दिल्ली विधानसभा चुनाव 2015 अपने चरमोत्कर्ष पर है। इस चुनाव की अहमियत आम चुनाव और अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव से कहीं ज्यादा दिख रही है क्योंकि इस चुनाव से देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा के चाणक्य कहे जाने वाले अमित शाह की प्रतिष्ठा जो जुड़ी हुई है। मोदी-शाह की जोड़ी के लिए यह चुनाव 'करो या मरो' जैसा हो गया है। हर रोज केजरीवाल से भाजपा पांच सवाल पूछ रही है।
मिशन दिल्ली के फतह में कही कोई चूक न होने पाए, इसके लिए कई राज्यों की सरकार समेत दिल्ली में सत्तारूढ़ केंद्र की मोदी सरकार भी अपना-अपना काम छोड़कर जी-जान से जुट गई है। दिल्ली नहीं तो कुछ भी नहीं के मद्देनजर आइए इसकी हम आपको यहां मोदी ब्रिगेड के काफिले से आंशिक परिचय करवाते हैं और खास बात यह है कि इस पूरे मोदी ब्रिगेड का मुकाबला 'अकेले केजरीवाल' से है।
'मोदी लहर + अमित शाह का चुनावी प्रबंधन + मोदी सरकार के एक दर्जन से अधिक केंद्रीय मंत्री + मोदी सरकार की महिला ब्रिगेड + 14 राज्यों के 120 सांसद + भाजपा शासित राज्यों के मुख्यमंत्री + एक दर्जन से अधिक राज्यों के भाजपा अध्यक्ष + आरएसएस के 5 लाख प्रचारक + बॉलीवुड स्टार्स + कॉरपोरेट मीडिया + धर्मांतरण + ओबामा की भारत यात्रा + किरण बेदी = अरविंद केजरीवाल'
है न मजेदार लड़ाई। दरअसल भाजपा और संघ ने इस चुनाव को नाक का सवाल बना लिया है और दोनों ने मिलकर चुनाव में अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। नाक का सवाल केजरीवाल के लिए भी है, लेकिन आम आदमी पार्टी के पास वैसी ताकत नहीं है कि वे भाजपा जैसा प्रदर्शन कर सकें। लेकिन केजरीवाल की सभा में किरण बेदी की सभा के मुकाबले ज्यादा भीड़ जरूर उमड़ रही है। और इसको लेकर चुनावी प्रबंधन के चाणक्य कहे जाने वाले अमित शाह 'खिसियानी बिल्ली खंभा नोचे' ही हालत में जी रहे हैं। खबरिया चैनलों के प्रायोजित साक्षात्कार में तो शाह ने यहां तक कह दिया कि आजकल वो सो नहीं रहे हैं। मतलब अमित शाह के आंखों की नींद उड़ी हुई हुई है।
जन-संपर्क के ज्यादातर साधन कॉरपोरेट के कब्जे में है और कॉरपोरेट लॉबी मोदी के साथ है, बावजूद इसके अमित शाह की भाजपा कहीं न कहीं बैकफुट पर जाती दिख रही है। 'मोदी ब्रिगेड = अरविंद केजरीवाल' वाला सियासी समीकरण भी इस बात की पुष्टि करता है। पता नहीं क्यों, दिल्ली को बीच मझधार में छोड़कर काशी की राह लेने के बावजूद अरविंद केजरीवाल में दिल्लीवासियों को 'अपनापन' का अहसास होता है। और यही अपनापन आम आदमी पार्टी की ताकत है जो कमल के प्रस्फुटन में बिध्न पैदा कर रहा है।
मिशन दिल्ली के फतह में कही कोई चूक न होने पाए, इसके लिए कई राज्यों की सरकार समेत दिल्ली में सत्तारूढ़ केंद्र की मोदी सरकार भी अपना-अपना काम छोड़कर जी-जान से जुट गई है। दिल्ली नहीं तो कुछ भी नहीं के मद्देनजर आइए इसकी हम आपको यहां मोदी ब्रिगेड के काफिले से आंशिक परिचय करवाते हैं और खास बात यह है कि इस पूरे मोदी ब्रिगेड का मुकाबला 'अकेले केजरीवाल' से है।
'मोदी लहर + अमित शाह का चुनावी प्रबंधन + मोदी सरकार के एक दर्जन से अधिक केंद्रीय मंत्री + मोदी सरकार की महिला ब्रिगेड + 14 राज्यों के 120 सांसद + भाजपा शासित राज्यों के मुख्यमंत्री + एक दर्जन से अधिक राज्यों के भाजपा अध्यक्ष + आरएसएस के 5 लाख प्रचारक + बॉलीवुड स्टार्स + कॉरपोरेट मीडिया + धर्मांतरण + ओबामा की भारत यात्रा + किरण बेदी = अरविंद केजरीवाल'
है न मजेदार लड़ाई। दरअसल भाजपा और संघ ने इस चुनाव को नाक का सवाल बना लिया है और दोनों ने मिलकर चुनाव में अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। नाक का सवाल केजरीवाल के लिए भी है, लेकिन आम आदमी पार्टी के पास वैसी ताकत नहीं है कि वे भाजपा जैसा प्रदर्शन कर सकें। लेकिन केजरीवाल की सभा में किरण बेदी की सभा के मुकाबले ज्यादा भीड़ जरूर उमड़ रही है। और इसको लेकर चुनावी प्रबंधन के चाणक्य कहे जाने वाले अमित शाह 'खिसियानी बिल्ली खंभा नोचे' ही हालत में जी रहे हैं। खबरिया चैनलों के प्रायोजित साक्षात्कार में तो शाह ने यहां तक कह दिया कि आजकल वो सो नहीं रहे हैं। मतलब अमित शाह के आंखों की नींद उड़ी हुई हुई है।
जन-संपर्क के ज्यादातर साधन कॉरपोरेट के कब्जे में है और कॉरपोरेट लॉबी मोदी के साथ है, बावजूद इसके अमित शाह की भाजपा कहीं न कहीं बैकफुट पर जाती दिख रही है। 'मोदी ब्रिगेड = अरविंद केजरीवाल' वाला सियासी समीकरण भी इस बात की पुष्टि करता है। पता नहीं क्यों, दिल्ली को बीच मझधार में छोड़कर काशी की राह लेने के बावजूद अरविंद केजरीवाल में दिल्लीवासियों को 'अपनापन' का अहसास होता है। और यही अपनापन आम आदमी पार्टी की ताकत है जो कमल के प्रस्फुटन में बिध्न पैदा कर रहा है।

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