अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प पर शिकंजा लगातार कसता जा रहा है और इस बात की आशंका प्रबल होती दिख रही है कि रिपब्लिकन पार्टी 2020 के राष्ट्रपति चुनाव के लिए उन्हें उम्मीदवार बनाने से परहेज करे। यह आशंका इसलिए प्रबल होती दिख रही है क्योंकि 2016 के चुनाव में ट्रम्प पर रूसी मदद के जो आरोप लगते आ रहे हैं उसपर अब रिपब्लिकन पार्टी ने भी मुहर लगा दी है। आप सब जानते हैं कि डोनाल्ड ट्रम्प रिपब्लिकन पार्टी से ही 2016 में राष्ट्रपति पद के लिए उम्मीदवार बने थे और डेमोक्रेट प्रत्याशी हिलेरी क्लिंटन को हराकर राष्ट्रपति बने थे। तभी से ट्रम्प पर रूसी मदद के आरोप लगने शुरू हो गए थे। एक दिन पहले अमेरिकी सीनेट में जब रिपब्लिकन सीनेटर की अगुआई में बनी कमेटी की रिपोर्ट पेश की गई तो खलबली मच गई क्योंकि इस रिपोर्ट ने भी ट्रम्प पर लग रहे आरोप को सच करार दिया है।
दरअसल, अमेरिका दुनिया का सबसे जागरूक लोकतांत्रिक देश माना जाता है। डेमोक्रेट और रिपब्लिकन दो दल ही यहां की राजनीतिक व्यवस्था में सक्रिय हैं जिनमें एक के पास सत्ता होती है तो दूसरा विपक्ष की भूमिका में होता है। खास बात यह है कि अमेरिकी सांसद चाहे वो रिपब्लिकन हों या डेमोक्रेट, वैचारिक और लोकतांत्रिक नजरिये से इतने सशक्त होते हैं कि अगर उनका नेता भी कहीं से गड़बड़ लगता है तो उसके खिलाफ आवाज उठाने में देरी नहीं करते हैं। ट्रम्प के मामले में भी जो चीजें सामने आ रही हैं वह इस बात को साबित करता है। हालांकि ट्रम्प-रूस कनेक्शन का अंदाजा तो बहुत पहले से लगाया जा रहा था और रिपब्लिकन की हालिया रिपोर्ट से पहले भी एक रिपोर्ट में इसकी पुष्टि हो चुकी है। बावजूद इसके ट्रम्प लगातार इस बात की वकालत करते आ रहे थे कि राष्ट्रपति चुनाव में रूस ने किसी भी तरह की दखलअंदाजी की है। इस तरह की खबरों को वे अक्सर फेक न्यूज करार देते रहे। फाइनली रिपब्लिकन पार्टी ने सीनेटर रिचर्ड बर की अगुआई में मामले की सच्चाई जानने के लिए कमेटी गठित की। और अब जब इस कमेटी की रिपोर्ट सामने आ गई है तो ट्रम्प पर संकट के बादल गहराने लगे हैं।
सीनेट इंटेलिजेंस कमेटी की इस जांच रिपोर्ट में कहा गया है कि रूस के सेंट पीटर्सबर्ग स्थित इंटरनेट रिसर्च एजेंसी (आईआरए) ने डोनाल्ड ट्रम्प के लिए सोशल मीडिया पर समर्थन जुटाया था। रिपोर्ट में इस बात का खुलासा हुआ है कि आईआरए ने अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में रूस के पसंदीदा उम्मीदवार के लिए समर्थन जुटाया था। इसके जरिए राष्ट्रपति चुनाव में डेमोक्रेट उम्मीदवार हिलेरी क्लिंटन को नुकसान पहुंचाया गया क्योंकि उनके जीतने की संभावना ज्यादा थी। रिपोर्ट में कहा गया है कि ये सब क्रेमलिन (रूस के राष्ट्रपति का आवास और कार्यालय) के आदेश पर किया गया। रिपोर्ट में चेतावनी भी दी गई है कि 2020 के चुनाव में भी रूस की दखलअंदाजी हो सकती है। लिहाजा एजेंसियों को सावधान रहने की जरूरत है।
रिपब्लिकन की इस ताजा जांच रिपोर्ट से पहले ट्रम्प के खिलाफ इसी साल इस आशय की एक और रिपोर्ट आई थी। करीब 448 पेज की उस रिपोर्ट में भी स्पेशल काउंसल रॉबर्ट मुलर ने इस बात की पुष्टि की थी कि रूसी सेना के अधिकारियों द्वारा डेमोक्रेट उम्मीदवार हिलेरी क्लिंटन के चुनाव को प्रभावित करने की कोशिश की थी। 18 अप्रैल 2019 को यह रिपोर्ट कानून मंत्रालय को सौंपी गई थी। हालांकि रिपोर्ट के आखिर में उन्होंने यह भी लिखा था कि रूसी दखल के मामले में पर्याप्त साक्ष्य नहीं मिल सके हैं। लेकिन इस बात का खुलासा जरूर हुआ था कि ट्रम्प ने रूसी दखल की जांच को नियंत्रित करने की कोशिश की। तब ट्रम्प ने मुलर को जांच से हटवाने की भी कोशिश की थी।
बहरहाल, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प लगातार मुश्किलों में फंसते जा रहे हैं। आपको पता होगा कि तीन अमेरिकी कांग्रेस समितियों के प्रमुख पहले ही महाभियोग चलाने से जुड़ी जांच का कानूनी आदेश व्हाइट हाउस में पेश कर चुके हैं। इस बीच अमेरिकी संसद में डेमोक्रेटिक पार्टी के सांसदों ने इससे जुड़े एक मामले में यूक्रेन पर दबाव बनाने के लिए उपराष्ट्रपति माइक पेंस से उनकी संभावित भूमिका को लेकर दस्तावेज भी मांगे गए हैं। मालूम हो कि ट्रंप पर उनके राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी जो.बिडेन को नुकसान पहुंचाने के मकसद से यूक्रेन से जानकारियां साझा करने के आरोप हैं। हालांकि ट्रंप इससे भी इनकार करते रहे हैं। अब जबकि ट्रम्प की पार्टी रिपब्लिकन की जांच कमेटी में भी इस बात का खुलासा हो गया है कि 2016 के राष्ट्रपति चुनाव में रूसी दखलंदाजी हुई है तो ट्रम्प पर मुसीबत का शिकंजा कसना लाजिमी है। वो भी ऐसे वक्त में जब अगले ही साल अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव होना है और ट्रम्प की यह ख्वाहिश कि अमेरिका के हित में उन्हें एक और मौका दिया जाए।

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