आजकल चहुंओर शोर है, काले धन का जोर है। यहां तक कि जी-20 देषों के सम्मेलन तक में विदेशी बैंकों में जमा काले धन को लेकर जबरदस्त चिंता जताई जा चुकी है और यूरोपीय संघ ने इस पर कड़े कदम उठाने की पुरजोर वकालत की है। इसके बाद अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की पहल पर जो प्रस्ताव पारित हुआ उसपर भारत ने भी हस्ताक्षर किए हैं। इसलिए अब भारत सरकार की राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धता है कि वह विदेशों में जमा काला धन न सिर्फ देश में वापस लाएं बल्कि उसे देश के बाहर ले जाने वालों के खिलाफ कार्रवाई भी करें।
कई दशकों से गुप्त खातों के लिए पूरी दुनिया में मशहूर स्विस बैंकों की एसोसिएशन के आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक स्विट्जरलैंड के बैंकों में भारतीयों का जमा कुल धन करीब 63 खरब रुपये है। यह रकम भारत के सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी से थोड़ी ही कम है। माना जा रहा है कि यह वह रकम है जिसका हिसाब किताब भारत सरकार के आयकर विभाग के पास भी नहीं है। कर चोरी और दूसरे गैरकानूनी तरीकों से कमाई गई यह रकम इन विदेशी बैंकों में जिन लोगों ने जमा की है उनमें नेता, उद्योगपति, अफसर, दलाल, माफिया सभी शामिल हैं। इस परिप्रेक्ष्य में आजकल भारत की सोशल मीडिया साइट्स में काले धन के लिए नई एकाउंटिंग टर्मिनोलॉजी का प्रयोग किया जाने लगा है जो इस प्रकार है-
1 करोड़ = 1 खोखा
500 करोड़ = 1 कोड़ा
1,000 करोड़ = 1 राडिया
10,000 करोड़ = 1 कलमाड़ी
1,00,000 करोड़ = 1 राजा
10 कलमाडी + 1 राजा = 1 पंवार
देश की जनता उक्त तमाम कोड़ा, राडिया, कलमाड़ी, राजा और पंवार से अच्छी तरह परिचित है। यह कहने की जरूरत नहीं कि देश की अर्थव्यवस्था को तहस-नहस करने में इन्होंने क्या-क्या गुल खिलाए हैं। यूं तो विदेशी बैंकों में विशेषकर स्विस बैंकों में भारतीयों के काले धन और गुप्त खातों की कहानियां लंबे समय से पढ़ी और सुनी जाती रही हैं, लेकिन इसका सबसे बड़ा खुलासा तब हुआ था जब यूपीए सरकार की पहली पारी के दौरान महाराष्ट्र के पुणे शहर में आयकर विभाग ने रेसकोर्स के एक बाजीगर हसन अली के घर छापा मारा था। इस छापे में आयकर अफसरों को एक लैपटॉप मिला जिसमें करीब 25 हजार करोड़ रुपये से भी ज्यादा रकम के विदेशी खातों का ब्यौरा था। उन्हीं दिनों स्विट्जरलैंड के एक सबसे बड़े बैंक ने भारत में अपनी शाखा खोलने के लिए आरबीआई में आवेदन किया था। छापे में हजारों करोड़ रुपये के स्विस खातों का ब्यौरा मिलने के बाद सरकार ने उक्त स्विस बैंक पर दबाव बनाकर उन गुप्त खातों की सारी जानकारी हासिल कर ली, लेकिन उनमें जो नाम थे उन्हें देखने के बाद सरकार को भी चुप्पी साधनी पड़ी। झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा के तमाम विदेशी कारोबार का ब्यौरा प्रवर्तन निदेशालय ने जुटाया। इसके अलावा कई बड़े राजनेताओं के गुप्त विदेशी खातों की जानकारी भी सरकार को मिली। इनमें महाराष्ट्र के कुछ कद्दावर नेता भी शामिल हैं। आर्थिक खुफिया शाखा से जुड़े अफसरों का कहना है कि विदेशी बैंकों में खाताधारियों की पैठ देश के हर राजनीतिक दलों में है और नौकरशाही पर भी इनकी पकड़ बेहद मजबूत है इसलिए जानकारियों के बावजूद जांच एजेंसियां काले धन के कारोबार की बड़ी मछलियां पकड़ने की हिम्मत नहीं जुटा पाती। वित्त मंत्रालय के सूत्रों के मुताबिक, हसन अली के लैपटॉप से 25 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा के जिन विदेशी खातों की जानकारी मिली है, सरकार के पास उन सबका विस्तृत ब्यौरा है, लेकिन उसमें सरकार में शामिल कुछ दिग्गजों के करीबी भी हैं, इसलिए सरकार कार्रवाई करने में हिचक रही है।
वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी और उनके पूर्वमंत्री पी. चिदंबरम दोनों ही इस मामले में कई बार कार्रवाई की कोशिश कर चुके हैं, लेकिन गठबंधन धर्म ने उनक हाथ बांध रखे हैं। लेकिन अब जब दुनिया भर की सरकारों ने स्विस बैंकों में जमा अपने देश का काला धन लाने की मुहिम की शुरुआत की है तो भारत सरकार पर भी ऐसा करने का दबाव लगाता बढ़ने लगा है। देष की सर्वोच्च अदालत ने सरकार को इस दिशा में कदम बढ़ाने को मजबूर कर दिया है। हालांकि काले धन की भारत वापसी का मामला वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी के एजेंडे में भी शामिल है।
ओबामा ने जब फंसाया पेंच
दरअसल अमेरिका के ओबामा प्रशासन ने लंबे समय से दुनिया भर के काले धन का गोपनीयता की आड़ में छिपाए रखने वाले यूनियन बैंक ऑफ स्विट्जरलैंड को संकट में डाल दिया है। ओबामा प्रषासन ने इस बैंक के खिलाफ आर्थिक धोखाधड़ी, घोटालों, विदेशी मुद्रा की हेराफेरी जैसे आरोप लगाते हुए बैंक के अमेरिका स्थित कई अफसरों के खिलाफ कार्रवाई शुरू कर दी है। ओबामा प्रशासन ने यह दबाव इसलिए बनाया ताकि स्विस बैंक उन तमाम गोपनीय खातों का ब्यौरा अमेरिकी सरकार को दे जिनमें अमेरिका का अरबों डॉलर का काला धन है। ओबामा प्रशासन का यह दबाव आखिरकार रंग लाया और स्विस बैंक इस शर्त पर कि उसके खातेधारकों के खिलाफ कोई आपराधिक मुकदमा नहीं चलाया जाएगा, अब वह सारी जानकारी अमेरिका को दे रहा है जिसकी उसे जरूरत है। अब अमेरिकी सीनेट एक ऐसा कानून बनाने जा रही है जिसके जरिए कर चोरी करके विदेशी बैंकों और टैक्स हैवन देशों में काली कमाई लगाने वालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जा सके और देश का धन वापस लाया जा सके। ओबामा की इस मुहिम का जी-20 देषों के सम्मेलन में स्वागत करते हुए स्विस बैंकों में जमा धन की जानकारी लेने का प्रस्ताव पारित हुआ। जी-20 के प्रस्ताव का असर यह हुआ है कि दुनिया के 28 ऐसे देश जिन्हें टैक्स हैवन माना जाता है जहां गोपनीय बैंकिंग के जरिये काला धन जमा होता है, उनपर भी यह दबाव बना है कि वे अपने बैंकों की गोपनीय बैंकिंग पर अंकुश लगाए और संबंधित देशों द्वारा मांगी जाने वाली जानकारी साझा करें। ओबामा प्रशासन की पहल के बाद यूरोपीय यूनियन के देशों चीन, जापान, आस्टेलिया आदि ने भी स्विस बैंकों और दूसरे टैक्स हैवन देशों की बैंकों से अपने-अपने देषों के खाताधारकों के खातों का ब्यौरा लेना शुरू कर दिया है। निश्चित रूप से इसका दबाव भारत सरकार भी पड़ेगा, लेकिन देखना यह होगा कि यहां की सरकार इस दिशा में कितनी कार्रवाई अमल में लाती है।
काले धन का स्रोत
