Friday, 15 October 2021

जब बुझने लगा सामाजिक न्याय का दीया तो मचने लगा ये शोर


भारत की सामाजिक और राजनीति व्यवस्था में यह नारा सदियों से लगता रहा है, 'जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी'. यहीं से शुरू होती है सामाजिक न्याय की लड़ाई. और अब जबकि ये लड़ाई राजनीतिक दलों को कमजोर होती दिखने लगी है, वोट बैंक खिसकने का खतरा मंडराने लगा है, सामाजिक न्याय का दीया बुझने का अहसास होने लगा है तो उसे ठोस आधार प्रदान करने के लिए जातीय जनगणना का शोर मचाया जाने लगा है. जातीय जनगणना कराने की मांग करने वाले नेताओं को ऐसा लगता है कि अन्य पिछड़ी जातियों यानी ओबीसी की श्रेणी में आबादी बढ़ी है, जिसका फायदा उन्हें जातीय जनगणना के आंकड़ों से मिल सकता है. शायद इसीलिए बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने इस बात को जोर-शोर से उठाना शुरू कर दिया है कि जातीय जनगणना कराना बहुत जरूरी है. सामाजिक न्याय और जातीय जनगणना की बात जब उठती है तो एक साथ कई सवाल भी उभरते हैं. पहला सवाल ये कि सामाजिक न्याय का दीया बुझने क्यों लगा है? और दूसरा, जातीय जनगणना कराने से मोदी सत्ता बच क्यों रही है? लेकिन इन सवालों की पड़ताल से पहले जातीय जनगणना के ऐतिहासिक तथ्यों को जान लेना जरूरी है.

जातीय जनगणना के ऐतिहासिक तथ्य

सामाजिक आबादी के बारे में जानकारी देना, उसका विश्लेषण करना और भारत जैसे लोक कल्याणकारी राज्य में यह पता लगाना कि लोगों की पहुंच का स्तर क्या है, यह न केवल समाज विज्ञानियों के लिए बल्कि देश व दुनिया के नीति निर्माताओं और सरकार के लिए भी काफी अहम होता है. देश में पहली बार 1881 में जनगणना कराई गई थी. तब यहां अंग्रेजों का राज हुआ करता था. तब भी जातीय जनगणना के आंकड़े जारी किए गए थे. 1931 तक की जनगणना में जातीय आंकड़े भी जारी किए जाते रहे. पहली बार 1941 की जनगणना में ऐसा हुआ कि जातीय आंकड़े जुटाए तो गए, लेकिन उसे जारी नहीं किया गया. आजादी के बाद पहली बार 1951 में जनगणना हुई. तब से लेकर अब तक सात बार की जनगणना में सिर्फ अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के आंकड़े ही प्रकाशित किए गए. वीपी सिंह की सरकार ने जिस मंडल कमीशन की सिफारिशों को लागू कर पिछड़ों को आरक्षण दिया, उसने भी 1931 की जनगणना को आधार मानकर ही ओबीसी की आबादी 52 प्रतिशत मानी थी.

क्यों बुझने लगा है सामाजिक न्याय का दीया?

जब हम सामाजिक न्याय की बात करते हैं तो सबसे पहले ये ख्याल आता है कि सभी मनुष्य समान हैं, लिहाजा सभी को समान अवसर मिलना चाहिए. इससे आगे बढ़ते हैं तो ये भी महसूस होता है कि किसी के साथ सामाजिक, धार्मिक, लैंगिक, भाषा, नस्ल आदि के आधार पर भेदभाव नहीं होना चाहिए. वक्त के साथ सामाजिक न्याय की अवधारणा में कई नए आयाम जुड़े. 50 और 60 के दशक को याद करें तो समाजवादी नेता व चिंतक राममनोहर लोहिया ने तब इस बात पर जोर दिया था कि पिछड़ों, दलितों, अल्पसंख्यकों और स्त्रियों को एकजुट होकर सामाजिक न्याय के लिए संघर्ष करना चाहिए. लोहिया चाहते थे कि ये समूह एकजुट होकर सत्ता और नौकरियों में ऊंची जातियों के एकाधिकार को चुनौती दें. लोहिया के विचारों की इसी पृष्ठभूमि में आपातकाल के बाद के राजनीतिक कालखंड में सामाजिक न्याय भारतीय राजनीति का एक प्रमुख नारा बना भी. खासतौर से 90 के दशक में उन जातियों का वर्चस्व राजनीति में भी स्थापित हुआ जिनकी बात लोहिया ने की थी. लेकिन जिस अरमान से जनता ने लालू, मुलायम, मायावती जैसे नेताओं को सत्ता के शिखर पर पहुंचाया, लोहिया के मानकों पर खड़े नहीं उतरे. उसकी बड़ी वजह यह रही कि ये नेता परिवारवाद और भाई-भतीजावाद में इस कदर फंस गए कि शासन की नीति के तौर पर जो काम इन्हें करने चाहिए थे वो वक्त रहते कर नहीं पाए. इनके लिए सामाजिक न्याय का नारा महज चुनावी नारा बनकर रह गया. चुनाव जीतने के बाद उन्होंने पलटकर नहीं देखा कि उनके लोग किस हाल में हैं. वक्त बदला, उसके साथ राजनीतिक व सामाजिक परिस्थितियां भी बदलीं. मौका पाकर भाजपा ने राजनीति की दिशा ही बदल दी. धर्म के आधार पर वोटों का ध्रुवीकरण और सरकारी कंपनियों का निजीकरण देश को उस मुहाने पर लाकर खड़ा कर दिया जहां नौकरियों में आरक्षण के मायने खत्म होने को हैं. जाति से इतर पूरे देश को 85 प्रतिशत बनाम 15 प्रतिशत में बांट दिया गया. 85 प्रतिशत आबादी जो एक तरह से मजदूरों की श्रेणी में आती हैं उनको जीने भर की चीजें तथाकथित तौर पर मुफ्त में बांटी जा रही है. ऐसे में सामाजिक न्याय का शब्द बेमानी हो गया. जाहिर सी बात है, जब देश में सरकारी कंपनियां बचेंगी ही नहीं तो सरकारी नौकरियों में आरक्षण का मतलब क्या रह जाएगा. जब सभी शिक्षण संस्थान प्राइवेट हाथों में चले जाएंगे तो दाखिले में मिलने वाले आरक्षण के क्या मायने रह जाएंगे. जब यह सब नहीं होगा तो सामाजिक न्याय का दीया कब तक जलेगा और उसके नाम पर राजनीति करने वाले नेताओं की सत्ता कब तक बचेगी?         

जातीय जनगणना से क्यों बच रही मोदी सत्ता?

मंत्रिमंडल विस्तार के बाद जो मोदी सरकार खुद को ओबीसी मंत्रियों की सरकार कहते नहीं थक रही, जो मोदी सत्ता नीट परीक्षा के ऑल इंडिया कोटे में ओबीसी आरक्षण देने पर खुद अपनी पीठ थपथपा रही हो, वही सत्ता जातीय जनगणना के विचार से क्यों डर रही है? यह अपने आप में बड़ा सवाल है. दरअसल, जनगणना खुद में एक बेहद जटिल कार्य है और इसमें कोई भी चीज जब दर्ज हो जाती है, तो उसी से राजनीति भी जन्म लेती है, विकास के नए आयाम भी उसी से निर्धारित होते हैं. इस वजह से कोई भी सरकार बहुत सोच-समझ कर फैसला लेती है. अंग्रेज़ों की ओर से जनगणना लागू करने के पहले जाति व्यवस्था बेहद लचीली और गतिशील हुआ करती थी. लेकिन जब अंग्रेज जातिगत जनगणना लेकर आए तो सब कुछ रिकॉर्ड में दर्ज हो गया और इसके बाद से जाति व्यवस्था बेहद जटिल हो गई. 

याद करें तो 1931 के बाद से जातीय जनगणना नहीं हुई, बावजूद इसके जाति के नाम पर राजनीति अब भी हो रही है. हालांकि अभी जो राजनीति हो रही है, उसका कोई ठोस आधार नहीं है, उसे कानूनी तौर पर चुनौती दी जा सकती है. लेकिन अगर एक बार जनगणना में सब दर्ज हो गया तो वह एक आधार बन जाएगा. और इसके लिए जिस तरह के सत्ता संतुलन की जरूरत होती है वह सत्ताधारी दलों के लिए चुनौती जैसी होती है. दूसरी तरफ इसके नकारात्मक पहलू को परखें तो अगर जातियों की संख्या एक बार पता चल जाए और उस हिसाब से हिस्सेदारी दी जाने लगी तो कम संख्या वाली जातियों का क्या होगा? उनके बारे में कौन सोचेगा? एक दूसरा डर भी है. ओबीसी की सूची केंद्र की अलग है और राज्यों में अलग है. कुछ जातियां ऐसी हैं जिनकी राज्यों में गिनती ओबीसी में होती है, लेकिन केंद्र की सूची में उनकी गिनती ओबीसी में होती ही नहीं है. ऐसे में जातीय जनगणना हुई तो बवाल होना तय है. केंद्र की मोदी सत्ता इस बात को अच्छे से समझती है. लिहाजा वह सुप्रीम कोर्ट में भी कह चुकी है कि केंद्र सरकार 2021 की जनगणना में सामाजिक-आर्थिक जातिगत जनगणना नहीं करा सकती है. इसकी कई व्यवहारिक वजहें भी सरकार के तरफ से गिनाई गई हैं. 

भाजपा नीत मोदी सत्ता जातीय जनगणना से इसलिए भी बच रही है क्यों कि उसे यह डर सता रहा है कि अगर ऐसा हुआ तो क्षेत्रीय दलों को केंद्र सरकार की नौकरियों और शिक्षण संस्थाओं में ओबीसी कोटे में बदलाव के लिए सरकार पर दबाव बनाने का मुद्दा मिल जाएगा, बहुत हद तक संभव है कि ओबीसी की संख्या उन्हें केंद्र की नौकरियों में मिल रहे मौजूदा आरक्षण से कहीं अधिक हो जाए. इससे मंडल पार्ट-2 जैसी स्थिति उत्पन्न हो सकती है और भाजपा को चुनौती देने का एजेंडा तलाश रहीं क्षेत्रीय राजनीतिक दलों को नया हथियार मिल सकता है जिसे बहुत हद तक भाजपा तोड़ चुकी है. कहने का मतलब यह कि सामाजिक न्याय का जो दीया बुझ रहा है उसे जातीय जनगणना से संजीवनी मिल सकती है.

