Sunday, 29 January 2017

24 साल पुराने इतिहास को दोहरा पाएंगे अखिलेश?

समाजवादी पार्टी की स्थापना के बाद तत्कालीन सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव ने उत्तर प्रदेश की सत्ता में आने के लिए जो प्रयोग 1993 में किया था, अखिलेश यादव 24 साल बाद 2017 के चुनाव में वही प्रयोग दोहरा रहे हैं। फर्क बस इतना है कि उस समय नेताजी मुलायम सिंह यादव ने बसपा के साथ गठबंधन किया था और इस बार अखिलेश ने कांग्रेस के साथ गठबंधन किया है।

समाजवादी पार्टी और कांग्रेस पार्टी का गठबंधन इस चुनाव में क्या गुल खिलाता है, यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा, लेकिन दोनों ही दलों की कमान इस समय युवा हाथों में है और दोनों नेताओं के रणनीतिकारों (प्रशांत किशोर और प्रो. स्टीव जार्डन) ने जिस तरह की चुनावी रणनीति को अंजाम दिया है उससे तो यही लगता है कि अखिलेश अपने पिता के लिखे इतिहास का न केवल दोहराएंगे बल्कि आगामी राजनीति की दिशा क्या होगी वह भी तय करेंगे।

मुलायम सिंह यादव ने 1993 में क्षेत्रीय पार्टियों के गठबंधन का नया प्रयोग किया था। उन्होंने बसपा के संस्थापक कांशीराम से हाथ मिलाते हुए गठबंधन की राजनीति शुरू की और इसका एलान लखनऊ के बेगम हजरत महल पार्क में किया था। उत्तराखंड उस समय उत्तर प्रदेश का हिस्सा हुआ करता था और उत्तर प्रदेश में कुल 422 विधानसभा सीटें हुआ करती थीं। मुलायम ने गठबंधन के आधार पर सपा के 256 उम्मीदवार उतारे थे और बसपा को 164 सीटें दी थीं। मुलायम का यह प्रयोग रंग लाया और उत्तर प्रदेश में सपा ने 109 और बसपा ने 67 सीटों पर जीत दर्ज की थी। गठबंधन की शर्तों के आधार पर मुलायम सिंह मुख्यमंत्री बने, लेकिन यह सरकार 18 माह ही चल सकी।

कांशीराम और मुलायम सिंह यादव की राजनीतिक कैमिस्ट्री तब शानदार थी। तब कांशीराम ने अपने शर्तों के अनुरूप मुलायम सिंह यादव से खुद की पार्टी यानी समाजवादी पार्टी का गठन करवाया था और फिर बसपा से तालमेल भी कराया था। 1991 में कांशीराम की इटावा से जीत के दौरान मुलायम का कांशीराम के प्रति यह आदर अचानक उभर कर सामने आया था जिसमें मुलायम ने अपनी पार्टी के खास राम सिंह शाक्य की पराजय में कोई गुरेज नहीं किया था। इस हार के बाद राम सिंह शाक्य और मुलायम सिंह यादव के बीच मनुमुटाव भी हुआ, लेकिन मामला फायदे का होने के चलते शांत हो गया।

कांशीराम की इस जीत के बाद उत्तर प्रदेश में मुलायम और कांशीराम की जो जुगलबंदी शुरू हुई इसका लाभ उत्तर प्रदेश में 1993 में मुलायम सिंह यादव की सरकार के रूप में मिला, लेकिन 2 जून 1995 को हुए गेस्ट हाउस कांड के बाद सपा और बसपा के बीच बढ़ी तकरार इस कदर हावी हो गई कि दोनों दल एक दूसरे को खत्म करने पर अमादा हो गए। उसके बाद मुलायम की सपा का आज तक बसपा की मायावती से गठबंधन पर कोई बात नहीं हुई।

उत्तर प्रदेश के वर्ष 2012 के चुनाव में समाजवादी पार्टी को पूर्ण बहुमत मिली। मुलायम सिंह यादव ने अपने बेटे  अखिलेश यादव को मुख्यमंत्री बनाया। अखिलेश इस समय सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं। कहें तो अखिलेश ने बतौर सपा मुखिया 24 साल पहले वाला मुलायम सिंह यादव का प्रयोग दोहराया है। मगर इस बार गठबंधन बसपा से न होकर कांग्रेस से है। अखिलेश ने राष्ट्रीय पार्टी होने के बाद भी कांग्रेस को 105 सीटें दी।

