Saturday, 14 March 2020

तेल के खेल में सरकार मस्त, जनता पस्त

क्या यह मोदी सरकार की तरफ से फैलाया जा रहा बड़ा झूठ नहीं है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में भारी कटौती से आम जनता को बड़ा फायदा मिल रहा है? सच्चाई तो यह है कि कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट से पेट्रोल और डीजल के दामों में जो कटौती होनी चाहिए और जो फायदा आम जनता को मिलनी चाहिए वह सब सरकारें और तेल कंपनियां मिलकर बांट रही है। इसे लूटने वाली सरकार नहीं कहें तो क्या कहें, जब मनमोहन सरकार 109 डॉलर प्रति बैरल कच्चा तेल खरीदकर अधिकतम 52 रुपये प्रति लीटर पेट्रोल बेच रही थी वहीं आज मोदी सरकार 38 डॉलर प्रति बैरल कच्चा तेल खरीदकर 70 रुपये प्रति लीटर पेट्रोल बेच रही है।

सरकार ने एक बार फिर से पेट्रोल और डीजल पर एक्साइज ड्यूटी तथा रोड सेस मिलाकर कुल तीन रुपये प्रति लीटर की दर से कर बढ़ाकर ज्यादा कमाई करने का फैसला किया है। इस शुल्क वृद्धि से पेट्रोल पर यह कर बढ़कर 22.98 रुपये प्रति लीटर और डीजल पर 18.83 रुपये प्रति लीटर हो गया है। याद हो तो 2014 में मोदी सरकार ने जब सत्ता अपने हाथ में ली थी तब पेट्रोल पर यह कर 9.48 रुपये प्रति लीटर और डीजल पर 3.56 रुपये प्रति लीटर था। बताया जा रहा है कि इस ताजा कर वृद्धि से केंद्र को लगभग 39,000 करोड़ रुपये का अतिरिक्त फायदा होगा। कांग्रेस पार्टी ने इसका विरोध करते हुए कहा है कि भाजपा सरकार की गैर-निर्देशित जन-विरोधी नीतियां पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस की उच्च कीमतों के लिए जिम्मेदार हैं, क्योंकि कच्चे तेल की कीमतों में पिछले छह वर्षों में 50 प्रतिशत से भी ज्यादा की कमी आई है।

कोरोना वायरस और अमेरिका-रूस में एक-दूसरे से ज्यादा तेल उत्पादन की लगी होड़ के चलते अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में बड़ी गिरावट दर्ज हुई है। अगर आप याद करें तो इस साल के शुरुआत में कच्चा तेल 67 डॉलर प्रति बैरल यानी 30.08 रुपए प्रति लीटर था। 12 मार्च 2020 की बात करें तो कच्चे तेल की कीमत 38 डॉलर प्रति बैरल यानी 17.79 रुपए प्रति लीटर हो गई है। लेकिन क्या डीजल-पेट्रोल की कीमतें इस अनुपात में कम हुई हैं- बिल्कुल नहीं। आइए हम यहां समझने की कोशिश करते हैं कि कैसे 18 रुपये प्रति लीटर मिलने वाला कच्चा तेल पेट्रोल या डीजल के तौर पर हमारी बाइक या कार की टंकी में आते-आते 70 रुपये और 63 रुपये प्रति लीटर तक पहुंच जाता है...

18 रुपए का पेट्रोल 70 रुपये प्रति लीटर का कैसे?
कच्चे तेल की कीमत- 17.79 रुपये प्रति लीटर
तेल कंपनियों का चार्ज- 13.91 रुपये प्रति लीटर
एक्साइज ड्यूटी, रोड सेस- 19.98 (अब 22.98) रुपये प्रति लीटर
पेट्रोल पंप स्वामी का कमीशन- 3.55 रुपये प्रति लीटर
वैट- 14.91 रुपये प्रति लीटर
कुल- 70.14 रुपये प्रति लीटर

18 रुपए का डीजल 63 रुपये प्रति लीटर का कैसे?
कच्चे तेल की कीमत- 17.79 रुपये प्रति लीटर
तेल कंपनियों का चार्ज- 17.55 रुपये प्रति लीटर
एक्साइज ड्यूटी और रोड सेस- 15.83 (अब 18.83) रुपये प्रति लीटर
पेट्रोल पंप स्वामी का कमीशन- 2.49 रुपये प्रति लीटर
वैट- 9.23 रुपये प्रति लीटर
कुल- 62.89 रुपये प्रति लीटर

यूपीए सरकार के मुखिया मनमोहन सिंह के पहले कार्यकाल की बात करें तो वर्ष 2004 से 2009 के दौरान पेट्रोल की कीमत दिल्ली में लगभग स्थिर रही थी। ये कीमत अलग-अलग वर्षों में लगभग 40 से 47 रुपये प्रति लीटर के बीच थी। मुंबई में ये आंकड़ा थोड़ा ज्यादा 45 से 50 रुपये प्रति लीटर के बीच था। शोध संस्था माइक्रोट्रेंड्स के अनुसार, इस दौरान अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत 50 डॉलर प्रति बैरल से 160 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई थीं। मनमोहन सिंह का दूसरा कार्यकाल वैश्विक आर्थिक मंदी के साथ शुरू हुआ था। दुनिया भर में मांग काफी कम थी और कमोडिटी कीमतों में भारी गिरावट आई थी। यही वजह रही कि जून 2008 में जहां कच्चे तेल की कीमत 161 डॉलर प्रति बैरल थी, वहीं जनवरी 2009 में घटकर ये 49.83 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर आ गई थी। इस दौरान दिल्ली में पेट्रोल की कीमत औसतन 40 से 73 रुपये के बीच रही। जबकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत औसतन 50 से 127 डॉलर प्रति बैरल के बीच रही।

मोदी सरकार के कार्यकाल की बात करें तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत मई 2014 में 113 डालर प्रति बैरल से लुढ़क कर जनवरी 2015 में 50 डालर प्रति बैरल के स्तर पर आ गए। इसके बाद लंबे समय तक इसी दायरे में बने रहे। जनवरी 2016 में यह 28 डॉलर प्रति बैरल पर लुढ़क गया। लेकिन वेनेजुएला में आर्थिक संकट और ईरान पर अमेरिका के प्रतिबंध की धमकियों के कारण नवंबर 2018 में तेल के दाम अप्रत्याशित उछाल के साथ 80 डालर प्रति बैरल के पार पहुंच गए। लेकिन तब भी मनमोहन के कार्यकाल के मुकाबले कीमत काफी कम रही लेकिन उसका फायदा देश को नहीं मिला। साल दर साल सिलसिलेवार मई के आंकड़ों को देखें तो मोदी सरकार में कभी भी पेट्रोल की कीमत 60 रुपये से नीचे नहीं गया जबकि कच्चे तेल की कीमत कभी 80 डॉलर से ऊपर नहीं गया।

कुल मिलाकर देखा जाए तो कच्चे तेल की कीमतों में फिसलन का फायदा उठाते हुए केन्द्र सरकार ने पेट्रोल-डीजल पर लगने वाली एक्साइड ड्यूटी में बड़ा इजाफा किया। जहां प्रति लीटर पेट्रोल पर 21.50 रुपये एक्साइड ड्यूटी वसूली गई वहीं प्रति लीटर डीजल पर सरकार ने 17.30 रुपये बतौर ड्यूटी वसूला। इसके चलते केन्द्र सरकार की पेट्रोल-डीजल की बिक्री से कमाई दो गुनी हो गई। जहां वित्त वर्ष 2014 में केन्द्र सरकार को पेट्रोल-डीजल पर टैक्स से कमाई जीडीपी का महज 0.7 फीसदी था वहीं वित्त वर्ष 2017 में दोगुना होकर 1.6 फीसदी हो गया। नतीजा यह हुआ कि केन्द्र सरकार के इस फैसले से आम आदमी के लिए पेट्रोल-डीजल की कीमतें कम नहीं हो सकीं। केन्द्र सरकार के अलावा राज्य सरकारों ने भी आम आदमी के लिए सस्ते पेट्रोल-डीजल का रास्ता बाधित किया। केन्द्र सरकार के एक्साइज ड्यूटी से अलग राज्य सरकारों ने पेट्रोल-डीजल की बिक्री पर सेल्स टैक्स में बड़ा इजाफा कर दिया। कच्चे तेल की कीमतों में आई इस फिसलन के दौरान राज्य सरकारों ने पेट्रोल पर वैट को लगभग 40 फीसदी बढ़ाया तो डीजल पर लगभग 28 फीसदी की वृद्धि कर दी गई। इसके चलते दोनों केन्द्र और राज्य सरकारों ने आम आदमी तक सस्ता पेट्रोल-डीजल नहीं पहुंचने दिया और तेल कंपनियों के साथ मिलकर जो आम जनता के हक का मुनाफा आपस में बांट लिया और ये सिलसिला निरंतर जारी है।

