आज एक मई है जिसे पूरी दुनिया 'अंतरराष्ट्रीय मजदूर दिवस' के रूप में याद करती है। यह वही तारीख है जब 1886 में एक नारा गढ़ा गया था- 'आठ घंटे काम, आठ घंटे आराम और आठ घंटे अपनी मर्जी का!' और इसी नारे के साथ अमेरिका के 13 हजार से अधिक व्यापारिक प्रतिष्ठानों में काम करने वाले करीब तीन लाख मजदूर अपनी एकजुटता का प्रदर्शन करते हुए सड़कों पर उतर आए थे। कहते हैं कि 'आठ घंटे का आंदोलन' इन मजदूरों के पांच दशक के संघर्षों की गाथा का चरम था। कारवां आगे बढ़ता गया। 4 मई को शिकागो के समूचे औद्योगिक और व्यवसायिक प्रतिष्ठानों के लाखों मजदूर काम रोक कर शाम को हे मार्केट स्क्वायर पर एकत्र हुए। जैसा कि आमतौर पर होता है, मज़दूरों की इस अभूतपूर्व एकजुटता को देखकर पूंजीपतियों के बीच हड़कंप मच गया। सत्ता भी चौंक गई। आनन-फानन में 176 पुलिसकर्मियों का एक दल भेजा गया। लेकिन मजदूरों का शांतिपूर्ण आंदोलन चलता रहा। मजदूरी के प्रिय नेता ऑगस्ट स्पाइस भाषण समाप्त कर चुके थे। इसी बीच पुलिस की दखलंदाजी शुरू होती है। अचानक एक बम फूटता है। फिर क्या था, पुलिस की गोलियों की अंधाधुंध बौछारें शुरू हो गईं। आठ पुलिस समेत सैकड़ों मजदूर उस रक्तरंजित हमले में मारे एग। सैकड़ों ज़ख़्मी हो गए। फिर सत्ता के दमन का अगला पाखंड शुरू हुआ। आठ मज़दूर नेताओं के जो 'आठ घंटे आंदोलन' के लोकप्रिय नेता थे ऊनके ऊपर मुकदमे का खेल शुरू हो गया। अल्बर्ट पार्सन्स, ऑगस्ट स्पाइस, सैम्युअल फ़िल्डेन, ऑस्कर निब्बे, माइकल श्वाब, जॉर्ज एंगेल, एडोल्फ फ़िशर और लुई लिंग को गिरफ्तार कर लिया गया। उनपर कत्ल का मुकदमा शुरू हुआ। उसे जज और जूरी की अदालत में जिसके बारे में खबरें उस समय के अधिकांश निष्पक्ष पत्रकारों द्वारा की गई रिपोर्टिंग की वजह से अखबारों की सुर्खियां बनी कि, 'जज पक्षपाती है और जूरी का गठन बड़े व्यवसायिक घरानों से की गई है जिससे यह पूरा का पूरा न्यायिक कार्य महज दिखावा और मज़ाक़ है।' फिर वही हुआ जो निरंकुश सत्ता में होता है- अभियुक्तों के भाषणों, पत्र-पत्रिकाओं, अख़बारों में प्रकाशित उनके लेख, बयान आदि को आधार बनाकर अदालत और जूरी का फैसला आया जिसमें अभियुक्तों में से पांच क्रांतिकारी नेताओं पार्सन्स, एंगेल, स्पाइस, फ़िशर और लुई लिंग को फांसी की सज़ा सुनाई गई और शेष तीन श्वाब, निब्बे और फ़िल्डेन को 15-15 साल के जेल की सजा। उसके बाद जुलाई 1889 में सोशलिस्ट और लेबर पार्टी के 20 देशों के प्रतिनिधियों ने पेरिस में एक बैठक की। इस दौरान सेकेण्ड इंटरनेशनल का गठन किया गया जो 1889 से 1916 तक अस्तित्व में रही। 