Saturday, 16 May 2020

प्रवासी मजदूरों को रौंद रहा सत्ता का अहंकार

बेचता यूं ही नहीं है आदमी ईमान को,
भूख ले जाती है ऐसे मोड़ पर इंसान को।

सब्र की इक हद भी होती है तवज्जो दीजिए,
गर्म रक्खें कब तलक नारों से दस्तरख़्वान को।
(अदम गोण्डवी)

कोरोना का काल, लॉकडाउन की मार और सत्ता का अहंकार जब अपने चरम पर हो तो प्रवासी मजदूरों के विस्थापन का सैलाब निश्चित रूप से पूरे समाज और देश को तहस-नहस कर देता है। अगर हम कोरोना को कुदरत का कहर मानें तो जाहिर तौर पर हमारा आपका इसके ऊपर वश नहीं, लेकिन लॉकडाउन की मार और सत्ता का अहंकार तो हम सबने खड़ा किया है। इसकी कीमत आज मजदूर वर्ग चुका रहा है, कल मध्यम वर्ग चुकाएगा और फिर परसों मुट्ठीभर अमीर वर्ग। तय मानिए बचेगा कोई नहीं।

कोरोना महासंकट के बीच एक और काली रात जो कुछ वक्त में गुजरने वाली थी लेकिन, इसे मजदूरों की बदकिस्मती कहें या काल की कुचाल, उनके नसीब में सुबह का सूरज देखना नहीं था क्योंकि शायद वो मजदूर थे और मजबूर भी। जिंदगी की अंगड़ाई, मौत की आहट को नहीं भांप सकी। काली रात ने चंद लम्हों में सब कुछ खत्म कर दिया। जी हां! हम बात कर रहे हैं उत्तर प्रदेश के औरैया जिले में शनिवार तड़के 3:30 बजे हाईवे पर दो ट्रकों की टक्कर की जिसमें करीब 24 मजदूरों की मौत हो गई और कई दर्जन जख्मी हो गए। इन ट्रकों में सवार सभी मजदूर इसी देश के थे। मध्य प्रदेश के छतरपुर में भी एक सड़क हादसा हुआ जिसमें चार महिलाओं समेत 6 मजदूरों की मौत हो गई। इस तरह से बीते 8 दिनों में चार और बड़े हादसे हुए जिसमें 32 अन्य मजदूरों की मौत हो चुकी है। 8 मई को महाराष्ट्र में औरंगाबाद के पास रेलवे ट्रैक पर 16 प्रवासी मजदूरों की मालगाड़ी की चपेट में आने से वीभत्स मौत की घटना को कौन भुला सकता है। अब मैं आपको कुछ ऐसी तस्वीरों से रू-ब-रू कराना चाहूंगा जो काफी वायरल हुए हैं। यहां इसका जिक्र इसलिए जरूरी है ताकि समाज, देश और सत्ता को समझ में आ सके कि मजदूर होने की उसे कितनी कीमत चुकानी पड़ती है। 



कोरोना संकट में लॉकडाउन के बीच एक बेबस और मजलूम पिता की मजबूरी कैसे ईमान को डिगा देती है...कैसे उसे कसूरवार बना देती है, इसे बरेली के मोहम्मद इकबाल की इस चिट्ठी से महसूस किया जा सकता है। इकबाल का कसूर सिर्फ इतना है कि उसने दिव्यांग बेटे को 1150 किमी दूर ले जाने के लिए साइकिल चुरा ली। लेकिन दूसरी तरफ साइकिल मालिक के नाम चिट्ठी भी छोड़ी, जिसमें लिखा कि मैं आपका कसूरवार हूं, लेकिन मजदूर हूं और मजबूर भी। मैं आपकी साइकिल लेकर जा रहा हूं। मुझे माफ कर देना...



इस तस्वीर में पूर्णिया जिले की मुख्तारा खातून की पीड़ा भी लॉकडाउन के कारण मजदूरी पर आए संकट की कहानी है। एक कामगार की पत्नी की बेबसी है और एक मां की दारुण कथा भी। पर परेशानियां अभी शुरू हुई थी, मुख्तारा के सामने पति नूरजामी बेहोश पड़ा था। कपड़े से ढंका हुआ। गुड़गांव से जब वह परिवार समेत अपने गांव के लिए निकला तो लखनऊ के पास ट्रक ने नूरजामी को टक्कर मार दी, जिससे उसका पैर टूट गया। 


ऐसी तस्वीरों को देखना मन-मस्तिष्क में दर्द पैदा करता है, विचलित करता है, लेकिन इस वक्त का सच भी यही है। विस्थापन का दर्द समेटे जितने भी मजदूर एक जगह से दूसरी जगह जा रहे हैं, उनके बच्चों के चेहरे मुरझाए और आंखें सूखे हुए दिखेंगे। आखिर दर्द बयां भी वह किससे करें। यह तस्वीर छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर की है। यह बच्चा पत्थर पर बैठा था। मां की गोद की आदत तो जैसे छूट सी गई। अब तो पत्थर पर भी नींद आ जाती है।  

न जाने ऐसी कितनी तस्वीरें अलग-अलग जगहों से निकलकर हमारे और आपके बीच में आ रही हैं। क्या किसी को गुस्सा नहीं आता है? मैं आप सबसे पूछना चाहता हूं कि इसे बेदिल सत्ता और समाज की साजिश नहीं कहें तो और क्या कहें? यहां एक बार फिर अदम गोंडवी की लिखी वो कविता याद आ रही है जो सत्ता और कुंठित मानसिकता वाले समाज पर करारा प्रहार है...

आँख पर पट्टी रहे और अक़्ल पर ताला रहे
अपने शाहे-वक़्त का यूँ मर्तबा आला रहे

तालिबे शोहरत हैं कैसे भी मिले मिलती रहे
आए दिन अख़बार में प्रतिभूति घोटाला रहे

एक जनसेवक को दुनिया में अदम क्या चाहिए
चार छह चमचे रहें, माइक रहे और माला रहे

लेकिन अदम गोंडवी की इन पंक्कियों को भी हुक्मरानों को नहीं भूलना चाहिए जिसमें उन्होंने कहा है...

वो जिसके हाथ में छाले हैं पैरों में बिवाई है,
उसी के दम से रौनक आपके बंगले में आई है।

रोटी कितनी महँगी है ये वो औरत बताएगी,
जिसने जिस्म गिरवी रख के ये क़ीमत चुकाई है।

बहरहाल, कोरोना महासंकट और लॉकडाउन के बीच प्रवासी मजदूरों के विस्थापन से देश में बड़ा संकट पैदा होने वाला है। उद्योग धंधे ठप्प पड़े हैं और जब इन्हें शुरू किया जाएगा तब इन्हें मजदूरों के अभाव का सामना करना पड़ेगा। मजदूरों को घर से वापस लाना बेहद मुश्किल काम होगा क्योंकि इन दो महीनों में जिस तरह की मुश्किलों से वो गुजरे हैं, उन्हें काम पर वापस लाना आसान नहीं होगा। इसका असर उत्पादन पर पड़ेगा। कहने का मतलब यह कि मांग और आपूर्ति का जो मूलभूत सिद्धांत है उसे फिर से व्यवहारिक तौर पर अर्थव्यवस्था की पटरी पर लाना सरकार के लिए बड़ी चुनौती होगी। मोदी सरकार 20 लाख करोड़ का जो विशेष आर्थिक पैकेज लेकर आई है उससे किसका भला हो रहा है या आने वाले वक्त में किसका भला होगा, यह कहना बहुत मुश्किल है। लेकिन इतना तय मानिए कि यह मांग को किसी भी रूप में नहीं बढ़ाएगा। और जब किसी भी प्रोडक्ट की मांग खड़ी नहीं होती है तो उस प्रोडक्ट के उत्पादन का कोई मतलब नहीं। 

सरकार को सबसे पहले इन प्रवासी मजदूरों और मध्यम वर्ग की मुश्किलों को दूर करने की दिशा में कदम उठाने चाहिए थे जो नहीं हो पाया। प्रवासी मजदूरों की बात करें तो उसे राशन, मकान का किराया और घर भेजने के लिए थोड़ी नकदी की व्यवस्था कर दी जाती तो उन्हें पलायन का दर्द नहीं सहना पड़ता और आने वाले वक्त में उद्योग धंधों को शुरू करने में भी मुश्किल नहीं होती। मध्यम वर्ग की बात करें तो उनकी नौकरियां जा रही हैं। सेलरी कटौती हो रही है। ऐसे में सरकार की तरफ से उन्हें तत्काल राहत के तौर पर ईएमआई से छूट, बच्चों की स्कूल फीस में रियायत देने का पब्लिक स्कूलों को निर्देश दिया जाना चाहिए था। लेकिन इस मोर्चे पर भी सरकार ने कुछ नहीं किया। सवाल है कि सारी समस्याओं का समाधान बैंक से लोन लेना तो हो नहीं सकता है। कहने का मतलब यह कि सरकार अपनी जेब से लोगों को राहत देने के लिए कुछ भी देने को तैयार नहीं है। जो कुछ दे रही है वो किसी न किसी तरीके से सरकार की पूर्व में घोषित सरकारी योजनाओं का ही हिस्सा है।

2 comments:

Anonymous said...

सामयिक। लेकिन आप पर राष्ट्रद्रोह का मामला बनता है।

Anonymous said...

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