Monday, 27 June 2011

राजनीति में फंसा नीतीश का विकास मॉडल

सुप्रसिद्ध अंतरराष्ट्रीय पत्रिका न्यूजवीक ने जहां अपनी एक रिपोर्ट में चीन के बाद बिहार की अर्थव्यवस्था को विश्व में सबसे तेज बताया था, वहीं विश्व बैंक ने अपनी एक रिपोर्ट में इस बात का उल्लेख किया है कि कारोबार करने के लिए मुम्बई से बेहतर पटना है, बावजूद इसके बिहार के विकास को लेकर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। लालू राज से त्रस्त जनता ने नीतीश के हाथ में सत्ता की बागडोर जरूर सौंप दी, लेकिन सरकार के खाली खजाने की वजह से विकास की गति जोर नहीं पकड़ पा रही है। इसके अलावा केंद्र और राज्य की राजनीतिक परिस्थितियों का अनुकूल न होना भी विकास में रोड़ा अटकाने में अहम भूमिका निभा रहा है।
नीतीश के सामने सबसे ज्वलंत समस्या बाढ़ की विभीषिका से निपटना है। कोसी के पूर्वी तटबंध पर बढ़ रहे दबाव के कारण प्रदेश के करीब ढाई करोड़ आबादी को बाढ़ का खतरा सताने लगा है। इस तटबंध को सिर्फ पायलट चैनल बनाकर ही बचाया जा सकता है। जब बिहार सरकार ने इस आषय का प्रस्ताव रखा तो नेपाल सरकार ने इस पर सहमति दे दी थी, लेकिन नेपाली ग्रामीणों के विरोध के बाद चैनल की खुदाई रोक दी गई। दरअसल नेपाली मीडिया ने यह भ्रम फैलाने में कोई कसर नहीं छोड़ी कि पायलट चैनल बनने से नेपाल के हजारों गांव डूब सकते हैं। इसके बाद नेपाल सरकार ने पायलट चैनल के मसले पर चुप्पी साध ली। नतीजतन बिहार के पांच जिलों पर बाढ़ की आशंका गहरा गई है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार इस मामले को लेकर काफी परेशान हैं और उन्होंने इस आशंका को केंद्रीय जल संसाधन मंत्री को अवगत भी करा दिया, लेकिन नेपाल में संवैधानिक संकट उत्पन्न होने की वजह से फिलहाल इस दिशा में कोई खास प्रगति होने के आसार नहीं दिख रहे हैं।
दूसरी प्रमुख बात यह है कि नीतीश के लगातार मांग के बावजूद केंद्र सरकार राज्य को विशेष पैकेज देने की बात को अनसूना कर रहा है। पिछले दिनों पटना में आयोजित एक समारोह में नीतीश ने बिहार को विशेष राज्य का दर्जा दिलाने की मुहिम के तहत एक बार फिर मांग उठाई कि उन्हें केंद्र सरकार से और कुछ नहीं चाहिए, वह केवल सूबे को विशेष राज्य का दर्ज दे दे। इसके बिना प्रदेश में निजी पूंजी का निवेष नहीं हो सकेगा और बिना निवेश के सूबे के विकास की कल्पना बेमानी होगी। नीतीश ने इस बात पर जोर दिया कि बिहार परंपरागत रूप से पिछड़ा राज्य रहा है। यहां सार्वजनिक पूंजी का निवेश नहीं हो सका। समावेशी विकास और न्याय के साथ विकास का एजेंडा लेकर चल रहे हैं, लेकिन निजी पूंजी निवेश के बिना बड़े पैमाने पर राज्य का विकास संभव नहीं है। इथनॉल एवं कोयला लिंकेज संबंधी प्रस्ताव को भी केंद्र मान लेता तो प्रदेश इथनॉल हब के रूप में विकसित होता और बिजली की समस्या का बहुत हद तक समाधान हो जाता।
