Saturday, 14 October 2017

2019 में रंग लाएगी राहुल की ये तरकीब

लोकसभा चुनाव 2019 के फाइनल की जंग के लिए गुजरात और हिमाचल प्रदेश में सेमीफाइनल का दौर शुरू हो चुका है। खास बात यह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी के बीच गुजरात विधानसभा चुनाव में फाइनल का रिहर्सल भी शुरू हो गया है। गुजरात में जीत और हार जिसकी भी हो, लेकिन ऐसा लगता है कि चुनाव नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी के चेहरे को ही आगे कर लड़ा जा रहा है मानों इन्हीं में से कोई एक गुजरात का मुख्यमंत्री बनने वाले हों। राहुल गांधी के लिए चाहे गुजरात चुनाव हो या फिर लोकसभा-2019 का चुनाव, खोने के लिए कुछ भी नहीं है। कांग्रेस को इन दोनों चुनावों में जो भी हासिल होगा, तय है पहले से बेहतर ही होगा क्योंकि कांग्रेस पार्टी का प्रदर्शन अब और खराब क्या हो सकता है। यह नरेंद्र मोदी और भाजपा के शाह भी जान रहे हैं कि गुजरात और देश दोनों ही स्थानों पर भाजपा नीत सरकार का प्रदर्शन जनता के मनोनुकूल नहीं दिख रहा है। इस बीच कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी और कांग्रेस पार्टी ने चुनावी शतरंज की बिसात पर कुछ ऐसी चालें चली हैं जिससे नरेंद्र मोदी की भाजपा गुजरात विधानसभा और लोकसभा चुनाव में चारों खाने चित्त हो जाए तो कोई आश्चर्य नहीं।

सोशल मीडिया अबकी राहुल के लिए वरदान
सोशल मीडिया का जो प्लैटफॉर्म 2014 के लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी और भाजपा के लिए वरदान साबित हुआ वहीं सोशल प्लैटफार्म गुजरात विधानसभा चुनाव और लोकसभा चुनाव 2019 में नरेंद्र मोदी और भाजपा के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन चुका है। 'विकास पागल हो गया है' हैशटैग ने भाजपा कैंप में खलबली मचा रखी है। ऊपर से बेरोजगारी, नोटबंदी, जीएसटी और रियल एस्टेट रेगुलेशन डिवेलपमेंट ऐक्ट ने पूरे देश में मंदी का माहौल बनाया है और इसमें सोशल मीडिया ने कांग्रेस के पक्ष में जबरदस्त तरीके से माहौल बनाया है। अगर आपको याद हो तो 2014 में नरेंद्र मोदी ने जिस विकास के मुद्दे को चुनाव जीतने का हथियार बनाया था उसमें सोशल मीडिया ने अहम भूमिका निभाई थी और वही विकास आज अगर पागल हो गया है तो लोगों का भाजपा और नरेंद्र मोदी से मोह भंग होना स्वाभाविक है क्योंकि सवाल पूछने वाले तो पूछेंगे कि नरेंद्र मोदी में इतनी भी प्रशासनिक क्षमता नहीं कि विकास को तीन साल भी ठीक से संभाल नहीं पाए। कहने का मतलब यह कि नरेंद्र मोदी ने 2014 में सत्ता पाने के लिए विकास शब्द का इस्तेमाल किया और लोगों ने उसपर भरोसा किया। यह सब कुछ हवा में एक जुमले की तरह था। इसकी कोई वास्तविक हैसियत नहीं थी, लेकिन आज की तारीख में कांग्रेस और राहुल गांधी सोशल मीडिया पर जिस तरह से विकास को लेकर मोदी सरकार पर हमले कर रहे हैं वो एक सच्चाई है ना कि जुमला। देश की जनता को यह मसहूस हो रहा है कि राहुल जो बात कर रहे हैं वह हमारा वर्तमान है। इसलिए संभव है 2019 आते-आते 'विकास' इतना पागल हो जाए कि 125 करोड़ लोगों की ताकत वाला देश 'विकास' का पागलपन ठीक करने की जिम्मेदारी राहुल गांधी की कांग्रेस को सौंप दे।

