Wednesday, 30 November 2011

बड़ी साज़िश का हिस्सा है मेमोगेट विवाद

पाकिस्तान की सियासत आज की तारीख में अगर किसी एक शब्द से सबसे अधिक भय खा रहा है तो वह शब्द हैमेमोगेट।पाकिस्तान के मेमोगेट से अमेरिका के वाटरगेट कांड की यादें कौंध जाती हैं। सत्तर के दशक में वाटरगेट कांड ने अमेरिका में राजनीतिक तूफान खड़ा कर दिया था। जून 1972 में डेमोकेट्रिक नेशनल कमेटी के वाटरगेट काम्पलेक्स स्थित मुख्यालय में प्रवेश के दौरान पांच लोग गिरफ्तार किए गए थे। एफबीआई ने खुलासा किया था कि इन लोगों को वर्ष 1972 में राष्ट्रपति का चुनाव करने वाली समिति के कोष से भुगतान किया गया था। तत्कालीन राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन के स्टाफ के आला अफसरों का नाम मामले में सामने आया। जांच में पता चला कि निक्सन ने रिकॉर्डिंग सिस्टम के जरिए अपने ऑफिस में कई लोगों की बातचीत टेप की थी। इस विवाद में निक्सन को राष्ट्रपति पद से इस्तीफा देना पड़ा था। कुछ ऐसा ही पाकिस्तान में इस समय घटित हो रहा है।

अमेरिका में पाकिस्तान के हाल तक राजदूत रहे हुसैन हक्कानी ने अपने मुल्क की फौज द्वारा नागरिक सरकार के तख्ता-पलट की आशंका को टालने के लिए अमेरिका से मदद की कथित गोपनीय गुहार लगाई थी। यह गुहार उस समय लगाई गई थी जब पाकिस्तान के ऐबटाबाद में घुसकर अमेरिका ने ओसामा बिन लादेन को मार गिराया था। उस लिखित गुहार के लिए ही ‘मेमोगेट’ शब्द का इस्तेमाल किया जा रहा है और पाकिस्तान के हुक्मरान को शक की नजरों से देखा जा रहा है। भारत के लिए भी यह चिंता का विषय है। वह इसलिए कि भारत-पाकिस्तान एक बार फिर से आतंकवाद और कश्मीर को लेकर सार्थक बातचीत की ओर कदम बढ़ा रहे थे जिसकी बुनियाद दक्षेश सम्मेलन में रखी गई थी।


मेमोगेट विवाद को लेकर इस समय पाकिस्तान में हर शख्स अपने-अपने तरीके से नतीजे की ओर पहुंच रहा है। सभी चिल्ला रहे हैं कि मुल्क के साथ विश्वासघात हुआ है। ऐसे में, मियां नवाज शरीफ के सुझाव काबिले-तारीफ है। उन्होंने कहा है कि इस मामले की उच्चस्तरीय जांच होनी चाहिए। यह एक जायज तरीका होगा। गोपनीय ज्ञापन की हकीकत को टटोले बिना किसी शख्स पर अंगुली उठाना ठीक नहीं है। हुकूमत को चाहिए कि वह विपक्ष को भरोसे में लेकर निष्पक्ष जांच कराए। वहीं दूसरी ओर पाकिस्तान में वरिष्ठ सुरक्षा अधिकारियों के अनुसार, उन्होंने मेमोगेट प्रकरण की जांच कर ली है। अधिकारियों को यक़ीन है कि ये मेमो राष्ट्रपति कार्यालय की ओर से था लेकिन ये साफ अभी नहीं है कि इसमें राष्ट्रपति जरदारी और राजदूत हक्कानी की कितनी भूमिका थी। अधिकारियों ने ये भी बताया कि हक्कानी ने सैनिक नेतृत्व के दबाव में इस्तीफा नहीं दिया। उनका कहना है कि इस्तीफ़ा पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय के दबाव में दिया गया है क्योंकि वहां कुछ अधिकारी मानते थे कि हक्कानी उनकी अवहेलना करते थे।


मेमोगेट (गुप्त ज्ञापन) का विवाद उस वक्त तूल पकड़ा जब ब्रिटिश समाचार पत्र फाइनेंशियल टाइम्स ने पाकिस्तानी मूल के अमरीकी व्यापारी मंसूर ऐजाज का एक लेख प्रकाशित किया, जिसमें पाकिस्तानी राजदूत हुसैन हक्कानी द्वारा अमरीकी सरकार को एक ज्ञापन सौंपे जाने का जिक्र है, ताकि पाकिस्तान में सेना द्वारा संभावित तख्तापलट को रोका जा सके। हुसैन हक्कानी ने हालांकि ऐसा कोई ज्ञापन दिए जाने से इनकार कर दिया था, लेकिन अमरीकी सेनाओं के प्रमुख माइकल मलेन ने ज्ञापन मिलने की पुष्टि की, साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि इसे उन्होंने गंभीरता से नहीं लिया। इस विवाद के गहराने के बाद हुसैन हक्कानी को इस्तीफा देना पड़ा। हुसैन हक्कानी अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के जानकार माने जाते हैं।


इतिहास गवाह है कि किसी एक शख्स या पार्टी के खिलाफ आंख मूंदकर नफरत करने के कारण पाकिस्तान ने हमेशा घातक नुकसान उठाए हैं। इस ‘हल्ला बोल’ माहौल में कट्टरपंथी एक तथ्य की अनदेखी कर रहे हैं। ‘मेमोगेट’ का मसला काफी हद तक अवाम-फौज संबंधों से जुड़ा है। अवाम और फौज के रिश्तों में विरोधाभास व असंतुलन का असर खास तौर पर नेताओं पर पड़ता है। यह एक ऐसी समस्या है, जो इस मुल्क में लगातार बनी हुई है और उसकी जद में तमाम सियासी पार्टियां हैं। फौज के कसते शिकंजे से पाकिस्तानी नेताओं के दम घुट रहे हैं। उन्हें इससे बाहर निकलने का कोई रास्ता नहीं सूझ रहा। यह पाकिस्तान की सबसे बड़ी समस्या है। आर्थिक संकट, अल्पसंख्यकों पर अत्याचार, जातीय संघर्ष, अंदरूनी और बाहरी दहशतगर्दी ये सभी इसी असंतुलन के नतीजे हैं।


