कोरोना महासंकट के बीच एक छोटा सा लोकतांत्रिक देश ताइवान पूरी दुनिया को दो हिस्सों में बांटने के लिए खुद को खड़ा कर लिया है। इसकी मुख्य वजह है- चीन की शह पर उसे डब्ल्यूएचओ से निकाल बाहर करना। ताइवान के उपराष्ट्रपति चेन चिएन जेन के हवाले से खबरों में कहा भी गया है कि आपदा के समय आप किसी को अनाथ कर रहे हैं। यह साफ करता है कि डब्ल्यूएचओ अपनी तटस्थ ज़िम्मेदारियों से ज़्यादा राजनीति में लिप्त है। लेकिन चीन में नेशनल पीपुल्स कांग्रेस की महत्वपूर्ण वार्षिक बैठक में ताइवान को लेकर प्रीमियर ली कचियांग ने शुक्रवार (22 मई ) को कहा कि चीन अपनी संप्रभुता को लेकर अडिग है। कहने का मतलब यह कि चीन ताइवान को लेकर जिस नीति पर पहले से काम करता आ रहा है उसमें कोई फेरबदल नहीं करेगा। अब इस पूरे प्रकरण में एक धड़ा चीन के साथ है तो दूसरा चीन के खिलाफ जिसका नेतृत्व अमेरिका कर रहा है। चीन भले ही ताइवान को अपना प्रांत मानता हो लेकिन 2.30 करोड़ की आबादी वाला ताइवान ख़ुद को एक अलग लोकतंत्र बताता है जहां साल 1949 में चीन से भागकर आए लोग बस गए थे। इसकी बुनियाद में चीन विरोध गहरे तक समाया हुआ है। जैसा कि कहा जाता है, चीन से पूरी दुनिया में फैला कोरोना वायरस चीन विरोधी देशों के लिए अचूक हथियार है। और इसी का फायदा ताइवान के साथ मिलकर अमेरिका उठाना चाह रहा है।
दरअसल, ताइवानी उपराष्ट्रपति चेन चिएन-जेन का कहना है कि ताइवान ने 31 दिसंबर 2019 को ही विश्व स्वास्थ्य संगठन डब्ल्यूएचओ को चेतावनी दी थी कि कोरोना वायरस इंसान से इंसान में फैलता है। चेन ने फाइनेंशियल टाइम्स को बताया कि ताइवानी डॉक्टरों ने शुरू में ही यह पता लगा लिया था कि वुहान में इस बीमारी का इलाज करने वाले डॉक्टर और दूसरे मेडिकल स्टाफ बीमार पड़ रहे हैं। लेकिन डब्ल्यूएचओ ने इस जानकारी को गंभीरता से नहीं लिया और न ही वक्त रहते इसकी पुष्टि की। बस, अमेरिका को एक सुनहरा मौका हाथ लगा एक तीर से डब्ल्यूएचओ और चीन दोनों पर निशाना साधने का। साथ ही ताइवान में घुसने का। अमरीकी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा, अमरीका इस बात से बेहद हैरान है कि वैश्विक स्वास्थ्य समुदाय से ताइवान की सूचना क्यों छिपाई गई। 14 जनवरी 2020 को बयान जारी कर डब्ल्यूएचओ कह रहा था कि इस वायरस के इंसान से इंसान में ट्रांसमिशन के संकेत नहीं मिले हैं जबकि ताइवान 31 दिसंबर को ही डब्ल्यूएचओ को बता चुका था कि कोरोना इंसान से इंसान में फैलने वाला वायरस है। डब्ल्यूएचओ के इस हरकत से वक़्त और ज़िंदगियां दोनों बर्बाद हुई हैं।
