देष की सेहत कुछ ठीक नहीं चल रही है। हालात को देखते हुए यह सवाल उठाना आज ज्यादा प्रासंगिक होगा कि आखिर भारतीय लोकतंत्र पर संकट क्यों मडरा रहा है। कुछ लोग इसे नेतृत्व का संकट कहते हैं तो कुछ लोग इसे चरित्र का संकट कहते हैं। लोगों का यह भी मानना है कि हमारे नेताओं और लोगों के निकम्मेपन के चलते ही यह संकट पैदा हुआ है। लेकिन हमें ऐसा लगता है कि वास्तव में यह संकट लोकतांत्रिक संस्थाओं की अहमियत को नकार देने के कारण पैदा हुआ है। ऐसे में सवाल यह भी उठता है कि लोकतांत्रिक संस्थाओं की अहमियत को नकारने वाले भी तो देष के नेता और लोग ही तो हैं।
विष्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देष भारत में अक्सर यह सवाल उठता रहा है कि कितना सजग है या रहा है हमारा लोकतंत्र? स्वभाविक है यह सवाल उठना क्यों कि वर्तमान परिदृष्य में भारतीय लोकतांत्रिक प्रणाली में लोगों की आस्था घट रही है। मसलन मतदान के प्रति मतदाताओं की उदासीनता, सार्वजनिक जीवन में विधायिका एवं कार्यपालिका के प्रति विष्वास का अभाव आदि कुछ ऐसे मुद्दे हैं जो लोकतंत्र की अस्मिता पर सवाल खड़े करते हैं।जब इस तरह के सवाल उठते हैं कि कितना सजग रहा है हमारा लोकतंत्र तो इसका मतलब यही निकलता है कि विष्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देष की अधिकांष जनता को यह नहीं मालूम कि आखिर लोकतंत्र का मतलब क्या होता है। ऐसे देष के लोकतंत्र का पतन होना निष्चित है जिस देष की जनता लोकतंत्र के अर्थ को समझ नहीं सकती या देष उसे लोकतंत्र के मायने समझा नहीं सकता।
आज जिस लोकतंत्र की सजगता पर सवाल खड़ा किया जा रहा है यह उसी महान एवं पवित्र लोकतंत्र का विकृत रूप है जिसे षब्दों में बांधते हुए अमरीकी राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन ने कहा था- लोकतंत्र वह सरकार है जो जनता की, जनता के लिए और जनता द्वारा चलाई जाती है। मुख्य रूप से लोकतंत्र जनता का षासन है। हालांकि भारत के संदर्भ में यह कहना गलत न होगा कि स्वतंत्रता के छह दषक के भारतीय लोकतंत्र का इतिहास राजनीति एवं लोकतंत्र के पतन का इतिहास रहा है। निष्चित रूप से आज के सभी राजनीतिक दलों को जो समाज सेवा के बहाने राजनीति अपनाते हैं और इस लोकतांत्रिक षासन प्रणाली को चलाने का दावा करते हैं उन्हें अपने घोषणा पत्रों में जनता को लोकतंत्र का अर्थ समझाने के कृतसंकल्प के मुद्दे को प्राथमिक मुद्दे के रूप में अपनाना चाहिए।
आज जिस लोकतंत्र की सजगता पर सवाल खड़ा किया जा रहा है यह उसी महान एवं पवित्र लोकतंत्र का विकृत रूप है जिसे षब्दों में बांधते हुए अमरीकी राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन ने कहा था- लोकतंत्र वह सरकार है जो जनता की, जनता के लिए और जनता द्वारा चलाई जाती है। मुख्य रूप से लोकतंत्र जनता का षासन है। हालांकि भारत के संदर्भ में यह कहना गलत न होगा कि स्वतंत्रता के छह दषक के भारतीय लोकतंत्र का इतिहास राजनीति एवं लोकतंत्र के पतन का इतिहास रहा है। निष्चित रूप से आज के सभी राजनीतिक दलों को जो समाज सेवा के बहाने राजनीति अपनाते हैं और इस लोकतांत्रिक षासन प्रणाली को चलाने का दावा करते हैं उन्हें अपने घोषणा पत्रों में जनता को लोकतंत्र का अर्थ समझाने के कृतसंकल्प के मुद्दे को प्राथमिक मुद्दे के रूप में अपनाना चाहिए।
