Wednesday, 14 December 2011

‘व्हाय दिस धोखाधड़ी…डी?’

ऐसा हो नहीं सकता कि ‘व्हाय दिस कोलावेरी…डी?’ गाने के बोल आपने नहीं सुने होंगे। तमाम लोगों, खासकर युवाओं की जुबां पर इन दिनों इस गाने का बुखार जो चढ़ा हुआ है। लेकिन अर्ज है, अपना मूड थोड़ा बदलिए और अब ‘व्हाय दिस धोखाधड़ी…डी?’ गुनगुनाने का वक्त गया है। चौंकिए नहीं! हम भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना के जनलोकपाल आंदोलन की बात कर रहे हैं। 11 दिसंबर को जंतर मंतर पर अन्ना के एकदिवसीय सांकेतिक अनशन के दौरान ‘व्हाय दिस धोखाधड़ी…डी?’ की धुन सुनने को खूब मिली। टीम अन्ना कह रही है कि सरकार लोकपाल को लेकर देश की जनता के साथ धोखाधड़ी कर रही है।

धोखाधड़ी ये कि जब प्रधानमंत्री ने टीम अन्ना को लिखित में प्रभावी लोकपाल का आश्वासन दिया था और अन्ना की तीन मांगों (समूह-सी और डी श्रेणी के सरकारी कर्मचारियों, सीबीआई और सिटीजन चार्टर को लोकपाल के दायरे में रखने) को लेकर संसद में प्रस्ताव भी पारित किया था तो फिर संसद की स्थायी समिति की रिपोर्ट इतनी उलट क्यों? प्रधानमंत्री और संसद से मिले आश्वासन के बाद अन्ना ने रामलीला मैदान में 12 दिन पुराने अनशन को स्थगित करने की घोषणा की थी। इसके बाद संसद ने सदन से पारित तीन प्रस्ताव के साथ सरकार और सिविल सोसायटी के लोकपाल ड्राफ्ट को संसद की स्थायी समिति के पास अनुशंसा के लिए भेज दिया। संसद की स्थायी समिति ने 9 दिसंबर को जो रिपोर्ट संसद में पेश की तो पता चला कि इसमें सेंस ऑफ हाउस के उस खास नोट की अवमानना की गई है जिसपर संसद ने अन्ना की तीन मांगों से सहमति जताते हुए प्रस्ताव पारित कर समिति को भेजी थी।


अब संसद से सड़क तक कांग्रेस के वरिष्ठ नेता, प्रवक्ता और स्टैंडिंग कमेटी के अध्यक्ष अभिषेक मनु सिंघवी की जबरदस्त आलोचना हो रही है। अन्ना हजारे ने लोकपाल विधेयक का परीक्षण करने वाली संसद की स्थायी समिति पर देश के साथ धोखा करने का आरोप लगाते हुए भ्रष्टाचार से निपटने में समिति की रिपोर्ट को कमजोर और प्रभावहीन बताया। अन्ना ने कहा कि सरकार भ्रष्टाचार मिटाने के प्रति गम्भीर नहीं है। सरकार में स्थायी समिति की रिपोर्ट खारिज करने की इच्छाशक्ति नहीं है। स्थायी समिति ने पूरे देश को धोखा दिया है। टीम अन्ना ने 11 दिसंबर को जंतर मंतर पर अन्ना के सांकेतिक अनशन के दौरान इस मसले पर बहस के लिए मिनी संसद बिठा दी। पहली बार सत्तारुढ़ यूपीए को छोड़ तमाम विपक्षी दलों के प्रतिनिधि मसलन अरुण जेटली (भाजपा), एबी वर्द्धन और डी.राजा (भाकपा), बृंदा कारत (सीपीएम), शरद यादव (जेडी यू), पिनाकी मिश्रा (बीजू जद) समेत करीब एक दर्जन सांसद अन्ना के मंच पर आए और टीम अन्ना की बातों का पुरजोर समर्थन करते हुए कह गए कि भ्रष्टाचार मुक्त भारत के निर्माण के लिए संसद में एक सशक्त लोकपाल कानून बनाने के लिए वह सरकार को बाध्य करेंगे।


लौटते हैं उस गाने पर जहां से हमने शुरुआत की थी। टेंगलिश (टूटी-फूटी तमिल मिश्रित अंग्रेजी) का यह गाना ‘व्हाय दिस कोलावेरी…डी?’ प्यार में हताश व निराश शराब के नशे में बहकते आम युवा की पुकार है, जो प्रेमिका से पूछ रहा है, इतना गुस्सा क्यों? कुछ ऐसा ही मर्म ‘व्हाय दिस धोखाधड़ी…डी?’ से भी परिलक्षित हो रहा है। फर्क सिर्फ इतना है कि ‘व्हाय दिस कोलावेरी…डी?’ में प्रेमिका की बात की गई है और ‘व्हाय दिस धोखाधड़ी…डी?’ में देश की सरकार और उसकी जनता से धोखाधड़ी की बात की जा रही है। सरकारी भ्रष्टाचार से त्रस्त आम जनता देश की सरकार से पूछ रही है कि भ्रष्टाचार मुक्त भारत के निर्माण के लिए अन्ना के जनलोकपाल से तुम इतने गुस्से में क्यों हो?


कहते हैं जीवन को बेहतर बनाने के लिए दिल की ताकतवर आवाज को बुलंद करना बहुत जरूरी होता है। अन्ना की हुंकार से देश की सौ करोड़ से अधिक जनता के दिल की ताकतवर आवाज निश्चित ही बुलंद हुई है। बुलंद न होती तो लोकपाल कानून को लेकर बात इतनी दूर तलक नहीं जाती। संसद की स्थायी समिति की रिपोर्ट पर अपनी प्रतिक्रिया में मुख्य विपक्षी पार्टी भाजपा का कहना है कि रिपोर्ट में ‘राजनीतिक भावना’ का अभाव है। पार्टी के वरिष्ठ नेता अरुण जेटली ने कहा, ‘मुझे यह कहने में कोई हिचकिचाहट नहीं है कि यह रिपोर्ट एक वकील के मसौदे की तरह है जिसमें राजनीतिक एवं प्रशासनिक भावना नहीं है।’ स्थायी समिति की रिपोर्ट की ‘विश्वसनीयता’ पर सवाल खड़े करते हुए कहा टीम अन्ना के अरविंद केजरीवाल का कहना है कि इसे सिर्फ़ 12 सदस्यों का समर्थन हासिल है। केजरीवाल ने कहा कि स्थायी समिति में 30 सदस्य हैं। दो सदस्यों ने कभी इसमें हिस्सा नहीं लिया। 16 सदस्य इससे असहमत हैं। इस प्रकार से देखा जाए तो इस रिपोर्ट को सिर्फ़ 12 सदस्यों की सहमति हासिल है। इस रिपोर्ट की यही विश्वसनीयता है। तो हुआ न जनता के साथ धोखा।


बहरहाल, सरकार माने या ना माने यह उसकी मर्जी। लेकिन इतना तय है कि जनतंत्र की जिद के आगे सत्ता को झुकना ही पड़ता है। 42 साल से जिस लोकपाल बिल का देश की जनता शिद्दत से इंतजार कर रही है, को लेकर लड़ी जा रही टीम अन्ना की लड़ाई अब निर्णायक मोड़ पर पहुंच गई है। इस मोड़ पर पहुंचकर जनतंत्र की बुलंद आवाज को दबाया नहीं जा सकता है। मतलब साफ है, संसद में एक सशक्त लोकपाल सरकार को लाना ही होगा।

Wednesday, 30 November 2011

बड़ी साज़िश का हिस्सा है मेमोगेट विवाद

पाकिस्तान की सियासत आज की तारीख में अगर किसी एक शब्द से सबसे अधिक भय खा रहा है तो वह शब्द हैमेमोगेट।पाकिस्तान के मेमोगेट से अमेरिका के वाटरगेट कांड की यादें कौंध जाती हैं। सत्तर के दशक में वाटरगेट कांड ने अमेरिका में राजनीतिक तूफान खड़ा कर दिया था। जून 1972 में डेमोकेट्रिक नेशनल कमेटी के वाटरगेट काम्पलेक्स स्थित मुख्यालय में प्रवेश के दौरान पांच लोग गिरफ्तार किए गए थे। एफबीआई ने खुलासा किया था कि इन लोगों को वर्ष 1972 में राष्ट्रपति का चुनाव करने वाली समिति के कोष से भुगतान किया गया था। तत्कालीन राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन के स्टाफ के आला अफसरों का नाम मामले में सामने आया। जांच में पता चला कि निक्सन ने रिकॉर्डिंग सिस्टम के जरिए अपने ऑफिस में कई लोगों की बातचीत टेप की थी। इस विवाद में निक्सन को राष्ट्रपति पद से इस्तीफा देना पड़ा था। कुछ ऐसा ही पाकिस्तान में इस समय घटित हो रहा है।

अमेरिका में पाकिस्तान के हाल तक राजदूत रहे हुसैन हक्कानी ने अपने मुल्क की फौज द्वारा नागरिक सरकार के तख्ता-पलट की आशंका को टालने के लिए अमेरिका से मदद की कथित गोपनीय गुहार लगाई थी। यह गुहार उस समय लगाई गई थी जब पाकिस्तान के ऐबटाबाद में घुसकर अमेरिका ने ओसामा बिन लादेन को मार गिराया था। उस लिखित गुहार के लिए ही ‘मेमोगेट’ शब्द का इस्तेमाल किया जा रहा है और पाकिस्तान के हुक्मरान को शक की नजरों से देखा जा रहा है। भारत के लिए भी यह चिंता का विषय है। वह इसलिए कि भारत-पाकिस्तान एक बार फिर से आतंकवाद और कश्मीर को लेकर सार्थक बातचीत की ओर कदम बढ़ा रहे थे जिसकी बुनियाद दक्षेश सम्मेलन में रखी गई थी।


मेमोगेट विवाद को लेकर इस समय पाकिस्तान में हर शख्स अपने-अपने तरीके से नतीजे की ओर पहुंच रहा है। सभी चिल्ला रहे हैं कि मुल्क के साथ विश्वासघात हुआ है। ऐसे में, मियां नवाज शरीफ के सुझाव काबिले-तारीफ है। उन्होंने कहा है कि इस मामले की उच्चस्तरीय जांच होनी चाहिए। यह एक जायज तरीका होगा। गोपनीय ज्ञापन की हकीकत को टटोले बिना किसी शख्स पर अंगुली उठाना ठीक नहीं है। हुकूमत को चाहिए कि वह विपक्ष को भरोसे में लेकर निष्पक्ष जांच कराए। वहीं दूसरी ओर पाकिस्तान में वरिष्ठ सुरक्षा अधिकारियों के अनुसार, उन्होंने मेमोगेट प्रकरण की जांच कर ली है। अधिकारियों को यक़ीन है कि ये मेमो राष्ट्रपति कार्यालय की ओर से था लेकिन ये साफ अभी नहीं है कि इसमें राष्ट्रपति जरदारी और राजदूत हक्कानी की कितनी भूमिका थी। अधिकारियों ने ये भी बताया कि हक्कानी ने सैनिक नेतृत्व के दबाव में इस्तीफा नहीं दिया। उनका कहना है कि इस्तीफ़ा पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय के दबाव में दिया गया है क्योंकि वहां कुछ अधिकारी मानते थे कि हक्कानी उनकी अवहेलना करते थे।


मेमोगेट (गुप्त ज्ञापन) का विवाद उस वक्त तूल पकड़ा जब ब्रिटिश समाचार पत्र फाइनेंशियल टाइम्स ने पाकिस्तानी मूल के अमरीकी व्यापारी मंसूर ऐजाज का एक लेख प्रकाशित किया, जिसमें पाकिस्तानी राजदूत हुसैन हक्कानी द्वारा अमरीकी सरकार को एक ज्ञापन सौंपे जाने का जिक्र है, ताकि पाकिस्तान में सेना द्वारा संभावित तख्तापलट को रोका जा सके। हुसैन हक्कानी ने हालांकि ऐसा कोई ज्ञापन दिए जाने से इनकार कर दिया था, लेकिन अमरीकी सेनाओं के प्रमुख माइकल मलेन ने ज्ञापन मिलने की पुष्टि की, साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि इसे उन्होंने गंभीरता से नहीं लिया। इस विवाद के गहराने के बाद हुसैन हक्कानी को इस्तीफा देना पड़ा। हुसैन हक्कानी अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के जानकार माने जाते हैं।