Thursday, 12 March 2020

मोदी-शाह के लिए ज्योतिरादित्य सिर्फ मोहरा!

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से पूरे 18 साल का नाता तोड़ भारतीय जनता पार्टी में शामिल होने के बाद ज्योतिरादित्य सिंधिया के राजनीतिक भविष्य को लेकर कई तरह के सवाल उठने लगे हैं। इन्हीं सवालों में से एक सवाल ये भी है कि क्या भाजपा में भी उनका वही रुतबा बरकरार रहेगा जो एक जमाने में कांग्रेस में हुआ करता था? इसी सवाल को ऐसे भी कर सकते हैं कि उस भाजपा में ज्योतिरादित्य का भविष्य कैसा होगा जहां सिर्फ मोदी, शाह और आरएसएस यानी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह और राष्ट्रीय स्वयंसेवक की चलती है?  मोदी-शाह की पार्टी भाजपा के लिए ज्योतिरादित्य सिंधिया सिर्फ मोहरा भर तो नहीं?

कांग्रेस में रहते ज्योतिरादित्य चार बार सांसद रहे, मनमोहन सिंह सरकार में दस साल तक केंद्रीय मंत्री रहे, पार्टी महासचिव रहे, कई राज्यों में चुनाव प्रभारी भी रहे। मध्य प्रदेश के ग्वालियर-चंबल अंचल में कांग्रेस का इकलौता बड़ा चेहरा थे और जिनके बारे में कहा जाता है कि चंबल के टिकट ही नहीं, कलेक्टर तक वह खुद तय करते थे, क्या मोदी-शाह की भाजपा में उनके लिए अब एक टीआई भी मर्जी का बनवा पाना संभव होगा? यह सवाल इसलिए क्योंकि भाजपा में तो सब कुछ संघ यानी आरएसएस और मोदी-शाह के इशारे पर तय होता है। इसमें कोई दो राय नहीं कि सिंधिया को राज्यसभा की सांसदी का टिकट मिल गया है। आने वाले वक्त में केंद्रीय मंत्री का पद भी हासिल हो जाएगा, लेकिन इससे ज्यादा की उम्मीद पालना उनकी खुद की सेहत के लिए फायदे का सौदा नहीं होगा। क्योंकि भाजपा की रुचि ज्योतिरादित्य सिंधिया को पार्टी में लाने से अधिक कांग्रेस को और उससे भी ज्यादा उभरते युवा नेतृत्व को तोड़ने में है। भाजपा नेतृत्व सिंधिया को शीर्ष पर बिठाने के लिए पार्टी में नहीं लाई है, बल्कि कांग्रेस को मध्य प्रदेश में खत्म करना उसका असली मकसद है।