राहुल का नरम हिन्दुत्व कार्ड भी मोदी पर भारी
गुजरात विधानसभा चुनाव के लिए कांग्रेस पार्टी ने राज्य में जब चुनाव अभियान की शुरुआत राहुल गांधी के जरिए की तो उन्होंने सबसे पहले द्वारकाधीश में जाकर पूजा-अर्चना की। श्रीकृष्ण के चरणों में शीश झुकाकर माथे पर तिलक लगाए अपनी तस्वीरें सोशल मीडिया पर शेयर कीं। गुजरात दौरे के दरम्यान वह तमाम दूसरे मंदिरों में भी गए और आने वाले दिनों में भी इस काम को करते रहने की योजना है। दरअसल यह राहुल की कांग्रेस की रणनीति का दूसरा हिस्सा है। हाल के वर्षों में कांग्रेस पर जो सबसे बड़ा आरोप लगा था वह यही था कि यह पार्टी अल्पसंख्यकों का तुष्टिकरण करती है। यह आरोप गुजरात में भारी ना पड़े इसलिए राहुल गांधी के जरिये कांग्रेस ने नरम हिंदुत्व का दांव खेला है। नरेंद्र मोदी की भाजपा इससे बेहद घबराई हुई है। क्योंकि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ खुद का हिन्दुत्व का सबसे बड़ा झंडाबरदार मानता है। आरएसएस को लगता है कि हिन्दुत्व पर उनका पेटेंट है और हिन्दुत्व की राजनीति करने का अधिकार सिर्फ भारतीय जनता पार्टी के पास है। लेकिन आरएसएस और भाजपा की दिक्कत यह है कि ये लोग कट्टर हिन्दुत्व की राजनीति करने लगे जो 125 करोड़ की जनता को पसंद नहीं। 2014 में लोगों ने मोदी की भाजपा को वोट इसलिए किया था कि मोदी सरकार हिन्दुत्व को विकास से जोड़कर जीने का एक बेहतरीन हथियार हर भारतवासी के हाथों में सौपेंगे, लेकिन तीन साल में ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। बड़ी साफ सी बात है कि कट्टरता किसी भी चीज में अच्छी नहीं होती तो फिर हिन्दुत्व के लिए कैसे अच्छी हो सकती। राहुल गांधी ने इसीलिए चुपके-चुपके नरम हिन्दुत्व का कार्ड खेल दिया है और आगे आने वाले दिनों में इस और मजबूती से पेश किया जाएगा।

राहुल की साफगोई से मोदी हो जाएंगे चित्त!
लाखों लोगों के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी किसी भी मुद्दे को घुमा-फिरा कर इस तरह से पेश करते हैं कि जुमला भी सच जैसा लगने लगता है। देश और दुनिया में घूम-घूम कर नरेंद्र मोदी ने इस बात को स्थापित करने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी कि पिछले 70 वर्षों में देश में कोई काम नहीं हुआ। लेकिन अब जब कि कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी भी देश-दुनिया में घूम-घूम कर मोदी सरकार के साथ-साथ कांग्रेस समेत देश की तमाम सरकारों की बात कर रहे हैं तो अमेरिका से लेकर गुजरात तक लोग कहने लगे हैं कि राहुल की साफगोई का कोई जवाब नहीं। अभी हाल ही में राहुल जब अमेरिकी दौरे पर कैलिफोर्निया और प्रिंसटन विश्वविद्यालय में छात्रों से बात की और कई इंटरव्यू दिए तो पश्चिमी मीडिया ने माना कि राहुल अपने देश भारत की जमीनी हकीकत को नरेंद्र मोदी के मुकाबले बेहतर तरीके से समझते हैं। राहुल की छवि इस रूप में सामने आई कि वह कांग्रेस के गुलाम नहीं हैं। बेरोजगारी के मुद्दे पर राहुल ने कांग्रेस को भी उतना ही दोषी ठहराया जितना मोदी सरकार को। गुजरात और हिमाचल प्रदेश में आगामी विधानसभा चुनाव के प्रचार के दौरान भी राहुल मोदी सरकार की आलोचना तो कर रही रहे हैं, साथ ही कांग्रेस को भी क्लीनचिट नहीं दे रहे। कुल मिलाकर कांग्रेस जनता के बीच राहुल गांधी की छवि कुछ इस तरह का बनाना चाहती है कि राहुल सीधा सोचते हैं। उनकी सोच और नीति में किसी तरह की राजनीति नहीं, जुमलेबाजी नहीं। मोदी की सत्ता इस बात से डरी हुई है कि अगर लोगों के दिल और दिमाग में यह बात घर कर गई कि नरेंद्र मोदी नीत भाजपा की सरकार सिर्फ चुनाव जीतने की राजनीति करती है जुमलों के जाल में फंसाकर तो फिर क्या होगा?

