Friday, 28 December 2012

यह वक्त है सामाजिक और राजनीतिक सुधार का

दिल्ली में में 23 वर्षीय पैरामेडिकल छात्रा के साथ सामूहिक बलात्कार के मामले में इंसाफ की मांग को लेकर उपजे जन आक्रोश को अनदेखा नहीं किया जा सकता है। न तो सरकार के स्तर पर और न ही समाज के स्तर पर। एक तरफ जहां समाज को प्रतिबद्धता के साथ इस लड़ाई को आगे बढ़ानी होगी, वहीं सरकार के स्तर पर कुछ ऐसे उपाय ईजाद करने होंगे ताकि गैंगरेप जैसे हालात पैदा ही न हों। मैं मानता हूं कि आर्थिक उदारीकरण के साथ-साथ देश में राजनीतिक उदारीकरण और पितृ सत्तात्मक भारतीय समाज का उदारीकरण भी होना जरूरी था जो नहीं हो पाया, लेकिन इसके साथ ही खासकर महिलाओं से जुड़े अपराध से संबंधित जो आदम जमाने के कानून की जिस छाया में हम जी रहे हैं उसे भी बदलने की सख्त जरूरत है। देश में आर्थिक उदारीकरण के जनक और हमारे अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह पता नहीं क्यों भूल गए कि देश, समाज, सरकार और कानून-व्यवस्था का उदारीकरण किए बिना आर्थिक उदारीकरण कभी सफल नहीं हो पाता है। दुर्भाग्य से हमारा देश कुछ ऐसे ही हालात में जी रहा है और इसका दुष्परिणाम हत्या, लूट, डाका, बलात्कार, सामूहिक बलात्कार, अपहरण आदि के रूप में सामने आ रहा है।

दरअसल इस तरह के अपराध को अंजाम देने वाला शख्स आर्थिक उदारीकरण के बाद की पीढ़ी है जिसकी सोच तो भौतिकवादी है लेकिन वह चारों तरफ से पुरातन समाज के कायदे- कानून और सामाजिक ताने-बाने में इस तरह से जकड़ा हुआ है कि इन दोनों के बीच वह संतुलन नहीं बिठा पाता जिससे हादसे हो जाते हैं। निश्चित रूप से जिन युवा प्रजाति के लड़कों ने इस जघन्य सामूहिक बलात्कार को अंजाम दिया, इसके पीछे कोई सोची समझी रणनीति नहीं रही होगी। जहां तक मैं समझ रहा हूं, बस के अंदर दुर्भाग्य से कुछ ऐसी परिस्थितियां बनी होगी (मसलन दोनों पक्षों में किसी बात को लेकर विवाद आदि) कि नशे में धुत्त आवारा किस्म के लड़कों ने इस जघन्य घटना को अंजाम दे दिया। लेकिन इतना तो तय है कि एक तो ये लड़के शराब के नशे में धुत्त थे और दूसरा ये कि इनको पुलिस और कानून का भय नहीं रहा होगा। ये सब कुछ क्यों हुआ और कैसे हुआ यह पुलिस जांच का विषय है लेकिन जो कुछ हुआ इससे वीभत्स घटना की कल्पना नहीं की जा सकती और इसमें आरोपियों को जो भी सजा मुकर्रर की जाएगी वो कम होगी। सजा होगी और सख्त से सख्त सजा होगी यह भी तय मानिए क्यों कि इस घटना की प्रतिक्रिया पूरे देश में जिस तरह से सामने आई वह भी कल्पना से परे है। लेकिन हम सबको मिलकर इस सूरत को बदलनी होगी वरना देश, समाज और सरकार उसी ढर्रे पर चलता रहेगा कि घटना घटी, हंगामा हुआ, सरकार की तरफ से सजा का ऐलान कर दिया गया और फिर वही मरघट की शांति।

महिलाएं भारतीय समाज में एक बेहतर जिंदगी कैसे जीएं, इसको लेकर आज पूरे देश में बड़ी बड़ी बहस छिड़ी हुई है। कोई कह रहा है महिला अपराध से संबंधित मामलों की सुनवाई को फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाया जाए, कोई कहता है महिला अपराध रोकने से संबंधित कानून को बदला जाए तो कोई कहता है कि पुलिस को सुधारा जाए। इस बात पर कोई बहस नहीं हो रही कि कुछ ऐसे उपाय क्यों नहीं ईजाद किए जाएं कि पुलिस, थाना और कचहरी तक पहुंचने की नौबत ही न आने पाए। मेरा मानना है कि इसके लिए हमें समस्या की जड़ में जाना चाहिए और समाधान के रास्ते वहीं से निकालने चाहिए। जहां तक मेरा चिंतन कहता है, हमें सबसे पहले सामाजिक उदारीकरण का रास्ता तैयार करना पड़ेगा। जाहिर है यह बड़ा सवाल सबके मन में होगा कि यह सामाजिक उदारीकरण क्या बला है?

सामाजिक उदारीकरण नाम का यह शब्द कोई अमेरिका से आयात नहीं किया गया है। सदियों से समय-समय पर भारतीय संस्कृति में सामाजिक उदारीकरण होता रहा है और एक बार फिर इसकी जरूरत आ पड़ी है क्यों कि हमारे देश के कुछ नीति निर्माताओं ने पश्चिमी देशों के दबाव में आर्थिक उदारीकरण का जो जाल देश में फैला दिया है उससे संतुलन बिठाने के लिए सामाजिक उदारीकरण जरूरी हो गया है। एक आम आदमी की भाषा में अगर इसे परिभाषित करना हो तो इसे यूं कहें कि समाज का हर व्यक्ति चाहे वह महिला हो या पुरुष, सबकी तरक्की कैसे हो इस बारे में सहज भाव से सोचे, समझे और मदद को तत्पर रहे। अपनी बेटी और पड़ोसी की बेटी का फर्क मिटाना होगा, बेटी और बहू का भेद मिटाना होगा, लड़का और लड़की का भेद भी मिटाना होगा, जात-पांत, धर्म-संप्रदाय में दूरियां खत्म करनी होगी। ये सारी चीजें सामाजिक उदारीकरण के दायरे में आती है और जिस दिन हम अपने देश में सामाजिक उदारीकरण के पेड़ को उगा लिए समझिए समाज की किसी महिला के खिलाफ अपराध नहीं होगा।

अब हम आगे चलते हैं। सामाजिक उदारीकरण एक लंबी प्रक्रिया है जो एक दिन में नहीं आने वाली। इसपर हमें सतत और समयबद्ध तरीके से काम करना होगा, लेकिन इसके साथ जो तत्काल प्रभाव से एक काम करना चाहिए और जो संभव भी है वो है देश के सभी राज्यों में शराबबंदी कानून लागू करने का। कहते हैं कि पूरे देश में गुजरात एक ऐसा राज्य है जहां यह कानून लागू है। मेरा मानना है कि गुजरात की तर्ज पर इसे सभी राज्यों में लागू किया जाना चाहिए और अगर सरकार इस दिशा में आगे नहीं बढ़ती है तो इसके लिए जन आंदोलन छेड़ा जा सकता है।

मेरा मानना है और इसमें कोई दो राय नहीं कि समाज में तमाम अपराधों की जड़ में शराब होता है। खासकर महिलाओं के खिलाफ अपराध में शराब की भूमिका सबसे अधिक होती है। अगर लोग शराब न पीएं तो महिलाओं के खिलाफ घरेलू हिंसा, बलात्कार, सामूहिक बलात्कार, मारपीट आदि के साथ-साथ सड़क हादसों में भी काफी कमी आएगी और लोगों की आर्थिक संपन्नता भी बढ़ेगी। शराब के खिलाफ अभियान सामाजिक उदारीकरण को लागू करने में काफी सहायक होगा और भरोसे के साथ हम कह सकते हैं कि दिल्ली गैंगरेप जैसी वीभत्स घटनाओं की आशंकाओं को जड़ से मिटाया जा सकता है।

इस सबके बावजूद अगर महिलाओं के खिलाफ अपराध का कोई मामला सामने आता है जो एक सोची समझी रणनीति या साजिश का हिस्सा होता है तो उसके लिए महिलाओं के खिलाफ अपराध से संबंधित जो कानून सदियों से देश में चले आ रहे हैं उसमें संशोधन किया जा सकता है और पुलिस को आधुनिक तौर तरीकों से कुछ इस तरह से प्रशिक्षित किया जाए ताकि कोई भी पीड़ित लड़की जब थाने में शिकायत दर्ज कराने जाए तो उसे अपने घर जैसा अहसास हो। मेरा मानना है कि महिलाओं के खिलाफ अपराध चाहे वह छेड़खानी हो, घरेलू हिंसा हो, अपहरण हो, बलात्कार हो या फिर सामूहिक बलात्कार गैरजमानती तीन साल से लेकर फांसी तक की सजा का प्रावधान होना चाहिए।