इतिहास गवाह है कि किसी एक शख्स या पार्टी के खिलाफ आंख मूंदकर नफरत करने के कारण पाकिस्तान ने हमेशा घातक नुकसान उठाए हैं। इस ‘हल्ला बोल’ माहौल में कट्टरपंथी एक तथ्य की अनदेखी कर रहे हैं। ‘मेमोगेट’ का मसला काफी हद तक अवाम-फौज संबंधों से जुड़ा है। अवाम और फौज के रिश्तों में विरोधाभास व असंतुलन का असर खास तौर पर नेताओं पर पड़ता है। यह एक ऐसी समस्या है, जो इस मुल्क में लगातार बनी हुई है और उसकी जद में तमाम सियासी पार्टियां हैं। फौज के कसते शिकंजे से पाकिस्तानी नेताओं के दम घुट रहे हैं। उन्हें इससे बाहर निकलने का कोई रास्ता नहीं सूझ रहा। यह पाकिस्तान की सबसे बड़ी समस्या है। आर्थिक संकट, अल्पसंख्यकों पर अत्याचार, जातीय संघर्ष, अंदरूनी और बाहरी दहशतगर्दी ये सभी इसी असंतुलन के नतीजे हैं।


पाकिस्तान के मौजू हालात पर गौर फरमाएं तो ये साफ है कि सरकार, सेना और आईएसआई के बीच आपसी सामंजस्य का भारी संकट है। सेना प्रमुख जनरल अशफाक कयानी उतने मजबूत नहीं हैं जितना आमतौर पर पाकिस्तानी सेना प्रमुख को माना जाता है। इसकी वजह भी है। सेना में एक धड़ा सरकार के पक्ष में है तो दूसरा धड़ा आईएसआई के पक्ष में बीन बजा रहा है। आतंकवाद के मुद्दे पर आईएसआई को सरकार की नीति रास नहीं आ रही है। सो आईएसआई सरकार विरोधी गतिविधियों में अपना ज्यादा वक्त जाया कर रहा है। तय मानिए कि कयानी की जगह सेना प्रमुख कोई जनरल परवेज मुशर्रफ जैसा होता तो आसिफ अली जरदारी के हाथ से सत्ता कबके छिन गई होती। हो न हो, मेमोगेट के पीछे आईएसआई का हाथ हो।


जहां से मैं देख रहा हूं, हालांकि इसके कोई साफ संकेत या प्रमाण नहीं हैं कि लंदन में निर्वासित जीवन जी रहे पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति जनरल परवेज मुशर्रफ और आईएसआई मिलकर पाकिस्तान में तख्तापलट की योजना को मूर्त रूप देने में लगे हों। अभी के हालात में अमेरिका को भी पाकिस्तानी हुक्मरान रास नहीं आ रहा सो बहुत हद तक इस बात की आशंका प्रबल है कि जनरल परवेज मुशर्रफ को अमेरिकी शह मिल रहा हो और पाकिस्तान में तख्तापलट के लिए जिस रिमोट को अमेरिका और आईएसआई ने मिलकर एसेंबल किया है उसको ऑपरेट करने की जिम्मेदारी मुशर्रफ को सौंपी गई हो। अतीत को याद करें तो आपको ध्यान होगा कि अमरीका ने जनरल मुशर्रफ़ के साथ गठबंधन कर आतंकवाद के ख़िलाफ़ जंग की शुरूआत की थी। इसलिए मेमोगेट प्रकरण में नवाज शरीफ की बातों को नजरंदाज करना जरदारी की सेहत के लिए ठीक नहीं होगा। पाकिस्तान सरकार इस मामले की निष्पक्ष जांच कराए और इस जांच के दायरे में परवेज मुशर्रफ और अमेरिका के बीच अगर कोई खिचड़ी पक रही है तो उन गतिविधियों को भी समेटने की कोशिश की जाए।


जहां तक कथित गुप्त ज्ञापन का सवाल है तो इससे कई सवाल उभरते हैं। मसलन 2 मई को ऐबटाबाद में अमरीकी सैनिकों की कार्रवाई में ओसामा बिन लादेन की मौत के बाद पाकिस्तानी सेना की काफ़ी आलोचना हो रही थी। उसका मनोबल कम हो रहा था और उसके लिए अपना बचाव करना मुश्किल हो रहा था। क्या ऐसे में सेना सत्ता पर क़ब्ज़ा करने का सोच सकती थी या कोई ऐसी योजना बना सकती थी? उन दिनों संसद और टीवी प्रोग्रामों में सबसे ज़्यादा सेना की आलोचना करने में मुस्लिम लीग नवाज़ के दोस्त आगे थे और पीपुल्स पार्टी वाले आईएसआई सहित सेना का हर मंच पर बचाव करते नजर आ रहे थे। ऐसे माहौल में सरकार को कैसे डर महसूस हो सकता था कि सेना तख़्ता पलट करने वाली है और उन्हें एडमिरल माइक मलेन से गुप्त रूप से मदद मांगनी चाहिए? अगर यह मान भी लें कि वह कथित संदेश अमरीकी सैन्य अधिकारी एडमिरल माइक मलेन को किसी आपात स्थिति में भेजा गया तो माइक मलेन के प्रवक्ता के मुताबिक़ उन्होंने उस संदिग्ध संदेश को महत्व क्यों नहीं दिया? चौथी बात ये कि अमरीका और पाकिस्तान के बीच ‘हॉट लाइन’ पर संपर्क बहाल है तो फिर मंसूर ऐजाज़ ख़ुद यह कथित संदेश सामने लाने पर मजबूर क्यों हुए? इसकी जानकारी एक विशेष मीडिया समूह के माध्यम से क्यों हुई? अगर यह सही है कि सेना सरकार का तख़्ता पलट करने वाली थी तो क्या उस बात की भी जांच होनी चाहिए कि ऐसा था भी या नहीं?


इसके अलावा मीडिया में मंसूर ऐजाज़ के जो बयान सामने आ रहे हैं उसमें भी काफ़ी विरोधाभास है। सबसे पहले उनका बयान आया कि राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी के कहने पर हुसैन हक्कानी की मंजूरी से उन्होंने यह कथित संदेश माइक मलेन को भेजा। बाद में उनकी ओर से बयान आया कि कथित संदेश हुसैन हक्कानी ने नहीं लिखा था, बल्कि उनकी टेलीफोन पर हुई बातचीत के बाद उन्होंने खुद लिखा था। अब जो ताजा बयान सामने आ रहा है उसके मुताबिक मंसूर ऐजाज कहते हैं कि उस कथित संदेश के बारे में राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी को पता नहीं है। ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि मंसूर ऐजाज के किस बयान पर भरोसा किया जाए?


इसलिए बेहतर यही होगा कि पाकिस्तान की सरकार और विपक्ष संयुक्त रूप से यह तय करें कि इस मुद्दे की जांच किससे करानी चाहिए और असल तथ्यों तक कैसे पहुंचा जाए? इस बात की भी परख होनी जरूरी है कि मेमोगेट विवाद का लाभ लेने वाले कौन लोग हैं? पाकिस्तानी हुक्मरान के लिए यही एक समयोचित रास्ता है जो पाकिस्तान में अस्थिरता पैदा करने की एक बड़ी साजिश का हिस्सा मेमोगेट विवाद की हकीकत को उजागर कर सकता है।

Wednesday, 23 November 2011

चुनौतियों के बीच संसद का शीतकालीन सत्र

पूरे देश की निगाहें संसद में 21 दिन तक चलने वाले शीतकालीन सत्र पर टिकी हैं। संसद का शीत सत्र तो हर साल आता है, लेकिन इस बार का शीत सत्र कई मायनों में खास है। क्योंकि इस शीत सत्र में एक आम आदमी के भूख, उसकी बेबसी और लाचारी को लेकर फैसला जो होना है। खाद्य सुरक्षा, लोकपाल और कालाधन को लेकर संसद के इस सत्र में सरकार कुछ महत्वपूर्ण फैसले ले सकती है। इसमें से खाद्य सुरक्षा और कालाधन दो ऐसे मुद्दे हैं जिनपर संसद का मौन टूट सकता है। साथ ही कैश फॉर वोट, 2जी स्पेक्ट्रम और महंगाई तीन ऐसे मुद्दे है जिसपर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तकरार होना तय है।


अक्सर जब हम संसद और आम आदमी की बात करते हैं तो जनकवि धूमिल का याद आ जाती है। साठ के दशक में जब जनकवि धूमिल अपने गृहस्थ जीवन में थे तभी एक आम आदमी की भूख, बेबसी और लाचारी मानो उनके नेत्रों के आगे खुलकर सामने आ गई थी। अनाज की जमाखोरी के पीछे की राजनीति उनकी पैनी दृष्टि से बच नहीं पायी। धूमिल का मानना था कि अनाज की कमी वास्तविक नहीं, बल्कि स्वार्थ की राजनीति से प्रेरित है। जमाखोरी को सरकारी नीति से बढ़ावा मिलता है। उस जमाखोरी से बचने का देश में कोई प्रयास न होता देख धूमिल ने जन भावनाओं की करुण गाथा को ‘संसद और रोटी’ शीर्षक से कविता के रूप में कागज पर उकेरा-

‘एक आदमी रोटी बेलता है,
एक आदमी रोटी खाता है,
एक तीसरा आदमी भी है,
जो न रोटी बेलता है न रोटी खाता है,
वह सिर्फ रोटी से खेलता है,
मैं पूछता हूं यह तीसरा आदमी कौन है?
मेरे देश की संसद मौन है।’

रोटी से खेलने वाले तीसरे आदमी को लेकर आजाद भारत की संसद वाकई मौन रही है। अगर संसद मौन नहीं रहती तो खाद्य सुरक्षा का बिल लाने में छह दशक का समय नहीं लगता। जब संसद को लगा कि जनता सब कुछ जान चुकी है तो आनन-फानन में खाद्य सुरक्षा बिल को तैयार किया गया और अब उसे संसद के शीतकालीन सत्र में पेश करने की बात कही जा रही है। हालांकि दावे के साथ हम यह नहीं कह सकते कि सबको भोजन देने की गारंटी वाला यह बिल संसद में पारित हो जाएगा, लेकिन इस बिल को लेकर चूंकि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी का अपना गणित है, सो उम्मीद जताई जा रही है कि लोकपाल बिल या महिला आरक्षण बिल जैसा हश्र इस बिल का नहीं होगा।


दरअसल कांग्रेस देश की जनता को यह संदेश देना चाहती है कि सबको सूचना का हक और शिक्षा का हक देने वाली कांग्रेस नीत यूपीए की सरकार ही सबको भोजन का अधिकार दे सकती है। निश्चित रूप से सरकार और कांग्रेस की यह मंशा काबिलेतारीफ है, लेकिन यक्ष प्रश्न यह है कि रोटी जैसी बुनियादी समस्या को सुलझाने में देश की सरकारों खासकर कांग्रेस नीत सरकारों को इतना वक्त क्यों लगा? इसका जवाब हमारी संसद के पास भी नहीं है। इससे ज्यादा शर्मनाक इस देश के लिए और कुछ नहीं हो सकता है कि आजादी के छह दशकों में भूख से मौत या सबको भरपेट खाना मिल रहा है या नहीं, देश की संसद के लिए राष्ट्रीय बहस का मुद्दा नहीं बन पाया।


हम आगे बढ़ते हैं। विदेशी बैंकों में जमा देश के कालेधन को लेकर भी संसद अब तक मौन रही है। अब जब कि जनता जान चुकी है कि यदि यह कालाधन देश में वापस आ जाए तो हर आदमी लखपति हो सकता है, भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी ने अपनी जनचेतना यात्रा को कालेधन पर फोकस कर दिया। देखना है इस मुद्दे पर संसद क्या रूख अपनाता है। इस संबंध में भाजपा के वरिष्ठ नेता और पूर्व उप प्रधान मंत्री लालकृष्ण आडवाणी का बयान गौर करने लायक है, ‘सरकार हर मुद्दे पर संसद में चर्चा कराती है, लेकिन कालेधन के मुद्दे पर अब तक चर्चा नहीं हुई है। ऐसा क्यों नहीं हुआ है इसका उत्तर सरकार को देना होगा। अब यह बात भी सामने आ गई है कि तीन सांसदों के खाते भी विदेशी बैंकों में हैं। मुझे नहीं पता कि ये कौन सांसद हैं, लेकिन सरकार को इसका खुलासा करना चाहिए। मेरी जनचेतना यात्रा समाप्त हो चुकी है। 22 नवंबर से संसद का शीतकालीन सत्र शुरू हो रहा है। इस मुद्दे पर हम प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को कटघरे में खड़ा करेंगे। कालेधन के मुद्दे पर उन्हें जवाब देना होगा।’


