Monday, 19 March 2012

महंगाई डायन को दादा की शह

आपने आमिर खान की फिल्म ‘पीपली लाइव’ जरूर देखा होगा और अगर फिल्म देखने का सुअवसर नहीं मिल पाया हो तो इस फिल्म का यह गाना तो निश्चित ही आपके कानों में गूंजा होगा-

‘सखी सैयां तो खूब ही कमात है,
महंगाई डायन खाए जात है’



हां! हम बात कर रहे हैं देश के वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी (दादा) द्वारा 16 मार्च (शुक्रवार) को पेश आम बजट 2012-13 की जिसमें दादा ने महंगाई डायन को अपनी तरफ से पूरी शह दे दी है कि एक साल का मौका तुम्हारे पास है, महंगाई का तांडव फैलाकर देश से गरीब जनता को ही मिटा दो। गरीब मिट जाएंगे तो गरीबी खुद-ब-खुद मिट जाएगी और फिर महंगाई का रोना जो किसी भी सरकार के लिए हमेशा सिर पर तलवार की तरह लटकती रहती है, से सदा के लिए मुक्ति मिल जाएगी। बात भी सही है कि यह महंगाई ही है जो किसी भी सरकार के आने और जाने का बहाना बनती है। यह महंगाई ही एक ऐसी चीज है जिस पर पूरे देश की एक राय बन जाती है वरना कहीं भाषा तो कहीं जाति, धर्म, वर्ग आदि के नाम पर अपनी-अपनी ढपली और अपना-अपना राग चलता है। इस तरह से देखा जाए तो महंगाई सारे देश को एकता के सूत्र में बांधकर रखती है। राष्ट्रीय एकता के लिए यह महंगाई किसी वरदान से कम नहीं है और इसी वरदान को सरकार जनता से छीन लेना चाहती है।

मनमोहन सरकार के वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने वित्त वर्ष 2012-13 को जो आम बजट पेश किया उसने बढ़ती महंगाई की धार को और गति दे दी है। दादा के इस बजट से कोई खुश नहीं है। ना तो गरीब, ना ही अमीर। एक लाइन में कहें तो महंगाई को लेकर बजट संवेदनशील नहीं है। महंगाई को लेकर बजट संवेदनशील होता, तो कुछ चीजों के भाव ज्यादा बढ़ते, कुछ के भाव कम गति से बढ़ते और कुछ के भाव बिलकुल नहीं बढ़ते। दुर्भाग्य से ऐसा नहीं हुआ। आइए समझते हैं महंगाई डायन का गणित–

सेवा वही, पर बढ़ा सेवा कर
दादा ने बजट में सेवा कर यानी सर्विस टेक्स में 2 प्रतिशत की वृद्धि कर दी है यानी पहले यदि आप मोबाइल फोन पर 500 रुपए प्रतिमाह खर्चते थे तो सेवा कर जोड़कर मोबाइल सेवा प्रदाता कंपनी को 550 रुपए से अधिक देते थे। अब सेवा प्रदाता कंपनी को उतनी ही सेवा पर, प्रतिमाह के उसी बजट पर आपको मोबाइल बिल के रूप में 560 रुपए से अधिक चुकाने होंगे। यानी प्रतिमाह 10 रुपए से भी अधिक। मोबाइल फोन एक उदाहरण है। आम आदमी के दैनिक जीवन में ऐसी कई दर्जन सेवाएं हैं जिनपर 2.06 प्रतिशत अधिक सेवा कर का भुगतान करना होगा। दादा कह रहे हैं कि हमने आयकर में छूट का दायरा बढ़ा दिया। जनता को यह पूछने का हक है कि कितना बढ़ाया, 1,80,000 रुपए से बढ़ाकर 2 लाख रुपए कर दिया। इससे 5 लाख रुपए तक की आमदनी वाले लोगों को 2000 रुपए सालाना (यानी मासिक करीब 170 रुपए) का फायदा होगा जबकि 8-10 लाख रुपए तक की आय वालों को तकरीबन 20,000 और 10 लाख से ज्यादा आय वालों को 22000 हजार का फायदा। यहां मोबाइल बिल पर तो हर महीने 2.36 प्रतिशत का सेवा कर चुकाना होगा।

देश की कर प्रणाली का इतिहास पलटें तो सेवा कर की शुरुआत 1994-95 में 5 प्रतिशत से हुई थी। तब टेलीफोन बिल, स्टॉक ब्रोकिंग और जनरल इंश्योरेंस को इसके दायरे में लाया गया था। समय के साथ महंगाई बढ़ती गई और सेवा कर का ग्राफ भी बढ़ता गया और नए वित्त वर्ष से यह एजुकेशन सेस और उसपर सरचार्ज के बाद यह 12.36 प्रतिशत हो जाएगा। साथ ही सौ से अधिक सेवाओं के इस दायरे में लाया जा चुका है। मसलन रेलवे फर्स्ट क्लास और एसी की सभी क्लास, रेलवे ट्रेवल, एयर ट्रेवल एजेंट, एयरपोर्ट सर्विस, एटीएम सेवा, बैंकिंग सेवाएं, ब्यूटी पार्लर, केबल ऑपरेटर, कोरियर सेवा, क्रेडिट व डेबिट कार्ड, ड्रायक्लीनिंग, हैल्थ क्लब, इंटरनेट कैफे, लाइफ इंश्योरेंस, फोटोग्राफी, स्वास्थ्य सेवाएं, कोचिंग, पंडाल व शमियाना सेवाएं, आईटी व सॉफ्टवेयर सेवाएं, एसी रेस्टोरेंट, होटल व गेस्ट हाउस की सेवाओं के अलावा कई और सेवाएं हैं जो सेवा कर के दायरे में शामिल की गई हैं जो एक आम आदमी को सीधे तौर पर प्रभावित करेगा।