जाहिर सी बात है कि यह सब राजनीतिक इच्चाशक्ति के बिना संभव नहीं है। अमेरिका के कहने पर अगर देश में परमाणु समझौता के लिए संसद में खास बहस हो सकती है, मल्टी ब्रांड रिटेल सेक्टर में प्रत्य़क्ष विदेशी निवेश (एफडीआइ) के लिए बहस हो सकती है, तो देश की महिलाओं की मुकम्मल सुरक्षा की बातचीत के लिए संसद क्यों नहीं बैठ सकती? देश की जनता चाहती है कि संसद समयबद्ध तरीके से व्यवस्था में सुधार के लिए एक कारगर कानून बनाए, यही रास्ता है। यानी संसद या विधायिका या विधानमंडल की यह संवैधानिक और नैतिक जिम्मेदारी बनती है कि जनता के प्रति, जनता के लिए और जनता के हित में एक ऐसा कानून बनाए जो अपराधियों के दिलो-दिमाग में खौफ पैदा कर सके। यह जरूरी इसलिए भी है क्यों कि दिल्ली गैंगरेप की घटना ने पूरी दुनिया में भारत की छवि को खराब किया है। इस घटना को लेकर न्यूयॉर्क टाइम्स अखबार ने लिखा, `भारत का अपराध संबंधी न्याय तंत्र अयोग्यता, भ्रष्टाचार व राजनीतिक हस्तक्षेप का शिकार है। ऐसा लगता है कि यह प्रभावी ढंग से प्रतिक्रिया देने में सक्षम नहीं है। सीएनएन की रिपोर्ट के अनुसार, भारत के आधिकारिक आंकड़े बताते हैं कि पिछले 40 वर्षों में दुष्कर्म की घटनाओं में करीब 875 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। 1971 में दुष्कर्म की 2487 घटनाएं हुई थीं। 2011 में ऐसी 24206 घटनाएं हुईं हैं।

बहरहाल, भारत को वैश्विक शक्ति के रूप में अपनी पहचान बनानी है तो देश की सत्ता में बैठे राजनीतिक दलों व उनके नेताओं को अपनी दैहिक भाषा बदलनी होगी। यह कहने से काम नहीं चलेगा कि हमारी भी तीन बेटियां हैं और गैंगरेप की इस घटना को लेकर हमें दुख है। देश के गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे ने तो गजब ही कर दिया। उनकी नजर में गैंगरेप केस में इंसाफ मांग रहे युवा लड़के-लड़कियों और माओवादियों में कोई फर्क ही नजर नहीं आया। इंडिया गेट पर प्रदर्शन कर इंसाफ की मांग कर रहे युवाओं से मिलने के सवाल पर गृहमंत्री ने यहां तक कह दिया कि कल को अगर माओवादी हथियारों के साथ प्रदर्शन करने लगें तो क्या मैं वहां भी जाऊंगा’? शिंदे ने कहा कि वो महिलाओं के खिलाफ बढ़ती रेप की घटनाओं का विरोध कर रहे प्रदर्शनकारियों से नहीं मिलेंगे। शिंदे ने यह भी कहा कि रेप कानून में संशोधन पर संसद का विशेष सत्र बुलाने की भी जरूरत नहीं है। इतने से साफ है कि जिस सरकार में सुशील कुमार शिंदे जैसे गृह मंत्री बैठे हो, न्याय की उम्मीद बेमानी ही होगी। इसलिए हमें राजनीतिक उदारीकरण की भी बात करनी होगी। भले ही इसके लिए आजादी की एक और लड़ाई क्यों न लड़नी पड़े। देश की जनता को जन नेता चाहिए राजनेता नहीं।

Thursday, 20 December 2012

नरेंद्र मोदी की महाविजय के हैं कई मायने

गुजरात में नरेंद्र मोदी ने जीत की हैट्रिक लगा दी है। यह मोदी की लगातार तीसरी और भाजपा की लगातार पांचवीं जीत है। तय मानिए यह जीत गुजरात का विकास और नरेंद्र मोदी के हिंदुत्व की है। यह जीत नरेंद्र मोदी को देश का प्रधानमंत्री बनाने के लिए जीत है। 182 सीट वाले गुजरात विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 115 सीटों पर जीत दर्ज कर एक बार फिर इतिहास रच दिया है। यह वाकई नरेंद्र मोदी की महाविजय है और इस महाविजय के कई मायने हैं।


पिछले डेढ़ दशक से गुजरात में भाजपा की सरकार है और खास बात यह है कि इन वर्षों में गुजरात ने आर्थिक और सामाजिक दोनों ही मोर्चे पर भारी तरक्की की है। गुजरात की सफलताएं इतनी प्रभावशाली हैं कि देश क्या दुनिया की निगाहें गुजरात पर आकर ठहर जाती हैं। इस सच से कोई इंकार नहीं कर सकता कि नरेंद्र मोदी आज की तारीख में भाजपा के सबसे बड़े नेता हैं और गुजरात विधानसभा का चुनाव जीतकर मोदी का कद आज और बड़ा हो गया है। नरेंद्र मोदी एक ईमानदार राजनेता हैं। नैतिक जिम्मेदारी के साथ जीते हैं। उनकी प्रशासनिक क्षमता संदेह से परे है। गुजरात में विकास के लिए उनकी गिनती देश के काबिल मुख्यमंत्रियों में होती है। मोदी के नाम पर भाजपा के कार्यकर्ता जोश से भर जाते हैं और सबसे बड़ी बात यह कि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और भाजपा जिस विचारधारा से ऊर्जा पाती है मोदी उसके सबसे बड़े प्रतीक पुरुष हैं। मोदी ने इस विचारधारा को नया आयाम दिया है। उन्होंने भाजपा के `हिंदुत्व` को `विकास` से जोड़कर एक नया मॉडल पेश करने की कोशिश की जिसमें वह बेहद सफल रहे।


पहले बात हिंदुत्व की ही करते हैं। दरअसल जिस सोमनाथ से लालकृष्ण आडवाणी ने 1989 में राम मंदिर के लिए रथयात्रा शुरू की थी, वहीं से आशीर्वाद लेकर नरेंद्र मोदी ने भी औपचारिक रूप से गुजरात में अपना चुनावी अभियान छह करोड़ गुजरातियों के विकास के नारे के साथ शुरू किया था। यह पहला मौका है जब हिंदुत्व की जमीन पर खड़े नरेंद्र मोदी का छह करोड़ गुजरातियों के विकास का नारा प्रभावी दिख रहा है। सद्भावना उपवास के बाद मोदी ने गुजरात में किसी मुस्लिम को भाजपा का टिकट नहीं दिया, लेकिन विकास में बराबर भागीदारी के नाम पर उन्हें भी अपने अभियान में शामिल करने की कोशिश की है। इसके अलावा मोदी ने महिलाओं और युवाओं पर सबसे ज्यादा फोकस किया। गुजरात का चुनावी इतिहास इस बात का गवाह है कि जब-जब प्रदेश में मतदान प्रतिशत अधिक होता है, भाजपा को सत्ता मिली है। गुजरात ने अपने पिछले रिकार्ड को तोड़ते हुए ताजा विधानसभा चुनाव में मतदान प्रतिशत का नया रिकार्ड बनाया है। साल 1995 में विधानसभा चुनावों में रिकार्ड 64.70 फीसदी मतदान हुआ था। तब केशुभाई पटेल भाजपा के मुख्यमंत्री बने थे। इस बार के चुनावों ने पिछले रिकार्ड को ध्वस्त करते हुए 71.30 फीसदी का नया रिकार्ड कायम किया है। मोदी ने सत्ता की हैट्रिक बनाई।


गोधरा कांड के बाद राज्य भर में भड़के दंगों के बाद साल 2002 के विधानसभा चुनावों में 61.55 फीसदी मतदान हुआ था और भाजपा सत्ता में आई थी। साल 2007 के विधानसभा चुनावों में हालांकि 59.77 फीसदी मतदान दर्ज किया गया था और तब भी भाजपा को सत्ता मिली थी। उस समय भाजपा को कुल 182 में से 117 सीटें मिली थी। कहने का मतलब यह कि मतदान प्रतिशत बढ़ने का तो गुजरात में भाजपा को फायदा होता ही है साथ ही एंटी इनकम्बेंसी फेक्टर के पंख भी इस प्रदेश में आकर कट जाते हैं। नरेंद्र मोदी ने मतदान के अंतिम चरण में मतदान करने से पहले कहा भी था कि गुजरात में प्रो-इनकम्बेंसी फेक्टर काम करता है। गुजरात में भाजपा की भव्य विजय होगी। निश्चित रूप से यह हिंदुत्व का एजेंडा ही है जो नरेंद्र मोदी की साख को लगातार बढ़ा रहा है।


दरअसल मोदी हिंदुत्व के जिस एजेंडा को लेकर चल रहे हैं वह वास्तविक हिंदुत्व की परिभाषा से ओतप्रोत है। मोदी के हिंदुत्व एजेंडा को आप सांप्रदायिकता के चश्मे से नहीं देख सकते हैं। नरेंद्र मोदी दरअसल वास्तविक राष्ट्रवाद के आधार पर शासन चलाते हैं और यह सत्य नियम है कि वास्तविक राष्ट्रवाद की बुनियाद पर काम किया जाए तो हिंदुत्व उस राष्ट्र का भविष्य बदल देगा। सोमनाथ मंदिर के सामने ठेला लगाने वाले मुसलमान भाई को इस बात से कोई मतलब नहीं कि प्रदेश में कौन जीत रहा है और कौन हार रहा है। वह मोदी राज में काफी सुरक्षित महसूस करता है। असुरक्षा का भाव होने का सवाल पूछने पर उसका कहना है कि साहब! यहां मंदिर में तो सब हिंदू ही तो आते हैं। आज तक तो ऐसा कोई भाव नहीं आया। समझ सकते हैं कि नरेंद्र मोदी इस प्रकार के हिंदुत्व को जीते हैं।


अब मोदी राज में विकास की बात करते हैं। गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी देश के ऐसे इकलौते राजनेता हैं जो जिंदगी अपनी शर्तों पर जीते हैं और इसी दर्शन के साथ वह तीसरी बार सत्ता में आए हैं। आपको याद होगा जब वर्ष 2002 में गुजरात में गोधरा की आग फैली थी तो पूरी दुनिया में गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को अछूत मान लिया गया था। देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने भी उन्हें `राजधर्म` का पालन करने की नसीहत दे डाली थी। ब्रिटेन ने 2002 में द्विपक्षीय सम्बंधों पर रोक लगा दी थी और मार्च-2005 में अमरीका ने मोदी को वीजा देने से इनकार कर दिया था। तब मोदी ने कसम खाई थी कि वह जीते जी अमेरिका की धरती पर कदम नहीं रखेंगे। और फिर मोदी ने गुजरात के परिदृश्य को ऐसे बदला कि गुजरात बना विकास मॉडल और नरेंद्र मोदी बने विकास पुरूष।