मुलायम-कांशीराम की तर्ज पर ही अखिलेश-राहुल ने कोई चुनावी रैली न करके रोड शो किया जिसके लिए लखनऊ को चुना गया। यह रोड शो जीपीओ स्थित गांधी प्रतिमा पर माल्यार्पण से शुरू होकर मेफेयर चौराहा हजरतगंज, नोवल्टी चौराहा, लालबाग से कैसरबाग, अमीनाबाद, नजीराबाद, नक्खास, चौक चौराहा होते हुए घंटाघर पर संपन्न हुई। रोड शो की खास बात यह रही कि जिस गांधी को मोदी सरकार और भाजपा मिटा देना चाहती है वहीं अखिलेश और राहुल ने गांधी प्रतिमा पर माल्यार्पण कर पहले साझा रोड शो के माध्यम से चुनाव प्रचार अभियान को अंजाम दिया है।

Tuesday, 3 January 2017

ममता को गुस्सा क्यों आता है?

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी फिर से आज गुस्से में दिखीं। नोटबंदी के बाद से जब भी ममता को गुस्सा आता है तो वह सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर हमला बोलती हैं। रोज वैली चिटफंड घोटाले में टीएमसी सांसद सुदीप बंद्योपाध्याय की गिरफ्तारी के बाद तृणमूल कांग्रेस ने आपात बैठक बुलाई। उनकी योजना बुधवार को विरोध-प्रदर्शन शुरू करने की है।

लाखों छोटे निवेशकों को कंगाल बना देने वाली फर्ज़ी निवेश योजना में शामिल होने के आरोप में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के वरिष्ठ नेता सुदीप बंद्योपाध्याय की गिरफ्तारी के कुछ ही मिनट बाद भाजपा के कोलकाता स्थित कार्यालय पर हमला किया गया। मां-माटी-मानुष की वकालत करने वाली पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर 'नोटबंदी के बाद तृणमूल-बंदी' का आरोप लगाया और कहा कि उनकी पार्टी पर ये अत्याचार इसीलिए किया जा रहा है, क्योंकि वह प्रधानमंत्री मोदी के नोटबंदी कदम का खुलकर विरोध कर रही है।

मालूम हो कि पिछले सप्ताह सीबीआई ने अभिनेता से राजनेता बने तृणमूल कांग्रेस नेता तापस पाल को गिरफ्तार किया था। ममता का मानना है कि ये गिरफ्तारियां प्रधानमंत्री कार्यालय के निर्देश पर की जा रही हैं। प्रधानमंत्री पर 'बदले की राजनीति' करने का आरोप लगाते हुए ममता ने कहा, मैं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चुनौती देती हूं कि अगर आप समझते हैं कि आप हमारे नेताओं को गिरफ्तार करेंगे और हम चुप बैठेंगे, तो ऐसा नहीं होगा...।

दरअसल रीयल एस्टेट तथा मनोरंजन के क्षेत्र में दखल रखने वाले बंगाल के रोज़ वैली ग्रुप द्वारा चलाई जा रही अनियमित वित्तीय निवेश योजनाओं की जांच सीबीआई कर रही है। इस मामले में दो साल पहले केस दर्ज किया गया था जिसमें रोज़ वैली पर निवेशकों के लगभग 17,000 करोड़ रुपये चुराने का आरोप लगाया गया था। रोज़ वैली के स्वामित्व वाली दो कंपनियों में तापस पाल निदेशक थे। सीबीआई सूत्रों का कहना है कि सुदीप बंद्योपाध्याय ने उन सवालों से बचने की कोशिश की जिनमें रोज़ वैली से उनके ताल्लुकात की प्रकृति के बारे में पूछा गया था। सुदीप बंद्योपाध्याय का कहना था कि उनके खिलाफ लगे आरोप साफ नहीं हैं।

असली सवाल यह है कि जब इस मामले में दो साल पहले केस दर्ज किया गया था तो सीबीआई आज की तारीख में कार्रवाई क्यों कर रही है। दो साल से सीबीआई क्या कर रही थी। आखिर मोदी सरकार के तीन साल होने जा रहे हैं। जब मोदी सरकार के कार्यकाल में इस मामले में मुकदमा दर्ज किया और दो साल तक सीबीआई सोती रही। अब आज जब ममता नोटबंदी को लेकर केंद्र सरकार के खिलाफ आंदोलन चला रही है तब सीबीआई की अचानक नींद खुल गई। फिर यह संदेह ना करने की कोई गुंजाइश नहीं बचती कि ममता को शांत कराने के लिए केंद्र सरकार सीबीआई का इस्तेमाल कर रही है। इतना कुछ मोदी सरकार कर रही है और फिर कहें कि ममता को गुस्सा क्यों आता है तो मेरे हिसाब से यह सवाल करना ही गलत होगा।

Monday, 2 January 2017

क्या अब ये खेल नहीं चलेगा?