राष्ट्रीय दल भी साधते रहे हैं अपना हित

ऐसा कहा जाता है कि देश की राष्ट्रीय पार्टियां जातीय जनगणना के खिलाफ हैं, लेकिन याद करें तो 2011 की जनगणना से ठीक पहले 2010 में तत्कालीन भाजपा नेता गोपीनाथ मुंडे ने संसद में कहा था कि अगर इस बार भी जनगणना में ओबीसी की गणना नहीं की गई तो ओबीसी को सामाजिक न्याय देने के लिए और 10 साल लग जाएंगे. हम उनके साथ अन्याय करेंगे. इतना ही नहीं, मोदी सरकार के पिछले कार्यकाल में जब राजनाथ सिंह गृह मंत्री थे, 2021 की जनगणना तैयारियों का जायजा लेते समय 2018 की एक प्रेस विज्ञप्ति में सरकार ने माना था कि नई जनगणना में ओबीसी का आंकड़ा जुटाया जाएगा. लेकिन अब सरकार अपने वादे से मुकर रही है. कांग्रेस की बात करें तो भले ही लालू यादव और मुलायम सिंह यादव के दबाव में 2011 की जनगणना में सोशियो इकोनॉमिक कास्ट सेंसस आधारित डेटा जुटाया गया था. लेकिन सत्ता बदल जाने के बाद साल 2016 में मोदी सरकार ने इसके जो आंकड़े प्रकाशित किए उसमें जातीय आंकड़ों को छिपा लिया गया. ये आंकड़े आज भी सामाजिक कल्याण मंत्रालय की फाइलों में दबा पड़ा है.

बहरहाल, जातीय जनगणना एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन चुका है. केंद्र सरकार ने बड़े ही शालीन तरीके से अपनी आपत्ति जताते हुए गेंद राज्य सरकारों के पाले में डाल दिया है. लेकिन इस सच को कोई झुठला नहीं सकता कि जाति की वजह से आए विशेषाधिकारों को खत्म करके ही हम जातिविहीन समाज की स्थापना कर सकेंगे, जहां सभी एक-समान होंगे. और इन विशेषाधिकारों को खत्म करने के लिए सामाजिक-आर्थिक स्थिति के आधार पर गणना करनी ही होगी, जातीय जनगणना के आंकड़ों का सामने लाना ही होगा. सामाजिक न्याय का मूल सिद्धांत भी इसी बुनियाद पर टिका है. और अगर बुनियाद हिली तो न्यू इंडिया और भारतीय समाज को एक नए संकट से जूझना पड़ेगा. और तब सभी राजनीतिक दलों को अपनी साख और सत्ता बचानी मुश्किल हो जाएगी.

(14 अक्टूबर 2021 को https://www.tv9hindi.com में प्रकाशित) 
https://www.tv9hindi.com/opinion/why-is-the-political-noise-of-caste-census-rising-is-social-justice-weakening-869287.html

Tuesday, 12 October 2021

क्या वाकई नवीन पटनायक वाली बीजेडी की जमीन दरक रही है?


बड़ी पुरानी कहावत है- अब पछताए होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत. क्या ये कहावत ओडिशा में बीजेडी यानी बीजू जनता दल और लगातार पांच बार के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक की राजनीतिक परिस्थिति पर फिट बैठ रही है? क्या यह बात सच है कि कांग्रेस मुक्त भारत अभियान में भाजपा का साथ देकर नवीन पटनायक की बीजेडी इस तरह से फंस गई है कि अब उसे सेफ्रॉन पॉलिटिक्स से ही हार का डर सताने लगा है? आज इन सवालों के जवाब तलाशने इसलिए जरूरी हो गए हैं क्योंकि ओडिशा के कुहरते जमीनी विकास पर तमाम राजनीतिक दल अपने-अपने तरीके से अपनी-अपनी इमारतें बुलंद करने में जुटे पड़े हैं.

याद कीजिए वो वक्त जब 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले नरेंद्र मोदी ने 'कांग्रेस मुक्त भारत' का नारा दिया था. तब ओडिशा की बीजेडी सहित कई गैर कांग्रेसी दलों ने तहे दिल से इस नारे की तख्ती को अपने गले में लटकाने में देरी नहीं की थी, क्योंकि ये लोग देश की सबसे पुरानी पार्टी को अपना मुख्य प्रतिद्वंद्वी मान बैठी थीं. हालांकि नवीन पटनायक की अगुवाई वाली बीजेडी पहले ही भाजपा से हाथ मिलाकर एनडीए का हिस्सा बन गई थी ताकि कांग्रेस को सत्ता से दूर रख सके. बीजेडी-भाजपा ने 2000 से 2009 तक ओडिशा में गठबंधन सरकार चलाई, लेकिन यह भी सच है कि नवीन पटनायक को जब यह बात समझ में आ गई कि सत्ता के लिए इस तरह की गलबहियां एक दिन बीजेडी को सत्ता से बाहर कर देगी, दोनों के बीच की राजनीतिक अंतरंगता सीट शेयरिंग के मुद्दे पर टूट गई और दोनों की राहें जुदा-जुदा हो गईं. गैर-कांग्रेसी मुहिम में शामिल होने के 20 साल बाद अब जब कि बीजेडी ने कांग्रेस को जमीनी तौर पर उखाड़ फेंका है, अब वह खुद को मुश्किल परिस्थिति में देख रही है, क्योंकि भाजपा लगातार मुख्य प्रतिद्वंद्वी के तौर पर उभर रही है. बीजेडी के नेता यह अहसास करने लगे हैं कि ओडिशा को 'कांग्रेस मुक्त' करने से क्षेत्रीय दल बीजेडी को उतना फायदा नहीं हुआ, जितना भाजपा को उभरने का मौका मिला.

भाजपा यहां आदिवासी, दलित, ओबीसी का अधिकतर वोट चुनावों में हासिल करने लगी है जो कभी कांग्रेस का वोट बैंक हुआ करता था. भाजपा की हिन्दुत्व नीति भी ओडिशा में उसके प्रसार के लिए काफी अहम है. लेकिन नवीन पटनायक भाजपा की इस चाल को काफी अच्छे से समझते हैं. शायद इसी का असर है कि धर्म और भाषा की राजनीति से हमेशा दूरी बनाकर चलने वाले नवीन पटनायक अब अपने पिता बीजू पटनायक की तर्ज पर चुनाव प्रचार का शुभारंभ और जीत के बाद जगन्नाथ मंदिर जाने लगे हैं. 2019 के बाद से पटनायक धार्मिक मुद्दों पर ध्यान केंद्रित कर उड़िया भाषा और संस्कृति को ध्यान में रखकर नीतियां बनाने लगे हैं, ताकि भाजपा का मुकाबला किया जा सके. सत्ता के गलियारों में इस बात को लेकर खूब कानाफूसी हो रही है कि अपने 5वें कार्यकाल में नवीन पटनायक ने सॉफ्ट हिंदुत्व की राह पकड़ ली है.

16 अक्टूबर 2021 को नवीन पटनायक 75 साल के हो जाएंगे। वर्ष 2000 से वह ओडिशा के मुख्यमंत्री हैं. निश्चित रूप से भाजपा 2024 के विधानसभा चुनाव में इस मुद्दे को उछालेगी कि जिस सूबे में लगातार पांच बार एक ही शख्स मुख्यमंत्री रहा हो और एक क्षेत्रीय दल बीजेडी की मजबूत सरकार रही हो वह सूबा विकास के नक्शे पर इतना पिछड़ा क्यों है? कोरापुट, बोलांगीर, नुआपाड़ा, नबरंगपुर, मलकानगिरी, कालाहांडी की गिनती सबसे गरीब जिलों में क्यों होती है? अब यहां बड़ा सवाल यह उठता है कि जिस शख्स की राजनीतिक जमीन इतनी मजबूत हो, चुनाव में विकास का मुद्दा कितना प्रभाव छोड़ेगा? इसमें कोई शक नहीं कि भाजपा में मोदी युग की बात करें तो 2014 और 2019 के विधानसभा और लोकसभा चुनाव में मिली सीटें और वोट प्रतिशत इस बात की तस्दीक करते हैं कि वह कछुए की चाल चलकर बीजेडी की मुख्य प्रतिद्वंद्वी बनकर खड़ी हो गई है. कांग्रेस यहां तीसरे नंबर की पार्टी बन गई है. 2014 में 147 सीटों वाली विधानसभा चुनाव में बीजू जनता दल ने 43.40 प्रतिशत वोट पाकर 117 सीटें जीती थी वहीं कांग्रेस पार्टी ने 25.70 प्रतिशत वोट हासिल कर 16 और 18 प्रतिशत वोट हासिल कर भाजपा ने 10 सीटों पर जीत दर्ज की थी। 2019 के विधानसभा चुनाव की बात करें तो बीजेडी का वोट प्रतिशत बढ़कर 44.71 प्रतिशत जरूर हो गया लेकिन सीटों की संख्या घटकर 112 रह गई. वहीं भाजपा 32.49 प्रतिशत वोट के साथ 23 सीटों पर जीत दर्ज की और कांग्रेस 16.12 प्रतिशत वोट के साथ 9 सीटें जीतकर तीसरे नंबर की पार्टी बन गई. 

लोकसभा में 21 सीटों की बात करें तो 2014 के मोदी लहर में 20 सीटों पर जीत दर्ज करने वाली बीजेडी 2019 में 8 सीटें गंवाकर 12 सीटों पर सिमट गई. दूसरी तरफ 2014 में भाजपा ने जहां एक सीट जीती थी वहीं 2019 में 8 सीटों पर जीत दर्ज कर यह जताने में कोई कसर नहीं छोड़ी कि आने वाले वक्त में भाजपा बीजेडी को कड़ी चुनौती देने वाली है. हाल ही में पिपिली विधानसभा उपचुनाव में भी नवीन पटनायक की पार्टी महज 20,916 वोट से ही जीतने में कामयाब रही. भाजपा को यहां 42 फीसदी वोट मिले, जबकि बीजेडी को 53.80 फीसदी वोट मिले. अब सबकी नजर 2022 में राज्य में त्रिस्तरीय पंचायत और निकाय चुनाव पर लगी है. राजनीतिक पंडितों का साफ मानना है कि आगामी सभी चुनावों में नवीन पटनायक की पार्टी को भगवा दल से कड़ी चुनौती का सामना करना पड़ेगा. लोकल बॉडी चुनाव से यह भी पता चल जाएगा कि 2024 लोकसभा चुनाव में हवा किस ओर बहने वाली है. इन चुनावों के आंकड़ों पर भी गौर करें तो 2012 में जिस भाजपा के जिला परिषद सदस्यों की संख्या 36 थी, 2017 में बढ़कर 297 हो गई. ऐसे में यह सवाल यह लाजिमी है कि लगातार 21 साल से सत्ता में रहने के बाद भी क्या नवीन पटनायक की बीजेडी के लिए सचमुच चुनाव जीतना पहले की तरह ही आसान होगा या उन्हें एंटी-इंकम्बेंसी का खामियाजा भुगतना पड़ेगा?

हालांकि निकट भविष्य में नवीन पटनायक को एंटी-इंकम्बेंसी का खामियाज़ा भुगतने के सवाल को सिरे से खारिज करने वाले जानकारों का साफ कहना है कि आज भी ओडिशा में नवीन पटनायक के भाषण पर पत्थर नहीं, बल्कि तालियां गूंजती हैं. बावजूद इसके कि पूरे देश में वह अकेले ऐसे मुख्यमंत्री हैं जो अपने राज्य की भाषा उड़िया न तो बोल पाते हैं और न ही पढ़-लिख सकते हैं. लोग उन्हें लगातार पांच बार जिता चुके हैं और हर बार पहले के मुकाबले अधिक मतों से. नवीन पटनायक को करीब से देखने व समझने वाले पत्रकार धड़ल्ले से इस बात का उल्लेख करते हैं कि नवीन पटनायक से बड़ा सॉफ्ट और कम बोलने वाला शख्स राजनीति में है ही नहीं. नवीन पटनायक के जीवन के पिछले पन्नों को पलटेंगे तो शुरुआती पांच दशक तक उन्होंने राजनीति की तरफ आंख उठाकर देखा तक नहीं. लेकिन जब उन्होंने एंट्री ली तो खासतौर पर ओडिशा में उनकी टक्कर का कोई राजनेता दिखाई ही नहीं देता। इसलिए विकास के मुद्दे पर ओडिशा में हार जीत का फैसला मुश्किल ही लगता है.

दूसरी नवीन पटनायक की छवि भी ओडिशा में बीजेडी की जीत के पीछे बड़ी वजह मानी जाती है. इसकी पुष्टि नवीन पटनायक की जीवनी लिखने वाले रूबेन बैनर्जी की उस बात से होती है जिसमें वो कहते हैं कि एक बार उन्हें 1998 में अस्का संसदीय क्षेत्र से नवीन पटनायक का चुनाव कवर करने का मौका मिला था. जब वो अस्का पहुंचे तो उन्हें नवीन पटनायक कहीं नहीं दिखाई दिए. बड़ी मुश्किल से खोजते-खोजते जब वो ओबरॉय गोपालपुर होटल पहुंचे तो उन्होंने देखा कि खबरों की दुनिया से बेखबर पूल के बगल में बैठे नवीन पटनायक सिगरेट पी रहे हैं. मकसद बताने के बाद नवीन पटनायक इस बात के लिए तैयार तो हो गए कि वह उनके साथ चुनाव प्रचार पर जाएंगे लेकिन साथ में दो शर्तें लगा दीं. पहली ये कि वो अपनी रिपोर्ट में ये नहीं बताएंगे कि प्रचार के दौरान नवीन पटनायक ओबरॉय होटल में ठहरे हैं और दूसरा ये कि वो सिगरेट पीते हैं. शायद वो अपने मतदाताओं को ये संदेश नहीं देना चाहते थे कि भारत के सबसे पिछड़े इलाके में वोट मांगने वाला शख्स एक पांच सितारा होटल में ठहरा हुआ है. राजनीति में इस तरह के अनुशासन का पालन बहुत कम राजनेता कर पाते हैं. यही वजह है कि ओडिशा की जनता नवीन पटनायक को किसी देवता से कम नहीं मानती. यहीं पर भाजपा का राजनीतिक अनुशासन मात खा जाती है. तमाम सियासी परिस्थितियां अनुकूल होते हुए भी नवीन पटनायक की टक्कर का कोई नेता नहीं होने की वजह से भाजपा को ओडिशा की सत्ता में आने के लिए उस दिन का इंतजार करना पड़ेगा जब नवीन पटनायक राजनीति से संन्यास लेने की घोषणा करेंगे.

(11 अक्टूबर 2021 को https://www.tv9hindi.com में प्रकाशित) 
https://www.tv9hindi.com/opinion/is-the-political-ground-of-naveen-patnaik-led-bjd-really-cracking-863879.html

Thursday, 30 September 2021

पंजाब : बदलती कांग्रेस के हाथ से फिसलती सत्ता


इसमें कोई दो राय नहीं कि देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस खुद को बदल रही है, लेकिन बदलाव के इस दौर में यह भी सच है कि एक के बाद एक राज्यों की सत्ता उसके हाथ से फिसल रही है। हम बात कर रहे हैं पाकिस्तान की सीमा से लगे उस पंजाब की जहां कुछ दिनों से चल रही भयानक उठापटक ने कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व की नींद उड़ा रखी है। खास बात यह है कि सूबे में आगामी कुछ महीनों में चुनाव होने हैं। कांग्रेस के लिए पंजाब की चुनौती इस रूप में बड़ी है क्योंकि एक तो यहां पार्टी सत्ता में है। दूसरी यह कि यही एक सूबा है जहां कांग्रेस को अगले साल होने वाले पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव में जीत की आस है। लेकिन ताजा राजनीतिक हालात कुछ इस तरह के बनते-बिगड़ते दिख रहे हैं जिसमें यह कहना सबके लिए आसान हो गया है कि बदलती कांग्रेस के हाथ से पंजाब की सत्ता कहीं निकल ना जाए।

कहानी शुरू होती है नवजोत सिंह सिद्धू की कांग्रेस पार्टी में एंट्री से। एक ऐसे सिद्धू की जिसके बारे में कहा जाता है कि चाहे क्रिकेट का मैदान हो या फिर राजनीति का अखाड़ा, कैप्टन से बगावत की अदावत से नवजोत सिंह सिद्धू का नाता पुराना रहा है। तो क्या कांग्रेस आलाकमान को यह बात पता नहीं थी। बिल्कुल पता थी और इसी वजह से बगावत की अदावत वाले सिद्धू के नाम पर कांग्रेस आलाकमान ने मुहर लगाई थी। दरअसल, कांग्रेस का केंद्रीय नेतृत्व उस बात को भूला नहीं था जब 2017 के पंजाब चुनाव के वक्त कैप्टन अमरिंदर सिंह ने धमकी दी थी कि अगर उन्हें मुख्यमंत्री उम्मीदवार नहीं बनाया गया तो वे पार्टी तोड़ देंगे। दरअसल, 2014 में जब कांग्रेस के बड़े-बड़े नेता लोकसभा चुनाव लड़ने से कतरा रहे थे, उस समय सोनिया गांधी के एक इशारे पर कैप्टन अमरिंदर अरूण जेटली के खिलाफ अमृतसर से लोकसभा चुनाव लड़ने के लिए तैयार हो गए थे और फिर वो न सिर्फ चुनाव लड़े, बल्कि उन्होंने जेटली को करारी मात भी दी। अंतत: 2017 के विधानसभा चुनाव में कैप्टन अमरिंदर सिंह की अगुवाई में कांग्रेस ने चुनाव लड़ा और पंजाब की कुल 117 सीटों में से 77 सीटों पर जीत हासिल कर पूरे एक दशक बाद सत्ता में वापसी की। अमरिंदर सिंह की यह जीत इस मायने में बेहद अहम थी कि 2014 में केंद्र में नरेंद्र मोदी की सरकार बनने के बाद भाजपा लगातार एक के बाद एक कई राज्यों में अपनी सरकार बनाती जा रही थी। लेकिन पंजाब की सत्ता में कांग्रेस की वापसी करा अमरिंदर सिंह मोदी-शाह वाली भाजपा के विजय रथ को रोकने वाले नेताओं में शुमार हो गए। इतना ही नहीं, जब 2019 के लोकसभा चुनाव में हर तरफ़ मोदी लहर की ही चर्चा थी, तब भी कांग्रेस ने पंजाब की 13 लोकसभा सीटों में से 8 सीटें जीतीं। इससे अमरिंदर का कद और ऊंचा हो गया। इतना ऊंचा कि अब वो कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व को नजरअंदाज करने लगे। अक्सर ये भी होने लगा कि कैप्टन जब भी दिल्ली आते थे, पीएम मोदी और गृह मंत्री अमित शाह से बिना मिले नहीं जाते थे। अब केंद्रीय नेतृत्व तो केंद्रीय नेतृत्व होता है। वो भी कांग्रेस पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व जहां गांधी परिवार की ही तूती बोलती हो। प्रियंका गांधी और राहुल गांधी को कैप्टन की एको-अहम की राजनीति रास नहीं आई। लेकिन लाख टके का सवाल ये था कि कैप्टन के खिलाफ खड़ा किसे किया जाए? जब आलाकमान ने घोड़े दौड़ाए तो सिद्धू के रूप में एक ऐसा नेता मिल गया जिसने कैप्टन अमरिंदर को सत्ता से बेदखल करने का बीड़ा उठा लिया। 

2017 के विधानसभा चुनाव से ठीक पहले सिद्धू ने कांग्रेस का हाथ थामा था। हालांकि कैप्टन अमरिंदर तब भी सिद्धू की कांग्रेस में एंट्री से खुश नहीं थे। लेकिन सोनिया-राहुल-प्रियंका की तिकड़ी सिद्धू को कैप्टन की नकेल कसने के लिए ही खड़ा किया था। लिहाजा 2017 का चुनाव जीतने के बाद कैप्टन अमरिंदर सिंह को ना चाहते हुए भी सिद्धू को कैबिनेट मंत्री बनाना पड़ा। लेकिन दोनों के बीच खींचतान तब बढ़ गई जब सिद्धू ने यह ऐलान कर दिया कि वे इमरान खान के शपथ ग्रहण समारोह का हिस्सा बनने के लिए पाकिस्तान जाएंगे। तब अमरिंदर ने सिद्धू को इस बात पर पुनर्विचार करने की सलाह भी दी थी लेकिन सिद्धू नहीं माने। मामला तब और पेचीदा हो गया जब अमरिंदर ने पाकिस्तानी सेना प्रमुख कमर जावेद बाजवा के साथ सिद्धू के गले मिलने की घटना का मुखर विरोध कर दिया। उसके बाद 2019 के लोकसभा चुनाव में आलाकमान के निर्देश पर चुनाव प्रचार करने सिद्धू पंजाब पहुंचे तो उन्होंने वहां अपनी ही पार्टी की कैप्टन सरकार पर भ्रष्टाचार का आरोप ये कहते हुए लगाया कि यहां भी 25 प्रतिशत का कमीशन लिया जा रहा है। कांग्रेस के कई नेताओं ने तब सिद्धू पर कार्रवाई की मांग भी की थी। इस तरह से कैप्टन अमरिंदर और नवजोत सिंह सिद्धू के बीच तनाव बढ़ता गया। 

