Monday, 30 March 2009

चुनावी महापर्व पर आती है धूमिल की याद

15वीं लोकसभा चुनाव की तैयारी षुरू हो चुकी है। लोकतांत्रिक प्रक्रिया के तहत प्रत्याषी जनता के द्वार खड़े हैं कि भैया, एक बार हमें आजमा लो। कोई षिकायत का मौका नहीं देंगे। भोली-भाली बेचारी जनता को तरस आ जाता है और भावना में बहकर वह जनप्रतिनिधि बनकर घर आए प्रत्याषी को अपने भाग्य का विधाता बनाकर देष की संसद में भेज देता है। वोट देते समय उसे यह याद नहीं रहता है कि पिछली से पिछली बार भी यही षख्स षिकायत का मौका न देने की बात कहकर वोट मांग संसद पहुंच गया था। और उसके बाद झांकने तक नहीं आया। जी हां! यह तो नेताओं की फितरत होती है। इनकी चमड़ी बड़ी मोटी होती है। इन्हें षर्म नहीं आती है। और ऐसे में ही याद आती है जनकवि धूमिल रचित कविता की।
न कोई प्रजा है
न कोई तंत्र है
यह आदमी के खिलाफ आदमी का
खुलासा षड्यंत्र है
जनकवि धूमिल आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनके द्वारा सृजित कविता का हर षब्द और उनसे मिलकर बना एक पूरा वाक्य परिलक्षित करता है कि धूमिल सही अर्थों में जनमानस में डूबे हुए सषक्त जनवादी कवि थे। धूमिल की जीवन गाथा से पता चलता है कि उनकी कविता की दुनिया बनारस के गांव खेवली से षुरू होती है और अपने समय के इतिहास की जागरूकताओं, सामयिक छिनालपन, विषेष तौर पर प्रजातंत्र की हास्यास्पद स्थिति को छूती हुई, धक्का देती हुई समकालीन साहित्यबोध और समकालीन साहित्यकारों तक जाती है। प्रजातंत्र से धूमिल को बड़ी चिढ़ थी। सुदामा पांडेय उर्फ धमिल के जीवन में भी वही समस्याएं, वही बाधाएं आयीं जो हर मध्यम वर्गीय भारतीयों के जीवन में आती है। बावजूद इसके व्यक्तिगत प्रतिभा के बल पर धूमिल ने भाषा की रात षीर्षक से रचित कविता में लिखा-
देष डूबता है तो डूबे
लोग ऊबते हैं तो ऊबें
जनता लट्टू हो चाहे तटस्थ रहे
बहरहाल, वह सिर्फ यह चाहते हैं कि
उनका स्वष्तिक स्वस्थ रहे।
धूमिल की यह ट्रैजिडी वास्तव में आज के युवा भारत की ज्वलंत समस्या की ओर इंगित करती है। धूमिल अपनी कविता को एक ओर यदि नागरिक सभ्यता से वहां की व्यवस्था, अन्याय व षोषण से जोड़ते हैं तो दूसरी ओर इनकी कविता ग्रामीण जनसमाज के उत्पीड़न, नफरत, दर्द, पीड़ा, कुंठा एवं घुटन से स्वतः जुड़ती प्रतीत होती है। भारत गांवों का देष है और गांव किसानों की आत्मा में बसती है। लेकिन इन नेताओं को किसानों की कोई फिक्र नहीं होती है। इन नेताओं की आत्मा तो षहर में ही बसती है। जीतकर आते हैं गांव से और पूजते हैं षहर को। यह एक विरोधाभासी चेहरा है इनका। तभी तो कविता में गांव को नहीं पाकर एक बार धूमिल अनायास ही बोल पड़े-
चाहिए तो यह कि किसान खेती-बारी करना बंद कर दे। जब फसल नहीं होगी तब इन षहरातियों को पता चलेगा कि गांव क्या होता है और इनकी अपनी बिसात क्या है? देखें तब ये क्या खाते हैं?