अमीरों पर भी बोझ कम नहीं
बजट में एक्साइज ड्यूटी यानी उत्पाद शुल्क में भी 2 प्रतिशत की बढ़ोतरी की गई है। दादा का बजट भाषण पूरा भी नहीं हुआ कि मारुति और होंडा ने अपनी-अपनी कारों की कीमतें बढ़ाने की घोषणा कर दी। महिंद्रा एंड महिंद्रा ने अपने स्पोर्ट्स युटिलिटी व्हीकल पर 4 हजार से 35 हजार रुपए बढ़ाने की बात कही। जाहिर है पहले से ही प्रतिकूल परिस्थितियों को झेल रही कार इंडस्ट्री बजट में 2 प्रतिशत उत्पाद शुल्क का बोझ अपने अमीर ग्राहकों पर ही डालेगी। विदेश में बनी कारों पर उत्पाद शुल्क 22 से बढ़ाकर 24 प्रतिशत कर दी गई है। एसयूवी, एमयूवी व बड़ा कारों पर बेसिक कस्टम ड्यूटी 60 से बढ़ाकर 75 प्रतिशत कर दी गई है जिससे अमीर वर्ग पर महंगाई की दोहरी मार पड़ेगी। कहने का मतलब दादा इस बजट में अमीर वर्ग को भी संतुष्ट करते नहीं दिख रहे।

दादा का राजनीतिक झांसा
चलते-चलते दादा के उस वक्तव्य का जिक्र करना यहां जरूरी होगा जो लोकसभा में बजट भाषण को शुरू करने से पहले उद्धृत किया था। उन्होंने कहा, ‘दयावान बनने के लिए पहले मुझे क्रूर होना पड़ेगा।’ शेक्सपीयर के इस उद्धरण को प्रणब मुखर्जी ने पेश किये गए बजट से एक हद तक साबित भी किया। लेकिन भाषा पर जरा गौर कीजिए, ‘दयावान बनने से पहले’ यानी क्रूरता तो दिखा दी और दयावान बनना अभी बाकी है। इस इशारे को गौर से समझना आपकी आर्थिक सेहत के लिए बेहद जरूरी है।

दादा का अगला बजट वित्त वर्ष 2013-14 के लिए होगा जो लोकसभा चुनाव 2014 से पहले आखिरी बजट होगा। साफ है अगले बजट में दादा दयावान बनकर आम आदमी को (जिसके वोट से जीतकर उन्हें पांच साल तक बजट पेश करने का मौका मिलता है) फिर से रिझाने की कोशिश की जाएगी। बजट को आम आदमी के हित में बनाने की हरसंभव कोशिश की जाएगी ताकि कांग्रेस नीत यूपीए की सरकार पर जनता फिर से मेहरबान हो अगले पांच साल तक के लिए सत्ता सौंप दे। दादा के इस वक्तव्य को देश की जनता को ध्यान में रखना होगा क्योंकि यह वक्तव्य पूरी तरह से राजनीतिक है। इसका मतलब सिर्फ वोट बैंक से है। अगर गलती से वित्त वर्ष 2013-14 के बजट में दादा दयावान बनते हैं तो फिर लोकसभा चुनाव 2014 में आपको सोच-समझकर अपनी सरकार चुननी होगी।