आखिरकार जून, 2019 में सिद्धू ने मंत्री पद से इस्तीफ़ा दे दिया। इस्तीफे में भी सिद्धू ने सियासी चाल चली और कैप्टन को नीचा दिखाने का मौका नहीं छोड़ा। उन्होंने अपना इस्तीफा राहुल गांधी के नाम लिखा और बाद में कैप्टन अमरिंदर सिंह को भेजा। तभी से कैप्टन को यह लगने लगा था कि पंजाब की राजनीति में सिद्धू नाम के पतंग की डोर को ढील कहीं और से दी जा रही है। और कांग्रेस आलाकमान के खेल का तब पर्दाफाश भी हो गया जब कैप्टन के लाख विरोध के बावजूद सिद्धू को पंजाब कांग्रेस की कमान सौंप दी गई। हालांकि तब भी कैप्टन पर सत्ता के अहंकार का नशा इतना हावी था कि वो ये नहीं समझ सके कि चुनाव से पहले उनके राजतख्त को पलटने तक की तैयारी हो रखी है। अंतत: कांग्रेस आलकमान ने कैप्टन से इस्तीफा मांग ही लिया। कैप्टन के पास कोई विकल्प नहीं था। इस्तीफा तो कैप्टन ने दे दिया लेकिन इस शर्त के साथ कि सीएम पद पर सिद्धू की ताजपोशी उन्हें मंजूर नहीं होगा। कैप्टन की शर्त कांग्रेस आलाकमान की पटकथा में पहले से ही तय थी। लेकिन ये वाली बात सिद्धू को भी नहीं पता थी कि दिल्ली में बैठी गांधी परिवार की तिकड़ी ने उसके कंधे पर बंदूक सिर्फ कैप्टन अमरिंदर को निपटाने के लिए रखी थी। और उसकी प्रतिक्रिया जिस रूप में सामने आएगी उससे सिद्धू भी जो आसमान में उड़ रहे थे उसे एक दलित नेता चरणजीत सिंह चन्नी की मुख्यमंत्री पद पर ताजपोशी कराकर जमीन पर ला दिया। सिद्धू को जब तक यह बात समझ में आई, बहुत देर हो चुकी थी।

दरअसल, एक दलित नेता का पंजाब का मुख्यमंत्री बनना लंबे वक्त से लंबित था। आलाकमान ने चन्नी के रूप में एक दलित सीएम की ताजपोशी कराकर इस बात को साबित करने की कोशिश की है कि कांग्रेस बदल रही है। अगर पंजाब की राजनीति को पन्नों को पलटकर देखें तो पता चलेगा कि बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक कांशी राम इसी पंजाब के होशियारपुर जिले से थे। यहीं से उन्होंने अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत की थी। ये अलग बात है कि 1996 के बाद के चुनावों में बसपा का प्रदर्शन अच्छा नहीं रहा। 2017 के विधानसभा चुनाव में तो वह 1.5 प्रतिशत वोटों में सिमट गई। जबकि पंजाब में दलितों की आबादी 32 प्रतिशत के आसपास है और कुल 34 सीटें अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित हैं। यह क्यों हुआ और कैसे हुआ इसकी एक अलग ही कहानी है। पर कांग्रेस ने सूबे के दलितों की राजनीतिक जमीन को पकड़ने की कोशिश के तहत ही एक दलित नेता को सीएम की कुर्सी पर बैठाया है। अब पंजाब कांग्रेस के अध्यक्ष पद से नवजोत सिंह सिद्धू ने जिस नाटकीय अंदाज में इस्तीफे की की पेशकश की है उससे कांग्रेस की साख को जबरदस्त डेंट लगा है। लोग पूछने और बोलने लगे हैं कि सिद्धू के बारे में जब कैप्टन पहले से ही आगाह कर रहे थे तो आलाकमान ने उनकी क्यों नहीं सुनी। अब इसमें सिद्धू का जो राजनीतिक नुकसान होगा वो तो होगा ही, कांग्रेस का नुकसान इस रूप में बड़ा होने वाला है कि सूबे में अब कैप्टन जैसा कोई ऐसा कद्दावर नेता कांग्रेस में नहीं है जो ताक में बैठे आप, अकाली दल, भाजपा आदि की चाल को समझकर होने वाले नुकसान से कांग्रेस को बचा पाए। क्योंकि कैप्टन के साथ आलाकमान ने जिस तरह का व्यवहार किया, वो कांग्रेस के साथ नहीं रहने का ऐलान कर चुके हैं। ऐसे में वह अब भाजपा से हाथ मिलाकर आने वाले चुनाव में कांग्रेस के नुकसान को बढ़ाने की भूमिका में ही खड़े होंगे।

बहरहाल, राज्य में विधानसभा चुनाव की उल्टी गिनती शुरू हो चुकी है। राजनीतिक घटनाक्रम तेजी से बदल रहे हैं। नवजोत सिंह सिद्धू किसी भी तरह से चुनाव से पहले मुख्यमंत्री बनना चाहते थे जो कांग्रेस आलाकमान ने होने नहीं दिया। अब सिद्धू ने जिस तरह का रूख अख्तियार किया है वह इस वक्त कांग्रेस की सेहत के लिए ठीक नहीं है। भाजपा का प्रदेश में कोई वोट बैंक इस रूप में नहीं है कि वह सत्ता के लिए ताल ठोके। भाजपा की उपलब्धि इसी में है कि वह किसी तरह से कांग्रेस को सत्ता से बेदखल कर दे। इसके लिए वह आम आदमी पार्टी तक को अंदरखाने समर्थन देने की बिसात बिछा रखी है। कैप्टन अमरिंदर सिंह पूरी तरह से मोदी-शाह के पाले में जा बैठे हैं। अकाली दल भी अपने तरीके से कांग्रेस को हराने में कोई कसर नहीं छोड़ेगी। ऐसे में अगर दिल्ली में बैठे कांग्रेसी चाणक्य एक भी चाल चूकते हैं, तो तय मानिए- बदल रही कांग्रेस के हाथ से पंजाब की सत्ता को फिसलने से कोई नहीं बचा सकता है। 

Friday, 9 October 2020

अब कौन नापेगा भारतीय राजनीति का तापमान?


फरकिया वाली खगड़िया के बेहद दुरुह इलाके शहरबन्नी से निकलकर दिल्ली की सत्ता यानी रायसीना हिल्स तक का सफर अपने संघर्ष के बूते तय करने का नाम है रामविलास पासवान जो अब हमारे बीच नहीं रहे। भारत की राजनीति में ‘मौसम वैज्ञानिक' के नाम से मशहूर रामविलास पांच दशक तक बिहार और देश की राजनीति में एक ध्रुवतारा की तरह चमकते रहे। दो बार लोकसभा चुनाव में सर्वाधिक मतों से जीतने का विश्व रिकॉर्ड बनाने और देश के आधा दर्जन प्रधानमंत्रियों की कैबिनेट की शोभा रहे इस दलित मसीहा के बारे में कहा जाता है कि राजनीति की नब्ज पर उनकी पकड़ इस कदर मजबूत थी कि एक वक्त में उन्हें यूपीए में शामिल कराने के लिए सोनिया गांधी खुद चलकर उनके घर पर दस्तक दी थीं। 

‘ना काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर’ इस कहावत को चरितार्थ करने वाले मृदुभाषी रामविलास पासवान के छह प्रधानमंत्रियों के साथ काम करने की कहानी भी बड़ी अजब गजब है। 1996 से 2015 तक केन्द्र में सरकार बनाने वाले सभी राष्ट्रीय गठबंधन चाहे यूपीए हो या एनडीए का वह हिस्सा बने रहे। इसी कारण लालू प्रसाद ने उनको ‘मौसम विज्ञानी’ का दर्जा भी दिया था। अब तो वह खुद भी स्वीकारने लगे थे कि वह जहां रहते हैं सरकार उन्हीं की बनती है। मतलब राजनीतिक मौसम का पुर्वानुमान लगाने में वे माहिर थे। समाजवादी पृष्ठभूमि के बड़े नेताओं में रामविलास की अपनी एक पहचान थी। 

जब सत्ता की चाबी लगी थी हाथ, लेकिन...

फरवरी 2005 की बात है जब बिहार की सत्ता की चाबी उनके हाथ लगी थी, लेकिन...। साल 2000 में लोक जनशक्ति पार्टी बनाने के बाद फरवरी 2005 में पहली बार उनकी पार्टी बिहार विधानसभा का चुनाव लड़ी थी तो 29 विधायक जीतकर आए थे। किसी दल को बहुमत नहीं होने के कारण सरकार नहीं बन रही थी। पासवान अगर उस वक्त नीतीश कुमार के साथ या लालू प्रसाद का साथ दे देते तो प्रदेश में सरकार बन सकती थी। मगर उन्होंने शर्त रख दी कि जो पार्टी अल्पसंख्यक को मुख्यमंत्री बनाएगी, उनकी पार्टी उसी का साथ देगी। और उनकी इस शर्त पर कोई खरा नहीं उतरा। सूबे को दोबारा चुनाव में जाना पड़ा। बाद में उसी साल अक्टूबर-नवम्बर में हुए चुनाव में नीतीश कुमार के नेतृत्व में एनडीए को बहुमत मिला और सरकार बनी। कहते हैं कि रामविलास पासवान की वह सबसे बड़ी राजनीतिक भूल थी और उसके बाद कभी भी उनकी पार्टी का प्रदर्शन उस रूप में नहीं कर पाई कि बिहार की सत्ता में अहम भूमिका निभा पाएं। 

