Monday, 30 September 2019

लालू यादव के कुनबे में ये कैसी जंग?

एक तरफ जहां बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और राष्ट्रीय जनता दल के संस्थापक लालू प्रसाद यादव इन दिनों जेल में जीवन से संघर्ष कर रहे हैं, वही दूसरी तरफ उनके घर में सास, बहू और ननद यानी राबड़ी देवी, ऐश्वर्या राय और मीसा भारती के बीच घमासान मचा हुआ है। हालांकि घटनाक्रम के तहत यह जानकारी निकलकर आई है कि सुलह हो गई है और बहू ऐश्वर्या को राबड़ी ने घर में एंट्री दे दी है लेकिन ऐसा पहले भी हो चुका है और इस बात की कोई गारंटी नहीं कि आगे इस तरह का कोई विवाद नहीं होगा।

दरअसल, पिछले साल मई में लालू के बड़े लाल तेजप्रताप और चंद्रिका राय की बेटी व दरोगा राय की पोती ऐश्वर्या की शादी पटना में हुई थी। शादी के महज पांच महीने बाद ही तेजप्रताप ने कोर्ट में तलाक की अर्जी दे दी। इसके बाद दोनों परिवारों के बीच सुलह कराने की कोशिशें की गईं। दोनों ही पक्षों की तरफ से कहा गया कि घर में सबकुछ ठीक है और परिवार के लोग इस मामले को बैठकर सुलझा लेंगे। लेकिन तेजप्रताप से जब भी इस बारे में मीडिया ने सवाल पूछा तो उन्होंने साफ कहा कि वे तलाक लेकर रहेंगे। इस मामले में वे अपने परिवार की बात भी नहीं सुनेंगे। यहीं आकर मामला बिगड़ गया है और अब तो राबड़ी और मीसा भी खुलकर तेजप्रताप के समर्थन में आ गईं हैं। ऐश्वर्या का कहना है कि वह अपने ससुराल में रहना चाहतीं हैं और अपने रिश्ते को बचाना चाहती हैं लेकिन मीसा भारती के बहकावे में आकर पति तेजप्रताप ने बातचीत करना बंद कर दिया। मुझे इस घर में जून से खाना तक नहीं मिल रहा है। मेरी मां अपने घर से खाना भेजती हैं।

एक सशक्त राजनीतिक परिवार के घर से इस तरह की कहानी का सार्वजनिक होना मुझे लगता है इकलौता मामला है और तय मानिए यह कहानी राष्ट्रीय जनता दल को ठीक उसी तरह से डुबो देगी जिस तरह से आज की तारीख में कुदरत के कहर ने नीतीश के सुशासन को डुबो दिया है। याद कीजिए, लालू प्रसाद यादव ने किस तरीके पार्टी को खड़ा किया था और किस तरह से वो अपनी सियासी चतुराई से पटना से लेकर दिल्ली तक की सत्ता को अपनी अंगुली पर नचाते थे। आज जब वह चारा घोटाला केस में अपने कर्मों का फल जेल की सजा के रूप में भुगत रहे हैं, पार्टी के अस्तित्व पर तो सवालिया निशान लग ही रहे हैं, परिवार भी बिखराव से बचता नजर नहीं आ रहा है। परिवार से लेकर पार्टी तक बिन लालू सब खत्म दिख रहा है।

दरअसल, लालू के बड़े लाल तेजप्रताप और दरोगा राय की बेटी ऐश्वर्या की शादी को शुरू से एक बेमेल रिश्ता बताया जा रहा था। लेकिन दोनों परिवारों ने किसी की एक नहीं सुनी और शादी हो गई। जब शादी हो गई तो नतीजा सामने आना ही था। अब सवाल यह उठता है कि दिल्ली यूनिवर्सिटी से काफी पढ़ी लिखी ऐश्वर्या ने यह जानते हुए कि 12वीं पास तेजप्रताप उसके मुकाबले काफी कम पढ़ा-लिखा है, शादी करने को क्यों तैयार हो गई? यह काफी अहम सवाल है और इस सवाल का जवाब ही इस पूरे फैमिली ड्रामे की जड़ में है। ऐश्वर्या उस दरोगा राय की पोती है जो 16 फरवरी 1970 से 22 दिसंबर 1970 तक बिहार के मुख्यमंत्री रहे थे। ऐश्वर्या की अपनी महत्वाकांक्षा है और निश्चित रूप से लालू के बेटे से शादी करने के पीछे भी वही राजनीतिक महत्वाकांक्षा रही होगी। लेकिन शादी के बाद जब चीजें खुलीं तो सबके कान खड़े हो गए। जेल जाने से पहले लालू ने अपनी राजनीतिक विरासत अपने छोटे बेटे तेजस्वी को सौंप दी थी। ऊपर से मीसा भारती भी राजनीतिक रूप से काफी सक्रिय हैं और वर्तमान में वह राज्यसभा सांसद हैं। 

कहने का मतलब यह कि जिस परिवार में लालू यादव के बाद तेजस्वी यादव, मीसा भारती, खुद राबड़ी देवी तीन-तीन लोग विरासत को संभालने में पसीना बहान रहे हैं वहां ऐश्वर्या की कितनी दाल गलेगी। बहुत संभव था, लालू प्रसाद यादव अगर जेल नहीं गए होते तो बहू ऐश्वर्या के राजनीतिक भविष्य को लेकर कोई तरकीब निकालते। लेकिन उनकी गैरमौजूदगी में हर किसी को यह भय सता रहा है कि ऐश्वर्या की इस घर में स्थापित कर कहीं राष्ट्रीय जनता दल को हथिया न ले। हालांकि अभी तक ऐश्वर्या की ऐसी कोई राजनीतिक महत्वाकांक्षा सार्वजनिक तौर पर सामने नहीं आई है लेकिन चूंकि जिस राजनीतिक परिवार से ऐश्वर्या आती हैं उसका असर तो मिटाए नहीं मिटेगा।

Sunday, 29 September 2019

पूरे देश की नब्ज टटोलेंगे ये चुनाव

आर्थिक मंदी, राष्ट्रवाद और भावनात्मक मुद्दों की पृष्टभूमि में आगामी 21 अक्टूबर को होने जा रहे महाराष्ट्र और हरियाणा विधानसभा चुनाव तथा देश के 18 राज्यों की 64 विधानसभा सीटों पर उपचुनाव को कम आंकना राजनीतिक लिहाज से बड़ी गलती होगी। ये चुनाव काफी अहम हैं। अहम इसलिए क्योंकि दोनों राज्यों में भाजपा की सरकार है और वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में इन चुनावों के नतीजे निश्चित रूप से इस बात का अहसास कराएंगे कि राष्ट्रवाद की बयार में अर्थनीति का राजनीति पर कितना व कैसा असर होता है।

2019 के लोकसभा चुनाव में मोदी और शाह की लीडरशिप में देश के मतदाताओं ने जिस तरह का जनादेश भारतीय जनता पार्टी को दिया, उसके बाद से तमाम सियासी पंडितों की जुबान पर जैसे ताला सा लग गया है। कुछ भी बोलने और बताने की जहमत नहीं उठा रहे। उस वक्त तो सिर्फ बालाकोट ही था। अब जब महाराष्ट्र और हरियाणा के चुनाव होने जा रहे हैं तो यह कश्मीर में धारा 370 और मुस्लिम महिलाओं के लिए तीन तलाक जैसे राष्ट्रवाद और भावनात्मक मुद्दों की पृष्टभूमि में लड़ा जा रहा है। जाहिर है तमाम विश्लेषकों को यह मानने में हिचक नहीं हो रही कि कमल को खिलने से कोई नहीं रोक सकता है। 

दोनों राज्य में होने जा रहे चुनाव कई मायनों में बेहद खास हैं, लेकिन इस चुनाव का मतलब सिर्फ इन दो राज्यों की सरकार का भविष्य नहीं है। दिवाली के दो दिन पहले 24 अक्टूबर को जो नतीजे आएंगे वो ऐसे बहुत से सवालों का जवाब देगें जिनपर पूरे देश की निगाहें टिकी हैं। ये चुनाव इसलिए भी खास है क्योंकि 2019 के लोकसभा चुनाव के बाद ये पहला चुनाव है और वह भी ऐसे दौर में हो रहा है जब देश आर्थिक मंदी के दंश को भी झेल रहा है। निश्चित रूप से इन चुनावों में अर्थनीति को राजनीति कितना प्रभावित करती है इसकी झलक भी दिखेगी। यह चुनाव सियासी गठबंधनों पर भी अपनी छाप छोड़ेगी और नतीजे राजनीतिक प्राथमिकताओं की दशा और दिशा तो तय करेंगे ही साथ ही राष्ट्रीय राजनीति का मार्ग भी तय करने में अहम भूमिका निभा सकते हैं। ये चुनाव इसलिए भी अहम हैं क्योंकि इसके साथ 18 राज्यों की 64 सीटों पर विधानसभा उपचुनाव भी होने हैं। इनमें कर्नाटक की 15 सीटें, उत्तर प्रदेश की 11, बिहार की 5, केरल की 5, असम की 4, गुजरात की 4, पंजाब की 4, सिक्किम की 3, हिमाचल प्रदेश की 2, राजस्थान की 2, तमिलनाडु की 2, अरुणाचल प्रदेश, छत्तीसगढ़, तेलंगाना, मध्यप्रदेश, मेघालय, ओडिशा, पुडुचेरी की एक-एक सीटें शामिल हैं। इतने राज्यों से जो जनादेश आएंगे वो पूरे देश की जमीनी हकीकत को दर्शाएंगे।