नरेंद्र दामोदर दास मोदी ने जब अक्तूबर 2001 में मुख्यमंत्री के रूप में पहली बार कार्यभार संभाला था तब गुजरात 26 जनवरी, 2001 को आए विनाशकारी भूकंप की विभीषिका तले दबा हुआ था। तब लगता था मानो गुजरात फिर कभी उठ नहीं पाएगा। लेकिन पुनर्वास और पुनर्निमाण के तेज प्रयासों और पुन: उठ खड़े होने के लोगों के अदम्य साहस और जज्बे से गुजरात विकास के मार्ग पर अग्रसर हो गया। उस दौर में गुजरात के पुनर्वास कार्य को रोल मॉडल के तौर पर स्वीकार किया गया। अपने डेढ़ दशक से अधिक के शासनकाल में मोदी के विकासवादी सोच के कुछ अहम फैसलों ने गुजरात कि किस्मत ही बदल दी।


किसी भी देश या राज्य की अर्थव्यवस्था की बात जब हम करते हैं तो निश्चित रूप से उसके सकल घरेलू उत्पाद दर (जीडीपी दर), कृषि विकास दर, औद्योगिक विकास दर और सेवा क्षेत्र में तरक्की की जमीनी हकीकत को आंका जाता है। गुजरात के सकल घरेलू उत्पाद (तरक्की की रफ्तार) की बात करें तो यह हमेशा डबल डिजिट में रही है। वर्ष 2000 के बाद गुजरात में कृषि की विकास दर बहुत अच्छी रही है। गुजरात में कृषि विकास दर हमेशा 10 प्रतिशत से ज्यादा रही है। वर्ष 2001 में गुजरात में 2000 मेगावाट बिजली पैदा होती थी जो उसकी अपनी जरूरत से बहुत कम थी, लेकिन 2012 के अंत में गुजरात में अतिरिक्त बिजली पैदा होने लगी। चूंकि बिजली औद्योगिक विकास के लिए संजीवनी होती है इसलिए गुजरात में औद्योगिक विकास की रफ्तार भी तेज है।


लोग अक्सर पूछते हैं कि गुजरात मॉडल क्या है। दरअसल इस राज्य में व्यक्तिगत पहल और उद्यमशीलता के लिए पूरी आजादी दी गई है और राज्य ने इसके लिए अनुकूल माहौल भी पैदा किया है। यह नियोजन के सशक्तिकरण और लोगों के सशक्तिकरण का बेजोड़ उदाहरण है। इसमें केंद्र के अनुदान से चलनेवाली योजनाओं के साथ राज्य की विशिष्ठ योजनाओँ को पूरक बनाया गया है। यह विकास का एक मानक सांचा है जिसे कोई भी राज्य अपनाकर तरक्की की राह पकड़ सकता है।


गुजरात विधानसभा चुनाव में जीत की हैट्रिक लगाकर नरेंद्र मोदी निश्चित रूप से देश के प्रधानमंत्री पद के संभावित दावेदारों में पहले पायदान पर आ गए हैं। इस मसले पर बहस पिछले एक साल से चल रही है और पूरे देश की निगाहें गुजरात विधानसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी के प्रदर्शन पर लगी थी। इस तरह के कयास लगाए जा रहे थे कि अगर नरेंद्र मोदी अपने पिछले प्रदर्शन से बेहतर प्रदर्शन करते हैं तो उस सूरत में नरेंद्र मोदी को देश का प्रधानमंत्री बनने से कोई नहीं रोक सकता है। अब जबकि गुजरात के नतीजे सामने आ चुके हैं, नरेंद्र मोदी को गुजरात से दिल्ली की ओर कूच करना चाहिए। मोदी को प्रधानमंत्री बनने के लिए मां का आशीर्वाद भी मिल चुका है तो फिर देर किस बात की....

Monday, 19 March 2012

महंगाई डायन को दादा की शह

आपने आमिर खान की फिल्म ‘पीपली लाइव’ जरूर देखा होगा और अगर फिल्म देखने का सुअवसर नहीं मिल पाया हो तो इस फिल्म का यह गाना तो निश्चित ही आपके कानों में गूंजा होगा-

‘सखी सैयां तो खूब ही कमात है,
महंगाई डायन खाए जात है’



हां! हम बात कर रहे हैं देश के वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी (दादा) द्वारा 16 मार्च (शुक्रवार) को पेश आम बजट 2012-13 की जिसमें दादा ने महंगाई डायन को अपनी तरफ से पूरी शह दे दी है कि एक साल का मौका तुम्हारे पास है, महंगाई का तांडव फैलाकर देश से गरीब जनता को ही मिटा दो। गरीब मिट जाएंगे तो गरीबी खुद-ब-खुद मिट जाएगी और फिर महंगाई का रोना जो किसी भी सरकार के लिए हमेशा सिर पर तलवार की तरह लटकती रहती है, से सदा के लिए मुक्ति मिल जाएगी। बात भी सही है कि यह महंगाई ही है जो किसी भी सरकार के आने और जाने का बहाना बनती है। यह महंगाई ही एक ऐसी चीज है जिस पर पूरे देश की एक राय बन जाती है वरना कहीं भाषा तो कहीं जाति, धर्म, वर्ग आदि के नाम पर अपनी-अपनी ढपली और अपना-अपना राग चलता है। इस तरह से देखा जाए तो महंगाई सारे देश को एकता के सूत्र में बांधकर रखती है। राष्ट्रीय एकता के लिए यह महंगाई किसी वरदान से कम नहीं है और इसी वरदान को सरकार जनता से छीन लेना चाहती है।

मनमोहन सरकार के वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने वित्त वर्ष 2012-13 को जो आम बजट पेश किया उसने बढ़ती महंगाई की धार को और गति दे दी है। दादा के इस बजट से कोई खुश नहीं है। ना तो गरीब, ना ही अमीर। एक लाइन में कहें तो महंगाई को लेकर बजट संवेदनशील नहीं है। महंगाई को लेकर बजट संवेदनशील होता, तो कुछ चीजों के भाव ज्यादा बढ़ते, कुछ के भाव कम गति से बढ़ते और कुछ के भाव बिलकुल नहीं बढ़ते। दुर्भाग्य से ऐसा नहीं हुआ। आइए समझते हैं महंगाई डायन का गणित–

सेवा वही, पर बढ़ा सेवा कर
दादा ने बजट में सेवा कर यानी सर्विस टेक्स में 2 प्रतिशत की वृद्धि कर दी है यानी पहले यदि आप मोबाइल फोन पर 500 रुपए प्रतिमाह खर्चते थे तो सेवा कर जोड़कर मोबाइल सेवा प्रदाता कंपनी को 550 रुपए से अधिक देते थे। अब सेवा प्रदाता कंपनी को उतनी ही सेवा पर, प्रतिमाह के उसी बजट पर आपको मोबाइल बिल के रूप में 560 रुपए से अधिक चुकाने होंगे। यानी प्रतिमाह 10 रुपए से भी अधिक। मोबाइल फोन एक उदाहरण है। आम आदमी के दैनिक जीवन में ऐसी कई दर्जन सेवाएं हैं जिनपर 2.06 प्रतिशत अधिक सेवा कर का भुगतान करना होगा। दादा कह रहे हैं कि हमने आयकर में छूट का दायरा बढ़ा दिया। जनता को यह पूछने का हक है कि कितना बढ़ाया, 1,80,000 रुपए से बढ़ाकर 2 लाख रुपए कर दिया। इससे 5 लाख रुपए तक की आमदनी वाले लोगों को 2000 रुपए सालाना (यानी मासिक करीब 170 रुपए) का फायदा होगा जबकि 8-10 लाख रुपए तक की आय वालों को तकरीबन 20,000 और 10 लाख से ज्यादा आय वालों को 22000 हजार का फायदा। यहां मोबाइल बिल पर तो हर महीने 2.36 प्रतिशत का सेवा कर चुकाना होगा।

देश की कर प्रणाली का इतिहास पलटें तो सेवा कर की शुरुआत 1994-95 में 5 प्रतिशत से हुई थी। तब टेलीफोन बिल, स्टॉक ब्रोकिंग और जनरल इंश्योरेंस को इसके दायरे में लाया गया था। समय के साथ महंगाई बढ़ती गई और सेवा कर का ग्राफ भी बढ़ता गया और नए वित्त वर्ष से यह एजुकेशन सेस और उसपर सरचार्ज के बाद यह 12.36 प्रतिशत हो जाएगा। साथ ही सौ से अधिक सेवाओं के इस दायरे में लाया जा चुका है। मसलन रेलवे फर्स्ट क्लास और एसी की सभी क्लास, रेलवे ट्रेवल, एयर ट्रेवल एजेंट, एयरपोर्ट सर्विस, एटीएम सेवा, बैंकिंग सेवाएं, ब्यूटी पार्लर, केबल ऑपरेटर, कोरियर सेवा, क्रेडिट व डेबिट कार्ड, ड्रायक्लीनिंग, हैल्थ क्लब, इंटरनेट कैफे, लाइफ इंश्योरेंस, फोटोग्राफी, स्वास्थ्य सेवाएं, कोचिंग, पंडाल व शमियाना सेवाएं, आईटी व सॉफ्टवेयर सेवाएं, एसी रेस्टोरेंट, होटल व गेस्ट हाउस की सेवाओं के अलावा कई और सेवाएं हैं जो सेवा कर के दायरे में शामिल की गई हैं जो एक आम आदमी को सीधे तौर पर प्रभावित करेगा।