पहला, भारत में काले धन को अब एक नया आयाम मिल चुका है। अब यह नशीली दवाओं के जरिये भी बढ़ रही है। सीमाकर एवं उत्पाद षुल्क से संबंधित केंद्रीय बोर्ड इस तथ्य को प्रवर्तन निदेशालय के सम्मुख भी लाया है। इस ड्रग मनी की मात्रा का कोई अनुमान उपलब्ध नहीं है, किंतु नशीली दवाओं के खरीद-बिक्री में लगाता वृद्धि हो रही है। यदि यह मान भी लें कि सकल घरेलू उत्पाद के अनुपात में काले धन के अनुपात में कोई खास वृद्धि नहीं हुई है, तब भी इतना तो जरूर है कि इसकी कुल राशि में बहुत वृद्धि हुई है। यह उम्मीद करना सही नहीं है कि आर्थिक सुधार के फलस्वरूप काले धन में कमी आएगी। आर्थिक सुधार अभी तक वास्तविक संपदा, किराया नियंत्रण, खेती भूमि हदबंदी, शिक्षा आदि से दूर ही है। इन क्षेत्रों में कुल लेन-देन का बहुत बड़ा भाग नकदी भुगतान से ही होता है।
दूसरा, लोकतंत्र और राजनीतिक भ्रष्टाचार में काफी मधुर संबंध हैं। प्रतियोगी और विश्वीकृत व्यापारिक परिवेश में व्यापारीगण भी यह सोचते हैं कि प्रेम और युद्ध की भांति व्यापार में भी सबकुछ जायज है। यही कारण है कि आज ऐसे लोगों की भरमार है जिनका प्रमुख कार्य लॉबिंग का धंधा है। 2 जी स्पेक्ट्रम घोटाले में नीरा राडिया प्रकरण इसका जीता-जागता प्रमाण है। इसी कारण पीआरओ संपर्क साधने वाले लोगों, दलालों और पैरोकारों की संख्या में काफी वृद्धि हुई है, खासतौर पर लोकतांत्रिक देशों और राज्यों की राजधानियों में। ये लोग राजनीतिज्ञों और नौकरशाहों को प्रभावित करते हैं ताकि विभिन्न कानूनों में परिवर्तन हो जाए जो उनके अनुकूल हों। यह भी सत्य है कि राजनीतिक भ्रष्टाचार को पूरी तरह से समाप्त नहीं किया जा सकता, लेकिन मतदाता अपने नेताओं के प्रति चौकस रहे और मीडिया बिना किसी भय के अपने दायित्वों का निर्वाह करे तो राजनीतिक भ्रष्टाचार को नियंत्रित जरूर किया जा सकता है।
...तो उपाय क्या है
काले धन के आतंक को रोकने के कोई भी उपाय तब तक सफल नहीं हो सकते जब तक कि नीति निर्धारक इस समस्या से निपटने के प्रति दृढ़ प्रतिज्ञ न हों। अर्थात इसमें सरकार की राजनीतिक इच्छा महत्वपूर्ण हैं। इस दृष्टि से काले धन के सृजन को रोकने के लिए पहली जरूरत यह है कि सरकारी प्रशासन स्वच्छ हो तथा राजनीतिज्ञ और नौकरशाह ईमानदार हों, ओबामा प्रशासन की तरह। यदि ये बातें उपलब्ध हों तभी कोई भी उपाय काले धन के सृजन को रोकने में प्रभावी होंगे अन्यथा कोई सूरत नहीं जो काले धन के विस्तार को रोकने पाए।
कुछ रोचक तथ्य
-आर्थिक अपराधों की छानबीन करने वाली खुफिया एजेंसियों से जुड़े सूत्रों के मुताबिक दिल्ली के एक फार्म हाउस में अक्सर कुछ लोग इसलिए जमा होते हैं कि वहां बैठकर वह तसल्ली से करोड़ों रुपये के काले धन का हिसाब-किताब कर सकें। दक्षिणी दिल्ली के इलाके में स्थित इस फार्म हाउस में नोटों की नहीं बल्कि हजार और पांच सौ के नोटों की गड्डियों को गिना जाता है। गड्डियों को गिनकर ही सैकड़ों करोड़ रुपये का हिसाब लगा लिया जाता है। यह वह रकम है जो ठेकों, तबादलों, शराब, बिल्डर माफिया, खदान माफिया और सरकारी योजनाओं के पैसे की लूट करके कमाई जा रही है। इसका कागज पर कोई हिसाब-किताब नहीं है। दिल्ली के अलावा देश के दूसरे बड़े शहरों में भी कई ऐसे ठिकाने हैं जहां अरबों रुपयों की काली कमाई जमा करके उसे इधर-उधर किया जाता है। यह जानकारी खुफिया एजेंसियों और आयकर विभाग के लोगों को भी है, लेकिन इन ठिकानों पर छापा मारने के लिए उनके पास राजनीतिक हरी झंडी नहीं होती है क्योंकि काले धन के इस समंदर में तमाम बड़े व कद्दावर नेता, अफसर और उद्योग जगत के लोग गोते लगा रहे होते हैं।
