के इस रवैये के खिलाफ एक जबरदस्त लेख लिखा था. 26 मई, 1927 को यंग इंडिया में लिखे इस लेख में गांधी कहते हैं, ‘इस दुःखद मामले से भी अगर जनता कोई सांत्वना की चीज ढूंढ़ निकालना चाहे, तो उसे एक चीज जरूर मिल जाएगी और वह यह कि अंतिम क्षण तक श्रीयुत सुभाष चन्द्र बोस सरकार द्वारा समय-समय पर रखी गई उन अपमान भरी शर्तों को बड़ी जवांमर्दी के साथ मानने से इनकार करते रहे. अब हमें आशा और प्रार्थना करनी चाहिए कि परमात्मा उन्हें फिर स्वस्थ करे और वे चिरकाल तक अपने देश की सेवा करते रहें.’

'पट्टाभि की हार मेरी हार है' प्रसंग का सच

नेताजी और गांधी के बीच के वैचारिक मतभेद को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने वाले लोग अक्सर 1939 में कांग्रेस अध्यक्ष के चुनाव वाला प्रसंग जरूर याद दिलाते हैं जिसमें गांधी को यह कहते हुए दिखाया जाता है कि ‘पट्टाभि सीतारमैया की हार मेरी हार है’. इसी एक वाक्य से लोगों में तब से लेकर अब तक भ्रम पैदा किया जाता रहा है. 4 फरवरी, 1939 को ‘यंग इंडिया’ में छपे लेख में गांधी कहते हैं, ‘...तो भी मैं उनकी (सुभाष बाबू की) विजय से खुश हूं और चूंकि मौलाना अबुल कलाम आजाद द्वारा अपना नाम वापस ले लेने के बाद डॉ. पट्टाभि को चुनाव से पीछे न हटने की सलाह मैंने दी थी, इसलिए यह हार उनसे ज्यादा मेरी है. इस हार से मैं खुश हूं....सुभाष बाबू अब उन लोगों की कृपा के सहारे अध्यक्ष नहीं बने हैं जिन्हें अल्पमत गुट वाले लोग दक्षिणपंथी कहते हैं, बल्कि चुनाव में जीतकर अध्यक्ष बने हैं. इससे वे अपने ही समान विचार वाली कार्य-समिति चुन सकते हैं और बिना किसी बाधा या अड़चन के अपना कार्यक्रम अमल में ला सकते हैं. सुभाष बाबू देश के दुश्मन तो हैं नहीं. उन्होंने उसके लिए कष्ट सहन किए हैं. उनकी राय में उनका कार्यक्रम और उनकी नीति दोनों अत्यंत अग्रगामी हैं. अल्पमत के लोग उसकी सफलता ही चाहेंगे.’

तब जबलपुर के त्रिपुरी अधिवेशन में 29 जनवरी 1939 को अपने भाषण में नेताजी ने कहा था...कांग्रेस का वर्तमान वातावरण धूमिल हो चुका है और मतभेद उभर आए हैं. फलस्वरूप हमारे अनेक मित्र खिन्नचित्त और हतोत्साह हो गए हैं. किन्तु मैं अपरिवर्तनीय आशावादी हूं. आप जिस मेघ को देख चुके हैं वह जानलेवा मेघ है. मुझे अपने देशवासियों के देशप्रेम पर विश्वास है. हमें भरोसा है शीघ्र ही हम इन कठिनाइयों पर विजय पाएंगे. हमारे कार्यकर्ताओं में एकता कायम हो जाएगी. इस तरह की स्थिति 1922 में गया कांग्रेस में भी उत्पन्न हुई थी और उसके बाद देशबंधु तथा पंडित मोतीलाल नेहरू ने स्वराज पार्टी का गठन किया था. मेरी प्रार्थना है कि मेरे पूज्य गुरु मोतीलाल तथा भारत के अन्य सपूतों की आत्मा हमें इस संकट में उत्साह प्रदान करे और महात्मा गांधी जो हमारे हैं राष्ट्र का मार्गदर्शन एवं सहायता कर कांग्रेस को इस उलझन से उबारें. इस तरह की ढेर सारी कहानियां इतिहास के पन्नों में दर्ज हैं जो इस विवादित बोल को नकारती हैं कि नेताजी या फिर भगत सिंह के खिलाफ गांधी या फिर पंडित नेहरू ने कुत्सित चाल चली थी.

गांधी के विचार को खत्म करने की साजिश  

ऐसा पहली बार नहीं हुआ है जब गांधी के चाल-चरित्र और चेहरे पर सवाल खड़े किए गए हों. याद हो तो 2019 में लोकसभा चुनाव के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक साक्षात्कार में कहा था कि वह नाथूराम गोडसे के बारे में उस बयान के लिए प्रज्ञा ठाकुर को कभी माफ नहीं करेंगे जिसमें उन्होंने गांधी के हत्यारे गोडसे को देशभक्त करार दिया था. लेकिन हकीकत में उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई. साध्वी प्रज्ञा ठाकुर जो वर्तमान में भाजपा की सांसद भी हैं, ने बाद में संसद में खड़े होकर गोडसे को देशभक्त करार दिया. भाजपा नेता अनंत हेगड़े ने पिछले साल महात्मा गांधी के स्वतंत्रता संग्राम को बनावटी बता दिया था. एक और भाजपा नेता साक्षी महाराज ने अपने विवादित बयान में कहा था, 'सुभाष चंद्र बोस को समय से पहले ही मौत के गाल में भेज दिया गया था. कांग्रेस ने ही सुभाष चंद्र बोस की हत्या कराई. बोस की लोकप्रियता के आगे पंडित नेहरू तो कहीं ठहरते ही नहीं थे. महात्मा गांधी भी उनकी लोकप्रियता के आगे कहीं नहीं ठहरते थे. हरियाणा सरकार में मंत्री और वरिष्ठ भाजपा नेता अनिल विज ने 2017 में अपने बयान में यहां तक कह दिया था कि गांधी का नाम जुड़ने से खादी की दुर्गति हुई थी और अब धीरे-धीरे नोटों से भी गांधी हटेंगे. इस तरह के विवादित और बकवास बयानों से सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि एक खास विचारधारा के लोग जो नाथूराम गोडसे से प्रेम करते हैं, गांधी के नाम को मिटाने की साजिश में जी-जान से जुटे हैं. क्योंकि भाजपा के बीते सात साल से अधिक के शासनकाल में गांधी के विचार और उनके आदर्श के साथ बार-बार खिलवाड़ किया जा रहा है.

