Friday, 24 December 2010

ओबामा का भारत दौरा: किसका हित किसका अहित?

फिल्म बैजू बावरा में एक गाने की पंक्ति है- सुर ना सजे क्या गाऊं मैं।’ सुर यानी ध्वनियों का बेहतरीन तालमेल, इतना सुंदर संतुलन कि वे संगीत में बदल जाएं। इतना दमखम पैदा हो जाए कि गाने वाला तो क्या, सुनने वाले भी खो जाएं उन ध्वनियों में। जी हां, मैं आपको 8 नवंबर 2010 सोमवार के दिन भारतीय संसद के सेंट्रल हॉल में अमेरिकी राष्ट्रपति बराक हुसैन ओबामा के संबोधन में सुर संतुलन का स्मरण कराना चाहता हूं। भारतीय संसद को पहले भी कई अमेरिकी राष्ट्रपतियों ने संबोधित किया है, लेकिन 49 वर्षीय ओबामा के संबोधन की बात ही कुछ और थी। एक डिप्लोमेटिक भाषण में किस तरह से जीवन मूल्यों, नैतिकताओं व आदर्शों की बात की जा सकती है उसका बेहतरीन नमूना ओबामा के भाषण में देखने को मिला। भारतीय प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह को आर्थिक गुरु मानने वाले ओबामा भारत को विश्व गुरु बनाकर पूरी महफिल लूट ले गए। अब देखना यह है कि भारत के विश्व गुरु बनने में असली हित किसका है- गुरु का या फिर जिसने गुरु का तमगा दिया उसका। हालांकि इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि कथनी और करनी में बहुत फर्क होता है, लेकिन यह भी सत्य है कि कुछ कहोगे तभी तो कुछ करने या होने की गुंजाइष बनेगी। राष्ट्रपति ओबामा ने अपने तीन दिवसीय भारत दौरे के दौरान जो कुछ कहा, यदि उसपर अमल करते हुए भारत-अमेरिका आगे बढ़ें तो यह कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं कि बहुत कम समय में भारत दुनिया का सबसे शक्तिशाली राष्ट्र बन जाएगा।
6 नवंबर 2010 को ओबामा मुंबई के होटल ताज पहुंचे जहां उन्होंने आगंतुक पुस्तिका में लिखा- अमेरिका आतंकवाद का अभिशाप खत्म करने में सभी मुंबईवासियों और भारत के साथ है। हम भारत के साथ स्थायी दोस्ती के पेशकश करते हैं। इसके बाद ओबामा अपनी पत्नी मिशेल के साथ होटल स्थित ‘ट्री ऑफ मेमोरियल’ के उस हिस्से में पहुंचे जिसे आतंकवादियों ने मुख्य रूप से निशाना बनाया था। ओबामा ने स्मारक स्थल पर मौजूद लोगों को संबोधित करते हुए कहा- ‘विविधता में एकता भारत की सबसे बड़ी ताकत है। यही हमलावरों के निशाने पर थी। वे धार्मिक आधार पर लोगों को लड़ाना चाहते थे, लेकिन उनके मंसूबे कामयाब नहीं हुए। हिंदुओं, सिखों, इसाइयों और मुस्लिमों ने हमले के वक्त एक दूसरे की रक्षा की। सभी धर्मों का सार है कि हम सब ईश्वर की संतान हैं। लोगों की भावनाओं से इस अवधारणा को फिर बल मिला।’ ओबामा के इस संबोधन से ही भारत को यह मान लेना चाहिए कि हम जो बात ओबामा से कहलवाना चाहते थे वह उन्होंने भारत की धरती पर कदम रखते ही अपने पहले संबोधन में ही व्यक्त कर दिये।