Wednesday, 14 March 2012

कांग्रेस को सुधारनी होगी अपनी दैहिक भाषा

उत्तरप्रदेश, पंजाब और गोवा विधानसभा चुनाव में करारी हार के बाद भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अंदर और बाहर मंथन का दौर शुरू हो गया है। क्योंकि इन तीन राज्यों के चुनाव परिणाम ने भविष्य के प्रधानमंत्री राहुल गांधी पर सवालिया निशान जो लगा दिया है। शतरंज की बिसात पर कांग्रेस का युवराज यूपी में लाल टोपी वाले युवराज की शह पर मात हो चुका है।
कांग्रेस की इस शर्मनाक पराजय पर सभी अचंभित हैं। उत्तराखंड में विजय बहुगुणा को मुख्यमंत्री के लिए नामित कर कांग्रेस आलाकमान ने एक अलग मुसीबत मोल ले ली है। बड़ा सवाल यह है कि उत्तर प्रदेश में कांग्रेस क्यों हारी? या फिर उत्तराखंड कांग्रेस में दोफाड़ क्यों हो गया? अलग-अलग राजनीतिक विश्लेषकों की अलग-अलग राय है, लेकिन जहां से मैं देखता हूं, कांग्रेस ने इस विधानसभा चुनाव में तीन बड़ी गलतियां की जिसे जल्द सुधारा नहीं गया तो आने वाले मिशन-2014 में भी कांग्रेस को मुंह की खानी पड़ सकती है।
जटिल दैहिक भाषा
देश की जनता अब लोकतंत्र के मायने, उसके नियम व कायदों का बेहतर तरीके से समझने लगी है। कांग्रेस पार्टी जनतंत्र में इस परिवर्तन की बयार को या तो समझ नहीं पा रही है या समझना नहीं चाहती। मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं कि कांग्रेस के नेताओं की जो देह भाषा है वह सत्ता के सिंहासन को कतई मंजूर नहीं। सत्ता का सिंहासन मतदाताओं के वोट से तय होती है और मतदाता को अगर आपकी दैहिक भाषा रास नहीं आई तो यह सोचने का क्या आधार कि आप चुनाव जीत जाएंगे और फिर जोड-तोड़कर सत्ता के सिंहासन पर कुंडली मारकर बैठ जाएंगे।
उत्तरप्रदेश में जनसभाओं के दौरान यदि आपने राहुल गांधी के संबोधनों पर गौर किया हो तो बहुत कुछ अनुमान आपको तभी लग गया होगा। चुनाव सिर पर हो तो जनता नेताओं से सवाल करना चाहती है ना कि नेता के सवालों का जवाब देना पसंद करती है। कांग्रेस नेताओं से पहली गलती यही हुई। चाहे वह राहुल गांधी हों, सलमान खुर्शीद हों, दिग्विजय सिंह हों या फिर बेनी प्रसाद वर्मा हों सभी ने एक के बाद एक जनता से सवाल करने बैठ गए, फिर अपना चुनावी घोषणा पत्र का फरमान सुना दिया और चलते बने। राहुल गांधी को ही ले लीजिए, दोनो बांह चढ़ाकर गुस्से में जनता से सवाल पूछते हैं कि कब तक तुम दूसरे प्रदेश में जाकर भीख मांगते रहोगे? दरअसल जनता राहुल गांधी की जनसभा में इस सवाल को जवाब देने तो नहीं गई थी सो उसे बड़ा बुरा लगा और इस तरह से उनके खास वोटर भी बिदकते चले गए। हाल ये हुआ कि कांग्रेस का गढ़ अमेठी और रायबरेली में भी जहां प्रियंका गांधी खासतौर पर प्रचार करने पहुंची थी, कांग्रेस को शर्मनाक हार का सामना करना पड़ा।

सलमान खुर्शीद, दिग्विजय सिंह और बेनी प्रसाद वर्मा को ये लगता था कि अगर हमने मुस्लिम मतदाताओं को अपने पक्ष में कर लिया तो बाकी सारा जहां जीत लेंगे और इस भ्रम में या कहिए अहंकार में वह एक के बाद अल्पसंख्यक आरक्षण पर विवादित बयान देते चले गए। मुसलमान मतदाता भी कांग्रेस की चाल समझ गए और परिणाम ये हुआ कि अपने तो अपने नहीं ही रहे, जिनको अपना बनाने चले थे वो भी धोखा दे गए। कहने का मतलब यह कि राजनीति में जो शालीनता होनी चाहिए, संबोधनों में जो सहजता होनी चाहिए, आपके आभामंडल में जो सौम्यता होनी चाहिए वह इन नेताओं में कहीं नहीं दिखी।

जनता के बीच जब आप जा रहे हैं तो उन्हें अपनी दैहिक भाषा से इस बात का भरोसा दिलाना होगा कि आप जो कह रहे हैं उसमें कोई धोखा नहीं है, कोई संशय नहीं है। तभी आप दावे से कह सकते हैं कि जीत हमारी होगी, वरना जो हुआ आपके सामने है। उत्तराखंड में चुनाव नतीजों के बाद जो परिदृश्य उजागर हुआ उसमें भी कहीं न कहीं कांग्रेस आलाकमान की दैहिक भाषा जिम्मेदार है। सवाल यह कि सोनिया गांधी ने ऐसा कैसे सोच लिया कि उनके द्वारा नामित कोई भी नेता को सूबे का जनता स्वीकार कर लेगी। हरीश रावत सूबे के जमीनी नेता रहे हैं। मुख्यमंत्री पद पर उनका दावा सर्वमान्य था, लेकिन कांग्रेस आज भी तीन दशक पहले की राजनीति कर रही है। आलाकमान की बात भी तभी मान्य होगी जब सूबे की जनता और उनके द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों को वह मान्य हो। इस मायने में कांग्रेस को हर हाल में अपनी दैहिक भाषा सुधारनी होगी।

