Monday, 13 May 2013

हलफनामे से हांफती संप्रग सरकार


कोल ब्लॉक आवंटन घोटाले में केंद्रीय जांच ब्यूरो के सुप्रीम कोर्ट में दिए हलफनामे और उसके बाद सुप्रीम कोर्ट की कड़ी टिप्पणी से केंद्र की संप्रग सरकार बुरी तरह हांफ रही है। अश्विनी कुमार को कानून मंत्री के पद से हटना पड़ा। सीबीआई की जांच रिपोर्ट सरकार से साझा करने पर गलत जानकारी देने के मामले में सरकार के अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल हरेन रावल को इस्तीफा देना पड़ा। अब प्रमुख विपक्षी दल भाजपा प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का इस्तीफा मांग रही है। भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी का मानना है कि अब मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बने रहने का कोई तर्क नहीं है। प्रधानमंत्री को बचा रहे कानून मंत्री को पद से हटाने के फैसले के बाद चीजें आगे बढ़नी चाहिए और आगे का रास्ता यही है कि प्रधानमंत्री को अब निश्चित तौर पर इस्तीफा देना चाहिए। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह भी कह रहे हैं कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह यदि स्वयं ईमानदारी से आत्मनिरीक्षण करें तो उनके पास इस्तीफे के अलावा और कोई विकल्प नहीं बचता है। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि पीएम का भविष्य बहुत कुछ सुप्रीम कोर्ट में 10 जुलाई को कोलगेट पर होने वाली सुनवाई पर टिका है। कहने का तात्पर्य यह कि पिछले कुछ सालों से खेलगेट, कोलगेट या फिर रेलगेट जैसे मामले उजागर हुए हैं, संप्रग सरकार की शासन व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करते हैं।

दरअसल इस सरकार के भ्रष्टाचार की कई कहानियां हैं, लेकिन हम यहां सिर्फ कोलगेट की ही बात करेंगे और उसमें भी सीबीआई के सुप्रीम कोर्ट में दिए उस हलफनामे की जिससे मनमोहन सरकार हांफती नजर आ रही है। संप्रग सरकार पांचवें साल में प्रवेश करने वाली है और लोकसभा चुनाव सिर पर है इसलिए मुश्किलें कुछ ज्यादा ही हैं। आगे बढ़ने से पहले हमें यहां यह जानना जरूरी होगा कि सीबीआई के इस हलफनामे की चिंगारी उठी कहां से? यह सवाल बेहद अहम है और देश को इसके बारे में जरूर पता होना चाहिए। साल 2003 में भाजपा के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) सरकार ने साल 2012 तक सभी को बिजली देने की मिशन की घोषणा की थी और इसके लिए एक लाख मेगावॉट अतिरिक्त बिजली के उत्पादन का लक्ष्य तय किया गया। लेकिन जब साल 2004 में कांग्रेस के नेतृत्व वाला संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) सत्ता में आया तो उसे लगा कि कोल इंडिया इतने बड़े पैमाने पर कोयले का उत्पादन नहीं कर पाएगी।

योजना आयोग के अनुमान के आधार पर सरकार ने निजी और सरकारी कंपनियों को अधिक कैप्टिव खदान आवंटित करने का निर्णय लिया। अब आप जानना चाहेंगे कि कैप्टिव खदान क्या है? साल 1973 में भारत सरकार ने कोयले के खनन को अपने हाथों में ले लिया था। सरकारी कंपनी कोल इंडिया लिमिटेड दुनिया की सबसे बड़ी कोयला उत्पादक कंपनी है और भारत में कोयला बेचने की एकमात्र एजेंसी भी। लेकिन साल 1976 में लोहे और इस्पात के निजी उत्पादकों को अपने आंतरिक इस्तेमाल के लिए कोयले की खदान दी जाने लगीं। ऐसी खदानों को ‘कैप्टिव खदान’ कहते हैं और इनका इस्तेमाल केवल और केवल उन्हीं कारखानों के लिए किया जा सकता है जिनके लिए इन्हें आवंटित किया गया हो। साल 2006 से 2009 के बीच निजी कंपनियों को 75 और सरकारी कंपनियों को 70 कोल ब्लॉक आवंटित किए गए। ये आवंटन कोयला मंत्रालय ने किए। इस दौरान कोयला मंत्रालय प्रधानमंत्री के पास था और प्रधानमंत्री थे मनमोहन सिंह। मंत्रालय ने इन आवंटनों के लिए एक स्क्रीनिंग कमेटी बनाई थी। ये कमेटी 1992 में बनाई गई थी और इसमें तीन बार साल 2005, 2006 और 2008 में बदलाव भी किए गए। लेकिन बाद में नियंत्रक और महालेखा परीक्षक यानी सीएजी ने कहा कि कोल ब्लॉकों को लीज पर दिए जाने में जिन दिशा-निर्देशों का पालन किया गया वो पारदर्शी नहीं थे। वर्ष 2004 में सरकार ने पहले कैप्टिव खदानों की नीलामी का सुझाव दिया। इसमें तर्क ये था कि जिसे भी कैप्टिव खदान मिलेगी उसकी तो चांदी हो जाएगी क्योंकि कोल इंडिया से खरीदने या आयात करने की तुलना में अपनी खदान से कोयला सस्ता पड़ेगा। कहने का तात्पर्य यह कि जिसे भी कैप्टिव खदान मिलती, उसे बाजार से सीधे कोयला खरीदने वाली कंपनी से सस्ता कोयला मिलता। लेकिन आने वाले वर्षों में नीलामी की ये योजना खटाई में पड़ती गई क्योंकि बिजली कंपनियों को इससे कोयले की कीमत बढ़ने का डर सताने लगा।

अक्तूबर 2008 में संसद में कोल ब्लॉक की नीलामी पर एक नया विधेयक पेश किया गया जो सितंबर 2010 में कानून बन गया। साल 2012 में सीएजी ने कहा कि कोल ब्लॉक आवंटित करने में कई स्तरों पर पारदर्शिता लाने की प्रक्रिया में देरी हुई जिससे निजी कंपनियों को 1 लाख 85 हजार 591 करोड़ रुपयों का वित्तीय लाभ हुआ यानी सरकार को चूना लगा। बचाव में सरकार ने कुतर्क देना शुरू किया कि गठबंधन सरकार में नीतिगत फैसले लेने में समय लगता है। सरकार ने ये भी तर्क दिया कि विपक्षी भाजपा जिन राज्यों में सत्ता में है, वहां की सरकारों ने भी नीलामी का विरोध किया था। अंतत: सीएजी ने अपनी रिपोर्ट में लिखा, 'स्क्रीनिंग कमेटी ने पारदर्शी तरीका नहीं अपनाया।' सबसे अहम बात ये है कि सीएजी के अनुसार कोल ब्लॉकों को आवंटित करने के पीछे 2012 तक सभी को बिजली देने का सपना था और उसे पूरा नहीं किया गया। जिन 86 कोल ब्लॉकों को साल 2010-11 तक उत्पादन शुरू करना था उनमें से सिर्फ 28 ने ही 31 मार्च 2011 तक ऐसा किया। फरवरी 2012 में सरकार ने सीएजी को बताया था कि कोल ब्लॉक को उत्पादन स्तर तक पहुंचने में तीन से सात वर्ष तक का समय लग सकता है।

सीएजी रिपोर्ट को आधार बनाकर विपक्ष ने कोल ब्लॉक आवंटन घोटाले की जांच की मांग को लेकर संसद ठप कर दिया। सरकार नियंत्रित सीबीआई ने जांच की और फिर जैसा कि अनुमान था, जांच रिपोर्ट में सरकार ने अपने तरीके से दखलंदाजी की। सीबीआई के तत्कालीन उप महानिरीक्षक रविकांत मिश्रा को जांच टीम से हटाकर गुप्तचर ब्यूरो में तबादला कर दिया गया। जब इतनी सारी बातें सामने आईं तो सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई से सरकार की दखलंदाजी पर हलफनामा मांग लिया। यह खबर मीडिया में ऐसे वक्त में लीक हुई जब बजट सत्र चल रहा था। कई महत्वपूर्ण वित्तीय विधेयक संसद में पारित होने थे। अगर सीबीआई के हलफनामे पर गौर किया जाए तो यह अदालत की अवमानना का मामला बनता है। क्योंकि सुप्रीम कोर्ट की साफ हिदायत थी कि जांच एजेंसी को सभी तरह के दबावों का मुकाबला करना चाहिए और उसे अपनी जांच रिपोर्ट कानून मंत्री सहित किसी के साथ भी साझा नहीं करनी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट की तीन सदस्यीय खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान सरकार और सीबीआई को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि सरकारी अधिकारियों के सुझाव पर रिपोर्ट की मूल आत्मा को ही बदल दिया गया। इससे जांच की पूरी दिशा ही बदल गई। सीबीआई जांच रिपोर्ट में केन्द्र के हस्तक्षेप पर चिंता व्यक्त करते हुए न्यायाधीशों ने कहा कि सीबीआई का काम कथित गड़बड़ियों के लिए कोयला मंत्रालय के अधिकारियों से पूछताछ करना है। सीबीआई के साथ विचार-विमर्श करने का उनका कोई सरोकार नहीं है। संयुक्त सचिव सीबीआई की जांच रिपोर्ट का अवलोकन कैसे कर सकते हैं?