हमारा मानना है कि ओबामा की भारत यात्रा अन्य अमेरिका राष्ट्रपतियों से काफी अलग है। क्योंकि इस यात्रा के दौरान ओबामा का पाकिस्तान जाने का कोई कार्यक्रम नहीं था। अमूमन भारत आने वाले सभी राष्ट्रपतियों का पाक दौरा जरूर होता है, लेकिन अब तक चली आ रही इस परंपरा को तोड़कर ओबामा ने साफ संकेत दिया है कि अब पाकिस्तान की जगह भारत ने अमेरिका की प्राथमिकताओं में अपनी जगह बना ली है। अमेरिका ने आतंकवाद के खिलाफ पाकिस्तान को अपना भरोसेमंद साथी करार दिया है और उसे अगले पांच साल में 2.2 अरब डॉलर की मदद दी है। इस मुद्दे पर अमेरिका अपनी जगह सही भी है क्योंकि वह पिछले काफी समय से तालिबान को दबाने की कोशिश कर रहा है। हमे इस बात पर आपत्ति नहीं होनी चाहिए क्योंकि भारत भी तालिबान और उसके द्वारा प्रशिक्षित आतंकियों की साजिशों का लगातार शिकार होता आ रहा है। हमें जरूरत सिर्फ यह तय करने की है कि इस पैसे से खरीदे जाने वाले साजो-सामान का भारत के खिलाफ कोई इस्तेमाल न हो। दूसरी तरफ ओबामा की इस यात्रा न पाक सरकार और उसकी फौज के माथे पर खिंची चिंता की लकीरें और गहरी कर दी हैं। पाकिस्तान को लगता है कि आतंक से लड़ने का सबसे बड़ा जिम्मा उनके कंधों पर है, लेकिन ओबामा दोस्ती हिन्दुस्तान से बढ़ा रहे हैं। मुझे लगता है कि भारत की सरजमीं पर कदम रखते ही विश्व के शक्तिशाली राष्ट्र का राष्ट्राध्यक्ष भारत के समर्थन में इतना कुछ बोल जाए, काफी है, लेकिन भारतीयों की मनःस्थिति साफ-साफ यह जानने की रहती है कि पाकिस्तान का नाम लेकर अमेरिका का सिरमौर कुछ क्यों नहीं बोल रहा। अरे भाई, बोलेगा, थोड़ा धैर्य तो रखो, अवसर तो आने दो। इतने हल्के में क्यों ले रहे हो इस महाशक्ति को। अंदाजा सच निकला और ज्यों-ज्यों पास आते गए, सुर और ताल का संतुलन मजबूती से बढ़ता गया और हम सबको कहना पड़ा- ‘नमस्ते ओबामा, वाह ओबामा।’
दिल्ली रवाना होने से पहले रविवार सुबह मुंबई के सेंट जेवियर कॉलेज के छात्रों से ओबामा रू-ब-रू हुए जहां उन्होंने यह बात साफ कर दी कि ‘भारत और पाकिस्तान के बीच बातचीत में अमेरिका मध्यस्थता नहीं करेगा। दक्षिण एशिया के इन दोनों पड़ोसियों को अपने विवाद खुद सुलझाने चाहिए। अमेरिका इसमें एक सहयोगी हो सकता है, लेकिन इस प्रक्रिया को थोप नहीं सकता।’ पूर्व केंद्रीय मंत्री मणिशंकर अय्यर जो अपने तीखे तेवरों और लीक से हटकर बोलने के लिए मशहूर हैं की बातें भी ओबामा से काफी मिलती-जुलती है। जब अय्यर से रविवार को सवाल किया गया कि ओबामा ने पाक का जिक्र अभी तक क्यों नहीं किया तो उन्होंने कहा कि भारत-पाकिस्तान के बीच जो भी मतभेद हैं उनका हल दोनों देशों को ही निकालना चाहिए। इन विषयों के लिए अमेरिका पर निर्भर रहना बिलकुल गलत है क्योंकि उसके अपने हित और स्वार्थ हैं।
