क्या यह मोदी सरकार की तरफ से फैलाया जा रहा बड़ा झूठ नहीं है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में भारी कटौती से आम जनता को बड़ा फायदा मिल रहा है? सच्चाई तो यह है कि कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट से पेट्रोल और डीजल के दामों में जो कटौती होनी चाहिए और जो फायदा आम जनता को मिलनी चाहिए वह सब सरकारें और तेल कंपनियां मिलकर बांट रही है। इसे लूटने वाली सरकार नहीं कहें तो क्या कहें, जब मनमोहन सरकार 109 डॉलर प्रति बैरल कच्चा तेल खरीदकर अधिकतम 52 रुपये प्रति लीटर पेट्रोल बेच रही थी वहीं आज मोदी सरकार 38 डॉलर प्रति बैरल कच्चा तेल खरीदकर 70 रुपये प्रति लीटर पेट्रोल बेच रही है।
सरकार ने एक बार फिर से पेट्रोल और डीजल पर एक्साइज ड्यूटी तथा रोड सेस मिलाकर कुल तीन रुपये प्रति लीटर की दर से कर बढ़ाकर ज्यादा कमाई करने का फैसला किया है। इस शुल्क वृद्धि से पेट्रोल पर यह कर बढ़कर 22.98 रुपये प्रति लीटर और डीजल पर 18.83 रुपये प्रति लीटर हो गया है। याद हो तो 2014 में मोदी सरकार ने जब सत्ता अपने हाथ में ली थी तब पेट्रोल पर यह कर 9.48 रुपये प्रति लीटर और डीजल पर 3.56 रुपये प्रति लीटर था। बताया जा रहा है कि इस ताजा कर वृद्धि से केंद्र को लगभग 39,000 करोड़ रुपये का अतिरिक्त फायदा होगा। कांग्रेस पार्टी ने इसका विरोध करते हुए कहा है कि भाजपा सरकार की गैर-निर्देशित जन-विरोधी नीतियां पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस की उच्च कीमतों के लिए जिम्मेदार हैं, क्योंकि कच्चे तेल की कीमतों में पिछले छह वर्षों में 50 प्रतिशत से भी ज्यादा की कमी आई है।
कोरोना वायरस और अमेरिका-रूस में एक-दूसरे से ज्यादा तेल उत्पादन की लगी होड़ के चलते अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में बड़ी गिरावट दर्ज हुई है। अगर आप याद करें तो इस साल के शुरुआत में कच्चा तेल 67 डॉलर प्रति बैरल यानी 30.08 रुपए प्रति लीटर था। 12 मार्च 2020 की बात करें तो कच्चे तेल की कीमत 38 डॉलर प्रति बैरल यानी 17.79 रुपए प्रति लीटर हो गई है। लेकिन क्या डीजल-पेट्रोल की कीमतें इस अनुपात में कम हुई हैं- बिल्कुल नहीं। आइए हम यहां समझने की कोशिश करते हैं कि कैसे 18 रुपये प्रति लीटर मिलने वाला कच्चा तेल पेट्रोल या डीजल के तौर पर हमारी बाइक या कार की टंकी में आते-आते 70 रुपये और 63 रुपये प्रति लीटर तक पहुंच जाता है...
18 रुपए का पेट्रोल 70 रुपये प्रति लीटर का कैसे?
कच्चे तेल की कीमत- 17.79 रुपये प्रति लीटर
तेल कंपनियों का चार्ज- 13.91 रुपये प्रति लीटर
एक्साइज ड्यूटी, रोड सेस- 19.98 (अब 22.98) रुपये प्रति लीटर
पेट्रोल पंप स्वामी का कमीशन- 3.55 रुपये प्रति लीटर
वैट- 14.91 रुपये प्रति लीटर
कुल- 70.14 रुपये प्रति लीटर
18 रुपए का डीजल 63 रुपये प्रति लीटर का कैसे?