बहरहाल, नरेंद्र मोदी और भाजपा के मुकाबले राहुल गांधी और कांग्रेस की चुनावी रणनीति और नई-नई चालें जारी रहीं तो देश में बड़ा राजनीतिक उलटफेर हो सकता है। 2014 और 2019 के लोकसभा चुनाव में फर्क को समझने की जरूरत है। हमें इस बात को स्वीकार करना होगा कि 2014 में जब नरेंद्र मोदी चुनाव के मैदान में उतरे थे तो तब देश में कांग्रेस की सत्ता थी और वो भी 10 साल से। मोदी के हाथ 'विकास' का अमोघ अस्त्र हाथ लग गया था जिसके कंधे पर बैठकर वो नैया पार कर गए। लेकिन आज परिस्थितियां बिलकुल उलट है। जिस विकास को आगे कर नरेंद्र मोदी ने जनता से सैकड़ों वादे कर सत्ता संभाली उसे डिलीवर करने की जब बारी आयी तो भाजपा के नेता व कार्यकर्ता यह कहकर बचकानी हरकत करने लगे कि वो तो जुमला था। चाहे वह कालाधन को विदेश से लाने की बात हो, हर साल 2 करोड़ लोगों को रोजगार देने का हो, महंगाई कम करने का हो हर मोर्चे पर सरकार पिछड़ती नजर आ रही है। ऊपर से नोटबंदी और जीएसटी की मार ने आम आदमी और व्यापारी वर्ग की कमर तोड़ दी है। तो ऐसे में राहुल गांधी के लिए 2019 का चुनाव इस मायने में आसान हो गया है कि 2014 की मोदी की लाठी से ही राहुल की कांग्रेस के लिए मोदी की भाजपा को चारों खाने चित्त करने का अवसर है।

Tuesday, 3 October 2017

न्यू इंडिया के सपने की हकीकत

2014 के लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान नरेंद्र मोदी ने जो वायदे देश की जनता से किए थे, अगर उसे भी पूरा करने में सरकार सफल रही तो खुद-ब-खुद नया भारत यानी न्यू इंडिया बन जाएगा। एक सुरक्षित, समृद्ध और मजबूत राष्ट्र बनाने का लक्ष्य नया नहीं है। सभी सरकारें सबके लिए रोटी, कपड़ा, मकान, शिक्षा, बिजली, स्वास्थ्य आदि मुहैया कराने पर जोर देती है और फिर हर प्रधानमंत्री ने अतीत में किसानों की आय बढ़ाने, युवाओं को रोजगार देने, भ्रष्टाचार और आतंकवाद से मुक्ति दिलाने, सामाजिक सद्भाव और सीमा सुरक्षा मजबूत करने का वादा किया है। फर्क सिर्फ इतना है कि अन्य प्रधानमंत्रियों के मुकाबले प्रधानसेवक नरेंद्र मोदी लोगों को यह यकीन दिलाने में कामयाब दिख रहे हैं कि न्यू इंडिया का यह विजन उनकी पहुंच में है और यदि लोग उनके साथ मिलकर मतलब 2019 में उनकी सरकार को दोबारा चुनते हैं तो इस लक्ष्य को पाना आसान होगा।

न्यू इंडिया मतलब नया भारत। एक ऐसा भारत जहां कोई गरीब नहीं हो, कोई भूखा न हो, कोई अनपढ़ न हो, कोई बेरोजगार न हो, सर्वधर्मसम्भाव का मान हो, जय जवान-जय किसान का नारा बुलंद हो। आजादी के इन 70 सालों में एक के बाद एक आने वाली और जाने वाली सरकारें यह तो करती रही हैं। ऐसा भी नहीं है कि आजादी के समय जो भारत हमें मिली थी, जिस रूप में मिली थी उससे कहीं बेहतर भारत में आज हम रह रहे हैं, लेकिन कहते हैं कि बदलाव हमेशा अपने साथ कुछ विकृतियां भी लाती हैं और यही ध्यान रखने की होती है किसी भी सरकार और देशवासियों के लिए कि बदलाव को स्वीकार कर सामूहिक प्रतिबद्धता के साथ विकृतियों के खिलाफ लड़ाई लड़ें। यहीं आकर सब गड़बड़ हो जाती है। एक ओर जनता जहां अपनी सामूहिकता और प्रतिबद्धता को भूल जाती है और सरकार अपनी सत्ता को बचाने के लिए वोट बैंक की राजनीति में उलझ जाती है, अपनी प्रतिबद्धता को आगे के लिए टाल देती है।