पाकिस्तान के मौजू हालात पर गौर फरमाएं तो ये साफ है कि सरकार, सेना और आईएसआई के बीच आपसी सामंजस्य का भारी संकट है। सेना प्रमुख जनरल अशफाक कयानी उतने मजबूत नहीं हैं जितना आमतौर पर पाकिस्तानी सेना प्रमुख को माना जाता है। इसकी वजह भी है। सेना में एक धड़ा सरकार के पक्ष में है तो दूसरा धड़ा आईएसआई के पक्ष में बीन बजा रहा है। आतंकवाद के मुद्दे पर आईएसआई को सरकार की नीति रास नहीं आ रही है। सो आईएसआई सरकार विरोधी गतिविधियों में अपना ज्यादा वक्त जाया कर रहा है। तय मानिए कि कयानी की जगह सेना प्रमुख कोई जनरल परवेज मुशर्रफ जैसा होता तो आसिफ अली जरदारी के हाथ से सत्ता कबके छिन गई होती। हो न हो, मेमोगेट के पीछे आईएसआई का हाथ हो।


जहां से मैं देख रहा हूं, हालांकि इसके कोई साफ संकेत या प्रमाण नहीं हैं कि लंदन में निर्वासित जीवन जी रहे पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति जनरल परवेज मुशर्रफ और आईएसआई मिलकर पाकिस्तान में तख्तापलट की योजना को मूर्त रूप देने में लगे हों। अभी के हालात में अमेरिका को भी पाकिस्तानी हुक्मरान रास नहीं आ रहा सो बहुत हद तक इस बात की आशंका प्रबल है कि जनरल परवेज मुशर्रफ को अमेरिकी शह मिल रहा हो और पाकिस्तान में तख्तापलट के लिए जिस रिमोट को अमेरिका और आईएसआई ने मिलकर एसेंबल किया है उसको ऑपरेट करने की जिम्मेदारी मुशर्रफ को सौंपी गई हो। अतीत को याद करें तो आपको ध्यान होगा कि अमरीका ने जनरल मुशर्रफ़ के साथ गठबंधन कर आतंकवाद के ख़िलाफ़ जंग की शुरूआत की थी। इसलिए मेमोगेट प्रकरण में नवाज शरीफ की बातों को नजरंदाज करना जरदारी की सेहत के लिए ठीक नहीं होगा। पाकिस्तान सरकार इस मामले की निष्पक्ष जांच कराए और इस जांच के दायरे में परवेज मुशर्रफ और अमेरिका के बीच अगर कोई खिचड़ी पक रही है तो उन गतिविधियों को भी समेटने की कोशिश की जाए।


जहां तक कथित गुप्त ज्ञापन का सवाल है तो इससे कई सवाल उभरते हैं। मसलन 2 मई को ऐबटाबाद में अमरीकी सैनिकों की कार्रवाई में ओसामा बिन लादेन की मौत के बाद पाकिस्तानी सेना की काफ़ी आलोचना हो रही थी। उसका मनोबल कम हो रहा था और उसके लिए अपना बचाव करना मुश्किल हो रहा था। क्या ऐसे में सेना सत्ता पर क़ब्ज़ा करने का सोच सकती थी या कोई ऐसी योजना बना सकती थी? उन दिनों संसद और टीवी प्रोग्रामों में सबसे ज़्यादा सेना की आलोचना करने में मुस्लिम लीग नवाज़ के दोस्त आगे थे और पीपुल्स पार्टी वाले आईएसआई सहित सेना का हर मंच पर बचाव करते नजर आ रहे थे। ऐसे माहौल में सरकार को कैसे डर महसूस हो सकता था कि सेना तख़्ता पलट करने वाली है और उन्हें एडमिरल माइक मलेन से गुप्त रूप से मदद मांगनी चाहिए? अगर यह मान भी लें कि वह कथित संदेश अमरीकी सैन्य अधिकारी एडमिरल माइक मलेन को किसी आपात स्थिति में भेजा गया तो माइक मलेन के प्रवक्ता के मुताबिक़ उन्होंने उस संदिग्ध संदेश को महत्व क्यों नहीं दिया? चौथी बात ये कि अमरीका और पाकिस्तान के बीच ‘हॉट लाइन’ पर संपर्क बहाल है तो फिर मंसूर ऐजाज़ ख़ुद यह कथित संदेश सामने लाने पर मजबूर क्यों हुए? इसकी जानकारी एक विशेष मीडिया समूह के माध्यम से क्यों हुई? अगर यह सही है कि सेना सरकार का तख़्ता पलट करने वाली थी तो क्या उस बात की भी जांच होनी चाहिए कि ऐसा था भी या नहीं?


इसके अलावा मीडिया में मंसूर ऐजाज़ के जो बयान सामने आ रहे हैं उसमें भी काफ़ी विरोधाभास है। सबसे पहले उनका बयान आया कि राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी के कहने पर हुसैन हक्कानी की मंजूरी से उन्होंने यह कथित संदेश माइक मलेन को भेजा। बाद में उनकी ओर से बयान आया कि कथित संदेश हुसैन हक्कानी ने नहीं लिखा था, बल्कि उनकी टेलीफोन पर हुई बातचीत के बाद उन्होंने खुद लिखा था। अब जो ताजा बयान सामने आ रहा है उसके मुताबिक मंसूर ऐजाज कहते हैं कि उस कथित संदेश के बारे में राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी को पता नहीं है। ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि मंसूर ऐजाज के किस बयान पर भरोसा किया जाए?


