Thursday, 27 July 2017

अवसरवादी राजनीति से गजब की यारी

जनता दल यूनाइटेड के राष्ट्रीय अध्यक्ष और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने एक बार फिर यह साबित कर दिया कि अवसरवादी राजनीति से उनकी गजब की यारी है। 12 साल में 6 बार मुख्यमंत्री पद की शपथ लेना वाकई कमाल की बात है। राजद-जेडीयू-कांग्रेस के त्रिगुट से बने महागठबंधन से यारी तोड़ जब नीतीश कुमार ने बिहार के मुख्यमंत्री पद से बुधवार को इस्तीफा दिया था तो सबसे पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें ट्वीट कर भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग लड़ने के लिए बधाई दी। भारतीय राजनीति के इतिहास में शायद ऐसा पहली बार हुआ होगा जब देश के प्रधानमंत्री ने किसी मुख्यमंत्री को उसके इस्तीफा देने पर बधाई दी हो।

दक्षिणपंथी राजनीतिक को करीब से जानने वाले कहते हैं कि नीतीश कुमार की वैचारिक प्रतिबद्धता भाजपा के सांचे में ज्यादा फिट बैठती है। यह ठीक बात है कि नीतीश कुमार ने अपने राजनीतिक कालखंड में जो सर्वाधिक बेहतर समय गुजारे हैं उसमें अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में मंत्री और फिर बिहार में भाजपा के साथ गठबंधन सरकार के मुख्यमंत्री बनना शामिल है। इतना वक्त भाजपा संग गुजारने के बाद भी अगर नीतीश भाजपा के पीएम उम्मीदवार बनाए जाने पर नरेंद्र मोदी का खुला विद्रोह कर बिहार में एनडीए की सरकार गिरा देते हैं तो इसे क्या कहेंगे? अगर भाजपा कार्यकर्ताओं के इतने ही स्वभाविक नेता नीतीश कुमार हैं तो भाजपा के खिलाफ 2015 के बिहार चुनाव में चारा घोटाले के जनक लालू यादव के साथ मिलकर महागठबंधन क्यों बनाया? नीतीश कुमार अगर भाजपा कार्यकर्ताओं के इतने ही स्वभाविक नेता हैं तो वह भाजपा में खुद को विलय क्यों नहीं कर देते हैं।

मुख्यमंत्री पद पर बने रहने के लिए नरेंद्र मोदी का खुला विरोध, मुख्यमंत्री बने रहने के लिए लालू यादव के साथ महागठबंधन बनाकर चुनाव जीत पीएम मोदी को अपनी ताकत का अहसास कराना और फिर कुर्सी की सलामती के लिए मोदी-शाह की जोड़ी के साथ हाथ मिलाकर लालू को उनकी औकात बताना यह तो अवसरवादी राजनीति का कोई महात्मा ही कर सकता है। लोग भले कहें कि नीतीश कुमार की राजनीतिक प्रतिबद्धता भाजपा में रचती और बसती है लेकिन सच यही है कि नीतीश कुमार की कोई राजनीतिक प्रतिबद्धता नहीं है। सत्ता में बने रहने के लिए उनकी राजनीतिक प्रतिबद्धता बदलती रहती है।

अगर याद हो तो अगस्त 2015 की बात है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जनता दल यूनाईटेड को जनता का दमन और उत्पीड़न पार्टी की संज्ञा दी थी। तब नीतीश ने पीएम मोदी पर पलटवार करते हुए बीजेपी (भाजपा) को बड़का झूठा पार्टी करार दिया था। तब नीतीश ने मोदी से कहा था कि भाजपा को हम लोग भारतीय जुमला पार्टी कहते थे लेकिन आप जिस स्तर पर चुनावी बातचीत को ले जा रहे हैं अब उससे काम नहीं चलने वाला है, अब उस व्याकरण के अनुसार भाजपा का नाम ‘बड़का झूठा पार्टी’ छोड़ कोई दूसरा नाम नहीं सूझ रहा है। नीतीश ने तब गुजरात दंगों का भी जिक्र किया था और कहा था कि आपने पिछली बार कह दिया कि आरजेडी ने जंगलराज फैलाया और इस वक्त बोल रहे हैं कि जेडीयू का मतलब जनता का दमन और उत्पीड़न है। आप गुजरात को क्यों भूल जाते हैं? भूल गए कि श्रद्धेय वाजपेयी जी ने आपको कहा था कि राजधर्म का पालन कीजिए?' लेकिन संयोग देखिए, नीतीश कुमार आज उसी बड़का झूठा पार्टी की गोद में जाकर बैठ गए हैं।

बिहार की चुनावी सरगर्मी के बीच अगस्त 2015 के उस दिन को याद करने का यह सही वक्त है जब नीतीश ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ट्वीट पर तंज कसते हुए कहा था कि 'इनका तो सब कुछ ट्विटर पर है। कहते भी ट्विटर पर हैं और सुनते भी ट्विटर पर ही हैं। जब हमने जाना कि यह ट्विटर की सरकार है तो हम अपनी बात कहने के लिए ट्विटर पर चले गए। वहीं पर हमने उनसे कुछ बातें कही, मगर वहां भी नहीं सुना गया। संयोग से जब नीतीश ने बुधवार को बिहार के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दिया तो प्रधानमंत्री मोदी ने सबसे पहले ट्वीट कर नीतीश को बधाई दी। इतना ही नहीं, नीतीश ने पीएम मोदी के ट्वीट का जवाब देते हुए तहेदिल से शुक्रिया भी लिखा। इतना सब तो कोई अवसरवादी राजनीति से यारी रखने वाला ही कर सकता है।

Thursday, 29 June 2017

नीतीश की जय या विनाशकाले विपरीत बुद्धि

भाजपा द्वारा गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को जब प्रधानमंत्री का उम्मीदवार बनाए जाने की घोषणा की गई थी तो बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कहा था, 'विनाश काले विपरीत बुद्धि'। कभी भाजपा नीत एनडीए के घटक दल रहे जेडीयू के नेता नीतीश कुमार ने तब कहा था कि विभाजनकारी तत्वों को देश स्वीकार नहीं करेगा। हालांकि नीतीश के कहे अनुसार, देश का जो भी बेड़ा गर्क हो रहा हो, लेकिन नरेंद्र मोदी के संदर्भ में ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। वह प्रधानमंत्री बने बैठे हैं और देश ने पूरे मनोयोग से उन्हें स्वीकार भी किया है।

कहने का मतलब यह कि नीतीश कुमार ने तब जो भविष्यवाणी की थी वह पूरी तरह से गलत साबित हुई और अब राष्ट्रपति चुनाव में विपक्षी एकजुटता दिखाने का वक्त था तो वही नीतीश कुमार भाजपा नीत एनडीए और नरेंद्र मोदी की गोद में जा बैठे हैं। विपक्षी उम्मीदवार के नाम का ऐलान होने तक भी इंतजार करना नीतीश ने उचित नहीं समझा और एनडीए के राष्ट्रपति उम्मीदवार रामनाथ कोविंद को समर्थन देने की घोषणा कर डाली। जिस लालू और कांग्रेस से मिलकर बिहार विधानसभा चुनाव में महागठबंधन का वटवृक्ष खड़ा किया उसकी बुनियाद हिलाने में बिना सोचे-समझे कोई देरी नहीं की।