दरअसल धूमिल षहर के हर आदमी को संदेह की नजरों से देखते थे ठीक उस किसान की तरह जो षहर को झूठ, लूट, धोखा, छल, बदमाषी व बेषर्मी का केंद्र मानता है। साठ के दषक में जब धूमिल अपने गृहस्थ जीवन में थे तो उस समय भी वे देष के भीतर अनाज की मांग को नजरअंदाज नहीं कर पाये थे। भूख-बेबसी-लाचारी मानो उनके नेत्रों के आगे खुलकर कहने लगी--
बच्चे भूखे हैं
मां के चेहरे पत्थर
पिता जैसे काठ
अपनी ही आग में जले हैं
ज्यों सारा घर।
इस प्रकार से अनाज की जमाखोरी के पीछे की राजनीति उनकी पैनी दृष्टि से बच नहीं पायी। उनका मानना था कि अनाज की कमी वास्तविक नहीं, बल्कि स्वार्थ की राजनीति से प्रेरित है। जमाखोरी को सरकारी नीति से बढ़ावा मिलता है। उस जमाखोरी से बचने का कोई प्रयास न होता देख कवि धूमिल के भावनाओं की करुण गाथा संसद और रोटी कविता के रूप में सामने आती है--
एक आदमी रोटी बेलता है
एक आदमी रोटी खाता है
एक तीसरा आदमी भी है
जो न रोटी बेलता है न रोटी खाता है
वह सिर्फ रोटी से खेलता है
मैं पूछता हूं यह तीसरा आदमी कौन है
मेरे देष की संसद मौन है।
दरअसल हालात इतने नाजुक हैं कि व्यक्ति अगर इस षोषण की प्रक्रिया को समझ भी जाए तो भी वह विद्रोह करने की स्थिति में नहीं रह गया है। अपनी विचारधारा का परित्याग कर, उसे झुठलाकर वह स्वार्थपूर्ति में निरंतर रत रहना चाहता है। आजादी के इन छह दषकों में सामाजिक व राजनीतिक षोषण ने जहां आम आदमी के रक्त को चूस लिया है, वहीं दूसरी ओर उसके विचारों को भी दिवालिया बना दिया है। किस्सा जनतंत्र में धूमिल ने इसी आम आदमी की विवषता की ओर संकेत किया है जिसमें कलछुल-बटलोही एवं तवे-चिमटे की क्रियाएं फिर आर्थिक विवषताओं के वषीभूत होकर आधे पेट भोजन प्राप्त करने वाला आदमी पहले भरपेट पानी पीता है और फिर भोजन करता है। कैसी विडंबना है इस आदमी की? यह अपने देष के किसी एक व्यक्ति की ट्रैजिडी नहीं है, वरन आज पूरा समाज इस त्रासद दौर से गुजर रहा है। इन्हीं सब त्रासद स्थितियों को लेकर देष की प्रजातांत्रिक व्यवस्था के प्रति जनकवि धूमिल के मन में गुस्सा था। धूमिल की तमाम कविताएं लाभ-लोभग्रस्त समाज और षोषक-षासक षक्तियों का पर्दाफास करता है जिसका तेवर विद्रोही और क्रांतिकारी है। वे तथाकथित जनतांत्रिक संस्थाओं, संसद, न्यायालय, षिक्षालय, औद्योगिक-व्यापारिक प्रतिष्ठानों आदि के जनविरोधी चरित्र को रेखांकित करते हैं, उसकी बुराइयों व अमानवीयताओं का भंडाफोड़ करते हैं जो साबित करता है कि धूमिल व्यक्तिवादी नहीं, बल्कि समाजवादी मूल्य के कवि हैं। वह आजादी और प्रजातंत्र षब्द को चुनौती देते हैं जो देष की षोषित जनता के लिए पूरी तरह से अप्रासंगिक व अपूर्ण है। धूमिल भ्रष्ट चुनाव पद्धति से चुने गए व्यावसायिक नेताओं द्वारा सामाजिक कायाकल्प की संभावनाओं को अस्वीकार करते हुए जनमत को एक होकर अपनी ऊबन को साकार व सार्थक करने की भी प्रेरणा देते हैं।

