आर्थिक मंदी, राष्ट्रवाद और भावनात्मक मुद्दों की पृष्टभूमि में आगामी 21 अक्टूबर को होने जा रहे महाराष्ट्र और हरियाणा विधानसभा चुनाव तथा देश के 18 राज्यों की 64 विधानसभा सीटों पर उपचुनाव को कम आंकना राजनीतिक लिहाज से बड़ी गलती होगी। ये चुनाव काफी अहम हैं। अहम इसलिए क्योंकि दोनों राज्यों में भाजपा की सरकार है और वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में इन चुनावों के नतीजे निश्चित रूप से इस बात का अहसास कराएंगे कि राष्ट्रवाद की बयार में अर्थनीति का राजनीति पर कितना व कैसा असर होता है।
2019 के लोकसभा चुनाव में मोदी और शाह की लीडरशिप में देश के मतदाताओं ने जिस तरह का जनादेश भारतीय जनता पार्टी को दिया, उसके बाद से तमाम सियासी पंडितों की जुबान पर जैसे ताला सा लग गया है। कुछ भी बोलने और बताने की जहमत नहीं उठा रहे। उस वक्त तो सिर्फ बालाकोट ही था। अब जब महाराष्ट्र और हरियाणा के चुनाव होने जा रहे हैं तो यह कश्मीर में धारा 370 और मुस्लिम महिलाओं के लिए तीन तलाक जैसे राष्ट्रवाद और भावनात्मक मुद्दों की पृष्टभूमि में लड़ा जा रहा है। जाहिर है तमाम विश्लेषकों को यह मानने में हिचक नहीं हो रही कि कमल को खिलने से कोई नहीं रोक सकता है।
दोनों राज्य में होने जा रहे चुनाव कई मायनों में बेहद खास हैं, लेकिन इस चुनाव का मतलब सिर्फ इन दो राज्यों की सरकार का भविष्य नहीं है। दिवाली के दो दिन पहले 24 अक्टूबर को जो नतीजे आएंगे वो ऐसे बहुत से सवालों का जवाब देगें जिनपर पूरे देश की निगाहें टिकी हैं। ये चुनाव इसलिए भी खास है क्योंकि 2019 के लोकसभा चुनाव के बाद ये पहला चुनाव है और वह भी ऐसे दौर में हो रहा है जब देश आर्थिक मंदी के दंश को भी झेल रहा है। निश्चित रूप से इन चुनावों में अर्थनीति को राजनीति कितना प्रभावित करती है इसकी झलक भी दिखेगी। यह चुनाव सियासी गठबंधनों पर भी अपनी छाप छोड़ेगी और नतीजे राजनीतिक प्राथमिकताओं की दशा और दिशा तो तय करेंगे ही साथ ही राष्ट्रीय राजनीति का मार्ग भी तय करने में अहम भूमिका निभा सकते हैं। ये चुनाव इसलिए भी अहम हैं क्योंकि इसके साथ 18 राज्यों की 64 सीटों पर विधानसभा उपचुनाव भी होने हैं। इनमें कर्नाटक की 15 सीटें, उत्तर प्रदेश की 11, बिहार की 5, केरल की 5, असम की 4, गुजरात की 4, पंजाब की 4, सिक्किम की 3, हिमाचल प्रदेश की 2, राजस्थान की 2, तमिलनाडु की 2, अरुणाचल प्रदेश, छत्तीसगढ़, तेलंगाना, मध्यप्रदेश, मेघालय, ओडिशा, पुडुचेरी की एक-एक सीटें शामिल हैं। इतने राज्यों से जो जनादेश आएंगे वो पूरे देश की जमीनी हकीकत को दर्शाएंगे।
आर्थिक लिहाज से अगर आंकलन करें तो इसमें कोई दो राय नहीं कि मुंबई की पहचान देश के बिजनेस कैपिटल के रूप में है, लेकिन देश की अर्थव्यवस्था के लिहाज से भी महाराष्ट्र काफी अहम है। देश की जीडीपी में महाराष्ट्र की हिस्सेदारी जहां 14 प्रतिशत की है वहीं हरियाणा की हिस्सेदारी 3.7 प्रतिशत है। कंपनियों के निवेश की वजह से प्रति व्यक्ति आय में भी ये शीर्ष राज्यों में शामिल हैं। ऐसी परिस्थिति में 288 सीटों के लिए महाराष्ट्र के 8.96 करोड़ मतदाता और 90 सीटों के लिए हरियाणा के 1.83 करोड़ मतदाताओं का मूड मायने रखता है। देश की अर्थव्यवस्था में मंदी का दौर और बढ़ती बेरोजगारी इस चुनाव पर कितना असर डालेगा, यह काफी महत्वपूर्ण है। आर्थिक मंदी की बात करें तो यह सुस्ती जिस ऑटो सेक्टर में सबसे ज्यादा है उसका सबसे बड़ा केंद्र भी इन्हीं दोनों राज्यों में है। आंकड़ों पर गौर करें तो दो तिहाई कारें हरियाणा में बनती हैं। मारुति ने गुरुग्राम और मानेसर में जिन प्लांटों में उत्पादन बंदी दिवस मनाने की घोषणा की है वे भी यहीं हैं। महाराष्ट्र में भी कई ऑटोमोबाइल कंपनियों के प्लांट बेहाल हैं। व्यापक बेरोजगारी के लिहाज से हरियाणा की स्थिति अच्छी नहीं है।
जहां तक सियासी दलों के बीच गठबंधनों और अपनी-अपनी हैसियत आंकने की बात है तो वह भी इस चुनाव के नतीजे तय करेंगे। शरद पवार और उनकी राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के साथ ही ओमप्रकाश चौटाला की इंडियन नेशनल लोकदल की राजनीति के लिए भी यह चुनाव निर्णायक साबित होगा। भाजपा और शिवसेना को भी यह चुनाव बताएगा कि महाराष्ट की राजनीति में कौन बड़ा भाई है और कौन छोटा भाई। दोनों राज्यों में सक्रिय लगभग आधा दर्जन छोटी पार्टियां किसी समय किस दल के साथ चली जाएं यह कहना मुश्किल है। अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी का भी दिल्ली से बाहर अपनी ताकत का अहसास हरियाणा चुनाव से हो जाएगा।
बहरहाल, नरेंद्र मोदी और अमित शाह की अगुआई में भाजपा ने जो नई राजनीति विकसित की है वह हर जगह पारंपरिक समीकरणों को तोड़कर खेल के नियम बदल देने में यकीन रखती है। चाहे वह मुख्यमंत्री की घोषणा का मसला हो, अधिकांश मौजूदा विधायकों के टिकट काटने का मसला हो, चुनावी मैदान में मुद्दों को डायवर्ट करने का मसला हो, राष्ट्रवाद को किस तरह से भुनाया जाए इसका मसला हो या कुछ और। अब इन तमाम रणनीतियों के बीच किस तरह का जनादेश निकलकर आता है ये तो आगामी 24 अक्टूबर को ही पता चलेगा लेकिन इतना तो तय है कि यह चुनाव काफी रोमांचक और राजनीति की दशा व दिशा को तय करने वाला होगा।

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