उत्तरप्रदेश, पंजाब और गोवा विधानसभा चुनाव में करारी हार के बाद भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अंदर और बाहर मंथन का दौर शुरू हो गया है। क्योंकि इन तीन राज्यों के चुनाव परिणाम ने भविष्य के प्रधानमंत्री राहुल गांधी पर सवालिया निशान जो लगा दिया है। शतरंज की बिसात पर कांग्रेस का युवराज यूपी में लाल टोपी वाले युवराज की शह पर मात हो चुका है।
कांग्रेस की इस शर्मनाक पराजय पर सभी अचंभित हैं। उत्तराखंड में विजय बहुगुणा को मुख्यमंत्री के लिए नामित कर कांग्रेस आलाकमान ने एक अलग मुसीबत मोल ले ली है। बड़ा सवाल यह है कि उत्तर प्रदेश में कांग्रेस क्यों हारी? या फिर उत्तराखंड कांग्रेस में दोफाड़ क्यों हो गया? अलग-अलग राजनीतिक विश्लेषकों की अलग-अलग राय है, लेकिन जहां से मैं देखता हूं, कांग्रेस ने इस विधानसभा चुनाव में तीन बड़ी गलतियां की जिसे जल्द सुधारा नहीं गया तो आने वाले मिशन-2014 में भी कांग्रेस को मुंह की खानी पड़ सकती है।
जटिल दैहिक भाषा
देश की जनता अब लोकतंत्र के मायने, उसके नियम व कायदों का बेहतर तरीके से समझने लगी है। कांग्रेस पार्टी जनतंत्र में इस परिवर्तन की बयार को या तो समझ नहीं पा रही है या समझना नहीं चाहती। मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं कि कांग्रेस के नेताओं की जो देह भाषा है वह सत्ता के सिंहासन को कतई मंजूर नहीं। सत्ता का सिंहासन मतदाताओं के वोट से तय होती है और मतदाता को अगर आपकी दैहिक भाषा रास नहीं आई तो यह सोचने का क्या आधार कि आप चुनाव जीत जाएंगे और फिर जोड-तोड़कर सत्ता के सिंहासन पर कुंडली मारकर बैठ जाएंगे।
देश की जनता अब लोकतंत्र के मायने, उसके नियम व कायदों का बेहतर तरीके से समझने लगी है। कांग्रेस पार्टी जनतंत्र में इस परिवर्तन की बयार को या तो समझ नहीं पा रही है या समझना नहीं चाहती। मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं कि कांग्रेस के नेताओं की जो देह भाषा है वह सत्ता के सिंहासन को कतई मंजूर नहीं। सत्ता का सिंहासन मतदाताओं के वोट से तय होती है और मतदाता को अगर आपकी दैहिक भाषा रास नहीं आई तो यह सोचने का क्या आधार कि आप चुनाव जीत जाएंगे और फिर जोड-तोड़कर सत्ता के सिंहासन पर कुंडली मारकर बैठ जाएंगे।
उत्तरप्रदेश में जनसभाओं के दौरान यदि आपने राहुल गांधी के संबोधनों पर गौर किया हो तो बहुत कुछ अनुमान आपको तभी लग गया होगा। चुनाव सिर पर हो तो जनता नेताओं से सवाल करना चाहती है ना कि नेता के सवालों का जवाब देना पसंद करती है। कांग्रेस नेताओं से पहली गलती यही हुई। चाहे वह राहुल गांधी हों, सलमान खुर्शीद हों, दिग्विजय सिंह हों या फिर बेनी प्रसाद वर्मा हों सभी ने एक के बाद एक जनता से सवाल करने बैठ गए, फिर अपना चुनावी घोषणा पत्र का फरमान सुना दिया और चलते बने। राहुल गांधी को ही ले लीजिए, दोनो बांह चढ़ाकर गुस्से में जनता से सवाल पूछते हैं कि कब तक तुम दूसरे प्रदेश में जाकर भीख मांगते रहोगे? दरअसल जनता राहुल गांधी की जनसभा में इस सवाल को जवाब देने तो नहीं गई थी सो उसे बड़ा बुरा लगा और इस तरह से उनके खास वोटर भी बिदकते चले गए। हाल ये हुआ कि कांग्रेस का गढ़ अमेठी और रायबरेली में भी जहां प्रियंका गांधी खासतौर पर प्रचार करने पहुंची थी, कांग्रेस को शर्मनाक हार का सामना करना पड़ा।