एक बात और, भाजपा अगर सत्ता, संगठन और प्रशासनिक अमले में सिंधिया या उनके लोगों को ज्यादा तरजीह देगी तो संगठन के स्तर पर उसे इसका खामियाजा भुगतना पड़ सकता है। क्योंकि किसी राज्य विशेष के इतने बड़े कद्दावर नेता का पार्टी में आना संबंधित राज्य में पार्टी के मौजूदा बड़े नेताओं के साथ हितों के टकराव को बढ़ावा दे सकता है। मध्यप्रदेश भाजपा में तो इस वक्त बड़े नेताओं की भरमार है, जिनमें शिवराज सिंह चौहान, नरेंद्र सिंह तोमर, प्रभात झा, कैलाश विजयवर्गीय, नरोत्तम मिश्रा जैसे नाम शामिल हैं। अगर आप आंखें खोलकर देख और समझ पाएं तो तय मानिए, सिंधिया के साथ भाजपा के कई नेताओं का तालमेल नहीं बैठ पाएगा। पूर्व सांसद और राज्य सरकार में मंत्री रहे जयभान सिंह पवैया या सिंधिया के भाजपा में आने से अपनी राज्यसभा सीट गंवाने वाले प्रभात झा क्या पार्टी के इस कदम से बहुत खुश हुए होंगे क्या? ये दोनों नेता जो ग्वालियर से ताल्लुक रखते हैं और जिनकी पूरी राजनीति ही महल यानी सिंधिया के खिलाफ चलती थी, उनके लिए तो धर्मसंकट की स्थिति खड़ी हो ही जाएगी। ऐसे में भाजपा का शीर्ष नेतृत्व सत्ता संतुलन बनाने के लिए कौन सा फार्मूला ईजाद करेगा इसपर बहुत कुछ निर्भर करेगा।

राजनीति में एक बात अक्सर कही जाती है कि हर नेता का भविष्य उसके हाथ में होता है। जहां भी उसे जो जिम्मेदारी मिलती है, जो जिम्मेदारी उसके हाथ में दी जाती है, भविष्य वहां उसके प्रदर्शन पर निर्भर करता है। हां, इसमें ये जरूरी होता है कि उसका दल उसे प्रदर्शन का कितना मौका देता है। इस लिहाज से देखें तो सिंधिया के लिए देश की बात हो या फिर बात मध्यप्रदेश की, बहुत ज्यादा स्पेस मिलने की गुंजाइश नहीं है। क्योंकि दोनों ही मोर्चे पर पार्टी के सक्षम नेता पहले से ही मौजूद हैं। सिंधिया का फायदा भाजपा दो तरीके से लेना चाहेगी। पहला मसला तात्कालिक है जिसके तहत मोदी-शाह चाहेंगे कि उनके समर्थक कांग्रेस विधायक और मंत्री टूटकर भाजपा में शामिल हो जाए ताकि कमल नाथ की सरकार गिर जाए। इसका बड़ा फायदा इस रूप में मिलेगा कि कमलनाथ सरकार ने भ्रष्टाचार की जो जांच चलाई थीं मसलन व्यापमं घोटाला, ई-टेंडर घोटाला, हनीट्रैप केस आदि जिनमें भाजपा नेता फंसे हुए हैं, कांग्रेस की सरकार गिरते ही ये जांच भी खत्म हो जाएंगी। इसमें पार्टी को कितना फायदा मिलता है ये आने वाला वक्त बताएगा। दूसरा मसला दीर्घकालिक है। वह यह कि मध्यप्रदेश का ग्वालियर-चंबल अंचल जिसके बारे में कहा जाता है कि वहां सिंधिया का सिक्का चलता है, एक बड़ा वोट बैंक जो अभी तक कांग्रेस के साथ था पूरी तरह से महाराज के साथ भाजपा में शिफ्ट हो जाएगा। अगर ऐसा होता है तो भाजपा के अंदर सिंधिया का राजनीतिक भविष्य एक सीमित दायरे में अच्छा रहेगा। लेकिन आज के बदलते राजनीतिक परिदृश्य में सब-कुछ सिंधिया की राजनीति के ही अनुकूल रहेगा, मान लेना सत्य से परे होगा।