नेता नदारद, कमजोर संगठन
कांग्रेस के साथ बड़ी दिक्कत यह है कि जब वह चुनाव मैदान में उतरती है तो उसके आलाकमान तक को पता नहीं होता कि वह किसे नेता के रूप में पेश कर रहा है। यही हाल हुआ देश के सबसे बड़े राज्य उत्तरप्रदेश के विधानसभा चुनाव में। प्रदेश की जनता को पता था कि कम से कम राहुल गांधी तो यहां के मुख्यमंत्री नहीं बनेंगे तो फिर राहुल की बातों पर कैसे भरोसा किया जाए। आखिर राहुल किस आधार पर इतना कुछ कह रहे हैं और इसकी क्या गारंटी है कि कांग्रेस की सरकार बन जाने के बाद सारे वायदे पूरे किए जाएंगे।

विधानसभा चुनाव में एक नेता का होना चुनाव जीतने की पहली शर्त होती है। नेता तो समाजवादी पार्टी ने भी घोषित नहीं किए थे, लेकिन लोगों को इतना जरूर पता था कि यदि सपा की सरकार बनती है तो मुख्यमंत्री या तो मुलायम बनेंगे या फिर उनके बेटे अखिलेश यादव बनेंगे। बसपा की सरकार बनती है तो तय है कि सीएम मायावती ही बनेंगी। लेकिन कोई आपसे पूछे कि कांग्रेस की सरकार बनती तो मुख्यमंत्री कौन बनता तो एक साथ कई नाम मसलन, बेनी प्रसाद वर्मा, प्रमोद तिवारी, रीता बहुगुणा जोशी वगैरह-वगैरह सामने आ जाते। मतदाताओं के बीच इसका अच्छा असर नहीं हुआ और कांग्रेस का खास वोट बैंक ने भी रास्ता बदल लिया। दूसरा संगठन के मामले में भी कांग्रेस काफी कमजोर दिखा। हालांकि इस बात को कांग्रेस का राष्ट्रीय अध्यक्ष सोनिया गांधी और कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी ने भी स्वीकार किया। 2007 के चुनाव के बाद कांग्रेस को पांच साल में अपना संगठन मजबूत बनाकर एक नेता को आगे कर तैयारी की होती तो खासकर यूपी चुनाव का परिदृश्य कुछ और होता।

बेमतलब की बयानबाजी
सच कहिए तो दिग्विजय सिंह की अन्ना हजारे के खिलाफ लगातार बयानबाजी, कानून मंत्री सलमान खुर्शीद और बेनी प्रसाद वर्मा के लगातार चुनाव आयोग की आदर्श चुनाव आचार संहिता का उल्लंघन करते हुए अल्पसंख्यक आरक्षण पर बयान, श्रीप्रकाश जायसवाल का उत्तर प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लगाने वाला बयान विशेष रूप से उत्तर प्रदेश की राजनीति में इतना खराब असर डाल गया जो कांग्रेस की हार का प्रमुख कारण बन गई। देखते हैं किसने क्या बयान दिया–
सलमान खुर्शीद के बोल : चुनाव आयोग मुझे मुस्लिम आरक्षण पर बोलने से रोक रहा है। चाहे मुझे फांसी दे दो, मैं मुस्लिम हक की बात करता रहूंगा।
बेनी प्रसाद के बोल : चुनाव आयोग चाहे तो मुझे नोटिस दे दे, लेकिन मुसलमानों का आरक्षण बढ़ाया जाएगा।
श्रीप्रकाश जायसवाल के बोल : राज्य में कांग्रेस को स्पष्ट बहुमत मिलने की संभावना है, लेकिन यदि त्रिशंकु विधानसभा आती है तो प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लग सकता है।

बहरहाल, कांग्रेस आलाकमान को उक्त तीन गलतियों पर एक मंथन बैठक करनी चाहिए और एक सकारात्मक रास्ता निकालकर विधानसभा चुनाव-2012 में हुई भारी क्षति की भरपाई करने की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए। उत्तर प्रदेश राजनीतिक दृष्टि से केंद्र की राजनीति के लिए काफी अहम स्थान रखता है। तभी तो मुलायम सिंह प्रधानमंत्री बनने का ख्वाब देखने लगे हैं।

Sunday, 4 March 2012

इनकी जेब में चुनाव आचार संहिता

देश में आजकल हर तरफ शोर मचा है कि कांग्रेसी सांसद और मंत्रीगण आदर्श चुनाव आचार संहिता को जेब में रखकर घूम रहे हैं। चर्चा कोई हवा में नहीं हो रही है। इसकी जमीनी हकीकत भी है। राजनीतिक दृष्टि से सबसे संवेदनशील और अहम उत्तर प्रदेश में विधान सभा चुनाव के दौरान कांग्रेसी सांसदों और मंत्रियों ने एक के बाद एक बयान देकर इस बात को साबित कर दिया कि आदर्श चुनाव आचार संहिता को जेब में रखकर घूमने में उनका कोई जोर नहीं। आगे बढ़ने से पहले एक के बाद एक उन मंत्रियों के बयानों का उल्लेख करना यहां जरूरी होगा जो कांग्रेस पार्टी के दिग्गज तो हैं ही साथ ही केंद्र सरकार के काबिल मंत्री भी हैं।