सबको पता है कि आज के दौर में राजनीति एक ऐसा षक्ति सूत्र है जिसके द्वारा लोकतंत्र के चारों खंभे यानी विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका, प्रेस संचालित व निर्देषित होती दिख रही है और आज की राजनीति का चरित्र किसी से छिपा नहीं है। जाहिर है जब राजनीति में भ्रष्टाचार फैलेगा तो लोकतांत्रिक संस्थाओं में भी भूचाल आएगा ही। आपातकाल से कुछ पहले के बात करें तो हम पाते हैं कि इंदिरा गांधी ने अपने तानाषाही रवैये को अपनाते हुए जिस परंपरा की षुरुआत की उससे पूरा का पूरा लोकतांत्रिक ढांचा तहस-नहस हो गया और आगे की राजनीति के लिए कुछ ऐसा ही कर गुजरने का द्वार खुल गया। हालांकि इंदिरा गांधी जैसा साहस कोई दूसरा नहीं कर पाया लेकिन राजनीति की मनोदषा तो बिगड़ी ही। एक लंबे प्रयास से जिला, मंडल और प्रदेष कमेटियों का जो पार्टी ढांचा कांग्रेस के नेताओं ने तैयार किया था उस ढांचे को तहस-नहस करने का श्रेय इंदिरा गांधी को ही जाता है। अब हमारे देष की जनता को यह समझ में नहीं आता कि आखिर पार्टी संगठन के टूटन से लोकतंत्र का क्या वास्ता है? जरूरत है इस मुद्दे पर गंभीर चिंतन एवं मनन करने की।
आपातकाल के समय में ही प्रधानमंत्री सचिवालय जैसी एक नई व्यवस्था अस्तित्व में आई जिसकी हैसियत कई मायनों में कैबिनेट से भी ज्यादा थी। कुल मिलाकर यही हुआ कि दल में पार्टी संगठन की जगह नौकरषाही ने ले ली और नेतृत्व के पास नौकरषाही पर आश्रित रहने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा। पार्टी संगठन के विलोप की संस्कृति के प्रभाव से अन्य वामपंथी या दक्षिणपंथी दल भी मुक्त न रह सके। इस परिस्थिति में भी जब राजनीति और पार्टी में जिन्होंने आस्था व्यक्त करने की कोषिष जारी रखनी चाही उन्हें या तो राजनीति के हाषिए पर धकेल दिया गया या फिर उनकी गर्दन आपातकाल की तलवार पर लटका दी गई।पार्टी संगठन के विलोप से ढेर सारी गैर लोकतांत्रिक गतिविधियों की घुसपैठ भारतीय राजनीति में हुई और आने वाले दिनों में होती रहेगी। जब पार्टी में संगठन नाम की षक्ति नहीं रही तो चुनाव के वक्त जनता से सीधे संपर्क कायम करने का जरिया भी खत्म हो गया। अब धन और बाहुबल के आधार पर ही जनता तक पहुंचने की रणनीति बनने लगी। समय-समय पर औद्योगिक घरानों एवं पूंजीपतियों से धन लेने का सिलसिला षुरू हुआ जिसका बुरा प्रभाव भारत की चुनाव प्रणाली पर पड़ा। चुनाव प्रचार के बहाने पूंजीपतियों से धन एंेठने की परंपरा भी चल पड़ी।राजनीति में अपराध का सिलसिला भी इंदिरा गांधी के षासनकाल से ही षुरू हुआ। संजय गांधी की राजनीतिक पहल ने पार्टी संगठन और लोकतांत्रिक संस्थाओं को ठंेगा दिखाते हुए भ्रष्टाचार और अपराध को संगठनबद्ध कर दिया जिसकी नकल अन्य राजनीतिक दलों में भी हुई।