Friday, 27 March 2009

लोकतांत्रिक ढांचे को बचाइए

देष की सेहत कुछ ठीक नहीं चल रही है। हालात को देखते हुए यह सवाल उठाना आज ज्यादा प्रासंगिक होगा कि आखिर भारतीय लोकतंत्र पर संकट क्यों मडरा रहा है। कुछ लोग इसे नेतृत्व का संकट कहते हैं तो कुछ लोग इसे चरित्र का संकट कहते हैं। लोगों का यह भी मानना है कि हमारे नेताओं और लोगों के निकम्मेपन के चलते ही यह संकट पैदा हुआ है। लेकिन हमें ऐसा लगता है कि वास्तव में यह संकट लोकतांत्रिक संस्थाओं की अहमियत को नकार देने के कारण पैदा हुआ है। ऐसे में सवाल यह भी उठता है कि लोकतांत्रिक संस्थाओं की अहमियत को नकारने वाले भी तो देष के नेता और लोग ही तो हैं।
विष्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देष भारत में अक्सर यह सवाल उठता रहा है कि कितना सजग है या रहा है हमारा लोकतंत्र? स्वभाविक है यह सवाल उठना क्यों कि वर्तमान परिदृष्य में भारतीय लोकतांत्रिक प्रणाली में लोगों की आस्था घट रही है। मसलन मतदान के प्रति मतदाताओं की उदासीनता, सार्वजनिक जीवन में विधायिका एवं कार्यपालिका के प्रति विष्वास का अभाव आदि कुछ ऐसे मुद्दे हैं जो लोकतंत्र की अस्मिता पर सवाल खड़े करते हैं।जब इस तरह के सवाल उठते हैं कि कितना सजग रहा है हमारा लोकतंत्र तो इसका मतलब यही निकलता है कि विष्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देष की अधिकांष जनता को यह नहीं मालूम कि आखिर लोकतंत्र का मतलब क्या होता है। ऐसे देष के लोकतंत्र का पतन होना निष्चित है जिस देष की जनता लोकतंत्र के अर्थ को समझ नहीं सकती या देष उसे लोकतंत्र के मायने समझा नहीं सकता।
आज जिस लोकतंत्र की सजगता पर सवाल खड़ा किया जा रहा है यह उसी महान एवं पवित्र लोकतंत्र का विकृत रूप है जिसे षब्दों में बांधते हुए अमरीकी राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन ने कहा था- लोकतंत्र वह सरकार है जो जनता की, जनता के लिए और जनता द्वारा चलाई जाती है। मुख्य रूप से लोकतंत्र जनता का षासन है। हालांकि भारत के संदर्भ में यह कहना गलत न होगा कि स्वतंत्रता के छह दषक के भारतीय लोकतंत्र का इतिहास राजनीति एवं लोकतंत्र के पतन का इतिहास रहा है। निष्चित रूप से आज के सभी राजनीतिक दलों को जो समाज सेवा के बहाने राजनीति अपनाते हैं और इस लोकतांत्रिक षासन प्रणाली को चलाने का दावा करते हैं उन्हें अपने घोषणा पत्रों में जनता को लोकतंत्र का अर्थ समझाने के कृतसंकल्प के मुद्दे को प्राथमिक मुद्दे के रूप में अपनाना चाहिए।
सबको पता है कि आज के दौर में राजनीति एक ऐसा षक्ति सूत्र है जिसके द्वारा लोकतंत्र के चारों खंभे यानी विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका, प्रेस संचालित व निर्देषित होती दिख रही है और आज की राजनीति का चरित्र किसी से छिपा नहीं है। जाहिर है जब राजनीति में भ्रष्टाचार फैलेगा तो लोकतांत्रिक संस्थाओं में भी भूचाल आएगा ही। आपातकाल से कुछ पहले के बात करें तो हम पाते हैं कि इंदिरा गांधी ने अपने तानाषाही रवैये को अपनाते हुए जिस परंपरा की षुरुआत की उससे पूरा का पूरा लोकतांत्रिक ढांचा तहस-नहस हो गया और आगे की राजनीति के लिए कुछ ऐसा ही कर गुजरने का द्वार खुल गया। हालांकि इंदिरा गांधी जैसा साहस कोई दूसरा नहीं कर पाया लेकिन राजनीति की मनोदषा तो बिगड़ी ही। एक लंबे प्रयास से जिला, मंडल और प्रदेष कमेटियों का जो पार्टी ढांचा कांग्रेस के नेताओं ने तैयार किया था उस ढांचे को तहस-नहस करने का श्रेय इंदिरा गांधी को ही जाता है। अब हमारे देष की जनता को यह समझ में नहीं आता कि आखिर पार्टी संगठन के टूटन से लोकतंत्र का क्या वास्ता है? जरूरत है इस मुद्दे पर गंभीर चिंतन एवं मनन करने की।
आपातकाल के समय में ही प्रधानमंत्री सचिवालय जैसी एक नई व्यवस्था अस्तित्व में आई जिसकी हैसियत कई मायनों में कैबिनेट से भी ज्यादा थी। कुल मिलाकर यही हुआ कि दल में पार्टी संगठन की जगह नौकरषाही ने ले ली और नेतृत्व के पास नौकरषाही पर आश्रित रहने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा। पार्टी संगठन के विलोप की संस्कृति के प्रभाव से अन्य वामपंथी या दक्षिणपंथी दल भी मुक्त न रह सके। इस परिस्थिति में भी जब राजनीति और पार्टी में जिन्होंने आस्था व्यक्त करने की कोषिष जारी रखनी चाही उन्हें या तो राजनीति के हाषिए पर धकेल दिया गया या फिर उनकी गर्दन आपातकाल की तलवार पर लटका दी गई।पार्टी संगठन के विलोप से ढेर सारी गैर लोकतांत्रिक गतिविधियों की घुसपैठ भारतीय राजनीति में हुई और आने वाले दिनों में होती रहेगी। जब पार्टी में संगठन नाम की षक्ति नहीं रही तो चुनाव के वक्त जनता से सीधे संपर्क कायम करने का जरिया भी खत्म हो गया। अब धन और बाहुबल के आधार पर ही जनता तक पहुंचने की रणनीति बनने लगी। समय-समय पर औद्योगिक घरानों एवं पूंजीपतियों से धन लेने का सिलसिला षुरू हुआ जिसका बुरा प्रभाव भारत की चुनाव प्रणाली पर पड़ा। चुनाव प्रचार के बहाने पूंजीपतियों से धन एंेठने की परंपरा भी चल पड़ी।राजनीति में अपराध का सिलसिला भी इंदिरा गांधी के षासनकाल से ही षुरू हुआ। संजय गांधी की राजनीतिक पहल ने पार्टी संगठन और लोकतांत्रिक संस्थाओं को ठंेगा दिखाते हुए भ्रष्टाचार और अपराध को संगठनबद्ध कर दिया जिसकी नकल अन्य राजनीतिक दलों में भी हुई।
आज सभी राजनीतिक दल अपराधियों को चुनाव में जिताकर विधायिका के सदस्य बन रहे हैं जो कि लोकतंत्र का एक स्तंभ है। इसका परिणाम यह हो रहा है कि आपराधिक तत्व आज राजनीतिक दलों के सहयोगी न रहकर सहभागी बन गए हैं। विधायिका के सदस्य और मंत्री बनकर इन असामाजिक तत्वों ने नया सामाजिक सम्मान पाया है। यदि इस संदर्भ मेंष्षंका हो तो चरित्र के धनी व पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त टीएन षेषन से आप पूछ सकते हैं कि आज के दौर में कितने सांसद या विधायक आपराधिक पृष्टभूमि से आते हैं।
आज धर्म और जाति के आधार पर चुनाव लड़े जा रहे हैं। पूर्ण बहुमत नहीं होने के बावजूद वे सरकार बनाने का अपना दावा पेष करते हैं और इस परिस्थिति से निपटने के लिए षुरू होती है सांसदों या विधायकों की खरीद- फरोख्त। आया राम-गया राम की राजनीति में विधायिका के सदस्य खुले बाजार में खुद को नीलाम करने में जुट जाते हैं। कुल मिलाकर आज की राजनीति में सभी इस सिद्धांत में रच बस गए हैं। देष भाड़ में जाए, जरूरी है सत्ता में बने रहना। सत्ता की इस राजनीतिक खेल में सब कुछ उन्हें जायज लगता है। वोट खरीदिए, विधायक और सांसद खरीदिए, मतदाताओं को आतंकित कीजिए, नेताओं को आतंकित कीजिए। हिंसा, अपहरण, बलात्कार सभी कुछ इनकी दृष्टि में वैध तरीके हैं। धर्मभीरुता, सांप्रदायिकता एवं जातीयता के राजनीतिक चक्रव्यूह में लोकतंत्र की सजगता धूमिल पड़ती नजर आ रही है। आखिर यह सब क्यों हो रहा है? इसका मुख्य कारण है विष्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देष की जनता का मौन एवं उदासीन होना है। कोउ नृप होय हमें का हानी का दर्षन जनता की मानसिक सोच में गहरा उतर गया है। इस दृष्टि ने भारतीय व्यक्तित्व की सहनषक्ति को लचीला बना दिया है। इसकी प्रतिरोधक क्षमता को कुंठित कर दिया है। लोकतंत्र के चैथे स्तंभ मीडिया यानी प्रेस को और पत्रकारों को बड़ अनुदानों से मौन रखा जा रहा है। बुद्धिजीवियों एवं लेखकों को रिझाया जा रहा है।
15वीं लोकसभा चुनाव की तैयारी चल रही है। चुनाव से संबंधित विभिन्न समाचार पत्र-पत्रिकाओं एवं विभिन्न टीवी चैनलों के कवरेज से किसी न किसी राजनीतिक दल विषेष को तरजीह या उसका प्रचार करने जैसे तरीके की बू आती है। प्रेस लोकतंत्र का चैथा खंभा है और इसका इस तरह से पेष आना खतरे की घंटी नही तो और क्या है।बहरहाल, भारतीय लोकतांत्रिक ढांचे की चरमराहट निरंतर जारी है। यह कहना कठिन होगा कि यह ढांचा बचेगा या मिटेगा, लेकिन इसकी चरमराहट की आवाज कुछ गंभीर एवं खतरनाक संकेतों की ओर इषारा करती है। बावजूद इसके, आने वाले दिनों में यदि इन संकेतों को नजरअंदाज किया गया तो खतरा बढ़ सकता है। इसलिए जरूरत है ऐसी परिस्थितियों में विषुद्ध सामाजिक स्तर पर कोई सार्वभौम षक्ति उभरकर सामने आए और दषकों से चली आ रही भारतीय लोकतांत्रिक परंपरा को स्वच्छ एवं मजबूत बनाने का प्रयास करे। आएं, हम सब मिलकर ऐसा कुछ सोचें और करें ताकि भारतीय लोकतंत्र की अस्मिता बरकरार रहे।

