सुप्रसिद्ध अंतरराष्ट्रीय पत्रिका न्यूजवीक ने जहां अपनी एक रिपोर्ट में चीन के बाद बिहार की अर्थव्यवस्था को विश्व में सबसे तेज बताया था, वहीं विश्व बैंक ने अपनी एक रिपोर्ट में इस बात का उल्लेख किया है कि कारोबार करने के लिए मुम्बई से बेहतर पटना है, बावजूद इसके बिहार के विकास को लेकर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। लालू राज से त्रस्त जनता ने नीतीश के हाथ में सत्ता की बागडोर जरूर सौंप दी, लेकिन सरकार के खाली खजाने की वजह से विकास की गति जोर नहीं पकड़ पा रही है। इसके अलावा केंद्र और राज्य की राजनीतिक परिस्थितियों का अनुकूल न होना भी विकास में रोड़ा अटकाने में अहम भूमिका निभा रहा है।
नीतीश के सामने सबसे ज्वलंत समस्या बाढ़ की विभीषिका से निपटना है। कोसी के पूर्वी तटबंध पर बढ़ रहे दबाव के कारण प्रदेश के करीब ढाई करोड़ आबादी को बाढ़ का खतरा सताने लगा है। इस तटबंध को सिर्फ पायलट चैनल बनाकर ही बचाया जा सकता है। जब बिहार सरकार ने इस आषय का प्रस्ताव रखा तो नेपाल सरकार ने इस पर सहमति दे दी थी, लेकिन नेपाली ग्रामीणों के विरोध के बाद चैनल की खुदाई रोक दी गई। दरअसल नेपाली मीडिया ने यह भ्रम फैलाने में कोई कसर नहीं छोड़ी कि पायलट चैनल बनने से नेपाल के हजारों गांव डूब सकते हैं। इसके बाद नेपाल सरकार ने पायलट चैनल के मसले पर चुप्पी साध ली। नतीजतन बिहार के पांच जिलों पर बाढ़ की आशंका गहरा गई है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार इस मामले को लेकर काफी परेशान हैं और उन्होंने इस आशंका को केंद्रीय जल संसाधन मंत्री को अवगत भी करा दिया, लेकिन नेपाल में संवैधानिक संकट उत्पन्न होने की वजह से फिलहाल इस दिशा में कोई खास प्रगति होने के आसार नहीं दिख रहे हैं।
दूसरी प्रमुख बात यह है कि नीतीश के लगातार मांग के बावजूद केंद्र सरकार राज्य को विशेष पैकेज देने की बात को अनसूना कर रहा है। पिछले दिनों पटना में आयोजित एक समारोह में नीतीश ने बिहार को विशेष राज्य का दर्जा दिलाने की मुहिम के तहत एक बार फिर मांग उठाई कि उन्हें केंद्र सरकार से और कुछ नहीं चाहिए, वह केवल सूबे को विशेष राज्य का दर्ज दे दे। इसके बिना प्रदेश में निजी पूंजी का निवेष नहीं हो सकेगा और बिना निवेश के सूबे के विकास की कल्पना बेमानी होगी। नीतीश ने इस बात पर जोर दिया कि बिहार परंपरागत रूप से पिछड़ा राज्य रहा है। यहां सार्वजनिक पूंजी का निवेश नहीं हो सका। समावेशी विकास और न्याय के साथ विकास का एजेंडा लेकर चल रहे हैं, लेकिन निजी पूंजी निवेश के बिना बड़े पैमाने पर राज्य का विकास संभव नहीं है। इथनॉल एवं कोयला लिंकेज संबंधी प्रस्ताव को भी केंद्र मान लेता तो प्रदेश इथनॉल हब के रूप में विकसित होता और बिजली की समस्या का बहुत हद तक समाधान हो जाता।