कच्चे तेल की कीमत- 17.79 रुपये प्रति लीटर
तेल कंपनियों का चार्ज- 17.55 रुपये प्रति लीटर
एक्साइज ड्यूटी और रोड सेस- 15.83 (अब 18.83) रुपये प्रति लीटर
पेट्रोल पंप स्वामी का कमीशन- 2.49 रुपये प्रति लीटर
वैट- 9.23 रुपये प्रति लीटर
कुल- 62.89 रुपये प्रति लीटर
यूपीए सरकार के मुखिया मनमोहन सिंह के पहले कार्यकाल की बात करें तो वर्ष 2004 से 2009 के दौरान पेट्रोल की कीमत दिल्ली में लगभग स्थिर रही थी। ये कीमत अलग-अलग वर्षों में लगभग 40 से 47 रुपये प्रति लीटर के बीच थी। मुंबई में ये आंकड़ा थोड़ा ज्यादा 45 से 50 रुपये प्रति लीटर के बीच था। शोध संस्था माइक्रोट्रेंड्स के अनुसार, इस दौरान अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत 50 डॉलर प्रति बैरल से 160 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई थीं। मनमोहन सिंह का दूसरा कार्यकाल वैश्विक आर्थिक मंदी के साथ शुरू हुआ था। दुनिया भर में मांग काफी कम थी और कमोडिटी कीमतों में भारी गिरावट आई थी। यही वजह रही कि जून 2008 में जहां कच्चे तेल की कीमत 161 डॉलर प्रति बैरल थी, वहीं जनवरी 2009 में घटकर ये 49.83 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर आ गई थी। इस दौरान दिल्ली में पेट्रोल की कीमत औसतन 40 से 73 रुपये के बीच रही। जबकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत औसतन 50 से 127 डॉलर प्रति बैरल के बीच रही।
मोदी सरकार के कार्यकाल की बात करें तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत मई 2014 में 113 डालर प्रति बैरल से लुढ़क कर जनवरी 2015 में 50 डालर प्रति बैरल के स्तर पर आ गए। इसके बाद लंबे समय तक इसी दायरे में बने रहे। जनवरी 2016 में यह 28 डॉलर प्रति बैरल पर लुढ़क गया। लेकिन वेनेजुएला में आर्थिक संकट और ईरान पर अमेरिका के प्रतिबंध की धमकियों के कारण नवंबर 2018 में तेल के दाम अप्रत्याशित उछाल के साथ 80 डालर प्रति बैरल के पार पहुंच गए। लेकिन तब भी मनमोहन के कार्यकाल के मुकाबले कीमत काफी कम रही लेकिन उसका फायदा देश को नहीं मिला। साल दर साल सिलसिलेवार मई के आंकड़ों को देखें तो मोदी सरकार में कभी भी पेट्रोल की कीमत 60 रुपये से नीचे नहीं गया जबकि कच्चे तेल की कीमत कभी 80 डॉलर से ऊपर नहीं गया।
कुल मिलाकर देखा जाए तो कच्चे तेल की कीमतों में फिसलन का फायदा उठाते हुए केन्द्र सरकार ने पेट्रोल-डीजल पर लगने वाली एक्साइड ड्यूटी में बड़ा इजाफा किया। जहां प्रति लीटर पेट्रोल पर 21.50 रुपये एक्साइड ड्यूटी वसूली गई वहीं प्रति लीटर डीजल पर सरकार ने 17.30 रुपये बतौर ड्यूटी वसूला। इसके चलते केन्द्र सरकार की पेट्रोल-डीजल की बिक्री से कमाई दो गुनी हो गई। जहां वित्त वर्ष 2014 में केन्द्र सरकार को पेट्रोल-डीजल पर टैक्स से कमाई जीडीपी का महज 0.7 फीसदी था वहीं वित्त वर्ष 2017 में दोगुना होकर 1.6 फीसदी हो गया। नतीजा