पीएम हाउस में मोर नाचा

सुबह नींद मोबाइल की धुन बजने से खुली। आंख मिचमिचाते हुए मोबाइल के मुंह को खोला तो उधर से एक मित्र की आवाज आई-अरे क्या कर रहे हो?

-आज का अखबार देखा?

-नहीं, क्या हो गया? अमेरिका पर आतंकवादी हमला हुआ है क्या?

-अरे नहीं

-फिर क्या देश से गरीबी मिट गई?

-सुबह-सुबह क्या बकवास कर रहा है?

-बकवास मैं कर रहा हूं कि तू। कितनी बढ़िया नींद आ रही थी, जगा दिया।

-अरे जागो प्यारे मोहन, यह जागने का वक्त है।

-क्यों? क्या देश से बेरोजगारी खत्म हो गई?

-अरे नहीं यार।

-फिर क्या अमेरिका ने किसी देश पर हमला किया है?

-ऐसा कुछ भी नहीं हुआ है।

-तो फिर क्या हुआ है?

-पीएम हाउस में मोर नाचा है प्यारे मोहन।

-तू पागल हो गया है क्या? मोर जंगल में नाचता है बच्चे।

-इसीलिए तो कह रहा हूं प्यारे मोहन, जागो, उठो और अखबार पढ़ो।इतना कहकर दोस्त ने फोन काट दिया और मेरी भी नींद भी भाग गई। स्साले मोर को क्या हो गया? जंगल छोड़कर पीएम हाउस में आ गया। सोचते हुए चारपाई से उठा। दरवाजे पर गया और अखबार उठा लाया। पहले पन्ने पर ही पीएम हाउस में नाचते मोर की तस्वीर छपी थी।

-अरे वाह। यह तो कमाल हो गया। पूरा का पूरा सिद्धांत और दर्शन ही बदल गया। मेरे मुंह से ये शब्द अनायास ही निकल पड़े। तस्वीर के साथ समाचार भी छपा था। शीर्षक था-पीएम हाउस में मोर नाचा। लिखा था कि आज जब प्रधानमंत्री अमेरिका की यात्रा पर जाने से पहले अपने मंत्रिमंडल के सहयोगियों से विदा ले रहे थे तो उसी वक्त पीएम हाउस में एक मोर नाचने लगा। मोर को नाचते देख पीएम हाउस में अफरा-तफरी मच गई। हर कोई यही कह रहा था कि मोर यहां कैसे आ गया? प्रेस फोटोग्राफरों और टीवी कैमरा वालों के लिए यह ऐतिहासिक क्षण था। सभी नाचते हुए मोर की तस्वीर अपने कैमरे में कैद करने लगे। कुछ उत्साही टीवी पत्रकार और कैमरामैन तो मयूरनृत्य को लाइव दिखाने लगे। सबसे पहले की होड़ में चैनल वाले टूट पड़े और उसके पत्रकार मोर के बारे में कुछ भी बोले जा रहे थे। चैनलों के स्टूडियो में बैठी एंकर भी अजीबोगरीब सवाल पूछे जा रही थी। ब्रेकिंग न्यूज चल रही थी कि पीएम हाउस की सुरक्षा में सेंध। मोर पीएम हाउस में घुसा और नृत्य कर रहा है। सुरक्षा बलों के बयान लिये जा रहे हैं। नेताओं से टिप्पणी मांगी जा रही है। स्टूडियो में विशेषज्ञ बुला लिए । गहन परिचर्चा भी आरंभ हो गई है। चैनल देखकर ऐसा लग रहा है कि देश पर घोर विपदा आ गई है। एक चैनल की एंकर ने अपने संवाददाता से सवाल किया कि क्या अब भी प्रधानमंत्री अमेरिका की यात्रा पर जाएंगे? संवाददाता ने कहा कि इस संबंध में जानकारी तो नहीं मिल पाई है लेकिन मेरा मानना है कि पीए को अपनी यात्रा रद्द कर देनी चाहिए। यात्रा से पहले अपशगुन हुआ है। अभी मोर घुस आया है। अगर आतंकवादी घुस आता तो क्या होता। एंकर ने फिर सवाल किया कि यदि आतंकवादी घुस आता तो क्या होता? कितना नुकसान पहुंचता? क्या मार दिया जाता? वह अपने मकसद में कामयाब हो जाता? संवाददाता फिर बोला कि कुछ भी हो सकता था। वह अपने मकसद में कामयाबा भी हो जाता। पकड़ा भी जा सकता था।

टीवी चैनलों की इस गहमा-गहमी के बीच पीएम अपने मंत्रिमंडल के सहयोगियों से विदाई लेते रहे। हर कोई उन्हें झुककर सलाम कर रहा है। फूलों का गुलदस्ता भेंट कर रहा है और तस्वीरें खिंचवा रहा है, लेकिन मोर के नाचने से यहां पर व्यवधान पड़ा। चूंकि मीडिया मयूरनृत्य पर मोह गया तो नेतानृत्य की तस्वीर कौन खींचे? ऐसे में नेताओं की त्योरी चढ़ गई। सुरक्षाबलों को आदेश हुआ कि मोर को जल्दी भगाओ। इसपर जवाब मिला कि चैनल वाले लाइव दिखा रहे हैं। वह जवाब मिलना था कि एक नेता चीखा। इसीलिए तो कह रहा हूं कि मोर को भगाओ, नहीं तो वे मूर्ख लोग पता नहीं क्या-क्या करेंगे? कहां प्रधानमंत्री इतने महत्वपूर्ण दौरे पर जा रहे हैं। हम लोग मिलने आए हैं। ऐसी शुभ घड़ी पर इस कार्यक्रम को दिखने की बजाए मयूरनृत्य का सीधा प्रसारण कर रहे हैं। कुछ जवान मोर को भगाने के लिए गए तो मीडिया वालों ने विरोध कर दिया। बोले यार! इतनी बढ़िया बाइट्स मिल रही है। क्यों चैपट कर रहे हो जो इसे लाइव दिखा रहे हैं। उनकी टीआपी बढ़ जाएगी। ऐसे में भैये वह मोर नहीं हमारे लिए तो भगवान है। इसकी आरती कर लेने दे भाई।जवान बोले कि लेकिन नेताजी विरोध कर रहे हैं। कह रहे हैं कि उनके कार्यक्रम को लाइव करो। यह सुनना था कि कई टीवी चैनल के पत्रकार हंसकर बोले कि उनसे बोलो कि ऐसा ही नृत्य वह भी करें। उनका भी सीधा प्रसारण कर देंगे। अभी तो आप जाओ और इसे नाचने दो। इसके जवाब में एक जवान ने चुटकी ली कि भाई नृत्य तो वह भी कर रहे हैं लेकिन आप लोगों को उनकी नाच शायद अच्छी नहीं लग रही है।मोर को बिन भगाए वापस लौटे तो एक नेता चीखा कि क्या हुआ?

