Saturday, 14 October 2017

2019 में रंग लाएगी राहुल की ये तरकीब

लोकसभा चुनाव 2019 के फाइनल की जंग के लिए गुजरात और हिमाचल प्रदेश में सेमीफाइनल का दौर शुरू हो चुका है। खास बात यह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी के बीच गुजरात विधानसभा चुनाव में फाइनल का रिहर्सल भी शुरू हो गया है। गुजरात में जीत और हार जिसकी भी हो, लेकिन ऐसा लगता है कि चुनाव नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी के चेहरे को ही आगे कर लड़ा जा रहा है मानों इन्हीं में से कोई एक गुजरात का मुख्यमंत्री बनने वाले हों। राहुल गांधी के लिए चाहे गुजरात चुनाव हो या फिर लोकसभा-2019 का चुनाव, खोने के लिए कुछ भी नहीं है। कांग्रेस को इन दोनों चुनावों में जो भी हासिल होगा, तय है पहले से बेहतर ही होगा क्योंकि कांग्रेस पार्टी का प्रदर्शन अब और खराब क्या हो सकता है। यह नरेंद्र मोदी और भाजपा के शाह भी जान रहे हैं कि गुजरात और देश दोनों ही स्थानों पर भाजपा नीत सरकार का प्रदर्शन जनता के मनोनुकूल नहीं दिख रहा है। इस बीच कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी और कांग्रेस पार्टी ने चुनावी शतरंज की बिसात पर कुछ ऐसी चालें चली हैं जिससे नरेंद्र मोदी की भाजपा गुजरात विधानसभा और लोकसभा चुनाव में चारों खाने चित्त हो जाए तो कोई आश्चर्य नहीं।

सोशल मीडिया अबकी राहुल के लिए वरदान
सोशल मीडिया का जो प्लैटफॉर्म 2014 के लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी और भाजपा के लिए वरदान साबित हुआ वहीं सोशल प्लैटफार्म गुजरात विधानसभा चुनाव और लोकसभा चुनाव 2019 में नरेंद्र मोदी और भाजपा के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन चुका है। 'विकास पागल हो गया है' हैशटैग ने भाजपा कैंप में खलबली मचा रखी है। ऊपर से बेरोजगारी, नोटबंदी, जीएसटी और रियल एस्टेट रेगुलेशन डिवेलपमेंट ऐक्ट ने पूरे देश में मंदी का माहौल बनाया है और इसमें सोशल मीडिया ने कांग्रेस के पक्ष में जबरदस्त तरीके से माहौल बनाया है। अगर आपको याद हो तो 2014 में नरेंद्र मोदी ने जिस विकास के मुद्दे को चुनाव जीतने का हथियार बनाया था उसमें सोशल मीडिया ने अहम भूमिका निभाई थी और वही विकास आज अगर पागल हो गया है तो लोगों का भाजपा और नरेंद्र मोदी से मोह भंग होना स्वाभाविक है क्योंकि सवाल पूछने वाले तो पूछेंगे कि नरेंद्र मोदी में इतनी भी प्रशासनिक क्षमता नहीं कि विकास को तीन साल भी ठीक से संभाल नहीं पाए। कहने का मतलब यह कि नरेंद्र मोदी ने 2014 में सत्ता पाने के लिए विकास शब्द का इस्तेमाल किया और लोगों ने उसपर भरोसा किया। यह सब कुछ हवा में एक जुमले की तरह था। इसकी कोई वास्तविक हैसियत नहीं थी, लेकिन आज की तारीख में कांग्रेस और राहुल गांधी सोशल मीडिया पर जिस तरह से विकास को लेकर मोदी सरकार पर हमले कर रहे हैं वो एक सच्चाई है ना कि जुमला। देश की जनता को यह मसहूस हो रहा है कि राहुल जो बात कर रहे हैं वह हमारा वर्तमान है। इसलिए संभव है 2019 आते-आते 'विकास' इतना पागल हो जाए कि 125 करोड़ लोगों की ताकत वाला देश 'विकास' का पागलपन ठीक करने की जिम्मेदारी राहुल गांधी की कांग्रेस को सौंप दे।

राहुल का नरम हिन्दुत्व कार्ड भी मोदी पर भारी
गुजरात विधानसभा चुनाव के लिए कांग्रेस पार्टी ने राज्य में जब चुनाव अभियान की शुरुआत राहुल गांधी के जरिए की तो उन्होंने सबसे पहले द्वारकाधीश में जाकर पूजा-अर्चना की। श्रीकृष्ण के चरणों में शीश झुकाकर माथे पर तिलक लगाए अपनी तस्वीरें सोशल मीडिया पर शेयर कीं। गुजरात दौरे के दरम्यान वह तमाम दूसरे मंदिरों में भी गए और आने वाले दिनों में भी इस काम को करते रहने की योजना है। दरअसल यह राहुल की कांग्रेस की रणनीति का दूसरा हिस्सा है। हाल के वर्षों में कांग्रेस पर जो सबसे बड़ा आरोप लगा था वह यही था कि यह पार्टी अल्पसंख्यकों का तुष्टिकरण करती है। यह आरोप गुजरात में भारी ना पड़े इसलिए राहुल गांधी के जरिये कांग्रेस ने नरम हिंदुत्व का दांव खेला है। नरेंद्र मोदी की भाजपा इससे बेहद घबराई हुई है। क्योंकि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ खुद का हिन्दुत्व का सबसे बड़ा झंडाबरदार मानता है। आरएसएस को लगता है कि हिन्दुत्व पर उनका पेटेंट है और हिन्दुत्व की राजनीति करने का अधिकार सिर्फ भारतीय जनता पार्टी के पास है। लेकिन आरएसएस और भाजपा की दिक्कत यह है कि ये लोग कट्टर हिन्दुत्व की राजनीति करने लगे जो 125 करोड़ की जनता को पसंद नहीं। 2014 में लोगों ने मोदी की भाजपा को वोट इसलिए किया था कि मोदी सरकार हिन्दुत्व को विकास से जोड़कर जीने का एक बेहतरीन हथियार हर भारतवासी के हाथों में सौपेंगे, लेकिन तीन साल में ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। बड़ी साफ सी बात है कि कट्टरता किसी भी चीज में अच्छी नहीं होती तो फिर हिन्दुत्व के लिए कैसे अच्छी हो सकती। राहुल गांधी ने इसीलिए चुपके-चुपके नरम हिन्दुत्व का कार्ड खेल दिया है और आगे आने वाले दिनों में इस और मजबूती से पेश किया जाएगा।