2009 में जब हार गए थे लोकसभा चुनाव

2004 के लोकसभा चुनाव में रामविलास जीते, लेकिन 2009 में वह हार गए। 2009 में पासवान ने लालू प्रसाद की पार्टी राजद के साथ गठबंधन किया था। पूर्व गठबंधन सहयोगी कांग्रेस को छोड़कर। 33 वर्षों में पहली बार वे हाजीपुर से जनता दल के रामसुंदर दास से चुनाव हार गए थे। उनकी पार्टी लोजपा 15वीं लोकसभा में कोई भी सीट जीतने में सफल नहीं रही। साथ ही उनके गठबंधन के साथी और उनकी पार्टी भी अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाई और 4 सीटों पर सिमट गई। उस वक्त लालू यादव के सहयोग से वह राज्यसभा में पहुंचे थे। बाद में हाजीपुर क्षेत्र से 2014 के चुनाव में नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में वह फिर से एनडीए में आ गए और संसद में पहुंकर मंत्री बने। उसी चुनाव में बेटा चिराग भी पहली बार जमुई से सांसद बना।   

साल 1983 में बनाई थी दलित सेना

वर्ष 1975 में जब भारत में आपातकाल की घोषणा की गई तो उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। 1977 में रिहा होने पर वे जनता पार्टी के सदस्य बन गए और पहली बार इसके टिकट पर हाजीपुर से संसद पहुंचे। इस चुनाव में उन्होंने सबसे अधिक अंतर से चुनाव जीतने का विश्व रिकॉर्ड अपने नाम किया। वे 1980 और 1984 में हाजीपुर निर्वाचन क्षेत्र से 7वीं लोकसभा के लिए चुने गए। 1983 में उन्होंने दलित मुक्ति और उसके कल्याण के लिए एक संगठन दलित सेना की स्थापना की। 1989 में लोकसभा के लिए फिर से चुने गए और उन्हें विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार में केंद्रीय श्रम और कल्याण मंत्री बनाया गया। उसी समय मंडल आयोग की सिफारिशें लागू की गईं। 1996 में उन्होंने लोकसभा में सत्तारूढ़ गठबंधन का भी नेतृत्व किया, क्योंकि तत्कालीन प्रधानमंत्री एचडी देवेगौड़ा राज्यसभा के सदस्य थे। उसी साल वे पहली बार केंद्रीय रेल मंत्री बने। उन्होंने 1998 तक उस पद को संभाला। इसके बाद वे अक्टूबर 1999 से सितंबर 2001 तक केंद्रीय संचार मंत्री रहे, जब उन्हें कोयला मंत्रालय में स्थानांतरित किया गया और वे इस पद पर अप्रैल 2002 तक बने रहे। मगर इसी बीच 2000 में लोक जनशक्ति पार्टी (एलजेपी) बनाने के लिए वे जनता दल से अलग हो गए। 2004 के लोकसभा चुनावों के बाद पासवान यूपीए में शामिल हो गए और यूपीए सरकार में उन्हें रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय और इस्पात मंत्रालय में केंद्रीय मंत्री बनाया गया। हाजीपुर में रेलवे का जोनल कार्यालय खुलवाना और केन्द्र सरकार में अंबेडकर जयंती पर छुट्टी घोषित करावाने का श्रेय रामविलास पासवान को जाता है।

पहली बार 1969 में लड़े थे चुनाव

पांच दशकों में रामविलास पासवान 8 बार लोकसभा के सदस्य रहे। पासवान उस वक्त बिहार विधानसभा के सदस्य बन गए थे, जब लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार अपने छात्र जीवन में ही थे। इमरजेंसी के दौरान इंदिरा गांधी वाली कांग्रेस सरकार से लड़ने से लेकर अगले पांच दशकों तक पासवान कई बार कांग्रेस के साथ, तो कभी खिलाफ चुनाव लड़ते रहे और जीतते रहे। 1977 के लोकसभा चुनाव में ही हाजीपुर सीट से जनता दल के टिकट पर चुनाव लड़े पासवान ने चार लाख से ज्यादा वोटों से जीत दर्ज कर वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाया था। इसके बाद 2014 तक उन्होंने आठ बार आम चुनावों में जीत हासिल की। रामविलास पासवान का राजनीतिक सफर 1969 में तब शुरू हुआ था, जब वे संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के टिकट पर खगड़िया जिले के सुरक्षित सीट अलौली से कांग्रेस के मिश्री सदा को हराकर बिहार विधानसभा पहुंचे थे। 1974 में राज नारायण और जेपी के प्रबल अनुयायी के रूप में लोकदल के महासचिव बने। वे व्यक्तिगत रूप से राज नारायण, कर्पूरी ठाकुर और सत्येंद्र नारायण सिन्हा जैसे आपातकाल के प्रमुख नेताओं के करीबी रहे हैं।

दो शादी से तीन बेटी और एक बेटा

खगड़िया में एक दलित परिवार में 5 जुलाई 1946 को जन्मे रामविलास पासवान राजनीति में आने से पहले बिहार प्रशासनिक सेवा में अधिकारी थे। पासवान ने इमरजेंसी का पूरा दौर जेल में गुजारा। इमरजेंसी खत्म होने के बाद पासवान छूटे और जनता दल में शामिल हो गए। उनका पैतृक गांव खगड़िया जिले के अलौली स्थित शहरबन्नी गांव है। उनकी शादी 1960 में राजकुमारी देवी के साथ हुई थी। बाद में 1981 में पहली पत्नी को तलाक देकर दूसरी शादी 1983 में पंजाबी महिला रीना शर्मा से की। देश की राजनीति में इतना लंबा वक्त गुजार चुके रामविलास पासवान की निजी जिंदगी परदे में ही रही। उनकी निजी जिंदगी पर बातें तभी हुई जब विवाद हुए। पासवान ने दो शादियां की थीं। उनकी पहली पत्नी राजकुमारी से दो बेटियां हैं, जबकि दूसरी पत्नी रीना से एक बेटा चिराग पासवान और एक बेटी है। पहली पत्नी अब भी उनके गांव शहरबन्नी में ही रहती हैं और इन दिनों बीमार भी हैं। रामविलास ने कोसी कॉलेज खगड़िया और पटना यूनिवर्सिटी में पढ़ाई की थी। पटना विश्वविद्यालय से उन्होंने एमए और लॉ ग्रेजुएट की डिग्री ली थी।

Friday, 25 September 2020

कोरोना महामारी के बीच बिहार में सत्ता संग्राम-2020 का शंखनाद


आखिरकार लंबे इंतजार के बाद कोरोना काल में सबसे बड़े चुनाव संग्राम के तौर पर बिहार में विधानसभा चुनाव का ऐलान हो ही गया। लंबे इंतजार की बात हम यहां इसलिए कर रहे हैं क्योंकि 2015 में चुनाव तारीखों का ऐलान 9 सितंबर को ही कर दिया गया था। चुनाव आयोग की घोषणा के मुताबिक, 243 सीटों पर तीन चरणों में 28 अक्टूबर, 3 नवंबर और 7 नवंबर को मतदान कराया जाएगा। 10 नवंबर मंगलवार को नतीजों की घोषणा की जाएगी। इसकी घोषणा आज यानी शुक्रवार दोपहर मुख्य चुनाव आयुक्त सुनील अरोड़ा ने किया। नजर मध्यप्रदेश की 28 विधानसभा सीटों समेत देशभर की 56 अलग-अलग सीटों पर उपचुनाव की घोषणा पर भी थी लेकिन इस पर फैसला 29 नवंबर तक के लिए टाल दिया गया है। क्यों टाला गया इसे आप बखूबी समझ सकते हैं।

14 नवंबर को दीपावली से चार दिन और 18 नवंबर से शुरू होने वाले छठ पर्व से 8 दिन पहले यह साफ हो जाएगा कि बिहार में अगली सरकार किसकी बनेगी। मौजूदा विधानसभा का टर्म 29 नवंबर 2020 तक है। चुनाव आयोग के मुताबिक, 243 सीटों पर इस बार के चुनाव में 7.29 करोड़ लोग वोट डाल सकेंगे। इनमें 3 करोड़ 85 लाख पुरुष और 3.39 करोड़ महिला वोटर हैं। पिछले विधानसभा चुनाव के वक्त 6 करोड़ 70 लाख वोटर थे। कुल 42 हजार पोलिंग बूथ पर 1 लाख 73 हजार वीवीपैट का इस्तेमाल किया जाएगा। 

चुनाव आयोग ने आज जो सबसे बड़ी घोषणा की वह यह कि कोरोना की वजह से मतदान की समयावधि में एक घंटे का इजाफा किया गया है। नक्सल प्रभावित क्षेत्रों को छोड़कर सामान्य इलाकों में सुबह 7 बजे से शाम 6 बजे के बीच वोटिंग होगी। एक पोलिंग बूथ पर 1500 की जगह 1000 वोटर ही आएंगे। कोरोना के मरीज वोटिंग के दिन आखिरी घंटे में ही वोट डाल पाएंगे। कोरोना की वजह से कुछ खास इंतजाम भी किए गए हैं। मसलन, चुनाव में 46 लाख मास्क, 7.6 लाख फेस शील्ड, 23 लाख जोड़ी हैंड ग्लव्स और 6 लाख पीपीई किट्स का इस्तेमाल होगा। नामांकन के दौरान उम्मीदवार 5 की जगह 2 ही गाड़ियां साथ ले जा सकेंगे।

पहला चरण : 28 अक्टूबर को 71 सीटों पर मतदान
कहलगांव, सुल्तानगंज, अमरपुर, धोरैया (एससी),  बांका, कटोरिया (एसटी), बेलहर, तारापुर, मुंगेर, जमालपुर, सूर्यगढ़, लखीसराय, शेखपुरा, बारबीघा, मोकामा, बाढ़, मसौढ़ी (एससी), पालीगंज, बिक्रम, संदेश, बराहरा, आरा, अगियांव (एससी), तरारी, जगदीशपुर, शाहपुर, ब्रह्मपुर, बक्सर, दुमरांव, रायपुर (एससी), मोहनिया (एससी), भभुआ, चैनपुर, चेनारी (एससी), सासाराम, करगहर, दिनारा, नोखा, डेहरी, काराकट, अरवल, कुर्था, जहानाबाद, घोसी, मखदूमपुर (एससी), गोह, ओबरा, नबीनगर, कुटुम्बा (एससी), औरंगाबाद, रफीगंज, गुरुआ, शेरघाटी, इमामगंज (एससी), बाराचट्टी (एससी), बोध गया (एससी), गया टाउन, टीकरी, बेलागंज, अतरी, वजीरगंज, राजौली (एससी), हिसुआ, नवादा, गोबिंदपुर, वारसलीगंज, सिकंदरा (एससी), जमुई, झाझा, चकाई।  