आर्थिक लिहाज से अगर आंकलन करें तो इसमें कोई दो राय नहीं कि मुंबई की पहचान देश के बिजनेस कैपिटल के रूप में है, लेकिन देश की अर्थव्यवस्था के लिहाज से भी महाराष्ट्र काफी अहम है। देश की जीडीपी में महाराष्ट्र की हिस्सेदारी जहां 14 प्रतिशत की है वहीं हरियाणा की हिस्सेदारी 3.7 प्रतिशत है। कंपनियों के निवेश की वजह से प्रति व्यक्ति आय में भी ये शीर्ष राज्यों में शामिल हैं। ऐसी परिस्थिति में 288 सीटों के लिए महाराष्ट्र के 8.96 करोड़ मतदाता और 90 सीटों के लिए हरियाणा के 1.83 करोड़ मतदाताओं का मूड मायने रखता है। देश की अर्थव्यवस्था में मंदी का दौर और बढ़ती बेरोजगारी इस चुनाव पर कितना असर डालेगा, यह काफी महत्वपूर्ण है। आर्थिक मंदी की बात करें तो यह सुस्ती जिस ऑटो सेक्टर में सबसे ज्यादा है उसका सबसे बड़ा केंद्र भी इन्हीं दोनों राज्यों में है। आंकड़ों पर गौर करें तो दो तिहाई कारें हरियाणा में बनती हैं। मारुति ने गुरुग्राम और मानेसर में जिन प्लांटों में उत्पादन बंदी दिवस मनाने की घोषणा की है वे भी यहीं हैं। महाराष्ट्र में भी कई ऑटोमोबाइल कंपनियों के प्लांट बेहाल हैं। व्यापक बेरोजगारी के लिहाज से हरियाणा की स्थिति अच्छी नहीं है। 

जहां तक सियासी दलों के बीच गठबंधनों और अपनी-अपनी हैसियत आंकने की बात है तो वह भी इस चुनाव के नतीजे तय करेंगे। शरद पवार और उनकी राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के साथ ही ओमप्रकाश चौटाला की इंडियन नेशनल लोकदल की राजनीति के लिए भी यह चुनाव निर्णायक साबित होगा। भाजपा और शिवसेना को भी यह चुनाव बताएगा कि महाराष्ट की राजनीति में कौन बड़ा भाई है और कौन छोटा भाई। दोनों राज्यों में सक्रिय लगभग आधा दर्जन छोटी पार्टियां किसी समय किस दल के साथ चली जाएं यह कहना मुश्किल है। अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी का भी दिल्ली से बाहर अपनी ताकत का अहसास हरियाणा चुनाव से हो जाएगा।

बहरहाल, नरेंद्र मोदी और अमित शाह की अगुआई में भाजपा ने जो नई राजनीति विकसित की है वह हर जगह पारंपरिक समीकरणों को तोड़कर खेल के नियम बदल देने में यकीन रखती है। चाहे वह मुख्यमंत्री की घोषणा का मसला हो, अधिकांश मौजूदा विधायकों के टिकट काटने का मसला हो, चुनावी मैदान में मुद्दों को डायवर्ट करने का मसला हो, राष्ट्रवाद को किस तरह से भुनाया जाए इसका मसला हो या कुछ और। अब इन तमाम रणनीतियों के बीच किस तरह का जनादेश निकलकर आता है ये तो आगामी 24 अक्टूबर को ही पता चलेगा लेकिन इतना तो तय है कि यह चुनाव काफी रोमांचक और राजनीति की दशा व दिशा को तय करने वाला होगा। 

Saturday, 28 September 2019

भारत को अमेरिका भी चाहिए और ईरान भी

अमेरिका यात्रा के अंतिम चरण में 26 सितंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब ईरान के राष्ट्रपति हसन रूहानी से मिले तो अमेरिका की इसपर खास नजर रही होगी क्योंकि यह बैठक तेहरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर ईरान और अमेरिका के बीच तनाव की पृष्ठभूमि में हुई। असल में ईरान पर सऊदी अरब के दो प्रमुख तेल संयंत्रों पर हमला करने का आरोप है जिसके बाद से क्षेत्र में नए सिरे से तनाव बढ़ गया है। हालांकि मोदी-रूहानी वार्ता का ज्यादा खुलासा तो नहीं किया गया, लेकिन पीएमओ ने ट्वीट कर इतना जरूर बताया कि दोनों नेताओं ने द्विपक्षीय संबंधों पर चर्चा की और साझा हितों के क्षेत्रीय और वैश्विक विकास पर अपने-अपने विचार साझा किए। विदेश मंत्रालय के एक बयान के अनुसार, दोनों नेताओं ने विशेष रूप से चाबहार बंदरगाह के परिचालन का उल्लेख किया और अफगानिस्तान तथा मध्य एशियाई क्षेत्र तक आने-जाने के लिए एक गेटवे के तौर पर इसकी भूमिका की महत्ता पर जोर दिया।