यह हुआ कि केन्द्र सरकार के इस फैसले से आम आदमी के लिए पेट्रोल-डीजल की कीमतें कम नहीं हो सकीं। केन्द्र सरकार के अलावा राज्य सरकारों ने भी आम आदमी के लिए सस्ते पेट्रोल-डीजल का रास्ता बाधित किया। केन्द्र सरकार के एक्साइज ड्यूटी से अलग राज्य सरकारों ने पेट्रोल-डीजल की बिक्री पर सेल्स टैक्स में बड़ा इजाफा कर दिया। कच्चे तेल की कीमतों में आई इस फिसलन के दौरान राज्य सरकारों ने पेट्रोल पर वैट को लगभग 40 फीसदी बढ़ाया तो डीजल पर लगभग 28 फीसदी की वृद्धि कर दी गई। इसके चलते दोनों केन्द्र और राज्य सरकारों ने आम आदमी तक सस्ता पेट्रोल-डीजल नहीं पहुंचने दिया और तेल कंपनियों के साथ मिलकर जो आम जनता के हक का मुनाफा आपस में बांट लिया और ये सिलसिला निरंतर जारी है।
सरकार ने एक बार फिर से पेट्रोल और डीजल पर एक्साइज ड्यूटी तथा रोड सेस मिलाकर कुल तीन रुपये प्रति लीटर की दर से कर बढ़ाकर ज्यादा कमाई करने का फैसला किया है। इस शुल्क वृद्धि से पेट्रोल पर यह कर बढ़कर 22.98 रुपये प्रति लीटर और डीजल पर 18.83 रुपये प्रति लीटर हो गया है। याद हो तो 2014 में मोदी सरकार ने जब सत्ता अपने हाथ में ली थी तब पेट्रोल पर यह कर 9.48 रुपये प्रति लीटर और डीजल पर 3.56 रुपये प्रति लीटर था। बताया जा रहा है कि इस ताजा कर वृद्धि से केंद्र को लगभग 39,000 करोड़ रुपये का अतिरिक्त फायदा होगा। कांग्रेस पार्टी ने इसका विरोध करते हुए कहा है कि भाजपा सरकार की गैर-निर्देशित जन-विरोधी नीतियां पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस की उच्च कीमतों के लिए जिम्मेदार हैं, क्योंकि कच्चे तेल की कीमतों में पिछले छह वर्षों में 50 प्रतिशत से भी ज्यादा की कमी आई है।
कोरोना वायरस और अमेरिका-रूस में एक-दूसरे से ज्यादा तेल उत्पादन की लगी होड़ के चलते अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में बड़ी गिरावट दर्ज हुई है। अगर आप याद करें तो इस साल के शुरुआत में कच्चा तेल 67 डॉलर प्रति बैरल यानी 30.08 रुपए प्रति लीटर था। 12 मार्च 2020 की बात करें तो कच्चे तेल की कीमत 38 डॉलर प्रति बैरल यानी 17.79 रुपए प्रति लीटर हो गई है। लेकिन क्या डीजल-पेट्रोल की कीमतें इस अनुपात में कम हुई हैं- बिल्कुल नहीं। आइए हम यहां समझने की कोशिश करते हैं कि कैसे 18 रुपये प्रति लीटर मिलने वाला कच्चा तेल पेट्रोल या डीजल के तौर पर हमारी बाइक या कार की टंकी में आते-आते 70 रुपये और 63 रुपये प्रति लीटर तक पहुंच जाता है...
18 रुपए का पेट्रोल 70 रुपये प्रति लीटर का कैसे?
कच्चे तेल की कीमत- 17.79 रुपये प्रति लीटर
तेल कंपनियों का चार्ज- 13.91 रुपये प्रति लीटर
एक्साइज ड्यूटी, रोड सेस- 19.98 (अब 22.98) रुपये प्रति लीटर
पेट्रोल पंप स्वामी का कमीशन- 3.55 रुपये प्रति लीटर
वैट- 14.91 रुपये प्रति लीटर
कुल- 70.14 रुपये प्रति लीटर
18 रुपए का डीजल 63 रुपये प्रति लीटर का कैसे?