आज इस बात को गहराई से समझने की जरूरत है कि गांधी और नेताजी जैसे लोगों का दिल बहुत बड़ा था. लिहाजा उनके आपसी संबंधों को समझने के लिए हमें भी अपना दिल बड़ा करना पड़ेगा. भाजपा सांसद वरुण गांधी ने ठीक ही कहा है, 'कभी महात्मा गांधी जी के त्याग और तपस्या का अपमान, कभी उनके हत्यारे का सम्मान और अब शहीद मंगल पाण्डेय से लेकर रानी लक्ष्मीबाई, भगत सिंह, चंद्रशेखर आज़ाद, नेताजी सुभाष चंद्र बोस और लाखों स्वतंत्रता सेनानियों की कुर्बानियों का तिरस्कार. इस सोच को मैं पागलपन कहूं या फिर देशद्रोह?' कंगना रनौत हों या साध्वी प्रज्ञा ठाकुर, अनंत हेगड़े हों या फिर अनिल विज. अगर ये लोग गांधी के खिलाफ आग उगलते हैं तो इसके पीछे आज की सत्ता के शिखर में बैठे लोगों का वरदहस्त है. अगर आप गोडसे को पूजते हैं तो निश्चित रूप से आप गांधी से घृणा करेंगे. मतलब साफ है, नेताजी या भगत सिंह तो बहाना हैं, असल में गांधी को मिटाना है. 

(18 नवंबर 2021 को https://www.tv9hindi.com में प्रकाशित)
https://www.tv9hindi.com/opinion/how-much-truth-is-there-in-the-claim-of-film-actress-kangana-ranaut-about-netaji-subhash-chandra-bose-920653.html

Thursday, 11 November 2021

बिहार में शराबबंदी, फिर भी रिसती ही जा रही शराब


बिहार में जहरीली शराब पीने से 50 से अधिक लोगों की मौत से राज्य में शराबबंदी पर एक बार फिर से सवाल उठने शुरू हो गए हैं और साथ में इस बात का भी आंकलन और विश्लेषण किया जाने लगा है कि 12 करोड़ की आबादी वाले राज्य बिहार में शराब पीने को आपराधिक बनाना और इसपर पूर्ण प्रतिबंध लगाना कितना जायज है? बिहार में शराब रखने और पीने को अपराध बनाने से संबंधित बिहार राज्य मद्यनिषेध कानून को अस्तित्व मे आए एक लंबा अरसा बीत चुका है और इस पर फिर से मंथन करने की आवश्यकता महसूस की जाने लगी है. मौजूदा स्थितियों और परिस्थितियों को देखते हुए यह साफ तौर पर कहा जा सकता है कि इस कानून से घोषित सामाजिक और आर्थिक उद्देश्यों की प्राप्ति नहीं हो पायी है. प्रशासनिक तथा सामाजिक स्तर पर भी कई ऐसी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है जिनके बारे में कल्पना भी नहीं की गई थी.  

शराब और ताड़ी में अंतर नहीं कर सकी सरकार     

पहली सोच में शराबबंदी एक अच्छा विचार है और इससे किसी को असहमति भी नहीं हो सकती है, लेकिन इसे लागू करने से पहले सामाजिक, प्रशासनिक, सांस्कृतिक, आर्थिक तथा ऐतिहासिक पहलुओं को समझना जरूरी है. बिहार और अन्य राज्यों में शराबबंदी लागू करने से पहले ताड़ी के बारे में सबसे पहले विचार कर लेना चाहिए. यह पेय पदार्थ मादक तो है लेकिन सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से स्वीकार्य पेय है. जब इसे अपराध की श्रेणी में डाला गया तो भारी प्रशासनिक समस्याएं खड़ी हो गयी थी जिसके कारण बिहार के मद्यनिषेध कानून में परिवर्तन करना पड़ा था. इसके तहत राज्य में ताड़ी की दुकानें सार्वजनिक स्थानों, हाट बाजार के प्रवेश द्वार, फैक्ट्री, पेट्रोल पंप, श्रमिक बस्ती, अस्पतालों, स्टेशन, बस पड़ाव और शहरी आबादी से 50 मीटर के दायरे में नहीं होंगी. अनूसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति तथा झुग्गी बस्ती और सघन आबादी वाले इलाकों में ताड़ी बेचने को प्रतिबंधित कर दिया गया. ताड़ी पीने के मामले में आंध्रप्रदेश पहले पायदान पर है. जबकि असम, झारखंड के बाद बिहार के लोग सर्वाधिक ताड़ी पीते हैं. आंध्रप्रदेश में प्रति माह 12.10 रूपए जबकि बिहार में 3.54 रूपए प्रति व्यक्ति ताड़ी पर खर्च होता है. ऐसे में शराब और ताड़ी में फर्क कर पाना प्रशासन के लिए बड़ी व गंभीर चुनौती है.