रविवार दोपहर बाद दिल्ली हवाई अड्डे पर ओबामा दंपति का स्वागत करने पहुंचे प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह और उनकी पत्नी गुरशरण कौर, वो भी प्रोटोकॉल तोड़कर। यह एक आत्मीयता थी, एक भारतीय दर्शन था ‘अतिथि देवो भव’ को साकार करने वाला। ओबामा इससे गदगद हुए। शाम में ओबामा दंपति 450 साल पुराने मुगलकालीन बेमिसाल इमारत को देखने ‘हुमायूं का मकबरा’ पहुंचे जहां मुख्य द्वार पर पहुंचते ही उनके मुंह से निकला पहला शब्द था ‘चमत्कार’। हुमायूं का मकबरा भारतीय उपमहाद्वीप का एकमात्र ऐसा मकबरा है जिसके चारों ओर बाग लगे हैं। इसका निर्माण 17वीं सदी में हुमायूं की विधवा हमीदा बानो ने 1562 में बनवाया था। दिल्ली स्थित इस पूरे मकबरे को ताजमहल की प्रेरणा माना जाता है। मकबरा धर्म की बजाय भारत की मिली-जुली संस्कृति का प्रतीक है इसीलिए शायद ओबामा ने यहां आना पसंद किया हो।
ओबामा के भारत दौरे का तीसरा व अंतिम दिन सोमवार काफी व्यस्त रहा और अभी तक जिस तरह के निष्कर्ष सामने आए थे उससे अलग होकर भारत के लोग सुनना चाहते थे ओबामा के मुख से। ओबामा भारतीयों की उम्मीद पर खड़े उतरे। ओबामा अपने जीवन के आदर्श महात्मा गांधी की समाधि पर श्रद्धांजलि देने राजघाट पहुंचे। यहां से ऊर्जा लेकर वह हैदराबाद हाउस पहुंचे जहां द्विपक्षीय बातचीत के लिए भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह उनका इंतजार कर रहे थे। 75 मिनट तक दोनों नेताओं ने आपसी बातचीत की और इसका ब्योरा देने दोनों नेता मीडिया के समक्ष उपस्थित हुए। मैं दावे के साथ इस बात को कह सकता हूं कि जिसने भी इस पल को न्यूज चैनलों पर लाइव देखा होगा, पहले कभी नहीं देखा होगा। इससे पहले पांच अमेरिकी राष्ट्रपति भारत के दौरे पर आ चुके हैं, लेकिन छठे अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा इन सबसे भिन्न दिख रहे थे। ओबामा में वो पूंजीवादी ठसक नहीं थी जो इससे पहले के अमेरिकी राष्ट्रपतियों में दिखती रही थी। इसके ठीक विपरीत जो ठसक भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह में दिखी, इससे पहले किसी भारतीय प्रधानमंत्री में नहीं देखी गई।
कश्मीर मसले के हल के लिए बीच-बचाव की पेशकश और पाकिस्तान से सीधी बातचीत की ओबामा की सलाह को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने नजरअंदाज कर दिया। प्रधानमंत्री ने ओबामा से साफ कहा कि आतंकवाद और बातचीत साथ-साथ नहीं चल सकते। साझा संवाददाता सम्मेलन में एक अमेरिकी पत्रकार द्वारा पूछे गए सवाल के जवाब में ओबामा ने कहा कि अगर दोनों पक्ष चाहें तो वह भारत-पाक के बीच विवाद दूर करने में मदद कर सकते हैं पर साथ ही उन्होंने यह भी साफ किया कि दोनों देशों को अपने विवाद आपसी बातचीत से ही दूर करने होंगे। अमेरिका कोई हल थोप नहीं सकता। ओबामा ने कहा कि यह भारत और पाक के हित में है कि आपसी तनाव कम करें, लेकिन प्रधानमंत्री ने कहा कि हम कश्मीर शब्द बोलने से नहीं डरते, पर अगर पाकिस्तान से आतंकवाद चलता रहे और हम बातचीत करते रहें तो ऐसा नहीं हो सकता। जब तक टेरर मशीनरी सक्रिय हैं, बातचीत सार्थक नहीं होगी।