यह बात सही है कि विशेष राज्य का दर्जा मिलने से प्रदेश को कई सहूलियतें खुद ब खुद मिलने लगेंगी, मसलन केंद्रीय करों में रियायत मिलेगी जिससे निवेशक प्रदेश की ओर आकर्षित होंगे और पूंजी का निवेश हो सकेगा। दरअसल झारखंड के बिहार से अलग होने के बाद सारी खणिज संपदा वहां चली गई। इसके एवज में केंद्र की पूर्ववर्ती राजग सरकार ने समविकास राशि के रूप में प्रदेश को एक हजार करोड़ की राशि देने की व्यवस्था की गई थी। यह राशि बंद नहीं होनी चाहिए। नीतीश ने केंद्र सरकार से उड़ीसा सीमा के पास इंटीग्रेटेड पोर्ट बनाने की इजाजत भी मांगी है। मुख्यमंत्री का कहना है कि वह यह पोर्ट पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप में बनवाएंगे।
नीतीश के साथ सबसे बड़ी समस्या यह है कि उनकी जनता दल यू भाजपा के गठबंधन से बिहार में सरकार चला रही है। कांग्रेस लालू राज का खात्मा जरूर चाहती थी, लेकिन वह यह भी चाहती थी कि जो भी सरकार बिहार में बने वह कांग्रेस के सहयोग से बने। नीतीश या तो इस बात को समझ नहीं पाए या उन्होंने फिर राजधर्म निभाते हुए भाजपा का साथ नहीं छोड़। नीतीश को हो सकता है यह भी अंदेशा रहा होगा कि कांग्रेस के साथ जाने पर उसे सत्ता से हाथ न धोना पड़े। कांग्रेस नीतीश को भाजपा के साथ किसी सूरत में नहीं देखना चाहती, क्योंकि जब तक नीतीश के साथ भाजपा चिपकी रहेगी, सूबे में कांग्रेस का पनपना बेहद मुश्किल होगा। यह एक प्रमुख वजह है और इसीलिए केंद्र सरकार से जो मदद नीतीश सरकार को मिलनी चाहिए वह नहीं मिल पा रही है। केंद्र सरकार का कहना है कि जो देनदारी सूबे के लिए बनती है वह मिलती रहेगी। विशेष पैकेज या विषेष राज्य का दर्जा देने से वह लगातार कन्नी काट रही है। विदेषी पूंजी निवेश के लिए नीतीश ने हाल में भूटान और चीन की भी यात्रा की है, लेकिन अभी इस दिशा में कोई ठोस आश्वासन या पहल नहीं दिख रही। विदेशी पूंजी निवेश के पीछे भी कोई सकारात्मक पहल तभी हो पाएगी जब निवेशकों को केंद्र सरकार की हरी झंडी मिलेगी। नीतीश ने अपने पिछले कार्यकाल में कुछ अति लोकप्रिय योजनाओं को अंजाम दिया था जिसमें समग्र विद्यालय विकास कार्यक्रम के तहत मुख्यमंत्री बालक-बालिका साइकिल योजना, मुख्यमंत्री बालिका पोषाक योजना, मुख्यमंत्री अनुसूचित जाति जनजाति मेधावृति योजना के अलावा कन्या विवाह योजना, कन्या सुरक्षा योजना, सेतु योजना, ग्राम सड़क योजना आदि प्रमुख हैं। इसमें कोई शक नहीं कि इन योजनाओं को अंजाम देने की वजह से 2010 के विधानसभा चुनाव में नीतीश के गठबंधन को भारी जनसमर्थन मिला और लालू की राजद का पूरी तरह से सफाया हो गया, लेकिन अब धन के अभाव में उक्त तमाम लोकप्रिय और जनकल्याणकारी योजनाओं को जारी रखने में नीतीश सरकार को मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है।