42 साल से लोकपाल बिल को लेकर भी संसद किसी नतीजे पर नहीं पहुंच पाई है। भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना हजारे की पहल पर देश जागा और जन आक्रोश की तपिश से जब यूपीए सरकार को झुलसने का खतरा दिखा तो आनन-फानन में शीतकालीन सत्र में लोकपाल बिल लाने पर तैयार हुई। लोकपाल को लेकर सुप्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता और गांधीवादी अन्ना हजारे अभी भी सरकार को संदेह की नजरों से देख रहे हैं। शायद इसीलिए अपना मौन व्रत तोड़ने से पहले उन्होंने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को चिट्ठी लिखी, ‘आपकी पार्टी और सरकार के कई लोग उलट-पलट बातें कर संदेह पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं। अगर शीतकालीन सत्र में जन लोकपाल पास नहीं हुआ तो सत्र के आखिरी दिन से अनशन को दोबारा शुरू कर दिया जाएगा और टीम अन्ना भी कई राज्यों में दौरे पर निकल जाएगी जो पांच राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनावों में लोगों से अपील करेगी कि वे अपना वोट सदाचारी व्यक्ति को ही दें, भ्रष्ट और गुंड़ों को वोट न दें।’


अन्ना की चिट्ठी पर सरकार के कई मंत्री आक्रामक हो गए। वह ऐसे बोलने लगे जैसे कांग्रेस के प्रवक्ता हों। कानून मंत्री सलमान खुर्शीद ने बयान जारी करते हुए कहा, ‘अगले चुनाव में क्या होगा इस बारे में किसी की राय पर हम कोई प्रतिक्रिया व्यक्त करने नहीं जा रहे हैं। यह उनका निर्णय है। हर नागरिक किसी को वोट देने के लिए स्वतंत्र है। कांग्रेस सिर्फ अपना काम करेगी, अपने कर्तव्य का निर्वाह करेगी और जब कर्तव्य पूरा हो जाएगा तो कांग्रेस फिर जनता के बीच जाएगी। फैसला जनता करेगी। हमने कहा है कि अगले सत्र में हम न सिर्फ एक विधेयक (लोकपाल) ला रहे हैं बल्कि कई और विधेयक भी लाने वाले हैं।’


केंद्रीय कार्मिक मामलों के राज्यमंत्री वी. नारायणसामी ने कहा, ‘स्थायी समिति ने लोकपाल विधेयक के प्रारूपों को परखने का कार्य पूरा कर लिया है। सिफारिशें तैयार करने का कार्य अंतिम चरण में है। इस विधेयक को संसद के शीतकालीन सत्र में लाना हमारी प्रतिबद्धता है। इस विधेयक के लिए हम सभी राजनीतिक दलों और सांसदों का हम समर्थन चाहते हैं।’


इन मंत्रियों के बयान से इतर देखें तो माजरा कुछ और ही लगता है। लोकपाल विधेयक पर गौर कर रही संसद की स्थायी समिति के कार्यकाल को एक महीने यानी 7 दिसंबर तक के लिए विस्तार दे दिया गया है। ऐसे में अब सवाल उठने लगा है कि 21 दिसंबर तक चलने वाले सत्र में क्या लोकपाल बिल पास हो पाएगा। सरकार भी संसद में इस विधेयक को तभी पेश कर सकती है जब स्थायी समिति अपनी सिफारिशें पेश करेगी। अगर समिति 7 दिसंबर को अपनी रिपोर्ट पेश करती है तो संसद के शीतकालीन सत्र के बाकी बचे दो हफ्ते में यह बिल संसद में पेश होकर पास हो पाएगा, यह बड़ा सवाल है।


नेता प्रतिपक्ष सुषमा स्वराज अलग ही राग अलाप रही हैं। माइक्रो ब्लागिंग वेबसाइट ट्विटर पर सुषमा ने लिखा, ‘संसद का शीतकालीन सत्र 22 नवंबर को शुरू होने जा रहा है। मैंने तेलंगाना और बढ़ती मंहगाई पर चर्चा के लिए नोटिस दिया है। लोकसभा में मेरी पार्टी के साथी भ्रष्टाचार, कालाधन, मणिपुर में चल रही नाकेबंदी, केंद्र-राज्य संबंध, कश्मीर, भारत-पाक संबंधों और अन्य महत्वपूर्ण मुद्दों पर नोटिस दाखिल कर रहे हैं। सशस्त्र बल विशेषाधिकार अधिनियम (एएफएसपीए) को लेकर उठे विवाद पर अलग से चर्चा कराने की मांग भाजपा करेगी।’ भाजपा के एजेंडे में लोकपाल शब्द नहीं है, न ही खाद्य सुरक्षा बिल और महिला आरक्षण बिल को लेकर पार्टी की ओर से कोई गारंटी दी है।


22 नवम्बर से शुरू हुआ संसद का यह शीतकालीन सत्र 21 दिसम्बर तक चलेगा। महीने भर चलने वाले इस सत्र के दौरान कुल 21 बैठकें होंगी। वामदल और भाजपा संसद में एक बार फिर 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले को उठाने का प्रयास करेंगे। इस मामले में गृह मंत्री पी. चिदंबरम के इस्तीफे की मांग की जा रही है। कैश फॉर वोट पर भी भाजपा यूपीए सरकार को घेरने का भरपूर प्रयास करेगी। कालाधन के मुद्दे पर आडवाणी अपना तेवर सत्र के शुरू होने से पहले जनचेतना यात्रा के समापन समारोह के दौरान रामलीला मैदान में दिखा चुके हैं। कहने का मतलब यह कि संसद का शीतकालीन सत्र-2011 भी हंगामे की भेंट चढ़ सकता है। यदि ऐसा हुआ तो फिर संसदीय कार्य मंत्री पवन कुमार बंसल सत्र के दौरान जिन 31 विधेयकों पर चर्चा कराकर उसे पारित कराने की बात कह रहे हैं कैसे संभव हो पाएगा। जबकि इन विधेयकों में कुछ अति महत्वपूर्ण न्यायिक जवाबदेही बिल, महिला आरक्षण बिल, व्हिसल ब्लोअर बिल, पेशन कोष नियामक बिल, राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा बिल और उपभोक्ता संरक्षण संशोधन बिल शामिल हैं।


बहरहाल, देश की जनता भ्रष्टाचार मुक्त भारत का निर्माण चाहती है। जनता चाहती है कि संसद इस दिशा में अपनी भूमिका निभाए। सरकारी प्रयासों से लोगों का भरोसा उठ चुका है और इसीलिए वह अन्ना हजारे के जनलोकपाल में आस्था जता रही है। लेकिन सरकार की आस्था जनलोकपाल बिल में नहीं है। सो इसकी उम्मीद कम ही दिखती है कि जो लोकपाल कानून सरकार लाएगी वह भ्रष्टाचार मुक्त भारत का निर्माण कर पाएगी। चूंकि भ्रष्टाचार तमाम समस्याओं की जड़ है, इसलिए संसद को हर हाल में सूरत ऐसी बनानी ही होगी जिसमें एक आम आदमी गुजारा कर सके। अगर ऐसा नहीं हो सका तो आम आदमी संसद की सूरत बदलने को बाध्य होगा।

Wednesday, 16 November 2011

सियासी यात्राओं में बिसरता आम आदमी

भारतवर्ष में यात्रा का इतिहास काफी पुराना है, लेकिन हम यहां सियासी यात्रा की बात कर रहे हैं। देश में इस समय एक दर्जन से अधिक सियासी यात्राएं चल रही हैं। कुछ यात्राएं तथाकथित संत भी कर रहे हैं, लेकिन उनकी यात्रा भी पूरी तरह से राजनीति से प्रेरित है, ये भी सियासी यात्रा है मसलन बाबा रामदेव की भारत स्वाभिमान यात्रा और श्रीश्री रविशंकर की भ्रष्टाचार के खिलाफ यात्रा। अगर वर्ष 2011 को भारत में 'सियासी यात्रा वर्ष' घोषित कर दिया जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। मुझे लगता है कि सियासी यात्राओं के इतिहास में एक वर्ष में इतनी यात्राएं कभी नहीं हुई होंगी। इस सबके बीच बड़ा सवाल यह खड़ा होता है कि संत, महात्मा और नेता यात्राएं क्यों करते हैं? सवाल जितना आसान दिखता है, जवाब उतना ही दुरुह। क्योंकि यात्राओं की अवधारणा में भी समय के साथ बदलाव आया है। जहां तक मैं समझता हूं और यही सही भी है कि यात्राओं के मकसद को समय के साथ बदला नहीं जा सकता है। यात्राएं हमेशा 'आम आदमी' की भलाई के लिए ही की जाती हैं। लेकिन आज के सियासी यात्राओं का 'आम आदमी की भलाई' का दर्शन कुछ अलग तरीके का हो गया है। शायद इसीलिए आज की सियासी यात्राओं में आम आदमी बिसर रहा है। ऐसा नहीं होना चाहिए, इसलिए यहां यह जानना जरूरी होगा कि सदियों से चली रही यात्राएं किस तरह से आम आदमी के लिए प्रतिफलित होती रही हैं।


भारतीय सभ्यता के हजारों वर्षों के इतिहास में यात्राओं की एक लंबी परंपरा रही है। इस परंपरा के एक छोर पर महात्मा बुद्ध खड़े हैं तो दूसरे छोर पर महात्मा गांधी और फिर स्वतंत्र भारत की अन्य यात्राएं जिसमें जयप्रकाश नारायण, विश्वनाथ प्रताप सिंह और लालकृष्ण आडवाणी की देशव्यापी यात्राएं शामिल हैं। यहां इन यात्राओं को आजादी से पहले और आजादी के बाद दो भागों में बांटकर तब और अब में फर्क महसूस करना जरूरी होगा। बुद्ध यानी गौतम बुद्ध की यात्रा राजमहल और राजधानियों से झोपड़ी और गांवों तक की यात्रा थी। नितांत मानवीय और प्रगतिशील। बुद्ध ने धर्म और दर्शन को मानवीय दुखों एवं सामाजिक असमानताओं को समाप्त करने का माध्यम बनाया। बुद्ध के दर्शन और यात्राओं से प्रभावित होकर मौर्य शासक अशोक ने एक लंबा समय यात्राओं में व्यतीत किया। इससे वह आम आदमी के संपर्क में आ सका और शासन को मानवीय शक्ल देने में सफल हुआ। मध्यकालीन भारत में शंकराचार्य एक महान धार्मिक व्यक्तित्व के रूप में सामने आए। उन्होंने यात्रा और शास्त्रार्थ के माध्यम से धर्म के कर्मकांडीय स्वरूप पर गहरी चोट की। व्यक्ति की आत्मा और परमात्मा में सहज संबंध स्थापित करके शंकर ने धार्मिक संप्रदायों के विभेद को मिटाने का प्रयास किया और समाज को एकजुट किया।


आधुनिक काल में भारत ने दासता की जंजीरों के साथ प्रवेश किया। 20वीं सदी के प्रारंभ से ब्रिटिश उपनिवेशवाद के विरुद्ध भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में सबसे प्रखर व्यक्तित्व महात्मा गांधी के रूप में सामने आए। अंग्रेजी सरकार के विरुद्ध एक प्रबल जनान्दोलन खड़ा करने के लिए गांधी ने पूरे भारत में लंबी यात्राएं की। जनमानस की शक्ति और कमजोरियों की जांच पड़ताल की। और फिर इस जननायक ने सहज ही देश की आम जनता अर्थात किसानों, मजदूरों, युवाओं और स्त्रियों को राष्ट्रीय आंदोलन की मुख्य शक्ति बना दिया।