प्रकरण नंबर 1 : केंद्रीय मंत्री सलमान खुर्शीद ने फर्रुखाबाद में 10 जनवरी को अपनी पत्नी लुईस खुर्शीद की चुनावी सभा में लोगों को आश्वासन दिया था कि कांग्रेस उत्तर प्रदेश में सत्ता में आई तो अल्पसंख्यकों को 9 प्रतिशत आरक्षण देगी। भाजपा ने चुनाव आयोग से शिकायत की। 9 फरवरी को मुख्य चुनाव आयुक्त ने 15 पृष्ठीय फैसले में इस बयान के लिए खुर्शीद को कड़ी फटकार लगाते हुए कहा कि केंद्रीय कानून मंत्री होते हुए उन्होंने निंदनीय मिशाल कायम की। चुनाव आयोग की फटकार को नकारते हुए खुर्शीद फिर एक चुनावी जनसभा में बोले, ‘चुनाव आयोग मुझे मुस्लिम आरक्षण पर बोलने से रोक रहा है। चाहे मुझे फांसी दे दो, मैं मुस्लिम हक की बात करता रहूंगा।’


प्रकरण नंबर 2 : केंद्रीय मंत्री बेनी प्रसाद वर्मा 15 फरवरी की रात लुईस खुर्शीद के क्षेत्र फर्रुखाबाद में ही एक जनसभा को संबोधित करने पहुंचे। मंच पर कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह और केंद्रीय मंत्री सलमान खुर्शीद दोनों ही मौजूद थे। ओबीसी कोटा में मुस्लिमों की हिस्सेदारी बढ़ाने की बात करते हुए बेनी प्रसाद ने अपने संबोधन में कहा, ‘चुनाव आयोग चाहे तो मुझे नोटिस दे दे, लेकिन मुसलमानों का आरक्षण बढ़ाया जाएगा।’ केंद्रीय इस्पात मंत्री बेनी प्रसाद वर्मा ने यह भी कहा कि खुर्शीद मुसलमानों की हक की लड़ाई बहुत ईमानदारी से लड़ रहे हैं।


प्रकरण नंबर 3 : केंद्रीय मंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल 23 फरवरी को कानपुर में वोट डालने के बाद पत्रकारों से मुखातिब हुए तो एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि राज्य में कांग्रेस को स्पष्ट बहुमत मिलने की संभावना है, लेकिन यदि त्रिशंकु विधानसभा आती है तो प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लग सकता है। यानी कांग्रेसी मंत्री ने पार्टी और सरकार के इरादे तीन चरण की वोटिंग और मतगणना से पहले ही अपने इरादे जगजाहिर कह दिए। गौरतलब है कि श्रीप्रकाश जायसवाल सिर्फ कांग्रेस नेता ही नहीं वरन वह केंद्रीय कोयला मंत्री भी हैं।


कांग्रेसी सांसदों, नेताओं और पार्टी के चुनाव प्रचारकों द्वारा आदर्श चुनाव आचार संहिता के उल्लंघन की फेहरिस्त इतनी लंबी है कि उनका जिक्र करना यहां संभव नहीं है इसलिए हमने सिर्फ उन तीन मंत्रियों के बयानों का जिक्र किया है जिन्होंने अन्ना आंदोलन के दौरान टीम अन्ना को संसद की गरिमा का अपमान, लोकतंत्र की अस्मिता को खतरा और कानून को हाथ में लेने जैसी बड़ी-बड़ी बातें करते दिख रहे थे। भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में संभवत: पहली दफा किसी केंद्रीय मंत्री वो भी कानून मंत्री के विरुद्ध चुनाव आयोग ने राष्ट्रपति को पत्र लिखा। लेकिन कांग्रेस पार्टी को कोई फर्क नहीं पड़ा। जब विवाद ने तूल पकड़ा तो खुर्शीद ने चुनाव आयोग से माफी मांग ली। कुछ ऐसा ही बेनी प्रसाद वर्मा ने किया और श्रीप्रकाश जायसवाल भी चुनाव आयोग के कोप का शिकार होने से बच गए। सवाल यह उठता है कि क्या आदर्श चुनाव आचार संहिता की अवधारणा को इसीलिए स्थापित किया गया था कि नेता, मंत्री जी भरकर उसका उल्लंघन करें और माफी मांग वैतरणी पार कर लें। तो फिर ऐसी आचार संहिता रहे या ना रहे, क्या फर्क पड़ता है।


थोड़ी गंभीरता से इस बात पर विचार करें, राष्ट्रपति ही मंत्रिगणों की नियुक्ति करते हैं। वे राष्ट्रपति के समक्ष ही संविधान पालन की शपथ लेते हैं। शपथ लेने वाले ने शपथ तोड़ी, चुनाव आयोग के प्रशासनिक अधिकारों व आचार संहिता को चुनौती दी। बावजूद इसके कानून मंत्री ठसक के साथ पद पर काबिज हैं। चुनाव आयोग संविधान और कानून से प्राप्त अधिकारों का ही तो प्रयोग करता है। आदर्श चुनाव आचार संहिता संविधान और कानून का ही तो सार है। लेकिन दुर्भाग्य से कांग्रेस स्वभाववश कोई आचार शास्त्र नहीं मानती जो कि उक्त तीन मंत्रियों के बयानों से पुष्ट भी होता है। दरअसल कांग्रेस पार्टी देश में नख व दंत विहीन चुनाव आयोग चाहती है। देश की जनता अपने कानून मंत्री सलमान खुर्शीद तथा दो अन्य मंत्री बेनी प्रसाद वर्मा, श्रीप्रकाश जायसवाल से और इनसे ही क्यों, प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से भी जानना चाहती है कि इस तरह की ओछी हरकतों से लोकतंत्र की गरिमा को बनाए रखा जा सकता है?