1889 में सेकेण्ड इंटरनेशनल की इसी पेरिस बैठक में रेमंड लाविग्ने ने एक प्रस्ताव के माध्यम से 'हे मार्केट शहीदों' की स्मृति में हर वर्ष एक दिवस के रूप में मनाने का निर्णय किया गया जिसे बाद सेकेण्ड इंटरनेशनल कांग्रेस ने 1891 में आधिकारिक रूप से 1 मई को मजदूर दिवस की मान्यता दे दी। भारत की बात करें तो यहां 1 मई 1923 को पहली बार मजदूर दिवस मनाया गया था। सिंगारवेलु चेट्टियार देश के कम्युनिस्टों में से एक तथा प्रभावशाली ट्रेड यूनियन और मज़दूर तहरीक के नेता थे। उन्होंने अप्रैल 1923 में भारत में मई दिवस (मजदूर दिवस) मनाने का सुझाव दिया था।
इस ऐतिहासिक घटनाक्रम का उल्लेख यहां हमने दो वजहों से किया है। पहला यह कि बहुत से लोगों खासकर आज की युवा पीढ़ी जो सोशल मीडिया में वायरल तथ्य को ही इतिहास मानने की भूल कर बैठता है, उन्हें पता होना चाहिए कि अंतरराष्ट्रीय मजदूर दिवस का इतिहास कितना रक्तरंजित है। मजदूर दिवस या श्रमिक दिवस कोई ऐसे ही नहीं मनाता है। इस दिवस के पीछे मजदूरों ने बड़ी कुर्बानियां दी हैं। दूसरा अहम तथ्य जिसको लेकर हम यहां विस्तार से बात करना चाहते हैं वह है 'आठ घंटे का आंदोलन'। 1886 में मजदूर आंदोलन की जो बुनियाद रखी गई थी उसके मूल में असली बात यही थी- 'आठ घंटे काम, आठ घंटे आराम और आठ घंटे हमारी मर्जी का!' हालांकि इन मजदूरों की और भी कई मांगें थी, लेकिन सबसे प्रमुख मांग '8 घंटे का कार्य दिवस' को वैधानिक रूप से मान्यता दिलाने की थी। दुर्भाग्य से भारत समेत पूरी दुनिया में मजदूरों के काम करने के घंटे को लेकर बहस फिर से छिड़ने लगी हैं क्योंकि हालात एक बार फिर से 1886 के पहले जैसी होती दिख रही है। कोरोना संकट के बीच मजदूरों की जिंदगी तो खतरे में पड़ी ही है, साथ ही उसके 8 घंटे के कार्यदिवस पर भी सरकार और कॉरपोरेट का हथौड़ा चलने वाला है। फैक्ट्रियों से लेकर बड़े-बड़े कॉरपोरेट दफ्तरों तक में 8 घंटे के कार्यदिवस को आईना दिखाया जा रहा है और कहा जाता है कि दफ्तर में आने का समय होता है, जाने का नहीं। कुछ बड़े कॉरपोरेट ऑफिस में '9 घंटे का कार्यदिवस' को कानूनी जामा भी पहना दिया गया है लेकिन यहां भी यह कार्यदिवस कहीं-कहीं 12 घंटे तक हो जाता है जिसे आपस की रजामंदी के आधार पर चलाया जा रहा है। 12 घंटे तक काम करने की परिस्थिति तमाम मजदूर चाहे वह शारीरिक श्रम से जुड़ा हो या फिर मानसिक श्रम से, उसे शारीरिक, आर्थिक, पारिवारिक और सामाजिक तौर पर लगातार तोड़ रहा है। उसके अस्तित्व को नष्ट कर रहा है। लेकिन वह विवश है क्योंकि उसने अपनी एकजुटता का जो ताना-बाना था उसे खुद ही छिन्न-भिन्न कर दिया है। वह कॉर्ल मार्क्स का वह नारा भुला दिया- दुनिया के मजदूरों एक हो, तुम्हारे पास खोने के लिए कुछ नहीं और पाने के लिए पूरी दुनिया।
