भारतीय राजनीति में भ्रष्ट आचरण के खिलाफ देश की सर्वोच्च अदालत ने एक क्रांतिकारी फैसला सुनाते हुए धर्म, जाति और भाषा के आधार पर वोट मांगने को पूरी तरह से गैरकानूनी करार दिया है। माननीय उच्चतम न्यायालय का यह फैसला ऐसे वक्त में आया है जब उत्तर प्रदेश और पंजाब समेत पांच राज्यों में कुछ ही दिनों बाद चुनाव होने हैं। राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण उत्तर प्रदेश में जहां जाति और धर्म के मुद्दे पर चुनाव लड़ा जाता है वहीं एक राज्य पंजाब है जहां अकाली दल जैसी पार्टियां भाषा के आधार पर चुनाव लड़ती रही है। तो क्या माना जाए, शीर्ष अदालत के इस फैसले के बाद जाति, धर्म और भाषा के आधार पर राजनीति करने वाले राजनेताओं और राजनीतिक दलों का खेल खत्म हो जाएगा?
दरअसल सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दाखिल करके ये सवाल उठाया गया था कि धर्म, जाति, भाषा, संप्रदाय आदि के नाम पर वोट मांगना जन प्रतिनिधित्व कानून के तहत गैरकानूनी है या नहीं। जन प्रतिनिधित्व कानून की धारा 123 (3) के तहत यह साफ-साफ लिखा है किसी भी चुनाव प्रत्याशी और उनके एजेंट द्वारा उसके धर्म का इस्तेमाल करके वोट मांगना भ्रष्ट आचरण माना जाएगा। इसमें एक टर्म है - 'उसका धर्म' इस मामले में सुप्रीम कोर्ट को व्याख्या करनी थी कि 'उसका धर्म' का दायरा क्या है? इस दायरे में सिर्फ प्रत्याशी आते हैं या फिर उसके एजेंट और वोटर भी इस दायरे में आते हैं?
इससे पहले इस प्रकरण में आए एक फैसले में कहा गया था कि ये व्याख्या उम्मीदवार के धर्म को लेकर की गई है। लेकिन अब सुप्रीम कोर्ट ने इस कानून की नए सिरे से व्याख्या करते हुए उसमें मतदाताओं को भी जोड़ दिया है। अब तक इस धारा के दायरे में सिर्फ उम्मीदवार आते थे। ये फैसला इसलिए भी महत्वपू्र्ण है कि सुप्रीम कोर्ट के सात जजों की बेंच में चार जज इस फैसले के पक्ष में थे जबकि तीन जज विपक्ष में थे। फैसले में कहा गया है कि धर्म को किसी भी ऐसे काम का हिस्सा नहीं बनाया जाना चाहिए जिसकी प्रकृति धर्मनिरपेक्ष हो। और चुनाव एक धर्मनिरपेक्ष पद्धति है।
इस फैसले के बाद धार्मिक नेताओं की तरफ से हर चुनाव की पूर्व संध्या पर जारी होने वाली अपीलों या कहें तो व्हीप पर लगाम लगेगी। सुप्रीम कोर्ट ने नए साल पर देश में 'शुचिता की राजनीति' का जो विचार दिया है उससे धार्मिक उन्माद, जाति उन्माद, सांप्रदायिक उन्माद में निश्चित रूप से कमी आएगी। आमतौर पर चुनाव से पहले धर्म गुरु या धार्मिक नेता अपने समुदाय से किसी एक पार्टी को वोट देने की अपील करते हैं। लेकिन अब अगर कोई धार्मिक नेता किसी उम्मीदवार या पार्टी के लिए अपने समुदाय से वोट देने की अपील करेगा तो इसकी ज़िम्मेदारी उम्मीदवार पर भी आएगी। अगर किसी उम्मीदवार को इस मामले में दोषी पाया गया तो उसका चुनाव भी रद्द कर दिया जाएगा और साथ ही चुनाव आयोग पार्टियों पर भी कार्रवाई कर सकता है।
भारतीय संविधान में सबको बराबरी का अधिकार दिया गया है। इसका उल्लेख संविधान के अनुच्छेद 14 में मिलता है। हालांकि अनुच्छेद 16 के सेक्शन 4ए में ये भी लिखा है कि बराबरी के अधिकार के बावजूद अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के पक्ष में आरक्षण का विकल्प बनाया जा सकता है। इस देश में हमेशा से ही धर्म और जाति के आधार पर वोट मांगे जाते हैं। वोट बैंक की राजनीति में इस तरह की बात समझने वाले राजनेताओं या राजनीतिक कार्यकर्ताओं की बहुतायत है कि आदिवासियों के हितों का ध्यान एक आदिवासी मुख्यमंत्री या नेता ही रख सकता है। दलितों के हितों का ध्यान सिर्फ एक दलित मुख्यमंत्री या नेता ही रख सकता है। इसी गलत धारणा पर सुप्रीम कोर्ट ने यह प्रहार किया है।
