Thursday, 4 June 2009

और अब गोविन्दाचार्य की बारी

पार्टी की वर्तमान में खराब सेहत और संघ परिवार की सक्रियता को देखकर ऐसा लग रहा है कि भाजपा के अगले अध्यक्ष गोविन्दाचार्य होंगे क्योंकि इस देश में गैर कांग्रेसवाद के विकल्प को बचाने के लिए अब एक ही रास्ता बचा है और वह है देश के सामने उदार हिन्दूवादी राजनीति का विकल्प पेश करना। पता नही क्यों, मुझे ऐसा लगता है कि इसमें गोविन्दाचार्य पूरी तरह से फिट बैठते हैं।
पंद्रहवीं लोकसभा के नतीजों से यह तो साफ हो गया है कि देश में गैर-कांग्रेसवाद के विकल्प में जो पार्टियां उभरी थी उनका या तो खात्मा हो गया और जो बची हैं उनका जनाधार कमजोर हुआ है। मसलन गैर कांग्रेसवाद का समाजवादी विकल्प तो कमजोर हुआ ही है वामपंथी पार्टियां भी हाशिये पर चली गयी हैं। चुनाव से पहले प्रकाश करात जिस गैर-कांग्रेसवाद का ढोल पीट रहे थे रिजल्ट आते ही अपना मुंह छिपाने लगे। मायावती को सबसे मजबूत धुरी मानकर आगे बढ़ रहे प्रकाश को तब और बड़ा झटका लगा जब माया ने बिना मांगे कांग्रेस को अपना समर्थन सौंप दिया। दक्षिण में करूणानिधि मजबूत न बने रहते तो जयललिता भी अब तक कांग्रेस के पाले में बैठी नजर आती। उत्तर प्रदेश में मुलायम काफी कमजोर हो गए हैं और बिहार में लालू पासवान भी मान चुके हैं कि अब कांग्रेस के साथ रहकर ही वे अपना राजनीतिक अस्तित्व बचा सकते हैं। यहां तक कि जेडी यू नेता और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी कांग्रेस के सुर में सुर मिलाने लगे हैं। नीतीश वह मौका तलाश रहे है कि भाजपा से किसी तरह से पीछा छूटे। पश्चिम बंगाल में कांग्रेस से विरोध कर तृणमूल कांग्रेस बनानेवाली ममता बनर्जी भी मान चुकी हैं कि प्रदेश में वामपंथी शासन को खत्म करने के लिए भाजपा की बजाय कांग्रेस ज्यादा विश्वसनीय सहयोगी है। और गैर कांग्रेसवाद की सबसे मजबूत विकल्प भाजपा ने भी इस चुनाव में काफी सीटें गंवाई हैं। वोट प्रतिशत में भी कमी आई है। गोविन्दाचार्य अक्सर भाजपा को इस बात की हिदायत देते रहे हैं कि गैर-कांग्रेसवाद का मतलब सिर्फ उनके नेता के सामने अपना नेता प्रोजेक्ट कर देना ही गैर-कांग्रेसवाद नहीं है। हम भाजपा को भगवा कांग्रेस बनाकर कांग्रेस का विकल्प नहीं खड़ा कर सकते।
गोविन्दाचार्य मानते हैं कि जनसंघ के बाद भाजपा के रूप में जो राजनीतिक प्रयोग हुआ उसके मूल में यही है कि हम आलाकमान की शैली में ही कांग्रेस का विकल्प खड़ा कर सकते हैं। यह प्रयोग कुछ साल की सरकार तो दे सकता है लेकिन देश की राजनीति में कोई स्थायी विकल्प खड़ा नहीं कर सकता। भाजपा का उत्थान और पतन इस बात का प्रमाण है। गोविन्दाचार्य संघ परिवार के थिंकटैंक माने जाते हैं और समय समय पर अपनी नसीहतें संघ और भाजपा को देते रहे हैं जिस वजह से वे उपेक्षित भी रहे। अब जब पंद्रहवी लोकसभा के चुनाव परिणाम में गोविंदाचार्य की कहीं बातें हकीकत को बयां कर गई तो संघ और भाजपा दोनों को ही गोविंदाचार्य की याद आई।
विचारधारा की राजनीति से गैर कांग्रेसवाद को खत्म करने के लिए बहुत लंबा सफर तय करना होगा यह बात संघ की समझ में भी आ गया है। ऐसे में संघ के शीर्ष नेतृत्व को एक बार फिर अपने पूरे राजनीतिक प्रयोग पर पुनर्विचार करने की सूझी है। संघ के शीर्ष नेतृत्व और गोविन्दाचार्य की कानाफूसी ने इस चर्चा को बल दिया है कि गैर कांग्रेसवाद के स्थायी विकल्प को मजबूत आधार प्रदान करने के लिए भाजपा की कमान क्यों न गोविन्दाचार्य को सौंपा जाए।

