Saturday, 12 August 2017

पीएम मोदी की ये कैसी नाइंसाफी?

जिस सामाजिक और राजनीतिक परिवेश में हम जी रहे हैं, आप देखेंगे कि कोई भी नेता हमेशा धर्म से दूर भागता है। इसलिए क्योंकि धर्म के सामने उसे आत्मग्लानि होती है। आध्यात्मिक संत ओशो भी कहते थे, 'धर्म अगर जीवन को जीने की कला है तो राजनीति जीवन कला का शरीर है। धर्म अगर प्रकाश है जीवन का तो राजनीति पृथ्वी है। शरीर न हो तो आत्मा अदृश्य हो जाती है और आत्मा न हो तो शरीर सड़ जाता है, दुर्गंध देने लगता है। ठीक इसी तरह धर्म के बिना राजनीति सड़ा हुआ शरीर हो जाती है और राजनीति से विहीन धर्म भी विलीन हो जाता है।' इस देश की दशा कुछ ऐसी ही है जहां धर्म और राजनीति एक दूसरे के खिलाफ खड़े हैं, देश हाशिये पर जा रहा है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ही बात करें तो 2014 के चुनाव में देश ने जब उन्हें प्रधानमंत्री चुना था तो इसके पीछे जनता की सोच यही थी कि ये शख्स एक धार्मिक व्यक्ति है और राजनीति का मंझा हुआ खिलाड़ी भी और जब दोनों गुणों का समागम हो जाएगा तो देश तरक्की के एक्सप्रेस-वे पर चल पड़ेगा जिसे कोई रोक नहीं पाएगा। लेकिन तीन सालों में प्रधानमंत्री मोदी ऐसा करिश्मा नहीं कर पाए। उनकी पूरी ताकत चुनाव जीतने में और कांग्रेस समेत तमाम विरोधी दलों का नामो-निशान मिटाने में लग गया। धर्म से उन्होंने दूरी बना ली। यहां हम गोरक्षा की बात कर रहे हैं। उस गाय की जो धर्म से भी जुड़ा है और देश की अर्थव्यवस्था से भी। पिछले दिनों खबर आई कि मोदी सरकार ने पूरे देश में संचालित की जा रही सेना की 39 गोशालाओं को बंद करने का फैसला किया है।

सरकार के इस फैसले पर कई तरह के सवाल उठ रहे हैं। इन गोशालाओं में देश की सबसे अच्छी नस्ल की गाय हैं और सरकार के इस फैसले से करीब 20 हजार गायों का भविष्य खतरे में पड़ गया है। साथ ही यहां काम करने वाले करीब ढाई हजार कर्मचारियों की नौकरी पर भी तलवार लटक रही है। सरकार का ये फैसला ऐसे वक्त में आया है जब मोदी सरकार गायों की सुरक्षा को लेकर निरंतर सवालों के घेरे में खड़ी है। आईसीएआर के वैज्ञानिकों ने भी इस बात को लेकर चिंता जताई है कि सैन्य गोशालाएं बंद होने के बाद इन गायों को क्या होगा। क्योंकि देश में दूसरी ऐसी कोई फर्म नहीं है जहां 20 हजार गायों को पाला जा सके। ये गायें देशभर की अन्य गायों की तुलना में सबसे ज्यादा दूध देती हैं। और गाय के दूध से बच्चों की सेहत का मामला भी तो जुड़ा होता है।

20 जुलाई 2017 को कैबिनेट कमेटी ने भारतीय सेना को निर्देश देते हुए कहा कि तीन महीने के भीतर इन गोशालाओं को बंद किया जाए। कमेटी ने आगे कहा कि सेना के जवानों के लिए दूध डेयरी से खरीदा जाए। समझा जा रहा है कि सेना को अब गोशालाएं रखने की जरूरत नहीं है। सरकार के इस फैसले को निजी मिल्क और डेयरी उद्योग को बढ़ावा देने के रूप में भी देखा जा रहा है। लेकिन इसके लिए जिस तरह की कीमत चुकानी पड़ेगी वह समझ से परे हैं। इन सैन्य गोशालाओं का इतिहास देखें तो इसकी शुरुआत ब्रिटिश काल में हुई थी| सबसे पहली सैन्य गोशाला 1889 में इलाहाबाद में खोली गई थी। वर्तमान सैन्य गोशालाएं अंबाला (हरियाणा), बैंगडुबी (नॉर्थ बंगाल), झांसी, कानपुर, लखनऊ, मेरठ, पिमप्री (महाराष्ट्र), पानागढ़ (बंगाल) और रांची के साथ अन्य स्थानों पर हैं। सरकार के इस फैसले से अब भारत की सबसे अच्छी नस्ल की गायों के भविष्य पर भी प्रश्न चिह्न लग गया है। ये गाय सबसे ज्यादा दूध देती हैं।

बहरहाल, भारतीय सेना की 39 गौशालाओं में पल रही 20 हजार गायों और इन गौशालाओं से जुड़े करीब ढाई हजार कर्मियों को लेकर सरकार का फैसला न सिर्फ गाय और उनके रखरखाव करने वाले कर्मचारियों से नाइंसाफी है बल्कि ये नाइंसाफी सेना के उन जवानों के साथ भी है जो सरहद पर जान की बाजी लगाकर देश की रक्षा करते हैं। इन गायों के दूध से सेना के जवानों और उनके घर परिवार में बच्चों की सेहत से भी जुड़ा है। कहते हैं गाय का दूध पीने से शरीर की हड्डियां मजबूत होती है। गाय के दूध का मुकाबला डेयरी का पैकेज्ड मिल्क कभी नहीं कर सकता है। इसलिए बेहतर होगा कि सरकार अपने इस फैसले पर पुनर्विचार करे और संभव हो तो इन गौशालाओं का और विस्तार करे।

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