हकीकत में इसे ही कहते हैं 'विनाशकाले विपरीत बुद्धि', मतलब जब विनाश का वक्त करीब आता है तो कहते हैं कि बुद्धि काम करना बंद कर देती है। यदि हम इसकी व्याख्या करें तो इसका अर्थ ये निकलता है कि जब इंसान का विनाश निकट आता है तो उसकी बुद्धि उसका साथ छोड़ देती है अर्थात् विनाश तो पहले से ही सुनिश्चित होता है बस उसे बुद्धि से सहयोग प्राप्त होना होता है और उसका विनाश आसानी से संपन्न हो जाता है। व्यक्तिगत तौर पर मैं कर्म को सर्वोपरि मानता हूं लेकिन मैं ये भी मानता हूं कि बुद्धि के निष्क्रिय हो जाने से ही ऐसी स्थिति आती है। जब लोग अपने हितैषियों की बात मानना बंद कर दें, अपनी सोच को सर्वोपरि मानने लगें, अपने निकटस्थ लोगों को चोट पहुंचाने लगें तो उन्हें समझ लेना चाहिए कि कुछ गड़बड़ है।

इंसान बहुत बार नकारात्मक सोच का शिकार हो जाता है और उसे पूरी कायनात उसके विरोध में षड्यंत्र करती नजर आती है। यदि कोई कार्य विफल हो जाता है तो उसके कारणों को खोजने के बजाये वह भाग्य को दोषी ठहराने लगता है और ऐसे में कोई उसे सही सलाह देने का प्रयास भी करता है तो उसे लगता है कि वह मुझे गलत सलाह दे रहा है या हमारे खिलाफ कोई साजिश रच रहा है। इस तरह से वह अपने हितैषियों से दूर होता चला जाता है और इसी दरम्यान दुश्मन सक्रिय हो जाते हैं। दुश्मन उसके चारों ओर एक कॉकस बनाकर उसे घेर लेते हैं और सलाह देने लगते हैं तो उसे लगता है कि यह तो बहुत सही सलाह दे रहा है। एक प्रकार से वह दुष्चक्र में घिर जाता है जो कि विनाश के समीप ले जाने में उसकी मदद करता है और इसी पूरी प्रक्रिया को समझाने की कोशिश में तुलसीदास एक पंक्ति में लिख गए- 'विनाशकाले विपरीत बुद्धि'।

राष्ट्रपति पद के लिए जब पूरी विपक्ष एक साझा उम्मीदवार उतारने की कोशिश में था, उसी बीच उसकी एक बेहद अहम कड़ी नीतीश कुमार ने एनडीए उम्मीदवार रामनाथ कोविंद को समर्थन देकर सबको चौंका दिया। सियासी गलियारों से लेकर आमजन के बीच इस सवाल का जवाब पाने को बेताबी है कि आखिर नीतीश ने क्यों एनडीए उम्मीदवार को समर्थन देने का फैसला किया है। अगर रामनाथ कोविंद बिहार का राज्यपाल रहते राष्ट्रपति पद के लिए उम्मीदवार बनाए गए हैं तो मीरा कुमार तो बिहार की बेटी हैं और लोकसभा की अध्यक्ष भी रह चुकी हैं। रामनाथ कोविंद अगर महादलित हैं तो मीरा कुमार भी दलितों की कद्दावर नेता हैं और इससे भी ऊपर आप बिहार में महागठबंधन की सरकार के नेता हैं जिसकी बुनियाद कांग्रेस और राष्ट्रीय जनता दल के नेता लालू प्रसाद यादव ने रखी। कम से कम इतना तो आंखों में पानी रखते कि मीरा कुमार बिहार की बेटी के साथ महिला भी हैं और कांग्रेस की नेता भी। 

दरअसल, नीतीश कुमार भी अब नरेंद्र मोदी और अमित शाह की तरह हर मुद्दे को सियासत के तराजू से तौलने लगे हैं। उनके लिए न तो बिहार की अस्मिता मायने रखता है, न महिला सशक्तिकरण की कोई अहमियत है और न ही राजनीतिक प्रतिबद्धता को निभाना चाहते हैं। मोदी और शाह की तरह उनके मन और मस्तिष्क में भी जीत के अहंकार की मोटी परत जमती जा रही है और सत्ता व पद के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं। इसमें कोई दो राय नहीं कि जिस लालू प्रसाद यादव और उनके मंत्री बेटों के साथ नीतीश को तालमेल बिठाकर सरकार चलानी पड़ रही है वह कोई आसान काम नहीं है, लेकिन यही तो आपकी राजनीतिक बुद्धिमता है और इसीलिए तो जनता की आप पसंद बने थे। लालू के दोनों बेटों को मंत्री बनाने से पहले ही यह सोचना चाहिए था कि यह बिहार के विकास के लिए ठीक नहीं होगा। तब तो मुख्यमंत्री बनने के लिए जो भी समझौता करना पड़ा आपने किया तो उससे निपटने की ताकत भी एक मुख्यमंत्री में होनी चाहिए। लालू के कुनबे की अराजकता से परेशान होकर फिर से मोदी और भाजपा नीत एनडीए के खेमे में इस उम्मीद से ताक-झांक करना कि इससे लालू और कांग्रेस को उनकी औकाद में रहेंगे यह नीतीश की बड़ी राजनीतिक भूल होगी। इससे साफ जाहिर होता है कि नीतीश दो नावों पर एक साथ सवारी करना चाहते हैं। ऐसे में इसके दुष्परिणाम से नीतीश या तो अनभिज्ञ हैं या फिर जानबूझकर ये गलती कर रहे हैं। 

दरअसल, बिहार में महादलित वोट बैंक निर्णायक भूमिका में है। संयोग से रामनाथ कोविंद महादलित श्रेणी से ही आते हैं। बिहार में लालू प्रसाद यादव के यादव-मुस्लिम गठजोड़ पर नीतीश कुमार के भारी होने की वजह महादलित वोट बैंक का उनके साथ जाना ही रहा है। नीतीश के लिए महादलित वोटों का महत्व इसी से समझा जा सकता है कि उन्होंने 2014 में अपनी जगह जीतनराम मांझी को मुख्यमंत्री बनाने का दांव चला था। मांझी भी महादलित श्रेणी से ही आते हैं। बाद में जब मांझी की राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं हद पार करने लगीं तो नीतीश को उन्हें हटाने का फैसला लेना पड़ा। मांझी ने इस फैसले को महादलितों का अपमान करार दिया था। एक हद तक वह वोट बैंक नीतीश से खिसका भी। 2015 के आम चुनाव में नीतीश कुमार महागठबंधन के जरिए दोबारा सत्ता में तो आ गए लेकिन वह बैसाखी के सहारे अपनी ताकत बनाए रखने के बजाय अकेले अपने दम पर मजबूत दिखना चाहते हैं। इसके लिए एक बार फिर से उनकी नजर महादलित वोट बैंक पर है। नीतीश को लगता है कि कोविंद का समर्थन कर महादलितों से नजदीकियां बढ़ाई जा सकती हैं जिसका फायदा उन्हें भविष्य में मिलेगा।