आउटसोर्सिंग मसले पर राष्ट्रपति ओबामा ने स्वीकार किया कि भारत ने अमेरिका के साथ 10 अरब डॉलर के जो समझौते किए हैं उनसे अमेरिका में 50 हजार रोजगार पैदा होंगे। भारत से मिले इन सौदों का वह अमेरिका में प्रचार करेंगे और उनके इन कथनों का जवाब देंगे कि आप भारत में इतना समय क्यों बर्बाद कर रहे हैं, जबकि भारतीय हमारी नौकरी छीन रहे हैं। वास्तव में वह अमेरिका को बताना चाहेंगे कि भारत ने अमेरिकियों के लिए 50 हजार नौकरियां बनाई हैं, इसलिए अमेरिका को संरक्षणवादी नीतियां नहीं अपनानी चाहिए। इस वक्तव्य में ओबामा की अपनी विवशताएँ साफ झलक रही थी। हालांकि ओबामा ने भारतीयों पर कटाक्ष भी किया जिसके जवाब में भारतीय प्रधानमंत्री ने ओबामा से दो टूक कहा- भारत अमेरिका की नौकरियां नहीं चुरा रहा है, बल्कि आउटसोर्सिंग से प्रतिस्पर्धा क्षमता बढ़ी है। पाकिस्तान और आउटसोर्सिंग दोनों ही मुद्दों पर ओबामा को जोर का झटका जोरों से लगा है और सिंह बन गए किंग।
कारवां आगे बढ़ा। भारतीय प्रतिनिधिमंडल और अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल से दोनों नेता रू-ब-रू हुए। ओबामा ने सोनियां गांधी, सुषमा स्वराज से अलग-अलग मुलाकात की। फिर ओबामा पहुंचे भारतीय संसद के संयुक्त अधिवेशन को संबोधित करने संसद के सेंटल हॉल में जहां लोकसभा स्पीकर मीरा कुमार ने उनका स्वागत किया। यहां 40 मिनट के अपने संबोधन में अमेरिकी राष्ट्रपति ने रिष्तों को नई ऊंचाई देने की राह खोली। यात्रा को कामयाब बनाने के लिए भारतवासियों को शुक्रिया अदा करने के लिए ओबामा ने ‘बहुत धन्यवाद’ कहा, वहीं संबोधन के आखिर में ‘जयहिंद’ कहकर सभी का दिल जीत लिया। यही नहीं, उन्होंने अपने भाषण में पंचतंत्र, चांदनी चौक और बंगलुरु का भी जिक्र करके भारत से निकटता का सन्देश दिया। इन भावनात्मक संदेशों के अलावा अमेरिकी राष्ट्रपति ने पाक को आतंकी नेटवर्क खत्म करने और मुंबई के हमलावरों को सजा दिलाने की चेतावनी के साथ संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता के लिए भारत को समर्थन देने का ऐतिहासिक ऐलान किया। उन्होने पाकिस्तान को लेकर भारत की नीति का भी समर्थन किया। इसके साथ ही भारत पर दोहरे इस्तेमाल वाली उच्च तकनीक के निर्यात पर से रोक हटाने का फैसला कर अमेरिका ने भारत के अंतरिक्ष और रक्षा प्रतिष्ठानों को राहत दे दी। संसदीय संबोधन और उसके बाद साझा घोषणा पत्र से यह बात साफ हो गई कि ओबामा भारत के साथ रिश्तों को 21वीं सदी में आपसी साझेदारी की नई मिसाल के तौर पर कायम करना चाहते हैं जो पूरी दुनिया में शान्ति और सुरक्षा के लिए मिलकर काम करेगी।
नोट : हालांकि यह आलेख ओबामा के भारत दौरे के दौरान ही लिखा गया था लेकिन कुछ तकनीकी कारणों से इसे ब्लॉग पर नहीं डाला जा सका।

Saturday, 14 August 2010

कॉमनवेल्थ - शीला से दूर होता कॉमन मैन