1920-21 में असहयोग आंदोलन के दौरान अली भाइयों के साथ पूरे देश की यात्रा की। इसी प्रकार 1930 में अहमदाबाद से दांडी तक की 240 मील की यात्रा संपन्न हुई। दांडी मार्च स्वतंत्रता संग्राम का वह मोड़ सिद्ध हुआ, जहां से देश ने स्वतंत्रता मिलने तक पीछे मुड़कर नहीं देखा। 1932 में गांधी जी ने वर्धा आश्रम से हरिजन यात्रा प्रारंभ की और नौ महीनों तक पूरे देश में छुआछूत उन्मूलन के लिए जबरदस्त प्रचार किया। अंत में स्वतंत्रता की पूर्व संध्या पर बंगाल और बिहार के दंगाग्रस्त इलाकों में शांति की अपील करती हुई गांधीजी की यात्राएं इतिहास की अविस्मरणीय निधि बन गई।


आजादी के बाद सर्वोदय से अलग होकर जयप्रकाश नारायण ने सत्तर के दशक में संपूर्ण क्रांति का आह्नान किया। भ्रष्टाचार और कुशासन के विरूद्ध युवाओं का यह आंदोलन 1973 में गुजरात से प्रारंभ होकर सन् 74 में बिहार पहुंचा और फिर पूरे देश में छा गया। इस बीच जयप्रकाश ने तुफानी यात्राएं की। यद्यपि अपने परिणामों में यह आंदोलन लक्ष्यहीन और अल्पजीवी सिद्ध हुआ। फिर भी इसने वैकल्पिक सरकार की संकल्पना को जरूर साकार किया। 1989-90 में वी.पी. सिंह के नेतृत्व में राष्ट्रीय मोर्चा की सरकार का गठन इसी आंदोलन के नक्शे कदम पर ही संपन्न हुआ। यहीं से यात्राओं का स्वरूप बदला और यह आम आदमी की भलाई से दलगत राजनीति की भलाई में परिवर्तित हो गया।


भारतीय राजनीति में 90 के दशक का प्रारंभ कई मायनों में निर्णायक सिद्ध हुआ। सन् 1989 के लोकसभा चुनावों में भाजपा एक प्रमुख दल के रूप में उभरी और राष्ट्रीय मोर्चा सरकार को बाहर से समर्थन दिया। इसी समय भाजपा अध्यक्ष लालकृष्ण आडवाणी ने राम मंदिर आंदोलन को केन्द्र में रखकर सोमनाथ से अयोध्या तक की अपनी रथयात्रा की घोषणा की। भारतीय राजनीति की दशा और दिशा पर इस यात्रा का गहरा प्रभाव पड़ा। जैसे-जैसे यह यात्रा आगे बढ़ती गई देश का राजनीतिक तापमान बढ़ता गया। बिहार में इस रथयात्रा को रोके जाने तक भाजपा की लोकप्रियता और जनाधार में कई गुना इजाफा हो चुका था। अगले लोकसभा चुनाव में भाजपा न सिर्फ प्रमुख विपक्षी दल के रूप में उभरी, बल्कि जनमानस में इसने स्वयं को कांग्रेस के विकल्प के रूप में स्थापित कर लिया। इसके बाद से लेकर अभी तक आडवाणी ही एक ऐसे राजनीतिक यात्री रहे जिन्होंने भाजपा की बरकत कहिए या फिर अपने ऊपर से 'पीएम इन वेटिंग' का तमगा हटाने के लिए समय-समय पर देशव्यापी यात्राओं पर निकलते रहे। इन दिनों भी आडवाणी देश में भ्रष्टाचार मिटाने के लिए जनचेतना यात्रा पर निकले हुए हैं और घूम-घूमकर जनता को बता रहे हैं कि देश में सुशासन भाजपा के राज में ही संभव है। आडवाणी की जनचेतना यात्रा का और विश्लेषण करने की शायद जरूरत नहीं क्योंकि इसे आप हर दिन न्यूज चैनल पर देख रहे होंगे। मैं यहां वर्ष 2011 में 12 सियासी यात्राओं का संक्षेप में उल्लेख कर रहा हूं जिसका तुलनात्मक आंकलन कर निष्कर्ष पर पहुंचना आप पर है कि ये तमाम यात्राएं आम आदमी के लिए है या फिर यात्री खुद का भविष्य संवारने के लिए जनता के पैसे से लाव-लश्कर के साथ निकले हैं।


लालकृष्ण आडवाणी : 11 अक्तूबर को आडवाणी ने अपनी छठी राजनीतिक यात्रा की शुरुआत जयप्रकाश नारायण की जन्मस्थली सिताबदियारा से की है। आडवाणी इससे पहले पांच यात्राएं-1990 में राम रथ यात्रा, 1993 में जनादेश यात्रा, 1997 में स्वर्ण जयंती यात्रा, 2004 में भारत उदय यात्रा और 2006 में भारत सुरक्षा यात्रा कर चुके हैं।

नीतीश कुमार : बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार नवंबर के पहले सप्ताह में अपनी छठी ‘सेवा यात्रा’ महात्मा गांधी के सत्याग्रह की धरती चंपारण से शुरू करने वाले हैं। नीतीश चार माह में बिहार के सभी 38 जिलों की यात्रा कर अपनी सेवा का अहसास कराएंगे। नीतीश कुमार भी न्याय यात्रा, विकास यात्रा, धन्यवाद यात्रा, प्रवास यात्रा, विश्वास यात्रा नाम की पांच राजनीतिक यात्रा कर चुके हैं।

बाबा रामदेव : योग गुरु बाबा रामदेव ने अपनी 10 हजार किलोमीटर की भारत स्वाभिमान यात्रा झांसी की रानी लक्ष्मीबाई की कर्मभूमि से 20 सितंबर से शुरू की है। बाबा रामदेव देश से बाहर जमा काला धन वापस लाने के अपने प्रण को बार-बार दोहरा रहे हैं। यह प्रयाग (उत्तरप्रदेश) में खत्म होगी।

श्रीश्री रविशंकर : आध्यात्मिक गुरु श्रीश्री रविशंकर भ्रष्टाचार के खिलाफ सात नवंबर से उस उत्तर प्रदेश की यात्रा पर हैं जहां अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं। 11 नवंबर तक जारी रहने वाले इस दौरे में वह जौनपुर, चंदौली, सोनभद्र मिर्जापुर और सुल्तानपुर में आयोजित कार्यक्रमों में न सिर्फ आम लोगों के साथ सत्संग करेंगे बल्कि उन्हें घूस न लेने, दहेज न लेने, भ्रष्टाचार के खिलाफ ल़डने और शिक्षा का उजियारा फैलाने की शपथ भी दिलाएंगे।

राहुल गांधी : कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी टीम अन्ना को जवाब देने के लिए उत्तर प्रदेश में चुनावी यात्रा करेंगे। जानकारों के मुताबिक राहुल गांधी 14 नवम्बर से व्यापक जन संपर्क यात्रा कर रहे हैं। ये यात्रा दस दिनों की होगी।

अन्ना हजारे : सुप्रसिद्ध गांधीवादी अन्ना हजारे एक मजबूत जनलोकपाल कानून के लिए जल्द ही देशव्यापी यात्रा पर निकलने वाले हैं। शायद अन्ना संसद के शीतकालीन सत्र का इंतजार करेंगे और उसके बाद यात्रा की कोई तारीख तय होगी।

नरेंद्र मोदी : 17-19 सितंबर को तीन दिवसीय सद्भावना उपवास के बाद गुजरात के सीएम नरेंद्र मोदी प्रदेश में लगातार सद्भावना यात्रा कर रहे हैं। जल्द ही वह देशव्यापी यात्रा भी करेंगे और अपनी राष्ट्रीय छवि बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ेंगे। उनकी नजर दिल्ली की गद्दी पर है। शायद वह आडवाणी की यात्रा के समाप्त होने का इंतजार कर रहे हैं।

राजनाथ सिंह : उत्तर प्रदेश को विकासयुक्त और भ्रष्टाचारमुक्त बनाने के नारे के साथ 'जन स्वाभिमान यात्रा' दो चरणों में पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह के नेतृत्व में मथुरा से 13 अक्टूबर को शुरू हुई। राजनाथ पूर्वी यूपी के 34 जिलों की यात्रा करेंगे।

कलराज मिश्रा : राजनाथ की तर्ज पर वाराणसी से शुरू हुई यात्रा की अगुवाई उत्तर प्रदेश के वरिष्ठ भाजपा नेता कलराज मिश्रा ने किया। लक्ष्य इनका भी माया सरकार को हिलाना है ना कि प्रदेश को विकास की पटरी पर लाना। कलराज 27 जनपदों की यात्रा करेंगे।

उमा भारती : भाजपा नेता उमा भारती ने गाजियाबाद जिले के गढ़मुक्तेश्वर से गंगा बचाओ अभियान की शुरुआत की। उत्तर प्रदेश, बिहार और बंगाल में जिन जगहों से गंगा गुज़रती है, उमा भारती उसी से लगे रास्ते से गुज़रेंगी और सभाओं को संबोधित करेंगी।

अखिलेश यादव : जनता को पार्टी की नीतियों से जोड़कर आगामी चुनाव में जीत के इरादे को आधार देने के लिए सपा के प्रदेश अध्यक्ष अखिलेश यादव ने बसपा के खिलाफ क्रांति रथयात्रा निकाली। 12 सितंबर से शुरू हुई यह यात्रा 24 सितंबर को समाप्त हुई।

अमर सिंह : लोकमंच पार्टी सुप्रीमो अमर सिंह ने सोमवार को उत्तर प्रदेश के बलिया से पूर्वांचल स्वाभिमान यात्रा के दूसरे चरण की शुरुआत की। यह पदयात्रा 17 जनवरी 2011 को बलिया से शुरू हुई जो 1 फरवरी को चंदौली में समाप्त हुई।

Monday, 7 November 2011

भाजपा में पीएम पद की कुश्ती

लोकसभा चुनाव-2014 में करीब ढाई साल का वक्त अभी बाकी है लेकिन भाजपा में प्रधानमंत्री की कुर्सी के लेकर जंग तेज हो गई है। आडवाणी और मोदी समेत दौड़ में आधा दर्जन से अधिक दिग्गज शामिल हैं। नितिन गडकरी भी लोकसभा चुनाव लड़ने की घोषणा कर चुके हैं और यशवंत सिन्हा भी राग अलापने लगे हैं कि वह ही प्रधानमंत्री पद के असली दावेदार हैं। लेकिन फिलहाल खुलकर मैदान में दो ही नेता सामने आए हैं। उनमें से भी एक को बुलाकर संघ मुख्यालय के मुखिया ने समझा दिया कि आप देश की जनता को बता दीजिये कि हम प्रधानमंत्री की रेस में नहीं हैं। अब वो कहां मानने वाले। शतरंज की बिसात पर एक चाल उन्होंने चल दी है जिससे बाजी काफी उलझ सी गई है। लेकिन उसे सुलझाना तो पड़ेगा ही।

राजनाथ सिंह से शुरू करते हैं। कुछ दिन पहले उत्तर प्रदेश में दो यात्राएं घोषित की गई थीं। एक यात्रा कलराज मिश्र ने घोषित की और दूसरी राजनाथ सिंह ने। कलराज मिश्र की यात्रा का उद्देश्य सा़फ है कि वह उत्तर प्रदेश के निर्विवाद मुख्यमंत्री बनना चाहते हैं, लेकिन रहस्यमय है राजनाथ सिंह की यात्रा की घोषणा। राजनाथ सिंह ने अपने साथ उमा भारती को मिला लिया और एक यात्रा घोषित कर दी। राजनाथ सिंह अभी से एकछत्र राष्ट्रीय नेता की छवि बनाना चाहते हैं, ताकि वह प्रधानमंत्री पद पर अपना दावा कर सकें।

राजनाथ सिंह की मंशा का जब गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को पता चला तो अमेरिकी सीनेट में प्रस्तुत की गई एक स्टडी ग्रुप की रिपोर्ट को अमेरिकी सरकार की राय बता खुद को भावी प्रधानमंत्री पद का सशक्त दावेदार घोषित कर दिया। नरेंद्र मोदी का मीडिया मैनेजमेंट इसमें काम आया। अन्ना हज़ारे की तर्ज पर अपने जन्मदिन पर तीन दिन के उपवास की घोषणा कर दी। 17-19 सितंबर तक अहमदाबाद स्थित गुजरात विवि के भव्य हॉल में आयोजित सद्भावना उपवास के लिए मोदी ने करोड़ों रुपये पानी की तरह बहा दिये। इस सबके बीच इमाम साहब की टोपी भी उछली और मोदी ने इमाम साहब को नाराज कर दिया उनकी भेंट की गई टोपी को न पहनकर। कुल मिलाकर उपवास का मकसद अपने अंजाम तक नहीं पहुंच सका।

अब आते हैं लालकृष्ण आडवाणी पर। पिछली चार जून को बाबा रामदेव के ऊपर रामलीला मैदान में सरकारी हमला हुआ और उनका अनशन सरकार ने जबरदस्ती समाप्त करा दिया। विश्वस्त सूत्रों के मुताबिक, उसी व़क्त यानी 4 जून को संघ के सर्वोच्च नेतृत्व ने आडवाणी जी से कहा कि वह कल यानी 5 जून को लोकसभा से त्यागपत्र दे दें और भ्रष्टाचार के ख़िला़फ एक यात्रा निकालें। आडवाणी जी ने इसे बचकानी सलाह की संज्ञा दी और अनदेखा कर दिया। लेकिन जब अन्ना हजारे ने अनशन किया और उनके समर्थन में देश में भूचाल आ गया तो आडवाणी जी को लगा कि उनसे चूक हो गई। उन्होंने अचानक लोकसभा से बाहर आकर पत्रकारों के सामने भ्रष्टाचार के खिलाफ यात्रा की घोषणा कर दी। आडवाणी जी ने न संघ से राय-मशविरा किया और न ही पार्टी से ही राय ली। 11 अक्टूबर को जेपी की जन्मभूमि बिहार के सिताबदियारा में मोदी के धुर विरोधी नीतीश कुमार ने आडवाणी की
जनचेतना रथयात्रा को हरी झंडी दिखाई। यात्रा जब 6 नवंबर को गुजरात में दाखिल हुई तो मोदी और आडवाणी और मोदी के बीच कुर्सियों का फासला दिख ही गया।

नरेंद्र मोदी और राजनाथ सिंह का मानना है कि आडवाणी जी के साथ न संघ है और न ही पार्टी तथा उनकी उम्र भी उन्हें अब ज़्यादा काम नहीं करने देगी, लिहाज़ा उन्हें महत्व न दिया जाए। फिर दोनों को लगने लगा कि प्रधानमंत्री पद के संघर्ष में आख़िरी मुक़ाबला उन्हीं के बीच होगा। हालांकि दो उम्मीदवार अभी और भी हैं, सुषमा स्वराज और अरुण जेटली। दोनों ही नेता ख़ामोशी से पत्ते खेलने में माहिर हैं। लेकिन कुछ भी हो, पुराना चावल तो पुराना ही होता है। आडवाणी जी ने नीतीश को साध लिया है और अंतिम समय में वह नीतीश कार्ड खेल सकते हैं। कहने का मतलब यह कि आडवाणी भले ही पीएम इन वेटिंग ही रिटायर्ड हो जाएं, लेकिन मोदी प्रधानमंत्री न बन पाएं।

भाजपा में कुछ इस तरह का खेल चल रहा है कि सब अपनी-अपनी डपली, अपना-अपना राग अलाप रहे हैं। ऐसे में संघ परिवार की भूमिका बढ़ जाती है। संघ हमेशा से हिन्दुत्व की लाइन पर अपना एजेंडा तय करता है। अब भाजपा में प्रधानमंत्री पद के लिए जो भी पांच छह उम्मीदवार सामने आ रहे हैं उनमें से संघ की लाइन पर नरेद्र मोदी ही फिट बैठ रहे हैं। शायद इसीलिए संघ मुख्यालय नागपुर में जब आडवाणी जी मत्था टेकने गए थे तो मोहन
भागवत ने उन्हें समझाने की कोशिश की थी कि वो मोदी का समर्थन न करे, लेकिन अपनी दावेदारी कम से कम वापस ले लें। हठी आडवाणी मुख्यालय से बाहर निकले और कुछ इस अंदाज में बातों को बयां कर गए कि समझने वाले समझ गए और जो न समझे वो अनाड़ी।

आडवाणी की रथयात्रा अपने अंतिम चरण में चल रही है। उम्मीद जताई जा रही है कि संसद के शीतकालीन सत्र के शुरू होने से पहले वह यात्रा समाप्त कर वापस आ जाएंगे। और भाजपा में प्रधानंत्री पद की असली रेस तब ही शुरू होगी। तब तक भाजपा और संघ दोनों के लिए तय करना आसान हो जाएगा कि कौन कितने पानी में है?

Monday, 10 October 2011

कहां तुम चले गए...?

ये दौलत भी ले लो..., होशवालों को खबर क्‍या..., हजारों ख्‍वाहिशें ऐसी..., हाथ छूटे भी तो...जैसे अनगिनत सुरीली गजलों को आवाज देने वाले और 'ग़ज़ल सम्राट' कहे जाने वाले जगजीत सिंह अब इस दुनिया में नहीं रहे. आज सुबह 8.10 बजे मुंबई में जगजीत सिंह का देहांत हो गया. उन्हें ब्रेन हैमरेज होने के कारण बीते 23 सितम्बर को मुंबई के लीलावती अस्पताल में भर्ती कराया गया था. ब्रेन हैमरेज होने के बाद जगजीत सिंह की सर्जरी की गई. इसके बाद से ही उनकी हालत गंभीर बनी हुई थी. जिस दिन उन्हें ब्रेन हैमरेज हुआ, उस दिन भी वे सुप्रसिद्ध गजल गायक गुलाम अली के साथ एक शो की तैयारी कर रहे थे. अपने जीवन के अंतिम समय तक गायकी को नया अंदाज देने के लिए जगजी‍त सिंह को हमेशा याद किया जाता रहेगा. जगजीत के ही गाये इन पंक्तियों से उन्हें हम सलाम करते हैं...

इन्तिहा आज इश्क की कर दी,

आप के नाम ज़िन्दगी कर दी,

था अँधेरा गरीब खाने में,

आप ने आ के रोशनी कर दी,

देने वाले ने उन को हुस्न दिया,

और अता मुझ को आशिकी कर दी,

तुम ने जुल्फों को रुख पे बिखरा कर,

शाम रंगीन और भी कर दी.

8 फरवरी 1941 को राजस्थान के गंगानगर में जन्‍में जगजीत सिंह को 'ग़ज़ल किंग' यानी गजल की दुनिया का बादशाह भी कहा जाता है. खालिस उर्दू जानने वालों की मिल्कियत समझी जाने वाली और शायरों की महफ़िलों में वाह-वाह की दाद पर इतराती ग़ज़लों को आम आदमी तक पहुंचाने का श्रेय अगर किसी को सबसे पहले दिया जाना हो तो एक ही नाम ज़ुबां पर आता है और वह नाम है जगजीत सिंह का.

मूल रूप से पंजाब के रोपड़ के रहने वाले जगजीत की शुरूआती शिक्षा गंगानगर (राजस्थान) के खालसा स्कूल में हुई और बाद की पढ़ाई के लिए जालंधर आ गए. डीएवी कॉलेज से स्नातक की डिग्री ली और इसके बाद कुरूक्षेत्र विश्वविद्यालय से इतिहास में एमए. भी किया. कहते हैं बहुतों की तरह जगजीत जी का पहला प्यार भी परवान नहीं चढ़ सका. अपने उन दिनों की याद करते हुए एक साक्षात्कार में कहा था कि उन्होंने भी एक लड़की को चाहा था.

बचपन मे अपने पिता से संगीत विरासत में मिली थी. गंगानगर मे ही पंडित छगन लाल शर्मा के सानिध्य में दो साल तक शास्त्रीय संगीत सीखी. आगे जाकर सैनिया घराने के उस्ताद जमाल ख़ान साहब से ख्याल, ठुमरी और ध्रुपद की बारीकियां सीखीं. पिता की ख़्वाहिश थी कि उनका बेटा आईएएस बने, लेकिन जगजीत पर गायकी की धुन सवार थी. कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय में पढ़ाई के दौरान संगीत मे उनकी दिलचस्पी देखकर कुलपति प्रो. सूरजभान ने जगजीत सिंह को काफ़ी उत्साहित किया. उनके ही कहने पर वे 1965 में मुंबई आ गए. संघर्ष के दौरान 1967 में जगजीत जी की मुलाक़ात चित्रा जी से हुई. दो साल बाद दोनों 1969 में परिणय सूत्र में बंध गए.

जगजीत सिंह ने 1999 में फिल्‍म सरफरोशके गीत होश वालों को खबर क्‍या...को आवाज दी थी. तब मशहूर गायिका लता मंगेशकर को कहना पड़ा कि जगजीत ने ग़ज़ल गायकी में हर चीज बदल ली. बोल, सुर, ताल, आवाज...सब कुछ. उन्‍होंने ग़ज़ल गाकर यह भी साबित किया कि गायिकी में दौलत-शोहरत कमाने के लिए बॉलीवुड से भी बाहर एक दुनिया है. लता मंगेशकर ने फिल्‍मों में गाने को लेकर एक बार मजाक में कहा था कि फिल्‍म में उन्‍हें कोई चांस ही नहीं देता और इसीलिए उन्‍होंने अपना अलग रास्‍ता चुन लिया. लेकिन ग़ज़ल गाकर वह इतने लोकप्रिय हो गए थे कि उन्‍हें फिल्‍मों में गाने की जरूरत ही नहीं रह गई. ग़ज़ल गायकी को नई बुलंदियों तक पहुंचाने में जगजीत सिंह का अहम योगदान रहा.

ग़ज़ल गायकी जैसे सौम्य और शिष्ट पेशे में मशहूर जगजीत जी को घुड़दौड़ का जबरदस्त शौक था. कन्सर्ट के बाद जगजीत को कहीं सुकून मिलता था तो वो था मुंबई महालक्ष्मी इलाक़े का रेसकोर्स. 1965 में मुंबई मे जगजीत ने जहां डेरा डाला था उस शेर-ए-पंजाब होटल में कुछ ऐसे लोग थे जिन्हें घोड़ा दौड़ाने का शौक था. संगत ने असर दिखाया और उन्हें ऐसा चस्का लगा कि शौकीन हो गए. इसी तरह लॉस वेगास के केसिनो भी उन्हें ख़ूब भाते थे.

जगजीत आज हमसे विदा हो गए हैं. हम उदास हैं, ये जहां उदास है. हर शय उदास है. हर शख्स उदास है जिसने जगजीत के ग़ज़लों को सुना ही नहीं, बल्कि जीया है, वो ग़ज़ल जिसे सुनकर कभी आंखें भर आयीं तो कभी होठों पर बरबस मुस्कान बिखेर गईं. उदासी के इस आलम में हम फ़िराक गोरखपुरी की उस ग़ज़ल से श्रद्धांजलि अर्पित करना चाहेंगे जिसे ख़ुद जगजीत ने आवाज़ दी थी...

ग़ज़ल का साज़ उठाओ बड़ी उदास है रात,

नवा-ए-मीर सुनाओ बड़ी उदास है रात.

कहें न तुमसे तो फ़िर और किससे जाके कहें,

सियाह ज़ुल्फ़ के सायों बड़ी उदास है रात.

दिये रहो यूं ही कुछ देर और हाथ में हाथ,

अभी ना पास से जाओ बड़ी उदास है रात.

सुना है पहले भी ऐसे में बुझ गये हैं चिराग़,

दिलों की ख़ैर मनाओ बड़ी उदास है रात.

Friday, 23 September 2011

मुस्लिम टोपी से ऐतराज़ क्यों?

गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के तीन दिनों के उपवास को लेकर कुछ बड़े सवाल उठ खड़े हुए हैं. पहला सवाल ये कि क्या मोदी अब नरम हिंदुत्ववादी की छवि बना रहे हैं? और दूसरा सवाल ये कि क्या मुस्लिम टोपी पहनने से इनकार करना उनकी निजी पसंद-नापसंद का मामला है या फिर उनका बर्तावसर्व-धर्म-सम्भावकी भावना के खिलाफ माना जाए?

दंगा पीड़ितों का दर्द

गुजरात में गोधरा के बाद हुए दंगों के पीड़ितों ने मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के तीन दिनों के उपवास को राजनीतिक तमाशा बताते हुए मोदी को एक पत्र लिखा जिसमें कहा गया, ‘जब तक उन्हें न्याय नहीं मिलता कोई सद्भावना नहीं हो सकती. हम लोग ताक़तवर राजनीतिक दलों के शिकार हैं जिनकी ताक़त इसी बात में है कि हम विभाजित रहें. वोट की राजनीति करने वालों को परास्त करके जब तक हम एकजुट नहीं होंगे सद्भावना क़ायम नहीं हो सकती. आप अगर इतने ही बड़े मुख्यमंत्री हैं जिसका आप दावा करते हैं तो साबरमती एक्सप्रेस में मारे गए 58 लोगों की जान आपने क्यों नहीं बचाई.’

मुस्लिम टोपी, ना बाबा ना

मोदी के उपवास के दौरान सभी धर्मों के नेताओं को बुलाया गया था और उनसे स्टेज पर मिलने कुछ मुस्लिम नेता भी गए. मुस्लिम धर्मगुरु सैय्यद इमाम शाही सैय्यद ने गुजरात के मुख्यमंत्री को एक टोपी भेंट की थी, लेकिन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस टोपी को लेने से मना कर दिया. हालांकि, मोदी ने मुस्लिम धर्म गुरु की तरफ से दी गई शॉल को स्वीकार किया. सैय्यद ने कहा, ‘मुझे इससे बहुत दुख हुआ है. वह हर समुदाय की टोपी और पगड़ी पहन रहे हैं, लेकिन उन्होंने मुस्लिम टोपी पहनने से इनकार कर दिया.’ वाकई मोदी तीन दिनों के उपवास में हर समुदाय की तरफ से भेंट की गई अलग-अलग टोपियों में देखे गए.

मोदी की आत्म प्रवंचना

उपवास तोड़ने के बाद मंच से नरेंद्र मोदी के भाषण का छोटे से अंश का यहां उल्लेख करना ज़रूरी होगा. मोदी के शब्दों पर गौर करिये, ‘कुछ साल पहले भारत सरकार ने जस्टिस सच्चर कमेटी का गठन किया था अल्पसंख्यकों के विकास का अध्ययन करने के लिए. जस्टिस सच्चर कमेटी की टीम ने गुजरात आकर भी अध्ययन किया. जस्टिस सच्चर की पूरी टीम की मेरे साथ एक मीटिंग हुई. उन्होंने मुझसे पूछा कि आप अपने राज्य में अल्पसंख्यकों के लिए क्या करते हैं. मैंने उनसे कहा कि मेरी सरकार अल्पसंख्यकों के लिए कुछ भी नहीं करती है. वो चौंक गए. ऐसा बेबाक उत्तर कोई दे सकता है. मैंने साफ-साफ कहा, मेरी सरकार अल्पसंख्यकों के लिए कुछ नहीं करती. मैंने कहा, एक और वाक्य लिख लीजिए. मेरी सरकार बहुसंख्यकों के लिए भी कुछ नहीं करती. मेरी सरकार 6 करोड़ गुजरातियों के लिए काम करती है. यहां कोई भेदभाव नहीं है. हर चीज को माइनॉरिटी-मैजोरिटी के तराजू पर तोलना. आए दिन वोट बैंक कि राजनीति करना. ये रास्ता मेरा नहीं है. मेरे राज्य के सभी नागरिक मेरे हैं. उनका दुख मेरा दुख है.

अटल की मोदी को नसीहत

एक जून 2002 को तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल विहारी वाजपेयी ने गुजरात की सांप्रदायिक स्थिति को लेकर मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को एक चिट्ठी लिखकर अपनी चिंता से अवगत कराया था. माना जाता है कि वह मुख्‍यमंत्रियों के साथ कम ही पत्राचार किया करते थे, लेकिन उन्‍हें गुजरात के हालात को लेकर दखल देने की जरूरत महसूस हुई और उन्‍होंने मोदी के नाम चिट्ठी लिखी. आरटीआई के जरिए सामने आई यह चिट्ठी गोधरा कांड के तीन महीने बाद की लिखी हुई है. चिट्ठी में तत्‍कालीन प्रधानमंत्री ने मोदी को यह आभास दिलाया कि दंगा पीडितों को पहुंचे नुकसान को काफी कम कर आंका गया है. उन्‍होंने मुख्‍यमंत्री को यहां तक भरोसा दिलाया था कि जरूरत पड़ी तो राज्‍य सरकार को अतिरिक्‍त खर्च से निपटने के लिए केंद्र धन भी मुहैया कराएगा. वाजपेयी ने यह भी लिखा था- मुझे जानकारी मिली है कि ज्‍यादातर मामलों में मारे गए लोगों के परिवारों को मुआवजा नहीं मिल सका है, क्‍योंकि उनके शव की पहचान नहीं हुई है. लापता व्‍यक्तियों को लेकर आए आवेदन निपटाने में होने वाली देरी की ओर भी वाजपेयी ने मोदी का ध्‍यान आकृष्‍ट कराया था. यह चिट्ठी लिखने से दो महीने पहले वाजपेयी ने मोदी को ‘राजधर्म’ का पालन करने की सलाह भी दी थी. इसमें उन्‍होंने कहा कि मुख्‍यमंत्री को जाति, पंथ, धर्म, संप्रदाय के आधार पर कोई भेदभाव किए बिना राजधर्म निभाते रहना चाहिए.

उक्त चार मुद्दों पर गौर करें तो शायद कुछ कहने की जरूरत नहीं रह जाती है. लेकिन इन्हीं चार मुद्दों से इस लेख के शुरू में किए गए कुछ सवालों का जवाब जरूर मिल जा रहा है. अगर मोदी नरम हिंदुत्ववादी की छवि के रूप में खुद को पेश करना चाह रहे हैं तो फिर क्या मुस्लिम और क्या हिंदू. दोनों की टोपियों में दूरियां क्यों? जहां तक मुस्लिम टोपी पहनने से इनकार करना उनकी निजी पसंद-नापसंद का मामला है तो मोदी को इस बात का इल्म होना चाहिए कि आप एक ऐसी कुर्सी पर बैठे हैं जहां इस तरह की निजी पसंद या नापसंद नहीं चलती. इस कुर्सी से आपको आपके ही नेता अटल विहारी वाजपेयी के कहे अनुसार, राजधर्म निभाना होता है. अंत में ‘सर्व-धर्म-सम्भाव’ की बात करें तो निश्चित रूप से मोदी के सभी धर्मों की टोपी पहनने के बाद मुस्लिम टोपी पहनने से मना करना ‘सर्व-धर्म-सम्भाव’ की भावना के बिल्कुल उलट है. मोदी जी, जो इमाम साहब आपको टोपी भेंट करना चाह रहे थे वो भी आपके 6 करोड़ गुजरातियों में से एक थे. आपने ही तो सच्चर कमेटी से कहा था कि मेरे राज्य के सभी नागरिक मेरे हैं. यहां कोई भेदभाव नहीं है. हर चीज को माइनॉरिटी-मैजोरिटी के तराजू पर तोलना, आए दिन वोट बैंक कि राजनीति करना, ये रास्ता मेरा नहीं है.

Thursday, 22 September 2011

‘उपवास’ नहीं, ‘जन उपहास’ कहिए

गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को इस बात का अभिमान है कि उन्होंने कभी अपना जन्मदिन नहीं मनाया है. 17 सितंबर को जब मोदी ने भव्य सद्भावना उपवास शुरू किया तो उनका यह अभिमान डगमगाने लगा था. इसलिए कि लोग क्या कहेंगे. फिर मोदी ने उपवास मंच से अपने संबोधन में उपवास के समर्थन में सफाई पेश की. मोदी के शब्द पर गौर करिए, “मैं जिन संस्कारों में पला हूं उनके कारण मैंने कभी अपना जन्मदिन नहीं मनाया. पहले तो लोगों को पता नहीं था कि मेरा जन्मदिन क्या है. अब जब से लोगों को पता चला है तो साल में सिर्फ एक ही यह दिन 17 सितंबर होता है जब मैं अपना फोन नहीं उठाता हूं. मैं कभी अपना जन्मदिन नहीं मनाता हूं. मेरे लिए यह अनूकूल समय था इसलिए मैंने यह कालखंड चुना है इसका मेरे जन्मदिन से कोई लेना-देना नहीं है.”

मोदी के उक्त संबोधन के शब्दों पर गौर करें तो आप शायद मानने को विवश होंगे कि इसका उपवास से कोई लेना-देना नहीं था, सिवाय आत्म प्रचार के. आगे बढ़ने से पहले हम यह जानने की कोशिश करते हैं कि उपवास क्या होता है? मानव शरीर में पांच इंद्रियां होती हैं. जब व्यक्ति को लगता है कि इन पांचों इंद्रियों में असंतुलन पैदा हो रहा है तो उसमें संतुलन बनाने के लिए उपवास का प्रयोग करता है. मन, कर्म और वचन से व्यक्ति कमजोर होने लगता है तो उपवास कर उसे मजबूत करता है. महात्मा गांधी उपवास को हमेशा एक हथियार के रूप में प्रयोग करते थे, जो नि:स्वार्थ होता था. और फिर उपवास को एकांत चाहिए, उपवास को सहज और सरल होना चाहिए.

मोदी का उपवास इससे बिल्कुल उलट था. इसे उपवास का उपहास कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं होनी चाहिए. मेरी दृष्टि में मोदी का उपवास जनउपहास है. वो इसलिए कि तीन दिनों के इस सद्भावना उपवास में 60 करोड़ से अधिक का खर्च बैठा है. उपवास के खर्च पर नज़र रखने वाले बताते हैं कि जिस हॉल में यह उपवास आयोजित किया गया था उसका किराया पांच लाख रुपये प्रतिदिन है. कहा जा रहा है कि विवि प्रशासन ने मोदी से तीन दिनों के लिए सिर्फ तीन रुपये यानी एक रुपये प्रतिदिन का किराया ही लिया. मतलब, विवि प्रशासन ने मोदी की खातिर 14 लाख 99 हजार 997 रुपये का राजस्व का नुकसान सहा.

गुजरात यूनिविर्सिटी के हॉल में भारी सुरक्षा इंतजामों पर भी नज़र डालना जरूरी होगा. 10 से 12 हजार पुलिसकर्मी, 4 त्‍वरित कार्रवाई दल, 2 चेतक कमांडो टीम, 9 एसआरपीएफ कमांडो, 10 आईपीएस अधिकारी, एसपी स्तर के 20 अधिकारी सद्भावना उपवास स्थल पर बैठे गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की सुरक्षा में तैनात किये गए थे. इसके अलावा 50 सीसीटीवी कैमरे, 35 छोटे कैमरे, ग्राउंड में 10 वॉच टावर, 2000 कार पार्किंग वीआईपी के लिए, दो से चार हजार कारें, आठ से 10 हजार बाइक और 1500 भारी वाहन जीएमडीसी ग्राउंड में बनाए गए थे. मेडिकल टीम में 10-15 फिजिशियन, एनेसेथेसिस्‍ट, कार्डियोलॉजिस्‍ट, टेक्‍नीशियन, मोबाइल आईसीयू चौबीसों घंटे तैनात. 10 प्‍लाज्‍मा टीवी, पांच एलईडी टीवी और कई बड़ी स्‍क्रीन ताकि नरेंद्र मोदी लोगों को करीब से दिखाई देते रहें.

हॉल के अंदर तीन कैमरे लगाए गए. इनमें मोदी और मंच पर मौजूद दिग्‍गजों की तस्‍वीरें कैद होती रहीं. इतना कुछ जान लेने के बाद उपवास पर कुल जमा खर्च का हिसाब लगाने की शायद जरूरत नहीं और यह कहने में भी कोई गुरेज नहीं कि यह सारा खर्च जनता की जमा पूंजी से किया गया है. जनता के पैसे से अगर मोदी अपनी गलती के लिए प्रायश्चित कार्यक्रम आयोजित करते हैं, या फिर देश की जनता से देश सेवा का समर्थन हासिल करना चाहते हैं तो जनता का इससे बड़ा उपहास और कुछ नहीं हो सकता है.

Tuesday, 6 September 2011

ममता-मनमोहन के बीच 'तीस्ता' की दीवार

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की दो दिवसीय ढाका यात्रा में चार अन्य मुख्यमंत्रियों के साथ ममता बनर्जी अब नहीं जा रही हैं. अपनी यात्रा रद्द करते हुए ममता बनर्जी ने प्रधानमंत्री कार्यालय को संदेश भिजवाया कि भारत और बांग्लादेश के बीच तीस्ता नदी जल बंटवारा संधि की जो शर्तें उन्हें बताई गई थीं, उससे अंतिम मसौदे का स्वरूप एकदम अलग है. बांग्लादेश को ज्यादा जल दिए जाने का प्रावधान है. इससे पश्चिम बंगाल को नुकसान होगा. कहने का मतलब यह कि ममता और मनमोहन के बीच तीस्ता नदी चल बंटवारा संधि दीवार बनकर खड़ा हो गया है. जाहिर है यह दीवार ममता ने सोची-समझी रणनीति के तहत खड़ी की है.
राजनीति के चश्मे से देखा जाए तो ममता ने एक तीर से कई निशाने साधे हैं. आपको अगर ध्यान हो तो ममता जब केंद्र में मंत्री थी तब भी वह अपने निर्णय से पश्चिम बंगाल की राजनीति पर असर ज़रूर छोड़ती थीं. अब तो वह राज्य की सीएम ही हैं तो फिर अपने प्रदेश का अहित होते कैसे देख सकती हैं. प्रधानमंत्री की ढाका यात्रा के दौरान तीस्ता जल बंटवारे को लेकर 15 वर्षीय अंतरिम समझौते पर दस्तखत होने हैं. केंद्र सरकार को समर्थन दे रहीं ममता बनर्जी तीस्ता जल बंटवारा संधि के बहाने बंगाल के लिए आर्थिक मदद की खातिर नए सिरे से दबाव बना सकती हैं. केंद्र ने पश्चिम बंगाल को विशेष आर्थिक पैकेज दिया है, लेकिन उसे अपर्याप्त बताते हुए ममता बाढ़ राहत और ग्रामीण विकास के मद में विशेष अनुदान की मांग कर रही हैं. ऐन वक्त पर बांग्लादेश की अपनी यात्रा रद्द कर ममता ने केंद्र को यही समझाने की कोशिश की है कि अगर बांग्लादेश को ज्यादा पानी देना है तो विशेष अनुदान की हमारी मांग भी पूरी करनी होगी. प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के लिए ममता की ज़िद को स्वीकारना उनकी राजनीतिक मज़बूरी है. वो इसलिए कि ममता की तृणमूल कांग्रेस की यूपीए सरकार की एक मज़बूत घटक जो है.
प्रधानमंत्री की ढाका यात्रा की तैयारियों को लेकर गृह मंत्री पी चिदंबरम और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार शिवशंकर मेनन ने हाल ही में कोलकाता जाकर ममता के साथ बैठकें की थीं. बैठकों के दौरान ममता बनर्जी को बताया गया था कि 25 हजार क्यूसेक पानी बांग्लादेश को दिया जाएगा. लेकिन अंतिम मसौदे में 33 हजार से 50 हजार क्यूसेक पानी बांग्लादेश के देने की बात कही गई है. तीस्ता नदी सिक्किम के सो लोमो झील से निकलकर बंगाल के जलपाईगु़ड़ी से होते हुए बांग्लादेश में प्रवेश करती है और 600 किलोमीटर का रास्ता तय कर ब्रह्मपुत्र में मिल जाती है. भारत में सिलीगु़ड़ी के पास तीस्ता के गाजलडोबा प्वाइंट पर जल की मात्रा मापकर बंटवारे का फार्मूला तैयार किया गया है.
मुख्यमंत्री सचिवालय के सूत्रों के अनुसार, गर्मी में गाजलडोबा प्वाइंट पर ही तीस्ता का पानी घटकर सिर्फ 5000 क्यूसेक तक रह जाता है. ऐसे में समझौते के अनुसार, बांग्लादेश को पानी देने पर बंगाल के छह जिलों का क्या होगा? ममता की आपत्ति का एक बिंदु तीस्ता नदी के सिंचाई वाले इलाकों को लेकर भी है. भारत में यह इलाका 10 हजार वर्ग किलोमीटर और बांग्लादेश में सिर्फ 2000 वर्ग किलोमीटर है.
इसमें कोई दो राय नहीं कि ममता ने जो मुद्दा उठाया है वह निश्चित रूप से राज्य के हित में है और इसकी राज्य या केंद्र किसी भी स्तर पर अनदेखी ममता की राजनीतिक निष्ठा में आड़े आ सकती है. लेकिन ममता की ज़िद से प्रधानमंत्री डॉ.मनमोहन सिंह के सामने बड़ा सवाल यह खड़ा हो गया है कि तीस्ता नदी पर हुए समझौते पर हस्ताक्षर किए जाएं या नहीं? संविधान के अनुसार, किसी भी अंतरराष्ट्रीय मामलों में निर्णय लेने का अधिकार केंद्र सरकार के पास होती है. यदि विदेशी मामलों में किसी निर्णय से कोई राज्य प्रभावित होता है तो केंद्र सरकार उससे विचार-विमर्श कर सकती है. लेकिन ऐन वक्त पर ममता की आपत्ति से तीस्ता नदी पर प्रस्तावित समझौता अब अधर में लटक गया है.



मुश्किलों के दलदल में भाजपा

अन्ना के आंदोलन से एक ओर जहां भाजपा को मज़बूत होने का मौका मिला, वहीं कर्नाटक के विवादास्पद रेड्डी बंधुओं ने पार्टी को मुश्किल में फंसा दिया है. सोमवार 5 अगस्त को सुबह होते ही सीबीआई की टीम बेल्लारी में अवैध खनन के मामले में कर्नाटक के पूर्व पयर्टन मंत्री जी. जनार्दन रेड्डी के घर जा धमकी. जनार्दन रेड्डी को गिरफ्तार किया. पूरे घर को खंगाला तो वहां से डेढ़ करोड़ की नगदी, एक निजी चौपड़ और कुछ अहम कागजात मिले जिसे टीम ने जब्त कर लिया. उनके भाई श्रीनिवास रेड्डी के घर से 30 किलो सोना और तीन करोड़ से अधिक की नगदी जब्त की गई.
अब बड़ा सवाल यह है कि भ्रष्टाचार मुक्त भारत के निर्माण के लिए समर्पित अन्ना के आंदोलन से विपक्षी पार्टी के नाते जिस भाजपा को यूपीए सरकार और कांग्रेस पार्टी को घेरने का जो मौका मिला था, रेड्डी बंधुओं की गिरफ्तारी के बाद भाजपा अब किस मुंह से भ्रष्टाचार के खिलाफ अपनी आवाज़ को बुलंद करे. वर्तमान परिवेश में पार्टी के लिए संकट सिर्फ मुद्दे का नहीं है, असली संकट यह है कि पार्टी में आंतरिक फूट विनाशक दौर में प्रवेश कर गया है.
लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्‍वराज ने इस बात से पूरी तरह इनकार किया है कि उन्‍होंने रेड्डी बंधुओं को कभी बचाने की कोशिश की. उन्‍होंने इस बात से भी इनकार किया कि बेल्‍लारी बंधुओं को कर्नाटक मंत्रिमंडल में जगह दिलाने में उनकी कोई भूमिका थी.स्‍वराज का कहना है कि जब रेड्डी बंधुओं को येदियुरप्‍पा सरकार में मंत्री बनाया गया तो अरुण जेटली कर्नाटक के प्रभारी थे और बी एस येदियुरप्‍पा राज्‍य के मुख्‍यमंत्री थे. वेंकैया नायडू और अनंत कुमार राज्‍य में उस वक्‍त सीनियर नेता थे. इन लोगों के बीच आपस में क्‍या बात हुई, इससे मेरा कोई लेना-देना नहीं था.
दरअसल बेल्‍लारी बंधु के तौर पर मशहूर जर्नादन, करुणाकर और सोमशेखर रेड्डी सुषमा स्‍वराज के करीबी माने जाते हैं और कहा जाता है कि इन तीनों भाइयों को सुषमा का आशीर्वाद हासिल है. सुषमा और रेड्डी बंधुओं की निकटता उस वक्‍त सामने आई थी जब 1999 में सुषमा ने कांग्रेस अध्‍यक्ष सोनिया गांधी के खिलाफ बेल्‍लारी लोकसभा सीट से चुनाव लड़ा था.
सुषमा स्वराज का कहना है कि रेड्डी बंधुओं से पूरे साल में सिर्फ एक बार मेरी मुलाकात होती है जब वह वरामहलक्ष्‍मी की पूजा के लिए बेल्‍लारी जाती हैं. बाकी 364 दिनों में हमारी कोई बात नहीं होती है. सुषमा स्वराज को इतनी सफाई इसलिए देनी पड़ी क्योंकि कांग्रेस तो दूर, पार्टी के अंदर ही एक धड़ा रेड्डी बंधुओं से उनके संबंधों को लेकर बखेड़ा खड़ा करने में जुटा है.
कांग्रेस भी समय-समय पर सुषमा के बेल्‍लारी बंधुओं से संबंधों को लेकर सवाल उठाती रही है. स्‍वराज पर खदान की कमाई से कर्नाटक की राजनीति पर राज करने वाले रेड्डी बंधुओं की सबसे बड़ी पैरवीकार के आरोप लगते रहे हैं. कांग्रेस नेता संजय निरुपम ने संसद में भी बेल्लारी बंधुओं के बहाने सुषमा स्वराज पर तीखे कटाक्ष किए हैं. तथ्यों के साथ-साथ अखबारों में छपे फोटो भी सदन में दिखाए गए हैं। इनमें रेड्डी बंधु, सुषमा स्वराज के पैर छूते दिखाई पड़ रहे हैं. इसके जवाब में सुषमा का कहना था कि पिछले 11 साल से रेड्डी बंधुओं को वह जानती हैं, लेकिन इन 11 सालों में उन्होंने उनसे 11 रुपए भी नहीं लिए हैं. स्वराज ने यह भी कहा कि बेल्लारी में सोनिया गांधी के खिलाफ चुनाव लड़ कर उन्होंने शुरुआत की थी और रेड्डी बंधुओं ने बेल्लारी से कांग्रेस को खत्म कर उनके अभियान का समापन किया है.
बहरहाल, भाजपा की धुर विरोधी कांग्रेस का लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष सुषमा स्वराज या उनकी पार्टी भाजपा को कटघरे में खड़ा करना तो बखूबी समझ में आता है, लेकिन भाजपा में अपने ही नेता पर अन्य नेताओं द्वारा कीचड़ उछाला जाना इस बात का साफ संकेत है कि पार्टी में सत्ता संघर्ष की कवायद तेज हो गई है. लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष और राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष के बीच जो सत्ता संघर्ष का खेल चल रहा है वह न तो इन दोनों नेताओं के हित में है और न ही पार्टी के हित में है. इसलिए समय रहते पार्टी आलाकमान को इस तरह के अंतरकलह से उबरना होगा. अगर ऐसा न हो सका तो पार्टी मुश्किलों के दलदल में लगातार फंसती ही चली जाएगी और मिशन-2014 का सपना पूरा नहीं हो पाएगा.

Saturday, 27 August 2011

जनतंत्र की भावनाओं से खेल रही सरकार

भ्रष्टाचार मुक्त भारत के निर्माण के लिए जनलोकपाल बिल की मांग को लेकर रामलीला मैदान में किया जा रहा अन्ना का अनशन गंभीर और निर्णायक मोड़ पर पहुंच गया है. एक ओर जहां सरकार अन्ना की मांग को संसद और संविधान की दुहाई देकर खारिज कर रही है, वहीं अन्ना जनभावनाओं का सम्मान करते हुए जनलोकपाल बिल को कानून बनाने की मांग पर अडिग हैं. बड़ा सवाल यह है कि देश में किसकी सर्वोच्चता मानी जाए- संसद, संविधान या फिर जन आवाज़ की.