दरअसल, कश्मीर के मुद्दे पर जिस तरह से पाकिस्तान तमाम मुस्लिम देशों के समक्ष अपना रोना रो रहा है उस परिस्थिति में भारत के लिए जितना जरूरी अमेरिका है उससे कहीं अधिक जरूरी ईरान का साथ होना है। भारत-ईरान के बीच कूटनीतिक संबंधों के पन्नों को पलटें तो आप पाएंगे कि अगले साल यानी 2020 में दोनों देश दोस्ती के 70 वर्ष का जश्न मनाएंगे। इसे बड़ी उपलब्धि के तौर पर देखा जा रहा है और प्रधानमंत्री मोदी तथा राष्ट्रपति रूहानी ने ताजा बैठक में कूटनीतिक संबंधों की 70वीं वर्षगांठ मनाने पर सहमति भी जताई है। 

पिछले कुछ वर्षों में भारत और ईरान के संबंध और बेहतर हुए हैं। प्रधानमंत्री मोदी ने ईरान और पश्चिम एशिया के साथ भारत के संबंधों को विस्तार देने के लिए मई 2016 में तेहरान का दौरा किया था। फरवरी 2018 में रूहानी ने भी भारत का दौरा किया था। कहने का मतलब यह कि भारत और ईरान की दोस्ती में अगर अमेरिका किसी तरह का विध्न पैदा करता है तो यह अंतरराष्ट्रीय कूटनीति का जो सिद्धांत है उसकी अवहेलना होगी। हालांकि अमेरिका निश्चित रूप से इस तरह की कोशिश से बाज नहीं आएगा कि भारत दुनिया के मंच पर ईरान का साथ ना दे, लेकिन इस परिस्थिति में भारत को यह बताने और जताने की कोशिश करनी होगी कि भारत जैसे विकासशील राष्ट्र के लिए सबका साथ जरूरी है।  

भारत के बारे में यह तथ्य सार्वजनिक है कि यह दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल उपभोक्ता देश है और अपनी तेल जरूरतों का करीब 80 प्रतिशत आयात से पूरा करता है। हाल तक इराक और सऊदी अरब के बाद ईरान भारत का तीसरा सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता देश था। ईरान से तेल खरीदने के लिए अमेरिका की ओर से भारत और अन्य सात देशों को मिली छह महीने की छूट की मियाद 2 मई 2019 को खत्म हो गई थी क्योंकि व्हाइट हाउस ने इसे आगे बढ़ाया नहीं। दरअसल अमेरिका दुनिया का सबसे बड़ा तेल निर्यातक देश है। वह नहीं चाहता कि कोई देश ईरान से तेल आयात करे। लेकिन तेल आयातक देशों की मजबूरी यह है कि अमेरिकी तेल की कीमतें ईरान के तेल की कीमतों से काफी महंगी है। अंतरराष्ट्रीय कानून के हिसाब से तेल के खेल में अमेरिका की पूरी दुनिया में तूती बोलती है और वह जब चाहे, ईरान या अन्य तेल निर्यातक देशों से तेल खरीदने को लेकर अन्य देशों पर प्रतिबंध लगा दे।

बहरहाल, भारत के लिए यह जरूरी है कि वह अमेरिका और ईरान के बीच संतुलन बनाए रखने की हर तरकीब को अपनाए। न तो हम अमेरिका के साथ उस हद तक आगे बढ़े जो ईरान का नागवार गुजरे और न ही ईरान के साथ ऐसी कोई बात करें जो अमेरिकी संबंधों पर असर पड़े। अमेरिका के लिए भारत इसलिए जरूरी है क्योंकि यह दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक देश है, लेकिन भारत के लिए ईरान इसलिए जरूरी है कि वह हमें सस्ता तेल तो देता ही है। साथ ही वैश्विक मंच पर उसका साथ मिलने से पाकिस्तान की नापाक कोशिशों को विफल करने में मदद मिलती है। ऐसे भी सात दशक की दोस्ती को अमेरिका की कीमत पर किनारे नहीं कर सकते हैं।