दूसरा चरण : 3 नवंबर को 94 सीटों पर मतदान
नौतन, चनपटिया, बेतिया, हरसिद्धि (एससी), गोविंदगंज , केसरिया, कल्याणपुर, पिपरा, मधुबन, शिवहर, सीतामढ़ी, रुन्नीसैदपुर, बेलसंड, मधुबनी, राजनगर (एससी), झंझारपुर, फूलपारस, कुशेश्वरस्थान (एससी), गौरा बौरम, बेनीपुर, अलीनगर, दरभंगा ग्रामीण, मीनापुर, कांटी, बरुराज, पारू, साहेबगंज, बैकुंठपुर, बरौली, गोपालगंज, कुचाइकोट, भोरे (एससी), हथुआ, सीवान, ज़िरादेई, दरौली (एससी), रघुनाथपुर, दरौंदा, बरहरिया, गोरैयाकोठी, महराजगंज, एकमा, मांझी, बनियापुर, तरैया, मढ़ौरा, छपरा, गरखा (एससी), अमनौर, परसा, सोनपुर, हाजीपुर, लालगंज, वैशाली, राजा पाकर (एससी), राघोपुर, महनार, उजियारपुर, मोहिउद्दीननगर, विभूतिपुर, रोसरा (एससी), हसनपुर, चेरिया-बरियारपुर, बछवारा, तेघरा, मटिहानी, साहेबपुर कमाल, बेगूसराय, बखरी (एससी), अलौली (एससी), खगड़िया, बेलदौर, परबत्ता, बिहपुर, गोपालपुर, पीरपैंती (एससी), भागलपुर, नाथनगर, अस्थावन, बिहारशरीफ, राजगीर (एससी), इस्लामपुर, हिलसा, नालंदा, हरनौत, बख्तियारपुर, दीघा, बांकीपुर, कुम्हरार, पटना साहिब, फतुहा, दानापुर, मनेर, फुलवारी (एससी)।   

तीसरा चरण : 7 नवंबर को 78 सीटों पर मतदान
वाल्मीकि नगर, रामनगर (एससी), नरकटियागंज, बगहा, लौरिया, सिकटा,  रक्सौल, सुगौली, नरकटिया, मोतिहारी, चिरैया, ढाका, रीगा, बथनाहा (एससी), परिहार, सुरसंड, बाजपट्टी, हरलाखी, बेनीपट्टी, खजौली, बाबूबरही, बिस्फी, लौकहा, निर्मली, पिपरा, सुपौल, त्रिवेणीगंज (एससी), छातापुर, नरपतगंज, रानीगंज (एससी), फारबिसगंज, अररिया, जोकीहाट, सिकटी, बहादुरगंज, ठाकुरगंज, किशनगंज, कोचाधामन, अमौर, बैसी, कस्बा, बनमनखी (एससी), रूपौली, धमदाहा, पूर्णिया, कटिहार, कदवा, बलरामपुर, प्राणपुर, मनिहारी (एससी), बरारी, कोरहा (एससी), आलमनगर, बिहारीगंज, सिंहेश्वर (एससी), मधेपुरा, सोनबरसा (एससी), सहरसा, सिमरी बख्तियारपुर, महिषी, दरभंगा, हायाघाट, बहादुरपुर, क्योटी, जाले, गायघाट, औराई, बोचहां (एससी), सकरा (एससी), कुढ़नी, मुजफ्फरपुर, महुआ, पातेपुर (एससी), कल्याणपुर (एससी), वारिसनगर, समस्तीपुर, मोरवा, सरायरंजन।

2015 में पांच चरणों में कराया गया था मतदान
2015 के चुनाव में चुनाव आयोग ने बिहार में पांच चरणों में चुनाव कराया था, जिसकी तारीखों का ऐलान 9 सितंबर को ही कर दिया गया था। नतीजे 8 नवंबर को आए थे। इस चुनाव में महागठबंधन को बहुमत मिली थी। 2015 के चुनाव में पहले चरण यानी 12 अक्टूबर को बांका, भागलपुर, बेगूसराय, जमुई, खगड़िया, लखीसराय, मुंगेर, नवादा, समस्तीपुर और शेखपुरा की 49 सीटों पर चुनाव हुआ था। दूसरे चरण में 16 अक्टूबर को अरवल, औरंगाबाद, गया, जहानाबाद, कैमूर, रोहतास की 32 सीटों पर चुनाव हुआ था। तीसरे चरण में 28 अक्टूबर को भोजपुर, बक्सर, नालंदा, पटना, सारण, वैशाली की 50 सीटों पर चुनाव हुआ था। चौथे चरण में 1 नवंबर को गोपालगंज, पश्चिम चंपारण, पूर्वी चंपारण, मुफ्फरपुर, शिवहर, सीतामढ़ी, सीवान की 55 सीटों पर चुनाव हुआ था। आखिरी चरण यानी 5 नवंबर को अररिया, दरभंगा, कटिहार, किशनगंज, मधेपुरा, मधुबनी, पुर्णिया, सहरसा, सुपौल की 57 सीटों पर चुनाव हुआ था। वोटों की गिनती 8 नवंबर को हुई थी। तब 243 सीट वाली बिहार विधानसभा में महागठबंधन के खाते में 178 सीटें आई थी जिसमें आरजेडी को 80, जेडीयू को 71 और कांग्रेस को 27 सीटों पर जीत मिली थी। जबकि एनडीए के खाते में 58 सीटें आई थी, जिसमें भाजपा को 53, लोजपा को 2, रालोसपा को 2 और हम को एक सीट पर जीत मिली थी।

2019 का लोकसभा चुनाव परिणाम 

2019 में हुए लोकसभा चुनाव में बिहार की 40 में 39 सीटें एनडीए को मिली थीं। सिर्फ एक सीट पर कांग्रेस का उम्मीदवार जीता था। लोकसभा के नतीजों को अगर विधानसभा क्षेत्र के हिसाब से देखें तो एनडीए को 223 सीटों पर बढ़त मिली थी। इनमें से 96 सीटों पर भाजपा तो 92 सीटों पर जेडीयू आगे थी। लोजपा 35 सीटों पर आगे थी। एक सीट जीतने वाला महागठबंधन विधानसभा के लिहाज से 17 सीटों पर आगे था। इनमें 9 सीट पर राजद, 5 पर कांग्रेस, दो पर हम (सेक्युलर) जो अब एनडीए का हिस्सा हैं और एक सीट पर रालोसपा को बढ़त मिली थी। अन्य दलों में दो विधानसभा क्षेत्रों में एआईएमआईएम और एक पर सीपीआई एमएल आगे थी।

2020 के मुख्यमंत्री पद के दावेदार

नीतीश कुमार : 2010 के चुनाव में नीतीश एनडीए की ओर से तो 2015 में महागठबंधन की ओर से मुख्यमंत्री पद का चेहरा थे। इस बार फिर वो एनडीए की ओर से मुख्यमंत्री का चेहरा हैं। पिछले 15 साल से राज्य में नीतीश की पार्टी सत्ता में है। इनमें 14 साल से ज्यादा नीतीश ही मुख्यमंत्री रहे हैं।
तेजस्वी यादव : महागठबंधन की ओर से इस बार तेजस्वी यादव चेहरा हो सकते हैं। लालू यादव के जेल जाने के बाद महागठबंधन की सबसे बड़ी पार्टी राजद का चेहरा तेजस्वी ही हैं। हाल ही में, राजद के पार्टी कार्यालय के बाहर चुनाव से जुड़ा जो पोस्टर लगाया गया उसमें अकेले तेजस्वी नजर आ रहे थे। पार्टी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव का चेहरा पोस्टर से गायब था।

2020 चुनाव के बड़े मुद्दे क्या हैं?

इन चुनावों में कोरोना बड़ा मुद्दा होगा। तेजस्वी यादव कोरोना को लेकर लगातार सरकार पर हमला कर रहे हैं। कोरोनाकाल में नीतीश कुमार के घर से बाहर नहीं निकलने को भी उन्होंने मुद्दा बनाया है। वहीं, नीतीश की ओर से सरकार द्वारा पिछले छह महीने में उठाए कदमों को गिनाया जा रहा है। केंद्र सरकार के कृषि से जुड़े दो नए बिल भी इन चुनावों में बड़ा मुद्दा बनेगा। राजद बेरोजगारी के मुद्दे को लगातार उठा रही है। प्रधानमंत्री के जन्मदिन को राजद ने राष्ट्रीय बेरोजगारी दिवस के रूप में मनाया। नीतीश सरकार लॉकडाउन के दौरान बिहार लौटे प्रवासी मजूदरों से बिहार में ही रोजगार देने का दावा कर रही है। जेडीयू और भाजपा जहां पिछली केंद्र और राज्य सरकारों की ओर से किए गए कामों को गिना रही है वहीं, राजद पिछले 15 साल में किए विकास के दावों को लगातार चुनौती दे रहा है। लॉकडाउन के दौरान बिहार लौटे प्रवासी मजदूरों का मुद्दा भी इस चुनाव में अहम होगा। सरकार जहां इन्हें प्रदेश में ही हर संभव मदद देने की बात कर रही है वहीं, विपक्ष प्रवासियों के लिए समुचित इंतजाम नहीं करने पर सवाल उठा रहा है। इसके अलावा पिछले 30 साल से चुनावी मुद्दा रहा राम मंदिर भाजपा के लिए इस बार भी बड़ा मुद्दा रहेगा। फर्क सिर्फ इतना होगा कि इस बार भाजपा इसके शिलान्यास को अपनी बड़ी उपलब्धि के तौर पर गिनाएगी।