इसमें कोई दो राय नहीं कि बिहार विकास के पथ पर अग्रसर है। यह सिर्फ नीतीश कुमार नहीं बोल रहे, पूरी दुनिया इस बात को स्वीकार कर रही है। बिहार देश का एक महत्वपूर्ण राज्य है और इस राज्य का विकास होगा तो देश इससे अछूता नहीं रहेगा। केंद्र सरकार को दलीय राजनीति के दलदल में सूबे के विकास को नहीं घसीटना चाहिए। जाहिर है आज केंद्र यदि बिहार को विशेष राज्य का दर्जा दे भी दे तो उसका श्रेय कांग्रेस को ही मिलेगा न कि नीतीष को। मनमोहन सिंह न सिर्फ देश के प्रधानमंत्री हैं, बल्कि एक अर्थशास्त्री भी है, इसलिए उन्हें अर्थशास्त्र के चश्मे से बिहार को देखना चाहिए और उसके विकास में सकारात्मक कदम उठाने चाहिए।
Monday, 27 June 2011
Saturday, 4 June 2011
भाजपा के विस्तार की चुनौतियां
’होइहें वही जो राम रूचि राखा’, लेकिन इस बात में कतई भरोसा जताने को तैयार नहीं हैं भाजपा के आला नेता। वर्ष 2004 के लोकसभा चुनाव से पार्टी में प्राइम मिनिस्टर इन वेटिंग चल रहे लालकृष्ण आडवाणी का सूरज लगभग अस्त हो चुका है और आगामी लोकसभा चुनाव-2014 को लेकर पार्टी के आला नेताओं में घमासान षुरू हो गया है। जबकि भाजपा की राजनीतिक जमीनी हकीकत यह है कि पार्टी में आज अटल बिहारी वाजपेयी जैसा कोई ऐसा कद्दावर नेता नहीं है जो एनडीए का एक मजबूत गठजोड़ बनाकर कांग्रेस की अगुवाई में चल रही मजबूत यूपीए-2 की सत्ता को पटकनी दे सके। दरअसल पार्टी में अंतरकलह इतना प्रबल हो गया है कि देष की जनता को लगने लगा है कि जो पार्टी अपना परिवार नहीं संभाल सकती है वह इतने बड़े देष को क्या संभाल पाएगी। इस अंतरकलह की वजह से ही पार्टी यह ऐलान करने की स्थिति में नहीं है कि लोकसभा का अगला चुनाव हम फलां नेता की अगुवाई में लड़ेंगे और प्रधानमंत्री फलां व्यक्ति होगा। कुल मिलाकर नेता का संकट भाजपा के विस्तार के लिए एक बड़ी चुनौती है।
पता नहीं क्यों, लेकिन मुझे ऐसा लगता है कि भाजपा में आगामी कुछ वर्षों तक नेता का संकट बना रहेगा। यह संकट तब तक चलेगा जब तक जनसंघ की विचारधारा से प्रेरित वर्ग का अस्तित्व पार्टी से मिट नहीं जाता और ऐसा निकट भविष्य में होता नहीं दिख रहा। वह इसलिए कि संघ परिवार यह कभी नहीं चाहेगा कि पार्टी में उसकी दखलंदाजी कम हो। यह सही है कि भाजपा के उत्थान में अयोध्या प्रकरण की भूमिका महत्वपूर्ण रही और इसमें जनसंघ की विचारधारा से निकली शिवसेना, बजरंग दल और विश्व हिंदू परिषद ने अपना भरपूर सहयोग दिया, लेकिन जब भाजपा के नेतृत्व में एनडीए का सर्वमान्य नेता और प्रधानमंत्री बनाने की बात उठी तो जनसंघ की विचारधारा से ओतप्रोत लालकृष्ण आडवाणी नहीं, मूल रूप से समाजवादी विचारधारा से प्रेरित अटल बिहारी वाजपेयी के नाम पर एनडीए के घटक ने सहमति जताई। यह बात आज भी भाजपा के आला नेताओं को समझ में आ जाए तो एक बार फिर से देश की सत्ता पर भाजपा काबिज हो सकती है। कांग्रेस गठबंधन लगातार इसलिए मजबूत होती जा रही है कि जनता के पास कोई सशक्त विकल्प मौजूद नहीं है।
वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में भाजपा को यह समझना होगा कि वह हिंदुत्व की पार्टी के तौर पर नाकाम हो चुकी है, सांप्रदायिकता जनता के बीच में अपनी अपील लगभग खो चुकी है। आज फिर से अयोध्या चलने के लिए देष की जनता को तैयार नहीं किया जा सकता। तो फिर भाजपा क्या करे? निश्चित रूप से पार्टी को ऐसे मुद्दों की तलाश करनी होगी जो जनता को उसपर फिदा होने पर मजबूर करे। लेकिन ऐसा मुद्दा तलाशना भाजपा के लिए ‘नेता का संकट’ से भी बड़ी चुनौती है। पहले बात करते हैं महंगाई पर। इस बात से कोई इंकार नहीं कर सकता कि आज अगर भाजपा जनता को विश्वास दिलाए कि हम देष को महंगाई के डंक से निजात दिलाएंगे और महंगाई से मुक्ति दिलाने वाले तर्कों से जनता यदि कनवींस हो जाए तो सत्ता की बागडोर भाजपा के हाथों में होगी। लेकिन इस हथियार को आजमाना कोई खेल नहीं है। यह तो भाजपा भी अच्छी तरह से जानती है कि महंगाई से निपटने का औजार बनाना कोई आसान काम नहीं है। सवाल है कि पेट्रोलियम पदार्थों मसलन पेट्रोल, डीजल की कीमतों को कम-ज्यादा करना अब सरकार के हाथ में रहा नहीं। जहां तक केरोसीन और रसोई गैस की कीमतों का सवाल है तो वह सब्सिडी को बढ़ाने या घटाने पर निर्भर करता है। अगर इन उत्पादों पर सब्सिडी कम करते हैं या खत्म करते हैं तो आपको इन उत्पादों के दाम बढ़ाने ही होंगे और अगर सब्सिडी बढ़ाते हैं तो सरकार पर अतिरिक्त बोझ बढ़ेगा जिसकी क्षतिपूति के लिए सरकार को अलग से कोई व्यवस्था करनी होगी। कहने का तात्पर्य यह है कि कोई भी सरकार यह कहे कि हम देश को महंगाई की मार से निजात दिला देंगे तो यह वर्तमान अर्थव्यवस्था में संभव नहीं हैं। हां, इतना जरूर किया जा सकता है कि महंगाई के बढ़ने की जो दर है उसको जरूर नियंत्रित किया जा सकता है जो यूपीए सरकार नहीं कर पा रही है।
भाजपा के रणनीतिकारों के लिए दुर्भाग्य की बात यह रही कि लगभग सात साल से पार्टी विपक्ष की भूमिका में है और इस दौरान देश की जनता को जिस तरह की अपेक्षा पार्टी नेताओं से थी वह पूरी नहीं हो सकी। जिस तरह से दिल्ली के जंतर मंतर से अण्णा हजारे ने भ्रष्टाचार के खिलाफ जन लोकपाल बिल के लिए आंदोलन का शंखनाद किया और लाखों लोग उनके समर्थन में सड़कों पर उतर आए, ठीक उसी तरह से भाजपा ने बढ़ते भ्रष्टाचार या बेकाबू होती महंगाई के खिलाफ मुहिम क्यों नहीं चलाई। मुहिम चलाना तो दूर, भाजपा ने तो अनमने भाव से भी अण्णा के आंदोलन को समर्थन नहीं दिया। इसीलिए न कि यदि वह इस आंदोलन का समर्थन करते हैं तो गाज तो उनपर भी तो गिरनी है। साफ है कि भ्रष्टाचार के मुद्दे पर आपकी नीति साफ नहीं है। हो भी कैसे सकती है, जब पार्टी अपने ही घर में भ्रष्टाचारी नेताओं से जूझ रही हो।