सलमान खुर्शीद, दिग्विजय सिंह और बेनी प्रसाद वर्मा को ये लगता था कि अगर हमने मुस्लिम मतदाताओं को अपने पक्ष में कर लिया तो बाकी सारा जहां जीत लेंगे और इस भ्रम में या कहिए अहंकार में वह एक के बाद अल्पसंख्यक आरक्षण पर विवादित बयान देते चले गए। मुसलमान मतदाता भी कांग्रेस की चाल समझ गए और परिणाम ये हुआ कि अपने तो अपने नहीं ही रहे, जिनको अपना बनाने चले थे वो भी धोखा दे गए। कहने का मतलब यह कि राजनीति में जो शालीनता होनी चाहिए, संबोधनों में जो सहजता होनी चाहिए, आपके आभामंडल में जो सौम्यता होनी चाहिए वह इन नेताओं में कहीं नहीं दिखी।
जनता के बीच जब आप जा रहे हैं तो उन्हें अपनी दैहिक भाषा से इस बात का भरोसा दिलाना होगा कि आप जो कह रहे हैं उसमें कोई धोखा नहीं है, कोई संशय नहीं है। तभी आप दावे से कह सकते हैं कि जीत हमारी होगी, वरना जो हुआ आपके सामने है। उत्तराखंड में चुनाव नतीजों के बाद जो परिदृश्य उजागर हुआ उसमें भी कहीं न कहीं कांग्रेस आलाकमान की दैहिक भाषा जिम्मेदार है। सवाल यह कि सोनिया गांधी ने ऐसा कैसे सोच लिया कि उनके द्वारा नामित कोई भी नेता को सूबे का जनता स्वीकार कर लेगी। हरीश रावत सूबे के जमीनी नेता रहे हैं। मुख्यमंत्री पद पर उनका दावा सर्वमान्य था, लेकिन कांग्रेस आज भी तीन दशक पहले की राजनीति कर रही है। आलाकमान की बात भी तभी मान्य होगी जब सूबे की जनता और उनके द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों को वह मान्य हो। इस मायने में कांग्रेस को हर हाल में अपनी दैहिक भाषा सुधारनी होगी।
नेता नदारद, कमजोर संगठन
कांग्रेस के साथ बड़ी दिक्कत यह है कि जब वह चुनाव मैदान में उतरती है तो उसके आलाकमान तक को पता नहीं होता कि वह किसे नेता के रूप में पेश कर रहा है। यही हाल हुआ देश के सबसे बड़े राज्य उत्तरप्रदेश के विधानसभा चुनाव में। प्रदेश की जनता को पता था कि कम से कम राहुल गांधी तो यहां के मुख्यमंत्री नहीं बनेंगे तो फिर राहुल की बातों पर कैसे भरोसा किया जाए। आखिर राहुल किस आधार पर इतना कुछ कह रहे हैं और इसकी क्या गारंटी है कि कांग्रेस की सरकार बन जाने के बाद सारे वायदे पूरे किए जाएंगे।
कांग्रेस के साथ बड़ी दिक्कत यह है कि जब वह चुनाव मैदान में उतरती है तो उसके आलाकमान तक को पता नहीं होता कि वह किसे नेता के रूप में पेश कर रहा है। यही हाल हुआ देश के सबसे बड़े राज्य उत्तरप्रदेश के विधानसभा चुनाव में। प्रदेश की जनता को पता था कि कम से कम राहुल गांधी तो यहां के मुख्यमंत्री नहीं बनेंगे तो फिर राहुल की बातों पर कैसे भरोसा किया जाए। आखिर राहुल किस आधार पर इतना कुछ कह रहे हैं और इसकी क्या गारंटी है कि कांग्रेस की सरकार बन जाने के बाद सारे वायदे पूरे किए जाएंगे।