चुनाव प्रचार के प्रमुख चेहरे

नरेंद्र मोदी : भाजपा ने 2013 में नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित होने के बाद से हर चुनाव में मोदी ही भाजपा के लिए प्रचार का प्रमुख चेहरा रहे हैं। उनकी रैलियां भाजपा के पक्ष में माहौल बनाने का बड़ा जरिया रही हैं। कोरोना की वजह से इस बार बड़ी रैलियां होना मुश्किल है। ऐसे में मोदी की वर्चुअल रैलियां मतदाताओं पर कितना असर डालती हैं ये देखना होगा।
नीतीश कुमार : जेडीयू और उससे पहले समता पार्टी के दौर से ही नीतीश हर चुनाव प्रचार में पार्टी का सबसे बड़ा चेहरा रहे हैं। इस चुनाव में एनडीए गठबंधन उनके ही चेहरे पर चुनाव लड़ रहा है।
तेजस्वी यादव : चुनावी राजनीति में महज पांच साल का अनुभव रखने वाले तेजस्वी यादव के हाथ में इस बार के चुनाव प्रचार की कमान होगी। राजद के गठन के बाद ये पहला विधानसभा चुनाव होगा जब पार्टी लालू के बिना लड़ेगी।
राहुल गांधी : राहुल गांधी भले कांग्रेस अध्यक्ष नहीं हैं लेकिन, चुनाव प्रचार में वो कितने सक्रिय रहते हैं इस पर नजर रहेगी। प्रियंका गांधी के चुनाव प्रचार पर भी सभी की नजर रहेगी। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की तबियत को देखते हुए पार्टी राहुल और प्रियंका गांधी को आगे कर सकती है।
चिराग पासवान : लोजपा अध्यक्ष चिराग पासवान चुनाव प्रचार में अपनी पार्टी का सबसे बड़ा चेहरा होंगे। एनडीए युवाओं और दलितों को लुभाने के लिए उनका इस्तेमाल कर सकता है। हालांकि, पासवान और उनकी पार्टी की ओर से जिस तरह सीटों के लेकर बयान आ रहे हैं उससे तय है कि एनडीए में सीटों का बंटवारा इतना आसान नहीं होने वाला है।
कन्हैया कुमार : भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के पोस्टर बॉय कन्हैया कुमार अपनी पार्टी के साथ-साथ महागठबंधन के भी प्रमुख चुनाव प्रचारक के तौर पर नजर आएंगे। बिहार चुनाव के मैदान में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अगर कोई चुनौती देने वाला नेता है तो वह कन्हैया कुमार ही होंगे।

Wednesday, 22 July 2020

नई वैश्विक व्यवस्था : खतरनाक साजिश है एजेंडा-21

कुछ साल पहले एक फिल्म आने वाली थी जिसका नाम था ए ग्रे स्टेट (A Grey State)। इस फिल्म के माध्यम से आज कोरोना महामारी की आड़ में जो कुछ भी हो रहा है वह फिल्मकार ने बताने की कोशिश की थी, लेकिन दुर्भाग्य से फिल्म के रिलीज होने से पहले ही फिल्म के निर्माता-निर्देशक डेविड क्रौली की हत्या हो गई। ऐसा माना जा रहा है की डीप स्टेट ने उसकी हत्या करवा दी थी। उनकी पत्नी और बच्ची को भी मार दिया गया क्योंकि डेविड क्रौली इस फिल्म के माध्यम से बताना चाहते थे कि किस तरह से सभ्रांत वर्ग यानी एलीट क्लास दुनिया को अपनी मुट्ठी में रख रहे हैं। इतना ही नहीं, जो आज के हालात बन रहे हैं ये डेविड क्रौली ने उस वक्त ही बता दिए थे कि किस तरह से लोगों को नियंत्रण में रखने के लिए टीकाकरण या वैक्सीन का सहारा लिया जाएगा, आरएफआईडी (RFID) चिप्स तक लगाईं जाएंगी, जिसे 'मार्क ऑफ द बीस्ट' भी बोला जा रहा है। हो सकता है इसी वजह से डीप स्टेट को यह अच्छा नहीं लगा होगा और उन्होंने फिल्म के रिलीज होने से पहले ही क्रौली कि हत्या करवा दी। इस फिल्म से ताल्लुक रखने वाली ज्यादातर जानकारी इंटरनेट से सेंसर कर दी गई। बात यहीं से शुरू होती है नई वैश्विक व्यवस्था यानी न्यू वर्ल्ड आर्डर की और यही है एजेंडा- 21 जिसकी समय सीमा 2020 से 2030 तक है। हम सबको खासतौर पर हम भारत के लोगों को इस बात को लेकर सतर्कता बरतनी चाहिए कि कुछ कुलीन, सभ्रांत या एलीट लोग हैं जो पूरी दुनिया को नियंत्रण में रखते हैं। हम सबको भले ही ऐसा लगता हो कि सरकारों के हाथ में ताकत होती है, लेकिन हकीकत यह है कि असली ताकत और नियंत्रण तो कुछ सीक्रेट सोसाइटी या कुलीन लोगों के हाथों में ही होती है और उनके ही निर्णय पूरी दुनिया को मानने होते हैं। अभी जो ये कोरोना वायरस की खबरें लगातार आ रही हैं उसको देखते हुए ऐसा लगने लगा है कि न्यू वर्ल्ड आर्डर यानी नई वैश्विक व्यवस्था का असली रूप जल्द ही हम सबके सामने होगा। 

दरअसल, अभी जो दुनियावी ताकतें काम कर रही हैं वह अलग-अलग जगहों पर विभाजित हैं, लेकिन जब नई वैश्विक व्यवस्था पूरी तरह से अपने प्रभाव में आ जाएगी तो ये शक्तियां पूरी तरह से एक ही संगठन के हाथों में चली जाएंगी जो टॉप लेवल से सभी चीजों को नियंत्रित करेगी। यही वह संगठन है जो एलीट क्लास यानी कुलीन वर्ग का होगा। मसलन क्राउन कॉरपोरेशन, बड़े बैंक संगठन जैसे कि रॉकफेलर या रॉथचाइल्ड इत्यादि या इलुमिनाटी समाज जो 300 लोगों की सुपरपावर कमेटी है, इनके हाथों में भी ये ताकत हो सकती हैं और इन्ही की 'हां या ना' से दुनिया के सारे फैसले किए जाएंगे। नई वैश्विक व्यवस्था को वास्तविक रूप से शैतानों की सभ्यता भी कहा जा रहा है। इसका मतलब यह नहीं है कि टॉप लेवल पर कोई शैतान बैठा हुआ है, लेकिन ये जो एलीट क्लास होता है ये किसी शैतान से कम भी नहीं होता है। इनके इरादे कभी नेक नहीं होते हैं। ये पूरी दुनिया पर अपना नियंत्रण चाहते हैं और हमें गुलाम बनाकर रखना चाहते हैं। इसीलिए न्यू वर्ल्ड ऑर्डर यानी नई वैश्विक व्यवस्था की स्थापना की जा रही है। इस नई वैश्विक व्यवस्था के साथ-साथ एक एजेंडा 2030 को भी स्थापित करने पर काम बहुत तेजी से चल रहा है जिसे एजेंडा-21 भी बोला जा रहा है। यह तो बहुत ही ज़्यादा खतरनाक है। 

हम भारत के अधिकांश लोग जिन्हें इस बारे में अंदाजा नहीं है उनको जानना चाहिए कि एजेंडा-21 जिसे 2030 तक पूरी तरह से लागू करने की योजना है उसके तहत होगी- एक ग्लोबल सरकार, एक ग्लोबल मुद्रा, एक ग्लोबल सेंट्रल बैंक जिसमें एक ग्लोबल कैशलेस सिस्टम होगा, एक ग्लोबल सेना होगी, पूरी शिक्षा व्यवस्था ऑनलाइन होगी। मतलब यह कि सारी चीजें एक ही ग्रुप के हाथों में होगी और वही ऊपर से सब-कुछ नियंत्रित करेगा। इसके साथ-साथ टीकाकरण यानी वैक्सीनेशन अनिवार्य कर दी जाएगी जिसका मतलब यह है कि आपको वैक्सीन लगवानी ही होगी। अगर आप वैक्सीन नहीं लगवाते हैं तो ये आपको कोई काम नहीं करने देंगे या फिर आपके काम में इतना रोड़ा अटका दिया जाएगा कि आपके लिए वैक्सीन लेना मजबूरी हो जाएगी। यहां यह भी जानना जरूरी है कि ये वैक्सीन बहुत ही ज्यादा घातक है और किसी भी सूरत में इंसानी ताकत के लिए ठीक नहीं है। जो विकसित देश हैं, वहां कोरोना वैक्सीन का खूब विरोध किया जा रहा है। लेकिन हमारे देश में ऐसा कुछ नहीं हो रहा और कुछ होने भी नहीं जा रहा है। जिस बिल एंड मिलिंडा गेट्स फाउंडेशन और माइक्रोसॉफ्ट कंपनी के स्वामी बिल गेट्स को पश्चिमी देशों में कोरोना और वैक्सीनेशन को लेकर पूरी तरह से एक्सपोज किया जा रहा है, उनके खिलाफ दर्जनों मुकदमें दर्ज किए गए हैं, हमारे देश में उस शख्स की पूजा की जा रही है। देश की मुख्यधारा की मीडिया में भी इस तरह की कोई खबर सामने नहीं आ रही है क्योंकि मुख्यधारा की मीडिया भी कहीं न कहीं बिल गेट्स जैसे एलीट क्लास के लोगों के नियंत्रण में है और उनका एकमात्र काम सिर्फ झूठ बोलना, प्रोपगेंडा फैलाना है। भारत में अगर कोई पत्रकार या मीडिया इस तरह की बात करता है तो उसे मानसिक रूप से दिवालिया करार दे दिया जाता है।

दरअसल, एजेंडा-21 के तहत आपको वैक्सीन लगाया जाएगा और उसके जरिये और ज्यादा बीमारियां आपकी बॉडी में इंजेक्ट कर दी जाएंगी। कहा तो ये भी जा रहा है कि इसी वैक्सीन के जरिये आपकी बॉडी में एक माइक्रो-चिप्स भी आने वाले वक्त में लगाई जा सकती हैं। इसी आरएफआईडी चिप्स के बारे में मैंने शुरू में जिक्र किया है। अगर आप गूगल सर्च करेंगे तो आपको पता चलेगा कि इसकी शुरुआत स्वीडन में हो चुकी है। इस चिप के जरिये हर व्यक्ति का पूरा ट्रैक रिकॉर्ड रखा जाएगा ताकि उसे जरूरत के हिसाब से नियंत्रित किया जा सके। जिस चिप की आज तक आपको जरूरत नहीं थी उसको अब आपके शरीर में डाला जाएगा और आप खुशी-खुशी इसे स्वीकार भी करेंगे। एजेंडा-21 के तहत ही 5G के टॉवर भी लगाने का काम शुरू हो चुका है। 5G के बारे में यह बात जानना जरूरी है कि टॉवर में इतनी घातक फ्रीक्वेंसी की किरणें निकलेंगी जिससे कैंसर जैसी बीमारी होने का खतरा बहुत बढ़ जाएगा। 5G की फ्रीक्वेंसी दुनिया की समृद्ध सेना और बड़ी-बड़ी स्टॉक एक्सचेंज में अपनी जानकारी इकट्ठा करने के लिए इस्तेमाल करती रही हैं। अब उसे अगर आम लोगों की सोसाइटी में लाया जाएगा तो बड़े स्तर पर दुनियावी सेहत को नुकसान होगा। यह बात सच है कि इससे इंटरनेट की स्पीड कई गुना बढ़ जाएगी, लेकिन यह भी सच है कि आपके हाथों में जो आरएफआईडी माइक्रो-चिप डाली जाएगी वह भी 5G से ही कंट्रोल होगा। दुनिया के कई देशों में इसका जबरदस्त विरोध किया जा रहा है, लेकिन हमारे देश में अभी तक इस बारे में लोगों को एक तो ज्यादा जानकारी नहीं है और दूसरा इस तरह की मानसिकता दिल और दिमाग में बैठ गई है कि देखा जाएगा, झेल लिया जाएगा। 