7 comments:

MANVINDER BHIMBER said...

Parveen ji.....blog ke liye badhaaee....lekin aap ye bataye ki aapki tabiyat kaise hai.....apne khayaal rakhen....

Unknown said...

उदार हिंदूवादी संरचना और गोविंदाचार्य।
हुज़ूर ये कहां फिट बैठते हैं.
वे सभी चहरे जो उग्रहिंदुत्ववादी थे, वे ही सभी साईड़लाईन कर दिये गये थे।
एक नरेन्द्र मोदी ही अपवाद हैं, जो गुजरात में अपनी पुरानी सफलता के चलते बचे रह गये। उन्हें चलता करने की भूमिका बांधी जा चुकी है।

और ये सब राजनैतिक मजबूरियों के चलते है, वहां कोई आदर्श काम नहीं कर रहे हैं।

भाजपा को एक मुख्यधारा की पार्टी बने बगैर अभी तो वेकल्पिक ध्रुव बनने की कोई खास संभावना नज़र नहीं आती।
और ऐसा करने में एक बार उसे बडा झटका खाना ही पडेगा।

दिनेशराय द्विवेदी said...

व्यक्तियों को ले कर नए प्रयोग सफल नहीं हो सकते। संघ की खुले या प्रच्छन्न रूप से हिन्दू राष्ट्रवाद की अवधारणा कभी भी संघ प्रायोजित दल को मुख्यधारा की पार्टी नहीं बनने देगी। भारतीय सोच चल सकती है। लेकिन आम जनता को विकास के लाभ लगातार दिलाते रहने के इर्दगिर्द ही रहना होगा।

RAJ said...

गोविंदाचार्य बेहद सुलझे हुए एवं बुधिमान रास्त्राभक्त है | उनके आने से भाजपा को नई जान मिल सकती है...

पर भाजपा के नये नेता उनके बताए रास्ते पर चलेंगे इसमे शक है....!

मुझे नही लगता कि वो सीधे कोई पद लेंगे जब तक उन्हे पूरा विश्वास ना हो कि भाजपाई उनका पूर्ण सहयोग करेंगे|

Anonymous said...

उनकी लाईन पर चल पाना मुश्किल नहीं होगा?

Unknown said...

आपकी खबर के अनुसार यदि यह सही है तो स्वागत योग्य कदम है, लेकिन भाजपा "सॉफ़्ट-हिन्दुत्व" की राह पर चलकर सफ़लता प्राप्त कर सकेगी, इसमें सन्देह ही है… जब तक अवसरवादी गठबन्धन किये जाते रहेंगे तब तक भाजपा वाले कभी कुमारस्वामी, कभी पटनायक, कभी जयललिता, कभी नीतीश से पीठ में घाव खाते ही रहेंगे…। सिर्फ़ "एकला चलो रे" ही भाजपा को बचा सकता है…

admin said...

ये भी कर के देख लो। शायद कोई फायदा हो जाए।
-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }