भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से पूरे 18 साल का नाता तोड़ भारतीय जनता पार्टी में शामिल होने के बाद ज्योतिरादित्य सिंधिया के राजनीतिक भविष्य को लेकर कई तरह के सवाल उठने लगे हैं। इन्हीं सवालों में से एक सवाल ये भी है कि क्या भाजपा में भी उनका वही रुतबा बरकरार रहेगा जो एक जमाने में कांग्रेस में हुआ करता था? इसी सवाल को ऐसे भी कर सकते हैं कि उस भाजपा में ज्योतिरादित्य का भविष्य कैसा होगा जहां सिर्फ मोदी, शाह और आरएसएस यानी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह और राष्ट्रीय स्वयंसेवक की चलती है? मोदी-शाह की पार्टी भाजपा के लिए ज्योतिरादित्य सिंधिया सिर्फ मोहरा भर तो नहीं?
कांग्रेस में रहते ज्योतिरादित्य चार बार सांसद रहे, मनमोहन सिंह सरकार में दस साल तक केंद्रीय मंत्री रहे, पार्टी महासचिव रहे, कई राज्यों में चुनाव प्रभारी भी रहे। मध्य प्रदेश के ग्वालियर-चंबल अंचल में कांग्रेस का इकलौता बड़ा चेहरा थे और जिनके बारे में कहा जाता है कि चंबल के टिकट ही नहीं, कलेक्टर तक वह खुद तय करते थे, क्या मोदी-शाह की भाजपा में उनके लिए अब एक टीआई भी मर्जी का बनवा पाना संभव होगा? यह सवाल इसलिए क्योंकि भाजपा में तो सब कुछ संघ यानी आरएसएस और मोदी-शाह के इशारे पर तय होता है। इसमें कोई दो राय नहीं कि सिंधिया को राज्यसभा की सांसदी का टिकट मिल गया है। आने वाले वक्त में केंद्रीय मंत्री का पद भी हासिल हो जाएगा, लेकिन इससे ज्यादा की उम्मीद पालना उनकी खुद की सेहत के लिए फायदे का सौदा नहीं होगा। क्योंकि भाजपा की रुचि ज्योतिरादित्य सिंधिया को पार्टी में लाने से अधिक कांग्रेस को और उससे भी ज्यादा उभरते युवा नेतृत्व को तोड़ने में है। भाजपा नेतृत्व सिंधिया को शीर्ष पर बिठाने के लिए पार्टी में नहीं लाई है, बल्कि कांग्रेस को मध्य प्रदेश में खत्म करना उसका असली मकसद है।
एक बात और, भाजपा अगर सत्ता, संगठन और प्रशासनिक अमले में सिंधिया या उनके लोगों को ज्यादा तरजीह देगी तो संगठन के स्तर पर उसे इसका खामियाजा भुगतना पड़ सकता है। क्योंकि किसी राज्य विशेष के इतने बड़े कद्दावर नेता का पार्टी में आना संबंधित राज्य में पार्टी के मौजूदा बड़े नेताओं के साथ हितों के टकराव को बढ़ावा दे सकता है। मध्यप्रदेश भाजपा में तो इस वक्त बड़े नेताओं की भरमार है, जिनमें शिवराज सिंह चौहान, नरेंद्र सिंह तोमर, प्रभात झा, कैलाश विजयवर्गीय, नरोत्तम मिश्रा जैसे नाम शामिल हैं। अगर आप आंखें खोलकर देख और समझ पाएं तो तय मानिए, सिंधिया के साथ भाजपा के कई नेताओं का तालमेल नहीं बैठ पाएगा। पूर्व सांसद और राज्य सरकार में मंत्री रहे जयभान सिंह पवैया या सिंधिया के भाजपा में आने से अपनी राज्यसभा सीट गंवाने वाले प्रभात झा क्या पार्टी के इस कदम से बहुत खुश हुए होंगे क्या? ये दोनों नेता जो ग्वालियर से ताल्लुक रखते हैं और जिनकी पूरी राजनीति ही महल यानी सिंधिया के खिलाफ चलती थी, उनके लिए तो धर्मसंकट की स्थिति खड़ी हो ही जाएगी। ऐसे में भाजपा का शीर्ष नेतृत्व सत्ता संतुलन बनाने के लिए कौन सा फार्मूला ईजाद करेगा इसपर बहुत कुछ निर्भर करेगा।
राजनीति में एक बात अक्सर कही जाती है कि हर नेता का भविष्य उसके हाथ में होता है। जहां भी उसे जो जिम्मेदारी मिलती है, जो जिम्मेदारी उसके हाथ में दी जाती है, भविष्य वहां उसके प्रदर्शन पर निर्भर करता है। हां, इसमें ये जरूरी होता है कि उसका दल उसे प्रदर्शन का कितना मौका देता है। इस लिहाज से देखें तो सिंधिया के लिए देश की बात हो या फिर बात मध्यप्रदेश की, बहुत ज्यादा स्पेस मिलने की गुंजाइश नहीं है। क्योंकि दोनों ही मोर्चे पर पार्टी के सक्षम नेता पहले से ही मौजूद हैं। सिंधिया का फायदा भाजपा दो तरीके से लेना चाहेगी। पहला मसला तात्कालिक है जिसके तहत मोदी-शाह चाहेंगे कि उनके समर्थक कांग्रेस विधायक और मंत्री टूटकर भाजपा में शामिल हो जाए ताकि कमल नाथ की सरकार गिर जाए। इसका बड़ा फायदा इस रूप में मिलेगा कि कमलनाथ सरकार ने भ्रष्टाचार की जो जांच चलाई थीं मसलन व्यापमं घोटाला, ई-टेंडर घोटाला, हनीट्रैप केस आदि जिनमें भाजपा नेता फंसे हुए हैं, कांग्रेस की सरकार गिरते ही ये जांच भी खत्म हो जाएंगी। इसमें पार्टी को कितना फायदा मिलता है ये आने वाला वक्त बताएगा। दूसरा मसला दीर्घकालिक है। वह यह कि मध्यप्रदेश का ग्वालियर-चंबल अंचल जिसके बारे में कहा जाता है कि वहां सिंधिया का सिक्का चलता है, एक बड़ा वोट बैंक जो अभी तक कांग्रेस के साथ था पूरी तरह से महाराज के साथ भाजपा में शिफ्ट हो जाएगा। अगर ऐसा होता है तो भाजपा के अंदर सिंधिया का राजनीतिक भविष्य एक सीमित दायरे में अच्छा रहेगा। लेकिन आज के बदलते राजनीतिक परिदृश्य में सब-कुछ सिंधिया की राजनीति के ही अनुकूल रहेगा, मान लेना सत्य से परे होगा।
जहां तक सिंधिया के भाजपा में शामिल होने के पीछे की कहानी और से कांग्रेस को इससे होने वाले नुकसान की बात है तो निश्चित रूप से कांग्रेसी खेमे में निराशा है। पार्टी का एक कद्दावर युवा चेहरा सिर्फ कांग्रेस पार्टी का नेता ही नहीं था बल्कि कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी का अभिन्न दोस्त भी था। राहुल गांधी ने इस बात का जिक्र मीडिया के सामने किया भी। राहुल की ज्योतिरादित्य से संबंधों के बारे में तो यहां तक कहा जाता है कि वह इकलौते कांग्रेस नेता थे जिन्हें राहुल गांधी से मिलने के लिए समय नहीं लेना पड़ता था। बावजूद इसके ज्योतिरादित्य ने कांग्रेस छोड़ने का फैसला लिया, निश्चित रूप से मसला एकतरफा तो नहीं ही हो सकता है। हो सकता है सिंधिया मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री बनना चाहते हों, नहीं बन सके। राज्यसभा सांसद बनने की तमन्ना पर भी पार्टी ने ग्रहण लगा दिया हो। अगर इन दो बातों को लेकर विश्लेषण किया जाए तो इससे इतर सिंधिया या फिर उनके समर्थकों को इस बात को लेकर भी आत्ममंथन करना चाहिए कि वह चार बार सांसद रहे हैं। पार्टी में लंबे समय तक महासचिव रहे और दस साल तक मनमोहन सरकार में मंत्री रहे। वक्त सब दिन एक जैसा तो होता नहीं है। पार्टी बुरे दौर से गुजर रही है। इसमें कोई दो राय नहीं कि सिंधिया के पार्टी छोड़ने से कांग्रेस को नुकसान तो होगा लेकिन जब कोई पार्टी बुरे दौर में होती है तो उसके नेताओं की भी यह जिम्मेदारी बनती है कि जब अच्छे वक्त में हमने अच्छे दिन गुजारे तो बुरे दौर से निकलने के लिए हमें पार्टी को वक्त देना चाहिए। जहां तक ग्वालियर-चंबल संभाग में कांग्रेस को नुकसान होने की बात की जा रही है तो नुकसान तो लोकसभा चुनाव में पहले हो ही चुका है। अगर वह इस इलाके के इतने बड़े कद्दावर नेता थे और क्षेत्र में इतना बड़ा प्रभाव था तो ज्योतिरादित्य 2019 के चुनाव में कम से कम अपनी सीट तो बचा लेते।
बहरहाल, ज्योतिरादित्य के कांग्रेस छोड़ने और भाजपा में शामिल होने के बाद इससे कांग्रेस को कितना नुकसान होगा और भाजपा को कितना फायदा होगा इसको तात्कालिक राजनीतिक दृष्टिकोण से सोचें तो यह बहुत कुछ मध्यप्रदेश की कमल नाथ सरकार के गिरने या बरकरार रहने से ही तय होगा। आने वाले समय में जब मप्र विधानसभा में बहुमत साबित करने में अगर कमल नाथ सरकार सफल होती है तो तय मानिए, ज्योतिरादित्य भाजपा से राज्यसभा पहुंचकर भी न तो मंत्री बन पाएंगे और न ही ग्वालियर-चंबल संभाग में उनका वो रूतबा रहेगा जैसा कांग्रेस में रहते हुआ करता था। इससे भाजपा को बहुत ज्यादा फर्क तो नहीं पड़ेगा। हां, कांग्रेस के लिए अच्छा यह होगा कि मध्यप्रदेश में दो गुटों में बंटी राजनीति का झमेला जरूर खत्म हो जाएगा। इसके विपरीत कमल नाथ अपनी सरकार नहीं बचा पाते हैं और सिंधिया समर्थक कांग्रेस विधायक कांग्रेस छोड़ देते हैं तो इसे कांग्रेस के लिए बड़ा नुकसान माना जाएगा क्योंकि पूर्ण रूप से कांग्रेस शासित एक राज्य हाथ से निकल जाएगी। इसके बाद कांग्रेस में आंतरिक कलह और बढ़ेगी।

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