राहुल की साफगोई से मोदी हो जाएंगे चित्त!
लाखों लोगों के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी किसी भी मुद्दे को घुमा-फिरा कर इस तरह से पेश करते हैं कि जुमला भी सच जैसा लगने लगता है। देश और दुनिया में घूम-घूम कर नरेंद्र मोदी ने इस बात को स्थापित करने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी कि पिछले 70 वर्षों में देश में कोई काम नहीं हुआ। लेकिन अब जब कि कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी भी देश-दुनिया में घूम-घूम कर मोदी सरकार के साथ-साथ कांग्रेस समेत देश की तमाम सरकारों की बात कर रहे हैं तो अमेरिका से लेकर गुजरात तक लोग कहने लगे हैं कि राहुल की साफगोई का कोई जवाब नहीं। अभी हाल ही में राहुल जब अमेरिकी दौरे पर कैलिफोर्निया और प्रिंसटन विश्वविद्यालय में छात्रों से बात की और कई इंटरव्यू दिए तो पश्चिमी मीडिया ने माना कि राहुल अपने देश भारत की जमीनी हकीकत को नरेंद्र मोदी के मुकाबले बेहतर तरीके से समझते हैं। राहुल की छवि इस रूप में सामने आई कि वह कांग्रेस के गुलाम नहीं हैं। बेरोजगारी के मुद्दे पर राहुल ने कांग्रेस को भी उतना ही दोषी ठहराया जितना मोदी सरकार को। गुजरात और हिमाचल प्रदेश में आगामी विधानसभा चुनाव के प्रचार के दौरान भी राहुल मोदी सरकार की आलोचना तो कर रही रहे हैं, साथ ही कांग्रेस को भी क्लीनचिट नहीं दे रहे। कुल मिलाकर कांग्रेस जनता के बीच राहुल गांधी की छवि कुछ इस तरह का बनाना चाहती है कि राहुल सीधा सोचते हैं। उनकी सोच और नीति में किसी तरह की राजनीति नहीं, जुमलेबाजी नहीं। मोदी की सत्ता इस बात से डरी हुई है कि अगर लोगों के दिल और दिमाग में यह बात घर कर गई कि नरेंद्र मोदी नीत भाजपा की सरकार सिर्फ चुनाव जीतने की राजनीति करती है जुमलों के जाल में फंसाकर तो फिर क्या होगा?

बहरहाल, नरेंद्र मोदी और भाजपा के मुकाबले राहुल गांधी और कांग्रेस की चुनावी रणनीति और नई-नई चालें जारी रहीं तो देश में बड़ा राजनीतिक उलटफेर हो सकता है। 2014 और 2019 के लोकसभा चुनाव में फर्क को समझने की जरूरत है। हमें इस बात को स्वीकार करना होगा कि 2014 में जब नरेंद्र मोदी चुनाव के मैदान में उतरे थे तो तब देश में कांग्रेस की सत्ता थी और वो भी 10 साल से। मोदी के हाथ 'विकास' का अमोघ अस्त्र हाथ लग गया था जिसके कंधे पर बैठकर वो नैया पार कर गए। लेकिन आज परिस्थितियां बिलकुल उलट है। जिस विकास को आगे कर नरेंद्र मोदी ने जनता से सैकड़ों वादे कर सत्ता संभाली उसे डिलीवर करने की जब बारी आयी तो भाजपा के नेता व कार्यकर्ता यह कहकर बचकानी हरकत करने लगे कि वो तो जुमला था। चाहे वह कालाधन को विदेश से लाने की बात हो, हर साल 2 करोड़ लोगों को रोजगार देने का हो, महंगाई कम करने का हो हर मोर्चे पर सरकार पिछड़ती नजर आ रही है। ऊपर से नोटबंदी और जीएसटी की मार ने आम आदमी और व्यापारी वर्ग की कमर तोड़ दी है। तो ऐसे में राहुल गांधी के लिए 2019 का चुनाव इस मायने में आसान हो गया है कि 2014 की मोदी की लाठी से ही राहुल की कांग्रेस के लिए मोदी की भाजपा को चारों खाने चित्त करने का अवसर है।

No comments: