Saturday, 14 August 2010

कॉमनवेल्थ - शीला से दूर होता कॉमन मैन

लगातार तीन बार दिल्ली की कुर्सी पर काबिज होने वाली शीला दीक्षित ने शायद सोचा भी न होगा कि जिस विकास के मुद्दे ने उन्हें जीत की हैट्रिक दिलवाई वही मुद्दा उनके गले की फांस बन जाएगा। देष की राजधानी में कॉमनवेल्थ गेम्स का आयोजन दिल्ली को वर्ल्ड क्लास सिटी की श्रेणी में शमिल करने के लिए एक बेहतर मौका था और इसके लिए शीला सरकार ने युद्धस्तर पर काम भी षुरू करवाया। लेकिन इसकी कीमत दिल्ली की जनता को जिस रूप में चुकानी पड़ रही है इसका अंदाजा षायद शीला को भी नहीं रहा होगा। विकास के नाम पर कभी बेघरों के रैन बसेरों को उजाड़ा गया, तो कभी बाहरी मेहमानों के लिए दिल्ली विवि के छात्रावास खाली कराए गए। गेम्स के नाम पर पैसा पानी की तरह बहाया जा रहा है। लेकिन शीला यह सब जानते हुए अनजान बनी हुई हैं। अपने किये पर पर्दा डालने के लिए शीला ने जब बयानबाजी षुरू की तो विवादों का दौर चल पड़ा। जब भी मीडिया ने उन्हेें अपनी बात रखने का मौका दिया उन्होंने कुछ न कुछ ऐसा कहा जिसने उन्हें ही कटघरे में खड़ा कर दिया। कभी वो मीडिया की पीठ सहलाते हुए कहती हैं हमें आपकी ज़रूरत है तो अगले ही पल कह देती हैं कि मीडिया के कहे पर ध्यान न दें।

बारिष ने खोली पोल
बदइंतज़ामी की कलई लगातार तीन घंटे तक हुई बारिष ने खोल कर रख दी। बुधवार सवेरे करीब साढ़े आठ बजे दिल्ली की मुख्यमंत्री अपने लाव लष्कर के साथ कॉमनवेल्थ गेम्स की तैयारियों का जायज़ा लेने अलग अलग जगहों पर पहुंची, साथ में दिल्ली के मेयर पृथ्वीराज साहनी भी थे। षुरूआत तीन मूर्ति मार्ग से की, उसके बाद दोनों ने पुरानी दिल्ली स्टेषन, कनॉट प्लेस, करोलबाग, ओल्ड राजेन्द्र नगर के इलाकों का दौरा किया, लेकिन मिनी बस से उतरे बगैर! गाड़ी में बैठे बैठे। मीडिया से मुखातिब हुईं तो फरमाया कि काम ठीक ठाक चल रहा है और समय पर पूरा भी हो जाएगा। लेकिन कलई तो उनके जाने के बाद दिल्ली पर फिदा हुई बारिष ने खोल कर रख दी। दोपहर ढलते ढलते बदरा एैसे बरसे कि दिल वालों की दिल्ली बेजार हो गई। नई दिल्ली को पूर्वी दिल्ली से जोड़ने वाला आईटीओ पुल हो, दिल्ली 6 हो या फिर दिल्ली को एनसीआर से जोड़ती सड़कें हों सभी राजधानी की बेहाली की दास्तां सुना रहे थे। पानी सड़कों पर था और सड़कें वेनिस की कहानी कह रहे थे। यहां पर बोटें तो नहीं थीं अलबत्ता दोपहिया, तीन पहिया या चार पहिया वाहन पानी में जरूर डूबते उतराते नज़र आये। साफ दिख रहा है कि सीडब्ल्यूजी के आयोजन के नाम पर जनता खुद को ठगा ठगा सा महसूस कर रही है। दो साल से इन गेम्स के नाम पर दिल्ली वालों से खूब टैक्स वसूला गया। उम्मीद थी कि विकास, विकास और चहुंमुखी विकास के मुद्दे पर वोट बटोरने वाली शीला सरकार दिल्ली वालों के लिए मसीहा बनकर सामने आएगी और चाहे वह अमीर हो या फिर गरीब हो सबके लिए रोटी, कपड़ा और मकान के साथ बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराएंगी लेकिन हुआ इसका उल्टा। गरीब करीब करीब मिट से गए और अमीर अपनी अमीरी से तंग हैं। उन्हें महंगाई और सरकारी टैक्स ने षीला को कोसने के लिए मजबूर कर दिया है। यहां हम कॉमनवेल्थ गेम्स से जुड़ कुछ महत्वपूर्ण तथ्य पेष कर रहे हैं जो बदहाली को साफ साफ बयां करती हैं