Friday, 27 September 2019

सिर्फ एक नौटंकी और पवार बन गए राजनीति के भीष्म पितामह

राष्ट्रवादी कांग्रेस के अध्यक्ष शरद पवार
महाराष्ट्र और भारतीय राजनीति के कद्दावर नेता शरद पवार ऐसे तो किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं, लेकिन शिवसेना के वरिष्ठ नेता संजय राउत ने चुनावी सत्ता संग्राम के बीच शरद पवार को 'राजनीति का भीष्म पितामह' कहकर नई बहस को जन्म दे दिया। उन्होंने पवार को एक नई परिभाषा में गढ़ने का प्रयास किया है, वो भी ऐसे वक्त में जब महाराष्ट्र स्टेट को-ऑपरेटिव बैंक घोटाले में प्रवर्तन निदेशालय ने उन्हें एक आरोपी के तौर पर शामिल किया गया है। सवाल यह उठता है कि शिवसेना ने शरद पवार के बारे में ऐसा बयान क्यों दिया? क्या यह बयान किसी सोची-समझी रणनीति का हिस्सा तो नहीं है? कुछ भी हो सकता है, चुनाव का मौसम जो है।

दरअसल, बैंक घोटाले में प्रवर्तन निदेशालय ने शरद पवार को जब से घसीटना शुरू किया है तब से शरद पवार की राजनीति में एक नई चमक आ गई है। दो दिन पहले जब उन्होंने एक प्रेस कांफ्रेंस आयोजित कर यह कहा कि दिल्ली की तख्त के आगे महाराष्ट्र नहीं झुकेगा तो इस एक बयान से उन्होंने महाराष्ट्र और मराठा राजनीति का दिल जीत लिया। ईडी के एफआईआर को एक साजिश करार देते हुए एनसीपी सुप्रीमो ने कहा कि दिल्ली के तख़्त के आगे महाराष्ट्र कभी नहीं झुकेगा। महाराष्ट्र का हर मराठा छत्रपति शिवाजी महाराज के संस्कारों से चलता है। केंद्र की एनडीए सरकार को चुनौती देते हुए पवार ने कहा कि मुझे बाबा साहेब आंबेडकर के संविधान पर भरोसा है। जिस बैंक घोटाले की बात की जा रही है उस बैंक में मैं कभी किसी पद पर नहीं रहा। बावजूद इसके ईडी की जांच में मैं पूरा सहयोग करूंगा। शरद पवार ने इस एक बयान और एक ऐलान से पूरी राजनीतिक फिजां ही बदल दी। इसका अहसास किसी और को भले ही न हो लेकिन शिवसेना इस बात को समझ गई और पवार के नहले पर दहला मारकर संजय राउत ने यह कहकर मराठा आक्रोश को कम करने का प्रयास किया कि शरद पवार तो राजनीति के भीष्म पितामह हैं। पूरा महाराष्ट्र जानता है कि जिस बैंक घोटाले को लेकर ईडी ने एफआईआर में नाम दर्ज किया है, उस बैंक में शरद पवार किसी भी पद पर नहीं रहे हैं। संजय राउत ने केंद्रीय एजेंसी प्रवर्तन निदेशालय पर भी हमला किया और कहा कि ईडी तो आज भगवान से भी बड़ी हो गई है। भगवान माफ कर सकते हैं लेकिन ईडी नहीं करती। ईडी ने पवार के साथ गलत किया है। कुल मिलाकर शिवसेना ने शरद पवार को क्लीनचिट दे दी।

संजय राउत की इस टिप्पणी से कुछ और भले ही न हो, लेकिन इतना तो तय मानिए कि मराठा राजनीति का जो खेमा वर्तमान में शिवसेना के साथ है उसमें सेंध लगते-लगते रह गया। इस बात में कोई दो राय नहीं कि भारतीय राजनीति के कद्दावर नेता माने जाने वाले शरद पवार के तारे इन दिनों गर्दिश में चल रहे हैं। उनकी पार्टी का लगातार गिरता प्रदर्शन, पुराने व भरोसेमंद नेताओं का पार्टी छोड़कर जाना और अब घोटाले में नाम आना इस बात को साबित करने के लिए काफी है कि इस वक्त पवार अपने करीब पांच दशक के सियासी करियर के सबसे नाजुक दौर से गुजर रहे हैं। बावजूद इसके 78 साल की उम्र में भी कोई यह अंदाजा नहीं लगा सकता कि शरद पवार के दिमाग में इस वक्त क्या चल रहा है। सियासी पंडित उनके बारे में बड़ा ही एक खास लफ्ज़ इस्तेमाल करते हैं कि 'पवार जो बोलते हैं वो करते नहीं और जो करते हैं वो बोलते नहीं।' पीएम मोदी तक खुले तौर पर इस बात का बहुत पहले  ऐलान कर चुके हैं कि पवार उनके राजनीतिक गुरु हैं। तीन बार महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री, केंद्र में रक्षा मंत्री और कृषि मंत्री रहे। राजनीति से बाहर क्रिकेट के मैदान में आईपीएल जनक के तौर पर भी उन्हें देखा जाता है। आज भी मराठा राजनीति में उनकी गहरी पैठ है और सियासी मिजाज को कब और कैसे मोड़ दें कोई नहीं जानता। 