ये पब्लिक जो है, सब जानती है। आप सरकार में मंत्री बनकर बैठे हैं तो इसका मतलब यह नहीं कि आप लोकतंत्र और संविधान से ऊपर की चीज हैं। देश की जनता एक सशक्त लोकपाल कानून की बात करे तो उससे लोकतंत्र की, संसद और संविधान की भावनाएं आहत होती हैं और आप जैसे मंत्रीगण, नेता और सांसद आदर्श चुनाव आचार संहिता को जेब में रखकर घूमें, जब जी में आया उसकी खिल्ली उड़ा दें और फिर माफी मांग लें तो इससे लोकतंत्र, संसद और संविधान की भावनाओं को ठेस नहीं पहुंचती है। मंत्री जी, इस देश में दो तरह के कानून नहीं चलेंगे। इस देश का एक ही संविधान है और हम सबको उसी संविधान की भावनाओं का सम्मान करते हुए उसके अनुरूप चलना होगा। चुनाव आयोग से माफी मांगना पर्याप्त नहीं है। अगर चुनाव आयोग ने आपके बयानों को आचार संहिता के उल्लंघन का दोषी माना है तो आपको पद की गरिमा का सम्मान करते हुए सरकार से तत्काल इस्तीफा दे देना चाहिए। नैतिकता का यही तकाजा है।

ये लड़ाई दूर तलक जाएगी...

विकास पुरुष बनने का दावा करने वाले गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी आजकल खट्टे-मीठे अनुभवों से गुजर रहे हैं। कभी कोर्ट की फटकार तो कभी तथाकथित जयकार के बीच पेंडुलम की तरह डोल जो रहे हैं। गुजरात हाईकोर्ट ने वर्ष 2002 में गोधरा कांड के बाद भड़के दंगों के दौरान कार्रवाई नहीं करने और लापरवाही बरतने को लेकर बीते 8 फरवरी को मोदी सरकार को कड़ी फटकार लगाई।

इस्लामिक रिलीफ कमेटी ऑफ गुजरात (आईआरसीजी) की याचिका पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने कहा कि 2002 में गोधरा कांड के बाद राज्य सरकार की निष्क्रियता, अपर्याप्त इंतजाम और लापरवाहीपूर्ण रवैये के चलते राज्य भर में धार्मिक स्थलों को बड़े पैमाने पर नुकसान हुआ। आदेश में कोर्ट ने आगे कहा है कि धार्मिक स्थलों की मरम्मत कराने और मुआवजा देने की जिम्मेदारी राज्य सरकार की है। कोर्ट ने यह भी कहा कि जब सरकार घरों को हुए नुकसान के लिए मुआवजा देती है तो उसे धार्मिक स्थलों, इमारतों को हुए नुकसान के लिए भी मुआवजा देना चाहिए।

इससे पहले भी हाईकोर्ट ने लोकायुक्त गठन के मामले में मोदी सरकार को फटकार लगाई थी। हाईकोर्ट ने सरकार की उस याचिका को खारिज कर दिया था जिसमें सरकार ने लोकायुक्त की नियुक्ति को चुनौती दी थी। लेकिन गुजरात दंगों के दौरान गुलबर्ग सोसायटी कांड को लेकर सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित विशेष जांच दल (एसआईटी) की रिपोर्ट में मोदी सरकार को क्लीन चिट देने की खबर एक अंग्रेजी दैनिक ने छापी तो नरेंद्र मोदी की बांछें खिल गई हैं। तमाम समर्थक और भाजपा के बड़े-बड़े नेता नरेंद्र मोदी की जयकार कर रहे हैं। जयकारा लगाने वालों को ये नहीं मालूम कि एसआईटी को सिर्फ जांच करने की जिम्मेदारी सुप्रीम कोर्ट ने सौंपी है, क्लीन चिट देने के लिए नहीं। मोदी को क्लीन चिट मिलना चाहिए या नहीं, कोर्ट को तय करना है।

अभिमान का चादर ओढ़े मोदी फटकार और जयकार के बीच सरोकार के रास्ते को भूल रहे हैं। भूलें भी क्यों नहीं, जनता ने इतने जिद्दी व सिरफिरे नेता को सत्ता की चाबी जो सौंप रखी है। फिलहाल वह पूरे प्रदेश में घूम-घूमकर दंगे के लिए प्रायश्चित भी कर रहे हैं। सद्भावना उपवास को मोदी ने अपना हथियार बनाया है। लेकिन क्या उनके प्रायश्चित करने से गुलबर्ग सोसायटी में दंगे की भेंट चढ़े एहसान जाफरी के रूप में जाकिया जाफरी को उनका पति मिल जाएगा। एसआईटी जांच पर गोधरा कांड के अहम गवाह संजीव भट्ट और एहसान जाफरी की विधवा जाकिया जाफरी मोदी पर लगे इस दाग को इतनी आसानी से मिटने देंगे? ये बड़ा सवाल है। गुजरात दंगों को लेकर नरेंद्र मोदी बनाम दंगा पीड़ितों की लड़ाई दूर तलक जाएगी।