शुरू से ही विवादों में रहा बिहार में शराबबंदी     

बिहार में शराबबंदी कानून शुरू से ही विवादों में रहा है. एक अप्रैल 2016 को लागू बिहार मद्य निषेध कानून से माना गया था कि इससे शराब से जुड़े अपराध कम होंगे और विभिन्न वर्गों की ओर से हो रहे विरोध का जवाब दिया जा सकेगा. राज्य भर में शराब की बिक्री और इसके उपभोग पर प्रतिबंध लगा दिया गया और जो भी व्यक्ति शराब के साथ पकड़ा गया उस पर मुकदमा दर्ज किया गया. एक अनुमान के मुताबिक शराबबंदी कानून लागू होने से राज्य सरकार को करीब 4,000 करोड़ रूपये के राजस्व का नुकसान हुआ है. हालांकि राज्य सरकार के स्तर पर अभी तक शराबबंदी से राजस्व नुकसान का कोई आधिकारिक आंकलन नहीं किया गया है. एक अध्ययन से पता चला है कि शराब पर प्रतिबंध से अपराधों पर रोक नहीं लगी बल्कि आपराधिक घटनाओं में अनुमान के विपरीत बढ़ोतरी दर्ज की गई. जानकारों का कहना है कि बिहार की मद्य निषेध नीति की नींव ही गलत है और शुरूआती गलतियों को ढंकने के लिए दूसरे तरीकों का सहारा लेते रहे जिनमें कानून में लगातार संशोधन, बेहतर छवि पेश करने के लिए आंकड़ों में हेर-फेर और मीडिया में अपने अनुकूल खबरें छपवाना शामिल है.

इसलिए विफल हो रहा है बिहार में शराबबंदी

मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि व्यक्ति की व्यवहार और आदतों में जोर जबरदस्ती से बदलाव कराने से वह दूसरे तरीके तलाशने लगता है जो न केवल सामाजिक और प्रशासनिक रूप से गलत है बल्कि नैतिक रूप से भी नाजायज होते हैं. संयोग कहें या प्रयोग, बिहार में भी शराबबंदी से यही हो रहा हैु. लोग अपनी क्षमता के अनुसार अन्य तरीकों से शराब जुटा रहे हैं. इनमें ताड़ी, नकली शराब, अवैध रूप से बनी शराब (भट्टी शराब) और चोरी-छिपे लायी जा रही शराब शामिल है. सीतामढ़ी के एक सामाजिक कार्यकर्ता राकेश पासी का कहना है कि पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों के लिए शराबबंदी उगाही और बदले की कार्रवाई करने का एक बड़ा हथियार बन गया है. किसी भी व्यक्ति की झोपड़ी पर शराब की बोतल फेंक कर आपराधिक मामला बना दिया जाता है और मामला दर्ज नहीं करने के नाम पर उससे उगाही की जाती है. इसी तरह से गया के एक सिन्हा परिवार को दिवाली के दिन शराब पीने और जुआ खेलने के आरोप में पुलिसिया कार्रवाई का सामना करना पड़ा. पीड़ित परिवार का कहना है कि यह उनकी संस्कृति और परंपरा है. खैर, यह परिवार प्रशासनिक और आर्थिक रूप से सशक्त था तो मामला रफा-दफा हो गया. लेकिन कानूनी रूप से अपराध तो हुआ ही. बिहार के निचली अदालतों मे ऐसे ढेरों मामले हैं जिनमें शराब पीने और रखने के आरोप हैं. इन मामलों में फंसे लोग दलित, निर्धन और ऐसे लोग हैं जिनकी पैरवी करने वाला कोई नहीं है.

शराबबंदी के मानवीय पहलू को भी समझना जरूरी

किसी भी क्षेत्र में शराबबंदी कानून लागू करने से पहले उसके मानवीय पहलु को समझना जरूरी है. शराब पीना और विशेष तौर से महंगी शराब पीना स्टेटस सिंबल माना जाता है. छोटी आमदनी के लोग अमीरों के जैसे शौक करने के लिए शराब पीते हैं. स्टार होटलों, दूतावासों और विशेष उत्सवों में शराब आवश्यक मानी जाती है. सेना के प्रतिष्ठानों और छावनियों में शराबबंदी न तो संभव है और न ही व्यवहारिक है. सेना के जवानों की तैनाती और काम की स्थितियां ऐसी होती हैं जहां शराबबंदी को सही नहीं ठहराया जा सकता. बिहार में शराबबंदी से पहले पर्याप्त शोध नहीं हुआ और विकल्पों की उपलब्धता और कालाबाजारी जैसे कारणों पर विचार नहीं किया. इसका ही नतीजा है कि ऐसे परिणाम सामने आ रहे हैं जिनके बारे में कभी सोचा नहीं गया था. ऐसा नहीं है कि शराबबंदी सबसे पहले बिहार में लागू की गयी और वहीं विफल हो रही है. 

दुनिया के देशों में भी शराबबंदी फिसड्डी साबित

दुनियाभर में शराबबंदी के प्रयास हुए हैं और उनका भी परिणाम बिहार जैसे ही हुए हैं और बाद में इन्हें वापस लेना पड़ा. स्कॉटलैंड में वर्ष 1853 में शराब की खपत में कमी लाने के लिए सप्ताह में एक कार्यदिवस, रविवार और रात 11 बजे के बाद शराब की दुकानें बंद करने का आदेश जारी किया गया था. सरकारी आंकड़ों में शराब की खपत तो घट गई लेकिन अवैध शराब परोसने वाले ठिकाने खुल गए. इनपर सस्ती और मिलावटी शराब बिकती थी जो खतरनाक भी होती थी. हालात इस कदर प्रतिकूल हो गए कि सरकार को यह कानून वापस लेना पड़ा. इस्लाम के सिद्धांतों के अनुसार, यमन में शराब पूरी तरह से प्रतिबंधित है. यमनियों को देश के सभी हिस्सों में शराब का सेवन करने और बेचने की अनुमति नहीं है, लेकिन अदन और सना के अपवाद के साथ यहां कुछ रेस्तरां, होटल और नाइटक्लब में शराब परोसी जाती है. गैर-मुस्लिम विदेशियों को देश में सीमित मात्रा में शराब लाने और घर पर या होटल के अंदर पीने की अनुमति है. ऐसे में शराब पर प्रतिबंध वाला कानून व्यवहारिक तौर पर अपने मकसद में सफल नहीं हो पाता है. पड़ोसी देश पाकिस्तान की बात करें तो देश की आजादी के बाद से तीन दशकों तक यहां शराब पीने की अनुमति थी. जुल्फिकार अली भुट्टो के शासनकाल में जरूर प्रतिबंध लगाया गया था जो 1977 में उनके पद से हटने के बाद भी प्रतिबंध जारी रहा. वर्तमान में, मुसलमानों को भले ही देश के भीतर मादक पेय बनाने, बेचने और उपभोग करने की अनुमति नहीं है, लेकिन गैर-मुस्लिम अल्पसंख्यकों को अल्कोहल परमिट के लिए आवेदन करने की अनुमति है. परमिट अक्सर आर्थिक विकास का हवाला देकर जारी किए जाते हैं. ऐसे में शराबबंदी कानून का कितना असर हो सकता है, सहज ही समझा जा सकता है.