बहरहाल, शरद पवार ने प्रवर्तन निदेशालय के समक्ष पेश होकर जांच में सहयोग देने का जो एक सियासी ड्रामा खेलने का प्रयास किया था वह विशुद्ध रूप से मराठा राजनीति में एक हलचल पैदा करने का एक जरिया था। इसमें बहुत हद तक पवार सफल भी रहे और बाद में कानून-व्यवस्था का हवाल देकर वह ईडी दफ्तर में पेश होने का इरादा बदल दिया। इस एक राजनीतिक नौटंकी भर से पवार राजनीति के भीष्म पितामह तक तो पहुंच ही गए। आने वाले वक्त में बैंक घोटाले को लेकर मोदी सरकार शिवसेना के संदेश और पवार की चाल को भांपकर ही कोई अगला कदम उठाएगी। अमित शाह निश्चित रूप से इस मामले को चुनाव तक टालना चाहेंगे क्योंकि इतना तो अंदाजा मोदी सरकार को लग ही गया होगा कि पवार झुकने वाले नहीं हैं। अगर वो अपने पर आ गए तो किसी भी हद तक जा सकते हैं। सरकार के दबाव में ईडी ने पवार को भी अगर सलाखों के पीछे पहुंचा दिया तो महाराष्ट्र चुनाव में लेने के देने पड़ जाएंगे।

Thursday, 26 September 2019

अमेरिका और ट्रम्प पर भरोसा मत करना साहेब

भारत और पाकिस्तान के बीच कश्मीर मसले पर मध्यस्थता को लेकर एक बार फिर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने तान छेड़ी है। अगर आप गिनना शुरू करें तो ट्रम्प ने छठी बार मध्यस्थता की बात की है। याद करें तो पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान की अमेरिका यात्रा के दौरान ट्रम्प ने 22 जुलाई को पहली बार मध्यस्थता की पेशकश की थी। फिर यही प्रस्ताव 2 अगस्त, 23 अगस्त और 10 सितंबर को दोहराया था। और खास बात यह भी कि भारत की तरफ से हर बार ट्रम्प की पेशकश को ठुकराया गया। खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जी-7 शिखर सम्मेलन में ट्रम्प से मुलाकात के दौरान कश्मीर मुद्दे पर तीसरे पक्ष के हस्तक्षेप को गैरजरूरी बताया था। संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस में मोदी ने ट्रम्प के सामने कहा था कि कश्मीर का मुद्दा भारत और पाकिस्तान का द्विपक्षीय मसला है और हम दुनिया के किसी भी देश को बीच में नहीं लाना चाहते हैं। 

संयुक्त राष्ट्र महाअधिवेशन सत्र को संबोधित करने के बाद बुधवार को ट्रम्प जब प्रेस कांफ्रेंस को संबोधित कर रहे थे तो भारत और पाकिस्तान के संदर्भ में पाकिस्तान का जिक्र उठा। फिर क्या था, ट्रम्प के दिमाग में स्क्रिप्ट पहले से ही फीड हो रखी थी। बोल पड़े- भारत और पाकिस्तान के संबंध में हमने कश्मीर के बारे में बात की और मैं जो भी मदद कर सकता हूं, उसकी मैंने पेशकश की और वह मदद मध्यस्थता है। मैं जो कर सकता हूं वह करूंगा, क्योंकि दोनों बहुत गंभीर मोड़ पर हैं। ट्रम्प ने कहा, यदि आप दोनों लोगों (मोदी-इमरान) की तरफ देखें तो वे दोनों मेरे बहुत अच्छे मित्र हैं। मैंने दोनों मित्रों से कहा कि इसे बस सुलझा लें क्योंकि वे दोनों परमाणु शक्ति संपन्न भी हैं। ट्रम्प के इस बयान पर गौर कीजिए- उन्होंने मोदी के साथ-साथ इमरान को भी अच्छे मित्र की उपाधि से विभूषित किया है और परमाणु संपन्न राष्ट्र का टैग भी लगाया। ट्रम्प के इस भाव को समझना भारत और भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए बेहद जरूरी है क्योंकि पीएम मोदी राष्ट्रपति ट्रम्प को अपना दोस्त मानते हैं तो फिर हमारा दुश्मन नंबर एक पाकिस्तान हमारे दोस्त अमेरिका और ट्रम्प का अच्छा दोस्त कैसे हो सकता है? है ना कहानी में बड़ा झोल।