अब ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि सीबीआई के हलफनामे से हांफ रही सरकार क्या सीबीआई रूपी तोते को पिंजरे से आजाद कर पाएगी? प्रथम दृष्ट्या तो इसका जवाब ना में ही होगा। देश की कोई भी पार्टी नहीं चाहती है कि सीबीआई को स्वायत्त संस्था का दर्जा दिया जाए क्योंकि सबके दामन दागदार हैं और उसे इस बात से डर लगता है सीबीआई अगर पिंजरे से बाहर आ गई तो उनकी बाकी जिंदगी जेल में ही कटेगी। लेकिन इस सबके बीच सुप्रीम कोर्ट की कड़ी फटकार के बाद सरकार ने सीबीआई रूपी 'तोते' को 'पिंजड़े' से आजाद करने की तैयारी शुरू कर दी है। इसके लिए वित्त मंत्री पी. चिदंबरम की अध्यक्षता में जीओएम (मंत्री समूह) का गठन भी कर दिया गया है। यह मंत्री समूह सीबीआई एक्ट (2010) में सुप्रीम कोर्ट के ताजा निर्देशों के अनुरूप बदलाव के सुझाव देगा। दरअसल सीबीआई अभी तक 1963 के दिल्ली विशेष पुलिस स्थापना कानून (डीएसपीईए) के आधार पर काम कर रही है। सुप्रीम कोर्ट के 1998 के विनीत नारायण फैसले के बाद इसमें कुछ बदलाव किए गए थे। जीओएम सुप्रीम कोर्ट के ताजा निर्देशों के अनुरूप इस एक्ट में बदलाव के सुझाव देगा जिसे सरकार 10 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट में पेश करेगी।

बहरहाल, हलफनामे के पीछे की पूरी कहानी आप समझ चुके होंगे। सपना था सबको बिजली देने का, ठीक उसी तरह जिस तरह से कांग्रेस की राष्ट्रीय अध्यक्ष सोनिया गांधी सबको भोजन की गारंटी योजना के तहत खाद्य सुरक्षा विधेयक संसद में पारित कराना चाहती हैं। लेकिन एक हलफनामे ने संप्रग सरकार का पूरा खेल बिगाड़ दिया है। यह कोई मामूली हलफनामा नहीं है जिसे सत्ता की ताकत से दबा दिया जाए। इस हलफनामे ने पूरे सत्ता तंत्र को हिलाकर रख दिया है। सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी से इस बात का सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में सरकार लोक की कोई बात नहीं कर रही, सिर्फ तंत्र की हनक से लोक को दबाकर रखने की जुगत भिड़ाई जा रही है। हलफनामे से सरकार का हांफना भी स्वभाविक है क्योंकि अगले साल देश में लोकसभा चुनाव होने हैं। भ्रष्टाचार के मकड़जाल में फंसी कांग्रेस नीत संप्रग सरकार को इस बात का भय सता रहा है कि कहीं उसकी दुर्दशा कर्नाटक में भाजपा सरकार की तरह ना हो जाए। ऊपर से कुछ लोकलुभावन विधेयक मसलन खाद्य सुरक्षा बिल, भूमि अधिग्रहण बिल आदि इस हलफनामे की वजह से संसद में पारित नहीं हो पाए। चुनाव से पहले अगर ये बिल सरकार पारित नहीं करा पाती है जिससे काफी उम्मीदें हैं तो जनता की अदालत का सामना करना संप्रग सरकार के लिए काफी मुश्किल भरा काम होगा।