इसलिए बेहतर यही होगा कि पाकिस्तान की सरकार और विपक्ष संयुक्त रूप से यह तय करें कि इस मुद्दे की जांच किससे करानी चाहिए और असल तथ्यों तक कैसे पहुंचा जाए? इस बात की भी परख होनी जरूरी है कि मेमोगेट विवाद का लाभ लेने वाले कौन लोग हैं? पाकिस्तानी हुक्मरान के लिए यही एक समयोचित रास्ता है जो पाकिस्तान में अस्थिरता पैदा करने की एक बड़ी साजिश का हिस्सा मेमोगेट विवाद की हकीकत को उजागर कर सकता है।

Wednesday, 23 November 2011

चुनौतियों के बीच संसद का शीतकालीन सत्र

पूरे देश की निगाहें संसद में 21 दिन तक चलने वाले शीतकालीन सत्र पर टिकी हैं। संसद का शीत सत्र तो हर साल आता है, लेकिन इस बार का शीत सत्र कई मायनों में खास है। क्योंकि इस शीत सत्र में एक आम आदमी के भूख, उसकी बेबसी और लाचारी को लेकर फैसला जो होना है। खाद्य सुरक्षा, लोकपाल और कालाधन को लेकर संसद के इस सत्र में सरकार कुछ महत्वपूर्ण फैसले ले सकती है। इसमें से खाद्य सुरक्षा और कालाधन दो ऐसे मुद्दे हैं जिनपर संसद का मौन टूट सकता है। साथ ही कैश फॉर वोट, 2जी स्पेक्ट्रम और महंगाई तीन ऐसे मुद्दे है जिसपर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तकरार होना तय है।


अक्सर जब हम संसद और आम आदमी की बात करते हैं तो जनकवि धूमिल का याद आ जाती है। साठ के दशक में जब जनकवि धूमिल अपने गृहस्थ जीवन में थे तभी एक आम आदमी की भूख, बेबसी और लाचारी मानो उनके नेत्रों के आगे खुलकर सामने आ गई थी। अनाज की जमाखोरी के पीछे की राजनीति उनकी पैनी दृष्टि से बच नहीं पायी। धूमिल का मानना था कि अनाज की कमी वास्तविक नहीं, बल्कि स्वार्थ की राजनीति से प्रेरित है। जमाखोरी को सरकारी नीति से बढ़ावा मिलता है। उस जमाखोरी से बचने का देश में कोई प्रयास न होता देख धूमिल ने जन भावनाओं की करुण गाथा को ‘संसद और रोटी’ शीर्षक से कविता के रूप में कागज पर उकेरा-

‘एक आदमी रोटी बेलता है,
एक आदमी रोटी खाता है,
एक तीसरा आदमी भी है,
जो न रोटी बेलता है न रोटी खाता है,
वह सिर्फ रोटी से खेलता है,
मैं पूछता हूं यह तीसरा आदमी कौन है?
मेरे देश की संसद मौन है।’

रोटी से खेलने वाले तीसरे आदमी को लेकर आजाद भारत की संसद वाकई मौन रही है। अगर संसद मौन नहीं रहती तो खाद्य सुरक्षा का बिल लाने में छह दशक का समय नहीं लगता। जब संसद को लगा कि जनता सब कुछ जान चुकी है तो आनन-फानन में खाद्य सुरक्षा बिल को तैयार किया गया और अब उसे संसद के शीतकालीन सत्र में पेश करने की बात कही जा रही है। हालांकि दावे के साथ हम यह नहीं कह सकते कि सबको भोजन देने की गारंटी वाला यह बिल संसद में पारित हो जाएगा, लेकिन इस बिल को लेकर चूंकि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी का अपना गणित है, सो उम्मीद जताई जा रही है कि लोकपाल बिल या महिला आरक्षण बिल जैसा हश्र इस बिल का नहीं होगा।


दरअसल कांग्रेस देश की जनता को यह संदेश देना चाहती है कि सबको सूचना का हक और शिक्षा का हक देने वाली कांग्रेस नीत यूपीए की सरकार ही सबको भोजन का अधिकार दे सकती है। निश्चित रूप से सरकार और कांग्रेस की यह मंशा काबिलेतारीफ है, लेकिन यक्ष प्रश्न यह है कि रोटी जैसी बुनियादी समस्या को सुलझाने में देश की सरकारों खासकर कांग्रेस नीत सरकारों को इतना वक्त क्यों लगा? इसका जवाब हमारी संसद के पास भी नहीं है। इससे ज्यादा शर्मनाक इस देश के लिए और कुछ नहीं हो सकता है कि आजादी के छह दशकों में भूख से मौत या सबको भरपेट खाना मिल रहा है या नहीं, देश की संसद के लिए राष्ट्रीय बहस का मुद्दा नहीं बन पाया।


हम आगे बढ़ते हैं। विदेशी बैंकों में जमा देश के कालेधन को लेकर भी संसद अब तक मौन रही है। अब जब कि जनता जान चुकी है कि यदि यह कालाधन देश में वापस आ जाए तो हर आदमी लखपति हो सकता है, भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी ने अपनी जनचेतना यात्रा को कालेधन पर फोकस कर दिया। देखना है इस मुद्दे पर संसद क्या रूख अपनाता है। इस संबंध में भाजपा के वरिष्ठ नेता और पूर्व उप प्रधान मंत्री लालकृष्ण आडवाणी का बयान गौर करने लायक है, ‘सरकार हर मुद्दे पर संसद में चर्चा कराती है, लेकिन कालेधन के मुद्दे पर अब तक चर्चा नहीं हुई है। ऐसा क्यों नहीं हुआ है इसका उत्तर सरकार को देना होगा। अब यह बात भी सामने आ गई है कि तीन सांसदों के खाते भी विदेशी बैंकों में हैं। मुझे नहीं पता कि ये कौन सांसद हैं, लेकिन सरकार को इसका खुलासा करना चाहिए। मेरी जनचेतना यात्रा समाप्त हो चुकी है। 22 नवंबर से संसद का शीतकालीन सत्र शुरू हो रहा है। इस मुद्दे पर हम प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को कटघरे में खड़ा करेंगे। कालेधन के मुद्दे पर उन्हें जवाब देना होगा।’


42 साल से लोकपाल बिल को लेकर भी संसद किसी नतीजे पर नहीं पहुंच पाई है। भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना हजारे की पहल पर देश जागा और जन आक्रोश की तपिश से जब यूपीए सरकार को झुलसने का खतरा दिखा तो आनन-फानन में शीतकालीन सत्र में लोकपाल बिल लाने पर तैयार हुई। लोकपाल को लेकर सुप्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता और गांधीवादी अन्ना हजारे अभी भी सरकार को संदेह की नजरों से देख रहे हैं। शायद इसीलिए अपना मौन व्रत तोड़ने से पहले उन्होंने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को चिट्ठी लिखी, ‘आपकी पार्टी और सरकार के कई लोग उलट-पलट बातें कर संदेह पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं। अगर शीतकालीन सत्र में जन लोकपाल पास नहीं हुआ तो सत्र के आखिरी दिन से अनशन को दोबारा शुरू कर दिया जाएगा और टीम अन्ना भी कई राज्यों में दौरे पर निकल जाएगी जो पांच राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनावों में लोगों से अपील करेगी कि वे अपना वोट सदाचारी व्यक्ति को ही दें, भ्रष्ट और गुंड़ों को वोट न दें।’


अन्ना की चिट्ठी पर सरकार के कई मंत्री आक्रामक हो गए। वह ऐसे बोलने लगे जैसे कांग्रेस के प्रवक्ता हों। कानून मंत्री सलमान खुर्शीद ने बयान जारी करते हुए कहा, ‘अगले चुनाव में क्या होगा इस बारे में किसी की राय पर हम कोई प्रतिक्रिया व्यक्त करने नहीं जा रहे हैं। यह उनका निर्णय है। हर नागरिक किसी को वोट देने के लिए स्वतंत्र है। कांग्रेस सिर्फ अपना काम करेगी, अपने कर्तव्य का निर्वाह करेगी और जब कर्तव्य पूरा हो जाएगा तो कांग्रेस फिर जनता के बीच जाएगी। फैसला जनता करेगी। हमने कहा है कि अगले सत्र में हम न सिर्फ एक विधेयक (लोकपाल) ला रहे हैं बल्कि कई और विधेयक भी लाने वाले हैं।’


केंद्रीय कार्मिक मामलों के राज्यमंत्री वी. नारायणसामी ने कहा, ‘स्थायी समिति ने लोकपाल विधेयक के प्रारूपों को परखने का कार्य पूरा कर लिया है। सिफारिशें तैयार करने का कार्य अंतिम चरण में है। इस विधेयक को संसद के शीतकालीन सत्र में लाना हमारी प्रतिबद्धता है। इस विधेयक के लिए हम सभी राजनीतिक दलों और सांसदों का हम समर्थन चाहते हैं।’


इन मंत्रियों के बयान से इतर देखें तो माजरा कुछ और ही लगता है। लोकपाल विधेयक पर गौर कर रही संसद की स्थायी समिति के कार्यकाल को एक महीने यानी 7 दिसंबर तक के लिए विस्तार दे दिया गया है। ऐसे में अब सवाल उठने लगा है कि 21 दिसंबर तक चलने वाले सत्र में क्या लोकपाल बिल पास हो पाएगा। सरकार भी संसद में इस विधेयक को तभी पेश कर सकती है जब स्थायी समिति अपनी सिफारिशें पेश करेगी। अगर समिति 7 दिसंबर को अपनी रिपोर्ट पेश करती है तो संसद के शीतकालीन सत्र के बाकी बचे दो हफ्ते में यह बिल संसद में पेश होकर पास हो पाएगा, यह बड़ा सवाल है।


नेता प्रतिपक्ष सुषमा स्वराज अलग ही राग अलाप रही हैं। माइक्रो ब्लागिंग वेबसाइट ट्विटर पर सुषमा ने लिखा, ‘संसद का शीतकालीन सत्र 22 नवंबर को शुरू होने जा रहा है। मैंने तेलंगाना और बढ़ती मंहगाई पर चर्चा के लिए नोटिस दिया है। लोकसभा में मेरी पार्टी के साथी भ्रष्टाचार, कालाधन, मणिपुर में चल रही नाकेबंदी, केंद्र-राज्य संबंध, कश्मीर, भारत-पाक संबंधों और अन्य महत्वपूर्ण मुद्दों पर नोटिस दाखिल कर रहे हैं। सशस्त्र बल विशेषाधिकार अधिनियम (एएफएसपीए) को लेकर उठे विवाद पर अलग से चर्चा कराने की मांग भाजपा करेगी।’ भाजपा के एजेंडे में लोकपाल शब्द नहीं है, न ही खाद्य सुरक्षा बिल और महिला आरक्षण बिल को लेकर पार्टी की ओर से कोई गारंटी दी है।