बिहार अकेला नहीं जहां शराबबंदी कानून विफल है   

जब बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने शराबबंदी की घोषणा की थी तो महिलाओं ने इसका जोरदार स्वागत किया था. शराब के कारण सैकड़ों परिवार तबाह हो गए थे. महिलाओं को इससे ज्यादा परेशानियां थीं. शराबियों के आतंक से महिलाएं घर और बाहर आतंकित रहती थीं. गरीब परिवार आर्थिक परेशानियों से जूझ रहे थे. महिलाओं की मांग पर ही राज्य में शराबबंदी कानून लागू की गई थी. बिहार में वर्ष 1977 में जननायक कर्पूरी ठाकुर ने भी शराब पर प्रतिबंध लगाया था. लेकिन शराब की कालाबाजारी और कई अन्य परेशानियों की वजह से यह प्रतिबंध ज्यादा दिनों तक नहीं चल सका. हालांकि बिहार कोई अकेला ऐसा राज्य नहीं है जहां शराबबंदी में निराशा हाथ लग रही है. हरियाणा, आंध्रप्रदेश और मिजोरम में भी शराबबंदी हुई थी, लेकिन यह कारगर नहीं हो पायी. हालांकि गुजरात, नागालैंड, लक्षद्वीप के अलावा मणिपुर के कुछ हिस्सों में शराब बिक्री पर अभी भी पाबंदी है. शराबबंदी में गुजरात की खूब चर्चा होती है. गुजरात में वर्ष 1960 से शराबबंदी है. इसके लिए केन्द्र सरकार प्रतिवर्ष 100 करोड़ रूपए मदद देती है. हालांकि गुजरात में भी शराब की कालाबाजारी की शिकायतें मिलती रही हैं. राज्य की एक बड़ी आबादी शराब का सेवन करती है. एक अनुमान के अनुसार गुजरात में हर वर्ष करीब 400 करोड़ रूपए के अवैध शराब का कारोबार होता है. बिहार के दक्षिण में झारखंड और उत्तर में पड़ोसी देश नेपाल में शराब की छूट है. इसके अलावा उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों का सीधा संपर्क बिहार से है. इन राज्यों में शराब की बिक्री पर प्रतिबंध नहीं है. इसलिए राज्य में शराब की कालाबाजारी का खतरा बना रहता है. 

एक सर्वेक्षण के अनुसार शराबबंदी से पहले बिहार में लगभग 29 प्रतिशत लोग शराब का सेवन करते रहे हैं. इसमें 0.2 प्रतिशत महिलाएं भी शामिल हैं. राज्य में करीब साढ़े तीन करोड़ लोग शराब का सेवन करते हैं. इसमें 40 लाख लोग ऐसे हैं जो आदतन शराब पीते रहे हैं. राज्य सरकार के आंकड़ों के मुताबिक, बिहार में प्रतिवर्ष 990.30 लाख लीटर शराब की खपत होती रही है। राज्य सरकार की शराब बिक्री से आमदनी वर्ष 2015-16 में करीब 4000 करोड़ पहुंच गई थी. लेकिन 1 अप्रैल, 2016 को बिहार देश का ऐसा पांचवां राज्य बन गया जहां शराब के सेवन और उसकी जमाखोरी पर प्रतिबंध लग गई थी. प्रतिबंध की अवज्ञा पर सख्त सजा के प्रावधान किए गए. यही वजह रही कि बीते चार साल में करीब दो लाख लोगों को शराबबंदी के उल्लंघन पर जेल हुई. स्थिति अब ऐसी हो गई है कोई भी दिन ऐसा नहीं बीतता जब राज्य के किसी ना किसी कोने से शराब की बरामदगी और शराबबंदी कानून तोड़ने की खबरें सुर्खियां ना बनती हों. 

बहरहाल, इस बात में कोई दो राय नहीं कि बिहार में शराबबंदी कानून बुरी तरह से फेल हुई है. भारत सरकार के स्वास्थ्य मंत्रालय ने जो रिपोर्ट जारी की है उसके अनुसार बिहार में महाराष्ट्र से ज्यादा शराब पी जाती है. राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस), 2020 की रिपोर्ट के मुताबिक, बिहार में 15.5 प्रतिशत पुरुष शराब का सेवन करते है. महाराष्ट्र में शराब प्रतिबंधित नहीं है लेकिन शराब पीने वाले पुरुषों की तादाद 13.9 फीसदी ही है. इसका मतलब साफ है कि यह कानून ढोंग है. इसके जरिए संरक्षण प्राप्त भ्रष्टाचारियों ने सत्ता के समानांतर अर्थव्यवस्था खड़ी कर दी है. इसलिए यह देखना होगा कि आखिर वे कौन लोग हैं जो कानून को ठेंगा दिखा रहे हैं. निश्चित रूप से शराबबंदी की नाकामी में पैसे की बड़ी भूमिका है. चंद लोग बहुत अमीर बन गए हैं. जो लोग पकड़े जा रहे वे बहुत छोटे लोग हैं. असली धंधेबाज या फिर उन्हें मदद करने वाले ना तो पकड़ में आ रहे हैं और ना ही उनपर किसी की नजर है. जाहिर है, जब तक कानून के असली गुनाहगार पकड़े नहीं जाएंगे तब तक राज्य में शराबबंदी कानून की यूं ही धज्जियां उड़ती रहेंगीं और लोग मरते रहेंगे.

(10 नवंबर 2021 को https://www.tv9hindi.com में प्रकाशित)
https://www.tv9hindi.com/opinion/liquor-prohibition-is-failing-badly-in-bihar-908865.html

Thursday, 4 November 2021

चारधाम देवस्थानम बोर्ड को लेकर केदारनाथ में इतना हंगामा क्यों?


केदारनाथ की बर्फ़ीली ठिठुरन में चारधाम देवस्थानम बोर्ड के खिलाफ तीर्थ-पुरोहितों के भारी विरोध प्रदर्शन ने देवभूमि उत्तराखंड का राजनीतिक तापमान बढ़ा दिया है. कहें तो चुनावी सरगर्मियों के बीच यह तापमान भाजपा और उत्तराखंड सरकार के लिए गले की फांस बनता जा रहा है. चारधाम हकहकूकधारी महापंचायत के बैनर तले प्रदर्शन कर रहे तीर्थ पुरोहित देवस्थानम बोर्ड को भंग किए जाने से कम पर मानने को तैयार नहीं हैं. इस बीच विपक्षी दल कांग्रेस पार्टी ने तीर्थ पुरोहितों के इस विरोध को भांपते हुए बिना देरी किए ऐलान कर दिया है कि चुनाव बाद अगर कांग्रेस सत्ता में आई तो इस बोर्ड को भंग कर दिया जाएगा. ऐसे में अब सत्ताधारी भाजपा को यह डर सताने लगा है और यह डर स्वाभाविक भी है कि कहीं चुनावों में ब्राह्मण वोट बैंक उससे छिटक न जाए. अगर ऐसा हुआ तो इसका असर न सिर्फ उत्तराखंड, बल्कि पड़ोसी राज्य उत्तर प्रदेश के चुनाव पर भी पड़ सकता है. बीते दिनों जिस तरह से पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत को तीर्थ-पुरोहितों के जबरदस्त विरोध का सामना करना पड़ा और केदारनाथ के दर्शन किए बिना उन्हें लौटना पड़ा, तमाम भाजपा नेता, कार्यकर्ता और प्रदेश सरकार इस बात को लेकर पशोपेश में हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 5 नवंबर को केदारनाथ धाम पहुंचने वाले हैं. टीएस रावत की तरह अगर पीएम मोदी का भी ऐसा ही विरोध हुआ तो फिर क्या होगा?

देवस्थानम बोर्ड को लेकर इतना हंगामा क्यों?

श्रीमद्भागवत गीता के चौथे अध्याय में एक श्लोक है जिसमें भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे॥

मतलब जब-जब संसार में धर्म की हानि होगी, जब-जब संसार में धर्म को चोट पहुंचेगी तब-तब मैं धर्म को बचाने के लिए, सज्जनों की रक्षा तथा दुष्टों के विनाश के लिए और धर्म की स्थापना व उसके उत्थान के लिए हर युग में अवतार लूंगा. तो क्या देवभूमि उत्तराखंड के मंदिरों में धर्म की इतनी हानि हो रही थी कि उसे बचाने के लिए सरकार को देवस्थानम बोर्ड का गठन करना पड़ा? निश्चित रूप से सरकार ने बोर्ड का गठन कर जिस तरह की परिस्थितियों को जन्म दिया है, उससे कई सवाल उठने लगे हैं. अगर सरकार के चश्मे से देखें तो इसमें कोई दो राय नहीं कि बदरीनाथ मंदिर हो या केदारनाथ का मंदिर, गंगोत्री हो या फिर यमुनोत्री, ये निजी मंदिर तो हैं नहीं. लोगों की सामूहिक भागीदारी से ही इन मंदिरों की दीवारें खड़ी की गई हैं. लिहाजा इन मंदिरों में चढ़ावे के तौर पर करोड़ों-करोड़ की जो कमाई होती है उसका हिसाब-किताब रखने और उस पैसे से श्रद्धालुओं की सुविधा व मंदिर परिसर के संरचनात्मक ढांचा को बेहतर बनाने के लिए ही सरकार ने वैष्णो देवी मंदिर की तर्ज पर ये कदम उठाया है. राज्य सरकार इस बात का ढिंढोरा पीट भी रही है कि चारधाम देवस्थानम बोर्ड गंगोत्री, यमुनोत्री, बदरीनाथ, केदारनाथ और उनके आसपास के मंदिरों की व्यवस्था में सुधार के लिए है. इसका मकसद इतना ही है कि यहां आने वाले श्रद्धालुओं का ठीक से स्वागत हो और उन्हें बेहतर सुविधाएं मिल सके. लेकिन तीर्थ पुरोहित लगातार विरोध प्रदर्शन कर सरकार की नीति और नीयत पर सवाल उठा रहे हैं. 