कौन है जाकिया जाफरी ?
28 फरवरी 2002 को गुजरात दंगों के दौरान अहमदाबाद की गुलबर्ग सोसायटी में एहसान जाफरी सहित 37 लोगों को जिंदा जला दिया गया था। एहसान जाफरी कांग्रेस के वरिष्ठ नेता व पूर्व सांसद थे और जाकिया जाफरी के पति भी। कहते हैं कि जब दंगाइयों ने जब गुलबर्ग सोसायटी में हमला बोला तो एहसान सूबे के तमाम अफसरों और नेताओं से गुहार लगाते रहे, लेकिन किसी ने उनकी एक नहीं सुनी। इसके बाद शुरू हुई जाकिया जाफरी की इंसाफ की लंबी लड़ाई जिसमें न्याय मिलना अभी बाकी है। मानवाधिकार आयोग ने गुजरात पुलिस पर दंगे से जुड़ी जांच में लापरवाही बरतने के आरोप लगाए। 8 जून 2006 को जाकिया जाफरी ने अपने पति की हत्या के खिलाफ तत्कालीन डीजीपी को खत लिखा। जाकिया ने हाईकोर्ट में भी ये अर्जी दी कि नरेंद्र मोदी समेत 63 लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज किए जाएं। लेकिन नवंबर 2007 में हाईकोर्ट ने जाकिया की अर्जी खारिज कर दी। इसके बाद जाकिया ने हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी।

मार्च 2008 में सुप्रीम कोर्ट ने गुलबर्ग केस समेत 8 केस की जांच के लिए विशेष टीम बनाई। 27 अप्रैल 2009 को सुप्रीम कोर्ट ने एसआईटी को उन 63 लोगों की जांच के आदेश दिए, जिनके खिलाफ जाकिया ने एफआईआर दर्ज करने की अपील की थी। 4 नवंबर 2009 को गुलबर्ग सोसायटी केस में पहला चश्मदीद कोर्ट के सामने पेश हुआ। उसने बताया कि एहसान जाफरी ने मोदी समेत कई लोगों को मदद के लिए फोन किए थे। 27 मार्च 2010 को एसआईटी ने नरेंद्र मोदी से घंटों पूछताछ की और इसके बाद 25 अप्रैल 2011 को एसआईटी ने अपनी अंतरिम रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट में सौंप दी। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि एमाइकस क्यूरी की रिपोर्ट सुनने के बाद ही फैसला सुनाया जाएगा। जाकिया जाफरी फिलहाल सूरत में अपने बड़े बेटे के साथ रह रही हैं जो एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में काम करता है।

संजीव भट्ट से लगता है डर
इस निलंबित आईपीएस अफसर से गुजरात की नरेंद्र मोदी सरकार को डर लगता है। डर इसलिए, क्योंकि यह अफसर ऐसे राज जानता है जिनका पर्दाफाश अगर हो गया तो मोदी गुजरात दंगों की आग में झुलस जाएंगे। अगर इस अफसर के दावे सही हैं तो यह साबित हो जाएगा कि गुजरात दंगों के पीछे दरअसल मोदी का दिमाग काम कर रहा था। आखिर इस अफसर ने सीधे सुप्रीम कोर्ट से गुहार क्यों लगाई, आखिर क्यों आईपीएस संजीव भट्ट को दंगों की जांच कर रही विशेष जांच दल (एसआईटी) पर रत्ती भर भरोसा नहीं है।

संजीव भट्ट को यह लगता है कि उन्होंने दंगों से जुड़े़ जो भी राज या जानकारियां एसआईटी को दीं उन्हें एसआईटी ने लीक कर दिया। वे एसआईटी से कहते रहे कि उनके पास नरेंद्र मोदी की भूमिका से जुड़ी जानकारियां हैं, लेकिन उन्हें लगातार बोला जाता रहा कि वे सिर्फ गुलबर्ग सोसायटी से जुड़ी जानकारियां ही दें। तेज-तर्रार आईपीएस अफसर संजीव भट्ट ने अपने हलफनामे में साफ लिखा है कि सुप्रीम कोर्ट दंगों में सरकारी तंत्र की भूमिका को लेकर निष्पक्ष और पूरी जांच के लिए एसआईटी पर भरोसा करता है, लेकिन एसआईटी इस भरोसे पर खरी नहीं उतर रही है।

