लोकसभा चुनाव-2014 में करीब ढाई साल का वक्त अभी बाकी है लेकिन भाजपा में प्रधानमंत्री की कुर्सी के लेकर जंग तेज हो गई है। आडवाणी और मोदी समेत दौड़ में आधा दर्जन से अधिक दिग्गज शामिल हैं। नितिन गडकरी भी लोकसभा चुनाव लड़ने की घोषणा कर चुके हैं और यशवंत सिन्हा भी राग अलापने लगे हैं कि वह ही प्रधानमंत्री पद के असली दावेदार हैं। लेकिन फिलहाल खुलकर मैदान में दो ही नेता सामने आए हैं। उनमें से भी एक को बुलाकर संघ मुख्यालय के मुखिया ने समझा दिया कि आप देश की जनता को बता दीजिये कि हम प्रधानमंत्री की रेस में नहीं हैं। अब वो कहां मानने वाले। शतरंज की बिसात पर एक चाल उन्होंने चल दी है जिससे बाजी काफी उलझ सी गई है। लेकिन उसे सुलझाना तो पड़ेगा ही।राजनाथ सिंह से शुरू करते हैं। कुछ दिन पहले उत्तर प्रदेश में दो यात्राएं घोषित की गई थीं। एक यात्रा कलराज मिश्र ने घोषित की और दूसरी राजनाथ सिंह ने। कलराज मिश्र की यात्रा का उद्देश्य सा़फ है कि वह उत्तर प्रदेश के निर्विवाद मुख्यमंत्री बनना चाहते हैं, लेकिन रहस्यमय है राजनाथ सिंह की यात्रा की घोषणा। राजनाथ सिंह ने अपने साथ उमा भारती को मिला लिया और एक यात्रा घोषित कर दी। राजनाथ सिंह अभी से एकछत्र राष्ट्रीय नेता की छवि बनाना चाहते हैं, ताकि वह प्रधानमंत्री पद पर अपना दावा कर सकें।
राजनाथ सिंह की मंशा का जब गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को पता चला तो अमेरिकी सीनेट में प्रस्तुत की गई एक स्टडी ग्रुप की रिपोर्ट को अमेरिकी सरकार की राय बता खुद को भावी प्रधानमंत्री पद का सशक्त दावेदार घोषित कर दिया। नरेंद्र मोदी का मीडिया मैनेजमेंट इसमें काम आया। अन्ना हज़ारे की तर्ज पर अपने जन्मदिन पर तीन दिन के उपवास की घोषणा कर दी। 17-19 सितंबर तक अहमदाबाद स्थित गुजरात विवि के भव्य हॉल में आयोजित सद्भावना उपवास के लिए मोदी ने करोड़ों रुपये पानी की तरह बहा दिये। इस सबके बीच इमाम साहब की टोपी भी उछली और मोदी ने इमाम साहब को नाराज कर दिया उनकी भेंट की गई टोपी को न पहनकर। कुल मिलाकर उपवास का मकसद अपने अंजाम तक नहीं पहुंच सका।
अब आते हैं लालकृष्ण आडवाणी पर। पिछली चार जून को बाबा रामदेव के ऊपर रामलीला मैदान में सरकारी हमला हुआ और उनका अनशन सरकार ने जबरदस्ती समाप्त करा दिया। विश्वस्त सूत्रों के मुताबिक, उसी व़क्त यानी 4 जून को संघ के सर्वोच्च नेतृत्व ने आडवाणी जी से कहा कि वह कल यानी 5 जून को लोकसभा से त्यागपत्र दे दें और भ्रष्टाचार के ख़िला़फ एक यात्रा निकालें। आडवाणी जी ने इसे बचकानी सलाह की संज्ञा दी और अनदेखा कर दिया। लेकिन जब अन्ना हजारे ने अनशन किया और उनके समर्थन में देश में भूचाल आ गया तो आडवाणी जी को लगा कि उनसे चूक हो गई। उन्होंने अचानक लोकसभा से बाहर आकर पत्रकारों के सामने भ्रष्टाचार के खिलाफ यात्रा की घोषणा कर दी। आडवाणी जी ने न संघ से राय-मशविरा किया और न ही पार्टी से ही राय ली। 11 अक्टूबर को जेपी की जन्मभूमि बिहार के सिताबदियारा में मोदी के धुर विरोधी नीतीश कुमार ने आडवाणी की
जनचेतना रथयात्रा को हरी झंडी दिखाई। यात्रा जब 6 नवंबर को गुजरात में दाखिल हुई तो मोदी और आडवाणी और मोदी के बीच कुर्सियों का फासला दिख ही गया।
नरेंद्र मोदी और राजनाथ सिंह का मानना है कि आडवाणी जी के साथ न संघ है और न ही पार्टी तथा उनकी उम्र भी उन्हें अब ज़्यादा काम नहीं करने देगी, लिहाज़ा उन्हें महत्व न दिया जाए। फिर दोनों को लगने लगा कि प्रधानमंत्री पद के संघर्ष में आख़िरी मुक़ाबला उन्हीं के बीच होगा। हालांकि दो उम्मीदवार अभी और भी हैं, सुषमा स्वराज और अरुण जेटली। दोनों ही नेता ख़ामोशी से पत्ते खेलने में माहिर हैं। लेकिन कुछ भी हो, पुराना चावल तो पुराना ही होता है। आडवाणी जी ने नीतीश को साध लिया है और अंतिम समय में वह नीतीश कार्ड खेल सकते हैं। कहने का मतलब यह कि आडवाणी भले ही पीएम इन वेटिंग ही रिटायर्ड हो जाएं, लेकिन मोदी प्रधानमंत्री न बन पाएं।
भाजपा में कुछ इस तरह का खेल चल रहा है कि सब अपनी-अपनी डपली, अपना-अपना राग अलाप रहे हैं। ऐसे में संघ परिवार की भूमिका बढ़ जाती है। संघ हमेशा से हिन्दुत्व की लाइन पर अपना एजेंडा तय करता है। अब भाजपा में प्रधानमंत्री पद के लिए जो भी पांच छह उम्मीदवार सामने आ रहे हैं उनमें से संघ की लाइन पर नरेद्र मोदी ही फिट बैठ रहे हैं। शायद इसीलिए संघ मुख्यालय नागपुर में जब आडवाणी जी मत्था टेकने गए थे तो मोहन
भागवत ने उन्हें समझाने की कोशिश की थी कि वो मोदी का समर्थन न करे, लेकिन अपनी दावेदारी कम से कम वापस ले लें। हठी आडवाणी मुख्यालय से बाहर निकले और कुछ इस अंदाज में बातों को बयां कर गए कि समझने वाले समझ गए और जो न समझे वो अनाड़ी।
आडवाणी की रथयात्रा अपने अंतिम चरण में चल रही है। उम्मीद जताई जा रही है कि संसद के शीतकालीन सत्र के शुरू होने से पहले वह यात्रा समाप्त कर वापस आ जाएंगे। और भाजपा में प्रधानंत्री पद की असली रेस तब ही शुरू होगी। तब तक भाजपा और संघ दोनों के लिए तय करना आसान हो जाएगा कि कौन कितने पानी में है?
No comments:
Post a Comment