विधानसभा चुनाव में एक नेता का होना चुनाव जीतने की पहली शर्त होती है। नेता तो समाजवादी पार्टी ने भी घोषित नहीं किए थे, लेकिन लोगों को इतना जरूर पता था कि यदि सपा की सरकार बनती है तो मुख्यमंत्री या तो मुलायम बनेंगे या फिर उनके बेटे अखिलेश यादव बनेंगे। बसपा की सरकार बनती है तो तय है कि सीएम मायावती ही बनेंगी। लेकिन कोई आपसे पूछे कि कांग्रेस की सरकार बनती तो मुख्यमंत्री कौन बनता तो एक साथ कई नाम मसलन, बेनी प्रसाद वर्मा, प्रमोद तिवारी, रीता बहुगुणा जोशी वगैरह-वगैरह सामने आ जाते। मतदाताओं के बीच इसका अच्छा असर नहीं हुआ और कांग्रेस का खास वोट बैंक ने भी रास्ता बदल लिया। दूसरा संगठन के मामले में भी कांग्रेस काफी कमजोर दिखा। हालांकि इस बात को कांग्रेस का राष्ट्रीय अध्यक्ष सोनिया गांधी और कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी ने भी स्वीकार किया। 2007 के चुनाव के बाद कांग्रेस को पांच साल में अपना संगठन मजबूत बनाकर एक नेता को आगे कर तैयारी की होती तो खासकर यूपी चुनाव का परिदृश्य कुछ और होता।
बेमतलब की बयानबाजी
सच कहिए तो दिग्विजय सिंह की अन्ना हजारे के खिलाफ लगातार बयानबाजी, कानून मंत्री सलमान खुर्शीद और बेनी प्रसाद वर्मा के लगातार चुनाव आयोग की आदर्श चुनाव आचार संहिता का उल्लंघन करते हुए अल्पसंख्यक आरक्षण पर बयान, श्रीप्रकाश जायसवाल का उत्तर प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लगाने वाला बयान विशेष रूप से उत्तर प्रदेश की राजनीति में इतना खराब असर डाल गया जो कांग्रेस की हार का प्रमुख कारण बन गई। देखते हैं किसने क्या बयान दिया–
सच कहिए तो दिग्विजय सिंह की अन्ना हजारे के खिलाफ लगातार बयानबाजी, कानून मंत्री सलमान खुर्शीद और बेनी प्रसाद वर्मा के लगातार चुनाव आयोग की आदर्श चुनाव आचार संहिता का उल्लंघन करते हुए अल्पसंख्यक आरक्षण पर बयान, श्रीप्रकाश जायसवाल का उत्तर प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लगाने वाला बयान विशेष रूप से उत्तर प्रदेश की राजनीति में इतना खराब असर डाल गया जो कांग्रेस की हार का प्रमुख कारण बन गई। देखते हैं किसने क्या बयान दिया–
सलमान खुर्शीद के बोल : चुनाव आयोग मुझे मुस्लिम आरक्षण पर बोलने से रोक रहा है। चाहे मुझे फांसी दे दो, मैं मुस्लिम हक की बात करता रहूंगा।
बेनी प्रसाद के बोल : चुनाव आयोग चाहे तो मुझे नोटिस दे दे, लेकिन मुसलमानों का आरक्षण बढ़ाया जाएगा।
श्रीप्रकाश जायसवाल के बोल : राज्य में कांग्रेस को स्पष्ट बहुमत मिलने की संभावना है, लेकिन यदि त्रिशंकु विधानसभा आती है तो प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लग सकता है।
बेनी प्रसाद के बोल : चुनाव आयोग चाहे तो मुझे नोटिस दे दे, लेकिन मुसलमानों का आरक्षण बढ़ाया जाएगा।
श्रीप्रकाश जायसवाल के बोल : राज्य में कांग्रेस को स्पष्ट बहुमत मिलने की संभावना है, लेकिन यदि त्रिशंकु विधानसभा आती है तो प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लग सकता है।
बहरहाल, कांग्रेस आलाकमान को उक्त तीन गलतियों पर एक मंथन बैठक करनी चाहिए और एक सकारात्मक रास्ता निकालकर विधानसभा चुनाव-2012 में हुई भारी क्षति की भरपाई करने की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए। उत्तर प्रदेश राजनीतिक दृष्टि से केंद्र की राजनीति के लिए काफी अहम स्थान रखता है। तभी तो मुलायम सिंह प्रधानमंत्री बनने का ख्वाब देखने लगे हैं।
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