अमीरों पर भी बोझ कम नहीं
बजट में एक्साइज ड्यूटी यानी उत्पाद शुल्क में भी 2 प्रतिशत की बढ़ोतरी की गई है। दादा का बजट भाषण पूरा भी नहीं हुआ कि मारुति और होंडा ने अपनी-अपनी कारों की कीमतें बढ़ाने की घोषणा कर दी। महिंद्रा एंड महिंद्रा ने अपने स्पोर्ट्स युटिलिटी व्हीकल पर 4 हजार से 35 हजार रुपए बढ़ाने की बात कही। जाहिर है पहले से ही प्रतिकूल परिस्थितियों को झेल रही कार इंडस्ट्री बजट में 2 प्रतिशत उत्पाद शुल्क का बोझ अपने अमीर ग्राहकों पर ही डालेगी। विदेश में बनी कारों पर उत्पाद शुल्क 22 से बढ़ाकर 24 प्रतिशत कर दी गई है। एसयूवी, एमयूवी व बड़ा कारों पर बेसिक कस्टम ड्यूटी 60 से बढ़ाकर 75 प्रतिशत कर दी गई है जिससे अमीर वर्ग पर महंगाई की दोहरी मार पड़ेगी। कहने का मतलब दादा इस बजट में अमीर वर्ग को भी संतुष्ट करते नहीं दिख रहे।

दादा का राजनीतिक झांसा
चलते-चलते दादा के उस वक्तव्य का जिक्र करना यहां जरूरी होगा जो लोकसभा में बजट भाषण को शुरू करने से पहले उद्धृत किया था। उन्होंने कहा, ‘दयावान बनने के लिए पहले मुझे क्रूर होना पड़ेगा।’ शेक्सपीयर के इस उद्धरण को प्रणब मुखर्जी ने पेश किये गए बजट से एक हद तक साबित भी किया। लेकिन भाषा पर जरा गौर कीजिए, ‘दयावान बनने से पहले’ यानी क्रूरता तो दिखा दी और दयावान बनना अभी बाकी है। इस इशारे को गौर से समझना आपकी आर्थिक सेहत के लिए बेहद जरूरी है।

दादा का अगला बजट वित्त वर्ष 2013-14 के लिए होगा जो लोकसभा चुनाव 2014 से पहले आखिरी बजट होगा। साफ है अगले बजट में दादा दयावान बनकर आम आदमी को (जिसके वोट से जीतकर उन्हें पांच साल तक बजट पेश करने का मौका मिलता है) फिर से रिझाने की कोशिश की जाएगी। बजट को आम आदमी के हित में बनाने की हरसंभव कोशिश की जाएगी ताकि कांग्रेस नीत यूपीए की सरकार पर जनता फिर से मेहरबान हो अगले पांच साल तक के लिए सत्ता सौंप दे। दादा के इस वक्तव्य को देश की जनता को ध्यान में रखना होगा क्योंकि यह वक्तव्य पूरी तरह से राजनीतिक है। इसका मतलब सिर्फ वोट बैंक से है। अगर गलती से वित्त वर्ष 2013-14 के बजट में दादा दयावान बनते हैं तो फिर लोकसभा चुनाव 2014 में आपको सोच-समझकर अपनी सरकार चुननी होगी।

Wednesday, 14 March 2012

कांग्रेस को सुधारनी होगी अपनी दैहिक भाषा

उत्तरप्रदेश, पंजाब और गोवा विधानसभा चुनाव में करारी हार के बाद भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अंदर और बाहर मंथन का दौर शुरू हो गया है। क्योंकि इन तीन राज्यों के चुनाव परिणाम ने भविष्य के प्रधानमंत्री राहुल गांधी पर सवालिया निशान जो लगा दिया है। शतरंज की बिसात पर कांग्रेस का युवराज यूपी में लाल टोपी वाले युवराज की शह पर मात हो चुका है।
कांग्रेस की इस शर्मनाक पराजय पर सभी अचंभित हैं। उत्तराखंड में विजय बहुगुणा को मुख्यमंत्री के लिए नामित कर कांग्रेस आलाकमान ने एक अलग मुसीबत मोल ले ली है। बड़ा सवाल यह है कि उत्तर प्रदेश में कांग्रेस क्यों हारी? या फिर उत्तराखंड कांग्रेस में दोफाड़ क्यों हो गया? अलग-अलग राजनीतिक विश्लेषकों की अलग-अलग राय है, लेकिन जहां से मैं देखता हूं, कांग्रेस ने इस विधानसभा चुनाव में तीन बड़ी गलतियां की जिसे जल्द सुधारा नहीं गया तो आने वाले मिशन-2014 में भी कांग्रेस को मुंह की खानी पड़ सकती है।
जटिल दैहिक भाषा
देश की जनता अब लोकतंत्र के मायने, उसके नियम व कायदों का बेहतर तरीके से समझने लगी है। कांग्रेस पार्टी जनतंत्र में इस परिवर्तन की बयार को या तो समझ नहीं पा रही है या समझना नहीं चाहती। मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं कि कांग्रेस के नेताओं की जो देह भाषा है वह सत्ता के सिंहासन को कतई मंजूर नहीं। सत्ता का सिंहासन मतदाताओं के वोट से तय होती है और मतदाता को अगर आपकी दैहिक भाषा रास नहीं आई तो यह सोचने का क्या आधार कि आप चुनाव जीत जाएंगे और फिर जोड-तोड़कर सत्ता के सिंहासन पर कुंडली मारकर बैठ जाएंगे।
उत्तरप्रदेश में जनसभाओं के दौरान यदि आपने राहुल गांधी के संबोधनों पर गौर किया हो तो बहुत कुछ अनुमान आपको तभी लग गया होगा। चुनाव सिर पर हो तो जनता नेताओं से सवाल करना चाहती है ना कि नेता के सवालों का जवाब देना पसंद करती है। कांग्रेस नेताओं से पहली गलती यही हुई। चाहे वह राहुल गांधी हों, सलमान खुर्शीद हों, दिग्विजय सिंह हों या फिर बेनी प्रसाद वर्मा हों सभी ने एक के बाद एक जनता से सवाल करने बैठ गए, फिर अपना चुनावी घोषणा पत्र का फरमान सुना दिया और चलते बने। राहुल गांधी को ही ले लीजिए, दोनो बांह चढ़ाकर गुस्से में जनता से सवाल पूछते हैं कि कब तक तुम दूसरे प्रदेश में जाकर भीख मांगते रहोगे? दरअसल जनता राहुल गांधी की जनसभा में इस सवाल को जवाब देने तो नहीं गई थी सो उसे बड़ा बुरा लगा और इस तरह से उनके खास वोटर भी बिदकते चले गए। हाल ये हुआ कि कांग्रेस का गढ़ अमेठी और रायबरेली में भी जहां प्रियंका गांधी खासतौर पर प्रचार करने पहुंची थी, कांग्रेस को शर्मनाक हार का सामना करना पड़ा।

सलमान खुर्शीद, दिग्विजय सिंह और बेनी प्रसाद वर्मा को ये लगता था कि अगर हमने मुस्लिम मतदाताओं को अपने पक्ष में कर लिया तो बाकी सारा जहां जीत लेंगे और इस भ्रम में या कहिए अहंकार में वह एक के बाद अल्पसंख्यक आरक्षण पर विवादित बयान देते चले गए। मुसलमान मतदाता भी कांग्रेस की चाल समझ गए और परिणाम ये हुआ कि अपने तो अपने नहीं ही रहे, जिनको अपना बनाने चले थे वो भी धोखा दे गए। कहने का मतलब यह कि राजनीति में जो शालीनता होनी चाहिए, संबोधनों में जो सहजता होनी चाहिए, आपके आभामंडल में जो सौम्यता होनी चाहिए वह इन नेताओं में कहीं नहीं दिखी।

जनता के बीच जब आप जा रहे हैं तो उन्हें अपनी दैहिक भाषा से इस बात का भरोसा दिलाना होगा कि आप जो कह रहे हैं उसमें कोई धोखा नहीं है, कोई संशय नहीं है। तभी आप दावे से कह सकते हैं कि जीत हमारी होगी, वरना जो हुआ आपके सामने है। उत्तराखंड में चुनाव नतीजों के बाद जो परिदृश्य उजागर हुआ उसमें भी कहीं न कहीं कांग्रेस आलाकमान की दैहिक भाषा जिम्मेदार है। सवाल यह कि सोनिया गांधी ने ऐसा कैसे सोच लिया कि उनके द्वारा नामित कोई भी नेता को सूबे का जनता स्वीकार कर लेगी। हरीश रावत सूबे के जमीनी नेता रहे हैं। मुख्यमंत्री पद पर उनका दावा सर्वमान्य था, लेकिन कांग्रेस आज भी तीन दशक पहले की राजनीति कर रही है। आलाकमान की बात भी तभी मान्य होगी जब सूबे की जनता और उनके द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों को वह मान्य हो। इस मायने में कांग्रेस को हर हाल में अपनी दैहिक भाषा सुधारनी होगी।