-मीडिया वाले मोर को भगाने नहीं दे रहे हैं।

-तो इन सालों को भी भगा दो। नमक हराम, कमीने कहीं के।

-जवान जाने लगा तो नेता फिर चीखा। साले ऐसे न मानें तो मोर को गोली मार दो।

-लेकिन सर, मोर तो राष्ट्रीय पक्षी है और वह मीडिया वाले।

-तो क्या हुआ? हम किसी की परवाह नहीं करते। नेता गुस्से में बोला।इसी बीच पीएम वहां से निकलकर बाहर आए। वह अपनी कार में बैठे ही थे कि मीडिया भी उनके पीछे भागा।मयूरनृत्य का सीधा प्रसारण बंद।जब मीडिया वाले चले गए तो मारे ने भी नाचना बंद कर दिया। इधर-उधर निगाह दौड़ाया और घास की झाड़ियों में गुम हो गया।समाचार पढ़कर जम्हाई ले रहा था कि मित्र का फोन फिर

-अखबार पढ़ा क्या?

-हां पढ़ा।

-तो यह बताओ कि पीएम हाउस में मोर क्यों नाचा?मुझसे कोई उत्तर देते नहीं बना, मैं चुप रहा। फिर मुझे लगा कि मित्र से ही पूछ लेना चाहिए।

-इसका उत्तर तो तू ही बता सकता है बच्चे।

-साजिश! प्यारे मोहन साजिश।

-किसकी।

-पाकिस्तान की।

-वह भला क्यों?

-क्योंकि प्रधानमंत्री अमेरिका की यात्रा पर जा रहे थे। पाकिस्तान नहीं चाहता कि हमारे रिश्ते अमेरिका से ठीक

-वह भला क्यों?

-क्योंकि यदि अमेरिका हमारा दोस्त बन जाएगा तो पाकिस्तान किसके दम पर हमें धमकाएगा। क्यों? सही कह रहा हूं न?

-अब तू कह रहा है तो सच ही कह रहा होगा।दोस्त ने फोन काट दिया। मैं सोच में पड़ गया। पीएम हाउस में मोर क्यों नाचा? क्या कारण हो सकता है? यही सब सोचते-सोचते मुझे नींद आ गई। सपने में मेरी मुलाकात पीएम हाउस में नृत्य करने वाले मोर से होती है। मैं उससे सवाल करता हूं।

-हे मेरे देश के राष्ट्रीय पक्षी! आपने पीएम हाउस में नृत्य क्यों किया?

-क्योंकि आपके प्रधानमंत्री अमेरिका की यात्रा पर जा रहे थे।

-महोदय, उनकी अमेरिका यात्रा से आपके नृत्य का क्या संबंध?

-है भले मानुस! क्या तुम इतना नहीं जानते कि पूरी दुनिया में अमेरिका के इशारे के बिना पत्ता भी नहीं हिलता।-जानता हूं

-तो, श्रीमन् जी बेवकूफों जैसा सवाल क्यों कर रहे हैं?

-वत्स, बेवकूफ तो तुम हो जो जंगल छोड़कर पीएम हाउस में नाच रहे हो।

-नहीं श्रीमान! आपका आरोप निराधार और बेबुनियाद है। आपको ज्ञात होना चाहिए कि धरती पर जंगल कितने बचे हैं। कितने प्राणी विलुप्त हो गए हैं। हमारी जाति भी संकट में है। सी संकट के निदान के लिए मैं पीएम हाउस गया था। सोचा था बढ़िया नृत्य करुंगा तो पीएम प्रसन्न हो जाएंगे। लेकिन वहां तो पहले से ही नृत्य करने वाले मौजूद थे। उनके आगे मेरी एक न चली। हां, मीडिया वालों ने अपने चैलनों पर दिखाकर मेरे महत्व को रेखांकित जरूर किया, लेकिन उन्होंने भी मुझे आतंकवादी बनाकर प्रस्तुत किया। खैर, इससे क्या फर्क पड़ता है। मुझे कवरेज तो मिल ही गई। अब यह खबर अमेरिका तक तो पहुंच ही जाएगी। हो सकता है अमेरिका हमारी जाति के लिए भी कुछ करे। किसी पैकेज-वैकेज की घोषणा करे। ताकि हम विलुप्त होने से बच जाएं।

-वत्स! तुम तो बड़े समझदार निकले।

-श्रीमान जी, जब मैं बहुत छोटा था तो मुझे एक आदमी जंगल में पकड़कर ले गया। मैं अपने माता-पिता और दोस्तों के लिए बहुत तड़पा, लेकिन उसने मुझे पिंजरे में कैद करके रखा। धीरे-धीरे मुझे भी अच्छा लगने लगा। मां-बाप को भूल गया। इस तरह आदमियों वाले गुण मुझमें आते गए। बाद में तो मुझे पिंजरे से आजाद कर दिया। फिर भी मैं जंगल में नहीं गया। क्यों कि मैं जान गया था कि जंगल रह ही नहीं गए हैं। हमारी जाति संकट में है। ऐसे में उसी आदमी के साथ रहने में ही मुझे अपनी भलाई दिखी। सोचा इसके लिए वहां रहकर ही मैं अपनी जाति के लिए कुछ कर सकता हूं। धीरे-धीरे उसकी सारी आदतें मुझमें आ गई। बिना दुम के भी दुम हिलाने की उसकी कला मुझे बहुत पसंद आई। वह इसी कला से बड़े से बड़ा काम करवा लेता। एक दिन मैंने भी सोचा कि मैं भी इसी कला का प्रदर्शन करके अपनी जाति को बचाऊंगा। बस यही सोचकर पीएम हाउस पहुंच गया। अब देखो, क्या परिणाम सामने आता है।