दूसरा, बिहार चुनाव जीतने के बाद गैर भाजपाई दलों के बीच नीतीश कुमार सबसे बड़ा चेहरा बन कर उभरे हैं। उसी के मद्देनजर जब-तब उन्हें 2019 के लोकसभा चुनाव में मोदी के मुकाबले प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाने की बात चलती रहती है, लेकिन नीतीश इस बात को लेकर पूरी तरह से आश्वस्त नहीं हैं। कांग्रेस ने अब तक इस मुद्दे पर अपना नजरिया स्पष्ट नहीं किया है। सियासी गलियारों में कहा जा रहा है कि कांग्रेस राहुल का मोह नहीं छोड़ पा रही है, नीतीश को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार मान लेने का मतलब एक तरह से राहुल गांधी का हथियार डाल देना होगा। कांग्रेस के इस रवैये से नीतीश आहत हैं और वह खास मौकों पर कांग्रेस से अपनी दूरी बनाकर दबाव की राजनीति के रूप में काम कर रहे हैं। कोविंद को समर्थन का ऐलान उनकी इसी रणनीति का हिस्सा है।

नीतीश के राजनीतिक भविष्य के लिए यह भी स्थापित होना जरूरी है कि उन्होंने मुख्यमंत्री बने रहने के लिए लालू प्रसाद यादव या कांग्रेस के सामने कोई समर्पण नहीं किया है बल्कि महागठबंधन की सरकार के मुख्तार वह खुद हैं। साझा सरकार होने के बावजूद तमाम बड़े मौकों पर अपना अलग रणनीतिक स्टैंड लेकर नीतीश यह स्थापित करने में पीछे नहीं रहे हैं कि लालू यादव या कांग्रेस उनके मास्टर नहीं हैं। नोटबंदी से लेकर राष्ट्रपति चुनाव तक पर नीतीश के फैसले इसकी मिसाल हैं। नीतीश को यह भी लगता है कि लालू यादव और उनका पूरा परिवार इस वक्त जिस तरह से सीबीआई से लेकर आयकर विभाग के घेरे में है, सरकार को गिराने जैसा कोई जोखिम लालू नहीं लेना चाहेंगे।

कहने का मतलब यह कि, लालू प्रसाद यादव की राजनीतिक और पारिवारिक मजबूरी का फायदा उठाते हुए अपनी राजनीतिक प्रतिबद्धता को ताक पर रखकर सिर्फ 'नीतीश की जय' के लिए जिस तरह के सियासी मार्ग पर नीतीश कुमार आगे बढ़ रहे हैं वह उनके लिए 'विनाशकाले विपरीत बुद्धि' जैसा ही साबित होने वाला है। क्योंकि नीतीश कुमार अपनी राजनीतिक प्रतिबद्धता, सुशासन बाबू, बिहार की अस्मिता, बिहार के विकास पुरूष और मोदी के खिलाफ 2019 में पीएम पद के लिए सशक्त संभावित चेहरा इन सबकी साख पर बट्टा लगाने की बड़ी गलती वाले सियासी राह पर आगे बढ़ चुके हैं। मोदी और शाह की नजर में बिहार अब प्राथमिकता में है। नीतीश को राजनीतिक रूप से कमजोर करना प्राथमिकता में हैं। रामनाथ कोविंद को नीतीश का समर्थन नोटबंदी के बाद इसकी दूसरी कड़ी है।

Sunday, 23 April 2017

अन्नदाता का दर्द और बेरहम शासक

गुलाम और आजाद भारत कई तरह के विरोध प्रदर्शनों का गवाह रहा है, लेकिन दिल्ली के जंतर मंतर, प्रधानमंत्री कार्यालय और प्रधानमंत्री आवास के बाहर अंतराल दर अंतराल ऐसा प्रदर्शन (तमिलनाडु के किसानों का आंदोलन) कभी नहीं देखा। गांधी के सत्य और अहिंसा से प्रेरित किसानों का एक महीने से अधिक समय से चला आ रहा विरोध प्रदर्शन यह जताने के लिए पर्याप्त है कि सूखा, कर्ज और बेकार की नीतियां देश के किसानों को किस तरह से लील रही हैं। कृषि विकास दर 1.2 प्रतिशत के चिंताजनक स्तर पर है और लाखों किसान कर्ज व थोड़ी सी आमदनी के चक्रव्यूह में इस कदर फंसा हुए है कि जीवन की बेहतरी अपनी जीवनलीला को खत्म करने में ही पाता है। और इससे भी बड़ा दुर्भाग्य यह है कि अन्नदाता के इस दर्द को देश का प्रधानसेवक (प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी) ना देख पा रहा है, ना सुन पा रहा है और ना महसूस कर पा रहा है।

सबसे खराब दौर में खेती और अन्नदाता
तमिलनाडु में करीब 40 प्रतिशत से अधिक लोग खेती-किसानी पर निर्भर हैं। तमिलनाडु में कम बारिश के कारण पानी की कमी, फसलों की कम कीमत, किसानों को कर्ज मिलने में होने वाली दिक्कतों ने कृषि संकट को पिछले कई दशकों के सबसे खराब दौर में पहुंचा दिया है। पिछले कुछ सालों में खराब बारिश और सूखे ने हालात ने किसानी को तहस-नहस कर दिया है और खेत बंजर हो चुके हैं। पिछले साल अक्टूबर के बाद से अब तक तमिलनाडु के सूखा प्रभावित जिलों में कर्ज के बोझ से दबे करीब 58 किसान आत्महत्या कर चुके हैं। जंतर-मंतर पर जुटे करीब 100 अन्नदाता मार्च महीने में ट्रेन से दिल्ली आए थे। इसमें से हर अन्नदाता की अपनी एक दर्दनाक कहानी है कि किस तरह से सुखाड़ से बंजर होते खेत और गूंगी व बहरी केंद्र व राज्य सरकारें उनकी जिंदगी के सारे सबूत मिटाने का खेल खेल रही है।