नेता नदारद, कमजोर संगठन
कांग्रेस के साथ बड़ी दिक्कत यह है कि जब वह चुनाव मैदान में उतरती है तो उसके आलाकमान तक को पता नहीं होता कि वह किसे नेता के रूप में पेश कर रहा है। यही हाल हुआ देश के सबसे बड़े राज्य उत्तरप्रदेश के विधानसभा चुनाव में। प्रदेश की जनता को पता था कि कम से कम राहुल गांधी तो यहां के मुख्यमंत्री नहीं बनेंगे तो फिर राहुल की बातों पर कैसे भरोसा किया जाए। आखिर राहुल किस आधार पर इतना कुछ कह रहे हैं और इसकी क्या गारंटी है कि कांग्रेस की सरकार बन जाने के बाद सारे वायदे पूरे किए जाएंगे।

विधानसभा चुनाव में एक नेता का होना चुनाव जीतने की पहली शर्त होती है। नेता तो समाजवादी पार्टी ने भी घोषित नहीं किए थे, लेकिन लोगों को इतना जरूर पता था कि यदि सपा की सरकार बनती है तो मुख्यमंत्री या तो मुलायम बनेंगे या फिर उनके बेटे अखिलेश यादव बनेंगे। बसपा की सरकार बनती है तो तय है कि सीएम मायावती ही बनेंगी। लेकिन कोई आपसे पूछे कि कांग्रेस की सरकार बनती तो मुख्यमंत्री कौन बनता तो एक साथ कई नाम मसलन, बेनी प्रसाद वर्मा, प्रमोद तिवारी, रीता बहुगुणा जोशी वगैरह-वगैरह सामने आ जाते। मतदाताओं के बीच इसका अच्छा असर नहीं हुआ और कांग्रेस का खास वोट बैंक ने भी रास्ता बदल लिया। दूसरा संगठन के मामले में भी कांग्रेस काफी कमजोर दिखा। हालांकि इस बात को कांग्रेस का राष्ट्रीय अध्यक्ष सोनिया गांधी और कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी ने भी स्वीकार किया। 2007 के चुनाव के बाद कांग्रेस को पांच साल में अपना संगठन मजबूत बनाकर एक नेता को आगे कर तैयारी की होती तो खासकर यूपी चुनाव का परिदृश्य कुछ और होता।

बेमतलब की बयानबाजी
सच कहिए तो दिग्विजय सिंह की अन्ना हजारे के खिलाफ लगातार बयानबाजी, कानून मंत्री सलमान खुर्शीद और बेनी प्रसाद वर्मा के लगातार चुनाव आयोग की आदर्श चुनाव आचार संहिता का उल्लंघन करते हुए अल्पसंख्यक आरक्षण पर बयान, श्रीप्रकाश जायसवाल का उत्तर प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लगाने वाला बयान विशेष रूप से उत्तर प्रदेश की राजनीति में इतना खराब असर डाल गया जो कांग्रेस की हार का प्रमुख कारण बन गई। देखते हैं किसने क्या बयान दिया–
सलमान खुर्शीद के बोल : चुनाव आयोग मुझे मुस्लिम आरक्षण पर बोलने से रोक रहा है। चाहे मुझे फांसी दे दो, मैं मुस्लिम हक की बात करता रहूंगा।
बेनी प्रसाद के बोल : चुनाव आयोग चाहे तो मुझे नोटिस दे दे, लेकिन मुसलमानों का आरक्षण बढ़ाया जाएगा।
श्रीप्रकाश जायसवाल के बोल : राज्य में कांग्रेस को स्पष्ट बहुमत मिलने की संभावना है, लेकिन यदि त्रिशंकु विधानसभा आती है तो प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लग सकता है।

बहरहाल, कांग्रेस आलाकमान को उक्त तीन गलतियों पर एक मंथन बैठक करनी चाहिए और एक सकारात्मक रास्ता निकालकर विधानसभा चुनाव-2012 में हुई भारी क्षति की भरपाई करने की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए। उत्तर प्रदेश राजनीतिक दृष्टि से केंद्र की राजनीति के लिए काफी अहम स्थान रखता है। तभी तो मुलायम सिंह प्रधानमंत्री बनने का ख्वाब देखने लगे हैं।

Sunday, 4 March 2012

इनकी जेब में चुनाव आचार संहिता

देश में आजकल हर तरफ शोर मचा है कि कांग्रेसी सांसद और मंत्रीगण आदर्श चुनाव आचार संहिता को जेब में रखकर घूम रहे हैं। चर्चा कोई हवा में नहीं हो रही है। इसकी जमीनी हकीकत भी है। राजनीतिक दृष्टि से सबसे संवेदनशील और अहम उत्तर प्रदेश में विधान सभा चुनाव के दौरान कांग्रेसी सांसदों और मंत्रियों ने एक के बाद एक बयान देकर इस बात को साबित कर दिया कि आदर्श चुनाव आचार संहिता को जेब में रखकर घूमने में उनका कोई जोर नहीं। आगे बढ़ने से पहले एक के बाद एक उन मंत्रियों के बयानों का उल्लेख करना यहां जरूरी होगा जो कांग्रेस पार्टी के दिग्गज तो हैं ही साथ ही केंद्र सरकार के काबिल मंत्री भी हैं।


प्रकरण नंबर 1 : केंद्रीय मंत्री सलमान खुर्शीद ने फर्रुखाबाद में 10 जनवरी को अपनी पत्नी लुईस खुर्शीद की चुनावी सभा में लोगों को आश्वासन दिया था कि कांग्रेस उत्तर प्रदेश में सत्ता में आई तो अल्पसंख्यकों को 9 प्रतिशत आरक्षण देगी। भाजपा ने चुनाव आयोग से शिकायत की। 9 फरवरी को मुख्य चुनाव आयुक्त ने 15 पृष्ठीय फैसले में इस बयान के लिए खुर्शीद को कड़ी फटकार लगाते हुए कहा कि केंद्रीय कानून मंत्री होते हुए उन्होंने निंदनीय मिशाल कायम की। चुनाव आयोग की फटकार को नकारते हुए खुर्शीद फिर एक चुनावी जनसभा में बोले, ‘चुनाव आयोग मुझे मुस्लिम आरक्षण पर बोलने से रोक रहा है। चाहे मुझे फांसी दे दो, मैं मुस्लिम हक की बात करता रहूंगा।’


प्रकरण नंबर 2 : केंद्रीय मंत्री बेनी प्रसाद वर्मा 15 फरवरी की रात लुईस खुर्शीद के क्षेत्र फर्रुखाबाद में ही एक जनसभा को संबोधित करने पहुंचे। मंच पर कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह और केंद्रीय मंत्री सलमान खुर्शीद दोनों ही मौजूद थे। ओबीसी कोटा में मुस्लिमों की हिस्सेदारी बढ़ाने की बात करते हुए बेनी प्रसाद ने अपने संबोधन में कहा, ‘चुनाव आयोग चाहे तो मुझे नोटिस दे दे, लेकिन मुसलमानों का आरक्षण बढ़ाया जाएगा।’ केंद्रीय इस्पात मंत्री बेनी प्रसाद वर्मा ने यह भी कहा कि खुर्शीद मुसलमानों की हक की लड़ाई बहुत ईमानदारी से लड़ रहे हैं।


प्रकरण नंबर 3 : केंद्रीय मंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल 23 फरवरी को कानपुर में वोट डालने के बाद पत्रकारों से मुखातिब हुए तो एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि राज्य में कांग्रेस को स्पष्ट बहुमत मिलने की संभावना है, लेकिन यदि त्रिशंकु विधानसभा आती है तो प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लग सकता है। यानी कांग्रेसी मंत्री ने पार्टी और सरकार के इरादे तीन चरण की वोटिंग और मतगणना से पहले ही अपने इरादे जगजाहिर कह दिए। गौरतलब है कि श्रीप्रकाश जायसवाल सिर्फ कांग्रेस नेता ही नहीं वरन वह केंद्रीय कोयला मंत्री भी हैं।


कांग्रेसी सांसदों, नेताओं और पार्टी के चुनाव प्रचारकों द्वारा आदर्श चुनाव आचार संहिता के उल्लंघन की फेहरिस्त इतनी लंबी है कि उनका जिक्र करना यहां संभव नहीं है इसलिए हमने सिर्फ उन तीन मंत्रियों के बयानों का जिक्र किया है जिन्होंने अन्ना आंदोलन के दौरान टीम अन्ना को संसद की गरिमा का अपमान, लोकतंत्र की अस्मिता को खतरा और कानून को हाथ में लेने जैसी बड़ी-बड़ी बातें करते दिख रहे थे। भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में संभवत: पहली दफा किसी केंद्रीय मंत्री वो भी कानून मंत्री के विरुद्ध चुनाव आयोग ने राष्ट्रपति को पत्र लिखा। लेकिन कांग्रेस पार्टी को कोई फर्क नहीं पड़ा। जब विवाद ने तूल पकड़ा तो खुर्शीद ने चुनाव आयोग से माफी मांग ली। कुछ ऐसा ही बेनी प्रसाद वर्मा ने किया और श्रीप्रकाश जायसवाल भी चुनाव आयोग के कोप का शिकार होने से बच गए। सवाल यह उठता है कि क्या आदर्श चुनाव आचार संहिता की अवधारणा को इसीलिए स्थापित किया गया था कि नेता, मंत्री जी भरकर उसका उल्लंघन करें और माफी मांग वैतरणी पार कर लें। तो फिर ऐसी आचार संहिता रहे या ना रहे, क्या फर्क पड़ता है।


थोड़ी गंभीरता से इस बात पर विचार करें, राष्ट्रपति ही मंत्रिगणों की नियुक्ति करते हैं। वे राष्ट्रपति के समक्ष ही संविधान पालन की शपथ लेते हैं। शपथ लेने वाले ने शपथ तोड़ी, चुनाव आयोग के प्रशासनिक अधिकारों व आचार संहिता को चुनौती दी। बावजूद इसके कानून मंत्री ठसक के साथ पद पर काबिज हैं। चुनाव आयोग संविधान और कानून से प्राप्त अधिकारों का ही तो प्रयोग करता है। आदर्श चुनाव आचार संहिता संविधान और कानून का ही तो सार है। लेकिन दुर्भाग्य से कांग्रेस स्वभाववश कोई आचार शास्त्र नहीं मानती जो कि उक्त तीन मंत्रियों के बयानों से पुष्ट भी होता है। दरअसल कांग्रेस पार्टी देश में नख व दंत विहीन चुनाव आयोग चाहती है। देश की जनता अपने कानून मंत्री सलमान खुर्शीद तथा दो अन्य मंत्री बेनी प्रसाद वर्मा, श्रीप्रकाश जायसवाल से और इनसे ही क्यों, प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से भी जानना चाहती है कि इस तरह की ओछी हरकतों से लोकतंत्र की गरिमा को बनाए रखा जा सकता है?