Sunday, 7 April 2013

कहीं 'मोदी फोबिया' में तो नहीं जी रहे कांग्रेसी

लगता है पूरी की पूरी कांग्रेस पार्टी `मोदी फोबिया` से ग्रस्त हो गई है, इसीलिए कांग्रेस के दिग्गज नेता एक सुर में गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को कोसने में लगे हैं। एक कांग्रेस नेता ने तो मोदी को यमराज तक कह डाला। एक और दिग्गज नेता जो कैबिनेट मंत्री भी हैं ने सारी हदें तोड़ते हुए मोदी को गुजरात का लोकल दादा करार दे दिया। आमतौर पर नरेन्द्र मोदी पर कांग्रेस के नेता हमला करने का कोई भी मौका नहीं गंवाते, लेकिन उनके द्वारा भारत मां का कर्ज चुकाने की बात कहने के बाद तो कांग्रेसी हमलों की बाढ़ सी आ गई है। नरेंद्र मोदी ने कहा था `हर बच्चे का कर्तव्य है कि वह ‘भारत माता’ का कर्ज चुकाए। न सिर्फ मोदी बल्कि हर बच्चे और नागरिक का भारत माता के प्रति ऋण है। यह उसका कर्तव्य है कि जब भी अवसर आए, वह उसे चुकाए।` हम यहां उन चंद बयानों पर गौर करेंगे जिसमें मोदी के इस बयान के बाद कांग्रेसी नेताओं ने सार्वजनिक रूप से मोदी पर हमले किए हैं।

-कांग्रेस प्रवक्ता राशिद अल्वी ने मोदी तुलना यमराज से की। दरअसल अल्वी से पत्रकारों ने राहुल गांधी के उस बयान पर प्रतिक्रिया मांगी थी जिसमें उन्होंने सीआईआई की बैठक में मोदी पर निशाना साधते हुए कहा था कि कोई आदमी घोड़े पर सवार होकर आए और लोगों की समस्या हल कर दे ऐसा नहीं होने वाला है। इसपर अल्वी ने कहा कि अगर राहुल को मोदी के बारे में कुछ कहना होता तो वह भैंसे की सवारी की बात कहते, क्योंकि यमराज भैंसे की सवारी करते हैं।
-सूचना प्रसारण मंत्री मनीष तिवारी की बयान बेहद आपत्तिजनक था। एक तरह से सांप्रदायिक बयान भी इसे कह सकते हैं। तिवारी ने कहा, `कहीं ऐसा न हो जाए कि मोदी पूरे देश में गुजरात वाली घटना को दोहरा दें। मुझे गुजरात के मुख्यमंत्री की मंशा पर चिंता होती है। शायद भारत में या भारत के बाकी हिस्सों में उनकी वही करने की मंशा हो जो उन्होंने गुजरात में 2002 में किया।’
-यूपीए सरकार में दूरसंचार मंत्री कपिल सिब्बल भी अपने बयानों की वजह से कांग्रेस के उस्ताद माने जाते हैं। सिब्बल ने नरेंद्र मोदी पर अपने ताजे हमले में कहा कि मोदी केंद्र की राजनीति में आना चाहते हैं, लेकिन वह लगते हैं लोकल दादा की तरह।
-कांग्रेस सांसद संदीप दीक्षित कहते हैं कि नरेन्द्र मोदी अहंकारी व्यक्ति हैं। मां का कर्ज कोई भी व्यक्ति नहीं चुका सकता। संदीप दीक्षित दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के बेटे हैं और राहुल गांधी के करीबी भी माने जाते हैं।
-कांग्रेस सांसद हरीश रावत ने भारत मां का कर्ज चुकाने के मोदी के बयान पर कहा कि मोदी के लिए सबसे बड़ी बाधा उनकी अपनी सोच है। हरीश रावत उत्तराखंड से सांसद हैं और सोनिया व राहुल के खासमखास माने जाते हैं।

दरअसल देश चुनावी मोड में आ गया है। देश की दो राष्ट्रीय पार्टियां कांग्रेस और भाजपा मैदान में खुलकर बल्लेबाजी करने लगी है। हालांकि 2014 में होने वाले लोकसभा चुनावों में अभी लगभग एक साल का वक्त बाकी है। लेकिन इन दोनों ही पार्टियों के नेताओं नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी के बीच अघोषित तौर पर `जंग का एलान` हो चुका है। लेकिन कांग्रेस नेता यह नहीं चाहते कि नरेंद्र मोदी गुजरात की सीमा से बाहर आएं। कांग्रेस कहीं न कहीं `मोदी फोबिया` से ग्रस्त दिख रही है। उसे लगता है कि अगर एक बार मोदी केंद्रीय राजनीति में आ गया तो फिर जिस तरह से गुजरात से कांग्रेस का सफाया हो गया है, कहीं केंद्र की सत्ता से भी बेदखल न होना पड़ जाए।