भारतीय राजनीति में भ्रष्ट आचरण के खिलाफ देश की सर्वोच्च अदालत ने एक क्रांतिकारी फैसला सुनाते हुए धर्म, जाति और भाषा के आधार पर वोट मांगने को पूरी तरह से गैरकानूनी करार दिया है। माननीय उच्चतम न्यायालय का यह फैसला ऐसे वक्त में आया है जब उत्तर प्रदेश और पंजाब समेत पांच राज्यों में कुछ ही दिनों बाद चुनाव होने हैं। राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण उत्तर प्रदेश में जहां जाति और धर्म के मुद्दे पर चुनाव लड़ा जाता है वहीं एक राज्य पंजाब है जहां अकाली दल जैसी पार्टियां भाषा के आधार पर चुनाव लड़ती रही है। तो क्या माना जाए, शीर्ष अदालत के इस फैसले के बाद जाति, धर्म और भाषा के आधार पर राजनीति करने वाले राजनेताओं और राजनीतिक दलों का खेल खत्म हो जाएगा?

दरअसल सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दाखिल करके ये सवाल उठाया गया था कि धर्म, जाति, भाषा, संप्रदाय आदि के नाम पर वोट मांगना जन प्रतिनिधित्व कानून के तहत गैरकानूनी है या नहीं। जन प्रतिनिधित्व कानून की धारा 123 (3) के तहत यह साफ-साफ लिखा है किसी भी चुनाव प्रत्याशी और उनके एजेंट द्वारा उसके धर्म का इस्तेमाल करके वोट मांगना भ्रष्ट आचरण माना जाएगा। इसमें एक टर्म है - 'उसका धर्म' इस मामले में सुप्रीम कोर्ट को व्याख्या करनी थी कि 'उसका धर्म' का दायरा क्या है? इस दायरे में सिर्फ प्रत्याशी आते हैं या फिर उसके एजेंट और वोटर भी इस दायरे में आते हैं?

इससे पहले इस प्रकरण में आए एक फैसले में कहा गया था कि ये व्याख्या उम्मीदवार के धर्म को लेकर की गई है। लेकिन अब सुप्रीम कोर्ट ने इस कानून की नए सिरे से व्याख्या करते हुए उसमें मतदाताओं को भी जोड़ दिया है। अब तक इस धारा के दायरे में सिर्फ उम्मीदवार आते थे। ये फैसला इसलिए भी महत्वपू्र्ण है कि सुप्रीम कोर्ट के सात जजों की बेंच में चार जज इस फैसले के पक्ष में थे जबकि तीन जज विपक्ष में थे। फैसले में कहा गया है कि धर्म को किसी भी ऐसे काम का हिस्सा नहीं बनाया जाना चाहिए जिसकी प्रकृति धर्मनिरपेक्ष हो। और चुनाव एक धर्मनिरपेक्ष पद्धति है।

इस फैसले के बाद धार्मिक नेताओं की तरफ से हर चुनाव की पूर्व संध्या पर जारी होने वाली अपीलों या कहें तो व्हीप पर लगाम लगेगी। सुप्रीम कोर्ट ने नए साल पर देश में 'शुचिता की राजनीति' का जो विचार दिया है उससे धार्मिक उन्माद, जाति उन्माद, सांप्रदायिक उन्माद में निश्चित रूप से कमी आएगी। आमतौर पर चुनाव से पहले धर्म गुरु या धार्मिक नेता अपने समुदाय से किसी एक पार्टी को वोट देने की अपील करते हैं। लेकिन अब अगर कोई धार्मिक नेता किसी उम्मीदवार या पार्टी के लिए अपने समुदाय से वोट देने की अपील करेगा तो इसकी ज़िम्मेदारी उम्मीदवार पर भी आएगी। अगर किसी उम्मीदवार को इस मामले में दोषी पाया गया तो उसका चुनाव भी रद्द कर दिया जाएगा और साथ ही चुनाव आयोग पार्टियों पर भी कार्रवाई कर सकता है।

