Sunday, 1 October 2017

इन नीतियों से PM मोदी का कोई वास्ता नहीं

इसी साल जून महीने में एक खबर निकलकर आई थी कि मनमोहन सरकार के कार्यकाल में मंत्रियों और सांसदों ने पंचसितारा होटलों के बिल पर 10 साल में 19.77 करोड़ रुपए खर्च किए वहीं वर्तमान मोदी सरकार के मंत्रियों और सांसदों ने पिछले एक साल में ही इन पर 25 करोड़ रुपये खर्च कर दिए। नियमों के मुताबिक, सांसदों को शपथ लेने के दिन से रहने के लिए आवास उपलब्ध कराना सरकार की जिम्मेदारी होती है। अगर आवास न भी उपलब्ध हो तो उन्हें स्टेट गेस्ट हाउस या फिर अशोका, जनपथ या सम्राट जैसे सरकारी होटलों में ठहराया जाता है। ऐसे में मोदी सरकार के मंत्री और हाउस कमेटी के चेयरमैन अर्जुन राम मेघवाल का यह जवाब कि वर्तमान लोकसभा में पहली बार 330 सांसद ऐसे हैं जिनका दिल्ली में कोई आवास नहीं है, ऐसे में होटल्स का बिल बढ़ना स्वभाविक है, बचकाना सा लगता है।

कल्याणकारी राज्य में भरोसा नहीं
दरअसल, मोदी सरकार ऐसी कोई नीति बनाने में भरोसा नहीं रखती जिसके तहत मंत्रियों और सांसदों की सुख-सुविधाओं में कटौती की बात हो। मोदी सरकार अपनी हर नीति में गरीबों के कल्याण की बात करती है, लेकिन यहां भी थोड़ी गहराई में जाकर इसकी छानबीन करें तो पाएंगे कि मोदी सरकार की कोई भी नीति गरीबों के कल्याण के लिए नहीं होती। दरअसल नरेंद्र मोदी कल्याणकारी राज्य की अवधारणा में विश्वास ही नहीं रखते। इस बात का संकेत उन्होंने शुरू में ही मनरेगा का मजाक उड़ाकर दे दिया था। देश के सवा सौ करोड़ भाईयों-बहनों को सरकार ने बीच बाजार में लाकर खड़ा कर दिया जिसकी समझ में ये नहीं आ रहा कि आगे बढूं या पीछे की तरफ लौट जाऊं। क्योंकि आगे कुआं दिख रहा है तो पीछे खाई। विचलित मन:स्थिति के बीच खड़ा जनमानस अपना सब कुछ सरकार को समर्पित कर जिंदगी को दांव पर लगा चुका है।

गरीबों के पैसे से गरीबों की योजनाएं

जनधन योजना इस सरकार के व्यापार का पहला चरण था जब गरीबों की जेब से पैसा निकालकर बैंकों के हवाले किया गया। बतौर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे भी गरीबों के कल्याण की योजना बताई और लोगों ने इसे मान भी लिया। इसके बाद नोटबंदी दूसरा चरण था ताकि ज्यादा से ज्यादा डिजिटल मनी को बढ़ावा मिले और कॉरपोरेट घरानों को अतिरिक्त व्यापार। उनके बाजार का तीसरा चरण जीएसटी के रूप सामने आया और चौथा चरण पेट्रोल और डीजल पर बेहिसाब टैक्स। ऐसी और भी कई स्कीमें हैं जिसे पीएम मोदी ने सफलतापूर्वक लागू किया और इसे गरीबों के कल्याण से जोड़ दिया। जबकि हकीकत में यह बाजार का कंसालिडेशन था।

डिजिटल मनी से पूंजीपतियों की चांदी
अर्थशास्त्र का सिद्धांत कहता है कि एक खुदरा बाजार संगठित व्यापार के लिए हमेशा नुकसानदेह होता है इसलिए बाजार जितना संगठित हो वह व्यापारियों के लिए बहुत मुनाफे का सौदा होता है। जब इस दुनिया में नोट के रूप में करेंसी आयी थी तब उसका भी यही मकसद था कि लोग जिस तरह से आपस में लेनदेन करते हैं उससे बाजार कभी पूंजीपतियों के हवाले नहीं हो पायेगा। डिजिटल मनी उससे भी आगे का कदम है जो बाजार को पूंजीपतियों के हवाले करने में मदद पहुंचाएगा। पहले नोट के कारण बाजार में जो छुटभैये पैदा हो गये थे डिजिटल मनी और जीएसटी उनको साफ कर देंगें।

विपन्न लोगों का संपन्न देश होगा भारत
प्रधानमंत्री मोदी देश में ऐसी आर्थिक नीति लागू कर रहे हैं जिससे देश तो मजबूत होता दिख रहा है लेकिन लोग लगातार कमजोर होते जा रहे हैं। देश की समृद्धि का ग्राफ ऊपर उठेगा लेकिन लोगों की समृद्धि का ग्राफ लगातार नीचे चला जाएगा। देश में एक लाख लखपति पैदा होने की बजाय सौ करोड़पति पैदा हो जाएंगे जिससे ऊपर से देखने पर देश आंकड़ों में बहुत समृद्ध नजर आयेगा, आधारभूत ढांचा भी विकसित होता चला जाएगा लेकिन आम आदमी की मुश्किलें बढ़ती जाएंगी। पहले भारत संपन्न लोगों का विपन्न देश था लेकिन मोदी का कार्यकाल खत्म होते-होते भारत विपन्न लोगों का संपन्न देश बन जाएगा।

बहरहाल, शुरू में जो बातें की गईं कि मोदी राज में मंत्रियों और सांसदों की सुख-सुविधाओं में किसी तरह की कटौती की बात करना सरकार की नीति का हिस्सा नहीं है वह तभी सफल हो पाएगा जब कल्याणकारी राज्य की अवधारणा को कुंद कर देंगे। मोदी सरकार ने बड़े ही होशियारी से गरीबों को नाम पर जनकल्याण योजनाएं बनाकर गरीबों से ही पैसे वसूलकर बैंकों और सरकार के खजाने भर लीं और उसे खुद की सुख सुविधाओं पर खर्च करने में उड़ा रही है या फिर कॉरपोरेट घरानों के कर्जों का सेटलमेंट करने में लगा रही है।

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