-भारत ने मोरीशस समेत करीब 79 देशों के साथ जो दोहरी कर मुक्ति संधि की है, उसका फायदा काले धन को सफेद करने में जमकर उठाया जा रहा है। खासकर मोरीशस के जरिये भारत के शेयर बाजार में होने वाले निवेश को ज्यादातर हिस्सा वही है जो भारत में नंबर दो की कमाई करके बाहर भेजा जाता है। भारतीय शेयर बाजार में जब तक निवेश का मोरीशस मार्ग खुला रहेगा, कालेधन और भ्रष्टाचार पर काबू पाना मुश्किल है। यह एनडीए सरकार की भारतीय अर्थव्यवस्था को दी गई सौगात है जिसे यूपीए की मनमोहन सरकार जारी रखे हुए है। यह कहना है पूर्व आयकर अधिकारी विश्वबन्धु गुप्ता का। गुप्ता के मुताबिक निवेश के मोरीशस मार्ग के जरिये सैकड़ों ऐसी कंपनियां हैं जिनका कोई वजूद नहीं है। वह सिर्फ मोरीशस में एक पोस्ट बॉक्स लेकर अपना कारोबार कर रही है और करोड़ो-अरबों रुपये के काले धन को शेयर बाजार के जरिये सफेद कर मोटा मुनाफा कमा रही है।
-सरकार माने या ना माने पर यह सच है कि देश में काले धन की लगभग समांतर अर्थव्यवस्था कायम हो चुकी है। यह आंकलन है ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल का जिसने भारत को विकासशील देशों में सर्वाधिक भ्रष्ट करार दिया है। एक अनुमान के मुताबिक आजादी के बाद से अब तक भारतीयों ने अपनी अवैध कमाई के करीब 70 लाख करोड़ रुपये देश से बाहर ले जाकर विदेशी बैंकों में जमा किये हैं। काली कमाई के 10 लाख करोड़ रुपये केवल 1995-96 से 2007-08 के 13 वर्षों में ही देश से बाहर ले जाकर जमा कर दिये गए। एक अपुष्ट अनुमान के अनुसार, केवल स्विट्जरलैंड की बैंकों में ही भारतीयों का कुल 65,223 अरब रुपये जमा हैं। भारतीयों का जितना काला धन स्विस बैंकों में जमा है, तकनीकी रूप से वह हमारे सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी का छह गुना है।
काला धन भारत का वापस मिल जाए तो...
अगर यह धन देश को वापस मिल जाए तो देश की अर्थव्यवस्था और आम आदमी की चांदी हो जाएगी। भारत को विदेशी ऋण की जरूरत नहीं रह जाएगी। भारत पर 31 दिसंबर 2009 तक कुल 229.5 अरब डॉलर का ऋण था। सरकारी आंकड़े कहते हैं कि भारत सरकार को देश के लोगों का पेट भरने और देश को चलाने के लिए बजट संतुलन के वास्ते अब भी सालाना तीन लाख करोड़ रुपये का कर्ज लेना पड़ता है। यह राशि लगातार बढ़ रही है। इसका ब्याज इतना अधिक बढ़ रहा है कि देश में जन्म लेने वांल हर बच्चा भी अपने सिर पर लगभग 14000 का कर्ज लेकर पैदा हो रहा है। इसी वजह से जहां एक तरफ प्रति व्यक्ति आमदनी बढ़ रही है, वहीं दूसरी ओर प्रति भारतीय पर कर्ज भी बढ़ता जा रहा है। अगर स्विस बैंकों में जमा कालेधन का पहले चरण में 30 से 40 प्रतिषत भी देश में वापस आ जाए तो हमें कर्ज के लिए आईएमएफ या विश्व बैंक के सामने हाथ नहीं फैलाने होंगे।
एक अनुमान के मुताबिक यदि कालाधन वापस आ जाए तो देश के आम बजट में हर साल लगाये जाने वाले करों से देशवासियों को तीन दशकों तक मुक्ति दी जा सकती है। आम आदमी को आयकर नहीं देना होगा और किसी भी वस्तु पर उत्पाद या बिक्री कर नहीं देना होगा। हमारी सरकार सभी गांवों को सड़कों से जोड़ना चाहती है। इसके लिए 40 लाख करोड़ रुपये की जरूरत है। अगर स्विस बैंक से कालाधन वापस आ जाए तो हर गांव तक एक नहीं, चार लेन की सड़क बन सकती है। स्विस बैंकों में भारतीयों का जितना धन जमा है, उसका 30 प्रतिशत भी देश को मिल जाए तो लगभग 20 करोड़ नई नौकरियों पैदा की जा सकती हैं। 50 प्रतिशत धन मिलने पर बाजार में 30 करोड़ नौकरियां पैदा हो सकती हैं।
विषेषज्ञों का अनुमान है कि स्विस बैंकों में भारतीयों का जमा काले धन का अगर 50 प्रतिशत भी देश को मिल जाए तो हर साल प्रत्येक भारतीय को 2000 रुपये का बोनस दिया जा सकता है। यही नहीं, यह सिलसिला 30 साल तक जारी रह सकता है। यानी देश में गरीबी के दर्शन नहीं होंगे।
कई दशकों से गुप्त खातों के लिए पूरी दुनिया में मशहूर स्विस बैंकों की एसोसिएशन के आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक स्विट्जरलैंड के बैंकों में भारतीयों का जमा कुल धन करीब 63 खरब रुपये है। यह रकम भारत के सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी से थोड़ी ही कम है। माना जा रहा है कि यह वह रकम है जिसका हिसाब किताब भारत सरकार के आयकर विभाग के पास भी नहीं है। कर चोरी और दूसरे गैरकानूनी तरीकों से कमाई गई यह रकम इन विदेशी बैंकों में जिन लोगों ने जमा की है उनमें नेता, उद्योगपति, अफसर, दलाल, माफिया सभी शामिल हैं। इस परिप्रेक्ष्य में आजकल भारत की सोशल मीडिया साइट्स में काले धन के लिए नई एकाउंटिंग टर्मिनोलॉजी का प्रयोग किया जाने लगा है जो इस प्रकार है-
1 करोड़ = 1 खोखा
500 करोड़ = 1 कोड़ा
1,000 करोड़ = 1 राडिया
10,000 करोड़ = 1 कलमाड़ी
1,00,000 करोड़ = 1 राजा
10 कलमाडी + 1 राजा = 1 पंवार
देश की जनता उक्त तमाम कोड़ा, राडिया, कलमाड़ी, राजा और पंवार से अच्छी तरह परिचित है। यह कहने की जरूरत नहीं कि देश की अर्थव्यवस्था को तहस-नहस करने में इन्होंने क्या-क्या गुल खिलाए हैं। यूं तो विदेशी बैंकों में विशेषकर स्विस बैंकों में भारतीयों के काले धन और गुप्त खातों की कहानियां लंबे समय से पढ़ी और सुनी जाती रही हैं, लेकिन इसका सबसे बड़ा खुलासा तब हुआ था जब यूपीए सरकार की पहली पारी के दौरान महाराष्ट्र के पुणे शहर में आयकर विभाग ने रेसकोर्स के एक बाजीगर हसन अली के घर छापा मारा था। इस छापे में आयकर अफसरों को एक लैपटॉप मिला जिसमें करीब 25 हजार करोड़ रुपये से भी ज्यादा रकम के विदेशी खातों का ब्यौरा था। उन्हीं दिनों स्विट्जरलैंड के एक सबसे बड़े बैंक ने भारत में अपनी शाखा खोलने के लिए आरबीआई में आवेदन किया था। छापे में हजारों करोड़ रुपये के स्विस खातों का ब्यौरा मिलने के बाद सरकार ने उक्त स्विस बैंक पर दबाव बनाकर उन गुप्त खातों की सारी जानकारी हासिल कर ली, लेकिन उनमें जो नाम थे उन्हें देखने के बाद सरकार को भी चुप्पी साधनी पड़ी। झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा के तमाम विदेशी कारोबार का ब्यौरा प्रवर्तन निदेशालय ने जुटाया। इसके अलावा कई बड़े राजनेताओं के गुप्त विदेशी खातों की जानकारी भी सरकार को मिली। इनमें महाराष्ट्र के कुछ कद्दावर नेता भी शामिल हैं। आर्थिक खुफिया शाखा से जुड़े अफसरों का कहना है कि विदेशी बैंकों में खाताधारियों की पैठ देश के हर राजनीतिक दलों में है और नौकरशाही पर भी इनकी पकड़ बेहद मजबूत है इसलिए जानकारियों के बावजूद जांच एजेंसियां काले धन के कारोबार की बड़ी मछलियां पकड़ने की हिम्मत नहीं जुटा पाती। वित्त मंत्रालय के सूत्रों के मुताबिक, हसन अली के लैपटॉप से 25 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा के जिन विदेशी खातों की जानकारी मिली है, सरकार के पास उन सबका विस्तृत ब्यौरा है, लेकिन उसमें सरकार में शामिल कुछ दिग्गजों के करीबी भी हैं, इसलिए सरकार कार्रवाई करने में हिचक रही है।
वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी और उनके पूर्वमंत्री पी. चिदंबरम दोनों ही इस मामले में कई बार कार्रवाई की कोशिश कर चुके हैं, लेकिन गठबंधन धर्म ने उनक हाथ बांध रखे हैं। लेकिन अब जब दुनिया भर की सरकारों ने स्विस बैंकों में जमा अपने देश का काला धन लाने की मुहिम की शुरुआत की है तो भारत सरकार पर भी ऐसा करने का दबाव लगाता बढ़ने लगा है। देष की सर्वोच्च अदालत ने सरकार को इस दिशा में कदम बढ़ाने को मजबूर कर दिया है। हालांकि काले धन की भारत वापसी का मामला वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी के एजेंडे में भी शामिल है।
ओबामा ने जब फंसाया पेंच
दरअसल अमेरिका के ओबामा प्रशासन ने लंबे समय से दुनिया भर के काले धन का गोपनीयता की आड़ में छिपाए रखने वाले यूनियन बैंक ऑफ स्विट्जरलैंड को संकट में डाल दिया है। ओबामा प्रषासन ने इस बैंक के खिलाफ आर्थिक धोखाधड़ी, घोटालों, विदेशी मुद्रा की हेराफेरी जैसे आरोप लगाते हुए बैंक के अमेरिका स्थित कई अफसरों के खिलाफ कार्रवाई शुरू कर दी है। ओबामा प्रशासन ने यह दबाव इसलिए बनाया ताकि स्विस बैंक उन तमाम गोपनीय खातों का ब्यौरा अमेरिकी सरकार को दे जिनमें अमेरिका का अरबों डॉलर का काला धन है। ओबामा प्रशासन का यह दबाव आखिरकार रंग लाया और स्विस बैंक इस शर्त पर कि उसके खातेधारकों के खिलाफ कोई आपराधिक मुकदमा नहीं चलाया जाएगा, अब वह सारी जानकारी अमेरिका को दे रहा है जिसकी उसे जरूरत है। अब अमेरिकी सीनेट एक ऐसा कानून बनाने जा रही है जिसके जरिए कर चोरी करके विदेशी बैंकों और टैक्स हैवन देशों में काली कमाई लगाने वालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जा सके और देश का धन वापस लाया जा सके। ओबामा की इस मुहिम का जी-20 देषों के सम्मेलन में स्वागत करते हुए स्विस बैंकों में जमा धन की जानकारी लेने का प्रस्ताव पारित हुआ। जी-20 के प्रस्ताव का असर यह हुआ है कि दुनिया के 28 ऐसे देश जिन्हें टैक्स हैवन माना जाता है जहां गोपनीय बैंकिंग के जरिये काला धन जमा होता है, उनपर भी यह दबाव बना है कि वे अपने बैंकों की गोपनीय बैंकिंग पर अंकुश लगाए और संबंधित देशों द्वारा मांगी जाने वाली जानकारी साझा करें। ओबामा प्रशासन की पहल के बाद यूरोपीय यूनियन के देशों चीन, जापान, आस्टेलिया आदि ने भी स्विस बैंकों और दूसरे टैक्स हैवन देशों की बैंकों से अपने-अपने देषों के खाताधारकों के खातों का ब्यौरा लेना शुरू कर दिया है। निश्चित रूप से इसका दबाव भारत सरकार भी पड़ेगा, लेकिन देखना यह होगा कि यहां की सरकार इस दिशा में कितनी कार्रवाई अमल में लाती है।
काले धन का स्रोत
पहला, भारत में काले धन को अब एक नया आयाम मिल चुका है। अब यह नशीली दवाओं के जरिये भी बढ़ रही है। सीमाकर एवं उत्पाद षुल्क से संबंधित केंद्रीय बोर्ड इस तथ्य को प्रवर्तन निदेशालय के सम्मुख भी लाया है। इस ड्रग मनी की मात्रा का कोई अनुमान उपलब्ध नहीं है, किंतु नशीली दवाओं के खरीद-बिक्री में लगाता वृद्धि हो रही है। यदि यह मान भी लें कि सकल घरेलू उत्पाद के अनुपात में काले धन के अनुपात में कोई खास वृद्धि नहीं हुई है, तब भी इतना तो जरूर है कि इसकी कुल राशि में बहुत वृद्धि हुई है। यह उम्मीद करना सही नहीं है कि आर्थिक सुधार के फलस्वरूप काले धन में कमी आएगी। आर्थिक सुधार अभी तक वास्तविक संपदा, किराया नियंत्रण, खेती भूमि हदबंदी, शिक्षा आदि से दूर ही है। इन क्षेत्रों में कुल लेन-देन का बहुत बड़ा भाग नकदी भुगतान से ही होता है।