22 नवम्बर से शुरू हुआ संसद का यह शीतकालीन सत्र 21 दिसम्बर तक चलेगा। महीने भर चलने वाले इस सत्र के दौरान कुल 21 बैठकें होंगी। वामदल और भाजपा संसद में एक बार फिर 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले को उठाने का प्रयास करेंगे। इस मामले में गृह मंत्री पी. चिदंबरम के इस्तीफे की मांग की जा रही है। कैश फॉर वोट पर भी भाजपा यूपीए सरकार को घेरने का भरपूर प्रयास करेगी। कालाधन के मुद्दे पर आडवाणी अपना तेवर सत्र के शुरू होने से पहले जनचेतना यात्रा के समापन समारोह के दौरान रामलीला मैदान में दिखा चुके हैं। कहने का मतलब यह कि संसद का शीतकालीन सत्र-2011 भी हंगामे की भेंट चढ़ सकता है। यदि ऐसा हुआ तो फिर संसदीय कार्य मंत्री पवन कुमार बंसल सत्र के दौरान जिन 31 विधेयकों पर चर्चा कराकर उसे पारित कराने की बात कह रहे हैं कैसे संभव हो पाएगा। जबकि इन विधेयकों में कुछ अति महत्वपूर्ण न्यायिक जवाबदेही बिल, महिला आरक्षण बिल, व्हिसल ब्लोअर बिल, पेशन कोष नियामक बिल, राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा बिल और उपभोक्ता संरक्षण संशोधन बिल शामिल हैं।


बहरहाल, देश की जनता भ्रष्टाचार मुक्त भारत का निर्माण चाहती है। जनता चाहती है कि संसद इस दिशा में अपनी भूमिका निभाए। सरकारी प्रयासों से लोगों का भरोसा उठ चुका है और इसीलिए वह अन्ना हजारे के जनलोकपाल में आस्था जता रही है। लेकिन सरकार की आस्था जनलोकपाल बिल में नहीं है। सो इसकी उम्मीद कम ही दिखती है कि जो लोकपाल कानून सरकार लाएगी वह भ्रष्टाचार मुक्त भारत का निर्माण कर पाएगी। चूंकि भ्रष्टाचार तमाम समस्याओं की जड़ है, इसलिए संसद को हर हाल में सूरत ऐसी बनानी ही होगी जिसमें एक आम आदमी गुजारा कर सके। अगर ऐसा नहीं हो सका तो आम आदमी संसद की सूरत बदलने को बाध्य होगा।

Wednesday, 16 November 2011

सियासी यात्राओं में बिसरता आम आदमी

भारतवर्ष में यात्रा का इतिहास काफी पुराना है, लेकिन हम यहां सियासी यात्रा की बात कर रहे हैं। देश में इस समय एक दर्जन से अधिक सियासी यात्राएं चल रही हैं। कुछ यात्राएं तथाकथित संत भी कर रहे हैं, लेकिन उनकी यात्रा भी पूरी तरह से राजनीति से प्रेरित है, ये भी सियासी यात्रा है मसलन बाबा रामदेव की भारत स्वाभिमान यात्रा और श्रीश्री रविशंकर की भ्रष्टाचार के खिलाफ यात्रा। अगर वर्ष 2011 को भारत में 'सियासी यात्रा वर्ष' घोषित कर दिया जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। मुझे लगता है कि सियासी यात्राओं के इतिहास में एक वर्ष में इतनी यात्राएं कभी नहीं हुई होंगी। इस सबके बीच बड़ा सवाल यह खड़ा होता है कि संत, महात्मा और नेता यात्राएं क्यों करते हैं? सवाल जितना आसान दिखता है, जवाब उतना ही दुरुह। क्योंकि यात्राओं की अवधारणा में भी समय के साथ बदलाव आया है। जहां तक मैं समझता हूं और यही सही भी है कि यात्राओं के मकसद को समय के साथ बदला नहीं जा सकता है। यात्राएं हमेशा 'आम आदमी' की भलाई के लिए ही की जाती हैं। लेकिन आज के सियासी यात्राओं का 'आम आदमी की भलाई' का दर्शन कुछ अलग तरीके का हो गया है। शायद इसीलिए आज की सियासी यात्राओं में आम आदमी बिसर रहा है। ऐसा नहीं होना चाहिए, इसलिए यहां यह जानना जरूरी होगा कि सदियों से चली रही यात्राएं किस तरह से आम आदमी के लिए प्रतिफलित होती रही हैं।


भारतीय सभ्यता के हजारों वर्षों के इतिहास में यात्राओं की एक लंबी परंपरा रही है। इस परंपरा के एक छोर पर महात्मा बुद्ध खड़े हैं तो दूसरे छोर पर महात्मा गांधी और फिर स्वतंत्र भारत की अन्य यात्राएं जिसमें जयप्रकाश नारायण, विश्वनाथ प्रताप सिंह और लालकृष्ण आडवाणी की देशव्यापी यात्राएं शामिल हैं। यहां इन यात्राओं को आजादी से पहले और आजादी के बाद दो भागों में बांटकर तब और अब में फर्क महसूस करना जरूरी होगा। बुद्ध यानी गौतम बुद्ध की यात्रा राजमहल और राजधानियों से झोपड़ी और गांवों तक की यात्रा थी। नितांत मानवीय और प्रगतिशील। बुद्ध ने धर्म और दर्शन को मानवीय दुखों एवं सामाजिक असमानताओं को समाप्त करने का माध्यम बनाया। बुद्ध के दर्शन और यात्राओं से प्रभावित होकर मौर्य शासक अशोक ने एक लंबा समय यात्राओं में व्यतीत किया। इससे वह आम आदमी के संपर्क में आ सका और शासन को मानवीय शक्ल देने में सफल हुआ। मध्यकालीन भारत में शंकराचार्य एक महान धार्मिक व्यक्तित्व के रूप में सामने आए। उन्होंने यात्रा और शास्त्रार्थ के माध्यम से धर्म के कर्मकांडीय स्वरूप पर गहरी चोट की। व्यक्ति की आत्मा और परमात्मा में सहज संबंध स्थापित करके शंकर ने धार्मिक संप्रदायों के विभेद को मिटाने का प्रयास किया और समाज को एकजुट किया।