विरोध-प्रदर्शन के तरीकों पर पर गौर कीजिए
पिछले हफ्ते दिल्ली के जंतर-मंतर पर बड़ा ही अलग तरह का नज़ारा दिखा। 65 साल के किसान चिन्नागोदांगी पलानीसामी ने अपने राज्य तमिलनाडु में किसानों की दुर्दशा की तरफ सरकार का ध्यान आकर्षित करने के लिए अपने दांतों के बीच जिंदा चूहा रखकर प्रदर्शन किया। बीबीसी की एक रिपोर्ट के मुताबिक, पलानीसामी कहते हैं, मैं और मेरे साथी किसान ये संदेश देने की कोशिश कर रहे थे कि अगर चीजें नहीं सुधरीं तो हम चूहों को खाने के लिए मजबूर हो जाएंगे।
याद रहे, दर्द की दास्तान लिए ये किसान उसी तमिलनाडु से आए हैं जिसकी गिनती भारत के सबसे विकसित सूबों में होती है। ये अन्नदाता सरकार से कोई आलीशान वातानुकूलित कोठियां नहीं मांग रहे हैं। वे तो सूखा राहत कोष बनाने, बुजुर्ग किसानों के लिए पेंशन, फसल और कृषि कर्ज की छूट, फसलों की बेहतर कीमत और उनके खेतों को सिंचाई के लिए नदियों को जोड़ने की न्यायसंगत मांग कर रहे हैं।

नहीं पसीजा देश के प्रधानसेवक का दिल
पारंपरिक सारंग जैसे वस्त्र और पगड़ी पहने इन किसानों ने मानव खोपड़ियों को खुद से बांधा है ताकि वे खुद को मृतक किसानों से जोड़ सकें। उन्होंने अपने दांतों के बीच जिंदा चूहे रखकर प्रदर्शन किये, अपने आधे सिर मुंडाकर प्रदर्शन किए, महिलाओं की पारंपरिक साड़ियां पहनकर प्रदर्शन किए, कपड़े उतारकर नग्न प्रदर्शन किया और शव यात्रा निकालकर प्रतीकात्मक अंत्येष्टि तक की. प्रदर्शनकारी अन्नदाताओं ने मिट्टी पर रखकर खाना खाया, अपना मूत्र पीकर प्रदर्शन किया तथा आगे मल खाने की धमकी दी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात नहीं करने देने से नाराज होकर उनके आवास के बाहर नग्न प्रदर्शन तक किया। लेकिन देश के प्रधानसेवक का दिल नहीं पसीजा। तो अन्नदाता को लेकर मोदी सरकार की कृषि नीति और मंशा पर सवाल उठना लाजिमी है।

प्रधानसेवक की करनी-कथनी में गहरा फर्क
लालकिले की प्राचीर से खुद को देश का प्रधानसेवक की उपाधि से विभूषित करने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की करनी और कथनी में गहरा फर्क है। यह हम नहीं कह रहे, बल्कि खेती-किसानी को लेकर मोदी सरकार के उपेक्षित रवैये से यह साफ जाहिर होता है। मन की बात, जनसभाओं और विदेशी यात्राओं के दौरान जहां भी मौका मिलता है, देश के किसानों की दशा और दिशा को बेहतर करने के लिए बड़ी-बड़ी बातें करने से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी नहीं चूकते लेकिन जब उन्हीं बातों को जमीन पर उतारने की बारी आती है तो चुप्पी साध जाते हैं। गांधी और पटेल के नाम पर राजनीतिक करने वाले पीएम मोदी अगर तमिलनाडु के इन किसानों की दर्द भरी दास्तां थोड़ा समय निकालकर सुन लेते तो इन अन्नदाताओं का कितना भला होता शायद इसका अंदाजा आपके लोगों ने नहीं लगा पाया।

प्रधानमंत्री जी! गुजरात के सूरत शहर में धूमधड़ाके के साथ 25000 बाइक सवारों की टोली के बीच 12 किलोमीटर लंबा रोड शो करने का वक्त आपके पास है, कार्यक्रम में अनाप-शनाप हुए खर्च को सहन करने की ताकत आपमें है, लेकिन उस 37 दिनों से चल रहे आंदोलन में शामिल अन्नदाताओं के लिए 10 मिनट का वक्त आपके पास नहीं है। तो क्या, अन्नदाता के प्रति आपकी बेरूखी यह कहने के लिए पर्याप्त नहीं है कि किसानों के लिए जैसा आप बोलते हैं, आपकी सोच और सरकार की नीति में कहीं भी फिट नहीं बैठती है?

Sunday, 5 March 2017

काशी का किस्सा : बिगड़े दूध से मक्खन नहीं निकलता

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के अंतिम चरण के मतदान से ठीक पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तीन दिन से काशी प्रवास पर हैं। 4 मार्च से 6 मार्च के बीच काशी के मतदाताओं से रू-ब-रू होने के लिए प्रधानमंत्री ने शनिवार और रविवार को अलग-अलग इलाकों में रोड शो किया और जनसभाएं कीं। कहते हैं कि पूरी काशी नगरी केसरिया रंग में रंग गया है। चुनाव विशेषज्ञ तो यहां तक कह रहे हैं कि जितनी भीड़ पीएम मोदी के रोड शो में दिखी है अगर वह वोट में परिवर्तित हो जाता है तो कम से कम वाराणसी लोकसभा के सभी विधानसभाओं में तो भाजपा की जीत पक्की समझिए। लेकिन भाजपा के मार्गदर्शक संगठन राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) का यह कहना कि, कोशिश यह की जा रही है कि बिगड़े दूध से जो भी मक्खन निकल सके, उसे निकाल लिया जाए।

तो क्या पीएम मोदी को अपने ही संसदीय क्षेत्र में भाजपा की हार का खतरा दिख रहा है? हां, इस बात की पुष्टि मोदी सरकार के मंत्री उपेंद्र कुशवाहा और भाजपा के स्टार नेता व सांसद शत्रुघ्न सिन्हा की टिप्पणी से भी होती है। वाराणसी में पीएम मोदी के रोड शो पर गहरी नाराजगी जताते हुए राष्ट्रीय लोक समता पार्टी के प्रमुख और केंद्रीय मंत्री उपेंद्र कुशवाहा ने शनिवार को कहा, 'मैं व्यक्तिगत रूप से महसूस करता हूं कि प्रधानमंत्री का पद इतना ऊंचा होता है कि उन्हें रोड शो नहीं करना चाहिए था। पीएम का यह रोड शो उनके पद और व्यक्तित्व की गरिमा के अनुकूल नहीं है।' अगले दिन रविवार को शत्रुघ्न सिन्हा उठ खड़े हुए और कहा, 'यह किसी किस्म की निराशा का भी संकेत देता है। यह कैसी हताशा है?' अगर आप कॉन्फिडेंट हैं, आपके पास स्टार प्रचारक हैं, जलेबी खाने वाले नेता हैं तो इस तामझाम का क्या मतलब है?'