मोदी और राहुल के बीच अघोषित जंग से इस बात के संकेत लगातार मिल रहे हैं कि यह मुकाबला अमेरिकी चुनाव जैसा हो सकता है, जहां राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार बहस में शरीक होकर राष्ट्रीय और अंतराष्ट्रीय मुद्दों पर चर्चा करते हैं। अमेरिकी नागरिकों की भी दोनों प्रत्याशियों पर पैनी नजर होती है। कुछ इसी तरह की भावनाएं भारतीय लोकतंत्र में भी नरेन्द्र मोदी और राहुल गांधी को लेकर दिखाई दे रही है। इस मुकाबले में राहुल गांधी के पक्ष में जो सबसे बड़ी बात दिखाई देती है, वह यह कि वे युवा हैं और पूरी कांग्रेस पार्टी उनके पीछे एकजुट होकर खड़ी है। पार्टी में उनकी प्रधानमंत्री पद पर ताजपोशी के लिए आवाजें भी बुलंद होती रहती हैं। लेकिन उनमें आत्मविश्वास की बेहद कमी है। उन्हें किसी बड़े पद पर काम करने का अनुभव नहीं है। जनता के बीच अपना प्रभाव नहीं छोड़ पाते।

दूसरी ओर नरेन्द्र मोदी की छवि विकास पुरुष की है और आत्मविश्वास उनके अंदर कूट-कूट कर भरा हुआ है। लंबा राजनीतिक अनुभव है गुजरात से लेकर केंद्र की राजनीति तक का। दुनिया भर में हर वर्ग के लोग नरेंद्र मोदी के भाषण शैली के मुरीद हैं। एक जमाने में लोग अटल के भाषण के मुरीद थे और आज लोग नरेंद्र मोदी के भाषण के मुरीद हैं। गांधीनगर में मोदी के भारत माता के कर्ज चुकाने संबंधी बयान के यही मायने निकाले जा रहे हैं कि मोदी केंद्र की सक्रिय राजनीति में पदार्पण कर रहे हैं। भाजपा ने संसदीय बोर्ड में शामिल करके मोदी की महत्वाकांक्षा पर एक तरह से मुहर लगा चुकी है। मोदी निश्चित रूप से जनाधार वाले नेता हैं। अच्छे वक्ता हैं और लोग उनकी बातों को ध्यान से सुनते भी हैं, लेकिन दिक्कत सिर्फ यह है कि उनके पीएम पद की उम्मीदवारी पर खुलकर कोई समर्थन नहीं कर रहा है। कांग्रेसी नेताओं की तरह भाजपा के कुछ आला नेता आखिर क्यों मोदी फोबिया में जी रहे हैं यह समझ से परे है। पार्टी को इसपर मंथन करना चाहिए।

हां, यह बात तय है कि अगर भाजपा नरेंद्र मोदी को देश के अगले प्रधानमंत्री के लिए उम्मीदवार घोषित करती है तो राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन में दरार पड़नी तय है, लेकिन पार्टी को इस बात पर मंथन करना चाहिए कि मोदी के नाम पर भाजपा `एकला चलो रे` की नीति क्यों नहीं अपनाती है। असल में भाजपा की पहली पंक्ति में बैठे नेताओं में आत्मविश्वास की बेहद कमी है। सत्ता पाने की उधेड़बुन में फंसे इन नेताओं को लगता है कि लोकसभा चुनाव-2014 अगर हाथ से निकल गया तो फिर दिल्ली की सत्ता कभी हाथ न आने वाली। बात भी सही है। अच्छा मौका है भाजपा के लिए कांग्रेस को पटखनी देने का। लेकिन भाजपा को यह समझना होगा कि पार्टी में नरेंद्र मोदी इकलौते नेता हैं जिनकी स्वीकारोक्ति पूरे देश में है। पश्चिमी देश भी मोदी का लोहा मानने लगे हैं। इसी बात से तो कांग्रेस भी डरी हुई है। कांग्रेस नेताओं की तो पूरी शक्ति इसी मिशन में लगी है कि सामने कोई भी हो, पर नरेंद्र मोदी न हो। इसीलिए जब भी नरेंद्र मोदी कोई ऐसा बयान देते हैं जिससे यह लगता है कि मोदी के कदम प्रधानमंत्री पद की ओर बढ़ रहे हैं तो एक सुर में कांग्रेसी हमले शुरू होने लगते हैं और गौर करें तो पाएंगे कि कांग्रेस नेताओं के निशाने पर सिर्फ नरेंद्र मोदी होते हैं ना कि मोदी की भाजपा।
(ज़ी न्यूज़ डॉट कॉम हिन्दी- April 07, 2013)