आधुनिक काल में भारत ने दासता की जंजीरों के साथ प्रवेश किया। 20वीं सदी के प्रारंभ से ब्रिटिश उपनिवेशवाद के विरुद्ध भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में सबसे प्रखर व्यक्तित्व महात्मा गांधी के रूप में सामने आए। अंग्रेजी सरकार के विरुद्ध एक प्रबल जनान्दोलन खड़ा करने के लिए गांधी ने पूरे भारत में लंबी यात्राएं की। जनमानस की शक्ति और कमजोरियों की जांच पड़ताल की। और फिर इस जननायक ने सहज ही देश की आम जनता अर्थात किसानों, मजदूरों, युवाओं और स्त्रियों को राष्ट्रीय आंदोलन की मुख्य शक्ति बना दिया।


1920-21 में असहयोग आंदोलन के दौरान अली भाइयों के साथ पूरे देश की यात्रा की। इसी प्रकार 1930 में अहमदाबाद से दांडी तक की 240 मील की यात्रा संपन्न हुई। दांडी मार्च स्वतंत्रता संग्राम का वह मोड़ सिद्ध हुआ, जहां से देश ने स्वतंत्रता मिलने तक पीछे मुड़कर नहीं देखा। 1932 में गांधी जी ने वर्धा आश्रम से हरिजन यात्रा प्रारंभ की और नौ महीनों तक पूरे देश में छुआछूत उन्मूलन के लिए जबरदस्त प्रचार किया। अंत में स्वतंत्रता की पूर्व संध्या पर बंगाल और बिहार के दंगाग्रस्त इलाकों में शांति की अपील करती हुई गांधीजी की यात्राएं इतिहास की अविस्मरणीय निधि बन गई।


आजादी के बाद सर्वोदय से अलग होकर जयप्रकाश नारायण ने सत्तर के दशक में संपूर्ण क्रांति का आह्नान किया। भ्रष्टाचार और कुशासन के विरूद्ध युवाओं का यह आंदोलन 1973 में गुजरात से प्रारंभ होकर सन् 74 में बिहार पहुंचा और फिर पूरे देश में छा गया। इस बीच जयप्रकाश ने तुफानी यात्राएं की। यद्यपि अपने परिणामों में यह आंदोलन लक्ष्यहीन और अल्पजीवी सिद्ध हुआ। फिर भी इसने वैकल्पिक सरकार की संकल्पना को जरूर साकार किया। 1989-90 में वी.पी. सिंह के नेतृत्व में राष्ट्रीय मोर्चा की सरकार का गठन इसी आंदोलन के नक्शे कदम पर ही संपन्न हुआ। यहीं से यात्राओं का स्वरूप बदला और यह आम आदमी की भलाई से दलगत राजनीति की भलाई में परिवर्तित हो गया।


भारतीय राजनीति में 90 के दशक का प्रारंभ कई मायनों में निर्णायक सिद्ध हुआ। सन् 1989 के लोकसभा चुनावों में भाजपा एक प्रमुख दल के रूप में उभरी और राष्ट्रीय मोर्चा सरकार को बाहर से समर्थन दिया। इसी समय भाजपा अध्यक्ष लालकृष्ण आडवाणी ने राम मंदिर आंदोलन को केन्द्र में रखकर सोमनाथ से अयोध्या तक की अपनी रथयात्रा की घोषणा की। भारतीय राजनीति की दशा और दिशा पर इस यात्रा का गहरा प्रभाव पड़ा। जैसे-जैसे यह यात्रा आगे बढ़ती गई देश का राजनीतिक तापमान बढ़ता गया। बिहार में इस रथयात्रा को रोके जाने तक भाजपा की लोकप्रियता और जनाधार में कई गुना इजाफा हो चुका था। अगले लोकसभा चुनाव में भाजपा न सिर्फ प्रमुख विपक्षी दल के रूप में उभरी, बल्कि जनमानस में इसने स्वयं को कांग्रेस के विकल्प के रूप में स्थापित कर लिया। इसके बाद से लेकर अभी तक आडवाणी ही एक ऐसे राजनीतिक यात्री रहे जिन्होंने भाजपा की बरकत कहिए या फिर अपने ऊपर से 'पीएम इन वेटिंग' का तमगा हटाने के लिए समय-समय पर देशव्यापी यात्राओं पर निकलते रहे। इन दिनों भी आडवाणी देश में भ्रष्टाचार मिटाने के लिए जनचेतना यात्रा पर निकले हुए हैं और घूम-घूमकर जनता को बता रहे हैं कि देश में सुशासन भाजपा के राज में ही संभव है। आडवाणी की जनचेतना यात्रा का और विश्लेषण करने की शायद जरूरत नहीं क्योंकि इसे आप हर दिन न्यूज चैनल पर देख रहे होंगे। मैं यहां वर्ष 2011 में 12 सियासी यात्राओं का संक्षेप में उल्लेख कर रहा हूं जिसका तुलनात्मक आंकलन कर निष्कर्ष पर पहुंचना आप पर है कि ये तमाम यात्राएं आम आदमी के लिए है या फिर यात्री खुद का भविष्य संवारने के लिए जनता के पैसे से लाव-लश्कर के साथ निकले हैं।


लालकृष्ण आडवाणी : 11 अक्तूबर को आडवाणी ने अपनी छठी राजनीतिक यात्रा की शुरुआत जयप्रकाश नारायण की जन्मस्थली सिताबदियारा से की है। आडवाणी इससे पहले पांच यात्राएं-1990 में राम रथ यात्रा, 1993 में जनादेश यात्रा, 1997 में स्वर्ण जयंती यात्रा, 2004 में भारत उदय यात्रा और 2006 में भारत सुरक्षा यात्रा कर चुके हैं।

नीतीश कुमार : बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार नवंबर के पहले सप्ताह में अपनी छठी ‘सेवा यात्रा’ महात्मा गांधी के सत्याग्रह की धरती चंपारण से शुरू करने वाले हैं। नीतीश चार माह में बिहार के सभी 38 जिलों की यात्रा कर अपनी सेवा का अहसास कराएंगे। नीतीश कुमार भी न्याय यात्रा, विकास यात्रा, धन्यवाद यात्रा, प्रवास यात्रा, विश्वास यात्रा नाम की पांच राजनीतिक यात्रा कर चुके हैं।