इसे समझने के लिए इस कहानी को याद करना होगा। बात 1965 की है जब एक अमरिकी अखबार को दिए इंटरव्यू में तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने अमेरिका द्वारा वियतनाम में चलाए गए युद्ध को आक्रामक कार्य बताया था। शास्त्री जी की यह टिप्पणी तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति लिंडन जॉनसन को नागवार गुजरी थी कि एक भूखा राष्ट्र अमेरिका को आक्रमणकारी कैसे कह सकता है? गुस्से में अमेरिका ने भारत को खाद्यान्न निर्यात पर पाबन्दी लगा दी। भारत की मुश्किलें बढ़ गईं। इस दौरान एक समय ऐसा आ गया था जब देश में मात्र सात दिनों का खाद्य भंडारण बाकी रह गया था। बढ़ते खाद्य संकट को देखते हुए शास्त्री जी ने देशवासियों से सोमवार को उपवास रखने की अपील की थी। साथ ही देश में खाद्य आत्म-निर्भरता लाने में किसानों की महत्त्वपूर्ण भूमिका को समझाते हुए उन्होंने 'जय जवान जय किसान' का लोकप्रिय नारा उद्घोषित किया था। देश की जनता शास्त्री जी के एक आह्वान पर मुट्ठी बांध ली थी और हरित क्रांति तथा श्वेत क्रांति के रास्ते हमारा देश खाद्य व दुग्ध उत्पादन में इतना आत्मनिर्भर हो गया कि भारत खाद्यान्न का निर्यात करने लगा।

तो ये होती है जनता की सामूहिकता और सरकार की प्रतिबद्धता। आज देश की हालत यह है कि खेत में किसान अपनी जान देने को मजबूर हैं तो सरहद पर जवान आतंकवादियों के हाथों मर रहे हैं। किसान और जवान का इस तरह से मरना किसी भी राष्ट्र की सेहत के लिए बहुत ही खराब स्थिति होती है। अगर किसान नहीं बचे तो देश की 125 करोड़ जनता का पेट कौन भरेगा? सरहद की सुरक्षा में तैनात जवान अगर इसी तरह से आतंकियों के हाथों मरते रहे तो जब चीन या पाकिस्तान हमले कर देगा तो कौन लड़ेगा देश के लिए? और फिर इस हालात में न्यू इंडिया तो बनेगा लेकिन वह कैसा न्यू इंडिया बनेगा इसकी कल्पना से भी रूह कांप जाती है। इसलिए सरकार को यह तय करना होगा कि जिस नए भारत का सपना आजादी के वीर सपूतों ने देखा था उस सपने को साकार करने के लिए, एक नया भारत बनाने के लिए किसान और जवान दोनों की ताकत को बढ़ाना होगा। रोटी, कपड़ा और मकान के बाद शिक्षा का अधिकार, रोजगार की गारंटी, बेहतर स्वास्थ्य सेवा, महिलाओं की सुरक्षा, जातीय संघर्ष को जड़ से मिटाना और सामाजिक सद्भाव ये ऐसे बुनियादी मसले हैं जिसको मजबूती देकर हम एक नए भारत का निर्माण कर सकते हैं। अगर सरकार ऐसा कर सकी तो बाकी की समस्याएं मसलन महंगाई, गरीबी, भ्रष्टाचार, बिचौलिया संस्कृति आदि खुद-ब-खुद सुसाइड कर लेंगे।