कुछ महीनों पहले भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे कर्नाटक के मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा को हटाने की बात आयी थी उस समय येदियुरप्पा ने सापफ धमकी दी थी कि यदि उन्हें हटाया गया तो वह उन राष्ट्रीय नेताओं के नाम उजागर कर देंगे जिन्हें रेड्डी बंधुओं और उन्होंने मदद पहुंचाई है। इसके बाद भाजपा के हाईकमान ने चुप्पी साध ली। इसके बाद पिछले दिनों रेड्डी बंधुओं को येदियुरप्पा मंत्रिमंडल में शामिल करने को लेकर भाजपा की वरिष्ठ नेत्री सुषमा स्वराज ने तीखे तेवर अपनाए तो एक बार फिर पार्टी में भ्रष्टाचार के साथ ही अंतरकलह की बात भी खुलकर सामने आ गई। दरअसल पार्टी में सुषमा के विरोधी गुट के लोगों ने इस बात को हवा देनी षुरू कर दी थी कि प्रदेश में अवैध खनन के आरोपी जी. करुणाकर रेड्डी और जी. जनार्दन रेड्डी सुषमा स्वराज के करीबी हैं और वह उन्हें प्रश्रय देती हैं। इस तरह के आरोप अरुण जेटली खेमे की ओर से उछाले गए थे। बात यहीं से बिगड़ी और सुषमा ने अपनी सफाई में वह सब बोल गईं जो उन्हें नहीं बोलना चाहिए था।
सुषमा के बयान से इस बात का खुलासा हो गया है पार्टी के शीर्षस्थ नेताओं में टकराव की असली वजह कर्नाटक के रेड्डी बंधुओं द्वारा चुनाव फंड के नाम पर दिए गए 160 करोड़ रुपये है। सुषमा ने यह कहकर अरुण जेटली की बोलती बंद कर दी कि हमने तो तभी इस तरह रकम लिए जाने को अनुचित बताते हुए इसकी बड़ी कीमत चुकाने की चेतावनी दे दी थी। यहां सुषमा का पक्ष इसलिए भी मजबूत था कि कर्नाटक चुनाव में प्रदेश प्रभारी अरुण जेटली थे। हालांकि बाद में पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी, पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह और मुख्यमंत्री येदियुरप्पा ने कहा कि रेड्डी बंधुओं को मंत्रिमंडल में शामिल करने का फैसला पार्टी का सामूहिक फैसला था। लेकिन इससे पार्टी की अंतरकलह तो देश के सामने आ ही गई और वो भी चुनावी फंड को लेकर।
महत्वपूर्ण सवाल यही है कि आप किस आधार पर देश की जनता को भरोसा दिलाएंगे कि अन्य दलों के मुकाबले चाल, चरित्र और चेहरा के मामले में भाजपा अलग है। कैसे भरोसा दिलाएंगे कि पार्टी की वैचारिक स्पष्टता अन्य पार्टियों से भिन्न है और अनुशासन सर्वोपरि है। पार्टी की बैठकों में भले ही आप सब कुछ तय कर लेंगे, लेकिन जब जनता के बीच जाएंगे तो निश्चित रूप से पार्टी के चाल, चरित्र और चेहरा को परिभाषित करना होगा। सिर्फ परिभाषित ही नहीं करना होगा, यह भी सुनिश्चित करना होगा कि जो आप कह रहे हैं उससे जनता कितनी कनवींस हो रही है। यदि आपकी बात जनता समझ गई तो आपको बधाई, वरना विस्तार की चुनौतियां रहेंगी बरकरार....