जहां तक सिंधिया के भाजपा में शामिल होने के पीछे की कहानी और से कांग्रेस को इससे होने वाले नुकसान की बात है तो निश्चित रूप से कांग्रेसी खेमे में निराशा है। पार्टी का एक कद्दावर युवा चेहरा सिर्फ कांग्रेस पार्टी का नेता ही नहीं था बल्कि कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी का अभिन्न दोस्त भी था। राहुल गांधी ने इस बात का जिक्र मीडिया के सामने किया भी। राहुल की ज्योतिरादित्य से संबंधों के बारे में तो यहां तक कहा जाता है कि वह इकलौते कांग्रेस नेता थे जिन्हें राहुल गांधी से मिलने के लिए समय नहीं लेना पड़ता था। बावजूद इसके ज्योतिरादित्य ने कांग्रेस छोड़ने का फैसला लिया, निश्चित रूप से मसला एकतरफा तो नहीं ही हो सकता है। हो सकता है सिंधिया मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री बनना चाहते हों, नहीं बन सके। राज्यसभा सांसद बनने की तमन्ना पर भी पार्टी ने ग्रहण लगा दिया हो। अगर इन दो बातों को लेकर विश्लेषण किया जाए तो इससे इतर सिंधिया या फिर उनके समर्थकों को इस बात को लेकर भी आत्ममंथन करना चाहिए कि वह चार बार सांसद रहे हैं। पार्टी में लंबे समय तक महासचिव रहे और दस साल तक मनमोहन सरकार में मंत्री रहे। वक्त सब दिन एक जैसा तो होता नहीं है। पार्टी बुरे दौर से गुजर रही है। इसमें कोई दो राय नहीं कि सिंधिया के पार्टी छोड़ने से कांग्रेस को नुकसान तो होगा लेकिन जब कोई पार्टी बुरे दौर में होती है तो उसके नेताओं की भी यह जिम्मेदारी बनती है कि जब अच्छे वक्त में हमने अच्छे दिन गुजारे तो बुरे दौर से निकलने के लिए हमें पार्टी को वक्त देना चाहिए। जहां तक ग्वालियर-चंबल संभाग में कांग्रेस को नुकसान होने की बात की जा रही है तो नुकसान तो लोकसभा चुनाव में पहले हो ही चुका है। अगर वह इस इलाके के इतने बड़े कद्दावर नेता थे और क्षेत्र में इतना बड़ा प्रभाव था तो ज्योतिरादित्य 2019 के चुनाव में कम से कम अपनी सीट तो बचा लेते। 

बहरहाल, ज्योतिरादित्य के कांग्रेस छोड़ने और भाजपा में शामिल होने के बाद इससे कांग्रेस को कितना नुकसान होगा और भाजपा को कितना फायदा होगा इसको तात्कालिक राजनीतिक दृष्टिकोण से सोचें तो यह बहुत कुछ मध्यप्रदेश की कमल नाथ सरकार के गिरने या बरकरार रहने से ही तय होगा। आने वाले समय में जब मप्र विधानसभा में बहुमत साबित करने में अगर कमल नाथ सरकार सफल होती है तो तय मानिए, ज्योतिरादित्य भाजपा से राज्यसभा पहुंचकर भी न तो मंत्री बन पाएंगे और न ही ग्वालियर-चंबल संभाग में उनका वो रूतबा रहेगा जैसा कांग्रेस में रहते हुआ करता था। इससे भाजपा को बहुत ज्यादा फर्क तो नहीं पड़ेगा। हां, कांग्रेस के लिए अच्छा यह होगा कि मध्यप्रदेश में दो गुटों में बंटी राजनीति का झमेला जरूर खत्म हो जाएगा। इसके विपरीत कमल नाथ अपनी सरकार नहीं बचा पाते हैं और सिंधिया समर्थक कांग्रेस विधायक कांग्रेस छोड़ देते हैं तो इसे कांग्रेस के लिए बड़ा नुकसान माना जाएगा क्योंकि पूर्ण रूप से कांग्रेस शासित एक राज्य हाथ से निकल जाएगी। इसके बाद कांग्रेस में आंतरिक कलह और बढ़ेगी।