फ्लैशबैक में जाएं तो ढाई साल पहले जब लोकसभा चुनाव लड़ने पीएम मोदी वाराणसी आए थे, तब नामांकन के बाद मुश्किल से एक बार कुछ घंटों के लिए उन्हें यहां आने की जरूरत पड़ी थी और वाराणसी की जनता ने उन्हें भारी बहुमत से जिताकर प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बिठा दिया था। आज हालत यह है कि विधानसभा चुनाव में भाजपा प्रत्याशियों को जिताने के लिए उन्हें वह सब कुछ करना पड़ रहा है, जो उन्होंने खुद के लिए भी नहीं किया था। सवा सौ करोड़ देशवासी के प्रधानमंत्री ने उत्तर प्रदेश और खासतौर पर वाराणसी में भाजपा की जीत के लिए अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया है। तीन दिन तक वाराणसी में कैम्प करना, शनिवार और रविवार को सात-सात किलोमीटर लंबा रोड शो करना, केंद्रीय मंत्रिमंडल के एक दर्जन से अधिक मंत्रियों को ड्यूटी लगाने को आखिर किस रूप में देखा जाए?

क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्र की सत्ता पर काबिज भाजपा को वाराणसी के मतदाताओं पर अब वो भरोसा नहीं रहा, जो 2014 में था? तमाम राजनीतिक विश्लेषकों की राय मानें तो वो इसे प्रधानमंत्री और उनकी पार्टी पर से वाराणसी की जनता का 'भरोसा उठना' बताते हैं। वह कहते हैं, देश के प्रधानमंत्री को नीतियों की बात करनी चाहिए, क्या किया और क्या करने वाले हैं, वह सब कुछ बताना चाहिए। वाराणसी के लिए उन्होंने क्या किया और क्या करने वाले हैं, यह बताना चाहिए। लेकिन प्रधानमंत्री रोड शो कर रहे हैं। आखिर रोड शो की जरूरत क्यों पड़ी? जनता तो हिसाब मांगेगी। आखिर मोदी सरकार के तीन साल होने जा रहे हैं।
दरअसल, नरेंद्र मोदी की यह पुरानी शैली रही है कि माहौल बनाकर, जुमलेबाजी कर, मतदाताओं को उंगली घुमाकर दिग्भ्रमित कर दो और फिर वोट ले लो। रोड शो के पीछे की रणनीति यही होती है। जीत हासिल करने की मोदी की इस पुरानी शैली को अखिलेश और राहुल भी खूब आजमा रहे हैं। दरअसल इस तरह की गलत परंपरा के जनक चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर हैं जिन्होंने पहले मोदी की आदत बिगाड़ी और अब राहुल और अखिलेश को उसी रास्ते पर आगे बढ़ा रहे हैं। जरा सोचकर देखिए, अगर मोदी जी ने देश के लिए कुछ अच्छा किया होता, अपने इलाके में कुछ अच्छा काम किया होता तो आज कम से कम काशी नगरी में उन्हें रोड शो की जरूरत नहीं पड़ती।

भाजपा आलाकमान अमित शाह और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को निश्चित रूप से इस बात का भान हो गया है कि जनता उनकी जुमलेबाजी को समझ गई है। तभी तो विधानसभा चुनाव के वो उम्मीदवार जो भाजपा के टिकट पर चुनाव मैदान में हैं उन्हें बिल्कुल पीछे धकेल दिया गया है। यूं कहिए कि मतदाताओं ने उनके चेहरे तक नहीं देखे। ये तो अजीब चुनाव है। लोकतंत्र की सेहत के लिए ये ठीक नहीं है। कहते हैं कि बनारस के राजनीतिक इतिहास में भी ऐसा कभी नहीं हुआ। ऐसा लगता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ही एक प्रत्याशी के तौर पर चुनाव मैदान में हैं।

वाराणसी भाजपा और खासतौर से नरेंद्र मोदी के लिए नाक की लड़ाई है। हर जगह जीत गए और यहां हार गए तो क्या मुंह दिखाएंगे प्रधानसेवक जी। पार्टी के लोग उनसे सवाल पूछने लगेंगे। इसलिए वह किसी भी सूरत में यहां की कम से कम भाजपा की तीन परंपरागत सीटों को बचाकर अपनी साख बचाना चाहते हैं। वाराणसी शहर क्षेत्र की ये तीनों सीटें फिलहाल भाजपा के पास हैं। शहर दक्षिणी से श्यामदेव राय चौधरी, उत्तरी से रविंद्र जायसवाल और कैंटोनमेंट से ज्योत्स्ना श्रीवास्तव भाजपा से मौजूदा विधायक हैं। शहर दक्षिणी में चौधरी की जगह इस बार आरएसएस के युवा कार्यकर्ता नीलकंठ तिवारी को टिकट दिया गया है। उत्तरी क्षेत्र से मौजूदा विधायक रवींद्र जायसवाल पर भाजपा ने एक बार फिर भरोसा किया है और कैंटोनमेंट से मौजूदा विधायक ज्योत्स्ना के बेटे सौरभ श्रीवास्तव को उम्मीदवार बनाया गया है।

भाजपा के पितृ संगठन आरएसएस की मानें तो उसे भरोसा नहीं है कि अमित शाह और नरेंद्र मोदी की ये कोशिशें रंग लाएंगी। संघ भी इस सच को मानता है कि पांच में से दो सीटें भी निकल जाए तो बहुत है। वाराणसी के बिगड़े हालात से भाजपा और संघ का शीर्ष नेतृत्व पूरी तरह से वाकिफ है। पीएम मोदी का तीन दिन का काशी प्रवास इसी रणनीति का हिस्सा है। मोदी और शाह को लगता है कि माहौल बनाकर चुनाव जीता जा सकता है। लेकिन इन्हें ये बात समझनी चाहिए कि ये 2014 का साल नहीं है। तब जनता ने नरेंद्र मोदी पर अपना विश्वास लुटाया था। अब ढाई साल बात उसी जनता को ये लगने लगा है कि मोदी जी ने जन-विश्वास से विश्वासघात किया है।

बहरहाल, ढाई साल में बहुत कुछ बदल गया है। प्रधानमंत्री के अपने लोग भी मानने लगे हैं कि काशी में भाजपा का दूध बिगड़ चुका है और रहीम दास की मानें तो बिगड़े दूध से मक्खन नहीं निकलता, चाहे उसे कितना भी मथा जाए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह अपने लावलश्कर के साथ काशी नगरी के मतदाताओं को मथ रहे हैं। अब इसमें से कितना मक्खन निकाल पाते हैं यह तो 11 मार्च को ही पता चलेगा।

Tuesday, 28 February 2017

भाजपा के मंत्री क्यों मना रहे हैं मातम?

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 403 विधानसभा सीटों में से एक भी सीट पर मुस्लिम उम्मीदवार को टिकट नहीं दिया। चार चरण का चुनाव खत्म होने के बाद अचानक ऐसा क्या हो गया कि एक के बाद एक तीन-तीन भाजपा नेता व मोदी सरकार के मंत्री पार्टी की इस गलती को कोस रहे हैं और मातम मनाने की भरपूर नौटंकी भी। सबसे पहले भाजपा के पूर्व अध्यक्ष और मोदी सरकार में देश के गृह मंत्री राजनाथ सिंह, फिर भाजपा की फायरब्रांड नेत्री उमा भारती और फिर भाजपा के मुस्लिम नेता और केंद्रीय मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी, एक के बाद एक ये नेता उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में किसी भी मुस्लिम को पार्टी के टिकट पर उम्मीदवार नहीं बनाने के फैसले पर सवाल उठाने लगे हैं। इन नेताओं के बयान को पार्टी की मुस्लिम विरोधी नीतियों के खिलाफ आवाज समझना ठीक नहीं होगा।

मोदी सरकार में मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी को इस बात का मलाल है कि भाजपा ने यूपी के चुनाव में एक भी मुस्लिम को टिकट नहीं दिया। हालांकि नकवी कह रहे हैं कि इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। अगर कमी हुई है तो भरपाई भी सूद समेत की जाएगी। उन्होंने कहा कि बीजेपी के मुस्लिमों को टिकट न देने के आधार पर केंद्र सरकार के कामकाज को नहीं आंका जाना चाहिए। उन्होंने कहा, 'भाजपा समाज के सभी वर्गों को साथ लेकर चलने में भरोसा रखती है और पार्टी की राज्य में सरकार बनने पर मुस्लिम समुदाय के लोगों को इसकी भरपाई की जाएगी। हमने सभी के सहयोग से केंद्र में सरकार बनाई। हम उत्तर प्रदेश में भी सरकार बनाएंगे।'

इससे पहले हिन्दुत्व की राजनीति करने वाली भाजपा की फायरब्रांड नेता और केंद्रीय मंत्री उमा भारती ने 'सीएनएन-न्यूज 18' से कहा, 'मुझे सच में इस बात का दु:ख है कि हम किसी मुस्लिम प्रत्याशी को चुनाव मैदान में नहीं उतार सके। मैंने इस बारे में भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और उत्तर प्रदेश भाजपा अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्य से बात की थी कि किसी प्रकार एक मुसलमान को विधानसभा में लाया जाए।'

हालांकि उमा भारती की टिप्पणी पर उनकी ही पार्टी के विनय कटियार ने सवालिया लहजे में कहा, 'जब मुसलमान हमारे लिए वोट ही नहीं करते तो हम उन्हें टिकट क्यों दें?' मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, जब ये सवाल भाजपा के यूपी अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्य से पूछा गया कि भाजपा ने किसी मुसलमान को टिकट क्यों नहीं दिया? तो उन्होंने साफ-साफ कह दिया कि कोई मुस्लिम कार्यकर्ता चुनाव जीतने के लायक ही नहीं था इसलिए टिकट नहीं दिया। कहने का मतलब यह कि भाजपा का 'सबका साथ-सबका विकास' का नारा सिर्फ जुमलेबाजी है। पूरे 20 प्रतिशत मुस्लिम आबादी के बीच से कोई एक प्रतिनिधि को भाजपा ने मौका ही नहीं दिया।

इससे पहले केंद्रीय गृह मंत्री और पूर्व भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने भी इस बात को स्वीकार कर चुके हैं कि इस चुनावी संग्राम में भाजपा को मुस्लिम प्रत्याशी उतारने चाहिए थे। टाइम्स नाउ के एडिटर राहुल शिवशंकर से खास बातचीत में राजनाथ सिंह ने कहा कि भाजपा को उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में मुसलमान उम्मीदवारों को उतारना चाहिए था। 'हमने कई दूसरे राज्यों में अल्पसंख्यकों को टिकट दिए हैं। उत्तर प्रदेश में भी इस पर बात होनी चाहिए थी। मैं वहां नहीं था, मुझे जो पता है उसके आधार पर बोल रहा हूं। हो सकता उन्हें (भाजपा संसदीय बोर्ड को) कोई जीतने योग्य मुस्लिम उम्मीदवार नहीं मिले हों। लेकिन, मेरा मानना है कि फिर भी उन्हें (मुसलमानों को) टिकट मिलना चाहिए था।'

उत्तर प्रदेश में मुस्लिम आबादी 20 प्रतिशत के करीब है। भाजपा लगातार कहती रही है कि टिकट बंटवारा योग्यता और उम्मीदवार के जीतने की संभावना के आधार पर तय होता है न कि जाति और धर्म के आधार पर। इसकी पुष्टि यूपी भाजपा के अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्य ने भी यह कहकर साफ कर दिया कि कोई मुस्लिम कार्यकर्ता चुनाव जीतने के लायक ही नहीं था। तो बड़ा सवाल यह उठता है कि पार्टी के कद्दावर नेता और मोदी सरकार के तीन-तीन वरिष्ठ मंत्री राजनाथ सिंह, उमा भारती और मुख्तार अब्बास नकवी को यूपी में चार चरणों के चुनाव संपन्न होने के बाद अचानक मुस्लिमों को चुनाव उम्मीदवार न बनाना भाजपा की गलती क्यों लग रही है?

निश्चित रूप से इस बयान के पीछे यूपी चुनाव में बाकी बचे चरणों के मतदान जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का संसदीय क्षेत्र वाराणसी भी शामिल है, मुस्लिम मतदाताओं को भाजपा की तरफ आकर्षित करने की एक रणनीतिक चाल है। क्योंकि भाजपा आलाकमान को यह अच्छे से पता है कि 2014 के लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी को मुसलमान मतदाताओं ने भी बड़ी संख्या में वोट किया था। इस चुनाव में हवा का रूख भाजपा के पक्ष में नहीं दिख रहा है इसलिए भाजपा नेता इस तरह के 'सर्व-धर्म-सम्भाव' का कार्ड खेलकर और 'सबका साथ सबका विकास' के नारे को स्थापित करने की नीति के तहत इस तरह के बयान दे रहे हैं। ताकि मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में अपनी इज्जत बचा सकें।

दूसरी बात शायद भाजपा आलाकमान को यह लग रहा होगा कि चुनाव नजदीक आने पर कुछ ऐसा चमत्कारिक घटनाक्रम हो जाएगा कि बीच चुनाव में वोटों के ध्रवीकरण की लहर चल जाएगी और हिन्दुओं का करीब 80 प्रतिशत वोट का अधिक से अधिक हिस्सा भाजपा के पक्ष में आ जाएगा। लेकिन ऐसी कोई लहर नहीं चल पाने के बाद भाजपा को काफी निराशा हाथ लगी। इसलिए पार्टी ने 'सबका साथ-सबका विकास' के जुमले को एक बार फिर से उछालकर इसके तहत यह जताने की कोशिश कर रहे हैं कि हम मुस्लिमों के खिलाफ नहीं हैं। हम सब चाहते तो थे और पार्टी को मुस्लिम उम्मीदवारों को चुनाव मैदान में उतारना चाहिए था।