यह बात सही है कि विशेष राज्य का दर्जा मिलने से प्रदेश को कई सहूलियतें खुद ब खुद मिलने लगेंगी, मसलन केंद्रीय करों में रियायत मिलेगी जिससे निवेशक प्रदेश की ओर आकर्षित होंगे और पूंजी का निवेश हो सकेगा। दरअसल झारखंड के बिहार से अलग होने के बाद सारी खणिज संपदा वहां चली गई। इसके एवज में केंद्र की पूर्ववर्ती राजग सरकार ने समविकास राशि के रूप में प्रदेश को एक हजार करोड़ की राशि देने की व्यवस्था की गई थी। यह राशि बंद नहीं होनी चाहिए। नीतीश ने केंद्र सरकार से उड़ीसा सीमा के पास इंटीग्रेटेड पोर्ट बनाने की इजाजत भी मांगी है। मुख्यमंत्री का कहना है कि वह यह पोर्ट पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप में बनवाएंगे।
नीतीश के साथ सबसे बड़ी समस्या यह है कि उनकी जनता दल यू भाजपा के गठबंधन से बिहार में सरकार चला रही है। कांग्रेस लालू राज का खात्मा जरूर चाहती थी, लेकिन वह यह भी चाहती थी कि जो भी सरकार बिहार में बने वह कांग्रेस के सहयोग से बने। नीतीश या तो इस बात को समझ नहीं पाए या उन्होंने फिर राजधर्म निभाते हुए भाजपा का साथ नहीं छोड़। नीतीश को हो सकता है यह भी अंदेशा रहा होगा कि कांग्रेस के साथ जाने पर उसे सत्ता से हाथ न धोना पड़े। कांग्रेस नीतीश को भाजपा के साथ किसी सूरत में नहीं देखना चाहती, क्योंकि जब तक नीतीश के साथ भाजपा चिपकी रहेगी, सूबे में कांग्रेस का पनपना बेहद मुश्किल होगा। यह एक प्रमुख वजह है और इसीलिए केंद्र सरकार से जो मदद नीतीश सरकार को मिलनी चाहिए वह नहीं मिल पा रही है। केंद्र सरकार का कहना है कि जो देनदारी सूबे के लिए बनती है वह मिलती रहेगी। विशेष पैकेज या विषेष राज्य का दर्जा देने से वह लगातार कन्नी काट रही है। विदेषी पूंजी निवेश के लिए नीतीश ने हाल में भूटान और चीन की भी यात्रा की है, लेकिन अभी इस दिशा में कोई ठोस आश्वासन या पहल नहीं दिख रही। विदेशी पूंजी निवेश के पीछे भी कोई सकारात्मक पहल तभी हो पाएगी जब निवेशकों को केंद्र सरकार की हरी झंडी मिलेगी। नीतीश ने अपने पिछले कार्यकाल में कुछ अति लोकप्रिय योजनाओं को अंजाम दिया था जिसमें समग्र विद्यालय विकास कार्यक्रम के तहत मुख्यमंत्री बालक-बालिका साइकिल योजना, मुख्यमंत्री बालिका पोषाक योजना, मुख्यमंत्री अनुसूचित जाति जनजाति मेधावृति योजना के अलावा कन्या विवाह योजना, कन्या सुरक्षा योजना, सेतु योजना, ग्राम सड़क योजना आदि प्रमुख हैं। इसमें कोई शक नहीं कि इन योजनाओं को अंजाम देने की वजह से 2010 के विधानसभा चुनाव में नीतीश के गठबंधन को भारी जनसमर्थन मिला और लालू की राजद का पूरी तरह से सफाया हो गया, लेकिन अब धन के अभाव में उक्त तमाम लोकप्रिय और जनकल्याणकारी योजनाओं को जारी रखने में नीतीश सरकार को मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है।
इसमें कोई दो राय नहीं कि बिहार विकास के पथ पर अग्रसर है। यह सिर्फ नीतीश कुमार नहीं बोल रहे, पूरी दुनिया इस बात को स्वीकार कर रही है। बिहार देश का एक महत्वपूर्ण राज्य है और इस राज्य का विकास होगा तो देश इससे अछूता नहीं रहेगा। केंद्र सरकार को दलीय राजनीति के दलदल में सूबे के विकास को नहीं घसीटना चाहिए। जाहिर है आज केंद्र यदि बिहार को विशेष राज्य का दर्जा दे भी दे तो उसका श्रेय कांग्रेस को ही मिलेगा न कि नीतीष को। मनमोहन सिंह न सिर्फ देश के प्रधानमंत्री हैं, बल्कि एक अर्थशास्त्री भी है, इसलिए उन्हें अर्थशास्त्र के चश्मे से बिहार को देखना चाहिए और उसके विकास में सकारात्मक कदम उठाने चाहिए।

No comments: