Saturday, 31 January 2015

मोदी ब्रिगेड पर भारी एक अकेला केजरीवाल

दिल्ली विधानसभा चुनाव 2015 अपने चरमोत्कर्ष पर है। इस चुनाव की अहमियत आम चुनाव और अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव से कहीं ज्यादा दिख रही है क्योंकि इस चुनाव से देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा के चाणक्य कहे जाने वाले अमित शाह की प्रतिष्ठा जो जुड़ी हुई है। मोदी-शाह की जोड़ी के लिए यह चुनाव 'करो या मरो' जैसा हो गया है। हर रोज केजरीवाल से भाजपा पांच सवाल पूछ रही है।
 मिशन दिल्ली के फतह में कही कोई चूक न होने पाए, इसके लिए कई राज्यों की सरकार समेत दिल्ली में सत्तारूढ़ केंद्र की मोदी सरकार भी अपना-अपना काम छोड़कर जी-जान से जुट गई है। दिल्ली नहीं तो कुछ भी नहीं के मद्देनजर आइए इसकी हम आपको यहां मोदी ब्रिगेड के काफिले से आंशिक परिचय करवाते हैं और खास बात यह है कि इस पूरे मोदी ब्रिगेड का मुकाबला 'अकेले केजरीवाल' से है।

'मोदी लहर + अमित शाह का चुनावी प्रबंधन + मोदी सरकार के एक दर्जन से अधिक केंद्रीय मंत्री + मोदी सरकार की महिला ब्रिगेड + 14 राज्यों के 120 सांसद + भाजपा शासित राज्यों के मुख्यमंत्री + एक दर्जन से अधिक राज्यों के भाजपा अध्यक्ष + आरएसएस के 5 लाख प्रचारक + बॉलीवुड स्टार्स + कॉरपोरेट मीडिया + धर्मांतरण + ओबामा की भारत यात्रा + किरण बेदी = अरविंद केजरीवाल'

है न मजेदार लड़ाई। दरअसल भाजपा और संघ ने इस चुनाव को नाक का सवाल बना लिया है और दोनों ने मिलकर चुनाव में अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। नाक का सवाल केजरीवाल के लिए भी है, लेकिन आम आदमी पार्टी के पास वैसी ताकत नहीं है कि वे भाजपा जैसा प्रदर्शन कर सकें। लेकिन केजरीवाल की सभा में किरण बेदी की सभा के मुकाबले ज्यादा भीड़ जरूर उमड़ रही है। और इसको लेकर चुनावी प्रबंधन के चाणक्य कहे जाने वाले अमित शाह 'खिसियानी बिल्ली खंभा नोचे' ही हालत में जी रहे हैं। खबरिया चैनलों के प्रायोजित साक्षात्कार में तो शाह ने यहां तक कह दिया कि आजकल वो सो नहीं रहे हैं। मतलब अमित शाह के आंखों की नींद उड़ी हुई हुई है।

जन-संपर्क के ज्यादातर साधन कॉरपोरेट के कब्जे में है और कॉरपोरेट लॉबी मोदी के साथ है, बावजूद इसके अमित शाह की भाजपा कहीं न कहीं बैकफुट पर जाती दिख रही है। 'मोदी ब्रिगेड = अरविंद केजरीवाल' वाला सियासी समीकरण भी इस बात की पुष्टि करता है। पता नहीं क्यों, दिल्ली को बीच मझधार में छोड़कर काशी की राह लेने के बावजूद अरविंद केजरीवाल में दिल्लीवासियों को 'अपनापन' का अहसास होता है। और यही अपनापन आम आदमी पार्टी की ताकत है जो कमल के प्रस्फुटन में बिध्न पैदा कर रहा है।

Monday, 26 January 2015

भारतीय गणतंत्र के 66 साल

देश आज 66वां गणतंत्र दिवस मना रहा है। कहते हैं कि कभी यह देश गणों का तंत्र था यानी शासन जनता के हाथों में होता था। आज हम सब तंत्र के गण बन चुके हैं यानी सत्ता के कल-पुर्जे। कहने को तो हम सब दुनिया के सबसे बड़े समझे जाने वाले लोकतंत्र के गण हैं पर यह सब दिखावटी बातें हैं। दरअसल हम वे मशीनी निर्जीव औजार हैं जो मिलकर एक विशालकाय मशीन तो बना लेते हैं पर उस मशीन मालिक जब चाहे अपनी जरूरत के मुताबिक उस पुर्जे को बदल सकता है। लेकिन ये किसी सफल गणतंत्र के शर्त नहीं है।