आपातकाल के समय में ही प्रधानमंत्री सचिवालय जैसी एक नई व्यवस्था अस्तित्व में आई जिसकी हैसियत कई मायनों में कैबिनेट से भी ज्यादा थी। कुल मिलाकर यही हुआ कि दल में पार्टी संगठन की जगह नौकरषाही ने ले ली और नेतृत्व के पास नौकरषाही पर आश्रित रहने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा। पार्टी संगठन के विलोप की संस्कृति के प्रभाव से अन्य वामपंथी या दक्षिणपंथी दल भी मुक्त न रह सके। इस परिस्थिति में भी जब राजनीति और पार्टी में जिन्होंने आस्था व्यक्त करने की कोषिष जारी रखनी चाही उन्हें या तो राजनीति के हाषिए पर धकेल दिया गया या फिर उनकी गर्दन आपातकाल की तलवार पर लटका दी गई।पार्टी संगठन के विलोप से ढेर सारी गैर लोकतांत्रिक गतिविधियों की घुसपैठ भारतीय राजनीति में हुई और आने वाले दिनों में होती रहेगी। जब पार्टी में संगठन नाम की षक्ति नहीं रही तो चुनाव के वक्त जनता से सीधे संपर्क कायम करने का जरिया भी खत्म हो गया। अब धन और बाहुबल के आधार पर ही जनता तक पहुंचने की रणनीति बनने लगी। समय-समय पर औद्योगिक घरानों एवं पूंजीपतियों से धन लेने का सिलसिला षुरू हुआ जिसका बुरा प्रभाव भारत की चुनाव प्रणाली पर पड़ा। चुनाव प्रचार के बहाने पूंजीपतियों से धन एंेठने की परंपरा भी चल पड़ी।राजनीति में अपराध का सिलसिला भी इंदिरा गांधी के षासनकाल से ही षुरू हुआ। संजय गांधी की राजनीतिक पहल ने पार्टी संगठन और लोकतांत्रिक संस्थाओं को ठंेगा दिखाते हुए भ्रष्टाचार और अपराध को संगठनबद्ध कर दिया जिसकी नकल अन्य राजनीतिक दलों में भी हुई।
आज सभी राजनीतिक दल अपराधियों को चुनाव में जिताकर विधायिका के सदस्य बन रहे हैं जो कि लोकतंत्र का एक स्तंभ है। इसका परिणाम यह हो रहा है कि आपराधिक तत्व आज राजनीतिक दलों के सहयोगी न रहकर सहभागी बन गए हैं। विधायिका के सदस्य और मंत्री बनकर इन असामाजिक तत्वों ने नया सामाजिक सम्मान पाया है। यदि इस संदर्भ मेंष्षंका हो तो चरित्र के धनी व पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त टीएन षेषन से आप पूछ सकते हैं कि आज के दौर में कितने सांसद या विधायक आपराधिक पृष्टभूमि से आते हैं।
आज धर्म और जाति के आधार पर चुनाव लड़े जा रहे हैं। पूर्ण बहुमत नहीं होने के बावजूद वे सरकार बनाने का अपना दावा पेष करते हैं और इस परिस्थिति से निपटने के लिए षुरू होती है सांसदों या विधायकों की खरीद- फरोख्त। आया राम-गया राम की राजनीति में विधायिका के सदस्य खुले बाजार में खुद को नीलाम करने में जुट जाते हैं। कुल मिलाकर आज की राजनीति में सभी इस सिद्धांत में रच बस गए हैं। देष भाड़ में जाए, जरूरी है सत्ता में बने रहना। सत्ता की इस राजनीतिक खेल में सब कुछ उन्हें जायज लगता है। वोट खरीदिए, विधायक और सांसद खरीदिए, मतदाताओं को आतंकित कीजिए, नेताओं को आतंकित कीजिए। हिंसा, अपहरण, बलात्कार सभी कुछ इनकी दृष्टि में वैध तरीके हैं। धर्मभीरुता, सांप्रदायिकता एवं जातीयता के राजनीतिक चक्रव्यूह में लोकतंत्र की सजगता धूमिल पड़ती नजर आ रही है। आखिर यह सब क्यों हो रहा है? इसका मुख्य कारण है विष्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देष की जनता का मौन एवं उदासीन होना है। कोउ नृप होय हमें का हानी का दर्षन जनता की मानसिक सोच में गहरा उतर गया है। इस दृष्टि ने भारतीय व्यक्तित्व की सहनषक्ति को लचीला बना दिया है। इसकी प्रतिरोधक क्षमता को कुंठित कर दिया है। लोकतंत्र के चैथे स्तंभ मीडिया यानी प्रेस को और पत्रकारों को बड़ अनुदानों से मौन रखा जा रहा है। बुद्धिजीवियों एवं लेखकों को रिझाया जा रहा है।