ये पब्लिक जो है, सब जानती है। आप सरकार में मंत्री बनकर बैठे हैं तो इसका मतलब यह नहीं कि आप लोकतंत्र और संविधान से ऊपर की चीज हैं। देश की जनता एक सशक्त लोकपाल कानून की बात करे तो उससे लोकतंत्र की, संसद और संविधान की भावनाएं आहत होती हैं और आप जैसे मंत्रीगण, नेता और सांसद आदर्श चुनाव आचार संहिता को जेब में रखकर घूमें, जब जी में आया उसकी खिल्ली उड़ा दें और फिर माफी मांग लें तो इससे लोकतंत्र, संसद और संविधान की भावनाओं को ठेस नहीं पहुंचती है। मंत्री जी, इस देश में दो तरह के कानून नहीं चलेंगे। इस देश का एक ही संविधान है और हम सबको उसी संविधान की भावनाओं का सम्मान करते हुए उसके अनुरूप चलना होगा। चुनाव आयोग से माफी मांगना पर्याप्त नहीं है। अगर चुनाव आयोग ने आपके बयानों को आचार संहिता के उल्लंघन का दोषी माना है तो आपको पद की गरिमा का सम्मान करते हुए सरकार से तत्काल इस्तीफा दे देना चाहिए। नैतिकता का यही तकाजा है।

ये लड़ाई दूर तलक जाएगी...

विकास पुरुष बनने का दावा करने वाले गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी आजकल खट्टे-मीठे अनुभवों से गुजर रहे हैं। कभी कोर्ट की फटकार तो कभी तथाकथित जयकार के बीच पेंडुलम की तरह डोल जो रहे हैं। गुजरात हाईकोर्ट ने वर्ष 2002 में गोधरा कांड के बाद भड़के दंगों के दौरान कार्रवाई नहीं करने और लापरवाही बरतने को लेकर बीते 8 फरवरी को मोदी सरकार को कड़ी फटकार लगाई।

इस्लामिक रिलीफ कमेटी ऑफ गुजरात (आईआरसीजी) की याचिका पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने कहा कि 2002 में गोधरा कांड के बाद राज्य सरकार की निष्क्रियता, अपर्याप्त इंतजाम और लापरवाहीपूर्ण रवैये के चलते राज्य भर में धार्मिक स्थलों को बड़े पैमाने पर नुकसान हुआ। आदेश में कोर्ट ने आगे कहा है कि धार्मिक स्थलों की मरम्मत कराने और मुआवजा देने की जिम्मेदारी राज्य सरकार की है। कोर्ट ने यह भी कहा कि जब सरकार घरों को हुए नुकसान के लिए मुआवजा देती है तो उसे धार्मिक स्थलों, इमारतों को हुए नुकसान के लिए भी मुआवजा देना चाहिए।

इससे पहले भी हाईकोर्ट ने लोकायुक्त गठन के मामले में मोदी सरकार को फटकार लगाई थी। हाईकोर्ट ने सरकार की उस याचिका को खारिज कर दिया था जिसमें सरकार ने लोकायुक्त की नियुक्ति को चुनौती दी थी। लेकिन गुजरात दंगों के दौरान गुलबर्ग सोसायटी कांड को लेकर सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित विशेष जांच दल (एसआईटी) की रिपोर्ट में मोदी सरकार को क्लीन चिट देने की खबर एक अंग्रेजी दैनिक ने छापी तो नरेंद्र मोदी की बांछें खिल गई हैं। तमाम समर्थक और भाजपा के बड़े-बड़े नेता नरेंद्र मोदी की जयकार कर रहे हैं। जयकारा लगाने वालों को ये नहीं मालूम कि एसआईटी को सिर्फ जांच करने की जिम्मेदारी सुप्रीम कोर्ट ने सौंपी है, क्लीन चिट देने के लिए नहीं। मोदी को क्लीन चिट मिलना चाहिए या नहीं, कोर्ट को तय करना है।

अभिमान का चादर ओढ़े मोदी फटकार और जयकार के बीच सरोकार के रास्ते को भूल रहे हैं। भूलें भी क्यों नहीं, जनता ने इतने जिद्दी व सिरफिरे नेता को सत्ता की चाबी जो सौंप रखी है। फिलहाल वह पूरे प्रदेश में घूम-घूमकर दंगे के लिए प्रायश्चित भी कर रहे हैं। सद्भावना उपवास को मोदी ने अपना हथियार बनाया है। लेकिन क्या उनके प्रायश्चित करने से गुलबर्ग सोसायटी में दंगे की भेंट चढ़े एहसान जाफरी के रूप में जाकिया जाफरी को उनका पति मिल जाएगा। एसआईटी जांच पर गोधरा कांड के अहम गवाह संजीव भट्ट और एहसान जाफरी की विधवा जाकिया जाफरी मोदी पर लगे इस दाग को इतनी आसानी से मिटने देंगे? ये बड़ा सवाल है। गुजरात दंगों को लेकर नरेंद्र मोदी बनाम दंगा पीड़ितों की लड़ाई दूर तलक जाएगी।

कौन है जाकिया जाफरी ?
28 फरवरी 2002 को गुजरात दंगों के दौरान अहमदाबाद की गुलबर्ग सोसायटी में एहसान जाफरी सहित 37 लोगों को जिंदा जला दिया गया था। एहसान जाफरी कांग्रेस के वरिष्ठ नेता व पूर्व सांसद थे और जाकिया जाफरी के पति भी। कहते हैं कि जब दंगाइयों ने जब गुलबर्ग सोसायटी में हमला बोला तो एहसान सूबे के तमाम अफसरों और नेताओं से गुहार लगाते रहे, लेकिन किसी ने उनकी एक नहीं सुनी। इसके बाद शुरू हुई जाकिया जाफरी की इंसाफ की लंबी लड़ाई जिसमें न्याय मिलना अभी बाकी है। मानवाधिकार आयोग ने गुजरात पुलिस पर दंगे से जुड़ी जांच में लापरवाही बरतने के आरोप लगाए। 8 जून 2006 को जाकिया जाफरी ने अपने पति की हत्या के खिलाफ तत्कालीन डीजीपी को खत लिखा। जाकिया ने हाईकोर्ट में भी ये अर्जी दी कि नरेंद्र मोदी समेत 63 लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज किए जाएं। लेकिन नवंबर 2007 में हाईकोर्ट ने जाकिया की अर्जी खारिज कर दी। इसके बाद जाकिया ने हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी।

मार्च 2008 में सुप्रीम कोर्ट ने गुलबर्ग केस समेत 8 केस की जांच के लिए विशेष टीम बनाई। 27 अप्रैल 2009 को सुप्रीम कोर्ट ने एसआईटी को उन 63 लोगों की जांच के आदेश दिए, जिनके खिलाफ जाकिया ने एफआईआर दर्ज करने की अपील की थी। 4 नवंबर 2009 को गुलबर्ग सोसायटी केस में पहला चश्मदीद कोर्ट के सामने पेश हुआ। उसने बताया कि एहसान जाफरी ने मोदी समेत कई लोगों को मदद के लिए फोन किए थे। 27 मार्च 2010 को एसआईटी ने नरेंद्र मोदी से घंटों पूछताछ की और इसके बाद 25 अप्रैल 2011 को एसआईटी ने अपनी अंतरिम रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट में सौंप दी। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि एमाइकस क्यूरी की रिपोर्ट सुनने के बाद ही फैसला सुनाया जाएगा। जाकिया जाफरी फिलहाल सूरत में अपने बड़े बेटे के साथ रह रही हैं जो एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में काम करता है।

संजीव भट्ट से लगता है डर
इस निलंबित आईपीएस अफसर से गुजरात की नरेंद्र मोदी सरकार को डर लगता है। डर इसलिए, क्योंकि यह अफसर ऐसे राज जानता है जिनका पर्दाफाश अगर हो गया तो मोदी गुजरात दंगों की आग में झुलस जाएंगे। अगर इस अफसर के दावे सही हैं तो यह साबित हो जाएगा कि गुजरात दंगों के पीछे दरअसल मोदी का दिमाग काम कर रहा था। आखिर इस अफसर ने सीधे सुप्रीम कोर्ट से गुहार क्यों लगाई, आखिर क्यों आईपीएस संजीव भट्ट को दंगों की जांच कर रही विशेष जांच दल (एसआईटी) पर रत्ती भर भरोसा नहीं है।

संजीव भट्ट को यह लगता है कि उन्होंने दंगों से जुड़े़ जो भी राज या जानकारियां एसआईटी को दीं उन्हें एसआईटी ने लीक कर दिया। वे एसआईटी से कहते रहे कि उनके पास नरेंद्र मोदी की भूमिका से जुड़ी जानकारियां हैं, लेकिन उन्हें लगातार बोला जाता रहा कि वे सिर्फ गुलबर्ग सोसायटी से जुड़ी जानकारियां ही दें। तेज-तर्रार आईपीएस अफसर संजीव भट्ट ने अपने हलफनामे में साफ लिखा है कि सुप्रीम कोर्ट दंगों में सरकारी तंत्र की भूमिका को लेकर निष्पक्ष और पूरी जांच के लिए एसआईटी पर भरोसा करता है, लेकिन एसआईटी इस भरोसे पर खरी नहीं उतर रही है।

भट्ट ने लिखा है, ’27 फरवरी 2002 को साबरमती एक्सप्रेस की बोगी एस-6 को जलाए जाने और उसके बाद भड़के दंगों की साजिश और सरकारी भूमिका से जुड़ी जानकारियां और सबूत मैंने एसआईटी को दिए। सबूतों के तौर पर 26 और 27 फरवरी 2002 को गोधरा में कॉल डीटेल्स की मूल फ्लॉपी, मोबाइल फोन की लोकेशन, सरकार के ऊंचे ओहदों पर बैठे लोगों के 27 और 28 फरवरी को किए गए फोन कॉल्स के ओरिजिनल प्रिंटआउट भी दी। मैंने लगातार एसआईटी को ये सबूत दिए, लेकिन एसआईटी उन्हें लेकर गंभीर नजर नहीं आई, वे आगे की तहकीकात करने से बचती रही।’

साफ है संजीव भट्ट उस एसआईटी की ईमानदारी पर सवाल खड़े कर रहा है, जो खुद सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में काम कर रही है। भट्ट का कहना है कि एसआईटी में कुछ लोग मोदी सरकार से हाथ मिला चुके हैं, उनका यह शक उस वक्त पक्का हुआ जब नवंबर 2009 में उन्हें एसआईटी ने बयान देने के लिए बुला भेजा। भट्ट कहते हैं, ‘एसआईटी ने मुझे नवंबर 2009 में बयान देने के लिए बुलाया, मैंने यह जानकारी गुप्त रखी, लेकिन राज्य सरकार के एक बड़े अधिकारी ने मुझसे संपर्क कर यह कहा कि एसआईटी में बयान देने से पहले जैसा कहा जाए मैं वैसा ही करूं। इस बारे में मैंने एसआईटी के सदस्य ए.के. मलहोत्रा को तत्काल जानकारी दी थी, इसके बावजूद कई घटनाएं ऐसी हुईं, जिससे मुझे अहसास हुआ कि मैं जो कुछ भी एसआईटी को बता रहा हूं वह तत्काल लीक कर दिया जा रहा है। हद तो तब हो गई जब मैंने एसआईटी को कहा कि वे मेरे बयान की तस्दीक कुछ गवाहों के हवाले से करवा सकते हैं और ऐसे ही राज्य खुफिया के अधिकारी के.डी. पंत का नाम भी एसआईटी को मैंने दिया। पंत ने मुझे बताया कि एसआईटी के लोगों ने उसे गिरफ्तारी और गंभीर परिणाम झेलने की धमकी भी दी। ऐसा लगता है कि इसी तरह की धमकी दूसरे गवाहों को भी दी गई होगी। आज भी गुजरात में हालात ऐसे हैं कि कोई गवाह राज्य सरकार के डर के कारण खुलकर सामने नहीं आ सकता है।’

तहलका पत्रिका की 12 फरवरी 2011 की एक रिपोर्ट के मानें तो एसआईटी ने अपनी प्रारम्भिक रिपोर्ट में गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को दंगे को लेकर ‘महत्वपूर्ण रेकार्ड को नष्ट करने,’ ‘साम्प्रदायिक मानसिकता’ को उजागर करने, ‘भडकाऊ भाषण देने, अदालतों में पब्लिक प्रॉसिक्यूटर के तौर पर संघ कार्यकर्ताओं को तैनात करने, पुलिस कन्ट्रोल रूम में अपने करीबी मंत्रियों को जनसंहार के दिनों में तैनात करने, ‘तटस्थ अधिकारियों को दण्डित करने’ आदि तमाम कामों के लिए जिम्मेदार माना है। अब उसी एसआईटी की रिपोर्ट में यदि नरेंद्र मोदी को बेदाग बताया जाता है तो फिर इसका फैसला देश की सर्वोच्च अदालत पर ही छोड़ना होगा।

बहरहाल, इतना तो तय है कि गोधरा कांड नरेंद्र मोदी के मुख्यमंत्रित्व काल में हुआ। दंगे के दौरान कई जगहों पर नरसंहार हुआ। दंगे को रोकने के लिए अगर प्रभावी कदम नहीं उठाया गया तो निश्चित रूप से इसकी जिम्मेदारी मोदी सरकार को लेनी चाहिए। लोग कहते हैं कि नरेंद्र मोदी विकास पुरुष हैं। गुजरात को विकास मॉडल दुनिया में चर्चा का विषय बना हुआ है सो ऐसे महान व्यक्तित्व पर इस तरह के लांछन नहीं लगाए जाने चाहिए। हां, मैं भी मानता हूं कि मोदी का विकास मॉडल काबिलेतारीफ है। लेकिन आप ये क्यों भूल रहे हैं कि विकास करना नरेंद्र मोदी का जनता के प्रति परम कर्तव्य बनता है। जनप्रतिनिधि को जनता चुनकर भेजती ही इसीलिए है। लेकिन आप विकास पुरुष बन गए तो इसका मतलब यह कतई नहीं कि आपको जनसंहार करने की छूट मिल गई। नरेंद्र मोदी को गोधरा कांड की नैतिक जिम्मेदारी स्वीकार करनी होगी और उन पीड़ित परिवारों से माफी मांगनी होगी जिनका घर परिवार जनसंहार की भेंट चढ़ गया था। मोदी अगर ऐसा नहीं करते हैं तो ये लड़ाई दूर तलक जाएगी।

Sunday, 29 January 2012

यूपी : जाति के बहाने जीतेगी राजनीति

राजनीतिक और सामाजिक दृष्टि से उत्तर प्रदेश एक ऐसा राज्य है जो दिल्ली की सत्ता को बहुत रास आता है। 2012 के विधानसभा चुनावों को 2014 में होने वाले लोकसभा के आम चुनाव का सेमीफाइनल माना जा रहा है। वैसे तो हर राज्य के चुनावी नतीजे अहम होते हैं, लेकिन उत्तर प्रदेश एक ऐसा राज्य है, जो दीर्घकाल से देश की राजनीतिक दशा व दिशा को तय करता आ रहा है। लेकिन 18 मंडल, 75 जनपद, 312 तहसील, 80 लोकसभा, 30 राज्यसभा के साथ 403 सदस्यीय विधानसभा और 20 करोड़ की आबादी वाले इस विशालकाय प्रदेश में विकास कहीं पीछे छूट गया है और जाने-अनजाने में यह सूबा धर्म व जाति आधारित राजनीति की प्रयोगशाला बन गया है। हम यहां यूपी की बात करेंगे। क्या चल रहा है यूपी की राजनीति में? लेकिन इससे पहले प्रदेश के जातीय समीकरण को सुलझा लेते हैं।


यूपी के बारे में एक कहावत बहुत प्रचलित है कि यहां के मतदाता अपना वोट नेता को नहीं, जाति को देते हैं। हर बार की तरह इस बार भी मतदाता वोट तो जाति को देंगे लेकिन जीतेगी राजनीति ही। जाति के इसी समीकरण को अपने-अपने पक्ष में करने के लिए तमाम राजनीतिक दल और प्रत्याशी अपने लुभावने वादों से मतदाताओं को फांसने में जुट गए हैं, लेकिन संयोगवश किसी राजनीतिक दल के पास न तो कोई मुद्दा है न कोई एजेंडा। ऐसे में मतदाताओं के पास एकमात्र विकल्प जाति का होता है और जिस दल का जातीय समीकरण मजबूत होगा, राजनीति उसे सत्ता सुख का ताज पहनाएगी। उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में जिस पार्टी को 30 प्रतिशत वोट मिलेंगे, उसकी जीत तय है। जहां तक जातीय समीकरण की बात है तो प्रदेश में 16 प्रतिशत वोट अगड़ी जाति के हैं। इनमें 8 प्रतिशत ब्राह्मण, 5 प्रतिशत ठाकुर और 3 प्रतिशत अन्य हैं। 35 प्रतिशत पिछड़ी जातियों में 13 प्रतिशत यादव, 12 प्रतिशत कुर्मी और 10 प्रतिशत अन्य हैं। इसके अलावा 25 प्रतिशत दलित, 18 प्रतिशत मुस्लिम, 5 प्रतिशत जाट और एक फीसदी अन्य हैं। पिछले चुनाव में मायावती सोशल इंजीनियरिंग के फार्मूले के तहत 25 प्रतिशत दलित, 8 प्रतिशत ब्राह्मण और 18 प्रतिशत मुस्लिम वोटों को जोड़ने में काफी हद तक सफल रहीं थी और यूपी में बसपा की पूर्ण बहुमत वाली सरकार का यही राज था।