-परिणाम! परिणाम तो अच्छा ही आएगा वत्स।-मैं वत्स नहीं, तुम्हारी पत्नी हूं। इतना दिन चढ़ गया और अभी तक सो रहे हो। पत्नी की आवाज सुनकर मैं जागा तो बड़ी देर तक खुद पर यकीन नहीं हो रहा था।

कहानीकार: ओमप्रकाश तिवारी

Monday, 16 March 2009

सत्ता के निहितार्थ

सत्व या अस्तित्व के अपने मूल अर्थ से भटककर आज सत्ता उस सामथ्र्य या अधिकार की वाचक मात्र कैसे बन गई जिसके बल पर सत्तासीन शासक शासितों पर नियंत्रण रखता है-यह एक अलग कहानी है। अपने अस्तित्व को बनाए रखने के लिए जीव-जगत को जिस समस्या से जूझना पड़ता है, मानव इतिहास के आदिकाल में आदि मानव को भी अस्तित्व के उसी संकट से रू-ब-रू होना पड़ता था। अपने और अपनों की सुरक्षा के लिए उसे एक ओर तो प्राकृतिक प्रकोप झेलने पड़ते थे तो दूसरी ओर न केवल हिंसक पशुओं से ही नहीं, अपने जैसों से भी अपनी रक्षा करनी पड़ती थी। कालांतर में अपने अनुभवों के बल पर आदि मानव जिस नतीजे पर पहुंचा वह था सत्ता के वर्तमान अर्थ का प्रारंभिक स्वरुप जिसे पारिवारिक सत्ता का नाम दिया जा सकता है।
मातृ सत्तात्मक समाज ने जब पितृ सत्तात्मक समाज की ओर कदम बढ़ाए तो सत्ता का दायरा भी बढ़ता चला गया। पहले परिवार पर अनुभवी बुजुर्ग का नियंत्रण रहता था, आखेट आदि में उसी का अनुभव काम आता था और उन्हीं की सदिच्छा पर अर्जित सामग्री का आवंटन भी होता था, यह सत्ता का एक साीधा-सादा स्वरुप था। आखेट युग से चारागाह युग में प्रवेश करते ही चारागाहों और पालतू पशुओं पर नियंत्रण के लिए विभिन्न कबीलों में आपसी संघर्ष की नौबत आती ही थी और इसी तरह सत्ता का खेल जटिल होने लगा। कृषि आधारित व्यवस्था में जमीन पर अधिकार के लिए जो खूनी खेल आरंभ हुआ उसका एक यह परिणाम निकला कि जिसकी लाठी में जोर था उसने जमीन और जमीन पर निर्भर रहने वाले पर अपनी सत्ता स्थापित कर ली। राजा को यह अधिकारी किसी ईश्वर ने नहीं उसकी लाठी ने दिया था, लेकिन शासन या ओझाओं की अगली पीढ़ी के पंडे पुजारियों ने राजा की सत्ता को ईश्वरेच्छा का नाम दे दिया। आदि मानव के लिए प्राकृतिक शक्तियां एक अबूझ पहेली थीं। जादू-टोना या टोटकों द्वारा शासन या ओझाओं ने जिस मायावी सत्ता की नींव रखी उसी ने आगे धर्म और अध्यात्म का बाना पहनकर राजतंत्र को और मजबूती प्रदान कीं।
बहुदेववाद एक तरह से सत्ता के बंटवारे का एक कमजोर आधार था जिसे एकेश्वरवाद के एकतंत्र ने दृढता प्रदान की। लेकिन, व्यवहार में किसी विशालकाय राज्य को नियंत्रित रखना किसी एक के बस की बात नहीं थी। उसके लिए छुटभैये अधिकारियों की फौज रखना जरूरी हो गया। फलतः सामंती व्यवस्था का प्रादुर्भाव हुआ और धर्म के ठेकेदार भी सत्ता के उस खेल के भागीदार बने रहे।यह भी सच है कि सत्ता सदा किसी एक ओर होकर नहीं रही। समाज के ताने-बाने में जब भी उलझाव की स्थिति उत्पन्न होती है, सत्ता एक से दूसरे के हाथ चली जाती है और ऐसी हर क्रांति अगली क्रांति के लिए जमीन तलाशने लगती है।
सत्ता के सताए जब उठ खड़े होते हैं तो विचार भी अपना रंग बदलने लगता है। औद्योगिक क्रांति से पूर्व यह विचार परोसा गया कि लोगों के आपसी विचार-विमर्श ने ही सत्ता किसी एक व्यक्ति या वर्ग विशेष को सौंपने का मन बनाया होगा। इसी में यह संकेत भी निहित था कि अब राजतंत्र की जगह जनतांत्रिक व्यवस्था ही उसका विकल्प होगी। कुछ अंशों में हुआ भी यही। लेकिन, जनतंत्र के नाम पर एक वर्ग विशेष ने सत्ता हथिया ली, धन-बल, जन-बल पर भारी पड़ गया और सत्ता वर्ग विशेष की चेरी बनकर रह