बाबा रामदेव : योग गुरु बाबा रामदेव ने अपनी 10 हजार किलोमीटर की भारत स्वाभिमान यात्रा झांसी की रानी लक्ष्मीबाई की कर्मभूमि से 20 सितंबर से शुरू की है। बाबा रामदेव देश से बाहर जमा काला धन वापस लाने के अपने प्रण को बार-बार दोहरा रहे हैं। यह प्रयाग (उत्तरप्रदेश) में खत्म होगी।

श्रीश्री रविशंकर : आध्यात्मिक गुरु श्रीश्री रविशंकर भ्रष्टाचार के खिलाफ सात नवंबर से उस उत्तर प्रदेश की यात्रा पर हैं जहां अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं। 11 नवंबर तक जारी रहने वाले इस दौरे में वह जौनपुर, चंदौली, सोनभद्र मिर्जापुर और सुल्तानपुर में आयोजित कार्यक्रमों में न सिर्फ आम लोगों के साथ सत्संग करेंगे बल्कि उन्हें घूस न लेने, दहेज न लेने, भ्रष्टाचार के खिलाफ ल़डने और शिक्षा का उजियारा फैलाने की शपथ भी दिलाएंगे।

राहुल गांधी : कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी टीम अन्ना को जवाब देने के लिए उत्तर प्रदेश में चुनावी यात्रा करेंगे। जानकारों के मुताबिक राहुल गांधी 14 नवम्बर से व्यापक जन संपर्क यात्रा कर रहे हैं। ये यात्रा दस दिनों की होगी।

अन्ना हजारे : सुप्रसिद्ध गांधीवादी अन्ना हजारे एक मजबूत जनलोकपाल कानून के लिए जल्द ही देशव्यापी यात्रा पर निकलने वाले हैं। शायद अन्ना संसद के शीतकालीन सत्र का इंतजार करेंगे और उसके बाद यात्रा की कोई तारीख तय होगी।

नरेंद्र मोदी : 17-19 सितंबर को तीन दिवसीय सद्भावना उपवास के बाद गुजरात के सीएम नरेंद्र मोदी प्रदेश में लगातार सद्भावना यात्रा कर रहे हैं। जल्द ही वह देशव्यापी यात्रा भी करेंगे और अपनी राष्ट्रीय छवि बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ेंगे। उनकी नजर दिल्ली की गद्दी पर है। शायद वह आडवाणी की यात्रा के समाप्त होने का इंतजार कर रहे हैं।

राजनाथ सिंह : उत्तर प्रदेश को विकासयुक्त और भ्रष्टाचारमुक्त बनाने के नारे के साथ 'जन स्वाभिमान यात्रा' दो चरणों में पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह के नेतृत्व में मथुरा से 13 अक्टूबर को शुरू हुई। राजनाथ पूर्वी यूपी के 34 जिलों की यात्रा करेंगे।

कलराज मिश्रा : राजनाथ की तर्ज पर वाराणसी से शुरू हुई यात्रा की अगुवाई उत्तर प्रदेश के वरिष्ठ भाजपा नेता कलराज मिश्रा ने किया। लक्ष्य इनका भी माया सरकार को हिलाना है ना कि प्रदेश को विकास की पटरी पर लाना। कलराज 27 जनपदों की यात्रा करेंगे।

उमा भारती : भाजपा नेता उमा भारती ने गाजियाबाद जिले के गढ़मुक्तेश्वर से गंगा बचाओ अभियान की शुरुआत की। उत्तर प्रदेश, बिहार और बंगाल में जिन जगहों से गंगा गुज़रती है, उमा भारती उसी से लगे रास्ते से गुज़रेंगी और सभाओं को संबोधित करेंगी।

अखिलेश यादव : जनता को पार्टी की नीतियों से जोड़कर आगामी चुनाव में जीत के इरादे को आधार देने के लिए सपा के प्रदेश अध्यक्ष अखिलेश यादव ने बसपा के खिलाफ क्रांति रथयात्रा निकाली। 12 सितंबर से शुरू हुई यह यात्रा 24 सितंबर को समाप्त हुई।

अमर सिंह : लोकमंच पार्टी सुप्रीमो अमर सिंह ने सोमवार को उत्तर प्रदेश के बलिया से पूर्वांचल स्वाभिमान यात्रा के दूसरे चरण की शुरुआत की। यह पदयात्रा 17 जनवरी 2011 को बलिया से शुरू हुई जो 1 फरवरी को चंदौली में समाप्त हुई।

Monday, 7 November 2011

भाजपा में पीएम पद की कुश्ती

लोकसभा चुनाव-2014 में करीब ढाई साल का वक्त अभी बाकी है लेकिन भाजपा में प्रधानमंत्री की कुर्सी के लेकर जंग तेज हो गई है। आडवाणी और मोदी समेत दौड़ में आधा दर्जन से अधिक दिग्गज शामिल हैं। नितिन गडकरी भी लोकसभा चुनाव लड़ने की घोषणा कर चुके हैं और यशवंत सिन्हा भी राग अलापने लगे हैं कि वह ही प्रधानमंत्री पद के असली दावेदार हैं। लेकिन फिलहाल खुलकर मैदान में दो ही नेता सामने आए हैं। उनमें से भी एक को बुलाकर संघ मुख्यालय के मुखिया ने समझा दिया कि आप देश की जनता को बता दीजिये कि हम प्रधानमंत्री की रेस में नहीं हैं। अब वो कहां मानने वाले। शतरंज की बिसात पर एक चाल उन्होंने चल दी है जिससे बाजी काफी उलझ सी गई है। लेकिन उसे सुलझाना तो पड़ेगा ही।