सरकार को यह समझना होगा कि जिस जनतंत्र की आवाज़ के सहारे अन्ना भ्रष्टाचार मुक्त भारत के निर्माण के लिए आंदोलन चला रहे हैं और जिस संसद व संविधान की दुहाई देकर अन्ना की मांग को खारिज किया जा रहा है उसमें सर्वोपरि कौन है. वास्तव में जनता द्वारा चुने गए सांसदों के समूह को संसद कहते हैं और जनता द्वारा चुनकर भेजे गए सांसद को कानून बनाने का अधिकार होता है. अब विचार का विषय यह है कि चुनाव के ज़रिए जनता सांसद चुनती है और इसी सांसद से संसद का अस्तित्व है तो फिर सांसद और संसद जनता से ऊपर कैसे हो सकता है. और जब जनता सर्वोपरि है तो अन्ना के आंदोलन से उठ रही जन आवाज़ को दबाने की हिमाकत सरकार क्यों कर रही है. अन्ना हज़ारे भी बार-बार यही कह रहे हैं कि नियम और कानून जनता के लिए है, जनता से ऊपर नहीं है.

निष्पक्ष, प्रभावी, स्वतंत्र और स्वायत्त लोकपाल व लोकायुक्त की संस्थाएं केंद्र और प्रांतीय स्तरों पर कायम होने से भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ने में मदद अवश्य मिलेगी. ठीक उसी तरह, जैसे आज उच्च न्यायालयों, सर्वोच्च न्यायालय एवं नियंत्रक व महालेखा परीक्षक जैसी संस्थाओं से कुछ सहायता मिल जाती है या सूचना के अधिकार का कानून बनने से भी कुछ मदद मिली है. किंतु यह भी सही है कि केंद्र सरकार, सत्ताधारी दल और विपक्षी पार्टियों में एक सही और प्रभावी लोकपाल संस्था को बनाने की कोई इच्छाशक्ति एवं क्षमता नहीं बची है.

किस्सा नया नहीं है. 42 साल से लोकपाल बिल को देश की सरकारें संसद में पारित कर कानून बनाने के मामले को टालती आ रही हैं. इतने सालों में पहली बार भ्रष्टाचार के खिलाफ मज़बूत लोकपाल बिल को लेकर इतना बड़ा आंदोलन खड़ा हुआ है. सवाल यह उठता है कि सरकार जनलोकपाल बिल को पारित क्यों नहीं करना चाहती है. सरकार का तर्क है कि अन्ना की शर्तें और तय समय सीमा में लोकपाल बिल को पारित कराना संभव नहीं है. मेरी राय में सरकार के इस तर्क का कोई आधार नहीं है. संसद में एक मज़बूत लोकपाल बिल को पेश करने और उसे पारित कराने के लिए टीम अन्ना ने सरकार को पर्याप्त समय दिया. याद करें 10 अप्रैल 2011 का जंतर-मंतर का वो दृश्य जब अन्ना ने सरकार से मिले आश्वासन (टीम अन्ना और सरकार की संयुक्त समिति एक साझा मसौदा तैयार करेगी जिसे एक मजबूत लोकपाल बिल का रूप दिया जाएगा और फिर उसे संसद में पेश किया जाएगा) के बाद अपना अनशन तोड़ा था. उस दिन भी अन्ना ने सरकार को आगाह किया था कि अगर 15 अगस्त तक लोकपाल बिल को संसद से पारित नहीं किया गया तो 16 अगस्त से फिर उनका अनशन शुरू होगा.

इस बीच टीम अन्ना और सरकार के प्रतिनिधियों के बीच बैठकों का दौर चलता रहा जिसका नतीजा शून्य रहा. टीम अन्ना ने इन चार महीनों में पूरे देश की जनता से संवाद बनाया और उसे समझाने की कोशिश की कि जनलोकपाल किस तरह से देश को भ्रष्टाचार से मुक्ति दिलाएगा. सरकार ने बाबा रामदेव के अनशन से निपटने की रणनीति को आधार बनाकर अन्ना के आंदोलन को सख्ती से दबाने में जुट गई. 16 अगस्त को अनशन पर बैठने से पहले अन्ना की गिरफ्तारी, फिर अन्ना पर सरकार व कांग्रेस के नेताओं द्वारा आपत्तिजनक टिप्पणियां करना सरकार के लिए खतरनाक व आत्मघाती साबित हुआ. अन्ना के साथ जनसैलाब उमड़ पड़ा. रामलीला मैदान और देश के कोने-कोने में लोगों का हुजूम उमड़ा तो सरकार के होश उड़ गए. लेकिन अब बहुत देर हो चुकी है.

टीम अन्ना के अहम सदस्य अरविंद केजरीवाल का कहना है कि सरकार में कई ऐसे मजबूत तत्व हैं, जो पूरी वार्ता प्रक्रिया को निष्फल बनाना चाहते हैं. हमें बताया गया कि सीसीपीए में, खास तौर पर पी. चिदंबरम और कपिल सिब्बल किसी भी प्रकार की बातचीत अथवा किसी भी प्रकार के समझौते के पूरी तरह खिलाफ हैं. सलमान खुर्शीद ने हमें बताया कि बहुत टकराव है. चिदंबरम और सिब्बल ने सीसीपीए की बैठक में साफ कहा कि टीम अन्ना के साथ कोई बातचीत नहीं होनी चाहिए और आंदोलन से कड़ाई से निपटा जाना चाहिए. केजरीवाल के इस कथन से सरकार की मंशा साफ जाहिर होती है.

बहरहाल, अन्ना के अनशन को लेकर टीम अन्ना और सरकार के बीच गतिरोध बना हुआ है. टीम अन्ना ने शनिवार की डेडलाइन सरकार के दे रखी है. इसके बाद आंदोलन और बड़ा आकार लेगा. दिल्ली चलो और संसद घेरो का अन्ना का नारा अस्तित्व में आ जाएगा. फिर सरकार के लिए इससे निपटना आसान नहीं रह जाएगा. फिर तो वही आवाज़ गूंजेगी- सिंहासन खाली करो कि जनती आती है…

Tuesday, 9 August 2011

क्रेडिट रेटिंग एजेंसी के निराले खेल

क्रेडिट रेटिंग एजेंसी के भी खेल बड़े निराले हैं. अमेरिका की क्रेडिट रेटिंग गिरने के बाद दुनिया के तमाम विकसित विकासशील देशों को क्रेडिट रेटिंग एजेंसी का भूत सताने लगा है. अमेरिका के इतिहास में पहली बार उसकी क्रेडिट रेटिंग गिरा कर उसे सबसे बड़े कर्ज संकट में डुबोने वालीएजेंसी स्टैंडर्ड एंड पूअर (एसएंडपी) ने चेतावनी जारी की है कि वह भारत, जापान और मलेशिया जैसे देशों की क्रेडिट रेटिंग भी गिरा सकता है. यह सुनकर भारतीयों के तो होश उड़ गए. आनन-फानन में वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी को देश को यह भरोसा दिलाना पड़ा कि देश इस संकट से निपटने में सक्षम है.
किसने मचाया तहलका?
एसएंडपी की कमान फिलहाल एक भारतीय के हाथ में है जिनका नाम है देवेन शर्मा. वह झारखंड के रहने वाले हैं. शर्मा का जन्म 1955 में झारखंड में हुआ. इनके पिता आर एन शर्मा कोल इंडिया की सहयोगी कंपनी सीसीएल के अधिकारी थे जो बाद में कोल इंडिया के अध्यक्ष भी बने थे. देवेन की पढ़ाई धनबाद, रांची और जमशेदपुर में हुई. वह धनबाद के एक क्रिश्चियन स्कूल डी नोबिली स्कूल से पढ़े हैं. देवेन ने 1977 में रांची के बिड़ला इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी, मेसरा से मेकेनिकल इंजिनियरिंग की डिग्री ली थी.
ऊच्च शिक्षा के लिए वह अमेरिका चले गए जहां विसकॉन्सिन से उन्होंने मास्टर्स डिग्री ली. 1987 में देवेन ने ओहायो से मैनेजमेंट में पीएचडी किया. उन्होंने शुरूआती दिनों में मैन्युफैक्चरिंग इंडस्ट्री में काम किया. बाद में वह एक मैनेजमेंट कंसल्टेंट कंपनी में चले गए. 2002 में वह मैग्रा हिल्स में चले गए. यह कंपनी ही एसएंडपी की मूल कंपनी है जिसने अमेरिका की रेटिंग गिराकर तहलका मचा दिया. शर्मा की टीम पिछले काफी समय से अमेरिका के घटनाक्रम पर नज़र रखे हुए थी. पिछले महीने अमेरिकी कांग्रेस की एक बैठक में भी देवेन ने भाग लिया था, लेकिन वह चुप्पी साधे रहे और किसी को भनक तक नहीं लगने दी कि वह और उनकी टीम अमेरिका की रेटिंग घटाने जा रही है.
कुछ यूं होता है रेटिंग का खेल
एएए, बीबीबी, सीसीसी, सीए, सी, डी आदि देखने और सुनने में स्कूली बच्चों के रिपोर्ट कार्ड के ग्रेड की तरह लगते हैं. लेकिन, यह स्कूली बच्चों को नहीं मिलता. यह देशों, बड़ी कंपनियों और बड़े पैमाने पर उधार लेने वालों का मूल्यांकन करती है. इस मूल्यांकन पर यह तय होता है कि उधार लेने वाले की माली हालत कैसी है? उसके उधार लौटाने की क्षमता कितनी है? ऐसे में अच्छा ग्रेड मिलने का सीधा मतलब है कम ब्याज पर आसानी से कर्ज लेने की पात्रता हासिल करना. वहीं, खराब मूल्यांकन मिलने पर ऊंची दरों पर बमुश्किल कर्ज मिलता है. इस समय रेटिंग की दुनिया में तीन बड़े नाम हैं. स्टैण्डर्ड एंड पूअर, मूडीज और फिच. इनमें सबसे पुरानी एजेंसी है स्टैण्डर्ड एंड पूअर. इसकी नींव 1960 में हेनरी पूअर ने रखी थी. पूअर ने अमरीका में नहरों और रेल नेटवर्क के विकास का इतिहास लिखा था. 1906 में गैर रेल कंपनियों के वित्त की जांच शुरू होने पर स्टैण्डर्ड स्टैटस्टिक ब्यूरो की स्थापना हुई. इन दोनों कंपनियों का 1940 के दशक में विलय हो गया. 1909 में जॉन मूडी ने मूडीज की स्थापना की. मूडीज ने भी रेल वित्त की साख का विश्लेषण और उनका मूल्यांकन करना शुरू किया. आज दुनिया के रेटिंग व्यवसाय का करीब 40 फीसदी कारोबार इन्हीं दो कंपनियों के पास हैं. फिच इन्हीं दोनों कंपनियों का छोटा रूप है.
अहमियत की वजह तो जानें
स्टैण्डर्ड एंड पूअर, मूडीज और फिच की ग्रेडिंग का इतना महत्वपूर्ण होने की अहम वजह है अमरीका की वित्तीय निगरानी करने वाली एजेंसी सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज कमीशन. 1975 में इस कमीशन ने इन तीन कंपनियों को मान्यता प्राप्त सांख्यिकीय रेटिंग एजेंसी घोषित किया था. इससे उधार लेने की इच्छुक कंपनियों और देशों का जीवन आसान हो गया. इन एजेंसियों ने उनकी वित्तीय हालत और साख का आकलन कर उन्हें रेटिंग देना शुरू कर दिया. इन रेटिंग एजेंसियों की ताकत तब और बढ़ गई, जब सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज कमीशन ने आदेश दिया कि सरकारी नियंत्रण वाले निवेश संस्थान केवल ऊंची रेटिंग वाली कंपनियों में ही निवेश करें. ऐसी परिस्थितियों में जिन कंपनियों या देशों की रेटिंग नीचे जाती है, उनके लिए बहुत बड़ी दिक्कत खड़ी हो जाती है. बड़ी निवेश वाली कंपनियां रेटिंग कम होने पर अपने निवेशों को बड़े पैमाने पर निकालना या बेचना शुरू कर देती है. ऐसे में उनके बांड की कीमत बाज़ार में और ज्यादा गिर जाती है और इससे उनको मिलने वाले कर्ज पर ब्याज और ज्यादा बढ़ जाता है.
ये जानना बहुत जरूरी
-एएए : सबसे मजबूत सबसे बेहतर
-एए : वादों को पूरा करने में सक्षम
- : वादों को पूरा करने की क्षमता पर विपरीत परिस्थितियों का पड़ सकता है असर
-बीबीबी : वादों को पूरा करने में सक्षम, लेकिन विपरीत परिस्थितियों में आर्थिक हालात प्रभावित होने की ज्यादा गुंजाइश.
-सीसीसी : वर्तमान में बहुत कमजोर
-डी : उधार लौटाने में विफल