दरअसल, अमेरिका के बारे में यह बात जगजाहिर है कि दुनिया में उसका न कोई दोस्त है और न कोई दुश्मन। वह तो देश छोड़िए, आतंकवादी संगठनों को भी दूध पिलाता है, फिर मतलब निकल जाने पर ठिकाने लगा देता है। ओसामा बिन लादेन के बारे में तो आपको पता होगा ही। अभी पिछले ही दिनों अमेरिकी थिंक टैंक काउंसिल ऑन फॉरेन रिलेशंस (सीएफआर) में इमरान खान ने कहा कि 11 सितंबर 2001 को अमेरिका के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हमले से पहले अलकायदा के आतंकियों को पाकिस्तानी सेना और आईएसआई ने मिलकर ट्रेनिंग दी थी। अल कायदा को ट्रेनिंग देने की बात इमरान ने कह तो दी लेकिन होशियारी से इसका दोष भी अमेरिका पर ही मढ़ दिया। इमरान ने ट्रंप की ओर इशारा करते हुए कहा कि दुनिया के शक्तिशाली देशों के नेता इस बात को क्यों नहीं समझते कि आखिर पाकिस्तान में कट्टरता आई कैसे। इमरान ने याद दिलाया कि 1980 में पाकिस्तान ने अमेरिका के कहने पर सोवियत संघ के खिलाफ जेहाद छेड़ा था और उसी के तहत इन आतंकियों को ट्रेनिंग दी गई थी। उस समय अमेरिका के राष्ट्रपति रोनल्ड रीगन पाकिस्तान की तारीफें करते नहीं थकते थे। कहने का मतलब यह कि इमरान खान ने अप्रत्यक्ष रूप से ये कह दिया कि भले ही इन आतंकियों को ट्रेनिंग देने वाले हाथ आईएसआई और पाकिस्तानी सेना के थे, लेकिन ये सब उसी अमेरिका के कहने पर हुआ जिसे खुद अलकायदा के हमले का शिकार होना पड़ा।

यह सच है कि अमेरिका और सोवियत रूस एक वक्त में एक-दूसरे को फूटी आंखों नहीं सुहाते थे। अमेरिका को तब दुनिया में टक्कर देने वाला एकमात्र देश सोवियत रूस ही था। सोवियत रूस को तबाह करने के लिए ही अमेरिका ने अलकायदा को पाल-पोषकर खड़ा किया था। हालांकि इसका दंश अमेरिका ने भी झेला लेकिन आज आतंकवाद का खात्मा करना अमेरिका की प्राथमिकता में है। दूसरी तरफ पुतिन-ट्रम्प की दोस्ती की कहानी भी सबको चौंकाती है। दोस्ती भी इस हद तक कि ट्रम्प को अमेरिका का राष्ट्रपति बनाने में पुतिन ने वो सब किया जो रूस के राष्ट्राध्यक्ष की हैसियत से उन्हें नहीं करना चाहिए था। लेकिन किया और ट्रम्प को इसका खामियाजा भी भुगतना पड़ा रहा है। अमेरिका के लोग उन्हें संदेह की नजरों से देखते हैं। पत्रकार बार-बार सवाल पूछते हैं। कहने का मतलब यह कि अमेरिका हों या ट्रम्प, दोनों की मतलब के यार हैं। यही बात हम भारत और पीएम मोदी को बताना और समझाना चाहते हैं। इतिहास पलकर अच्छी तरह से पढ़ और समझ लें। अमेरिका कभी हमारा भरोसेमंद साथी नहीं रहा है और न ही आगे रहने वाला। भारत जैसे देश को तो वह सिर्फ बाजार समझता है- तेल और हथियारों का।

Wednesday, 25 September 2019

मोदी जी! दोस्त से यह कैसी दुश्मनी?

केंद्र की मोदी सरकार राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के चीफ और महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री शरद पवार को भी चिदंबरम की तरह जेल भेजने की तैयारी तो नहीं कर रही है? यह सवाल सियासी गलियारों में तैरने लगी है। लेकिन साथ में एक सवाल यह भी है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शरद पवार को अपना दोस्त भी तो मानते हैं। तो फिर केंद्र सरकार पवार के साथ यह सौतेला व्यवहार क्यों कर रही है?

याद कीजिए फरवरी 2015 का वो वक्त जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की एनसीपी प्रमुख शरद पवार से नजदीकियां बढ़ने पर एमएनएस प्रमुख राज ठाकरे ने मोदी का कार्टून बनाकर उनकी तीखी आलोचना की थी। तब पीएम मोदी महाराष्ट्र के बारामती में एक कार्यक्रम के दौरान शरद पवार के तारीफों के पुल बांधे थे और उनके सा‌थ दिन का भोजन भी किया था। मीडिया में दोस्ती की नुमाइश वाली कई तस्वीरे तब सामने आई थीं। इतना ही नहीं, तब मोदी जी ने कहा था कि पवार साहब यूपीए सरकार के दौरान गुजरात सरकार की काफी मदद करते थे। शरद पवार को लेकर पीएम मोदी के इस बदले रुख से खफा राज ठाकरे ने मोदी और पवार का कार्टून बनाकर एक-दूसरे को वेलेंटाइन दोस्त बताया था। इससे पहले शरद पवार की पार्टी एनसीपी ने महाराष्ट्र में भाजपा को बिना शर्त समर्थन देने का भी ऐलान किया था जिसके बाद शिवसेना ने काफी हंगामा किया था। तो ऐसी थी मोदी-पवार की दोस्ती। लेकिन अचानक ऐसा क्या हुआ कि एक झटके में दोस्ती के सारे उसूलों को धता बताते हुए घोटाले का मुकदमा दर्ज करा दिया।