कच्चे तेल की कीमत- 17.79 रुपये प्रति लीटर
तेल कंपनियों का चार्ज- 17.55 रुपये प्रति लीटर
एक्साइज ड्यूटी और रोड सेस- 15.83 (अब 18.83) रुपये प्रति लीटर
पेट्रोल पंप स्वामी का कमीशन- 2.49 रुपये प्रति लीटर
वैट- 9.23 रुपये प्रति लीटर
कुल- 62.89 रुपये प्रति लीटर
यूपीए सरकार के मुखिया मनमोहन सिंह के पहले कार्यकाल की बात करें तो वर्ष 2004 से 2009 के दौरान पेट्रोल की कीमत दिल्ली में लगभग स्थिर रही थी। ये कीमत अलग-अलग वर्षों में लगभग 40 से 47 रुपये प्रति लीटर के बीच थी। मुंबई में ये आंकड़ा थोड़ा ज्यादा 45 से 50 रुपये प्रति लीटर के बीच था। शोध संस्था माइक्रोट्रेंड्स के अनुसार, इस दौरान अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत 50 डॉलर प्रति बैरल से 160 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई थीं। मनमोहन सिंह का दूसरा कार्यकाल वैश्विक आर्थिक मंदी के साथ शुरू हुआ था। दुनिया भर में मांग काफी कम थी और कमोडिटी कीमतों में भारी गिरावट आई थी। यही वजह रही कि जून 2008 में जहां कच्चे तेल की कीमत 161 डॉलर प्रति बैरल थी, वहीं जनवरी 2009 में घटकर ये 49.83 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर आ गई थी। इस दौरान दिल्ली में पेट्रोल की कीमत औसतन 40 से 73 रुपये के बीच रही। जबकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत औसतन 50 से 127 डॉलर प्रति बैरल के बीच रही।
मोदी सरकार के कार्यकाल की बात करें तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत मई 2014 में 113 डालर प्रति बैरल से लुढ़क कर जनवरी 2015 में 50 डालर प्रति बैरल के स्तर पर आ गए। इसके बाद लंबे समय तक इसी दायरे में बने रहे। जनवरी 2016 में यह 28 डॉलर प्रति बैरल पर लुढ़क गया। लेकिन वेनेजुएला में आर्थिक संकट और ईरान पर अमेरिका के प्रतिबंध की धमकियों के कारण नवंबर 2018 में तेल के दाम अप्रत्याशित उछाल के साथ 80 डालर प्रति बैरल के पार पहुंच गए। लेकिन तब भी मनमोहन के कार्यकाल के मुकाबले कीमत काफी कम रही लेकिन उसका फायदा देश को नहीं मिला। साल दर साल सिलसिलेवार मई के आंकड़ों को देखें तो मोदी सरकार में कभी भी पेट्रोल की कीमत 60 रुपये से नीचे नहीं गया जबकि कच्चे तेल की कीमत कभी 80 डॉलर से ऊपर नहीं गया।
कुल मिलाकर देखा जाए तो कच्चे तेल की कीमतों में फिसलन का फायदा उठाते हुए केन्द्र सरकार ने पेट्रोल-डीजल पर लगने वाली एक्साइड ड्यूटी में बड़ा इजाफा किया। जहां प्रति लीटर पेट्रोल पर 21.50 रुपये एक्साइड ड्यूटी वसूली गई वहीं प्रति लीटर डीजल पर सरकार ने 17.30 रुपये बतौर ड्यूटी वसूला। इसके चलते केन्द्र सरकार की पेट्रोल-डीजल की बिक्री से कमाई दो गुनी हो गई। जहां वित्त वर्ष 2014 में केन्द्र सरकार को पेट्रोल-डीजल पर टैक्स से कमाई जीडीपी का महज 0.7 फीसदी था वहीं वित्त वर्ष 2017 में दोगुना होकर 1.6 फीसदी हो गया। नतीजा यह हुआ कि केन्द्र सरकार के इस फैसले से आम आदमी के लिए पेट्रोल-डीजल की कीमतें कम नहीं हो सकीं। केन्द्र सरकार के अलावा राज्य सरकारों ने भी आम आदमी के लिए सस्ते पेट्रोल-डीजल का रास्ता बाधित किया। केन्द्र सरकार के एक्साइज ड्यूटी से अलग राज्य सरकारों ने पेट्रोल-डीजल की बिक्री पर सेल्स टैक्स में बड़ा इजाफा कर दिया। कच्चे तेल की कीमतों में आई इस फिसलन के दौरान राज्य सरकारों ने पेट्रोल पर वैट को लगभग 40 फीसदी बढ़ाया तो डीजल पर लगभग 28 फीसदी की वृद्धि कर दी गई। इसके चलते दोनों केन्द्र और राज्य सरकारों ने आम आदमी तक सस्ता पेट्रोल-डीजल नहीं पहुंचने दिया और तेल कंपनियों के साथ मिलकर जो आम जनता के हक का मुनाफा आपस में बांट लिया और ये सिलसिला निरंतर जारी है।

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