भारतीय संविधान में सबको बराबरी का अधिकार दिया गया है। इसका उल्लेख संविधान के अनुच्छेद 14 में मिलता है। हालांकि अनुच्छेद 16 के सेक्शन 4ए में ये भी लिखा है कि बराबरी के अधिकार के बावजूद अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के पक्ष में आरक्षण का विकल्प बनाया जा सकता है। इस देश में हमेशा से ही धर्म और जाति के आधार पर वोट मांगे जाते हैं। वोट बैंक की राजनीति में इस तरह की बात समझने वाले राजनेताओं या राजनीतिक कार्यकर्ताओं की बहुतायत है कि आदिवासियों के हितों का ध्यान एक आदिवासी मुख्यमंत्री या नेता ही रख सकता है। दलितों के हितों का ध्यान सिर्फ एक दलित मुख्यमंत्री या नेता ही रख सकता है। इसी गलत धारणा पर सुप्रीम कोर्ट ने यह प्रहार किया है।

राजनीतिक दल अक्सर धर्म और जाति के आधार पर ही टिकट बांटते हैं। यहां उम्मीदवार को टिकट उसकी योग्यता के आधार पर नहीं बल्कि इस आधार पर दिया जाता है कि उम्मीदवार के क्षेत्र का जातीय समीकरण क्या हैं? अगर उस क्षेत्र में मुसलमान ज्यादा हैं तो मुस्लिम उम्मीदवार को टिकट मिलेगा, अगर सवर्ण ज्यादा हैं तो सवर्ण उम्मीदवार, अगर पिछड़ी जातियों की संख्या ज्यादा है, तो पिछड़ी जातियों के उम्मीदवार को टिकट दिया जाएगा। कहने का मतलब यह कि देश की राजनीतिक पार्टियों में टिकट इसी जाति, धर्म, संप्रदाय और भाषा के आधार पर बांटे जाते हैं और इसी वजह से हमारे देश में वोट बैंक की राजनीति जैसे शब्दों का प्रादुर्भाव हुआ।

उत्तर प्रदेश को ही लें तो यहां चुनाव का पूरा तंत्र ही धर्म और जाति की बैसाखी पर टिका है। आने वाले कुछ ही दिनों में उत्तर प्रदेश में चुनाव होने वाले हैं और यहां की कुछ राजनीतिक पार्टियों ने अपने प्रत्याशी भी घोषित कर दिये हैं। अब देखिए कैसे राजनीतिक दल, धर्म और जाति के आधार पर टिकट बांटते हैं और कैसे पूरा मीडिया धर्म और जाति का चश्मा पहनकर चुनावों से जुड़ी कवरेज करता है। बसपा ने 125 मुसलमानों को टिकट दिये हैं। इसी तरह से कांग्रेस ने इस बार उत्तर प्रदेश में ब्राह्मणों का वोट हासिल करने के लिए मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार शीला दीक्षित को बनाया है।

यादवों को समाजवादी पार्टी का पक्का वोटर माना जाता है। दलितों के बारे में ये मान लिया गया है कि उनका झुकाव मायावती की तरफ है। मुस्लिम वोटर कांग्रेस जैसी पार्टियों को वोट देते हैं जबकि भाजपा को सवर्ण वोटरों की पसंदीदा पार्टी कहा जाता है। ये सारे पूर्वाग्रह धीरे-धीरे बने हैं और आज की राजनीति में यह सिर चढ़कर बोल रहा है। इसके लिए राजनीतिक दल और मीडिया दोनों ही बराबर के जिम्मेदार हैं। पार्टियों के टिकट बंटवारे से लेकर चुनाव जीतने के बाद मंत्रिमंडल के गठन तक में जाति, धर्म और भाषा के आधार पर संतुलन को लेकर मीडिया सबसे ज्यादा जागरूक रहती है।