दरअसल एक कहावत काफी प्रचलित है कि राजनीति में स्थायी रूप से न कोई किसी का दोस्त होता है और न ही कोई किसी का दुश्मन। यह सारा खेल शतरंज की बिसात पर नफा और नुकसान का है। सारा खेल लेनदेन का है। सारा खेल अवसरों को भुनाने का है। मालूम हो कि महाराष्ट्र में अगले महीने की 21 तारीख को विधानसभा का चुनाव होने जा रहा है। इस चुनाव में भाजपा और शिवसेना को पटखनी देने के लिए शरद पवार की एनसीपी ने कांग्रेस पार्टी से हाथ मिलाया है। शरद पवार पहले ही ऐलान कर चुके हैं कि कांग्रेस और एनसीपी 125-125 सीटों पर चुनाव लड़ेंगी, जबकि 38 सीटों पर सहयोगी पार्टियां लड़ेंगी। बस यही बात मोदी जी को नागवार गुजरी। कांग्रेसमुक्त भारत की बात करने वाले मोदी और शाह को शरद पवार का यह फैसला कुछ रास नहीं आया और फिर बिना देरी किए उनके पीछे प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) को लगा दिया। अब ईडी ने चाचा-भतीजा (शरद पवार और अजीत पवार) का जो हाल किया वह किसी से छिपा नहीं है। 
प्रवर्तन निदेशालय ने 24 सितंबर को महाराष्ट्र स्टेट को-ऑपरेटिव बैंक में हुए एक घोटाले के मामले में शरद पवार, अजीत पवार समेत बैंक के 70 पूर्व अधिकारियों के खिलाफ मनी लॉन्ड्रिंग का केस दर्ज किया है। यह मामला करीब एक दशक पुराना है। इसके पीछे की कहानी यह है कि शरद पवार, जयंत पाटिल समेत बैंक के अन्य निदेशकों ने कथित तौर पर चीनी मिलों को कम ब्याज दरों पर कर्ज दिया था और फिर डिफॉल्टर की संपत्तियों को सस्ती कीमतों पर बेच दिया। माना जा रहा है कि सस्ता कर्ज देने, इन संपत्तियों को बेचने और उनका दोबारा भुगतान नहीं होने से बैंक को साल 2007 से 2011 के बीच करीब 1000 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ। रिकॉर्ड के मुताबिक, महाराष्ट्र के तत्कालीन वित्त मंत्री अजित पवार उस समय को-ऑपरेटिव बैंक के निदेशक थे।

बहरहाल, अपने खिलाफ मुकदमा दर्ज होने के बाद एनसीपी प्रमुख शरद पवार ने जेल जाने के कयासों को लेकर जिस तरह की खुशी जताई है और मुंबई में प्रेस कांफ्रेंस बुलाकर जिस तरह से घोटाले के आरोपों का जवाब दिया है जिसमें उन्होंने साफ तौर से कहा है कि वह प्रवर्तन निदेशालय की जांच में पूरा सहयोग करेंगे और 27 सितंबर को वह खुद ईडी के दफ्तर में जांच के लिए उपस्थित रहेंगे, उससे तो यही लगता है कि मोदी सरकार ने जो जाल बिछाया है उसमें भाजपा कहीं खुद न फंस जाए। क्योंकि अभी तक भाजपा और शिवसेना के बीच सीट बंटवारे को लेकर कोई फैसला नहीं हो पाया है और ऐसे में अगर यह मामला तूल पकड़ता है तो मतदाताओं के दिमाग में निश्चित रूप से यह बात पैठ जमा सकती है कि मोदी सरकार बदले की राजनीति को हवा दे रही है। चूंकि शरद पवार की एनसीपी ने कांग्रेस के साथ गठबंधन में चुनाव लड़ने का ऐलान किया है इसलिए यह कार्रवाई की गई है। ऐसे भी इसे ओछी राजनीति ही कही जाएगी कि कोई भ्रष्ट नेता या पार्टी भाजपा के साथ हो तो वह ईमानदार और कांग्रेस के साथ हो तो बेईमान।