राजनीतिक दल अक्सर धर्म और जाति के आधार पर ही टिकट बांटते हैं। यहां उम्मीदवार को टिकट उसकी योग्यता के आधार पर नहीं बल्कि इस आधार पर दिया जाता है कि उम्मीदवार के क्षेत्र का जातीय समीकरण क्या हैं? अगर उस क्षेत्र में मुसलमान ज्यादा हैं तो मुस्लिम उम्मीदवार को टिकट मिलेगा, अगर सवर्ण ज्यादा हैं तो सवर्ण उम्मीदवार, अगर पिछड़ी जातियों की संख्या ज्यादा है, तो पिछड़ी जातियों के उम्मीदवार को टिकट दिया जाएगा। कहने का मतलब यह कि देश की राजनीतिक पार्टियों में टिकट इसी जाति, धर्म, संप्रदाय और भाषा के आधार पर बांटे जाते हैं और इसी वजह से हमारे देश में वोट बैंक की राजनीति जैसे शब्दों का प्रादुर्भाव हुआ।
उत्तर प्रदेश को ही लें तो यहां चुनाव का पूरा तंत्र ही धर्म और जाति की बैसाखी पर टिका है। आने वाले कुछ ही दिनों में उत्तर प्रदेश में चुनाव होने वाले हैं और यहां की कुछ राजनीतिक पार्टियों ने अपने प्रत्याशी भी घोषित कर दिये हैं। अब देखिए कैसे राजनीतिक दल, धर्म और जाति के आधार पर टिकट बांटते हैं और कैसे पूरा मीडिया धर्म और जाति का चश्मा पहनकर चुनावों से जुड़ी कवरेज करता है। बसपा ने 125 मुसलमानों को टिकट दिये हैं। इसी तरह से कांग्रेस ने इस बार उत्तर प्रदेश में ब्राह्मणों का वोट हासिल करने के लिए मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार शीला दीक्षित को बनाया है।
यादवों को समाजवादी पार्टी का पक्का वोटर माना जाता है। दलितों के बारे में ये मान लिया गया है कि उनका झुकाव मायावती की तरफ है। मुस्लिम वोटर कांग्रेस जैसी पार्टियों को वोट देते हैं जबकि भाजपा को सवर्ण वोटरों की पसंदीदा पार्टी कहा जाता है। ये सारे पूर्वाग्रह धीरे-धीरे बने हैं और आज की राजनीति में यह सिर चढ़कर बोल रहा है। इसके लिए राजनीतिक दल और मीडिया दोनों ही बराबर के जिम्मेदार हैं। पार्टियों के टिकट बंटवारे से लेकर चुनाव जीतने के बाद मंत्रिमंडल के गठन तक में जाति, धर्म और भाषा के आधार पर संतुलन को लेकर मीडिया सबसे ज्यादा जागरूक रहती है।
अभी हाल ही में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भीम (BHIM) नाम से एक एप जारी किया था। निश्चित रूप से इस ऐप का नाम भीम रखने के पीछे दलित वोट हासिल करने की मंशा रही होगी क्योंकि भीम शब्द बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर को निरुपित करता है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भीम ऐप को जारी करने के बाद अपने भाषण में भी डॉ. अंबेडकर का नाम कई बार लिया था। इस ऐप के नाम पर अगर आप गौर करें और इसके नाम पर जाए तो इसका सही नाम बिम होता क्योंकि इस ऐप का पूरा नाम है भारत इंटरफेस फॉर मनी। लेकिन भारत से दो शब्द B और H में I और M जोड़ देने से यह भीम बन गया जिसे अंबेडकर के अनुयायी सम्मान से 'जय भीम' कहते हैं।
कहने की मतलब यह कि भारतीय लोकतंत्र में चुनाव के पहले और चुनाव जीतने के बाद बनी सरकार का मुखिया अपनी राजनीति की अस्मिता को बनाए रखने के लिए अपनी सुविधा के हिसाब से जाति, धर्म और भाषा के आधार पर वोट मांगते हैं, प्रत्याशी खड़े करते हैं और फिर वोट बैंक को बनाए रखने के लिए शासन और प्रशासन में भी नीति निर्देशन कर इसका दुरुपयोग करते हैं।