आज धर्म और जाति के आधार पर चुनाव लड़े जा रहे हैं। पूर्ण बहुमत नहीं होने के बावजूद वे सरकार बनाने का अपना दावा पेष करते हैं और इस परिस्थिति से निपटने के लिए षुरू होती है सांसदों या विधायकों की खरीद- फरोख्त। आया राम-गया राम की राजनीति में विधायिका के सदस्य खुले बाजार में खुद को नीलाम करने में जुट जाते हैं। कुल मिलाकर आज की राजनीति में सभी इस सिद्धांत में रच बस गए हैं। देष भाड़ में जाए, जरूरी है सत्ता में बने रहना। सत्ता की इस राजनीतिक खेल में सब कुछ उन्हें जायज लगता है। वोट खरीदिए, विधायक और सांसद खरीदिए, मतदाताओं को आतंकित कीजिए, नेताओं को आतंकित कीजिए। हिंसा, अपहरण, बलात्कार सभी कुछ इनकी दृष्टि में वैध तरीके हैं। धर्मभीरुता, सांप्रदायिकता एवं जातीयता के राजनीतिक चक्रव्यूह में लोकतंत्र की सजगता धूमिल पड़ती नजर आ रही है। आखिर यह सब क्यों हो रहा है? इसका मुख्य कारण है विष्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देष की जनता का मौन एवं उदासीन होना है। कोउ नृप होय हमें का हानी का दर्षन जनता की मानसिक सोच में गहरा उतर गया है। इस दृष्टि ने भारतीय व्यक्तित्व की सहनषक्ति को लचीला बना दिया है। इसकी प्रतिरोधक क्षमता को कुंठित कर दिया है। लोकतंत्र के चैथे स्तंभ मीडिया यानी प्रेस को और पत्रकारों को बड़ अनुदानों से मौन रखा जा रहा है। बुद्धिजीवियों एवं लेखकों को रिझाया जा रहा है।
15वीं लोकसभा चुनाव की तैयारी चल रही है। चुनाव से संबंधित विभिन्न समाचार पत्र-पत्रिकाओं एवं विभिन्न टीवी चैनलों के कवरेज से किसी न किसी राजनीतिक दल विषेष को तरजीह या उसका प्रचार करने जैसे तरीके की बू आती है। प्रेस लोकतंत्र का चैथा खंभा है और इसका इस तरह से पेष आना खतरे की घंटी नही तो और क्या है।बहरहाल, भारतीय लोकतांत्रिक ढांचे की चरमराहट निरंतर जारी है। यह कहना कठिन होगा कि यह ढांचा बचेगा या मिटेगा, लेकिन इसकी चरमराहट की आवाज कुछ गंभीर एवं खतरनाक संकेतों की ओर इषारा करती है। बावजूद इसके, आने वाले दिनों में यदि इन संकेतों को नजरअंदाज किया गया तो खतरा बढ़ सकता है। इसलिए जरूरत है ऐसी परिस्थितियों में विषुद्ध सामाजिक स्तर पर कोई सार्वभौम षक्ति उभरकर सामने आए और दषकों से चली आ रही भारतीय लोकतांत्रिक परंपरा को स्वच्छ एवं मजबूत बनाने का प्रयास करे। आएं, हम सब मिलकर ऐसा कुछ सोचें और करें ताकि भारतीय लोकतंत्र की अस्मिता बरकरार रहे।
1 comment:
nice .. one,, u r into mass media and communication... i like this reading and writing .. visit mine.. u will like it;;;
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