Wednesday, 6 February 2013

नरेंद्र मोदी बनेंगे धर्म और राजनीति के सेतु?

धर्मनगरी प्रयाग में पृथ्वी का सबसे बड़ा धार्मिक आयोजन `महाकुंभ` अपने उफान पर है। ऐसा माना जा रहा है कि महाकुंभ-2013 इस देश में धर्म और राजनीति के बीच सैकड़ों सालों से चले आ रहे उस सौतिया डाह को खत्म करेगा जिसकी वजह से भारत `गुलाम भारत` की मन:स्थिति से आज तक उबर नहीं पाया है। बड़े नाजुक समय में महाकुंभ-2013 आया है। ऐसे समय में जब गंगा उदास है और यमुना हताश है। एक ऐसा समय जब `गटर गंगा` का बोलवाला है। इस महाकुंभ में हमें प्रण लेना है नदियों को बचाने का। नदियां बचेंगी तो जीवन बचेगा और जीवन रहा तभी धर्म बचेगा और बचेगी राजनीति। आप गौर करें तो समझ में आएगा कि इस देश में धर्म और राजनीति दोनों ही हाशिए पर हैं और यही वजह है कि देश डूब रहा है गटर गंगा में। हम यानी हमारा देश न तो नैतिक सत्ता के स्वामी हैं, न ही आर्थिक सत्ता के और न ही आध्यात्मिक सत्ता के। जरा सोचिए! कैसे बनेंगे विश्व गुरु। जरा सोचिए! कैसे बनेंगे हम सुपर पावर। इन सब ऊहा-पोहों के बीच महाकुंभ में धर्म संसद का आयोजन निश्चित रूप से एक बड़े बदलाव की आहट है। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि धर्म संसद में देश के प्रधानमंत्री पद के लिए गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को पेश करने के जो कयास लगाए जा रहे हैं, वाकई वह धर्म और राजनीति को जोड़ पाने में सफल होंगे? जिस धर्म और राजनीति के बीच तालमेल बिठाने का काम साबरमती के संत (महात्मा गांधी) पूरा नहीं कर पाए, क्या नरेंद्र मोदी उस संत के अधूरे कार्य को पूरा कर पाएंगे। निश्चित रूप से बड़ा सवाल है और देश इस बड़े सवाल पर बेचैन सा दिख रहा है।

आगे बढ़ने से पहले हमें धर्म और राजनीति के रिश्ते को समझना होगा। आखिर क्या वजह है कि भारत में धर्म और राजनीति एक दूसरे के पूरक नहीं बन पा रहे हैं? क्यों दोनों दो ध्रुव पर खड़े हैं? क्या आपमें कभी यह जानने की उत्कंठा हुई कि धर्म क्या है और राजनीति का धर्म से क्या रिश्ता है? सदियों से चली आ रही इस गुत्थी को किसी ने सुलझाने का प्रयास नहीं किया? प्रयास क्यों नहीं किया गया यह भी एक अबूझ पहेली है। आइए मिलकर थोड़ी माथापच्ची करते हैं। आध्यात्मिक संत ओशो के अनुसार, `धर्म जीवन को जीने की एक कला है एक मंत्र है, जीवन को जीने का एक विज्ञान है। इस रूप में धर्म यदि जीवन कला की आत्मा है तो राजनीति जीवन कला का शरीर है। धर्म अगर प्रकाश है जीवन का तो राजनीति पृथ्वी है। अब सोचने वाली बात है अकेली आत्मा और अकेला शरीर का क्या अस्तित्व होगा। शरीर न हो तो आत्मा अदृश्य हो जाती है और खो जाती है और आत्मा न हो तो शरीर सड़ जाता है, दुर्गंध देने लगता है। ठीक इसी तरह धर्म के बिना राजनीति सड़ा हुआ शरीर हो जाती है। लेकिन यह भी याद रहे कि राजनीति से विहीन धर्म भी विलीन हो जाता है।` इस देश की दशा कुछ ऐसी ही है जहां धर्म और राजनीति एक दूसरे के खिलाफ खड़े हैं, देश हाशिये पर जा रहा है।