अभी हाल ही में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भीम (BHIM) नाम से एक एप जारी किया था। निश्चित रूप से इस ऐप का नाम भीम रखने के पीछे दलित वोट हासिल करने की मंशा रही होगी क्योंकि भीम शब्द बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर को निरुपित करता है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भीम ऐप को जारी करने के बाद अपने भाषण में भी डॉ. अंबेडकर का नाम कई बार लिया था। इस ऐप के नाम पर अगर आप गौर करें और इसके नाम पर जाए तो इसका सही नाम बिम होता क्योंकि इस ऐप का पूरा नाम है भारत इंटरफेस फॉर मनी। लेकिन भारत से दो शब्द B और H में I और M जोड़ देने से यह भीम बन गया जिसे अंबेडकर के अनुयायी सम्मान से 'जय भीम' कहते हैं।

कहने की मतलब यह कि भारतीय लोकतंत्र में चुनाव के पहले और चुनाव जीतने के बाद बनी सरकार का मुखिया अपनी राजनीति की अस्मिता को बनाए रखने के लिए अपनी सुविधा के हिसाब से जाति, धर्म और भाषा के आधार पर वोट मांगते हैं, प्रत्याशी खड़े करते हैं और फिर वोट बैंक को बनाए रखने के लिए शासन और प्रशासन में भी नीति निर्देशन कर इसका दुरुपयोग करते हैं।

ऐसे में बड़ा सवाल यह कि क्या देश की सर्वोच्च अदालत का ये आदेश जमीनी स्तर पर लागू हो पाएगा? क्या हमारे देश के नेता वोट बैंक की राजनीति से तौबा कर अपने अंदर इतनी उदारता दिखाएंगे कि विशुद्ध काम और विकास के आधार पर चुनाव लड़ सके? मेरी राय में सभी राजनीतिक दलों को सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। क्योंकि जाति, धर्म और भाषा के आधार पर वोट बैंक की राजनीति ने इस राष्ट्र की एकता और अखंडता तक को खतरे में डाल दिया है।

Sunday, 1 January 2017

'बबुआ' का समाजवाद!

लगता है अब वो समय आ गया है जब बॉलीवुड उत्तर प्रदेश में वंशवाद की समाजवादी राजनीति पर एक फिल्म बनाए। फिल्म का नाम होना चाहिए 'बबुआ का समाजवाद' और उसका शीर्षक गीत (टाइटल सांग) जनवादी कवि गोरख पांडेय की समाजवाद के भटकाव पर लिखी कविता से शुरू होनी चाहिए जो इस प्रकार हैं-

'समाजवाद बबुआ धीरे-धीरे आई...
हाथी से आई, घोड़ा से आई...
लाठी से आई, डंडा से आई...
समाजवाद बबुआ धीरे-धीरे आई...


उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक ही खानदान है जो वंशवाद की राजनीति को निरंतर सींच रहा है और वह है समाजवादी पार्टी का मुलायम परिवार। इस परिवार में राजनीति एक करियर की तरह माना जाता है। मुलायम आए, शिवपाल आए और उसके बाद फिर पूरा खानदान एक के बाद एक लाइन में लग गया। पढ़ाने-लिखाने का कार्य छोड़कर प्रो. रामगोपाल भी आए। देशी और विदेशी कॉलेजों से इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने के बाद बबुआ (मुलायम के बेटे अखिलेश) भी आए। फिर अखिलेश की पत्नी डिंपल भी आईं। देखते ही देखते कई दर्जन नेता इस परिवार में पैदा हो गए। कोई राष्ट्रीय अध्यक्ष बना तो कोई सांसद। कोई मुख्यमंत्री बना तो कोई मंत्री। कोई विधायक बना तो कोई जिला अध्यक्ष।

जब तक समाजवादी पार्टी पर मुलायम की पकड़ रही तब तक इस परिवारवाद की राजनीति में कोई चूं नहीं बोला। एक तरह से 'वन मैन आर्मी' की तरह मुलायम पार्टी को लेकर आगे बढ़ते रहे। जब उत्तर प्रदेश में जीते तो मुख्यमंत्री और हार गए पर राष्ट्रीय राजनीति में समय बिताने दिल्ली चले आते थे। एक समय ऐसा आया जब लगने लगा कि एक परिवार की समाजवादी पार्टी में मुलायम के बाद कौन? तो फिर बदलते राजनीतिक परिदृश्य में नेता जी ने अपने बबुआ को मैदान में उतार दिया। ऑस्ट्रेलिया के सिडनी से ताजा-ताजा लौटे थे। डिंपल से नई-नई शादी हुई थी। साल 2000 का वक्त था। कन्नौज से लोकसभा उपचनाव में मुलायम ने बबुआ को मैदान में उतार दिया। 27 साल की उम्र में चुनाव जीतकर बबुआ सांसद बन गए। फिर 2004 में दूसरी बार और 2009 में तीसरी बार बबुआ लोकसभा के लिए चुने गए।