दूसरा, लोकतंत्र और राजनीतिक भ्रष्टाचार में काफी मधुर संबंध हैं। प्रतियोगी और विश्वीकृत व्यापारिक परिवेश में व्यापारीगण भी यह सोचते हैं कि प्रेम और युद्ध की भांति व्यापार में भी सबकुछ जायज है। यही कारण है कि आज ऐसे लोगों की भरमार है जिनका प्रमुख कार्य लॉबिंग का धंधा है। 2 जी स्पेक्ट्रम घोटाले में नीरा राडिया प्रकरण इसका जीता-जागता प्रमाण है। इसी कारण पीआरओ संपर्क साधने वाले लोगों, दलालों और पैरोकारों की संख्या में काफी वृद्धि हुई है, खासतौर पर लोकतांत्रिक देशों और राज्यों की राजधानियों में। ये लोग राजनीतिज्ञों और नौकरशाहों को प्रभावित करते हैं ताकि विभिन्न कानूनों में परिवर्तन हो जाए जो उनके अनुकूल हों। यह भी सत्य है कि राजनीतिक भ्रष्टाचार को पूरी तरह से समाप्त नहीं किया जा सकता, लेकिन मतदाता अपने नेताओं के प्रति चौकस रहे और मीडिया बिना किसी भय के अपने दायित्वों का निर्वाह करे तो राजनीतिक भ्रष्टाचार को नियंत्रित जरूर किया जा सकता है।
...तो उपाय क्या है
काले धन के आतंक को रोकने के कोई भी उपाय तब तक सफल नहीं हो सकते जब तक कि नीति निर्धारक इस समस्या से निपटने के प्रति दृढ़ प्रतिज्ञ न हों। अर्थात इसमें सरकार की राजनीतिक इच्छा महत्वपूर्ण हैं। इस दृष्टि से काले धन के सृजन को रोकने के लिए पहली जरूरत यह है कि सरकारी प्रशासन स्वच्छ हो तथा राजनीतिज्ञ और नौकरशाह ईमानदार हों, ओबामा प्रशासन की तरह। यदि ये बातें उपलब्ध हों तभी कोई भी उपाय काले धन के सृजन को रोकने में प्रभावी होंगे अन्यथा कोई सूरत नहीं जो काले धन के विस्तार को रोकने पाए।
कुछ रोचक तथ्य
-आर्थिक अपराधों की छानबीन करने वाली खुफिया एजेंसियों से जुड़े सूत्रों के मुताबिक दिल्ली के एक फार्म हाउस में अक्सर कुछ लोग इसलिए जमा होते हैं कि वहां बैठकर वह तसल्ली से करोड़ों रुपये के काले धन का हिसाब-किताब कर सकें। दक्षिणी दिल्ली के इलाके में स्थित इस फार्म हाउस में नोटों की नहीं बल्कि हजार और पांच सौ के नोटों की गड्डियों को गिना जाता है। गड्डियों को गिनकर ही सैकड़ों करोड़ रुपये का हिसाब लगा लिया जाता है। यह वह रकम है जो ठेकों, तबादलों, शराब, बिल्डर माफिया, खदान माफिया और सरकारी योजनाओं के पैसे की लूट करके कमाई जा रही है। इसका कागज पर कोई हिसाब-किताब नहीं है। दिल्ली के अलावा देश के दूसरे बड़े शहरों में भी कई ऐसे ठिकाने हैं जहां अरबों रुपयों की काली कमाई जमा करके उसे इधर-उधर किया जाता है। यह जानकारी खुफिया एजेंसियों और आयकर विभाग के लोगों को भी है, लेकिन इन ठिकानों पर छापा मारने के लिए उनके पास राजनीतिक हरी झंडी नहीं होती है क्योंकि काले धन के इस समंदर में तमाम बड़े व कद्दावर नेता, अफसर और उद्योग जगत के लोग गोते लगा रहे होते हैं।
-भारत ने मोरीशस समेत करीब 79 देशों के साथ जो दोहरी कर मुक्ति संधि की है, उसका फायदा काले धन को सफेद करने में जमकर उठाया जा रहा है। खासकर मोरीशस के जरिये भारत के शेयर बाजार में होने वाले निवेश को ज्यादातर हिस्सा वही है जो भारत में नंबर दो की कमाई करके बाहर भेजा जाता है। भारतीय शेयर बाजार में जब तक निवेश का मोरीशस मार्ग खुला रहेगा, कालेधन और भ्रष्टाचार पर काबू पाना मुश्किल है। यह एनडीए सरकार की भारतीय अर्थव्यवस्था को दी गई सौगात है जिसे यूपीए की मनमोहन सरकार जारी रखे हुए है। यह कहना है पूर्व आयकर अधिकारी विश्वबन्धु गुप्ता का। गुप्ता के मुताबिक निवेश के मोरीशस मार्ग के जरिये सैकड़ों ऐसी कंपनियां हैं जिनका कोई वजूद नहीं है। वह सिर्फ मोरीशस में एक पोस्ट बॉक्स लेकर अपना कारोबार कर रही है और करोड़ो-अरबों रुपये के काले धन को शेयर बाजार के जरिये सफेद कर मोटा मुनाफा कमा रही है।