लगातार तीन बार दिल्ली की कुर्सी पर काबिज होने वाली शीला दीक्षित ने शायद सोचा भी न होगा कि जिस विकास के मुद्दे ने उन्हें जीत की हैट्रिक दिलवाई वही मुद्दा उनके गले की फांस बन जाएगा। देष की राजधानी में कॉमनवेल्थ गेम्स का आयोजन दिल्ली को वर्ल्ड क्लास सिटी की श्रेणी में शमिल करने के लिए एक बेहतर मौका था और इसके लिए शीला सरकार ने युद्धस्तर पर काम भी षुरू करवाया। लेकिन इसकी कीमत दिल्ली की जनता को जिस रूप में चुकानी पड़ रही है इसका अंदाजा षायद शीला को भी नहीं रहा होगा। विकास के नाम पर कभी बेघरों के रैन बसेरों को उजाड़ा गया, तो कभी बाहरी मेहमानों के लिए दिल्ली विवि के छात्रावास खाली कराए गए। गेम्स के नाम पर पैसा पानी की तरह बहाया जा रहा है। लेकिन शीला यह सब जानते हुए अनजान बनी हुई हैं। अपने किये पर पर्दा डालने के लिए शीला ने जब बयानबाजी षुरू की तो विवादों का दौर चल पड़ा। जब भी मीडिया ने उन्हेें अपनी बात रखने का मौका दिया उन्होंने कुछ न कुछ ऐसा कहा जिसने उन्हें ही कटघरे में खड़ा कर दिया। कभी वो मीडिया की पीठ सहलाते हुए कहती हैं हमें आपकी ज़रूरत है तो अगले ही पल कह देती हैं कि मीडिया के कहे पर ध्यान न दें।

बारिष ने खोली पोल
बदइंतज़ामी की कलई लगातार तीन घंटे तक हुई बारिष ने खोल कर रख दी। बुधवार सवेरे करीब साढ़े आठ बजे दिल्ली की मुख्यमंत्री अपने लाव लष्कर के साथ कॉमनवेल्थ गेम्स की तैयारियों का जायज़ा लेने अलग अलग जगहों पर पहुंची, साथ में दिल्ली के मेयर पृथ्वीराज साहनी भी थे। षुरूआत तीन मूर्ति मार्ग से की, उसके बाद दोनों ने पुरानी दिल्ली स्टेषन, कनॉट प्लेस, करोलबाग, ओल्ड राजेन्द्र नगर के इलाकों का दौरा किया, लेकिन मिनी बस से उतरे बगैर! गाड़ी में बैठे बैठे। मीडिया से मुखातिब हुईं तो फरमाया कि काम ठीक ठाक चल रहा है और समय पर पूरा भी हो जाएगा। लेकिन कलई तो उनके जाने के बाद दिल्ली पर फिदा हुई बारिष ने खोल कर रख दी। दोपहर ढलते ढलते बदरा एैसे बरसे कि दिल वालों की दिल्ली बेजार हो गई। नई दिल्ली को पूर्वी दिल्ली से जोड़ने वाला आईटीओ पुल हो, दिल्ली 6 हो या फिर दिल्ली को एनसीआर से जोड़ती सड़कें हों सभी राजधानी की बेहाली की दास्तां सुना रहे थे। पानी सड़कों पर था और सड़कें वेनिस की कहानी कह रहे थे। यहां पर बोटें तो नहीं थीं अलबत्ता दोपहिया, तीन पहिया या चार पहिया वाहन पानी में जरूर डूबते उतराते नज़र आये। साफ दिख रहा है कि सीडब्ल्यूजी के आयोजन के नाम पर जनता खुद को ठगा ठगा सा महसूस कर रही है। दो साल से इन गेम्स के नाम पर दिल्ली वालों से खूब टैक्स वसूला गया। उम्मीद थी कि विकास, विकास और चहुंमुखी विकास के मुद्दे पर वोट बटोरने वाली शीला सरकार दिल्ली वालों के लिए मसीहा बनकर सामने आएगी और चाहे वह अमीर हो या फिर गरीब हो सबके लिए रोटी, कपड़ा और मकान के साथ बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराएंगी लेकिन हुआ इसका उल्टा। गरीब करीब करीब मिट से गए और अमीर अपनी अमीरी से तंग हैं। उन्हें महंगाई और सरकारी टैक्स ने षीला को कोसने के लिए मजबूर कर दिया है। यहां हम कॉमनवेल्थ गेम्स से जुड़ कुछ महत्वपूर्ण तथ्य पेष कर रहे हैं जो बदहाली को साफ साफ बयां करती हैं

रिपोर्ट में दिल्ली की हकीकत