फिर मुलायम ने बबुआ को उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में प्रचार अभियान की जिम्मेदारी सौंप दी। मुलायम को पता था कि अपने बूते तो वह यूपी की सत्ता में वापसी नहीं कर सकते हैं। इसलिए क्यों न बबुआ पर दांव खेला जाए। नेता जी का राजनीतिक अनुभव काम आया और यूथ आइकन की चमक बिखेरकर साइकिल पर सवार होकर अखिलेश पूरा प्रदेश घूम गए। लोगों ने इस युवा नेता पर भरोसा किया और पूर्ण बहुमत से समाजवादी पार्टी सत्ता में आ गई। विधायकी का चुनाव लड़े बिना अखिलेश 10 मार्च 2012 को उत्तर प्रदेश समाजवादी पार्टी के नेता चुन लिए गए और पांच दिन बाद 15 मार्च 2012 को सूबे के सबसे युवा मुख्यमंत्री का ताज पहना। बाद में अखिलेश ने सांसदी से इस्तीफा देकर विधान परिषद से विधायक बने।

संसदीय राजनीति से लेकर उत्तर प्रदेश की राजनीति का यह सफर बबुआ को काफी कुछ सिखा गया। लेकिन उत्तर प्रदेश में पांच साल तक मुख्यमंत्री की कुर्सी पर रहकर जिस तरह से सत्ता की डगर को नजदीक से देखा और परखा उससे अखिलेश काफी परिपक्व राजनेता के साथ-साथ एक दबंग सुल्तान की भूमिका को भी अपने अंदर समावेशित किया। चार साल तक 'तेल देखो तेल की धार देखो' वाले फॉर्मूले पर खुद को चलाते रहे और जब लगा कि 'अब नहीं तो कभी नहीं' तो पूरी की पूरी समाजवादी राजनीति की दिशा ही बदल दी। बबुआ कब राजनेता बन गया और फिर सुल्तान इसकी नेताजी को भनक तक नहीं लगी। और जब समझ में आया तब तक बहुत देर हो चुकी थी। पूरी पार्टी सुल्तान के कब्जे में आ चुकी थी।

मुझे नहीं मालूम कि मुलायम सिंह यादव ने अपने जीवन में कभी शतरंज खेली है या नहीं, लेकिन अखिलेश की राजनीतिक समझ बताती है कि शतरंज की बिसात पर कब कौन सा मोहरा चलना है और कब शह देकर खेल को खत्म कर देना है अच्छी तरह से पता है। हालांकि यह मानना गलत होगा कि मुलायम सिंह यादव की राजनीतिक समझ कमजोर है। नेताजी का लंबा राजनीति जीवन है और सियासी सफर में काफी उठापटक उन्होंने देखे हैं। कई तरह की परिस्थितियों का सामना किया होगा। बहुत सारे फैसले मजबूरी में भी लेने पड़ते हैं। लेकिन आज की तारीख में तमाम राजनीतिक पंडित इस बात को मान रहे हैं कि अपने ही हाथों से सींचकर जिस समाजवादी पार्टी के पेड़ को बड़ा कर वटवृक्ष का स्वरूप दिया उसे ही समझने में भूल कैसे कर दी।

सोशल मीडिया में आजकल एक ई-मेल वाइरल हो रही है जिसके मुताबिक समाजवादी पार्टी में पारिवारिक नौटंकी एक सोची समझी पटकथा की परिणति है। लीक हुई एक ई-मेल के बाद यह सवाल सियासी गलियारों में बड़ी तेजा से तैर रहा है। यह ई-मेल प्रो. स्टीव जार्डिंग की बताई जा रही है। अब आप पूछेंगे कि ये प्रो. जार्डिंग कौन हैं? दरअसल स्टीव जार्डिंग हॉर्वर्ड यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर और समाजवादी पार्टी के अहम चुनावी रणनीतिकार हैं, प्रशांत किशोर की तरह। बीते साल सितंबर 2016 में यह खबर आई थी कि सपा ने उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों के प्रचार में अहम भूमिका निभाने के लिए उन्हें किराये पर लिया है। हिलेरी क्लिंटन और अल गोर जैसी हस्तियों के लिए प्रचार का काम देख चुके स्टीव जार्डिंग के बारे में कहा जा रहा है कि स्टीव ने ही इस कथित ई-मेल में मुलायम सिंह यादव को सलाह दी कि वे एक पारिवाहिक अंतरकलह का नाटक रचे जिसमें चाचा शिवपाल खलनायक नजर आएं और अखिलेश यादव बेदाग छवि वाले नेता। 24 जुलाई 2016 को भेजी गई इस कथित ई-मेल में यह भी कहा गया है कि अखिलेश यादव को भविष्य में पार्टी के मुखिया यानी राष्ट्रीय अध्यक्ष के तौर पर प्रचारित किया जाए।