भट्ट ने लिखा है, ’27 फरवरी 2002 को साबरमती एक्सप्रेस की बोगी एस-6 को जलाए जाने और उसके बाद भड़के दंगों की साजिश और सरकारी भूमिका से जुड़ी जानकारियां और सबूत मैंने एसआईटी को दिए। सबूतों के तौर पर 26 और 27 फरवरी 2002 को गोधरा में कॉल डीटेल्स की मूल फ्लॉपी, मोबाइल फोन की लोकेशन, सरकार के ऊंचे ओहदों पर बैठे लोगों के 27 और 28 फरवरी को किए गए फोन कॉल्स के ओरिजिनल प्रिंटआउट भी दी। मैंने लगातार एसआईटी को ये सबूत दिए, लेकिन एसआईटी उन्हें लेकर गंभीर नजर नहीं आई, वे आगे की तहकीकात करने से बचती रही।’

साफ है संजीव भट्ट उस एसआईटी की ईमानदारी पर सवाल खड़े कर रहा है, जो खुद सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में काम कर रही है। भट्ट का कहना है कि एसआईटी में कुछ लोग मोदी सरकार से हाथ मिला चुके हैं, उनका यह शक उस वक्त पक्का हुआ जब नवंबर 2009 में उन्हें एसआईटी ने बयान देने के लिए बुला भेजा। भट्ट कहते हैं, ‘एसआईटी ने मुझे नवंबर 2009 में बयान देने के लिए बुलाया, मैंने यह जानकारी गुप्त रखी, लेकिन राज्य सरकार के एक बड़े अधिकारी ने मुझसे संपर्क कर यह कहा कि एसआईटी में बयान देने से पहले जैसा कहा जाए मैं वैसा ही करूं। इस बारे में मैंने एसआईटी के सदस्य ए.के. मलहोत्रा को तत्काल जानकारी दी थी, इसके बावजूद कई घटनाएं ऐसी हुईं, जिससे मुझे अहसास हुआ कि मैं जो कुछ भी एसआईटी को बता रहा हूं वह तत्काल लीक कर दिया जा रहा है। हद तो तब हो गई जब मैंने एसआईटी को कहा कि वे मेरे बयान की तस्दीक कुछ गवाहों के हवाले से करवा सकते हैं और ऐसे ही राज्य खुफिया के अधिकारी के.डी. पंत का नाम भी एसआईटी को मैंने दिया। पंत ने मुझे बताया कि एसआईटी के लोगों ने उसे गिरफ्तारी और गंभीर परिणाम झेलने की धमकी भी दी। ऐसा लगता है कि इसी तरह की धमकी दूसरे गवाहों को भी दी गई होगी। आज भी गुजरात में हालात ऐसे हैं कि कोई गवाह राज्य सरकार के डर के कारण खुलकर सामने नहीं आ सकता है।’

तहलका पत्रिका की 12 फरवरी 2011 की एक रिपोर्ट के मानें तो एसआईटी ने अपनी प्रारम्भिक रिपोर्ट में गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को दंगे को लेकर ‘महत्वपूर्ण रेकार्ड को नष्ट करने,’ ‘साम्प्रदायिक मानसिकता’ को उजागर करने, ‘भडकाऊ भाषण देने, अदालतों में पब्लिक प्रॉसिक्यूटर के तौर पर संघ कार्यकर्ताओं को तैनात करने, पुलिस कन्ट्रोल रूम में अपने करीबी मंत्रियों को जनसंहार के दिनों में तैनात करने, ‘तटस्थ अधिकारियों को दण्डित करने’ आदि तमाम कामों के लिए जिम्मेदार माना है। अब उसी एसआईटी की रिपोर्ट में यदि नरेंद्र मोदी को बेदाग बताया जाता है तो फिर इसका फैसला देश की सर्वोच्च अदालत पर ही छोड़ना होगा।

बहरहाल, इतना तो तय है कि गोधरा कांड नरेंद्र मोदी के मुख्यमंत्रित्व काल में हुआ। दंगे के दौरान कई जगहों पर नरसंहार हुआ। दंगे को रोकने के लिए अगर प्रभावी कदम नहीं उठाया गया तो निश्चित रूप से इसकी जिम्मेदारी मोदी सरकार को लेनी चाहिए। लोग कहते हैं कि नरेंद्र मोदी विकास पुरुष हैं। गुजरात को विकास मॉडल दुनिया में चर्चा का विषय बना हुआ है सो ऐसे महान व्यक्तित्व पर इस तरह के लांछन नहीं लगाए जाने चाहिए। हां, मैं भी मानता हूं कि मोदी का विकास मॉडल काबिलेतारीफ है। लेकिन आप ये क्यों भूल रहे हैं कि विकास करना नरेंद्र मोदी का जनता के प्रति परम कर्तव्य बनता है। जनप्रतिनिधि को जनता चुनकर भेजती ही इसीलिए है। लेकिन आप विकास पुरुष बन गए तो इसका मतलब यह कतई नहीं कि आपको जनसंहार करने की छूट मिल गई। नरेंद्र मोदी को गोधरा कांड की नैतिक जिम्मेदारी स्वीकार करनी होगी और उन पीड़ित परिवारों से माफी मांगनी होगी जिनका घर परिवार जनसंहार की भेंट चढ़ गया था। मोदी अगर ऐसा नहीं करते हैं तो ये लड़ाई दूर तलक जाएगी।