राजनाथ सिंह से शुरू करते हैं। कुछ दिन पहले उत्तर प्रदेश में दो यात्राएं घोषित की गई थीं। एक यात्रा कलराज मिश्र ने घोषित की और दूसरी राजनाथ सिंह ने। कलराज मिश्र की यात्रा का उद्देश्य सा़फ है कि वह उत्तर प्रदेश के निर्विवाद मुख्यमंत्री बनना चाहते हैं, लेकिन रहस्यमय है राजनाथ सिंह की यात्रा की घोषणा। राजनाथ सिंह ने अपने साथ उमा भारती को मिला लिया और एक यात्रा घोषित कर दी। राजनाथ सिंह अभी से एकछत्र राष्ट्रीय नेता की छवि बनाना चाहते हैं, ताकि वह प्रधानमंत्री पद पर अपना दावा कर सकें।

राजनाथ सिंह की मंशा का जब गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को पता चला तो अमेरिकी सीनेट में प्रस्तुत की गई एक स्टडी ग्रुप की रिपोर्ट को अमेरिकी सरकार की राय बता खुद को भावी प्रधानमंत्री पद का सशक्त दावेदार घोषित कर दिया। नरेंद्र मोदी का मीडिया मैनेजमेंट इसमें काम आया। अन्ना हज़ारे की तर्ज पर अपने जन्मदिन पर तीन दिन के उपवास की घोषणा कर दी। 17-19 सितंबर तक अहमदाबाद स्थित गुजरात विवि के भव्य हॉल में आयोजित सद्भावना उपवास के लिए मोदी ने करोड़ों रुपये पानी की तरह बहा दिये। इस सबके बीच इमाम साहब की टोपी भी उछली और मोदी ने इमाम साहब को नाराज कर दिया उनकी भेंट की गई टोपी को न पहनकर। कुल मिलाकर उपवास का मकसद अपने अंजाम तक नहीं पहुंच सका।

अब आते हैं लालकृष्ण आडवाणी पर। पिछली चार जून को बाबा रामदेव के ऊपर रामलीला मैदान में सरकारी हमला हुआ और उनका अनशन सरकार ने जबरदस्ती समाप्त करा दिया। विश्वस्त सूत्रों के मुताबिक, उसी व़क्त यानी 4 जून को संघ के सर्वोच्च नेतृत्व ने आडवाणी जी से कहा कि वह कल यानी 5 जून को लोकसभा से त्यागपत्र दे दें और भ्रष्टाचार के ख़िला़फ एक यात्रा निकालें। आडवाणी जी ने इसे बचकानी सलाह की संज्ञा दी और अनदेखा कर दिया। लेकिन जब अन्ना हजारे ने अनशन किया और उनके समर्थन में देश में भूचाल आ गया तो आडवाणी जी को लगा कि उनसे चूक हो गई। उन्होंने अचानक लोकसभा से बाहर आकर पत्रकारों के सामने भ्रष्टाचार के खिलाफ यात्रा की घोषणा कर दी। आडवाणी जी ने न संघ से राय-मशविरा किया और न ही पार्टी से ही राय ली। 11 अक्टूबर को जेपी की जन्मभूमि बिहार के सिताबदियारा में मोदी के धुर विरोधी नीतीश कुमार ने आडवाणी की
जनचेतना रथयात्रा को हरी झंडी दिखाई। यात्रा जब 6 नवंबर को गुजरात में दाखिल हुई तो मोदी और आडवाणी और मोदी के बीच कुर्सियों का फासला दिख ही गया।

नरेंद्र मोदी और राजनाथ सिंह का मानना है कि आडवाणी जी के साथ न संघ है और न ही पार्टी तथा उनकी उम्र भी उन्हें अब ज़्यादा काम नहीं करने देगी, लिहाज़ा उन्हें महत्व न दिया जाए। फिर दोनों को लगने लगा कि प्रधानमंत्री पद के संघर्ष में आख़िरी मुक़ाबला उन्हीं के बीच होगा। हालांकि दो उम्मीदवार अभी और भी हैं, सुषमा स्वराज और अरुण जेटली। दोनों ही नेता ख़ामोशी से पत्ते खेलने में माहिर हैं। लेकिन कुछ भी हो, पुराना चावल तो पुराना ही होता है। आडवाणी जी ने नीतीश को साध लिया है और अंतिम समय में वह नीतीश कार्ड खेल सकते हैं। कहने का मतलब यह कि आडवाणी भले ही पीएम इन वेटिंग ही रिटायर्ड हो जाएं, लेकिन मोदी प्रधानमंत्री न बन पाएं।

भाजपा में कुछ इस तरह का खेल चल रहा है कि सब अपनी-अपनी डपली, अपना-अपना राग अलाप रहे हैं। ऐसे में संघ परिवार की भूमिका बढ़ जाती है। संघ हमेशा से हिन्दुत्व की लाइन पर अपना एजेंडा तय करता है। अब भाजपा में प्रधानमंत्री पद के लिए जो भी पांच छह उम्मीदवार सामने आ रहे हैं उनमें से संघ की लाइन पर नरेद्र मोदी ही फिट बैठ रहे हैं। शायद इसीलिए संघ मुख्यालय नागपुर में जब आडवाणी जी मत्था टेकने गए थे तो मोहन
भागवत ने उन्हें समझाने की कोशिश की थी कि वो मोदी का समर्थन न करे, लेकिन अपनी दावेदारी कम से कम वापस ले लें। हठी आडवाणी मुख्यालय से बाहर निकले और कुछ इस अंदाज में बातों को बयां कर गए कि समझने वाले समझ गए और जो न समझे वो अनाड़ी।

आडवाणी की रथयात्रा अपने अंतिम चरण में चल रही है। उम्मीद जताई जा रही है कि संसद के शीतकालीन सत्र के शुरू होने से पहले वह यात्रा समाप्त कर वापस आ जाएंगे। और भाजपा में प्रधानंत्री पद की असली रेस तब ही शुरू होगी। तब तक भाजपा और संघ दोनों के लिए तय करना आसान हो जाएगा कि कौन कितने पानी में है?