विरोध के पीछे धार्मिक परंपराओं में सरकारी दखलंदाजी

तीर्थ पुरोहितों ने अपनी लड़ाई के लिए जो चारधाम हकहकूकधारी महापंचायत गठित की है उसने बोर्ड को लेकर सरकार की नीयत पर कई तरह से सवाल खड़े किए हैं. महापंचायत के प्रवक्ता बृजेश सती का साफतौर पर कहना है कि देवस्थानम एक्ट के वजूद में आने के बाद से सदियों से चली आ रही परंपराएं तो टूटी ही हैं, यात्रा प्रबंधन एवं संचालन में भी समस्याएं आई हैं. यहा तक कि मंदिर के पूजा मुहूर्त तक में बदलाव कर दिया गया है. पहले पूजा ब्रह्म मुहूर्त में होता था. उसका समय बदल दिया गया है. मंदिर के इतिहास में पहली बार सरकार इस तरह की दखलंदाजी कर रही है. जबकि हाईकोर्ट का भी इस संदर्भ में साफतौर पर कहना है कि चार धाम देवास्थानम बोर्ड का अधिकार केवल मंदिर की संपत्ति के प्रशासन और प्रबंधन तक ही सीमित होगा. सती का कहना है कि सरकार मनमानी कर रही है. उसने 31 अक्टूबर तक देवस्थानम बोर्ड को लेकर स्थिति साफ करने की बात कही थी. लेकिन कुछ भी नहीं हुआ. मुख्यमंत्री ने इस बात का भी आश्वासन दिया था कि इस एक्ट पर पुनर्विचार के लिए हाई पावर कमेटी में चारों धामों के आठ तीर्थ पुरोहितों को शामिल किया जाएगा, लेकिन जब हमने नाम भेजे तो उसमें से कई लोगों के नाम ही हटा दिए. उसपर से हाई पावर कमेटी ने बिना तीर्थ पुरोहितों और मंदिर समितियों से संवाद किए ही अपनी अंतरिम रिपोर्ट मुख्यमंत्री को सौंप दी. महापंचायत का कहना है कि देवस्थानम बोर्ड के गठन के दो साल होने जा रहे हैं बावजूद इसके अब तक सरकार के पास बताने के लिए कोई उपलब्धि नहीं है. उल्टे देवस्थानम बोर्ड की ओर से चारों धामों की संस्कृति और धार्मिक परंपराओं के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है. दबी जुबान में इस बात को लेकर भी कानाफूसी शुरू हो गई है कि मोदी सरकार जिस तरह से रेलवे समेत तमाम सरकारी कंपनियों को निजी हाथों में सौंप रही है, वो वक्त भी आएगा जब बड़े-बड़े मंदिरों और तीर्थस्थलों को भी निजी हाथों में सौंप दिया जाएगा. 

बोर्ड अधिनियम की धारा 22 पर है बड़ा विवाद

चारधाम देवस्थानम बोर्ड अधिनियम की धारा 22 कहता है कि चारधाम देवास्थानम से संबंधित सभी संपत्तियां जो कि सरकार, जिला पंचायत, जिला परिषद, नगर निगम के अधिकार या अधीक्षण में हैं या किसी कंपनी, सोसाइटी, संगठन या किसी संस्था के अधिकार या अधीक्षण में हैं उन सभी संपत्तियों का हस्तांतरण बोर्ड को हो जाएगा. सरकार स्थानीय प्राधिकरण या किसी व्यक्ति में निहित संपत्तियां और संबंधित देयताएं भी बोर्ड को हस्तांतरित हो जाएंगी. धारा 22 के मुताबिक बोर्ड के पास अधिकार होगा कि बेहतर विकास के लिए वह मंदिर के आसपास की भूमि का अधिग्रहण करे. कोर्ट में भी याचिकाकर्ता ने इसी बात पर आपत्ति जताई थी कि राज्य सरकार धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप कर रही है और तीर्थ स्थान से जुड़े मामलों को लेकर पुजारी समुदाय से कोई परामर्श नहीं किया गया.

टूरिज्म स्पॉट बनाने की नीति से भी है नाराजगी 

सरकार चारधाम को दुनिया के नक्शे पर एक भव्य पर्यटन स्थल के तौर पर विकसित करने की बड़ी भूल कर रही है. असल में चारधाम से यहां बसे आसपास के गांवों की आस्था जुड़ी हुई है. यहां के तीर्थ-पुरोहित, हक-हकूक धारी नंगे पांव बर्फ में डोली लेकर भगवान को लाने और छोड़ने जाते हैं. इसके दस्तूर में इन्हें एक किलो चावल और 10 रुपये मिलते हैं. कहने का मतलब यह कि भगवान की डोली लेकर बर्फ पर मीलों मील नंगे पांव चलने के पीछे भगवान के प्रति एक भावना होती है, आस्था की गहराई होती है. तीर्थ पुरोहितों को लगता है कि देवस्थानम बोर्ड पूरी तरह से एक्शन में आया नहीं है तब तो पुनर्निर्माण के नाम पर केदारनाथ मंदिर का वास्तु बदल दिया गया है. मंदिर की धार्मिक परंपराओं को बदला जा रहा है. तो आने वाले वक्त में यहां किस-किस तरह के बदलाव होंगे सहज ही समझा जा सकता है. आखिर केदारनाथ में शंकराचार्य की प्रतिमा का क्या मतलब है. यहां तो स्वयंभू ज्योतिर्लिंग की पूजा होती है. धर्म को अपनी राजनीतिक सत्ता में कैसे इस्तेमाल करना है, यह उसकी एक बानगी है. आने वाले समय में जिस तरह से काशी विश्वनाथ मंदिर को नया रूप दिया गया है उसी तरह से कई तरह के टूरिस्ट सर्किट चारधाम में भी बनाए जाएंगे जो टूरिज्म स्पॉट के तौर पर सरकार की कमाई का साधन बनेंगे. 

सवाल तो ये भी उठता है कि बदरीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री समेत प्रदेश के 51 मंदिरों का प्रबंधन हाथ में लेने के लिए बनाया गया चारधाम देवस्थानम बोर्ड अगर इतना ही शानदार है तो फिर भाजपा के राज्यसभा सांसद डॉ. सुब्रमण्यम स्वामी ने इसके खिलाफ याचिका क्यों लगाई जिसे हाईकोर्ट ने खारिज कर दिया? स्वामी ने इस याचिका में कहा था कि देवस्थानम बोर्ड अधिनियम असंवैधानिक है. देवस्थानम बोर्ड के माध्यम से सरकार द्वारा चारधाम और 51 अन्य मंदिरों का प्रबंधन लेना संविधान के अनुच्छेद 25 व 26 का उल्लंघन है. यह तो अपने आप में बड़ा विरोधाभास है कि जिस पार्टी की सरकार देवस्थानम बोर्ड का गठन कर रही है उसी पार्टी का सांसद हाईकोर्ट में उसे असंवैधानिक ठहराने के लिए अर्जी लगा रहा है. ऐसे में कोई कुछ भी कहे, असलियत में उत्तराखंड सरकार देवस्थानम बोर्ड के माध्यम से मनुस्मृति के उसी दर्शन को स्थापित और प्रतिपादित करने में जुटी है कि मंदिर का मुख्य पुजारी तो राजा ही होता है और राजा जिसे चाहे मंदिर प्रबंधन की जिम्मेदारी सौंप सकता है, पूजा का अधिकार दे सकता है.

(3 नवंबर 2021 को https://www.tv9hindi.com में प्रकाशित)
https://www.tv9hindi.com/opinion/why-is-there-so-much-ruckus-in-kedarnath-regarding-chardham-devasthanam-board-900979.html

 

Wednesday, 3 November 2021

रात बाकी.. बात बाकी.. तो फिर 2जी घोटाला बड़ा फ्रॉड कैसे?


भारत के 11वें नियन्त्रक एवं महालेखापरीक्षक (कैग) रहे विनोद राय ने कांग्रेस नेता संजय निरूपम से माफी क्या मांगी, पूरी कांग्रेस पार्टी एक स्वर में यह दावा करने लगी है कि 2जी स्पेक्ट्रम घोटाला और कोल ब्लॉक आवंटन घोटाला हुआ ही नहीं था. यह सब तत्कालीन कांग्रेस नीत यूपीए सरकार (मनमोहन सरकार) को बदनाम करने की साजिश भर थी जिसमें विनोद राय ने अहम भूमिका निभाई थी. अब विनोद राय के माफीनामे को लेकर तर्क-वितर्क शुरू हो गए हैं. कोई कह रहा है कि यह माफीनामा दिवाली से पहले किया गया एक राजनीतिक धमाका है तो कोई कह रहा है कि माफीनामे को '2जी घोटाला-एक बड़ा फ्रॉड' के तौर पर देखा जाना चाहिए. अब इस माफीनामे के पीछे की असली कहानी क्या है जानने के लिए घटनाक्रम की क्रोनोलॉजी को समझना जरूरी है.

संत कबीर कहते हैं, 'हरि रूठे गुरु ठौर है, गुरु रूठे नहिं ठौर'. कबीर ने जब यह लाइन लिखी होगी तब उन्होंने भी ऐसा नहीं सोचा होगा कि सत्ता की चाह में कुछ ताकतवर लोग हरि यानी ईश्वर और गुरु की परिभाषा ही बदल देंगे. गुरु की कृपादृष्टि बनी रहे के चक्कर में फंसकर कुछ लोग पूरे सिस्टम को तहस-नहस कर देते हैं. और जब बात बिगड़ जाती है तो माफी मांगकर आगे बढ़ जाते हैं. भारत के पूर्व नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक (कैग) विनोद राय ने जो कुछ पहले किया और जो कुछ आज कर रहे हैं, कहीं न कहीं उसके पीछे एक आका या कहें तो गुरु के साजिश की बू आती है. जब बात गुरु से शुरू हुई है तो 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन घोटाले की तीन अहम तारीखों का जिक्र करना जरूरी होगा. इसे संयोग कहें या प्रयोग ये अलग बात है, लेकिन इन तारीखों में येन-केन-प्रकारेण गुरु (गुरुवार का दिन) का प्रभाव तो दिखता ही है.  

2 फरवरी 2012 गुरुवार का दिन 

देश की शीर्ष अदालत सुप्रीम कोर्ट ने 2 फरवरी 2012 को कहा था कि कांग्रेस नीत संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) सरकार द्वारा 2जी स्पेक्ट्रम का आवंटन गैर-कानूनी है. यह सत्ता के मनमाने इस्तेमाल का एक उदाहरण है. इसके बाद अदालत ने पूर्व दूरसंचार मंत्री ए. राजा के कार्यकाल के दौरान 11 कंपनियों को 10 जनवरी 2008 को या उसके बाद आवंटित सभी 122 दूरसंचार लाइसेंस रद्द कर दिए थे. 

21 दिसंबर 2017 गुरुवार का दिन 

2जी स्पेक्ट्रम लाइसेंस आवंटन मामले में सरकारी राजस्व को भारी नुकसान के भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) तथा केंद्रीय जांच एजेंसी सीबीआई के आंकलन को बड़ा झटका देते हुए एक विशेष अदालत ने यह कहकर घोटाले के सभी आरोपियों को बरी कर दिया कि कुछ लोगों ने चालाकी से कुछ चुनिंदा तथ्यों का इंतजाम किया और एक घोटाला पैदा कर दिया जबकि ऐसा कुछ हुआ ही नहीं था.

28 अक्टूबर 2021 गुरुवार का दिन

दिल्ली के पटियाला हाउस स्थित मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट की अदालत में दायर अपने हलफनामे में पूर्व नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक विनोद राय ने कांग्रेस नेता संजय निरुपम से माफी मांगते हुए कहा, मैं समझता हूं कि मेरे बयान से संजय निरूपम, उनके परिवार और उनके शुभचिंतकों को ठेस पहुंची है और मैं इसके लिए बिना शर्त माफी मांगना चाहता हूं. मुझे उम्मीद है कि संजय निरूपम मेरी बिना शर्त माफी पर विचार करेंगे, स्वीकार करेंगे और इस मुद्दे को बंद कर देंगे.’