पता नहीं क्यों, लेकिन मुझे ऐसा लगता है कि भाजपा में आगामी कुछ वर्षों तक नेता का संकट बना रहेगा। यह संकट तब तक चलेगा जब तक जनसंघ की विचारधारा से प्रेरित वर्ग का अस्तित्व पार्टी से मिट नहीं जाता और ऐसा निकट भविष्य में होता नहीं दिख रहा। वह इसलिए कि संघ परिवार यह कभी नहीं चाहेगा कि पार्टी में उसकी दखलंदाजी कम हो। यह सही है कि भाजपा के उत्थान में अयोध्या प्रकरण की भूमिका महत्वपूर्ण रही और इसमें जनसंघ की विचारधारा से निकली शिवसेना, बजरंग दल और विश्व हिंदू परिषद ने अपना भरपूर सहयोग दिया, लेकिन जब भाजपा के नेतृत्व में एनडीए का सर्वमान्य नेता और प्रधानमंत्री बनाने की बात उठी तो जनसंघ की विचारधारा से ओतप्रोत लालकृष्ण आडवाणी नहीं, मूल रूप से समाजवादी विचारधारा से प्रेरित अटल बिहारी वाजपेयी के नाम पर एनडीए के घटक ने सहमति जताई। यह बात आज भी भाजपा के आला नेताओं को समझ में आ जाए तो एक बार फिर से देश की सत्ता पर भाजपा काबिज हो सकती है। कांग्रेस गठबंधन लगातार इसलिए मजबूत होती जा रही है कि जनता के पास कोई सशक्त विकल्प मौजूद नहीं है।
वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में भाजपा को यह समझना होगा कि वह हिंदुत्व की पार्टी के तौर पर नाकाम हो चुकी है, सांप्रदायिकता जनता के बीच में अपनी अपील लगभग खो चुकी है। आज फिर से अयोध्या चलने के लिए देष की जनता को तैयार नहीं किया जा सकता। तो फिर भाजपा क्या करे? निश्चित रूप से पार्टी को ऐसे मुद्दों की तलाश करनी होगी जो जनता को उसपर फिदा होने पर मजबूर करे। लेकिन ऐसा मुद्दा तलाशना भाजपा के लिए ‘नेता का संकट’ से भी बड़ी चुनौती है। पहले बात करते हैं महंगाई पर। इस बात से कोई इंकार नहीं कर सकता कि आज अगर भाजपा जनता को विश्वास दिलाए कि हम देष को महंगाई के डंक से निजात दिलाएंगे और महंगाई से मुक्ति दिलाने वाले तर्कों से जनता यदि कनवींस हो जाए तो सत्ता की बागडोर भाजपा के हाथों में होगी। लेकिन इस हथियार को आजमाना कोई खेल नहीं है। यह तो भाजपा भी अच्छी तरह से जानती है कि महंगाई से निपटने का औजार बनाना कोई आसान काम नहीं है। सवाल है कि पेट्रोलियम पदार्थों मसलन पेट्रोल, डीजल की कीमतों को कम-ज्यादा करना अब सरकार के हाथ में रहा नहीं। जहां तक केरोसीन और रसोई गैस की कीमतों का सवाल है तो वह सब्सिडी को बढ़ाने या घटाने पर निर्भर करता है। अगर इन उत्पादों पर सब्सिडी कम करते हैं या खत्म करते हैं तो आपको इन उत्पादों के दाम बढ़ाने ही होंगे और अगर सब्सिडी बढ़ाते हैं तो सरकार पर अतिरिक्त बोझ बढ़ेगा जिसकी क्षतिपूति के लिए सरकार को अलग से कोई व्यवस्था करनी होगी। कहने का तात्पर्य यह है कि कोई भी सरकार यह कहे कि हम देश को महंगाई की मार से निजात दिला देंगे तो यह वर्तमान अर्थव्यवस्था में संभव नहीं हैं। हां, इतना जरूर किया जा सकता है कि महंगाई के बढ़ने की जो दर है उसको जरूर नियंत्रित किया जा सकता है जो यूपीए सरकार नहीं कर पा रही है।