गणतंत्र केवल राजनीतिक ढांचा ही नहीं होता जिसमें समय पर चुनाव द्वारा सरकार का गठन हो। गणतंत्र एक प्रक्रिया है जिसका आधार कानून की व्यवस्था है, साथ ही इसमें लोगों के अधिकारों का भी महत्व है। यदि किसी गणतंत्र में कानून की व्यवस्था लुप्त हो जाए या लोगों के अधिकारों पर राजनीतिक नियंत्रण थोपा जाए तो उसके गणतंत्र कहलाने पर सवालिया निशान लग जाता है।

आज जबकि हम सगर्व अपना 66वां गणतंत्र दिवस मना रहे हैं तो इस बात पर चिंतन-मंथन हो कि क्या हमने अपने सभी गण के लिए सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक न्याय को सुनिश्चित कर लिया है? क्या आज सभी भारतीयों को हैसियत और अवसर की समानता उपलब्ध है? क्या सबको विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, आस्था एवं उपासना की संपूर्ण स्वतंत्रता मिली हुई है? और क्या हम अपने समाज में बंधुत्व की ऐसी भावना स्थापित करने में सफल हैं, जिससे हर व्यक्ति की गरिमा सुरक्षित हो सके?

छह दशक से अधिक के समय में हमने क्या खोया और क्या पाया? देश की आजादी तो ठीक है, लेकिन एक गणतंत्र के तौर पर सफलता की कसौटी पर हम कितना खरा उतर पाए? गणतंत्र दिवस पर हमने जो संविधान स्वीकार किया था, वह कितना सफल रहा? चिंतन इस बात पर भी होनी चाहिए कि केन्द्र-राज्यों के सम्बन्धों की जटिलता दूर करने की दिशा में क्या अड़चनें हैं और इन्हें कैसे दूर किया जा सकता है? संविधान ने तो आम जनता को बहुतेरे अधिकार दे रखे हैं लेकिन क्या हम इस देश के सभी नागरिकों को सही मायनों में आजादी दे पाए हैं?

दरअसल हमारा तंत्र इतना जटिल है कि आजादी के 65 साल बाद भी देश में बहुतेरे लोग यह कहते मिल जाते हैं कि इससे अच्छा तो अंग्रेजों का ही राज था। यानी आजादी और अपना संविधान मिलने के बावजूद कहीं ना कहीं खिन्नता का भाव देश में मौजूद है जो दर्शाता है कि तरक्की के तमाम दावों के बावजूद आमजन उपेक्षित महसूस करता है। शासन में बैठे लोगों को तो इस पर मनन करना ही चाहिए, लेकिन सबसे अधिक जिम्मेदारी गण की बनती है, तंत्र का नंबर बाद में आता है। गण को विचार करना होगा कि क्या वह अपनी जिम्मेदारी ढंग से निभा रहा है? हम अधिकारों की बात तो करते हैं लेकिन कर्तव्यों के निर्वहन की बात क्यों भूल जाते है?

हालांकि इससे कोई इनकार नहीं कर सकता कि बीते छह दशक से अधिक वर्षों में व्यापक विकास हुआ है। लेकिन दुर्भाग्य से जनहित का विचार व्यापक रूप से पीछे खिसकता गया है। जनहित की आवाज लगातार दबती चली गई। किसी भी कामयाब गणतंत्र के लिए जिन मूल्यों को आगे बढ़ाना जरूरी होता है और जिसकी व्याख्या संविधान में विशिष्ट रूप से की गई है, आज ये सारे मूल्य केवल कागजों पर रेखांकित कुछ शब्द भर रह गए हैं। आज हमारे गणतंत्र का आदर जन समर्थन पर आधारित नहीं है, सुरक्षा बलों द्वारा उनके दमन पर आधारित है। राष्ट्रवाद इस दमन की प्रक्रिया में एक ढाल की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है।

सरकार, सियासी दलों और आम नागरिक को संसाधनों का देशहित में इस्तेमाल करने की आदत डालनी चाहिए। गणतंत्र दिवस पर ईमानदारी से ये चिंतन हो जाए और उसी के अनुरूप सोच भी ढल जाए, तभी गणतंत्र की सफलता मानी जाएगी। परेड और झांकियां गणतंत्र दिवस का एक अंग हो सकता है लेकिन बात तभी बनेगी जब हम सब मिलकर अपनी गलतियों से सबक लेते हुए उन्हें ना दोहराने का संकल्प लें। महिला सुरक्षा, भ्रष्टाचार, पर्यावरण संरक्षण, मौलिक अधिकारों की पूर्ति ये कुछ ऐसे मुद्दे हैं जिसपर गंभीरता से काम करना होगा। ऐसा करना कोई मुश्किल काम नहीं, जरूरत नीयत और इच्छाशक्ति की है। उन लोगों की नीयत और इच्छाशक्ति जिनके हाथों में परोक्ष या अपरोक्ष रूप से सत्ता की बागडोर है।

इसमें कोई दो राय नहीं कि हमारी कई सफलताओं से दुनिया चकित है। बावजूद इसके यह निश्चिंत होकर बैठने का वक्त नहीं है। चुनौतियां हमेशा बनी रहती हैं, इसीलिए तो कहा गया है कि सतत जागरूकता ही स्वतंत्रता की गारंटी है। 15 अगस्त और 26 जनवरी जैसे राष्ट्रीय दिवस हमें यही याद दिलाने के लिए तो आते हैं। गणतंत्र दिवस इसी संकल्प का अवसर है कि हमारे संविधान ने जो रास्ता तय किया, उसे सुरक्षित रखने और उसपर आगे बढ़ने के लिए हम निरंतर जागरूक और प्रयत्नशील रहेंगे।

Friday, 23 January 2015

प्रधानमंत्री जी! आपके लिए अमेरिकी कंपनी अहम है या फिर बेटियों की सुरक्षा?

अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा 25 जनवरी 2015 रविवार तड़के हिन्दुस्तान की जमीं पर कदम रखेंगे। अमेरिकी राष्ट्रपति भारतीय गणतंत्र दिवस के मुख्य अतिथि के तौर पर भारत पधार रहे हैं। लेकिन इससे ठीक दो दिन पहले शुक्रवार 23 दिसंबर को जो कुछ हुआ वह भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की महिला सुरक्षा की प्रतिबद्धता को तार-तार करने वाला कदम कहा जाए तो कोई गलती नहीं होगी। देश प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से इस सवाल पर जवाब चाहता है कि आपके लिए अमेरिकी आका की खुशी के लिए उबेर कैब को संचालन देना ज्यादा मायने रखता है या फिर देश की बेटियों की सुरक्षा।

भारत सरकार ने अमेरिकी कैब सेवा प्रदाता कंपनी उबेर कैब को फिर से राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में कैब संचालन की अनुमति दे दी है। बावजूद इसके कि इसी उबेर कैब के चालक ने बीते साल 6 दिसंबर की रात दिल्ली में एक 26 साल की युवती के साथ रेप किया था। त्वरित कार्रवाई करते हुए सरकार ने उबेर कैब कंपनी के कैब संचालन पर तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी थी।

यहां एक चौंकाने वाली बात यह है कि बलात्कार पीड़िता के अमेरिकी वकील डगलस विडगोर जो न्यू यॉर्क में रहते हैं ने भारत सरकार के इस फैसले पर आश्चर्य जताया और कहा कि उन्हें यह विश्वास नहीं हो रहा है कि कंपनी ने भारत केंद्रित सुरक्षा उपाय लागू किए जाने का जो आश्वासन दिया है उससे कैब में सफर करने वाले सवारियों पर एक और हमला रूक जाएगा।

डगलस विडगोर की बातों पर भरोसा करें तो उबेर ने उनके मुवक्किल को सीधे ई-मेल करने की ‘धृष्टता’ की जिसमें उसने कहा है कि वह दिल्ली के बाजार में फिर से आ गई है। युवती के साथ रेप की दुखद घटना के कुछ दिनों के बाद ही और उबेर के चालक की सुनवाई के दौरान यह ई-मेल किया गया है। विडगोर न्यू यॉर्क के एक प्रसिद्ध वकील हैं और 6 दिसंबर  2014 को नई दिल्ली में उबेर के एक चालक द्वारा बलात्कार की पीड़िता ने उनकी सेवाएं ली हैं।