ऐसे में बड़ा सवाल यह कि क्या देश की सर्वोच्च अदालत का ये आदेश जमीनी स्तर पर लागू हो पाएगा? क्या हमारे देश के नेता वोट बैंक की राजनीति से तौबा कर अपने अंदर इतनी उदारता दिखाएंगे कि विशुद्ध काम और विकास के आधार पर चुनाव लड़ सके? मेरी राय में सभी राजनीतिक दलों को सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। क्योंकि जाति, धर्म और भाषा के आधार पर वोट बैंक की राजनीति ने इस राष्ट्र की एकता और अखंडता तक को खतरे में डाल दिया है।
दरअसल सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दाखिल करके ये सवाल उठाया गया था कि धर्म, जाति, भाषा, संप्रदाय आदि के नाम पर वोट मांगना जन प्रतिनिधित्व कानून के तहत गैरकानूनी है या नहीं। जन प्रतिनिधित्व कानून की धारा 123 (3) के तहत यह साफ-साफ लिखा है किसी भी चुनाव प्रत्याशी और उनके एजेंट द्वारा उसके धर्म का इस्तेमाल करके वोट मांगना भ्रष्ट आचरण माना जाएगा। इसमें एक टर्म है - 'उसका धर्म' इस मामले में सुप्रीम कोर्ट को व्याख्या करनी थी कि 'उसका धर्म' का दायरा क्या है? इस दायरे में सिर्फ प्रत्याशी आते हैं या फिर उसके एजेंट और वोटर भी इस दायरे में आते हैं?
इससे पहले इस प्रकरण में आए एक फैसले में कहा गया था कि ये व्याख्या उम्मीदवार के धर्म को लेकर की गई है। लेकिन अब सुप्रीम कोर्ट ने इस कानून की नए सिरे से व्याख्या करते हुए उसमें मतदाताओं को भी जोड़ दिया है। अब तक इस धारा के दायरे में सिर्फ उम्मीदवार आते थे। ये फैसला इसलिए भी महत्वपू्र्ण है कि सुप्रीम कोर्ट के सात जजों की बेंच में चार जज इस फैसले के पक्ष में थे जबकि तीन जज विपक्ष में थे। फैसले में कहा गया है कि धर्म को किसी भी ऐसे काम का हिस्सा नहीं बनाया जाना चाहिए जिसकी प्रकृति धर्मनिरपेक्ष हो। और चुनाव एक धर्मनिरपेक्ष पद्धति है।
इस फैसले के बाद धार्मिक नेताओं की तरफ से हर चुनाव की पूर्व संध्या पर जारी होने वाली अपीलों या कहें तो व्हीप पर लगाम लगेगी। सुप्रीम कोर्ट ने नए साल पर देश में 'शुचिता की राजनीति' का जो विचार दिया है उससे धार्मिक उन्माद, जाति उन्माद, सांप्रदायिक उन्माद में निश्चित रूप से कमी आएगी। आमतौर पर चुनाव से पहले धर्म गुरु या धार्मिक नेता अपने समुदाय से किसी एक पार्टी को वोट देने की अपील करते हैं। लेकिन अब अगर कोई धार्मिक नेता किसी उम्मीदवार या पार्टी के लिए अपने समुदाय से वोट देने की अपील करेगा तो इसकी ज़िम्मेदारी उम्मीदवार पर भी आएगी। अगर किसी उम्मीदवार को इस मामले में दोषी पाया गया तो उसका चुनाव भी रद्द कर दिया जाएगा और साथ ही चुनाव आयोग पार्टियों पर भी कार्रवाई कर सकता है।
भारतीय संविधान में सबको बराबरी का अधिकार दिया गया है। इसका उल्लेख संविधान के अनुच्छेद 14 में मिलता है। हालांकि अनुच्छेद 16 के सेक्शन 4ए में ये भी लिखा है कि बराबरी के अधिकार के बावजूद अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के पक्ष में आरक्षण का विकल्प बनाया जा सकता है। इस देश में हमेशा से ही धर्म और जाति के आधार पर वोट मांगे जाते हैं। वोट बैंक की राजनीति में इस तरह की बात समझने वाले राजनेताओं या राजनीतिक कार्यकर्ताओं की बहुतायत है कि आदिवासियों के हितों का ध्यान एक आदिवासी मुख्यमंत्री या नेता ही रख सकता है। दलितों के हितों का ध्यान सिर्फ एक दलित मुख्यमंत्री या नेता ही रख सकता है। इसी गलत धारणा पर सुप्रीम कोर्ट ने यह प्रहार किया है।
राजनीतिक दल अक्सर धर्म और जाति के आधार पर ही टिकट बांटते हैं। यहां उम्मीदवार को टिकट उसकी योग्यता के आधार पर नहीं बल्कि इस आधार पर दिया जाता है कि उम्मीदवार के क्षेत्र का जातीय समीकरण क्या हैं? अगर उस क्षेत्र में मुसलमान ज्यादा हैं तो मुस्लिम उम्मीदवार को टिकट मिलेगा, अगर सवर्ण ज्यादा हैं तो सवर्ण उम्मीदवार, अगर पिछड़ी जातियों की संख्या ज्यादा है, तो पिछड़ी जातियों के उम्मीदवार को टिकट दिया जाएगा। कहने का मतलब यह कि देश की राजनीतिक पार्टियों में टिकट इसी जाति, धर्म, संप्रदाय और भाषा के आधार पर बांटे जाते हैं और इसी वजह से हमारे देश में वोट बैंक की राजनीति जैसे शब्दों का प्रादुर्भाव हुआ।
उत्तर प्रदेश को ही लें तो यहां चुनाव का पूरा तंत्र ही धर्म और जाति की बैसाखी पर टिका है। आने वाले कुछ ही दिनों में उत्तर प्रदेश में चुनाव होने वाले हैं और यहां की कुछ राजनीतिक पार्टियों ने अपने प्रत्याशी भी घोषित कर दिये हैं। अब देखिए कैसे राजनीतिक दल, धर्म और जाति के आधार पर टिकट बांटते हैं और कैसे पूरा मीडिया धर्म और जाति का चश्मा पहनकर चुनावों से जुड़ी कवरेज करता है। बसपा ने 125 मुसलमानों को टिकट दिये हैं। इसी तरह से कांग्रेस ने इस बार उत्तर प्रदेश में ब्राह्मणों का वोट हासिल करने के लिए मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार शीला दीक्षित को बनाया है।
यादवों को समाजवादी पार्टी का पक्का वोटर माना जाता है। दलितों के बारे में ये मान लिया गया है कि उनका झुकाव मायावती की तरफ है। मुस्लिम वोटर कांग्रेस जैसी पार्टियों को वोट देते हैं जबकि भाजपा को सवर्ण वोटरों की पसंदीदा पार्टी कहा जाता है। ये सारे पूर्वाग्रह धीरे-धीरे बने हैं और आज की राजनीति में यह सिर चढ़कर बोल रहा है। इसके लिए राजनीतिक दल और मीडिया दोनों ही बराबर के जिम्मेदार हैं। पार्टियों के टिकट बंटवारे से लेकर चुनाव जीतने के बाद मंत्रिमंडल के गठन तक में जाति, धर्म और भाषा के आधार पर संतुलन को लेकर मीडिया सबसे ज्यादा जागरूक रहती है।
अभी हाल ही में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भीम (BHIM) नाम से एक एप जारी किया था। निश्चित रूप से इस ऐप का नाम भीम रखने के पीछे दलित वोट हासिल करने की मंशा रही होगी क्योंकि भीम शब्द बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर को निरुपित करता है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भीम ऐप को जारी करने के बाद अपने भाषण में भी डॉ. अंबेडकर का नाम कई बार लिया था। इस ऐप के नाम पर अगर आप गौर करें और इसके नाम पर जाए तो इसका सही नाम बिम होता क्योंकि इस ऐप का पूरा नाम है भारत इंटरफेस फॉर मनी। लेकिन भारत से दो शब्द B और H में I और M जोड़ देने से यह भीम बन गया जिसे अंबेडकर के अनुयायी सम्मान से 'जय भीम' कहते हैं।
कहने की मतलब यह कि भारतीय लोकतंत्र में चुनाव के पहले और चुनाव जीतने के बाद बनी सरकार का मुखिया अपनी राजनीति की अस्मिता को बनाए रखने के लिए अपनी सुविधा के हिसाब से जाति, धर्म और भाषा के आधार पर वोट मांगते हैं, प्रत्याशी खड़े करते हैं और फिर वोट बैंक को बनाए रखने के लिए शासन और प्रशासन में भी नीति निर्देशन कर इसका दुरुपयोग करते हैं।
ऐसे में बड़ा सवाल यह कि क्या देश की सर्वोच्च अदालत का ये आदेश जमीनी स्तर पर लागू हो पाएगा? क्या हमारे देश के नेता वोट बैंक की राजनीति से तौबा कर अपने अंदर इतनी उदारता दिखाएंगे कि विशुद्ध काम और विकास के आधार पर चुनाव लड़ सके? मेरी राय में सभी राजनीतिक दलों को सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। क्योंकि जाति, धर्म और भाषा के आधार पर वोट बैंक की राजनीति ने इस राष्ट्र की एकता और अखंडता तक को खतरे में डाल दिया है।

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