दरअसल धर्म के ठेकेदारों ने सैकड़ों सालों से धर्म को राजनीति निरपेक्ष बनाए रखा और प्रतिक्रिया में राजनीतिज्ञों ने भी मौका पाकर राजनीति को धर्मनिरपेक्ष बनाकर बदला ले लिया, लेकिन सोचने वाली बात यह है कि इससे नुकसान किसका हुआ। राजनीति का धर्म निरपेक्ष होने का क्या मतलब हो सकता है, यही न कि जीवन में जो भी महत्वपूर्ण है, जो भी श्रेष्ठ है, राजनीति को उससे कोई वास्ता नहीं। फिर धर्म से निरपेक्ष होने का अर्थ सत्य से निरपेक्ष होना, प्रेम से निरपेक्ष, जीवन के गूढ़ ज्ञान से निरपेक्ष होना है। कोई भी राजनीति अगर धर्म से निरपेक्ष होगी तो वह मनुष्य शरीर में गहरे तक प्रवेश नहीं कर सकती और जो समाज केवल शरीर के आसपास जीने लगता है उस समाज के जीवन में सड़ी लाश जैसी दुर्गंध फैलने लगती है। हमारा मकसद यहां किसी को दोषी ठहराने का नहीं है और अगर दोषी हैं तो दोनों ही दोषी हैं जिसमें पहली गलती धर्म के ठेकेदारों ने की और फिर प्रतिक्रियास्वरूप राजनीतिज्ञों ने की। एक हजार साल तक देश गुलाम था और हिन्दुस्तान के साधु-संतों ने इस गुलामी को उखाड़ फेंकने की दिशा में कोई काम नहीं किया। इनका कहना यह था कि हमें राजनीति से क्या मतलब? कहने का अर्थ यह कि अच्छे लोगों को गुलामी बुरी चीज नहीं लगी। जब देश आजाद हुआ, राजनीति जब सत्ता में आई तो उसने भी कहा कि हमें धर्म से क्या लेना देना है। लेकिन गलत चीज का बदला लेना सही तो नहीं कहा जा सकता है। तो इस परिस्थिति में आज विचारणीय बात यह है कि क्या सदियों से धर्म और राजनीति के सौतिया डाह को उसी तरह से चलने दें जिस रूप में चली आ रही हैं या फिर दोनों के बीच की खाई को पाटा जाए, दूरियां मिटाई जाए।

महाकुंभ में आयोजित धर्म संसद में धर्म और राजनीति को करीब लाने की जो पहल की जा रही है यह निश्चित रूप से देश के भविष्य के लिए अच्छे संकेत हैं। खास बात यह है कि धर्म संसद के संतों ने जिस पराक्रमी राजनेता (नरेंद्र मोदी) को इंगित कर देश की सत्ता सौंपने की बात की है, अगर उसपर अमल हुआ तो तय मानिए कि इतिहास खुद को दोहराएगा नहीं। अगर भारतीय राजनीति के इतिहास पर गौर करें तो महात्मा गांधी और जयप्रकाश नारायण दो ऐसी शख्सियत दिमाग में कौंधते हैं जिन्होंने राजनीतिक सत्ता की चाबी अपने हाथ में ली होती तो देश का नक्शा कुछ और होता। जिस सामाजिक और राजनीतिक परिवेश में हम जी रहे हैं, गौर करें तो आप देखेंगे कि कोई भी राजनेता हमेशा धर्म से दूर भागता है। इसलिए क्योंकि धर्म के सामने उसे आत्मग्लानि होती है। धर्मरूपी दर्पण का वह सामना नहीं कर सकता है क्यों कि उसे उस दर्पण के सामने धर्म और कर्तव्य का पालन न करने का अपराधबोध होने लगता है। उसे मालूम है कि अगर वह धर्म और कर्तव्य से बंध गया तो देश में समस्या ही खत्म हो जाएगी और फिर उसकी अहमियत ही खत्म हो जाएगी। इसीलिए तो राजनीतिज्ञ हमेशा धर्मनिरपेक्ष राजनीति की बात करता है। ठीक इसी प्रकार से कोई भी कमजोर प्रवृति का संत महात्मा कभी नहीं चाहता कि राजनीति से उसका कोई संबंध हो। दिनभर एक दर्जन राजनेताओं को आशीर्वाद देना उसे मंजूर है लेकिन सक्रिय राजनीति से वह हमेशा दूर भागने की कोशिश करता है, ठीक उसी तरह से जिस तरह एक कमजोर ब्रह्मचारी किसी स्त्री को देखकर दूर भागता है कि कहीं पास आने पर उसकी कमजोरी सार्वजनिक न हो जाए।