लेकिन, राजनीतिक दलों पर पैनी नजर रखने वाली संस्था एडीआर ने कॉरपोरेट फंडिग के जो तथ्य देश के सामने रखे हैं वह इन्हीं राजनीतिक दलों में से बनी सरकार पर सवालिया निशान लगाती है कि क्या ये 'नया भारत' बनाएंगे? रिपोर्ट के मुताबिक, 2014 के आम चुनाव में राजनीतिक दलों को जितना पैसा कॉरपोरेट फंडिंग से मिला उतना पैसा उससे पहले के 10 साल में नहीं मिला। एडीआर के मुताबिक, 2004 से 2013 के बीच कॉरपोरेट ने 460 करोड़ 83 लाख रुपये राजनीतिक दलों को फंडिंग किया। वहीं 2013 से 2015 के बीच कॉरपोरेट ने 797 करोड़ 79 लाख रुपये राजनीतिक दलों को फंडिंग किया। ध्यान रखिएगा कि ये आंकडे सिर्फ राष्ट्रीय राजनीतिक दलों के हैं। यानी भारतीय जनता पार्टी, कांग्रेस पार्टी, एनसीपी और वामपंथी दलो को दिये गये फंड। एडीआर की इस रिपोर्ट से ही ये सच भी निकला है कि 80 फीसदी से ज्यादा कॉरपोरेट फंडिंग भाजपा को मिल रही है। अप्रैल 2012 से अप्रैल 2016 के बीच 956 करोड़ 77 लाख रुपये की कॉरपोरेट फंडिग हुई। इसमें से 705 करोड़ 81 लाख रुपये भाजपा के पास गये। 198 करोड़ 16 लाख रुपये कांग्रेस के पास गये।

यहां जिस पार्टी की सरकार 'न्यू इंडिया' की बात कर रही है उसी पार्टी को सबसे ज्यादा कॉरपोरेट चंदा मिल रहा है तो मेरा सवाल यह कि अगर कॉरपोरेट से इतना चंदा लेकर धन और बल की ताकत पर चुनाव जीतने का खेल जो राजनीतिक दल कर रही है उसकी कीमत भी तो सरकार को इन कॉरपोरेट घरानों को चुकानी होगी। क्योंकि ये कॉरपोरेट घराने चंदा समाजसेवा और जनकल्याण की नीतियों के लिए तो नहीं देते हैं। वो चंदा सिर्फ इसलिए देते हैं क्योंकि जब उस पार्टी की सरकार बनती है तो उससे अपने माफिक नीतियां बनवाकर अत्यधिक मुनाफा कमा सकें। लोकतंत्र में जब चुनाव होते हैं तो मतदाता यह देखता है कि कौन सा राजनीतिक दल और उसका नेता जनहित और देशहित में बेहतर साबित हो सकता है। कहने का मतलब यह कि चुनाव में हार और जीत का आधार उसका काम होता है। लेकिन बदलते भारत में जब चुनाव धनबल की ताकत से लड़ा जाने लगे तो तय मानिए कि देश उल्टी दिशा में चलने लगा है। चुनाव में जीत या हार अगर कॉरपोरेट तय करने लगे तो समझिए देश का विनाश तय है, वक्त जो भी लगे। फिर ये कहने में कोई गुरेज नहीं कि इस हालात में 'न्यू इंडिया' का सपना तो कभी पूरा नहीं होने वाला।

Sunday, 1 October 2017

इन नीतियों से PM मोदी का कोई वास्ता नहीं

इसी साल जून महीने में एक खबर निकलकर आई थी कि मनमोहन सरकार के कार्यकाल में मंत्रियों और सांसदों ने पंचसितारा होटलों के बिल पर 10 साल में 19.77 करोड़ रुपए खर्च किए वहीं वर्तमान मोदी सरकार के मंत्रियों और सांसदों ने पिछले एक साल में ही इन पर 25 करोड़ रुपये खर्च कर दिए। नियमों के मुताबिक, सांसदों को शपथ लेने के दिन से रहने के लिए आवास उपलब्ध कराना सरकार की जिम्मेदारी होती है। अगर आवास न भी उपलब्ध हो तो उन्हें स्टेट गेस्ट हाउस या फिर अशोका, जनपथ या सम्राट जैसे सरकारी होटलों में ठहराया जाता है। ऐसे में मोदी सरकार के मंत्री और हाउस कमेटी के चेयरमैन अर्जुन राम मेघवाल का यह जवाब कि वर्तमान लोकसभा में पहली बार 330 सांसद ऐसे हैं जिनका दिल्ली में कोई आवास नहीं है, ऐसे में होटल्स का बिल बढ़ना स्वभाविक है, बचकाना सा लगता है।

कल्याणकारी राज्य में भरोसा नहीं
दरअसल, मोदी सरकार ऐसी कोई नीति बनाने में भरोसा नहीं रखती जिसके तहत मंत्रियों और सांसदों की सुख-सुविधाओं में कटौती की बात हो। मोदी सरकार अपनी हर नीति में गरीबों के कल्याण की बात करती है, लेकिन यहां भी थोड़ी गहराई में जाकर इसकी छानबीन करें तो पाएंगे कि मोदी सरकार की कोई भी नीति गरीबों के कल्याण के लिए नहीं होती। दरअसल नरेंद्र मोदी कल्याणकारी राज्य की अवधारणा में विश्वास ही नहीं रखते। इस बात का संकेत उन्होंने शुरू में ही मनरेगा का मजाक उड़ाकर दे दिया था। देश के सवा सौ करोड़ भाईयों-बहनों को सरकार ने बीच बाजार में लाकर खड़ा कर दिया जिसकी समझ में ये नहीं आ रहा कि आगे बढूं या पीछे की तरफ लौट जाऊं। क्योंकि आगे कुआं दिख रहा है तो पीछे खाई। विचलित मन:स्थिति के बीच खड़ा जनमानस अपना सब कुछ सरकार को समर्पित कर जिंदगी को दांव पर लगा चुका है।

गरीबों के पैसे से गरीबों की योजनाएं

जनधन योजना इस सरकार के व्यापार का पहला चरण था जब गरीबों की जेब से पैसा निकालकर बैंकों के हवाले किया गया। बतौर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे भी गरीबों के कल्याण की योजना बताई और लोगों ने इसे मान भी लिया। इसके बाद नोटबंदी दूसरा चरण था ताकि ज्यादा से ज्यादा डिजिटल मनी को बढ़ावा मिले और कॉरपोरेट घरानों को अतिरिक्त व्यापार। उनके बाजार का तीसरा चरण जीएसटी के रूप सामने आया और चौथा चरण पेट्रोल और डीजल पर बेहिसाब टैक्स। ऐसी और भी कई स्कीमें हैं जिसे पीएम मोदी ने सफलतापूर्वक लागू किया और इसे गरीबों के कल्याण से जोड़ दिया। जबकि हकीकत में यह बाजार का कंसालिडेशन था।

डिजिटल मनी से पूंजीपतियों की चांदी
अर्थशास्त्र का सिद्धांत कहता है कि एक खुदरा बाजार संगठित व्यापार के लिए हमेशा नुकसानदेह होता है इसलिए बाजार जितना संगठित हो वह व्यापारियों के लिए बहुत मुनाफे का सौदा होता है। जब इस दुनिया में नोट के रूप में करेंसी आयी थी तब उसका भी यही मकसद था कि लोग जिस तरह से आपस में लेनदेन करते हैं उससे बाजार कभी पूंजीपतियों के हवाले नहीं हो पायेगा। डिजिटल मनी उससे भी आगे का कदम है जो बाजार को पूंजीपतियों के हवाले करने में मदद पहुंचाएगा। पहले नोट के कारण बाजार में जो छुटभैये पैदा हो गये थे डिजिटल मनी और जीएसटी उनको साफ कर देंगें।

विपन्न लोगों का संपन्न देश होगा भारत
प्रधानमंत्री मोदी देश में ऐसी आर्थिक नीति लागू कर रहे हैं जिससे देश तो मजबूत होता दिख रहा है लेकिन लोग लगातार कमजोर होते जा रहे हैं। देश की समृद्धि का ग्राफ ऊपर उठेगा लेकिन लोगों की समृद्धि का ग्राफ लगातार नीचे चला जाएगा। देश में एक लाख लखपति पैदा होने की बजाय सौ करोड़पति पैदा हो जाएंगे जिससे ऊपर से देखने पर देश आंकड़ों में बहुत समृद्ध नजर आयेगा, आधारभूत ढांचा भी विकसित होता चला जाएगा लेकिन आम आदमी की मुश्किलें बढ़ती जाएंगी। पहले भारत संपन्न लोगों का विपन्न देश था लेकिन मोदी का कार्यकाल खत्म होते-होते भारत विपन्न लोगों का संपन्न देश बन जाएगा।

बहरहाल, शुरू में जो बातें की गईं कि मोदी राज में मंत्रियों और सांसदों की सुख-सुविधाओं में किसी तरह की कटौती की बात करना सरकार की नीति का हिस्सा नहीं है वह तभी सफल हो पाएगा जब कल्याणकारी राज्य की अवधारणा को कुंद कर देंगे। मोदी सरकार ने बड़े ही होशियारी से गरीबों को नाम पर जनकल्याण योजनाएं बनाकर गरीबों से ही पैसे वसूलकर बैंकों और सरकार के खजाने भर लीं और उसे खुद की सुख सुविधाओं पर खर्च करने में उड़ा रही है या फिर कॉरपोरेट घरानों के कर्जों का सेटलमेंट करने में लगा रही है।