2जी घोटाला को बड़ा फ्रॉड कहना जल्दबाजी होगी

दरअसल, साल 2014 में विनोद राय की एक किताब आई थी. Not Just an Accountant: The Diary of the Nation’s Conscience Keeper शीर्षक से प्रकाशित इस किताब में लेखक विनोद राय ने कांग्रेस नेता संजय निरूपम के नाम का उल्लेख उन सांसदों के साथ किया था, जिन्होंने 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन मामले में कैग की रिपोर्ट में पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का नाम नहीं लेने के लिए उन पर कथित तौर पर दबाव बनाया था. इतना ही नहीं, पूर्व सीएजी ने अपनी किताब में लगाए गए ये आरोप एक खबरिया चैनल को दिए साक्षात्कारों में भी दोहराया था. फिर क्या था. संजय निरूपम ने विनोद राय के खिलाफ मानहानि का मुकदमा दायर कर दिया. अब जबकि विनोद राय ने इस मामले में संजय निरूपम से माफी मांग ली है तो इससे इस बात की गारंटी तो मिल नहीं सकती कि 2जी घोटाला हुआ ही नहीं. यह एक बड़ा फ्रॉड था.

इस बात से कोई इंकार नहीं है कि 2जी घोटाले में अब तक जो तथ्य या विशेष अदालत के जो फैसले आए हैं सब तत्कालीन यूपीए सरकार को बदनाम करने और देश की अर्थव्यवस्था को पटरी से उतारने की साजिश थी. इस साजिश के हिस्सेदारों के नामों को ट्वीटर पर चिड़िया बनाकर खूब उड़ाए भी जा रहे हैं. इस बात से भी इंकार नहीं कि यह एक गंभीर किस्म का आपराधिक षड्यंत्र है. कांग्रेस ने अपने प्रवक्ता पवन खेड़ा के हवाले से एक ट्वीट में यहां तक लिखा कि जो आदमी अपनी किताब बेचने के लिए इतने बड़े झूठ का सहारा ले सकता है, सरेआम पूरे देश के सामने झूठ बोल सकता है; वो अपना और अपने आकाओं का एजेंडा आगे बढ़ाने के लिए क्या-क्या नहीं कर सकता है. लेकिन इस सच से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि सीबीआई ने विशेष अदालत ने उस फैसले के खिलाफ ऊपरी अदालत में अपील भी कर रखी है जिसमें मामले के सभी आरोपियों को बरी कर दिया गया था. निश्चित तौर पर यहां नमक हलाल फिल्म के उस गाने की पहली लाइन रात बाकी... बात बाकी... को आप गुनगुना सकते हैं. कहने का मतलब यह कि कांग्रेस को इसके लिए अंतिम फैसले का इंतजार होगा. तब तक इस घोटाले में तत्कालीन यूपीए सरकार को क्लीन चिट देना या इस पूरे घोटाले को एक बड़ा फ्रॉड कहना जल्दबाजी होगी.

राजनीतिक धमाका कैसे हो सकता है माफीनामा?

संजय निरूपम से विनोद राय के माफीनामे को दिवाली से पहले मोदी-शाह के राजनीतिक धमाके के तौर पर भी देखा जा रहा है. दरअसल विशेष अदालत ने 2जी घोटाले के सभी आरोपियों को बरी कर इस मामले को पूरी तरह से खत्म कर दिया था. अब जबकि उत्तर प्रदेश समेत पांच राज्यों में चुनावी सरगर्मियां तेज हो चली हैं, महंगाई और बेरोजगारी के मु्द्दे से लोगों को भटकाने के लिए फिर से 2जी घोटाले को हवा दी जा रही है. यूपी चुनाव में 40 प्रतिशत महिलाओं को टिकट देने और पांच प्रतिज्ञा का राग छेड़कर कांग्रेस नेत्री प्रियंका गांधी ने जिस तरह की मुश्किलें भाजपा के समक्ष खड़ी कर दी हैं, आने वाले वक्त में इससे निपटने के लिए भाजपा के रणनीतिकारों को कांग्रेस पार्टी के और भी गड़े मुर्दे उखाड़ने में मेहनत करनी पड़ेगी. लेकिन बड़ा सवाल यह है कि विनोद राय का माफीनामा भाजपा जैसी ताकतवर सत्ताधारी पार्टी के लिए राजनीतिक धमाका कैसे हो सकता है. आज जब देश 5जी की तरंगों में अपने रंग भर रहा है, 2जी के गड़े मुर्दे को उखाड़ और उभारकर कुछ भी हासिल नहीं हो सकता.

बहरहाल, जब बात निकली है तो गालिब के शब्दों में यह दूर तलक जाएगी ही. अगर किताब में गलत तथ्य को पेश करने और मानहानि का मुकदमा होने पर हलफनामे में विनोद राय जैसे ताकतवर और कद्दावर पूर्व नौकरशाह माफी मांग सकते हैं तो उन्हें आज भारतीय जनमानस को इस बात का जवाब भी देना चाहिए कि सीएजी रिपोर्ट क्यों और कैसे लीक हुई थी? आखिर उस रिपोर्ट को लीक करने के पीछे उनका मकसद क्या था? अगर मकसद जैसा कि कांग्रेस पार्टी कहती है, विनोद राय के फर्जीवाड़े से शुरू हुआ था अन्ना का भ्रष्टाचार विरोधी आदोलन और डॉ. मनमोहन सिंह जैसे ईमानदार पीएम को बदनाम करने का पाप किया थी सीएजी ने तो फिर विनोद राय की माफी स्वीकार्य नहीं होनी चाहिए. सीएजी या इस तरह की जो भी संवैधानिक संस्थाएं जिनपर लोग भरोसा करते हैं उसे किसी राजनीतिक पार्टी का टूलकिट नहीं बनना चाहिए.

(2 नवंबर 2021 को https://www.tv9hindi.com में प्रकाशित)
https://www.tv9hindi.com/opinion/vinod-rai-has-created-a-new-controversy-by-apologizing-to-congress-leader-sanjay-nirupam-on-2g-spectrum-899337.html