Monday, 30 March 2009

चुनावी महापर्व पर आती है धूमिल की याद

15वीं लोकसभा चुनाव की तैयारी षुरू हो चुकी है। लोकतांत्रिक प्रक्रिया के तहत प्रत्याषी जनता के द्वार खड़े हैं कि भैया, एक बार हमें आजमा लो। कोई षिकायत का मौका नहीं देंगे। भोली-भाली बेचारी जनता को तरस आ जाता है और भावना में बहकर वह जनप्रतिनिधि बनकर घर आए प्रत्याषी को अपने भाग्य का विधाता बनाकर देष की संसद में भेज देता है। वोट देते समय उसे यह याद नहीं रहता है कि पिछली से पिछली बार भी यही षख्स षिकायत का मौका न देने की बात कहकर वोट मांग संसद पहुंच गया था। और उसके बाद झांकने तक नहीं आया। जी हां! यह तो नेताओं की फितरत होती है। इनकी चमड़ी बड़ी मोटी होती है। इन्हें षर्म नहीं आती है। और ऐसे में ही याद आती है जनकवि धूमिल रचित कविता की।
न कोई प्रजा है
न कोई तंत्र है
यह आदमी के खिलाफ आदमी का
खुलासा षड्यंत्र है
जनकवि धूमिल आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनके द्वारा सृजित कविता का हर षब्द और उनसे मिलकर बना एक पूरा वाक्य परिलक्षित करता है कि धूमिल सही अर्थों में जनमानस में डूबे हुए सषक्त जनवादी कवि थे। धूमिल की जीवन गाथा से पता चलता है कि उनकी कविता की दुनिया बनारस के गांव खेवली से षुरू होती है और अपने समय के इतिहास की जागरूकताओं, सामयिक छिनालपन, विषेष तौर पर प्रजातंत्र की हास्यास्पद स्थिति को छूती हुई, धक्का देती हुई समकालीन साहित्यबोध और समकालीन साहित्यकारों तक जाती है। प्रजातंत्र से धूमिल को बड़ी चिढ़ थी। सुदामा पांडेय उर्फ धमिल के जीवन में भी वही समस्याएं, वही बाधाएं आयीं जो हर मध्यम वर्गीय भारतीयों के जीवन में आती है। बावजूद इसके व्यक्तिगत प्रतिभा के बल पर धूमिल ने भाषा की रात षीर्षक से रचित कविता में लिखा-
देष डूबता है तो डूबे
लोग ऊबते हैं तो ऊबें
जनता लट्टू हो चाहे तटस्थ रहे
बहरहाल, वह सिर्फ यह चाहते हैं कि
उनका स्वष्तिक स्वस्थ रहे।
धूमिल की यह ट्रैजिडी वास्तव में आज के युवा भारत की ज्वलंत समस्या की ओर इंगित करती है। धूमिल अपनी कविता को एक ओर यदि नागरिक सभ्यता से वहां की व्यवस्था, अन्याय व षोषण से जोड़ते हैं तो दूसरी ओर इनकी कविता ग्रामीण जनसमाज के उत्पीड़न, नफरत, दर्द, पीड़ा, कुंठा एवं घुटन से स्वतः जुड़ती प्रतीत होती है। भारत गांवों का देष है और गांव किसानों की आत्मा में बसती है। लेकिन इन नेताओं को किसानों की कोई फिक्र नहीं होती है। इन नेताओं की आत्मा तो षहर में ही बसती है। जीतकर आते हैं गांव से और पूजते हैं षहर को। यह एक विरोधाभासी चेहरा है इनका। तभी तो कविता में गांव को नहीं पाकर एक बार धूमिल अनायास ही बोल पड़े-
चाहिए तो यह कि किसान खेती-बारी करना बंद कर दे। जब फसल नहीं होगी तब इन षहरातियों को पता चलेगा कि गांव क्या होता है और इनकी अपनी बिसात क्या है? देखें तब ये क्या खाते हैं?
दरअसल धूमिल षहर के हर आदमी को संदेह की नजरों से देखते थे ठीक उस किसान की तरह जो षहर को झूठ, लूट, धोखा, छल, बदमाषी व बेषर्मी का केंद्र मानता है। साठ के दषक में जब धूमिल अपने गृहस्थ जीवन में थे तो उस समय भी वे देष के भीतर अनाज की मांग को नजरअंदाज नहीं कर पाये थे। भूख-बेबसी-लाचारी मानो उनके नेत्रों के आगे खुलकर कहने लगी--
बच्चे भूखे हैं
मां के चेहरे पत्थर
पिता जैसे काठ
अपनी ही आग में जले हैं
ज्यों सारा घर।
इस प्रकार से अनाज की जमाखोरी के पीछे की राजनीति उनकी पैनी दृष्टि से बच नहीं पायी। उनका मानना था कि अनाज की कमी वास्तविक नहीं, बल्कि स्वार्थ की राजनीति से प्रेरित है। जमाखोरी को सरकारी नीति से बढ़ावा मिलता है। उस जमाखोरी से बचने का कोई प्रयास न होता देख कवि धूमिल के भावनाओं की करुण गाथा संसद और रोटी कविता के रूप में सामने आती है--
एक आदमी रोटी बेलता है
एक आदमी रोटी खाता है
एक तीसरा आदमी भी है
जो न रोटी बेलता है न रोटी खाता है
वह सिर्फ रोटी से खेलता है
मैं पूछता हूं यह तीसरा आदमी कौन है
मेरे देष की संसद मौन है।
दरअसल हालात इतने नाजुक हैं कि व्यक्ति अगर इस षोषण की प्रक्रिया को समझ भी जाए तो भी वह विद्रोह करने की स्थिति में नहीं रह गया है। अपनी विचारधारा का परित्याग कर, उसे झुठलाकर वह स्वार्थपूर्ति में निरंतर रत रहना चाहता है। आजादी के इन छह दषकों में सामाजिक व राजनीतिक षोषण ने जहां आम आदमी के रक्त को चूस लिया है, वहीं दूसरी ओर उसके विचारों को भी दिवालिया बना दिया है। किस्सा जनतंत्र में धूमिल ने इसी आम आदमी की विवषता की ओर संकेत किया है जिसमें कलछुल-बटलोही एवं तवे-चिमटे की क्रियाएं फिर आर्थिक विवषताओं के वषीभूत होकर आधे पेट भोजन प्राप्त करने वाला आदमी पहले भरपेट पानी पीता है और फिर भोजन करता है। कैसी विडंबना है इस आदमी की? यह अपने देष के किसी एक व्यक्ति की ट्रैजिडी नहीं है, वरन आज पूरा समाज इस त्रासद दौर से गुजर रहा है। इन्हीं सब त्रासद स्थितियों को लेकर देष की प्रजातांत्रिक व्यवस्था के प्रति जनकवि धूमिल के मन में गुस्सा था। धूमिल की तमाम कविताएं लाभ-लोभग्रस्त समाज और षोषक-षासक षक्तियों का पर्दाफास करता है जिसका तेवर विद्रोही और क्रांतिकारी है। वे तथाकथित जनतांत्रिक संस्थाओं, संसद, न्यायालय, षिक्षालय, औद्योगिक-व्यापारिक प्रतिष्ठानों आदि के जनविरोधी चरित्र को रेखांकित करते हैं, उसकी बुराइयों व अमानवीयताओं का भंडाफोड़ करते हैं जो साबित करता है कि धूमिल व्यक्तिवादी नहीं, बल्कि समाजवादी मूल्य के कवि हैं। वह आजादी और प्रजातंत्र षब्द को चुनौती देते हैं जो देष की षोषित जनता के लिए पूरी तरह से अप्रासंगिक व अपूर्ण है। धूमिल भ्रष्ट चुनाव पद्धति से चुने गए व्यावसायिक नेताओं द्वारा सामाजिक कायाकल्प की संभावनाओं को अस्वीकार करते हुए जनमत को एक होकर अपनी ऊबन को साकार व सार्थक करने की भी प्रेरणा देते हैं।

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