आज जब पूरी दुनिया कोरोना महामारी की वजह से लॉकडाउन और भारत कंप्लीट लॉकडाउन की परिस्थिति में जीने को अभिशप्त है, दुनियाभर की मजदूर विरोधी सोच रखने वाली सरकारें यहां तक सोचने लगी हैं कि '8 घंटा कार्यदिवस' का जो कानून 1886 से चला आ रहा है उसे बदलकर उसमें राष्ट्रवाद का घी और कानून का तड़का डालकर 12 घंटे कर दिया जाए। भारत में भी इस तरह की बात पर मंथन चल रहा है और इसको लेकर कॉरपोरेट का सरकार पर भारी दबाव है। मजदूर संगठनों को इस बारे में सोचना चाहिए और समय रहते इसके खिलाफ आंदोलन छेड़ना चाहिए कि इस तरह की कोई भी पहल देश के लिए घातक होगा। वैसे ही देश में जब से आर्थिक उदारीकरण की लहर चली, भारतीय अर्थव्यवस्था धीरे-धीरे गिरती गई और कोरोना के दौर में तो ठप्प ही हो गई है। उसपर अगर मजदूरों के खिलाफ काम के घंटे को लेकर विरोधी नीति सरकार के स्तर पर बनी तो फिर बहुत मुश्किल हो जाएगी। क्योंकि कोरोना की वजह से सरकार ने जिस तरह से नोटबंदी की तर्ज पर सिर्फ चार घंटे की मोहलत के साथ कंप्लीट लॉकडाउन का ऐलान कर दिया उसमें अगर किसी एक वर्ग की हालत सबसे खराब हुई है तो वह है कमजोर तबके का प्रवासी मजदूर। मजदूरों की एक ऐसी श्रेणी जिसके घर में अगले दिन का राशन नहीं होता। दिहाड़ी मजदूरी के बल पर गुजारा करने वाले इन प्रवासी मजदूरों की सुध लेने वाला कोई नहीं होता। उसके पास न तो राशन कार्ड होता है, न ही वह सरकार की किसी गरीब कल्याण योजना का हिस्सा होता है। शहर की पैमाइश में किसी की नजर पड़ गई तो ठीक वरना इनकी और इनके परिवार की जिंदगी भगवान भरोसे। बीच-बीच में ट्रेन और बस के चलने की अफवाह उड़ती है तो फिजिकल डिस्टेंसिंग की धज्जियां उड़ाते हुए ये प्रवासी मजदूर इस उम्मीद में सड़कों पर निकल आते हैं कि किसी तरह से वो अपने गांव पहुंच जाएं। लेकिन वहां उन्हें बस या ट्रेन नहीं बल्कि मिलती हैं निरंकुश सत्ताधारी पुलिस की लाठियां। ऐसी सरकार से क्या हम इस तरह की उम्मीद कर सकते हैं कि आने वाले वक्त में बेबश और लाचार किस्म के मजदूरों के लिए कोई ऐसी नीति बने ताकि महा आपदा और आपात परिस्थिति में इनके जीने का आधार बने। क्या असंगठित क्षेत्र का जो सेक्टर है इसे पूरी तरह से खत्म करने के लिए दुनिया भर सकी सरकारें किसी योजना को अमली जामा पहनाने पर विचार करेगी? क्योंकि यह संकट विश्वव्यापी है। भारत का संकट थोड़ा ज्यादा है। उम्मीद तो हम यही करेंगे कि कोरोना संकट को हम कोरोना क्रांति के रूप में स्वीकार करें और आज मजदूर दिवस के प्रण लें कि आने वाले वक्त में सरकार की नीति मजदूर हितैषी हो और असंगठित क्षेत्र के मजदूरों के लिए एक ऐसा रजिस्ट्रर बने जिसमें गलती से भी कोई वंचित न रहने पाए।

No comments:
Post a Comment