यूपी मिशन-2012 की राजनीतिक प्रकृति काफी कुछ बदल चुकी है। मायाराज के इन पांच वर्षों के कार्यकाल में बसपा से ब्राह्मणों का मोह भंग हुआ है। 8 प्रतिशत का यह वोट बैंक भाजपा और कांग्रेस में बंटने की उम्मीद जताई जा रही है। लेकिन मसला राजनीतिक दलों के लिए ब्राह्मणों का 8 प्रतिशत या अगड़ों के 16 प्रतिशत वोट का नहीं है और न ही 35 प्रतिशत पिछड़ी जातियों का वोट बैंक कोई मुद्दा है। एक भाजपा को छोड़ दें तो तमाम दलों और यूपी की पूरी राजनीति मुस्लिम समुदाय के 18 प्रतिशत वोट के इर्द-गिर्द घूम रही है। दरअसल प्रदेश में सत्ता के दावेदार दलों की बात करें तो पहले नंबर पर बसपा, दूसरे नंबर पर सपा और तीसरे नंबर पर कांग्रेस और भाजपा है। इसमें भाजपा की स्थिति कमजोर दिख रही है। वह इसलिए कि प्रदेश में एक मजबूत नेता के न होने से भाजपा का जनाधार लगातार कम होता जा रहा है। 25 प्रतिशत दलित और 18 प्रतिशत मुस्लिम वोट पार्टी को मिलना नहीं है। 16 प्रतिशत अगड़ा और 35 प्रतिशत पिछड़ी जातियों के वोट बैंक में सभी की हिस्सेदारी होगी। तो जातीय समीकरण के हिसाब से भाजपा यूपी की सत्ता में फिट नहीं बैठती है और फिर चुनाव बाद भी भाजपा की केमेस्ट्री किसी दल से मेल नहीं खाती। अब बची कांग्रेस, सपा और बसपा। ये तीनों ही दल अपने-अपने वोट बैंक में 18 प्रतिशत वोट बैंक को सत्ता की सीढ़ी पर चढ़ने में मददगार मानते हुए मुस्लिम समुदाय को सबसे बड़ा हितैषी साबित करने में जुटे हैं।


चूंकि यह चुनाव बिना किसी मुद्दा और एजेंडा के लड़ा जा रहा है इसलिए अल्पसंख्यकों को आरक्षण का मुद्दा एक सोची-समझी रणनीति के तहत पैदा किया गया और सभी दल इसके सहारे गंगा नहा लेना चाहते हैं। हालांकि ये कोई आसान काम नहीं है। दरअसल अल्पसंख्यक आरक्षण का मुद्दा मायावती की राजनीति की देन है। अब 27 प्रतिशत कोटे में ही 4.5 प्रतिशत अल्पसंख्यक कोटा का प्रावधान कर कांग्रेस नीत यूपीए सरकार ने पासा फेंका उससे कांग्रेस खुद ही मुश्किल में फंस गई है। कांग्रेस के लिए अल्पसंख्यक आरक्षण न तो उगलते बन रहा है और न ही निगलते। हां, एक सूरत बनती जरूर दिख रही है और उसके संकेत भी मिल रहे हैं जिसके तहत चुनाव बाद कांग्रेस और रालोद सपा के साथ मिलकर गठबंधन सरकार बनाएं। इस समीकरण की नीब डाली जा चुकी है। इस नीब को मजबूती देने का काम किया है केंद्र की यूपीए सरकार की घटक ममता की तृणमूल कांग्रेस ने।


तृणमूल लगातार कांग्रेस को आंखें दिखा रही है। लेकिन ये गठबंधन तब होगा जब कांग्रेस और मुलायम पर 18 प्रतिशत मुसलमान मेहरबान हो जाएं। लेकिन ऐसा होना इसलिए मुश्किल होगा कि मुसलमानों को भी इस बात का अंदाजा है कि 4.5 प्रतिशत अल्पसंख्यक आरक्षण से उनका भला नहीं होने वाला है और गाहे-बगाहे मुसलमानों में भी इस बात की सुगबुगाहट अब होने लगी है कि उन्हें आरक्षण नहीं अवसर की चाहिए। अल्पसंख्यक आरक्षण की राजनीति को मुसलमान अब समझने लगे हैं। गा बजा के बसपा ही एक ऐसी पार्टी शेष बचती है जिसके पास दलितों का 25 प्रतिशत वोट बैंक का मजबूत आधार है। कुछ मेहरबानी मुस्लिम वोटर तो कुछ अन्य जातियों के वोटर बसपा के जातिगत समीकरण के तहत उतारे गए प्रत्याशी में निश्चित रूप से निष्ठा जताएंगे। अगर 10 प्रतिशत वोटर का रुझान भी अन्य जातियों से बसपा की तरफ रहा तो मायावती को सत्ता में आने से कोई नहीं रोक सकता है।


ये था सियासी दलों का जातीय गणित। अब आते हैं सूबे की राजनीति पर। कांग्रेस करीब दो दशक पुरानी अपनी राजनीतिक जमीन को फिर से पाना चाहती है। किसी भी सूरत में। बसपा की माया और भाजपा की उमा अपने-अपने मोर्चे संभाले हुए हैं। कांग्रेस ने राहुल, तो सपा ने मुलायम परिवार और रालोद ने अजित सिंह चौधरी को अपने सेनापति के तौर पर चुनावी संग्राम में उतारा है। राहुल गांधी, रीता बहुगुणा जोशी और दिग्विजय की तिकड़ी यूपी के ‘मिशन इंपॉसिबल’ को पॉसिबल मान रही है। 25 जनवरी 1950 को संयुक्त प्रांत से इस राज्य का नामकरण उत्तर प्रदेश हुआ था। लंबे समय तक कांग्रेस का यहां एकछत्र राज रहा। जिस समय राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे, तब 1985 के चुनाव में यहां अंतिम बार कांग्रेस को 260 से ज्यादा सीटें हासिल हुई थीं और 1989 में वह सत्ता से बाहर हुई तो 22 साल बीत चुके हैं, सत्ता में वापस नहीं लौटी। इसके साथ यह भी हकीकत है कि जब से उत्तर प्रदेश कांग्रेस से रूठा है, तब से केन्द्र में वह अपने बूते सरकार नहीं बना सकी है सो कांग्रेस को किसी भी सूरत में यूपी की सत्ता चाहिए।


मुख्यमंत्री मायावती ने 21 नवंबर को विधानसभा में प्रदेश को चार टुकड़ों पूर्वाचल, बुंदेलखंड, अवध प्रदेश और पश्चिम प्रदेश में बांटने का प्रस्ताव पारित कर केन्द्र सरकार को भेजने का ऐलान कर कांग्रेस ही नहीं, भाजपा और सपा को भी चारो खाने चित्त कर दिया। अवध को छोड़ दें तो बाकी तीन क्षेत्रों से अलग राज्य की मांग लंबे समय से चली आ रही है। मायावती इन क्षेत्रों के मतदाताओं को यह संदेश देने में सफल रही कि वे छोटे राज्यों के गठन के पक्ष में हैं। मायावती ने ऐन चुनाव से पहले राज्य को चार हिस्सों में बांटने का प्रस्ताव हड़बड़ी में क्यों पारित किया, यह समझने के लिए उत्तर प्रदेश के राजनीतिक हालातों को समझना जरूरी है।


वैसे तो मायावती पहले भी इस तरह की मौखिक मांग केन्द्र से कर चुकी थीं परन्तु राजनीतिक दल उनकी नीयत पर यह कहते हुए उंगली उठा रहे थे कि वह वाकई गंभीर हैं तो विस से प्रस्ताव पारित करके केन्द्र को क्यों नहीं भेजती? विस के सत्र से पहले हफ्ते में मुलायम सिंह यादव ने एटा में बड़ी रैली की थी और राहुल गांधी ने फूलपुर में शक्ति प्रदर्शन कर चुनावी शंखनाद फूंका था। मुलायम ने जहां सत्ता में आने पर किसानों को सिंचाई के लिए मुफ्त पानी उपलब्ध कराने का भरोसा दिया, वहीं राहुल ने प्रदेश के लोगों की गैरत को यह कहते हुए ललकारा था कि कब तक पंजाब और महाराष्ट्र में भीख मांगते रहोगे। जाहिर है, यूपी में चुनाव हैं तो सबके निशाने पर मायावती है। मायावती ने भी कच्ची गोलियां नहीं खेली हैं। वे जानती हैं कि कब किससे कैसे निपटना है? इसलिए उन्होंने पिछले कुछ महीनों में जहां एक के बाद एक कई लोकलुभावन घोषणाएं की, वहीं राज्य के बंटवारे का प्रस्ताव पारित करके विपक्ष के ऊपर ब्रह्मास्त्र चला दिया।


बहरहाल, गंगा-जमुनी संस्कृति का उद्गम स्थल रहा उत्तर प्रदेश आज अपनी पहचान के संकट से गुजर रहा है। जिस प्रदेश की भूमि ने बाल्मीकि, संत तुलसीदास, कबीरदास, सूरदास, प्रेमचंद, निराला, जयशंकर प्रसाद, सुमित्रा नंदन पंत, भारतेन्दु हरिश्चंद्र, रामचंद्र शुक्ल, महाबीर प्रसाद द्विवेदी, मैथिलीशरण गुप्त जैसे रचनाकारों को पैदा किया हो और जिस सूबे की राजनीति ने देश को सर्वाधिक आठ प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू, लाल बहादुर शास्त्री, इंदिरा गांधी, चौधरी चरण सिंह, राजीव गांधी, विश्वनाथ प्रताप सिंह, चंद्रशेखर और अटल बिहारी वाजपेयी के रूप में दिए हों, वहां धर्म व जाति आधारित राजनीति का बोलबाला है और विकास के रथ का पहिया टूटता जा रहा है। लेकिन इस सबके बीच जैसा कि हमने शुरू में कहा था कि वोट भले ही जाति को पड़े जीतेगी राजनीति ही। लेकिन वो राजनीति नहीं जो सियासी पार्टियां चाहती हैं। राजनीति की प्रकृति तेजी से बदल रही है क्योंकि मतदाता का मिजाज जो बदल रहा है। तय मानिए यूपी में यह राजनीतिक बदलाव एक नया सबेरा लाएगा।