-सरकार माने या ना माने पर यह सच है कि देश में काले धन की लगभग समांतर अर्थव्यवस्था कायम हो चुकी है। यह आंकलन है ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल का जिसने भारत को विकासशील देशों में सर्वाधिक भ्रष्ट करार दिया है। एक अनुमान के मुताबिक आजादी के बाद से अब तक भारतीयों ने अपनी अवैध कमाई के करीब 70 लाख करोड़ रुपये देश से बाहर ले जाकर विदेशी बैंकों में जमा किये हैं। काली कमाई के 10 लाख करोड़ रुपये केवल 1995-96 से 2007-08 के 13 वर्षों में ही देश से बाहर ले जाकर जमा कर दिये गए। एक अपुष्ट अनुमान के अनुसार, केवल स्विट्जरलैंड की बैंकों में ही भारतीयों का कुल 65,223 अरब रुपये जमा हैं। भारतीयों का जितना काला धन स्विस बैंकों में जमा है, तकनीकी रूप से वह हमारे सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी का छह गुना है।
काला धन भारत का वापस मिल जाए तो...
अगर यह धन देश को वापस मिल जाए तो देश की अर्थव्यवस्था और आम आदमी की चांदी हो जाएगी। भारत को विदेशी ऋण की जरूरत नहीं रह जाएगी। भारत पर 31 दिसंबर 2009 तक कुल 229.5 अरब डॉलर का ऋण था। सरकारी आंकड़े कहते हैं कि भारत सरकार को देश के लोगों का पेट भरने और देश को चलाने के लिए बजट संतुलन के वास्ते अब भी सालाना तीन लाख करोड़ रुपये का कर्ज लेना पड़ता है। यह राशि लगातार बढ़ रही है। इसका ब्याज इतना अधिक बढ़ रहा है कि देश में जन्म लेने वांल हर बच्चा भी अपने सिर पर लगभग 14000 का कर्ज लेकर पैदा हो रहा है। इसी वजह से जहां एक तरफ प्रति व्यक्ति आमदनी बढ़ रही है, वहीं दूसरी ओर प्रति भारतीय पर कर्ज भी बढ़ता जा रहा है। अगर स्विस बैंकों में जमा कालेधन का पहले चरण में 30 से 40 प्रतिषत भी देश में वापस आ जाए तो हमें कर्ज के लिए आईएमएफ या विश्व बैंक के सामने हाथ नहीं फैलाने होंगे।
एक अनुमान के मुताबिक यदि कालाधन वापस आ जाए तो देश के आम बजट में हर साल लगाये जाने वाले करों से देशवासियों को तीन दशकों तक मुक्ति दी जा सकती है। आम आदमी को आयकर नहीं देना होगा और किसी भी वस्तु पर उत्पाद या बिक्री कर नहीं देना होगा। हमारी सरकार सभी गांवों को सड़कों से जोड़ना चाहती है। इसके लिए 40 लाख करोड़ रुपये की जरूरत है। अगर स्विस बैंक से कालाधन वापस आ जाए तो हर गांव तक एक नहीं, चार लेन की सड़क बन सकती है। स्विस बैंकों में भारतीयों का जितना धन जमा है, उसका 30 प्रतिशत भी देश को मिल जाए तो लगभग 20 करोड़ नई नौकरियों पैदा की जा सकती हैं। 50 प्रतिशत धन मिलने पर बाजार में 30 करोड़ नौकरियां पैदा हो सकती हैं।
विषेषज्ञों का अनुमान है कि स्विस बैंकों में भारतीयों का जमा काले धन का अगर 50 प्रतिशत भी देश को मिल जाए तो हर साल प्रत्येक भारतीय को 2000 रुपये का बोनस दिया जा सकता है। यही नहीं, यह सिलसिला 30 साल तक जारी रह सकता है। यानी देश में गरीबी के दर्शन नहीं होंगे।
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