गई। अस्तित्व का वही पुराना संकट आज भी लगभग उसी पुराने रूप में विद्यमान है। सत्ता आशंकाग्रस्त रहता है कि पता नहीं कब उसके हाथ से सत्ता की बागडोर पिफसल जाए या छीन ली जाए और सत्ता से बाहर उसी प्रवृति के लोग सत्ता हथियाने की जोड़तोड़ में संलग्न रहते हैं। जिंदाभर रहने की जगह सत्ता के सुखभोग की अनियंत्रित लिप्सा निरंतर प्रबल होती गई और आज वही और भी बड़े संकट का कारण बन गई है। भौतिक सुखों का कायल सांसारिक व्यक्ति ही नहीं, संसार के माया-मोह से विरक्ति का उपदेश देने वाले संत-महंत और बाबा लोग भी इससे अछूते नहीं हैं। उनके भक्तों, चेले-चांटों की फौज आश्रमों की चकाचैंध और जनसामान्य पर उनका दबदबा उसी सत्ता सुख-भोग का दूसरा रूप है।
येन-केन-प्रकारेण सत्ता सुख पाने की होड़ आज कोढ़ में खाज बनकर रह गई है। राजनीतिक ठगी का आज ऐसा बोलबाला है जैसा पहले कभी नहीं था। एक दूसरे पर अपनी सत्ता स्थापित करने के छोटे-बड़े प्रयास पहले भी होते रहे, लेकिन इधर दो-दो विश्वयुद्धों ने मानवता को जिस तरह से लहूलुहान किया उसकी सानी नहीं मिलती। हर तिकड़म को बड़े-बड़े आदर्शों की आड़ में इस तरह पेश किया जाता है कि सामान्य लोग उसके झांसे में आने से बच नहीं पाते।छल से या बल से सत्ता तक पहुंचने के हर प्रयास के पीछे भौतिक सुख-समृद्धि के ही सपने जुड़े होते हैं और उनकी पूर्ति के लिए कुछ भी किया जाना जायज मान लिया जाता है। साम्राज्यवादी सोच इसी का नतीजा है। किसी हवाई आदर्श का बहाना लेकर एक देश दूसरे देश पर हमला करने से परहेज नहीं करता और यह सब राजनीति के धूर्त खिलाड़ियों की शह पर होता है। विजेता को पराजितों पर मनमानी करने का लाइसेंस मिल जाता है और फिर जो प्रतिक्रया होती है उसके पीछे भी वही सत्ता सुख झांकता नजर आता है। वस्तुतः यह है तो अस्तित्व का ही संघर्ष, किन्तु अपने सीमित दायरे से जब वह आगे निकल जाता है तो अस्तित्व के संकट में बदल जाता है और हम एक दूसरे को अपने अस्तित्व का दुश्मन मानने लग जाते हैं। दुनिया में शोषण, लूट, ठगी, हत्या जैसे घिनौने अपराधों के पीछे यही एक बड़ा कारण नजर आता है। हम मान बैठते हैं कि सत्ता के बिना एक पत्ता भी नहीं हिल सकता, इसलिए चाहे जो हो सत्तासीन होना ही आज का परमधर्म है। काल्पनिक ईश्वरीय सत्ता दुनिया में उतनी असरदार कभी नहीं रही जितनी ठोस भौतिक सत्ता रही है और आज यहां-वहां जितने भी राजनीतिक प्रपंच देखने को मिलते हैं वे सब इसी सत्ता के लिए होते हैं।क्या कुछ ऐसा नहीं हो सकता कि सत्ता की भूख हद से आगे न बढ़ पाए?
यह तो एक सच्चाई है कि सत्ता अस्तित्व के संघर्ष से अलग-थलग नहीं की जा सकती, लेकिन उसे संयमित और नियंत्रित रखने का कोई न कोई रास्ता तो खोजा ही जाना चाहिए। एक ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए जिसमें सबल निर्बल की बेचारगी का लाभ न उठा सके। कोई ऐसा सामाजिक ढांचा विकसित होना चाहिए जिसमें निर्बल के अधिकारों से सबल खिलवाड़ न कर सके। लेकिन, ऐसा सत्तासीनों की भलमनसाहत के भरोसे होना नामुमकिन है। इसके लिए निर्बल वर्ग को ही आगे आना होगा और उसी को संघर्ष कना होगा। एक ऐसी व्यवस्था के लिए जिसमें किसी के भी अस्तित्व पर संकट का ग्रहण न लग पाए और सभी को सम्मानपूर्वक जीने का अधिकार मिल सके। जीव जगत में मनुष्य ही एक ऐसा प्राणी है जो सोचने-समझने की शक्ति रखता है और आज दुनिया में जिस तरह के आंदोलन चल रहे हैं उनसे तो यही लगता है कि एक न एक दिन मानव जाति उस व्यवस्था को कायम करके ही दम लेगी।