गौर करने वाली बात यह भी है कि मुस्लिमों से सहानूभूति रखने वाले बयान पार्टी के अंदर से नहीं बल्कि मोदी सरकार के मंत्रियों की तरफ से आ रहे हैं। संकेत साफ है कि मुस्लिमों को लेकर पार्टी की नीति में कोई बदलाव नहीं आया है। सरकार का धर्म होता है कि देश के हर वर्ग के लोगों का समान विकास हो लेकिन यह भी नहीं भूलना चाहिए कि हर पार्टी अपने सिद्धांतों की राजनीति करती है और जब वह पार्टी सरकार में आती है तो अपनी उसी विचारधारा को सरकार की नीति के रूप में पेश करती है। कहने का मतलब यह कि यूपी चुनाव में मुस्लिम उम्मीदवारों की अनदेखी को लेकर जिस तरह के बयान जारी किए जा रहे हैं यह महज मुस्लिम मतदाताओं को दिग्भ्रमित करने की एक चुनावी चाल है।  

मालूम हो कि भाजपा की विरोधी पार्टियां चाहे वो सपा-कांग्रेस गठबंधन हो या फिर बसपा और राष्ट्रीय लोक दल हो, मुस्लिम वोट के सहारे ही अपनी नैया पार कराने की कोशिश में लगे हैं। यही वजह है कि इस बार के चुनाव में समाजवादी पार्टी और कांग्रेस गठबंधन ने 100 मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट दिया है, वहीं मायावती ने 97 मुस्लिम उम्मीदवार मैदान में उतारे हैं। और चुनाव को आखिरी दो-तीन चरणों में भाजपा को भी याद आया कि हमसे गलती हो गई। हमें भी मुस्लिम उम्मीदवार उतारने चाहिए थे।

Sunday, 12 February 2017

तो पलट दो सरकार को उलटा

बीते एक-दो महीने के आंकड़ों पर गौर करें तो चीनी, आटा, गेहूं, दाल ब्रेड से लेकर छोले, मूंगफली और चॉकलेट तक सभी चीजें महंगी हो गई हैं। आम बजट के बाद भी कुछ चीजों के दाम बढ़े हैं। लेकिन उत्तर प्रदेश समेत पांच राज्यों के चुनाव में महंगाई कोई मुद्दा नहीं है। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के पहले चरण में वेस्ट की 73 सीटों पर मतदान के दिन तक नेता जात-पांत, सांप्रदायिक मुद्दे और स्थानीय मुद्दों को बढ़ा-चढ़ा कर पेश करते दिखे।

इस संबंध में विपक्षी पार्टियों से आप सवाल करेंगे तो वह सत्ताधारी पार्टी पर निशाना साधता है। दूसरी तरफ केंद्र की सत्ता पर काबिज भारतीय जनता पार्टी कहती है कि यूपीए सरकार के मुकाबले महंगाई कम हुई है। अब कोई भी पार्टी प्रतिबद्धता के साथ पने चुनाव घोषणा पत्र में महंगाई को मुद्दा नहीं बनाता है। कहने का मतलब यह कि बढ़ती महंगाई का मुद्दा धीरे-धीरे राजनीति के परिदृश्य से गायब हो चला है। ऐसे में एक मतदाता, एक मेहनतकश जो आम आदमी भी है को यह समझना होगा कि उससे और उसके लिए बनी राजनीति और सरकार उसे संविधानप्रदत्त बुनियादी अधिकारों से वंचित न करने पाए।

याद कीजिए 2014 के लोकसभा चुनाव को जब भाजपा के प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी नरेंद्र मोदी यूपीए सरकार में महंगाई को मुद्दा बनाकर यह कहते नहीं थकते थे कि 'मोदी सरकार आई महंगाई गई'। भाजपा ने इस मुद्दे पर जनभावनाओं को भुनाया और जब देश में बहुमत की सरकार बन गई तो उसके बाद सर्जिकल स्ट्राइक, नोटबंदी, रेनकोट, जन्मपत्री जैसे मुद्दों में उलझाकर आम आदमी की जिन्दगी को सबसे ज्यादा प्रभावित करने वाले महंगाई के मुद्दे को नेपथ्य के हवाले कर दिया।

दरअसल 6-7 दशक की राजनीतिक अनुभवों ने देश के राजनीतिज्ञों को यह समझा दिया है कि चुनाव मुद्दों से नहीं बल्कि समीकरणों से जीता जाता है। यह समीकरण गठबंधन की राजनीति के चलते दलीय भी हो सकता है और जातिगत भी। हर दल सस्ते और भावुकतापूर्ण नारों के साथ इसी समीकरण को धार देने में जुटा रहता है। इसलिए मुद्दे उभरते हैं अथवा उभारे जाते हैं लेकिन समय के साथ उन्हें नेपथ्य में जाते भी देर नहीं लगती है।

भारतीय रिजर्व बैंक का कहना है कि वित्त वर्ष 2017-18 में औसतन खुदरा मुद्रास्फीति 4.5 फीसदी रह सकती है, लेकिन उसे महंगाई दर के इससे ऊपर जाने का जोखिम भी दिख रहा है। इसका मतलब यह भी है कि रिजर्व बैंक के लिए ब्याज दरों में और कटौती करना संभव नहीं रह गया है और महंगाई 4.5 फीसदी के बजाय पांच फीसदी रहती है तो इसका मतलब यह है कि अगले वित्त वर्ष में वह ब्याज दरों में बढ़ोतरी भी कर सकता है।

सच पूछा जाय तो आम आदमी की जिन्दगी से ताल्लुक रखने वाले इस महंगाई को मुद्दा बनाकर सत्ता में आने वाली मोदी सरकार के लिए अब यह मुद्दा नहीं रह गया है। अगर गलती से कोई यह सवाल करता है तो सरकार और भाजपाई प्रवक्ता इसका जवाब देने के बजाय यूपीए सरकार की महंगाई से तुलना करने लगते हैं।

तो बड़ा सवाल यह कि आखिर देश का आम मतदाता कब ईवीएम की बटन दबाने के पहले खुद की जिन्दगी के बारे में सोचेगा? क्या उसे यह बात नहीं सोचनी चाहिए कि बढ़ती महंगाई उसकी थाली की रोटियों में लगातार कटौती करती जा रही है? क्या वह यह नहीं सोचेगा कि इस महीने बच्चों की स्कूल-फीस देने के लिए हो सकता है उसे घर का कोई सामान गिरवी रखना पड़े? क्या महंगाई का राजनीति के परिदृश्य से बाहर चले जाने को उसकी अंतिम विदाई मान लिया जाए?