हाउसिंग एंड लैंड राइट्स नेटवर्क संस्था ने एक रिपोर्ट तैयार की जिसके मुताबिक गरीबी से लड़ने के लिए रखी गई एक बड़ी राषि का प्रयोग कॉमनवेल्थ गेम्स के लिए किया गया है। यह रिपोर्ट सूचना के अधिकार अधिनियम के तहत मिली जानकारी पर आधारित है। इसके मुताबिक गेम्स के आयोजन में तय राषि में दो हजार प्रतिषत से भी अधिक बढ़ोत्तरी की गई है। रिपोर्ट के मुताबिक एक लाख से अधिक लोगों को बेघर होना पड़ा। रिपोर्ट ये भी कहती है कि अक्तूबर में गेम्स षुरू होने से पहले करीब 40 हजार परिवार विस्थापित हो जाएंगे। यूएनओ के मानव अधिकार विंग के एक पूर्व अधिकारी का कहना है कि वर्ल्ड क्लास सिटी दिखाने की होड़ में दिल्ली सरकार लोगों के प्रति अपनी कानूनी और नैतिक जिम्मेदारी भूल गई है। इसके अलावा उत्तर प्रदेष की मुख्यमंत्री और दलित नेता मायावती ने आरोप लगाया कि दिल्ली सरकार ने एससी/एसटी कल्याण कोस की 750 करोड़ की राषि को गेम्स के मद में खर्च किया है।

टैक्स का बोझ
सीएनजी की दरें एक साल में 6 बार बढ़ी। बिजली, पानी, गैस, ट्ांसपोर्ट, दूध में दो साल में बेतहाषा वृद्धि हुई। पिछले दो साल के आंकड़ों पर नज़र डालें तो दिल्ली वासियों की तकलीफ का अंदाज़ा लगाया जा सकता है। बिजली सब्सिडी को शीला सरकार ने कम किया जिससे जनता पर 50 पैसे प्रति यूनिट का बोझ बढ़ा। पानी और सीवर टैक्स में 50 से 100 फीसदी तक की बढ़ोत्तरी हुई है। दूध के दाम तो छह से आठ रुपये तक बढ़ गये।

मणिषंकर का वार
राज्यसभा सांसद और कांग्रेस के सीनियर लीडर मणिषंकर अय्यर ने यह कहकर शीला की परेषानी और बढ़ा दी कि बारिष की वजह से कॉमनवेल्थ गेम्स की तैयारियों का बेड़ा गर्क हो जाए तो उन्हें बहुत खुषी होगी। मणिषंकर ने मीडिया से खुलेआम कहा कि मेजबानी के लिए भारत तैयार नहीं है। क्योंकि 30 हजार करोड़ रुपये से अधिक राषि जो आयोजन पर खर्च किये जा रहे हैं इसके बदले हम अपने खिलाड़ियों के लिए बेहतर सुविधाएं मुहैया कराते तो पांच साल में भारत चीन की पंक्ति में खड़ा होता। उन्होंने खेल पंडाल में कंडोम बांटने के लिए 150 मषीनें लगाने पर भी ऐतराज जताया।

शीला को डेंगू ने भी दी चुनौती
यह अजीब संयोग है कि कॉमनवेल्थ गेम्स की तारीखें और डेंगू के दस्तक देने का समय आपस में टकरा रही हैं। गेम्स की तारीखें तय करते समय इसपर किसी ने ध्यान नहीं दिया कि डेंगू के मच्छर अक्तूबर के महीने में ही अपना रंग दिखाते हैं। डेंगू का पिछला इतिहास कुछ यही बयां कर रहा है। गेम्स में आने वाले विदेषी मेहमानों को इस डेंगू से भी निपटना होगा जो अतिथि देवो भव की भारतीय परंपरा के लिए झटका होगा। गेम्स की तैयारियों के चलते जगह जगह गड्ढे खुदे हैं जिनमें जलभराव हो गया है। आम लोग भले ही इससे परेषान हों लेकिन इन तैयारियों में हो रही कोताही ने मच्छरों को पनपने का पूरा मौका मुहैया करा दिया है। एमसीडी ने दिल्ली के विभिन्न खेल परिसरों का दौरा किया और छह में डेंगू के मच्छरों की मौजूदगी की बात कही। इनमें विदेषी मेहमानों के लिए तैयार खेलगांव, यमुना स्पोर्ट्स कॉम्पलेक्स, हंसराज कॉलेज परिसर भी षामिल है।