अब ताइवान और डब्ल्यूएचओ की तू-तू मैं-मैं को अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प की सारी इंद्रियां एकदम से जागृत हो गईं। उन्हें लगा कि इससे बेहतर मौका चीन और डब्ल्यूएचओ को घेरने का तथा ताइवान के दिल में जगह बनाने का नहीं हो सकता है। क्योंकि इसी बीच त्साई इंग वेन एक बार फिर से ताइवान की राष्ट्रपति चुनी गईं। अमेरिका ने लगे हाथों जीत का बधाई संदेश देने में देर नहीं की। वेन का जीतना और अमेरिकी का बधाई संदेश दोनों ही चीन को नागवार गुजरा। फिर उसे यह भी लगा कि कोरोना वायरस के खिलाफ चीन की तुलना में बहुत अच्छे से लड़ने पर ताइवान का प्रभुत्व कहीं बढ़ने न लगे, इसलिए दबाव बनाकर चीन ने उसे विश्व स्वास्थ्य संगठन से बाहर निकलवा दिया। इसको लेकर चीन लंबे अरसे से दावा कर रहा था कि ताइवान कोई अलग संप्रभु देश नहीं बल्कि उसी का एक हिस्सा है। लेकिन, इस दावे के बावजूद बरसों से ताइवान संगठन में था। जब चीन व ताईवान के रिश्ते अच्छे थे, तब 2009 से 2016 के बीच ताईवान ऑब्ज़र्वर के तौर पर डब्ल्यूएचओ का हिस्सा रहा। अब अमेरिका व उसके समर्थक देश ताइवान को संगठन में शामिल किए जाने के पक्ष में आकर चीन के खिलाफ रणनीति तैयार कर रहे हैं।
अब ऐसे में बड़ा सवाल यह उठता है कि ताइवान का भविष्य क्या होगा और भारत की भूमिका क्या होनी चाहिए? अमेरिका और उसके समर्थक भले ही ताइवान को बाहर करने के डब्ल्यूएचओ के कदम को गलत ठहरा रहे हों, लेकिन उनका असली मकसद डब्ल्यूएचओ और चीन पर वैश्विक दबाव बनाकर अपना उल्लू सीधा करना ज़्यादा है, ताइवान से हमदर्दी रखना कम। ऐसे में सीएनए की रिपोर्ट को आधार मानें तो लैटिन अमेरिका के आर्थिक रूप से कमजोर समझे जाने वाले अधिकतम 15 देश ताइवान के समर्थन में आ सकते हैं। बाकी कोई देश ताइवान की सीट के लिए चीन से सीधे दुश्मनी मोल नहीं लेगा। हालांकि यह सच बात है कि त्साई इंग-वेन के हाल में दोबारा राष्ट्रपति चुने जाने से चीन की मुश्किलें बढ़ी हैं क्योंकि त्साई चीन की 'एक राष्ट्र' की परिकल्पना में ताइवान को देखने की हमेशा से विरोधी रही हैं और ताइवान के स्वतंत्र देश के दर्जे के लिए लड़ती रही हैं। त्साई की दोबारा जीत के पीछे चीन के खिलाफ डटकर मुकाबला बड़ी वजह रही है। 2016 में पहली बार त्साई के राष्ट्रपति बनने के बाद से ही चीन ताइवान के खिलाफ दबाव बना रहा था। अब अगर ताइवान अमेरिका और ब्रिटेन जैसे बड़े देश को समर्थक के तौर पर चीन के खिलाफ जुटाने में सफल रहा तो यह चीन के लिए बड़ी मुश्किल होगी।
जहां तक भारत की भूमिका का सवाल है तो पिछले कुछ हफ्तों में ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, जापान और न्यूज़ीलैंड ने अमेरिका के सुर में सुर मिलाते हुए कहा है कि विश्व स्वास्थ्य सभा में ताइवान को ऑब्ज़र्वर का दर्जा मिलना चाहिए। इस पर चीन का रुख ये था कि पश्चिमी देश कोरोना से लड़ने में अपनी नाकामी को छिपाने के लिए ताइवान पर राजनीति कर रहे हैं। अब इन गुटीय वैश्विक कूटनीति की जमीन पर भारत को अपने पुराने रूख पर ही कायम रहना चाहिए था। लेकिन मोदी सरकार ने अपनी नीति में बदलाव करते हुए दो ऐसे काम एक साथ किए जिससे चीन का अपरोक्ष तौर पर नाराज होना स्वाभाविक था। पहला... डब्ल्यूएचओ की जो बैठक अभी हाल ही में संपन्न हुई उसमें कोरोना महासंकट को लेकर अमेरिका जिस तरह से चीन पर आरोप लगा रहा है और जांच के लिए जिन 62 देशों ने मिलकर एक प्रस्ताव पारित करवाया उसमें भारत भी शामिल हो गया। दूसरा...त्साई इंग-वेन ने दो दिन पहले ताइवान के राष्ट्रपति पद की दोबारा शपथ ली। इस शपथ ग्रहण कार्यक्रम में भाजपा के दो सांसदों, मीनाक्षी लेखी और राहुल कस्वान ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए हिस्सा लिया और वेन को बधाई दी। लेखी और कस्वान समेत दुनियाभर के 41 देशों के कुल 42 गणमान्य हस्तियों ने इस कार्यक्रम में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए शिरकत की। इस बात को जानते हुए कि चीन ताइवान को स्वतंत्र राष्ट्र का दर्जा नहीं देता है और उसे अपना ही एक हिस्सा बताता है।
अब यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या मोदी सरकार ने ताइवान के प्रति अपनी नीति बदल दी है? सवाल के पीछे की सबसे बड़ी वजह यह है कि 2016 में जब त्साई ने पहली बार राष्ट्रपति पद की शपथ ली थी तब मोदी सरकार ने न्योता मिलने के बावजूद अपने किसी सांसद को ताइवान नहीं भेजने का फैसला किया था। लेकिन इस बार के शपथ ग्रहण समारोह में लेखी और कस्वान के अलावा भारत-ताइपे एसोसिएशन के कार्यकारी महानिदेशक सोहंग सेन ने भी हिस्सा लिया। ताइपे में उन्होंने भारत का प्रतिनिधित्व किया। संयुक्त राष्ट्र के 194 सदस्य देशों में से 179 देशों का ताइवान के साथ राजनयिक संबंध हैं, लेकिन भारत अब तक इससे बच रहा था। चीन ने शपथ ग्रहण समारोह में भारतीय सांसदों की आभासी उपस्थिति पर तो कोई अलग से बयान नहीं दिया, लेकिन ताइवानी राष्ट्रपति को बधाई संदेश देने वाले विदेशी नेताओं की निंदा जरूर की है। लेकिन इस बीच चीन और नेपाल की सीमा पर जिस तरह की मुश्किलें खड़ी की जा रही हैं, आप दावे के साथ यह नहीं कह सकते कि इसमें चीन की भूमिका नहीं है।
अब यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या मोदी सरकार ने ताइवान के प्रति अपनी नीति बदल दी है? सवाल के पीछे की सबसे बड़ी वजह यह है कि 2016 में जब त्साई ने पहली बार राष्ट्रपति पद की शपथ ली थी तब मोदी सरकार ने न्योता मिलने के बावजूद अपने किसी सांसद को ताइवान नहीं भेजने का फैसला किया था। लेकिन इस बार के शपथ ग्रहण समारोह में लेखी और कस्वान के अलावा भारत-ताइपे एसोसिएशन के कार्यकारी महानिदेशक सोहंग सेन ने भी हिस्सा लिया। ताइपे में उन्होंने भारत का प्रतिनिधित्व किया। संयुक्त राष्ट्र के 194 सदस्य देशों में से 179 देशों का ताइवान के साथ राजनयिक संबंध हैं, लेकिन भारत अब तक इससे बच रहा था। चीन ने शपथ ग्रहण समारोह में भारतीय सांसदों की आभासी उपस्थिति पर तो कोई अलग से बयान नहीं दिया, लेकिन ताइवानी राष्ट्रपति को बधाई संदेश देने वाले विदेशी नेताओं की निंदा जरूर की है। लेकिन इस बीच चीन और नेपाल की सीमा पर जिस तरह की मुश्किलें खड़ी की जा रही हैं, आप दावे के साथ यह नहीं कह सकते कि इसमें चीन की भूमिका नहीं है।