ईमानदारी से विश्लेषण किया जाए तो भले ही यह ई-मेल फर्जी हो, लेकिन इसमें जो बातें लिखी बताई जा रही है वह निश्चित रूप से सच प्रतीत हो रही है। दरअसल 2014 के लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी के चुनावी रणनीतिकार बने प्रशांत किशोर ने राजनीतिक दलों के नेताओं को इस बात के लिए मजबूर किया है कि चुनाव जीतने के लिए अब आपको पढ़ा-लिखा इलेक्शन स्ट्रेटजिस्ट रखना होगा जो अपेक्षित परिणाम पाने के लिए समय और परिस्थितियों के हिसाब से चीजें तय करता है, फिर उसे अंजाम तक पहुंचाता है। नरेंद्र मोदी का चुनावी अभियान हो, नीतीश कुमार का चुनावी अभियान हो या फिर अखिलेश यादव का अभियान, सभी अब काफी आधुनिक तरीके से प्रचार अभियान चलाते हैं। सोशल मीडिया का जमाना है जो विवादित मुद्दों को समाज के हर तबके में इस तरह से उछालता है कि राह चलता अनपढ़ गंवार भी ठहरकर अपना कान लगा देता है। ये आधुनिक चुनावी रणनीतिकार इस बात को अच्छी तरह से जानते हैं कि भारतीय मतदाता गॉसिप और विवादित बयान, नौटंकी आदि में पूरी शिद्दत से उलझता है।

थोड़ा गौर से सोचिए! उत्तर प्रदेश में चुनाव होने में कुछ ही दिनों का वक्त बचा है। जो वक्त गुजर रहा है वह यह चर्चा करने और समझने में गुजारना था कि अखिलेश सरकार ने अपने कार्यकाल में जनता की भलाई के लिए क्या काम किया और कौन सा काम नहीं किया जिसका वादा उन्होंने पार्टी की मेनिफेस्टो में किया था। यह वक्त हर विधायक चाहे वो सपा का हो, बसपा का हो, भाजपा का हो या फिर कांग्रेस का हो, रिपोर्ट कार्ड पेश करने का है। खबरिया चैनल हो, अखबार हो या फिर डिजिटल मीडिया सभी को अपने-अपने तरीके से विधानसभा क्षेत्रों में जाकर सबकी रिपोर्ट कार्ड बनाकर पेश करते। लेकिन क्या ये सब हो रहा है? दरअसल अब सरकारें जनता के लिए काम कम करती हैं उसका भौकाल ज्यादा मचाती हैं। अब इस भौकाली तथ्य को कोई  समझ न ले इसी काम के लिए आजकल चुनावी रणनीतिकार रखने की परंपरा चल पड़ी है जो काफी हद तक सफल भी हो रहे हैं।

बहरहाल, उत्तर प्रदेश में 'बबुआ का समाजवाद' आ चुका है। नेताजी का समाजवाद पीछे छूट चुका है। जनेश्वर मिश्र पार्क में नए साल की पहली सुबह जिस तरह से अखिलेश ने समाजवादी पार्टी में तख्तापलट कर पार्टी की कमान अपने हाथों में ले ली है उससे साफ हो गया है कि नेताजी मुलायम सिंह यादव अब बबुआ की तरफ से दिए गए संरक्षक पद की शोभा बढ़ाएं उसी में उनकी भलाई है। पटकथा के मुताबिक फिल्म पूरी हो चुकी है। हां! फिल्म के टाइटल सांग जिसे गोरख पांडे की कविता से शुरू करने की हमने सलाह दी है उसमें कुछ समाजवादी दर्शन की पंक्तियां जोड़ना चाहें तो इस काम में जरूर मेहनत करें।