नहीं, ऐसा कभी नहीं होना चाहिए। दरअसल सरकार चाहे कोई भी पार्टी बनाए, वास्तव में वे पूंजीपतियों की बेलगाम लूट और मुनाफे की परिस्थितियां ही तैयार करती हैं। आम मेहनतकश जनता उनकी निगाह में इंसान नहीं जानवर होते हैं जिसे रोटी, कपड़ा, मकान, इलाज और शिक्षा की जरूरत नहीं होती। बस पेट भरने के लिए मुट्ठी भर अनाज काफी होता है और वह भी गरीबी रेखा वाली शर्त पूरी करने के बाद। एक मेहनतकश अवाम के लिए इस नारकीय स्थिति से मुक्ति पाने का बस एक ही रास्ता बचता है जिसका उल्लेख अपने नाटक 'मदर' में बेर्टोल्ट ब्रेष्ट ने किया है। जरा गौर से पढ़िए और समझिए...

ग़र थाली आप की ख़ाली है
ग़र थाली आपकी ख़ाली है
तो सोचना होगा कि खाना कैसे खाओगे
ये आप पर है कि पलट दो सरकार को उलटा
जब तक कि खाली पेट नहीं भरता
अपनी मदद आप करो
किसी का इन्तजार ना करो
यदि काम नहीं है और आप हो गरीब
तो खाना कैसे होगा ये आप पर है
सरकार आपकी हो ये आप पर है
पलट दो उलटा सर नीचे और टांगें ऊपर
आप पर है कि पलट दो सरकार को उलटा
तुम पर हंसते हैं कहते हैं तुम गरीब हो
वक़्त मत गंवाओ अपने आप को बढ़ाओ
योजना को अमली जामा पहनाने के लिए
गरीब-गुरबा को अपने पास लाओ
ध्यान रहे कि काम होता रहे
होता रहे-होता रहे
जल्दी ही समय आयेगा जब वो बोलेंगे
कमजोर के आस-पास हंसी मंडरायेगी
हंसी मंडरायेगी, हंसी मंडरायेगी।

Sunday, 29 January 2017

24 साल पुराने इतिहास को दोहरा पाएंगे अखिलेश?

समाजवादी पार्टी की स्थापना के बाद तत्कालीन सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव ने उत्तर प्रदेश की सत्ता में आने के लिए जो प्रयोग 1993 में किया था, अखिलेश यादव 24 साल बाद 2017 के चुनाव में वही प्रयोग दोहरा रहे हैं। फर्क बस इतना है कि उस समय नेताजी मुलायम सिंह यादव ने बसपा के साथ गठबंधन किया था और इस बार अखिलेश ने कांग्रेस के साथ गठबंधन किया है।

समाजवादी पार्टी और कांग्रेस पार्टी का गठबंधन इस चुनाव में क्या गुल खिलाता है, यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा, लेकिन दोनों ही दलों की कमान इस समय युवा हाथों में है और दोनों नेताओं के रणनीतिकारों (प्रशांत किशोर और प्रो. स्टीव जार्डन) ने जिस तरह की चुनावी रणनीति को अंजाम दिया है उससे तो यही लगता है कि अखिलेश अपने पिता के लिखे इतिहास का न केवल दोहराएंगे बल्कि आगामी राजनीति की दिशा क्या होगी वह भी तय करेंगे।

मुलायम सिंह यादव ने 1993 में क्षेत्रीय पार्टियों के गठबंधन का नया प्रयोग किया था। उन्होंने बसपा के संस्थापक कांशीराम से हाथ मिलाते हुए गठबंधन की राजनीति शुरू की और इसका एलान लखनऊ के बेगम हजरत महल पार्क में किया था। उत्तराखंड उस समय उत्तर प्रदेश का हिस्सा हुआ करता था और उत्तर प्रदेश में कुल 422 विधानसभा सीटें हुआ करती थीं। मुलायम ने गठबंधन के आधार पर सपा के 256 उम्मीदवार उतारे थे और बसपा को 164 सीटें दी थीं। मुलायम का यह प्रयोग रंग लाया और उत्तर प्रदेश में सपा ने 109 और बसपा ने 67 सीटों पर जीत दर्ज की थी। गठबंधन की शर्तों के आधार पर मुलायम सिंह मुख्यमंत्री बने, लेकिन यह सरकार 18 माह ही चल सकी।

कांशीराम और मुलायम सिंह यादव की राजनीतिक कैमिस्ट्री तब शानदार थी। तब कांशीराम ने अपने शर्तों के अनुरूप मुलायम सिंह यादव से खुद की पार्टी यानी समाजवादी पार्टी का गठन करवाया था और फिर बसपा से तालमेल भी कराया था। 1991 में कांशीराम की इटावा से जीत के दौरान मुलायम का कांशीराम के प्रति यह आदर अचानक उभर कर सामने आया था जिसमें मुलायम ने अपनी पार्टी के खास राम सिंह शाक्य की पराजय में कोई गुरेज नहीं किया था। इस हार के बाद राम सिंह शाक्य और मुलायम सिंह यादव के बीच मनुमुटाव भी हुआ, लेकिन मामला फायदे का होने के चलते शांत हो गया।

कांशीराम की इस जीत के बाद उत्तर प्रदेश में मुलायम और कांशीराम की जो जुगलबंदी शुरू हुई इसका लाभ उत्तर प्रदेश में 1993 में मुलायम सिंह यादव की सरकार के रूप में मिला, लेकिन 2 जून 1995 को हुए गेस्ट हाउस कांड के बाद सपा और बसपा के बीच बढ़ी तकरार इस कदर हावी हो गई कि दोनों दल एक दूसरे को खत्म करने पर अमादा हो गए। उसके बाद मुलायम की सपा का आज तक बसपा की मायावती से गठबंधन पर कोई बात नहीं हुई।

उत्तर प्रदेश के वर्ष 2012 के चुनाव में समाजवादी पार्टी को पूर्ण बहुमत मिली। मुलायम सिंह यादव ने अपने बेटे  अखिलेश यादव को मुख्यमंत्री बनाया। अखिलेश इस समय सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं। कहें तो अखिलेश ने बतौर सपा मुखिया 24 साल पहले वाला मुलायम सिंह यादव का प्रयोग दोहराया है। मगर इस बार गठबंधन बसपा से न होकर कांग्रेस से है। अखिलेश ने राष्ट्रीय पार्टी होने के बाद भी कांग्रेस को 105 सीटें दी।

मुलायम-कांशीराम की तर्ज पर ही अखिलेश-राहुल ने कोई चुनावी रैली न करके रोड शो किया जिसके लिए लखनऊ को चुना गया। यह रोड शो जीपीओ स्थित गांधी प्रतिमा पर माल्यार्पण से शुरू होकर मेफेयर चौराहा हजरतगंज, नोवल्टी चौराहा, लालबाग से कैसरबाग, अमीनाबाद, नजीराबाद, नक्खास, चौक चौराहा होते हुए घंटाघर पर संपन्न हुई। रोड शो की खास बात यह रही कि जिस गांधी को मोदी सरकार और भाजपा मिटा देना चाहती है वहीं अखिलेश और राहुल ने गांधी प्रतिमा पर माल्यार्पण कर पहले साझा रोड शो के माध्यम से चुनाव प्रचार अभियान को अंजाम दिया है।