अब आते हैं एजेंडा-21 की सबसे भयानक साजिश पर। जो भी लोग नई वैश्विक व्यवस्था और एजेंडा-21 के पीछे काम कर रहे हैं उनका मकसद 2030 तक दुनिया की 75 से 80 फीसदी जनसंख्या को मिटा देना है यानी खत्म कर देना है। यह कोई काल्पनिक बात नहीं है। यह जॉर्जिया के गाइड स्टोन पर बड़े-बड़े अक्षरों में और कई भाषाओं में साफ-साफ लिखा हुआ है। उनका मिशन है कि पूरी दुनिया की जनसंख्या को 50 करोड़ के अंदर लाना है। इसका मतलब यह हुआ कि जो एलीट क्लास या सबसे ऊपर बैठी शैतानों की फौज है उसे दुनिया को अपनी मुट्ठी में करने के लिए छोटी जनसंख्या वाली दुनिया चाहिए क्योंकि वर्तमान में 760 करोड़ की बड़ी जनसंख्या वाली दुनिया को कंट्रोल करना बहुत मुश्किल काम होगा। इसलिए एजेंडा-21 की थिंकटैंक यही चाहेगी कि दुनिया की 80 प्रतिशत से अधिक जनसंख्या का अस्तित्व ही खत्म हो जाए और दुनिया की पूरी जनसंख्या का सर्वाधिक हिस्सा भारत और चीन में है। तो इस परिस्थिति में हम भारत के लोगों को ये तय करना होगा कि इस 80 प्रतिशत मिटने वाली जनसंख्या में होना चाहेंगे या नहीं। कहने का मतलब यही है कि अब हम सबका अस्तित्व खतरे में है।

कोरोना वायरस निश्चित रूप से एजेंडा-21 यानी नई वैश्विक व्यवस्था को लागू करने का एक जरिया या हिस्सा हो सकता है- इससे इनकार नहीं किया जा सकता है। यही वायरस एक तरह से बायोलॉजिकल वर्ल्ड वॉर को भी जन्म दे सकता है। यह महामारी कोई प्राकृतिक प्रकोप नहीं बल्कि जानबूझकर पैदा किया गया मानवजनित वायरस है जो युद्ध करने के लिए बनाया गया है ताकि अर्थव्यवस्था को धराशायी किया जा सके और लोगों में डर पैदा कर उसकी मजबूरी का पूरी तरह से इस्तेमाल किया जा सके। और लोगों की ऐसी ही परिस्थितियों के बीच नई वैश्विक व्यवस्था को लागू कर दिया जाएगा। दुनिया से लोकतंत्र खत्म हो जाएगा और कुलीन तंत्र की स्थापना हो जाएगी। मेरे आलेख के रूप में ये पूरी कहानी आपको बहुत हद तक काल्पनिक लग सकती है, दंतकथा जैसी लग सकती है, लेकिन कोरोना से पहले और कोरोना के बाद की दुनिया को जब आप समझने की कोशिश करेंगे, जो चीजें जीवन में घटित हो रही हैं उस सबको जब आप कनेक्ट करने की कोशिश करेंगे तो शायद आप यह अहसास कर पाएंगें कि वाकई यह सब होने जा रहा है।

Thursday, 2 July 2020

भारतीय रेल ने भी पकड़ ही ली 'निजीकरण' की ट्रेन

अंदेशा तो पहले से ही था, लेकिन अब वह पूरी तरह से होने जा रहा है। हम बात कर रहे हैं भारतीय रेल के निजीकरण की। मुझे याद है 22 नवंबर 2019 शुक्रवार का वो दिन जब रेल मंत्री पीयूष गोयल ने राज्यसभा में प्रश्नकाल के दौरान सवालों का जवाब देते हुए कहा था कि रेलवे भारत और देशवासियों की संपत्ति है और आगे भी रहेगी। गोयल ने रेलवे के निजीकरण की संभावाओं को खारिज करते हुए तब कहा था कि सरकार रेलवे का निजीकरण नहीं कर रही है, बल्कि यात्रियों को बेहतर सुविधाएं मुहैया कराने के लिए निजी कंपनियों से कॉमर्शियल और ऑन-बोर्ड सेवाओं की आउटसोर्सिंग कर रही है। मालिकाना हक रेलवे के पास ही रहेगा। हम केवल लाइसेंस दे रहे हैं। हमारे देश की जनता बहुत भोली है। मंत्री जी का संसद में दिया बयान सुन लिया, समझ लिया और मान लिया। लेकिन सरकार कहां मानने वाली। वक्त का इंतजार किया और कोरोना महामारी व लॉकडाउन के दौरान आपदा एक्ट का फायदा उठाते हुए यात्री ट्रेन सेवा के संचालन के लिए पहली बार खुले तौर पर निजी कंपनियों के दरवाजे खोल दिए। इसके तहत देश में 109 गंतव्य मार्गों पर निजी कंपनियां यात्री ट्रेनों का संचालन कर सकेंगी। सरकार का अनुमान है कि इसमें 30 हजार करोड़ रुपये का निवेश हो सकता है। हालांकि इसकी शुरूआत तो तभी हो गई थी जब आईआरसीटीसी ने सरकारी पटरी पर पहली निजी ट्रेन तेजस का संचालन शुरू किया था।

दरअसल, मोदी सरकार का यह फैसला उस बिबेक देबरॉय समिति की उस रिपोर्ट का हिस्सा है जिसे वर्ष 2014 में रेलवे बोर्ड ने प्रमुख रेल परियोजनाओं के लिये संसाधन जुटाने और रेलवे बोर्ड के पुनर्गठन के लिए सुझाव देने को कहा था। इसका साथ दिया नीति आयोग ने भी। देबरॉय समिति ने वर्ष 2015 में अपनी रिपोर्ट पेश की थी जिसमें रेल के डिब्बों तथा इंजन के निजीकरण की बात साफतौर पर कही गई थी। समिति ने कहा था कि रेलवे के बुनियादी ढांचे के लिए एक अलग कंपनी का निर्माण करना चाहिए और ट्रेनों के संचालन का काम निजी हाथों में सौंपा जाना जरूरी है। रेलवे में निचले स्तर पर विकेंद्रीकरण की जरूरत पर भी समिति ने जोर दिया है। साथ ही नई लाइनों के निर्माण में रेलवे को राज्य सरकारों के साथ मिलकर काम करने की सलाह दी है।

बहुत से लोगों को सरकार का यह फैसला आज अच्छा लग रहा होगा, लेकिन आने वाले वक्त में अच्छे स्कूल और अस्पताल की तरह कहीं आना-जाना भी आपकी जेब से दूर हो जाएगा क्योंकि निजी कंपनियों का एक ही लक्ष्य होता है मुनाफा कमाना और रेलवे में लाभ कमाने का सबसे आसान तरीका होता है यात्री किराये में इजाफा करना जो पिछले पांच साल से सरकार ने अपरोक्ष तौर पर लगातार किया भी। लेकिन जब यह काम निजी कंपनियां करेंगी तो जनता की आवाज और उसका दर्द नक्कारखाने में तूती की आवाज बन जाएगी। क्योंकि निजी कंपनियां अपने व्यवहार में अप्रत्याशित होती हैं और इनमें जवाबदेही की भारी कमी होती है। उनकी जवाबदेही रेल यात्रियों के प्रति नहीं होगी बल्कि उनकी जेब से वसूली जाने वाली किराया से उनकी कंपनी को कितना मुनाफा पहुंचाना है उसकी चिंता करना महत्वपूर्ण होता है। एक और बात जो काफी महत्वपूर्ण है वह यह है कि रेलवे विशुद्ध तौर पर आम आदमी की जिंदगी को जीता है। सरकार के पास जब तक इसका स्वामित्व है, वह नफा-नुकसान की परवाह किए बिना राष्ट्रव्यापी पहुंच प्रदान करती है लेकिन निजीकरण में यह गुंजाइश खत्म हो जाएगी और उन्हें जिस क्षेत्र से मुनाफा नहीं होगा उस मार्ग पर ट्रेनों का संचालन बंद कर देंगे।

बहरहाल, यात्री ट्रेनों के संचालन के लिए पहली बार भारतीय रेलवे ने निजी निवेश का रास्ता साफ कर दिया है और सरकार के इस कदम के साथ ही रेलवे का 167 साल का इतिहास बदलने जा रहा है। साल 1853 में भारत में शुरू हुई व्यावसायिक ट्रेन सेवा अमेरिका, चीन और रूस के बाद दुनिया का चौथा सबसे बड़ा रेल नेटवर्क है और इसी नेटवर्क के जरिये भारतीय रेलवे प्रतिदिन करीब ढाई करोड़ लोगों को एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाती है। इस कार्य को अंजाम देने के लिए उसके पास तकरीबन 13 लाख कर्मचारी हैं। हालांकि वर्ष 2019 में ही लखनऊ से नई दिल्ली के बीच भारत की पहली प्राइवेट ट्रेन तेजस एक्सप्रेस की शुरुआत हो गई थी जिसे रेलवे में निजीकरण की दिशा में पहला बड़ा कदम माना गया था, लेकिन आज जब हम कोरोना जैसी वैश्विक महामारी के दौर से गुजर रहे हैं, देश में आपदा एक्ट लगा हुआ है और इसकी आड़ में सरकार उन सारे एजेंडा को पूरा कर लेना चाहती है जिसपर उसे लगता है कि इसके खिलाफ जनता की आवाज उठ सकती हैं। आखिर भारतीय रेल को देश की लाइफ लाइन जो कहा जाता है।