भाजपा के रणनीतिकारों के लिए दुर्भाग्य की बात यह रही कि लगभग सात साल से पार्टी विपक्ष की भूमिका में है और इस दौरान देश की जनता को जिस तरह की अपेक्षा पार्टी नेताओं से थी वह पूरी नहीं हो सकी। जिस तरह से दिल्ली के जंतर मंतर से अण्णा हजारे ने भ्रष्टाचार के खिलाफ जन लोकपाल बिल के लिए आंदोलन का शंखनाद किया और लाखों लोग उनके समर्थन में सड़कों पर उतर आए, ठीक उसी तरह से भाजपा ने बढ़ते भ्रष्टाचार या बेकाबू होती महंगाई के खिलाफ मुहिम क्यों नहीं चलाई। मुहिम चलाना तो दूर, भाजपा ने तो अनमने भाव से भी अण्णा के आंदोलन को समर्थन नहीं दिया। इसीलिए न कि यदि वह इस आंदोलन का समर्थन करते हैं तो गाज तो उनपर भी तो गिरनी है। साफ है कि भ्रष्टाचार के मुद्दे पर आपकी नीति साफ नहीं है। हो भी कैसे सकती है, जब पार्टी अपने ही घर में भ्रष्टाचारी नेताओं से जूझ रही हो।
कुछ महीनों पहले भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे कर्नाटक के मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा को हटाने की बात आयी थी उस समय येदियुरप्पा ने सापफ धमकी दी थी कि यदि उन्हें हटाया गया तो वह उन राष्ट्रीय नेताओं के नाम उजागर कर देंगे जिन्हें रेड्डी बंधुओं और उन्होंने मदद पहुंचाई है। इसके बाद भाजपा के हाईकमान ने चुप्पी साध ली। इसके बाद पिछले दिनों रेड्डी बंधुओं को येदियुरप्पा मंत्रिमंडल में शामिल करने को लेकर भाजपा की वरिष्ठ नेत्री सुषमा स्वराज ने तीखे तेवर अपनाए तो एक बार फिर पार्टी में भ्रष्टाचार के साथ ही अंतरकलह की बात भी खुलकर सामने आ गई। दरअसल पार्टी में सुषमा के विरोधी गुट के लोगों ने इस बात को हवा देनी षुरू कर दी थी कि प्रदेश में अवैध खनन के आरोपी जी. करुणाकर रेड्डी और जी. जनार्दन रेड्डी सुषमा स्वराज के करीबी हैं और वह उन्हें प्रश्रय देती हैं। इस तरह के आरोप अरुण जेटली खेमे की ओर से उछाले गए थे। बात यहीं से बिगड़ी और सुषमा ने अपनी सफाई में वह सब बोल गईं जो उन्हें नहीं बोलना चाहिए था।
सुषमा के बयान से इस बात का खुलासा हो गया है पार्टी के शीर्षस्थ नेताओं में टकराव की असली वजह कर्नाटक के रेड्डी बंधुओं द्वारा चुनाव फंड के नाम पर दिए गए 160 करोड़ रुपये है। सुषमा ने यह कहकर अरुण जेटली की बोलती बंद कर दी कि हमने तो तभी इस तरह रकम लिए जाने को अनुचित बताते हुए इसकी बड़ी कीमत चुकाने की चेतावनी दे दी थी। यहां सुषमा का पक्ष इसलिए भी मजबूत था कि कर्नाटक चुनाव में प्रदेश प्रभारी अरुण जेटली थे। हालांकि बाद में पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी, पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह और मुख्यमंत्री येदियुरप्पा ने कहा कि रेड्डी बंधुओं को मंत्रिमंडल में शामिल करने का फैसला पार्टी का सामूहिक फैसला था। लेकिन इससे पार्टी की अंतरकलह तो देश के सामने आ ही गई और वो भी चुनावी फंड को लेकर।
महत्वपूर्ण सवाल यही है कि आप किस आधार पर देश की जनता को भरोसा दिलाएंगे कि अन्य दलों के मुकाबले चाल, चरित्र और चेहरा के मामले में भाजपा अलग है। कैसे भरोसा दिलाएंगे कि पार्टी की वैचारिक स्पष्टता अन्य पार्टियों से भिन्न है और अनुशासन सर्वोपरि है। पार्टी की बैठकों में भले ही आप सब कुछ तय कर लेंगे, लेकिन जब जनता के बीच जाएंगे तो निश्चित रूप से पार्टी के चाल, चरित्र और चेहरा को परिभाषित करना होगा। सिर्फ परिभाषित ही नहीं करना होगा, यह भी सुनिश्चित करना होगा कि जो आप कह रहे हैं उससे जनता कितनी कनवींस हो रही है। यदि आपकी बात जनता समझ गई तो आपको बधाई, वरना विस्तार की चुनौतियां रहेंगी बरकरार....
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