रिपोर्ट में दिल्ली की हकीकत
हाउसिंग एंड लैंड राइट्स नेटवर्क संस्था ने एक रिपोर्ट तैयार की जिसके मुताबिक गरीबी से लड़ने के लिए रखी गई एक बड़ी राषि का प्रयोग कॉमनवेल्थ गेम्स के लिए किया गया है। यह रिपोर्ट सूचना के अधिकार अधिनियम के तहत मिली जानकारी पर आधारित है। इसके मुताबिक गेम्स के आयोजन में तय राषि में दो हजार प्रतिषत से भी अधिक बढ़ोत्तरी की गई है। रिपोर्ट के मुताबिक एक लाख से अधिक लोगों को बेघर होना पड़ा। रिपोर्ट ये भी कहती है कि अक्तूबर में गेम्स षुरू होने से पहले करीब 40 हजार परिवार विस्थापित हो जाएंगे। यूएनओ के मानव अधिकार विंग के एक पूर्व अधिकारी का कहना है कि वर्ल्ड क्लास सिटी दिखाने की होड़ में दिल्ली सरकार लोगों के प्रति अपनी कानूनी और नैतिक जिम्मेदारी भूल गई है। इसके अलावा उत्तर प्रदेष की मुख्यमंत्री और दलित नेता मायावती ने आरोप लगाया कि दिल्ली सरकार ने एससी/एसटी कल्याण कोस की 750 करोड़ की राषि को गेम्स के मद में खर्च किया है।

टैक्स का बोझ
सीएनजी की दरें एक साल में 6 बार बढ़ी। बिजली, पानी, गैस, ट्ांसपोर्ट, दूध में दो साल में बेतहाषा वृद्धि हुई। पिछले दो साल के आंकड़ों पर नज़र डालें तो दिल्ली वासियों की तकलीफ का अंदाज़ा लगाया जा सकता है। बिजली सब्सिडी को शीला सरकार ने कम किया जिससे जनता पर 50 पैसे प्रति यूनिट का बोझ बढ़ा। पानी और सीवर टैक्स में 50 से 100 फीसदी तक की बढ़ोत्तरी हुई है। दूध के दाम तो छह से आठ रुपये तक बढ़ गये।

मणिषंकर का वार
राज्यसभा सांसद और कांग्रेस के सीनियर लीडर मणिषंकर अय्यर ने यह कहकर शीला की परेषानी और बढ़ा दी कि बारिष की वजह से कॉमनवेल्थ गेम्स की तैयारियों का बेड़ा गर्क हो जाए तो उन्हें बहुत खुषी होगी। मणिषंकर ने मीडिया से खुलेआम कहा कि मेजबानी के लिए भारत तैयार नहीं है। क्योंकि 30 हजार करोड़ रुपये से अधिक राषि जो आयोजन पर खर्च किये जा रहे हैं इसके बदले हम अपने खिलाड़ियों के लिए बेहतर सुविधाएं मुहैया कराते तो पांच साल में भारत चीन की पंक्ति में खड़ा होता। उन्होंने खेल पंडाल में कंडोम बांटने के लिए 150 मषीनें लगाने पर भी ऐतराज जताया।

शीला को डेंगू ने भी दी चुनौती
यह अजीब संयोग है कि कॉमनवेल्थ गेम्स की तारीखें और डेंगू के दस्तक देने का समय आपस में टकरा रही हैं। गेम्स की तारीखें तय करते समय इसपर किसी ने ध्यान नहीं दिया कि डेंगू के मच्छर अक्तूबर के महीने में ही अपना रंग दिखाते हैं। डेंगू का पिछला इतिहास कुछ यही बयां कर रहा है। गेम्स में आने वाले विदेषी मेहमानों को इस डेंगू से भी निपटना होगा जो अतिथि देवो भव की भारतीय परंपरा के लिए झटका होगा। गेम्स की तैयारियों के चलते जगह जगह गड्ढे खुदे हैं जिनमें जलभराव हो गया है। आम लोग भले ही इससे परेषान हों लेकिन इन तैयारियों में हो रही कोताही ने मच्छरों को पनपने का पूरा मौका मुहैया करा दिया है। एमसीडी ने दिल्ली के विभिन्न खेल परिसरों का दौरा किया और छह में डेंगू के मच्छरों की मौजूदगी की बात कही। इनमें विदेषी मेहमानों के लिए तैयार खेलगांव, यमुना स्पोर्ट्स कॉम्पलेक्स, हंसराज कॉलेज परिसर भी षामिल है।

1 comment:

अजित गुप्ता का कोना said...

अच्‍छी जानकारी। वैसे रोज ही मीडिया भी दिल्‍ली को दिखा ही रहा है। अब तो हालात यह है कि कुछ कहने को भी मन नहीं करता। नेता और नौकरशाह इस देश को मिलकर लूट रहे हैं।