महात्मा गांधी ने सबसे अच्छा काम किया था कि उन्होंने मुल्क की राजनीति में हिस्सा लिया, लेकिन गांधी का यह प्रयास कुछ ऐसा ही था जैसे कि कोई आदमी डूब रहा हो और उसे बचाकर ठेठ किनारे पर लाकर छोड़ दिया जाए। गांधी जी ने इस देश के साथ कुछ ऐसा ही किया। गुलाम भारत को आजाद कराने के बाद जब देश को पटरी पर लाने की बात आई तो उन्होंने हिन्दुस्तान की सत्ता दूसरों के हाथ में सौंपकर देश को नुकसान पहुंचाया। गांधी एक धार्मिक इंसान थे और जिन लोगों के हाथ में गांधी ने हिन्दुस्तान की सत्ता सौंपी उन्होंने सबसे पहला काम धर्म का राजनीति से रिश्ता तोड़ने का काम किया। गांधी धार्मिक व्यक्ति थे और पंडित जवाहर लाल नेहरू के चित्त में धर्म के लिए कोई जगह नहीं थी। वह घोर राजनीतिक व्यक्ति थे। गांधी के लिए अहिंसा जीवन और मरण का सवाल होता था तो नेहरू के लिए अहिंसा सिर्फ राजनीतिक हथियार। एक धार्मिक व्यक्ति (गांधी) के हाथ में सत्ता जाती तो मुल्क का भाग्य बदल सकता था। लेकिन दुर्भाग्य से ऐसा हो नहीं सका। इसी तरह के एक और शख्स आजादी के आंदोलन से निकले जिनका नाम बिनोबा था और उन्होंने तमाम अच्छे लोगों को राजनीति में जाने से रोका। जयप्रकाश नारायण जैसे नेक इंसान को भी बिनोबा ने राजनीति से अलग कर दिया। भारतीय राजनीति का इतिहास, भारतीय आजादी का इतिहास और धर्म का राजनीति से गठजोड़ इन तीनों परिदृश्यों को जोड़कर जब हम भारत देश के बारे में सोचते हैं तो पता नहीं क्यों मुझे ऐसा लगता है कि अगर आजादी के बाद महात्मा गांधी राजनीतिक सत्ता अपने हाथों में लेते और फिर जयप्रकाश नारायण जैसे लोग गांधी के उत्तराधिकारी बनते तो शायद देश की सूरत कुछ और होती।

उक्त तमाम उपयोगी बातों को उद्धृत करने के पीछे मेरा मानना है कि जिस हिन्दुस्तान के पास सैकड़ों सालों की गुलामी और बहुत कम सैकड़ों सालों की आजादी का इतिहास और वर्तमान का अनुभव हो उस हिन्दुस्तान को इन तमाम अनुभवों से सीखने की जरूरत है। पहली बात तो यह कि इस देश में धर्म और राजनीति को जोड़ने की जल्दी कोई पहल करता नहीं है और इसके बावजूद महाकुंभ-2013 में देश के संत-महात्माओं ने इस दिशा में कोई पहल की है तो वाकई ऐसा अहसास होता दिख रहा है कि भारत की तकदीर बदलने वाली है। मुझे नहीं मालूम कि धार्मिक लोग अचानक से राजनीति के प्रति इस तरह की सदाशयता क्यों दिखा रहे हैं और शायद जानने की जरूरत भी नहीं है। लेकिन जितनी सदाशयता धर्म संसद देश की राजनीति के प्रति दिखा रही है उतनी ही सदाशयता राजनीतिक लोगों को भी धर्म संसद के प्रति दिखानी चाहिए। बड़ी मुश्किल से संगम के तट पर यह संयोग बना है, शायद मुल्क की तकदीर बदलने के लिए।